सभा पर्व · अध्याय 19
चण्डकौशिक की भविष्यवाणी और जरासन्ध से वैर
कृष्ण कथा आगे बढ़ाते हैं: मुनि चण्डकौशिक फिर मगध आते हैं और बृहद्रथ से सम्मान पाकर बालक की महिमा की भविष्यवाणी करते हैं — कोई राजा उसकी बराबरी न कर सकेगा, शस्त्र उसे घायल न करेंगे, उससे भिड़ने वाले राजा नष्ट होंगे, और वह साक्षात् शिव के दर्शन करेगा। बृहद्रथ जरासन्ध का राज्याभिषेक करके रानियों सहित वन चले जाते हैं और वहीं स्वर्ग सिधारते हैं। फिर कृष्ण बताते हैं कि जरासन्ध के जामाता कंस के वध से वैर कैसे आरम्भ हुआ, जरासन्ध ने गिरिव्रज से मथुरा की ओर निन्यानवे योजन तक गदा कैसे फेंकी, और उसके मन्त्री हंस और डिभक के कारण यादवों ने खुले युद्ध से कैसे परहेज़ किया।
कृष्ण उवाच
श्लोक 1 (2.19.1)
कस्यचित्त्वथ कालस्य पुनरेव महातपाः । मगधेषूपचक्राम भगवांश्चण्डकौशिकः ॥
kasyacittvatha kālasya punareva mahātapāḥ | magadheṣūpacakrāma bhagavāṃścaṇḍakauśikaḥ
कुछ समय बाद महातपस्वी भगवान् चण्डकौशिक फिर मगध देश में आए।
श्लोक 2 (2.19.2)
तस्याऽऽगमनसंहृष्टः सामात्यः सपुरःसरः । सभार्यः सह पुत्रेण निर्जगाम बृहद्रथः ॥
tasyā''gamanasaṃhṛṣṭaḥ sāmātyaḥ sapuraḥsaraḥ | sabhāryaḥ saha putreṇa nirjagāma bṛhadrathaḥ
उनके आगमन से हर्षित होकर बृहद्रथ अपने मन्त्रियों, अनुचरों, पत्नियों और पुत्र के साथ उनकी अगवानी को निकले।
श्लोक 3 (2.19.3)
पाद्यार्घ्याचमनीयैस्तमर्चयामास भारत । स नृपो राज्यसहितं पुत्रं तस्मै न्यवेदयत् ॥
pādyārghyācamanīyaistamarcayāmāsa bhārata | sa nṛpo rājyasahitaṃ putraṃ tasmai nyavedayat
हे भारत, उन्होंने पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय से उनका पूजन किया, और राजा ने राज्य सहित अपना पुत्र उन्हें समर्पित कर दिया।
श्लोक 4 (2.19.4)
प्रतिगृह्य च तां पूजां पार्थिवाद्भगवानृषिः । उवाच मागधं राजन्प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
pratigṛhya ca tāṃ pūjāṃ pārthivādbhagavānṛṣiḥ | uvāca māgadhaṃ rājanprahṛṣṭenāntarātmanā
राजन्, राजा की वह पूजा स्वीकार करके भगवान् ऋषि ने प्रसन्न मन से मगधराज से कहा:
चण्डकौशिक उवाच
श्लोक 5 (2.19.5)
सर्वमेतन्मया ज्ञातं राजन्दिव्येन चक्षुषा । पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र यादृशोऽयं भविष्यति ॥
sarvametanmayā jñātaṃ rājandivyena cakṣuṣā | putrastu śṛṇu rājendra yādṛśo'yaṃ bhaviṣyati
"राजन्, यह सब मैंने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया है। हे राजेन्द्र, अब सुनो कि तुम्हारा यह पुत्र कैसा होगा।
श्लोक 6 (2.19.6)
अस्य रूपं च सत्वं च बलमूर्जितमेव च । एष श्रिया समुदितः पुत्रस्तव न संशयः ॥
asya rūpaṃ ca satvaṃ ca balamūrjitameva ca | eṣa śriyā samuditaḥ putrastava na saṃśayaḥ
इसका रूप, इसका सत्त्व और इसका प्रबल बल — तुम्हारा यह पुत्र श्री से सम्पन्न है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 7 (2.19.7)
प्रापयिष्यति तत्सर्वं विक्रमेण समन्वितः । अस्य वीर्यवतो वीर्यं नानुयास्यन्ति पार्थिवाः ॥
prāpayiṣyati tatsarvaṃ vikrameṇa samanvitaḥ | asya vīryavato vīryaṃ nānuyāsyanti pārthivāḥ
पराक्रम से युक्त होकर यह वह सब प्राप्त करेगा। इस वीर के बल की बराबरी राजा नहीं कर सकेंगे,
श्लोक 8 (2.19.8)
पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगाः । विनाशमुपयास्यन्ति ये चास्य परिपन्थिनः ॥
patato vainateyasya gatimanye yathā khagāḥ | vināśamupayāsyanti ye cāsya paripanthinaḥ
जैसे झपटते हुए विनतानन्दन गरुड़ की गति की बराबरी दूसरे पक्षी नहीं कर पाते। और जो इसके विरोधी होंगे, वे विनाश को प्राप्त होंगे।
श्लोक 9 (2.19.9)
देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते । न रुजं जनयिष्यन्ति गिरेरिव नदीरयाः ॥
devairapi visṛṣṭāni śastrāṇyasya mahīpate | na rujaṃ janayiṣyanti gireriva nadīrayāḥ
हे पृथ्वीपति, देवताओं द्वारा छोड़े गए शस्त्र भी इसे वैसे ही पीड़ा नहीं पहुँचाएँगे, जैसे नदियों का वेग पर्वत को।
श्लोक 10 (2.19.10)
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मूर्ध्नि ज्वलिष्यति । प्रभाहरोऽयं सर्वेषां ज्योतिषामिव भास्करः ॥
sarvamūrdhābhiṣiktānāmeṣa mūrdhni jvaliṣyati | prabhāharo'yaṃ sarveṣāṃ jyotiṣāmiva bhāskaraḥ
यह सभी अभिषिक्त राजाओं के शीर्ष पर प्रज्वलित होगा; जैसे सूर्य सभी ज्योतियों की प्रभा हर लेता है, वैसे ही यह सबकी प्रभा हर लेगा।
श्लोक 11 (2.19.11)
एनमासाद्य राजानः समृद्धबलवाहनाः । विनाशमुपयास्यन्ति शलभा इव पावकम् ॥
enamāsādya rājānaḥ samṛddhabalavāhanāḥ | vināśamupayāsyanti śalabhā iva pāvakam
समृद्ध सेना और वाहनों वाले राजा भी इससे भिड़कर वैसे ही नष्ट हो जाएँगे जैसे आग में गिरकर पतंगे।
श्लोक 12 (2.19.12)
एष श्रियः समुदिताः सर्वराज्ञां ग्रहीष्यति । वर्षास्विवोदीर्णजला नदीर्नदनदीपतिः ॥
eṣa śriyaḥ samuditāḥ sarvarājñāṃ grahīṣyati | varṣāsvivodīrṇajalā nadīrnadanadīpatiḥ
यह सब राजाओं की बढ़ी हुई सम्पदा को वैसे ही ग्रहण कर लेगा जैसे वर्षा ऋतु में जल से उमड़ती नदियों को नदों और नदियों का स्वामी समुद्र।
श्लोक 13 (2.19.13)
एष धारयिता सम्यक्चातुर्वर्ण्यं महाबलः । शुभां शुभवतीं स्फीतां सर्वसस्यधरां धराम् ॥
eṣa dhārayitā samyakcāturvarṇyaṃ mahābalaḥ | śubhāṃ śubhavatīṃ sphītāṃ sarvasasyadharāṃ dharām
यह महाबली चारों वर्णों को और इस सुन्दर, मंगलमयी, समृद्ध तथा सब प्रकार के अन्न धारण करने वाली पृथ्वी को भली-भाँति धारण करेगा।
श्लोक 14 (2.19.14)
अस्याज्ञावशगाः सर्वे भविष्यन्ति नराधिपाः । सर्वभूतात्मभूतस्य वायोरिव शरीरिणः ॥
asyājñāvaśagāḥ sarve bhaviṣyanti narādhipāḥ | sarvabhūtātmabhūtasya vāyoriva śarīriṇaḥ
सभी राजा इसकी आज्ञा के वश में रहेंगे, जैसे सब देहधारी प्राणियों की आत्मा बने वायु के अधीन रहते हैं।
श्लोक 15 (2.19.15)
एष रुद्रं महादेवं त्रिपुरान्तकरं हरम् । सर्वलोकेष्वतिबलः साक्षाद्द्रक्ष्यति मागधः ॥
eṣa rudraṃ mahādevaṃ tripurāntakaraṃ haram | sarvalokeṣvatibalaḥ sākṣāddrakṣyati māgadhaḥ
सब लोकों में अत्यन्त बलवान यह मगधराज त्रिपुर का विनाश करने वाले महादेव रुद्र हर का साक्षात् दर्शन करेगा।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 16 (2.19.16)
एवं ब्रुवन्नेव मुनिः स्वकार्यमिव चिन्तयन् । विसर्जयामास नृपं बृहद्रथमथारिहन् ॥
evaṃ bruvanneva muniḥ svakāryamiva cintayan | visarjayāmāsa nṛpaṃ bṛhadrathamathārihan
हे शत्रुनाशक, ऐसा कहते-कहते ही मुनि ने, मानो अपने कार्य का विचार करते हुए, राजा बृहद्रथ को विदा कर दिया।
श्लोक 17 (2.19.17)
प्रविश्य नगरीं चापि ज्ञातिसम्बन्धिभिर्वृतः । अभिषिच्य जरासन्धं मगधाधिपतिस्तदा ॥
praviśya nagarīṃ cāpi jñātisambandhibhirvṛtaḥ | abhiṣicya jarāsandhaṃ magadhādhipatistadā
अपने नगर में प्रवेश करके, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों से घिरे मगधराज ने तब जरासन्ध का राज्याभिषेक किया,
श्लोक 18 (2.19.18)
बृहद्रथो नरपतिः परां निर्वृतिमाययौ । अभिषिक्ते जरासन्धे तदा राजा बृहद्रथः । पत्नीद्वयेनानुगतस्तपोवनचरोऽभवत् ॥
bṛhadratho narapatiḥ parāṃ nirvṛtimāyayau | abhiṣikte jarāsandhe tadā rājā bṛhadrathaḥ | patnīdvayenānugatastapovanacaro'bhavat
और राजा बृहद्रथ को परम सन्तोष प्राप्त हुआ। जरासन्ध का अभिषेक हो जाने पर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों के साथ तपोवन में रहने लगे।
श्लोक 19 (2.19.19)
ततो वनस्थे पितरि मातृभ्यां सह भारत । जरासन्धः स्ववीर्येण पार्थिवानकरोद्वशे ॥
tato vanasthe pitari mātṛbhyāṃ saha bhārata | jarāsandhaḥ svavīryeṇa pārthivānakarodvaśe
हे भारत, फिर जब उसके पिता दोनों माताओं के साथ वन में थे, तब जरासन्ध ने अपने पराक्रम से राजाओं को वश में कर लिया।
श्लोक 20 (2.19.20)
अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृपः । सभार्यः स्वर्गमगमत्तपस्तप्त्वा बृहद्रथः ॥
atha dīrghasya kālasya tapovanacaro nṛpaḥ | sabhāryaḥ svargamagamattapastaptvā bṛhadrathaḥ
बहुत समय बाद तपोवन में रहने वाले राजा बृहद्रथ तपस्या करके अपनी पत्नियों सहित स्वर्ग चले गए।
श्लोक 21 (2.19.21)
जरासन्धोऽपि नृपतिर्यथोक्तं कौशिकेन तत् । वरप्रदानमखिलं प्राप्य राज्यमपालयत् ॥
jarāsandho'pi nṛpatiryathoktaṃ kauśikena tat | varapradānamakhilaṃ prāpya rājyamapālayat
राजा जरासन्ध ने भी कौशिक मुनि के कहे अनुसार सारे वरदान प्राप्त करके राज्य का पालन किया।
श्लोक 22 (2.19.22)
हते चैव मया कंसे सहंसडिभिके तदा । जरासन्धस्य दुहिता रोदते पार्श्वतः पितुः । जातो वै वैरनिर्बन्धो मयासीत्तत्र भारत ॥
hate caiva mayā kaṃse sahaṃsaḍibhike tadā | jarāsandhasya duhitā rodate pārśvataḥ pituḥ | jāto vai vairanirbandho mayāsīttatra bhārata
जब मैंने हंस और डिभक के साथी कंस का वध किया, तब जरासन्ध की पुत्री अपने पिता के पास जाकर रोने लगी; हे भारत, तभी से उसके और मेरे बीच गहरा वैर उत्पन्न हो गया।
श्लोक 23 (2.19.23)
भ्रामयित्वा शतगुणमेकोनं येन भारत । गदा क्षिप्ता बलवता मागधेन गिरिव्रजात् ॥
bhrāmayitvā śataguṇamekonaṃ yena bhārata | gadā kṣiptā balavatā māgadhena girivrajāt
हे भारत, उस बलवान मगधराज ने अपनी गदा को निन्यानवे बार घुमाकर गिरिव्रज से फेंका,
श्लोक 24 (2.19.24)
तिष्ठतो मथुरायां वै कृष्णस्याद्भुतकर्मणः । एकोनयोजनशते सा पपात गदा शुभा ॥
tiṣṭhato mathurāyāṃ vai kṛṣṇasyādbhutakarmaṇaḥ | ekonayojanaśate sā papāta gadā śubhā
मथुरा में रह रहे अद्भुत कर्म करने वाले कृष्ण की ओर; और वह सुन्दर गदा निन्यानवे योजन दूर जाकर गिरी।
श्लोक 25 (2.19.25)
दृष्ट्वा पौरैस्तदा सम्यग्गदा चैव निवेदिता । गदावसानं तत्ख्यातं मथुरायाः समीपतः ॥
dṛṣṭvā pauraistadā samyaggadā caiva niveditā | gadāvasānaṃ tatkhyātaṃ mathurāyāḥ samīpataḥ
पुरवासियों ने उसे देखकर गदा की सूचना यथावत् दी, और मथुरा के पास जिस स्थान पर वह गिरी वह "गदावसान" नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 26 (2.19.26)
तस्यास्तां हंसडिभिकावशस्त्रनिधनावुभौ । मन्त्रे मतिमतां श्रेष्ठौ नीतिशास्त्रे विशारदौ ॥
tasyāstāṃ haṃsaḍibhikāvaśastranidhanāvubhau | mantre matimatāṃ śreṣṭhau nītiśāstre viśāradau
उसके दो मन्त्री थे — हंस और डिभक — जिन्हें कोई शस्त्र मार नहीं सकता था; वे मन्त्रणा में बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और नीतिशास्त्र में निपुण थे।
श्लोक 27 (2.19.27)
यौ तौ मया ते कथितौ पूर्वमेव महाबलौ । त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥
yau tau mayā te kathitau pūrvameva mahābalau | trayastrayāṇāṃ lokānāṃ paryāptā iti me matiḥ
ये वही दोनों महाबली हैं जिनके विषय में मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ। मेरे विचार से वे तीनों, तीनों लोकों के लिए पर्याप्त थे।
श्लोक 28 (2.19.28)
एवमेष तदा वीर बलिभिः कुकुरान्धकैः । वृष्णिभिश्च महाराज नीतिहेतोरुपेक्षितः ॥
evameṣa tadā vīra balibhiḥ kukurāndhakaiḥ | vṛṣṇibhiśca mahārāja nītihetorupekṣitaḥ
हे वीर, हे महाराज, इसी कारण उस समय बलवान कुकुरों, अन्धकों और वृष्णियों ने नीति के विचार से उसकी उपेक्षा की।