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सभा पर्व · अध्याय 20

कृष्ण, भीम और अर्जुन का मगध-प्रस्थान

हंस, डिभक और कंस के न रहने पर कृष्ण कहते हैं कि अब जरासन्ध के वध का समय आ गया है: उसे सेना के युद्ध में नहीं, केवल द्वन्द्व-युद्ध में जीता जा सकता है, और वे युधिष्ठिर से भीम और अर्जुन को अपने हाथ सौंपने को कहते हैं। युधिष्ठिर सहमत होते हैं और कृष्ण की स्तुति करते हैं कि पाण्डव उन्हीं के आश्रित हैं। स्नातक ब्राह्मणों का वेश धरकर तीनों कुरुदेश से निकलते हैं और अनेक नदियों और देशों — सरयू, कोसल, मिथिला, गंगा और शोण — को पार करते हुए पूर्व की ओर बढ़ते हैं, और गोरथ पर्वत पर पहुँचकर मगध की राजधानी को देखते हैं।

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वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (2.20.1)

पतितौ हंसडिभिकौ कंसश्च सगणो हतः । जरासन्धस्य निधने कालोऽयं समुपागतः ॥

patitau haṃsaḍibhikau kaṃsaśca sagaṇo hataḥ | jarāsandhasya nidhane kālo'yaṃ samupāgataḥ

"हंस और डिभक गिर चुके हैं, और कंस अपने साथियों सहित मारा जा चुका है। अब जरासन्ध के वध का समय आ गया है।

श्लोक 2 (2.20.2)

न शक्योऽसौ रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरैः । प्राणयुद्धेन जेतव्यः स इत्युपलभामहे ॥

na śakyo'sau raṇe jetuṃ sarvairapi surāsuraiḥ | prāṇayuddhena jetavyaḥ sa ityupalabhāmahe

उसे युद्ध में सारे देवता और असुर मिलकर भी नहीं जीत सकते। हमें ज्ञात है कि उसे प्राणों की बाज़ी वाले द्वन्द्व-युद्ध में ही जीता जा सकता है।

श्लोक 3 (2.20.3)

मयि नीतिर्बलं भीमे रक्षिता चावयोर्जयः । मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नयः ॥

mayi nītirbalaṃ bhīme rakṣitā cāvayorjayaḥ | māgadhaṃ sādhayiṣyāma iṣṭiṃ traya ivāgnayaḥ

मुझमें नीति है, भीम में बल है, और जय (अर्जुन) हम दोनों का रक्षक है। जैसे तीन अग्नियाँ यज्ञ को सिद्ध करती हैं, वैसे ही हम तीनों मगधराज का काम तमाम करेंगे।

श्लोक 4 (2.20.4)

त्रिभिरासादितोऽस्माभिर्विजने स नराधिपः । न सन्देहो यथा युद्धमेकेनाप्युपयास्यति ॥

tribhirāsādito'smābhirvijane sa narādhipaḥ | na sandeho yathā yuddhamekenāpyupayāsyati

जब हम तीनों उस नरेश के सामने एकान्त में पहुँचेंगे, तो इसमें सन्देह नहीं कि वह हममें से किसी एक के साथ युद्ध स्वीकार कर लेगा।

श्लोक 5 (2.20.5)

अवमानाच्च लोभाच्च बाहुवीर्याच्च दर्पितः । भीमसेनेन युद्धाय ध्रुवमप्युपयास्यति ॥

avamānācca lobhācca bāhuvīryācca darpitaḥ | bhīmasenena yuddhāya dhruvamapyupayāsyati

तिरस्कार, लोभ और अपनी भुजाओं के बल के घमण्ड के कारण वह निश्चय ही भीमसेन से युद्ध करने को तैयार हो जाएगा।

श्लोक 6 (2.20.6)

अलं तस्य महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः । लोकस्य समुदीर्णस्य निधनायान्तको यथा ॥

alaṃ tasya mahābāhurbhīmaseno mahābalaḥ | lokasya samudīrṇasya nidhanāyāntako yathā

महाबाहु महाबली भीमसेन उसका विनाश करने में वैसे ही समर्थ है, जैसे उद्दण्ड हो चुके जगत् का विनाश करने में यमराज।

श्लोक 7 (2.20.7)

यदि भीमबलं वेत्सि यदि ते प्रत्ययो मयि । भीमसेनार्जुनौ शीघ्रं न्यासभूतौ प्रयच्छ मे ॥

yadi bhīmabalaṃ vetsi yadi te pratyayo mayi | bhīmasenārjunau śīghraṃ nyāsabhūtau prayaccha me

यदि तुम भीम का बल जानते हो और यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास है, तो भीमसेन और अर्जुन को शीघ्र धरोहर के रूप में मुझे सौंप दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (2.20.8)

एवमुक्तो भगवता प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । भीमार्जुनौ समालोक्य सम्प्रहृष्टमुखौ स्थितौ ॥

evamukto bhagavatā pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ | bhīmārjunau samālokya samprahṛṣṭamukhau sthitau

भगवान् के ऐसा कहने पर युधिष्ठिर ने प्रसन्न मुख से खड़े भीम और अर्जुन की ओर देखकर उत्तर दिया:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 9 (2.20.9)

अच्युताच्युत मा मैवं व्याहरामित्रकर्शन । पाण्डवानां भवान्नाथो भवन्तं चाश्रिता वयम् ॥

acyutācyuta mā maivaṃ vyāharāmitrakarśana | pāṇḍavānāṃ bhavānnātho bhavantaṃ cāśritā vayam

"अच्युत, अच्युत, हे शत्रुसंहारक, ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो! तुम पाण्डवों के नाथ हो, और हम तुम्हारे ही आश्रित हैं।

श्लोक 10 (2.20.10)

यथा वदसि गोविन्द सर्वं तदुपपद्यते । नहि त्वमग्रतस्तेषां येषां लक्ष्मीः पराङ्मुखी ॥

yathā vadasi govinda sarvaṃ tadupapadyate | nahi tvamagratasteṣāṃ yeṣāṃ lakṣmīḥ parāṅmukhī

गोविन्द, तुम जो कुछ कहते हो वह सब उचित है। जिनसे लक्ष्मी मुँह फेर लेती है, उनके आगे तुम कभी नहीं रहते।

श्लोक 11 (2.20.11)

येषामभिमुखी लक्ष्मीस्तेषां कृष्ण त्वमग्रतः । निहतश्च जरासन्धो मोक्षिताश्च महीक्षितः । राजसूयश्च मे लब्धो निदेशे तव तिष्ठतः ॥

yeṣāmabhimukhī lakṣmīsteṣāṃ kṛṣṇa tvamagrataḥ | nihataśca jarāsandho mokṣitāśca mahīkṣitaḥ | rājasūyaśca me labdho nideśe tava tiṣṭhataḥ

कृष्ण, जिनकी ओर लक्ष्मी मुख करती है, उनके आगे तुम रहते हो। तुम्हारी आज्ञा में रहते हुए मानो जरासन्ध मारा जा चुका, राजा मुक्त हो चुके और राजसूय मुझे प्राप्त हो चुका।

श्लोक 12 (2.20.12)

क्षिप्रमेव यथा त्वेतत्कार्यं समुपपद्यते । अप्रमत्तो जगन्नाथ तथा कुरु नरोत्तम ॥

kṣiprameva yathā tvetatkāryaṃ samupapadyate | apramatto jagannātha tathā kuru narottama

हे जगन्नाथ, हे नरश्रेष्ठ, सावधान रहकर ऐसा करो कि यह कार्य शीघ्र सिद्ध हो जाए।

श्लोक 13 (2.20.13)

त्रिभिर्भवद्भिर्हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे । धर्मकामार्थरहितो रोगार्त इव दुःखितः ॥

tribhirbhavadbhirhi vinā nāhaṃ jīvitumutsahe | dharmakāmārtharahito rogārta iva duḥkhitaḥ

तुम तीनों के बिना मैं जीवित नहीं रहना चाहता; मैं धर्म, काम और अर्थ से रहित, रोग से पीड़ित मनुष्य की भाँति दुःखी हो जाऊँगा।

श्लोक 14 (2.20.14)

न शौरिणा विना पार्थो न शौरिः पाण्डवं विना । नाजेयोऽस्त्यनयोर्लोके कृष्णयोरिति मे मतिः ॥

na śauriṇā vinā pārtho na śauriḥ pāṇḍavaṃ vinā | nājeyo'styanayorloke kṛṣṇayoriti me matiḥ

शौरि (कृष्ण) के बिना पार्थ नहीं, और पाण्डुपुत्र के बिना शौरि नहीं। मेरा विश्वास है कि इन दोनों कृष्णों के लिए संसार में कुछ भी अजेय नहीं है।

श्लोक 15 (2.20.15)

अयं च बलिनां श्रेष्ठः श्रीमानपि वृकोदरः । युवाभ्यां सहितो वीर किं न कुर्यान्महायशाः ॥

ayaṃ ca balināṃ śreṣṭhaḥ śrīmānapi vṛkodaraḥ | yuvābhyāṃ sahito vīra kiṃ na kuryānmahāyaśāḥ

और यह श्रीमान् वृकोदर बलवानों में श्रेष्ठ है — हे वीर, तुम दोनों के साथ मिलकर वह महायशस्वी क्या नहीं कर सकता?

श्लोक 16 (2.20.16)

सुप्रणीतो बलौघो हि कुरुते कार्यमुत्तमम् । अन्धं बलं जडं प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः ॥

supraṇīto balaugho hi kurute kāryamuttamam | andhaṃ balaṃ jaḍaṃ prāhuḥ praṇetavyaṃ vicakṣaṇaiḥ

भली-भाँति संचालित बल का समूह उत्तम कार्य सिद्ध करता है। अकेले बल को अन्धा और जड़ कहा गया है; उसे विवेकी लोगों द्वारा चलाया जाना चाहिए।

श्लोक 17 (2.20.17)

यतो हि निम्नं भवति नयन्ति हि ततो जलम् । यतश्छिद्रं ततश्चापि नयन्ते धीवरा जलम् ॥

yato hi nimnaṃ bhavati nayanti hi tato jalam | yataśchidraṃ tataścāpi nayante dhīvarā jalam

जहाँ भूमि नीची होती है, वहीं जल ले जाया जाता है; और जहाँ छिद्र होता है, वहीं से मछुआरे भी जल को ले जाते हैं।

श्लोक 18 (2.20.18)

तस्मान्नयविधानज्ञं पुरुषं लोकविश्रुतम् । वयमाश्रित्य गोविन्दं यतामः कार्यसिद्धये ॥

tasmānnayavidhānajñaṃ puruṣaṃ lokaviśrutam | vayamāśritya govindaṃ yatāmaḥ kāryasiddhaye

इसलिए हम संसार में विख्यात, नीति के विधान को जानने वाले पुरुष गोविन्द का आश्रय लेकर कार्य-सिद्धि के लिए प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 19 (2.20.19)

एवं प्रज्ञानयबलं क्रियोपायसमन्वितम् । पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्णकार्यार्थसिद्धये ॥

evaṃ prajñānayabalaṃ kriyopāyasamanvitam | puraskurvīta kāryeṣu kṛṣṇakāryārthasiddhaye

इसी प्रकार सब कार्यों में ऐसे व्यक्ति को आगे रखना चाहिए जिसमें बुद्धि, नीति और बल हो और जो कर्म तथा उसके उपायों में कुशल हो — अतः इस कार्य की सिद्धि के लिए कृष्ण को।

श्लोक 20 (2.20.20)

एवमेव यदुश्रेष्ठ यावत्कार्यार्थसिद्धये । अर्जुनः कृष्णमन्वेतु भीमोऽन्वेतु धनञ्जयम् । नयो जयो बलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति ॥

evameva yaduśreṣṭha yāvatkāryārthasiddhaye | arjunaḥ kṛṣṇamanvetu bhīmo'nvetu dhanañjayam | nayo jayo balaṃ caiva vikrame siddhimeṣyati

हे यदुश्रेष्ठ, ऐसा ही हो: जब तक कार्य का उद्देश्य सिद्ध न हो, अर्जुन कृष्ण का अनुसरण करें और भीम धनञ्जय का। नीति, विजय और बल मिलकर इस पराक्रम में सफलता दिलाएँगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (2.20.21)

एवमुक्तास्ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसः । वार्ष्णेयः पाण्डवेयौ च प्रतस्थुर्मागधं प्रति ॥

evamuktāstataḥ sarve bhrātaro vipulaujasaḥ | vārṣṇeyaḥ pāṇḍaveyau ca pratasthurmāgadhaṃ prati

ऐसा कहे जाने पर वे सब महातेजस्वी भाई — वृष्णिवंशी कृष्ण और दोनों पाण्डुपुत्र — मगध की ओर चल पड़े।

श्लोक 22 (2.20.22)

वर्चस्विनां ब्राह्मणानां स्नातकानां परिच्छदैः । आच्छाद्य सुहृदां वाक्यैर्मनोज्ञैरभिनन्दिताः ॥

varcasvināṃ brāhmaṇānāṃ snātakānāṃ paricchadaiḥ | ācchādya suhṛdāṃ vākyairmanojñairabhinanditāḥ

उन्होंने तेजस्वी स्नातक ब्राह्मणों के वस्त्र धारण करके अपने को छिपा लिया, और मित्रों ने मधुर वचनों से उनका अभिनन्दन करके उन्हें विदा किया।

श्लोक 23 (2.20.23)

माधवः पाण्डवेयौ च प्रतस्थुर्व्रतधारिणः । अमर्षादभितप्तानां ज्ञात्यर्थं मुख्यतेजसाम् । रविसोमाग्निवपुषां दीप्तमासीत्तदा वपुः ॥

mādhavaḥ pāṇḍaveyau ca pratasthurvratadhāriṇaḥ | amarṣādabhitaptānāṃ jñātyarthaṃ mukhyatejasām | ravisomāgnivapuṣāṃ dīptamāsīttadā vapuḥ

माधव और दोनों पाण्डुपुत्र व्रत धारण किए हुए चल पड़े। अपने बन्धुओं के लिए क्रोध से तपे हुए, सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान रूप वाले उन परम तेजस्वियों का शरीर उस समय दमक उठा।

श्लोक 24 (2.20.24)

हतं मेने जरासन्धं दृष्ट्वा भीमपुरोगमौ । एककार्यसमुद्यन्तौ कृष्णौ युद्धेऽपराजितौ ॥

hataṃ mene jarāsandhaṃ dṛṣṭvā bhīmapurogamau | ekakāryasamudyantau kṛṣṇau yuddhe'parājitau

युद्ध में अपराजित दोनों कृष्णों को भीम को आगे करके एक ही उद्देश्य से उद्यत देखकर युधिष्ठिर ने जरासन्ध को मारा गया ही मान लिया।

श्लोक 25 (2.20.25)

ईशौ हितौ महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तिनौ । धर्मकामार्थलोकानां कार्याणां च प्रवर्तकौ ॥

īśau hitau mahātmānau sarvakāryapravartinau | dharmakāmārthalokānāṃ kāryāṇāṃ ca pravartakau

क्योंकि वे दोनों महात्मा स्वामी और हितकारी थे, सब कार्यों के प्रवर्तक, जो संसार में धर्म, काम और अर्थ के कार्यों को चलाते हैं।

श्लोक 26 (2.20.26)

कुरुभ्यः प्रस्थितास्ते तु मध्येन कुरुजाङ्गलम् । रम्यं पद्मसरो गत्वा कालकूटमतीत्य च ॥

kurubhyaḥ prasthitāste tu madhyena kurujāṅgalam | ramyaṃ padmasaro gatvā kālakūṭamatītya ca

कुरुदेश से निकलकर वे कुरुजांगल के बीच से होते हुए रमणीय पद्मसरोवर पहुँचे और कालकूट पर्वत को पार कर गए।

श्लोक 27 (2.20.27)

गण्डकीं च महाशोणं सदानीरां तथैव च । एकपर्वतके नद्यः क्रमेणैत्याव्रजन्त ते ॥

gaṇḍakīṃ ca mahāśoṇaṃ sadānīrāṃ tathaiva ca | ekaparvatake nadyaḥ krameṇaityāvrajanta te

फिर वे क्रम से एक ही पर्वत-श्रेणी से निकलने वाली नदियों — गण्डकी, महाशोण और सदानीरा — तक पहुँचकर आगे बढ़े।

श्लोक 28 (2.20.28)

उत्तीर्य सरयूं रम्यां दृष्ट्वा पूर्वांश्च कोसलान् । अतीत्य जग्मुर्मिथिलां मालां चर्मण्वतीं नदीम् ॥

uttīrya sarayūṃ ramyāṃ dṛṣṭvā pūrvāṃśca kosalān | atītya jagmurmithilāṃ mālāṃ carmaṇvatīṃ nadīm

रमणीय सरयू को पार करके और पूर्वी कोसल देश को देखते हुए वे आगे बढ़कर मिथिला पहुँचे, और माला तथा चर्मण्वती नदियों तक गए।

श्लोक 29 (2.20.29)

अतीत्य गङ्गां शोणं च त्रयस्ते प्राङ्मुखास्तदा । कुशचीरच्छदा जग्मुर्मागधं क्षेत्रमच्युताः ॥

atītya gaṅgāṃ śoṇaṃ ca trayaste prāṅmukhāstadā | kuśacīracchadā jagmurmāgadhaṃ kṣetramacyutāḥ

गंगा और शोण को पार करके कुश और वल्कल धारण किए हुए वे तीनों अच्युत वीर पूर्व की ओर मुख किए मगध क्षेत्र में पहुँचे।

श्लोक 30 (2.20.30)

ते शश्वद्गोधनाकीर्णमम्बुमन्तं शुभद्रुमम् । गोरथं गिरिमासाद्य ददृशुर्मागधं पुरम् ॥

te śaśvadgodhanākīrṇamambumantaṃ śubhadrumam | gorathaṃ girimāsādya dadṛśurmāgadhaṃ puram

सदा गोधन से भरे, जल से सम्पन्न और सुन्दर वृक्षों वाले गोरथ पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने मगध की राजधानी को देखा।

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