सभा पर्व · अध्याय 21
गिरिव्रज में प्रवेश और जरासन्ध से भेंट
कृष्ण अर्जुन को गिरिव्रज को घेरे हुए पाँच पर्वत, गौतम का आश्रम और मगध देश के पवित्र स्थान दिखाते हैं। तीनों वीर नगर के द्वार से न जाकर बृहद्रथ द्वारा बैल की खाल से बनवाए नगाड़ों को तोड़ते हैं, चैत्यक पर्वत का शिखर गिराते हैं और स्नातक ब्राह्मणों के वेश में, बाज़ार से बलपूर्वक मालाएँ लेते हुए, नगर में प्रवेश करते हैं। अपशकुनों की शान्ति के लिए उपवास कर रहा जरासन्ध आधी रात को उनसे मिलता है, धनुष की डोरी के चिह्नों वाली उनकी भुजाएँ देखकर उनसे परिचय पूछता है; कृष्ण उत्तर देते हैं कि क्षत्रिय भी स्नातक-व्रत रखते हैं, वे शत्रु बनकर आए हैं इसलिए बिना द्वार के घुसे हैं, और शत्रु का सत्कार वे ग्रहण नहीं करते।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (2.21.1)
एष पार्थ महान्भाति पशुमान्नित्यमम्बुमान् । निरामयः सुवेश्माढ्यो निवेशो मागधः शुभः ॥
eṣa pārtha mahānbhāti paśumānnityamambumān | nirāmayaḥ suveśmāḍhyo niveśo māgadhaḥ śubhaḥ
"देखो पार्थ, मगध की यह विशाल बस्ती कैसी शोभा पा रही है — पशुधन से भरी, सदा जल से सम्पन्न, रोगों से मुक्त, सुन्दर भवनों से युक्त और मंगलमय।"
श्लोक 2 (2.21.2)
वैहारो विपुलः शैलो वाराहो वृषभस्तथा । तथा ऋषिगिरिस्तात शुभाश्चैत्यकपञ्चमाः ॥
vaihāro vipulaḥ śailo vārāho vṛṣabhastathā | tathā ṛṣigiristāta śubhāścaityakapañcamāḥ
"विशाल वैहार पर्वत, वाराह और वृषभ, तात, ऋषिगिरि भी, और पाँचवाँ सुन्दर चैत्यक —"
श्लोक 3 (2.21.3)
एते पञ्चमहाशृङ्गाः पर्वताः शीतलद्रुमाः । रक्षन्तीवाभिसंहत्य संहताङ्गा गिरिव्रजम् ॥
ete pañcamahāśṛṅgāḥ parvatāḥ śītaladrumāḥ | rakṣantīvābhisaṃhatya saṃhatāṅgā girivrajam
"शीतल वृक्षों वाले, ऊँचे शिखरों से युक्त ये पाँचों पर्वत आपस में सटकर मानो मिल-जुलकर गिरिव्रज की रक्षा कर रहे हैं।"
श्लोक 4 (2.21.4)
पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्भिर्मनोहरैः । निगूढा इव लोध्राणां वनैः कामिजनप्रियैः ॥
puṣpaveṣṭitaśākhāgrairgandhavadbhirmanoharaiḥ | nigūḍhā iva lodhrāṇāṃ vanaiḥ kāmijanapriyaiḥ
"कामीजनों को प्रिय लोध्र के वनों से, जिनकी शाखाओं के सिरे सुगन्धित और मनोहर फूलों से लिपटे हैं, वे मानो ढके-से हैं।"
श्लोक 5 (2.21.5)
यत्र दीर्घतमा नाम ऋषिः परमन्त्रितः । शूद्रायां गौतमो यत्र महात्मा संशितव्रतः । औशीनर्यामजनयत्काक्षीवाद्यान्सुतान्मुनिः ॥
yatra dīrghatamā nāma ṛṣiḥ paramantritaḥ | śūdrāyāṃ gautamo yatra mahātmā saṃśitavrataḥ | auśīnaryāmajanayatkākṣīvādyānsutānmuniḥ
"यहीं दीर्घतमा नामक परम सम्मानित ऋषि रहते थे; यहीं कठोर व्रत वाले महात्मा गौतम मुनि ने औशीनरी नामक शूद्रा स्त्री से काक्षीवान आदि पुत्र उत्पन्न किए थे।"
श्लोक 6 (2.21.6)
गौतमः प्रणयात्तस्माद्यथाऽसौ तत्र सद्मनि । भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहः ॥
gautamaḥ praṇayāttasmādyathā'sau tatra sadmani | bhajate māgadhaṃ vaṃśaṃ sa nṛpāṇāmanugrahaḥ
"इस स्थान के प्रति स्नेह के कारण गौतम यहाँ अपने आश्रम में रहते हुए मगध के राजवंश का साथ देते हैं; यह उन राजाओं पर उनका अनुग्रह है।"
श्लोक 7 (2.21.7)
अङ्गवङ्गादयश्चैव राजानः सुमहाबलाः । गौतमक्षयमभ्येत्य रमन्ते स्म पुरार्जुन ॥
aṅgavaṅgādayaścaiva rājānaḥ sumahābalāḥ | gautamakṣayamabhyetya ramante sma purārjuna
"अर्जुन, पूर्वकाल में अंग, वंग आदि देशों के महाबली राजा गौतम के निवास पर आकर आनन्द मनाया करते थे।"
श्लोक 8 (2.21.8)
वनराजीस्तु पश्येमाः पिप्पलानां मनोरमाः । लोध्राणां च शुभाः पार्थ गौतमौकः समीपजाः ॥
vanarājīstu paśyemāḥ pippalānāṃ manoramāḥ | lodhrāṇāṃ ca śubhāḥ pārtha gautamaukaḥ samīpajāḥ
"पार्थ, गौतम के आश्रम के समीप उगी पीपल के वृक्षों की इन मनोरम पंक्तियों और लोध्र के सुन्दर वनों को देखो।"
श्लोक 9 (2.21.9)
अर्बुदः शक्रवापी च पन्नगौ शत्रुतापनौ । स्वस्तिकस्यालयश्चात्र मणिनागस्य चोत्तमः ॥
arbudaḥ śakravāpī ca pannagau śatrutāpanau | svastikasyālayaścātra maṇināgasya cottamaḥ
"यहाँ शत्रुओं को संताप देने वाले अर्बुद और शक्रवापी नामक दो नाग रहते हैं, और यहीं स्वस्तिक तथा मणिनाग का उत्तम निवास है।"
श्लोक 10 (2.21.10)
अपारिहार्या मेघानां मागधा मनुना कृताः । कौशिको मणिमांश्चैव चक्राते चाप्यनुग्रहम् ॥
apārihāryā meghānāṃ māgadhā manunā kṛtāḥ | kauśiko maṇimāṃścaiva cakrāte cāpyanugraham
"मनु ने मगध देश को ऐसा बनाया है कि मेघ उसे कभी छोड़ नहीं सकते; कौशिक और मणिमान ने भी उस पर अनुग्रह किया है।"
श्लोक 11 (2.21.11)
पाण्डरे विपुले चैव तथा वाराहकेऽपि च । चैत्यके च गिरिश्रेष्ठे मातङ्गे च शिलोच्चये ॥
pāṇḍare vipule caiva tathā vārāhake'pi ca | caityake ca giriśreṣṭhe mātaṅge ca śiloccaye
"पाण्डर और विपुल पर, वाराहक पर भी, पर्वतश्रेष्ठ चैत्यक पर और शिलामय मातंग पर्वत पर —"
श्लोक 12 (2.21.12)
एतेषु पर्वतेन्द्रेषु सर्वसिद्धसमालयाः । यतीनामाश्रमाश्चैव मुनीनां च महात्मनाम् ॥
eteṣu parvatendreṣu sarvasiddhasamālayāḥ | yatīnāmāśramāścaiva munīnāṃ ca mahātmanām
"इन श्रेष्ठ पर्वतों पर सभी सिद्धों के निवास हैं, तथा यतियों और महात्मा मुनियों के आश्रम भी हैं,"
श्लोक 13 (2.21.13)
वृषभस्य तमालस्य महावीर्यस्य वै तथा । गन्धर्वरक्षसां चैव नागानां च तथाऽऽलयाः ॥
vṛṣabhasya tamālasya mahāvīryasya vai tathā | gandharvarakṣasāṃ caiva nāgānāṃ ca tathā''layāḥ
"और वृषभ तथा महापराक्रमी तमाल के, एवं गन्धर्वों, राक्षसों और नागों के भी निवास-स्थान हैं।"
श्लोक 14 (2.21.14)
कक्षीवतस्तपोवीर्यात्तपोदा इति विश्रुताः । पुण्यतीर्थाश्च ते सर्वे सिद्धानां चैव कीर्तिताः । मणेश्च दर्शनादेव भद्रं शिवमवाप्नुयात् ॥
kakṣīvatastapovīryāttapodā iti viśrutāḥ | puṇyatīrthāśca te sarve siddhānāṃ caiva kīrtitāḥ | maṇeśca darśanādeva bhadraṃ śivamavāpnuyāt
"कक्षीवान की तपस्या के प्रभाव से ये 'तपोद' नाम से विख्यात हैं; ये सभी पवित्र तीर्थ हैं और सिद्धों के स्थान कहे जाते हैं। मणि के दर्शन मात्र से ही मनुष्य कल्याण और मंगल पाता है।"
श्लोक 15 (2.21.15)
एवं प्राप्य पुरं रम्यं दुराधर्षं समन्ततः । अर्थसिद्धिं त्वनुपमां जरासन्धोऽभिमन्यते ॥
evaṃ prāpya puraṃ ramyaṃ durādharṣaṃ samantataḥ | arthasiddhiṃ tvanupamāṃ jarāsandho'bhimanyate
"चारों ओर से दुर्जेय इस रमणीय नगरी को पाकर जरासन्ध समझता है कि उसकी सफलता अनुपम है।"
श्लोक 16 (2.21.16)
वयमासादने तस्य दर्पमद्य हरेम हि ॥
vayamāsādane tasya darpamadya harema hi
"आज उसके पास पहुँचकर हम उसका घमण्ड चूर कर दें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (2.21.17)
एवमुक्त्वा ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसः ॥
evamuktvā tataḥ sarve bhrātaro vipulaujasaḥ
ऐसा कहकर वे सब महातेजस्वी भाई —
श्लोक 18 (2.21.18)
वार्ष्णेयः पाण्डवौ चैव प्रतस्थुर्मागधं पुरम् । हृष्टपुष्टजनोपेतं चातुर्वर्ण्यसमाकुलम् ॥
vārṣṇeyaḥ pāṇḍavau caiva pratasthurmāgadhaṃ puram | hṛṣṭapuṣṭajanopetaṃ cāturvarṇyasamākulam
वृष्णिवंशी कृष्ण और दोनों पाण्डव — मगध की राजधानी की ओर चल पड़े, जो हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरी और चारों वर्णों से परिपूर्ण थी।
श्लोक 19 (2.21.19)
स्फीतोत्सवमनाधृष्यमासेदुश्च गिरिव्रजम् । ततो द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छ्रितम् ॥
sphītotsavamanādhṛṣyamāseduśca girivrajam | tato dvāramanāsādya purasya girimucchritam
वे उत्सवों से भरे, अजेय गिरिव्रज में पहुँचे। तब नगर के द्वार पर न जाकर वे उस ऊँची पहाड़ी की ओर बढ़े
श्लोक 20 (2.21.20)
बार्हद्रथैः पूज्यमानं तथा नगरवासिभिः । मागधानां तु रुचिरं चैत्यकान्तरमाद्रवन् ॥
bārhadrathaiḥ pūjyamānaṃ tathā nagaravāsibhiḥ | māgadhānāṃ tu ruciraṃ caityakāntaramādravan
जिसकी बृहद्रथवंशी और नगरवासी पूजा करते थे — मगधवासियों के उस सुन्दर चैत्यक पर्वत की ओर वे दौड़ पड़े।
श्लोक 21 (2.21.21)
यत्र मांसादमृषभमाससाद बृहद्रथः । तं हत्वा मासतालाभिस्तिस्रो भेरीरकारयत् ॥
yatra māṃsādamṛṣabhamāsasāda bṛhadrathaḥ | taṃ hatvā māsatālābhistisro bherīrakārayat
वहीं बृहद्रथ का सामना एक मांसभक्षी वृषभ से हुआ था। उसे मारकर उसने तीन नगाड़े बनवाए, जो एक बार बजाने पर महीने भर गूँजते रहते थे।
श्लोक 22 (2.21.22)
स्वपुरे स्थापयामास तेन चानह्य चर्मणा । यत्र ताः प्राणदन्भेर्यो दिव्यपुष्पावचूर्णिताः ॥
svapure sthāpayāmāsa tena cānahya carmaṇā | yatra tāḥ prāṇadanbheryo divyapuṣpāvacūrṇitāḥ
उसी की खाल मढ़कर उसने उन्हें अपनी नगरी में स्थापित किया; वहाँ दिव्य पुष्पों से ढके वे नगाड़े गरजा करते थे।
श्लोक 23 (2.21.23)
भङ्क्त्वा भेरीत्रयं तेऽपि चैत्यप्राकारमाद्रवन् । द्वारतोऽभिमुखाः सर्वे ययुर्नानायुधास्तथा ॥
bhaṅktvā bherītrayaṃ te'pi caityaprākāramādravan | dvārato'bhimukhāḥ sarve yayurnānāyudhāstathā
उन तीनों नगाड़ों को तोड़कर वे भी चैत्य की प्राचीर की ओर दौड़े; द्वार की ओर मुख किए वे सब नाना प्रकार के आयुधों के साथ आगे बढ़े।
श्लोक 24 (2.21.24)
मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं तं समाद्रवन् । शिरसीव समाघ्नन्तो जरासन्धं जिघांसवः ॥
māgadhānāṃ suruciraṃ caityakaṃ taṃ samādravan | śirasīva samāghnanto jarāsandhaṃ jighāṃsavaḥ
जरासन्ध को मारने की इच्छा से वे मगधवासियों के उस सुन्दर चैत्यक पर ऐसे टूट पड़े मानो उसके सिर पर ही प्रहार कर रहे हों।
श्लोक 25 (2.21.25)
स्थिरं सुविपुलं शृङ्गं सुमहत्तत्पुरातनम् । अर्चितं गन्धमाल्यैश्च सततं सुप्रतिष्ठितम् ॥
sthiraṃ suvipulaṃ śṛṅgaṃ sumahattatpurātanam | arcitaṃ gandhamālyaiśca satataṃ supratiṣṭhitam
वह स्थिर, विशाल, अत्यन्त महान और प्राचीन शिखर, जो सदा गन्ध और मालाओं से पूजित तथा दृढ़ता से स्थापित था —
श्लोक 26 (2.21.26)
विपुलैर्बाहुभिर्वीरास्तेऽभिहत्याभ्यपातयन् । ततस्ते मागधं हृष्टाः पुरं प्रविविशुस्तदा ॥
vipulairbāhubhirvīrāste'bhihatyābhyapātayan | tataste māgadhaṃ hṛṣṭāḥ puraṃ praviviśustadā
उसे उन वीरों ने अपनी विशाल भुजाओं से प्रहार करके गिरा दिया। तब वे प्रसन्न होकर मगध की नगरी में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 27 (2.21.27)
एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः । दृष्ट्वा तु दुर्निमित्तानि जरासन्धमदर्शयन् ॥
etasminneva kāle tu brāhmaṇā vedapāragāḥ | dṛṣṭvā tu durnimittāni jarāsandhamadarśayan
उसी समय वेदों के पारंगत ब्राह्मणों ने अपशकुन देखकर उन्हें जरासन्ध को दिखाया।
श्लोक 28 (2.21.28)
पर्यग्न्यकुर्वंश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिताः । ततस्तच्छान्तये राजा जरासन्धः प्रतापवान् । दीक्षितो नियमस्थोऽसावुपवासपरोऽभवत् ॥
paryagnyakurvaṃśca nṛpaṃ dviradasthaṃ purohitāḥ | tatastacchāntaye rājā jarāsandhaḥ pratāpavān | dīkṣito niyamastho'sāvupavāsaparo'bhavat
पुरोहितों ने हाथी पर बैठे राजा के चारों ओर अग्नि घुमाई। तब उन अपशकुनों की शान्ति के लिए प्रतापी राजा जरासन्ध दीक्षा लेकर नियमों में स्थित हो उपवास करने लगा।
श्लोक 29 (2.21.29)
स्नातकव्रतिनस्ते तु बाहुशस्त्रा निरायुधाः । युयुत्सवः प्रविविशुर्जरासन्धेन भारत ॥
snātakavratinaste tu bāhuśastrā nirāyudhāḥ | yuyutsavaḥ praviviśurjarāsandhena bhārata
भारत, इधर वे स्नातक-व्रतधारी ब्राह्मणों का वेश बनाए, भुजाओं को ही शस्त्र बनाकर, बिना किसी आयुध के, जरासन्ध से युद्ध की इच्छा लिए नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 30 (2.21.30)
भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशुः श्रियमुत्तमाम् । स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम् ॥
bhakṣyamālyāpaṇānāṃ ca dadṛśuḥ śriyamuttamām | sphītāṃ sarvaguṇopetāṃ sarvakāmasamṛddhinīm
उन्होंने खाद्य-पदार्थों और मालाओं की दुकानों की उत्तम शोभा देखी — भरपूर, सब गुणों से युक्त और सभी मनचाही वस्तुओं से सम्पन्न।
श्लोक 31 (2.21.31)
तां तु दृष्ट्वा समृद्धिं ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमाः । राजमार्गेण गच्छन्तः कृष्णभीमधनञ्जयाः । बलाद्गृहीत्वा माल्यानि मालाकारान्महाबलाः ॥
tāṃ tu dṛṣṭvā samṛddhiṃ te vīthyāṃ tasyāṃ narottamāḥ | rājamārgeṇa gacchantaḥ kṛṣṇabhīmadhanañjayāḥ | balādgṛhītvā mālyāni mālākārānmahābalāḥ
उस गली की समृद्धि देखकर राजमार्ग पर चलते हुए उन महाबली नरश्रेष्ठों — कृष्ण, भीम और धनंजय — ने मालियों से बलपूर्वक मालाएँ ले लीं।
श्लोक 32 (2.21.32)
कर्पूरशृङ्गं कोष्ठं च सफलं चान्तरापणे । वैश्याद्बलाद्गृहीत्वा ते विहृत्य च महारथाः ॥
karpūraśṛṅgaṃ koṣṭhaṃ ca saphalaṃ cāntarāpaṇe | vaiśyādbalādgṛhītvā te vihṛtya ca mahārathāḥ
भीतरी बाज़ार में उन महारथियों ने एक वैश्य से कपूर का सींग और फलों सहित एक टोकरी भी बलपूर्वक ले ली और घूमते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 33 (2.21.33)
विरागवसनाः सर्वे स्रग्विणो मृष्टकुण्डलाः । निवेशनमथाजग्मुर्जरासन्धस्य धीमतः ॥
virāgavasanāḥ sarve sragviṇo mṛṣṭakuṇḍalāḥ | niveśanamathājagmurjarāsandhasya dhīmataḥ
रंगीन वस्त्र पहने, मालाएँ धारण किए और चमकते कुण्डलों से सजे वे सब तब बुद्धिमान जरासन्ध के भवन पर आए,
श्लोक 34 (2.21.34)
गोवासमिव वीक्षन्तः सिंहा हैमवता यथा । शालस्तम्भनिभास्तेषां चन्दनागुरुरूषिताः ॥
govāsamiva vīkṣantaḥ siṃhā haimavatā yathā | śālastambhanibhāsteṣāṃ candanāgururūṣitāḥ
उसे वैसे ही देखते हुए जैसे हिमालय के सिंह गोशाला को देखते हैं। साल के खम्भों जैसी, चन्दन और अगुरु से लिप्त उन युद्धकुशल वीरों की भुजाएँ
श्लोक 35 (2.21.35)
अशोभन्त महाराज बाहवो युद्धशालिनाम् । तान्दृष्ट्वा द्विरदप्रख्याञ्शालस्कन्धानिवोद्गतान् ॥
aśobhanta mahārāja bāhavo yuddhaśālinām | tāndṛṣṭvā dviradaprakhyāñśālaskandhānivodgatān
महाराज, बहुत शोभा पा रही थीं। हाथियों जैसे विशाल, ऊँचे उठे साल-वृक्षों के तनों जैसे
श्लोक 36 (2.21.36)
व्यूढोरस्कान्मागधानां विस्मयः समपद्यत । अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य विविशुर्मागधालयम् ॥
vyūḍhoraskānmāgadhānāṃ vismayaḥ samapadyata | advāreṇābhyavaskandya viviśurmāgadhālayam
और चौड़ी छाती वाले उन वीरों को देखकर मगधवासी विस्मित हो गए। बिना द्वार के ही कूदकर वे मगधराज के महल में घुस गए।
श्लोक 37 (2.21.37)
ते त्वतीत्य जनाकीर्णाः कक्षास्तिस्रो नरर्षभाः । अहङ्कारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथाः ॥
te tvatītya janākīrṇāḥ kakṣāstisro nararṣabhāḥ | ahaṅkāreṇa rājānamupatasthurgatavyathāḥ
लोगों से भरी तीन ड्योढ़ियाँ पार करके वे नरश्रेष्ठ निर्भय होकर गर्व के साथ राजा के सामने जा खड़े हुए।
श्लोक 38 (2.21.38)
भो शब्देनैव राजानमूचुस्ते तु महारथाः । तान्पाद्यमधुपर्कार्हान्गवार्हान्सत्कृतिं गतान् । प्रत्युत्थाय जरासन्ध उपतस्थे यथाविधि ॥
bho śabdenaiva rājānamūcuste tu mahārathāḥ | tānpādyamadhuparkārhāngavārhānsatkṛtiṃ gatān | pratyutthāya jarāsandha upatasthe yathāvidhi
उन महारथियों ने राजा को केवल 'भोः' कहकर सम्बोधित किया। जरासन्ध ने उठकर, उन्हें पाद्य, मधुपर्क और गौ के योग्य सम्माननीय अतिथि मानकर, विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।
श्लोक 39 (2.21.39)
उवाच चैतान्राजाऽसौ स्वागतं वोऽस्त्विति प्रभुः । मौनमासीत्तदा पार्थभीमयोर्जनमेजय ॥
uvāca caitānrājā'sau svāgataṃ vo'stviti prabhuḥ | maunamāsīttadā pārthabhīmayorjanamejaya
और उस समर्थ राजा ने उनसे कहा, "आपका स्वागत है।" जनमेजय, उस समय अर्जुन और भीम मौन रहे।
श्लोक 40 (2.21.40)
तेषां मध्ये महाबुद्धिः कृष्णो वचनमब्रवीत् । वक्तुं नायाति राजेन्द्र एतयोर्नियमस्थयोः ॥
teṣāṃ madhye mahābuddhiḥ kṛṣṇo vacanamabravīt | vaktuṃ nāyāti rājendra etayorniyamasthayoḥ
तब उनके बीच महाबुद्धिमान कृष्ण ने कहा, "राजेन्द्र, ये दोनों नियम का पालन कर रहे हैं, इसलिए बोल नहीं सकते।
श्लोक 41 (2.21.41)
अर्वाङ्निशीथात्परतस्त्वया सार्धं वदिष्यतः । यज्ञागारे स्थापयित्वा राजा राजगृहं गतः ॥
arvāṅniśīthātparatastvayā sārdhaṃ vadiṣyataḥ | yajñāgāre sthāpayitvā rājā rājagṛhaṃ gataḥ
आधी रात के बाद ये आपसे बात करेंगे।" राजा उन्हें यज्ञशाला में ठहराकर अपने राजभवन चला गया।
श्लोक 42 (2.21.42)
ततोऽर्धरात्रे सम्प्राप्ते यातो यत्र स्थिता द्विजाः । तस्य ह्येतद्व्रतं राजन्बभूव भुवि विश्रुतम् ॥
tato'rdharātre samprāpte yāto yatra sthitā dvijāḥ | tasya hyetadvrataṃ rājanbabhūva bhuvi viśrutam
फिर आधी रात होने पर वह वहाँ गया जहाँ वे ब्राह्मण ठहरे थे; क्योंकि राजन्, उसका यह व्रत पृथ्वी पर प्रसिद्ध था —
श्लोक 43 (2.21.43)
स्नातकान्ब्राह्मणान्प्राप्ताञ्श्रुत्वा स समितिञ्जयः । अप्यर्धरात्रे नृपतिः प्रत्युद्गच्छति भारत ॥
snātakānbrāhmaṇānprāptāñśrutvā sa samitiñjayaḥ | apyardharātre nṛpatiḥ pratyudgacchati bhārata
भारत, स्नातक ब्राह्मणों के आने का समाचार सुनते ही वह युद्धविजयी राजा आधी रात को भी उनकी अगवानी के लिए निकल पड़ता था।
श्लोक 44 (2.21.44)
तांस्त्वपूर्वेण वेषेण दृष्ट्वा स नृपसत्तमः । उपतस्थे जरासन्धो विस्मितश्चाभवत्तदा ॥
tāṃstvapūrveṇa veṣeṇa dṛṣṭvā sa nṛpasattamaḥ | upatasthe jarāsandho vismitaścābhavattadā
उन्हें अनोखे वेश में देखकर नृपश्रेष्ठ जरासन्ध उनके पास आया और विस्मित हो गया।
श्लोक 45 (2.21.45)
ते तु दृष्ट्वैव राजानं जरासन्धं नरर्षभाः । इदमूचुरमित्रघ्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥
te tu dṛṣṭvaiva rājānaṃ jarāsandhaṃ nararṣabhāḥ | idamūcuramitraghnāḥ sarve bharatasattama
भरतश्रेष्ठ, राजा जरासन्ध को देखते ही उन शत्रुनाशक नरश्रेष्ठों ने एक साथ यह कहा —
श्लोक 46 (2.21.46)
स्वस्त्यस्तु कुशलं राजन्निति तत्र व्यवस्थिताः । तं नृपं नृपशार्दूल प्रेक्षमाणाः परस्परम् ॥
svastyastu kuśalaṃ rājanniti tatra vyavasthitāḥ | taṃ nṛpaṃ nṛpaśārdūla prekṣamāṇāḥ parasparam
"राजन्, आपका कल्याण हो, आप कुशल रहें।" यह कहकर, हे नृपश्रेष्ठ, वे वहीं खड़े रहे और कभी राजा को तो कभी एक-दूसरे को देखते रहे।
श्लोक 47 (2.21.47)
तानब्रवीञ्जरासन्धस्तथा पाण्डवयादवान् । आस्यतामिति राजेन्द्र ब्राह्मणच्छद्मसंवृतान् ॥
tānabravīñjarāsandhastathā pāṇḍavayādavān | āsyatāmiti rājendra brāhmaṇacchadmasaṃvṛtān
राजेन्द्र, तब जरासन्ध ने ब्राह्मण-वेश में छिपे उन पाण्डवों और यादव से कहा, "आसन ग्रहण कीजिए।"
श्लोक 48 (2.21.48)
अथोपविविशुः सर्वे त्रयस्ते पुरुषर्षभाः । सम्प्रदीप्तास्त्रयो लक्ष्म्या महाध्वर इवाग्नयः ॥
athopaviviśuḥ sarve trayaste puruṣarṣabhāḥ | sampradīptāstrayo lakṣmyā mahādhvara ivāgnayaḥ
तब वे तीनों पुरुषश्रेष्ठ बैठ गए; शोभा से दमकते हुए वे किसी महायज्ञ की तीन अग्नियों के समान लग रहे थे।
श्लोक 49 (2.21.49)
तानुवाच जरासन्धः सत्यसन्धो नराधिपः । विगर्हमाणः कौरव्य वेषग्रहणवैकृतान् । न स्नातकव्रता विप्रा बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥
tānuvāca jarāsandhaḥ satyasandho narādhipaḥ | vigarhamāṇaḥ kauravya veṣagrahaṇavaikṛtān | na snātakavratā viprā bahirmālyānulepanāḥ
हे कुरुनन्दन, तब सत्यप्रतिज्ञ नरेश जरासन्ध ने उनके धारण किए वेश की विचित्रता की निन्दा करते हुए उनसे कहा, "स्नातक-व्रत रखने वाले ब्राह्मण बाहर माला और अंगराग धारण करके नहीं घूमते —
जरासन्ध उवाच
श्लोक 50 (2.21.50)
भवन्तीति नृलोकेऽस्मिन्विदितं मम सर्वशः । के यूयं पुष्पवन्तश्च भुजैर्ज्याकृतलक्षणैः ॥
bhavantīti nṛloke'sminviditaṃ mama sarvaśaḥ | ke yūyaṃ puṣpavantaśca bhujairjyākṛtalakṣaṇaiḥ
"यह बात मनुष्यलोक में मुझे भली-भाँति ज्ञात है। फूलों से सजे, धनुष की डोरी के चिह्नों वाली भुजाओं वाले तुम कौन हो,
श्लोक 51 (2.21.51)
बिभ्रतः क्षात्रमोजश्च ब्राह्मण्यं प्रतिजानथ । एवं विरागवसना बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥
bibhrataḥ kṣātramojaśca brāhmaṇyaṃ pratijānatha | evaṃ virāgavasanā bahirmālyānulepanāḥ
"जो क्षत्रियों का तेज धारण किए हो और स्वयं को ब्राह्मण बताते हो? इस प्रकार रंगीन वस्त्र पहने, बाहर माला और अंगराग धारण किए हुए —
श्लोक 52 (2.21.52)
क्षत्रिया एव लोकेऽस्मिन्विदिता मम सर्वशः । सत्यं वदत के यूयं सत्यं राजसु शोभते ॥
kṣatriyā eva loke'sminviditā mama sarvaśaḥ | satyaṃ vadata ke yūyaṃ satyaṃ rājasu śobhate
"ऐसे तो इस लोक में केवल क्षत्रिय ही होते हैं, यह मैं भली-भाँति जानता हूँ। सच कहो, तुम कौन हो? राजाओं को सत्य ही शोभा देता है।
श्लोक 53 (2.21.53)
चैत्यकस्य गिरेः शृङ्गं भित्त्वा किमिह सद्मनि । अद्वारेण प्रविष्टाः स्थ निर्भया राजकिल्विषात् ॥
caityakasya gireḥ śṛṅgaṃ bhittvā kimiha sadmani | advāreṇa praviṣṭāḥ stha nirbhayā rājakilviṣāt
"चैत्यक पर्वत का शिखर तोड़कर, राजा के प्रति अपराध से निडर होकर, तुम इस भवन में बिना द्वार के क्यों घुसे हो?
श्लोक 54 (2.21.54)
वदध्वं वाचि वीर्यं च ब्राह्मणस्य विशेषतः । कर्म चैतद्विलिङ्गस्थं किं वोऽद्य प्रसमीक्षितम् ॥
vadadhvaṃ vāci vīryaṃ ca brāhmaṇasya viśeṣataḥ | karma caitadviliṅgasthaṃ kiṃ vo'dya prasamīkṣitam
"बताओ — ब्राह्मण का बल तो विशेष रूप से वाणी में होता है, पर तुम्हारा यह कर्म तुम्हारे वेश से मेल नहीं खाता। आज तुम्हारा इरादा क्या है?
श्लोक 55 (2.21.55)
एवं च मामुपस्थाय कस्माच्च विधिनार्हणाम् । प्रणीतां नानुगृह्णीत कार्यं किं वाऽस्मदागमे ॥
evaṃ ca māmupasthāya kasmācca vidhinārhaṇām | praṇītāṃ nānugṛhṇīta kāryaṃ kiṃ vā'smadāgame
"और इस प्रकार मेरे पास आकर तुम विधिपूर्वक प्रस्तुत किया गया सत्कार क्यों स्वीकार नहीं करते? हमारे यहाँ आने का तुम्हारा प्रयोजन क्या है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 56 (2.21.56)
एवमुक्ते ततः कृष्णः प्रत्युवाच महामनाः । स्निग्धगम्भीरया वाचा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
evamukte tataḥ kṛṣṇaḥ pratyuvāca mahāmanāḥ | snigdhagambhīrayā vācā vākyaṃ vākyaviśāradaḥ
उसके ऐसा कहने पर वाक्पटु, महामना कृष्ण ने स्निग्ध और गम्भीर वाणी में उत्तर दिया —
कृष्ण उवाच
श्लोक 57 (2.21.57)
स्नातकान्ब्राह्मणान्राजन्विद्ध्यस्मांस्त्वं नराधिप । स्नातकव्रतिनो राजन्ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ॥
snātakānbrāhmaṇānrājanviddhyasmāṃstvaṃ narādhipa | snātakavratino rājanbrāhmaṇāḥ kṣatriyā viśaḥ
"नराधिप, हमें स्नातक ब्राह्मण ही समझो। राजन्, स्नातक का व्रत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी धारण करते हैं।
श्लोक 58 (2.21.58)
विशेषनियमाश्चैषामविशेषाश्च सन्त्युत । विशेषवांश्च सततं क्षत्रियः श्रियमृच्छति ॥
viśeṣaniyamāścaiṣāmaviśeṣāśca santyuta | viśeṣavāṃśca satataṃ kṣatriyaḥ śriyamṛcchati
"उनके लिए कुछ विशेष नियम हैं और कुछ सामान्य; और जो क्षत्रिय विशेष नियमों का पालन करता है, उसे सदा श्री प्राप्त होती है।
श्लोक 59 (2.21.59)
पुष्पवत्सु ध्रुवा श्रीश्च पुष्पवन्तस्ततो वयम् । क्षत्रियो बाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान् । अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद्बार्हद्रथेरितम् ॥
puṣpavatsu dhruvā śrīśca puṣpavantastato vayam | kṣatriyo bāhuvīryastu na tathā vākyavīryavān | apragalbhaṃ vacastasya tasmādbārhadratheritam
"फूल धारण करने वालों में लक्ष्मी स्थिर रहती है, इसीलिए हमने फूल धारण किए हैं। क्षत्रिय का बल उसकी भुजाओं में होता है, वाणी में वैसा नहीं; इसलिए हे बृहद्रथनन्दन, उसकी वाणी को संयत कहा गया है।
श्लोक 60 (2.21.60)
स्ववीर्यं क्षत्रियाणां तु बाह्वोर्धाता न्यवेशयत् । तद्दिदृक्षसि चेद्राजन्द्रष्टास्यद्य न संशयः ॥
svavīryaṃ kṣatriyāṇāṃ tu bāhvordhātā nyaveśayat | taddidṛkṣasi cedrājandraṣṭāsyadya na saṃśayaḥ
"विधाता ने क्षत्रियों का पराक्रम उनकी भुजाओं में ही रखा है। राजन्, यदि तुम उसे देखना चाहते हो तो आज निःसन्देह देख लोगे।
श्लोक 61 (2.21.61)
अद्वारेण रिपोर्गेहं द्वारेण सुहृदो गृहान् । प्रविशन्ति नरा धीरा द्वाराण्येतानि धर्मतः ॥
advāreṇa riporgehaṃ dvāreṇa suhṛdo gṛhān | praviśanti narā dhīrā dvārāṇyetāni dharmataḥ
"धीर पुरुष शत्रु के घर में बिना द्वार के और मित्रों के घरों में द्वार से प्रवेश करते हैं; धर्म के अनुसार यही द्वार हैं।
श्लोक 62 (2.21.62)
कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नार्हणां वयम् । प्रतिगृह्णीम तद्विद्धि एतन्नः शाश्वतं व्रतम् ॥
kāryavanto gṛhānetya śatruto nārhaṇāṃ vayam | pratigṛhṇīma tadviddhi etannaḥ śāśvataṃ vratam
"किसी प्रयोजन से शत्रु के घर आकर हम शत्रु से सत्कार ग्रहण नहीं करते। यह जान लो, यही हमारा सनातन व्रत है।"