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सभा पर्व · अध्याय 22

कृष्ण द्वारा जरासन्ध को चुनौती

जरासन्ध कहता है कि उसने इन तीनों का कोई अपकार नहीं किया। कृष्ण उत्तर देते हैं कि उसने पृथ्वी के राजाओं को रुद्र की बलि चढ़ाने के लिए बन्दी बना रखा है, और यह पाप उन सबको लगेगा जो उसे रोकने में समर्थ हैं; वे युद्ध में मृत्यु को स्वर्ग का मार्ग बताते हैं, अपना परिचय देते हैं और जरासन्ध को चुनौती देते हैं कि या तो राजाओं को छोड़ दे या युद्ध करे। जरासन्ध कृष्ण को मथुरा से भागा हुआ ग्वाला कहकर ताना देता है, कंस का बदला लेने की प्रतिज्ञा करता है, जीतकर लाए राजाओं को छोड़ने से इनकार करता है और किसी भी रीति से युद्ध करने को तैयार हो जाता है। वह अपने पुत्र सहदेव का अभिषेक करवाता है और अपने सेनापतियों हंस और डिबिक का स्मरण करता है; उधर कृष्ण ब्रह्मा की आज्ञा का ध्यान रखते हुए जरासन्ध का वध भीम के लिए छोड़ देते हैं।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

जरासन्ध उवाच

श्लोक 1 (2.22.1)

न स्मरामि कदा वैरं कृतं युष्माभिरित्युत । चिन्तयंश्च न पश्यामि भवतां प्रति वैकृतम् ॥

na smarāmi kadā vairaṃ kṛtaṃ yuṣmābhirityuta | cintayaṃśca na paśyāmi bhavatāṃ prati vaikṛtam

"मुझे याद नहीं कि कभी तुम्हारे साथ मेरा वैर हुआ हो; सोचने पर भी मुझे तुम्हारे प्रति अपना कोई अपकार दिखाई नहीं देता।

श्लोक 2 (2.22.2)

वैकृते वा सति कथं मन्यध्वं मामनागसम् । अरिं वै ब्रूत हे विप्राः सतां समय एष हि ॥

vaikṛte vā sati kathaṃ manyadhvaṃ māmanāgasam | ariṃ vai brūta he viprāḥ satāṃ samaya eṣa hi

"और यदि कोई अपकार हुआ भी हो, तो बताओ, मुझ निर्दोष को तुम शत्रु कैसे मानते हो? हे विप्रो, कहो; सज्जनों की यही रीति है।

श्लोक 3 (2.22.3)

अर्थधर्मोपघाताद्धि मनः समुपतप्यते । योऽनागसि प्रसजति क्षत्रियो हि न संशयः ॥

arthadharmopaghātāddhi manaḥ samupatapyate | yo'nāgasi prasajati kṣatriyo hi na saṃśayaḥ

"अर्थ और धर्म की हानि होने पर मन संतप्त होता है। जो क्षत्रिय किसी निरपराध पर आक्रमण करता है, वह निःसन्देह —

श्लोक 4 (2.22.4)

अतोऽन्यथा चरँल्लोके धर्मज्ञः सन्महारथः । वृजिनां गतिमाप्नोति श्रेयसोऽप्युपहन्ति च ॥

ato'nyathā caram̐lloke dharmajñaḥ sanmahārathaḥ | vṛjināṃ gatimāpnoti śreyaso'pyupahanti ca

"संसार में इस प्रकार धर्म के विपरीत आचरण करने वाला, धर्मज्ञ और महारथी होते हुए भी, पापियों की गति पाता है और अपने कल्याण का भी नाश कर लेता है।

श्लोक 5 (2.22.5)

त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान्वै साधुचारिणाम् । नान्यं धर्मं प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जनाः ॥

trailokye kṣatradharmo hi śreyānvai sādhucāriṇām | nānyaṃ dharmaṃ praśaṃsanti ye ca dharmavido janāḥ

"तीनों लोकों में सदाचारी लोगों के लिए क्षत्रिय-धर्म ही श्रेष्ठ है; धर्म को जानने वाले लोग किसी अन्य धर्म की प्रशंसा नहीं करते।

श्लोक 6 (2.22.6)

तस्य मेऽद्य स्थितस्येह स्वधर्मे नियतात्मनः । अनागसं प्रजानां च प्रमादादिव जल्पथ ॥

tasya me'dya sthitasyeha svadharme niyatātmanaḥ | anāgasaṃ prajānāṃ ca pramādādiva jalpatha

"मैं आज अपने धर्म में दृढ़, संयमी और प्रजा के प्रति निरपराध हूँ; फिर भी तुम मानो प्रमादवश ऐसी बातें कर रहे हो।"

कृष्ण उवाच

श्लोक 7 (2.22.7)

कुलकार्यं महाबाहो कश्चिदेकः कुलोद्वहः । वहते यस्तन्नियोगाद्वयमभ्युद्यतास्त्वयि ॥

kulakāryaṃ mahābāho kaścidekaḥ kulodvahaḥ | vahate yastanniyogādvayamabhyudyatāstvayi

"महाबाहु, हमारे कुल में एक कुलधुरंधर है जो कुल का कार्यभार उठाता है; उसी की आज्ञा से हम तुम्हारे विरुद्ध उद्यत हुए हैं।

श्लोक 8 (2.22.8)

त्वया चोपहृता राजन्क्षत्रिया लोकवासिनः । तदागः क्रूरमुत्पाद्य मन्यसे किमनागसम् ॥

tvayā copahṛtā rājankṣatriyā lokavāsinaḥ | tadāgaḥ krūramutpādya manyase kimanāgasam

"राजन्, तुम संसार के क्षत्रियों को बन्दी बनाकर ले आए हो। ऐसा क्रूर अपराध करके तुम स्वयं को निरपराध कैसे मानते हो?

श्लोक 9 (2.22.9)

राजा राज्ञः कथं साधून्हिंस्यान्नृपतिसत्तम । तद्राज्ञः सन्निगृह्य त्वं रुद्रायोपजिहीर्षसि ॥

rājā rājñaḥ kathaṃ sādhūnhiṃsyānnṛpatisattama | tadrājñaḥ sannigṛhya tvaṃ rudrāyopajihīrṣasi

"नृपश्रेष्ठ, कोई राजा भले राजाओं की हिंसा कैसे कर सकता है? पर तुम राजाओं को बन्दी बनाकर रुद्र को उनकी बलि चढ़ाना चाहते हो।

श्लोक 10 (2.22.10)

अस्मांस्तदेनोपगच्छेत्कृतं बार्हद्रथ त्वया । वयं हि शक्ता धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिणः ॥

asmāṃstadenopagacchetkṛtaṃ bārhadratha tvayā | vayaṃ hi śaktā dharmasya rakṣaṇe dharmacāriṇaḥ

"हे बृहद्रथनन्दन, तुम्हारे द्वारा किया गया वह पाप हमें भी लगेगा; क्योंकि हम धर्म का आचरण करते हैं और धर्म की रक्षा करने में समर्थ हैं।

श्लोक 11 (2.22.11)

तस्मादद्योपगच्छामस्तव बार्हद्रथान्तिकम् । मनुष्याणां समालम्भो न च दृष्टः कदाचन । स कथं मानुषैर्देवं यष्टुमिच्छसि शङ्करम् ॥

tasmādadyopagacchāmastava bārhadrathāntikam | manuṣyāṇāṃ samālambho na ca dṛṣṭaḥ kadācana | sa kathaṃ mānuṣairdevaṃ yaṣṭumicchasi śaṅkaram

"इसीलिए आज हम तुम्हारे पास आए हैं, बृहद्रथनन्दन। मनुष्यों की बलि कहीं कभी देखी नहीं गई; फिर तुम मनुष्यों से भगवान शंकर का यजन कैसे करना चाहते हो?

श्लोक 12 (2.22.12)

सवर्णो हि सवर्णानां पशुसञ्ज्ञां करिष्यसि । कोऽन्य एवं यथा हि त्वं जरासन्ध वृथामतिः ॥

savarṇo hi savarṇānāṃ paśusañjñāṃ kariṣyasi | ko'nya evaṃ yathā hi tvaṃ jarāsandha vṛthāmatiḥ

"तुम स्वयं उन्हीं के वर्ण के होकर अपने ही वर्ण वालों को बलि-पशु बनाओगे! जरासन्ध, तुम जैसा भ्रष्ट-बुद्धि और कौन है?

श्लोक 13 (2.22.13)

यस्यां यस्यामवस्थायां यद्यत्कर्म करोति यः । तस्यां तस्यामवस्थायां तत्फलं समवाप्नुयात् ॥

yasyāṃ yasyāmavasthāyāṃ yadyatkarma karoti yaḥ | tasyāṃ tasyāmavasthāyāṃ tatphalaṃ samavāpnuyāt

"मनुष्य जिस-जिस अवस्था में जो-जो कर्म करता है, उसी-उसी अवस्था में उसका फल पाता है।

श्लोक 14 (2.22.14)

ते त्वां ज्ञातिक्षयकरं यममार्तानुसारिणः । ज्ञातिवृद्धिनिमित्तार्थं विनिहन्तुमिहागताः ॥

te tvāṃ jñātikṣayakaraṃ yamamārtānusāriṇaḥ | jñātivṛddhinimittārthaṃ vinihantumihāgatāḥ

"हम पीड़ितों का साथ देने वाले हैं; बन्धु-बान्धवों का नाश करने वाले, यमरूप तुमको मारने के लिए, अपने बन्धुओं की उन्नति के निमित्त हम यहाँ आए हैं।

श्लोक 15 (2.22.15)

नास्ति लोके पुमानन्यः क्षत्रियेष्विति चैव तत् । मन्यसे स च ते राजन्सुमहान्बुद्धिविप्लवः ॥

nāsti loke pumānanyaḥ kṣatriyeṣviti caiva tat | manyase sa ca te rājansumahānbuddhiviplavaḥ

"तुम समझते हो कि संसार के क्षत्रियों में तुम्हारे समान कोई दूसरा पुरुष नहीं है; राजन्, यह तुम्हारी बुद्धि का बहुत बड़ा भ्रम है।

श्लोक 16 (2.22.16)

को हि जानन्नभिजनमात्मवान्क्षत्रियो नृप । नाविशेत्स्वर्गमतुलं रणानन्तरमव्ययम् ॥

ko hi jānannabhijanamātmavānkṣatriyo nṛpa | nāviśetsvargamatulaṃ raṇānantaramavyayam

"राजन्, अपने कुल को जानने वाला कौन आत्मवान क्षत्रिय युद्ध के पश्चात मिलने वाले अतुलनीय और अविनाशी स्वर्ग में प्रवेश नहीं करना चाहेगा?

श्लोक 17 (2.22.17)

स्वर्गं ह्येव समास्थाय रणयज्ञेषु दीक्षिताः । जयन्ति क्षत्रिया लोकांस्तद्विद्धि मनुजर्षभ ॥

svargaṃ hyeva samāsthāya raṇayajñeṣu dīkṣitāḥ | jayanti kṣatriyā lokāṃstadviddhi manujarṣabha

"नरश्रेष्ठ, यह जान लो कि स्वर्ग को ही लक्ष्य बनाकर, रणयज्ञ में दीक्षित होकर क्षत्रिय लोकों को जीतते हैं।

श्लोक 18 (2.22.18)

स्वर्गयोनिर्महद्ब्रह्म स्वर्गयोनिर्महद्यशः । स्वर्गयोनिस्तपो युद्धे मृत्युः सोऽव्यभिचारवान् ॥

svargayonirmahadbrahma svargayonirmahadyaśaḥ | svargayonistapo yuddhe mṛtyuḥ so'vyabhicāravān

"महान वेद स्वर्ग का कारण है, महान यश स्वर्ग का कारण है, तप स्वर्ग का कारण है; पर युद्ध में मृत्यु तो वह मार्ग है जो कभी नहीं चूकता।

श्लोक 19 (2.22.19)

एष ह्यैन्द्रो वैजयन्तो गुणैर्नित्यं समाहितः । येनासुरान्पराजित्य जगत्पाति शतक्रतुः ॥

eṣa hyaindro vaijayanto guṇairnityaṃ samāhitaḥ | yenāsurānparājitya jagatpāti śatakratuḥ

"यही इन्द्र का वैजयन्त है, जो सदा गुणों से सम्पन्न है और जिसके द्वारा शतक्रतु असुरों को पराजित कर जगत की रक्षा करते हैं।

श्लोक 20 (2.22.20)

स्वर्गमार्गाय कस्य स्याद्विग्रहो वै यथा तव । मागधैर्विपुलैः सैन्यैर्बाहुल्यबलदर्पितः ॥

svargamārgāya kasya syādvigraho vai yathā tava | māgadhairvipulaiḥ sainyairbāhulyabaladarpitaḥ

"मगध की विशाल सेनाओं के बल के घमण्ड में चूर तुम्हारे लिए जैसे युद्ध स्वर्ग का मार्ग बन सकता है, वैसा और किसके लिए होगा?

श्लोक 21 (2.22.21)

माऽवमंस्थाः परान्राजन्नास्ति वीर्यं नरे नरे । समं तेजस्त्वया चैव विशिष्टं वा नरेश्वर ॥

mā'vamaṃsthāḥ parānrājannāsti vīryaṃ nare nare | samaṃ tejastvayā caiva viśiṣṭaṃ vā nareśvara

"राजन्, दूसरों का तिरस्कार मत करो। पराक्रम हर मनुष्य में होता है; नरेश्वर, दूसरों में तुम्हारे बराबर या उससे भी बढ़कर तेज हो सकता है।

श्लोक 22 (2.22.22)

यावदेतदसम्बुद्धं तावदेव भवेत्तव । विषह्यमेतदस्माकमतो राजन्ब्रवीमि ते ॥

yāvadetadasambuddhaṃ tāvadeva bhavettava | viṣahyametadasmākamato rājanbravīmi te

"जब तक यह बात समझ में नहीं आती, तभी तक तुम्हारा यह अभिमान टिक सकता है। पर हम इसे दबाने में समर्थ हैं; इसीलिए राजन्, मैं तुमसे यह कह रहा हूँ।

श्लोक 23 (2.22.23)

जहि त्वं सदृशेष्वेव मानं दर्पं च मागध । मा गमः ससुतामात्यः सबलश्च यमक्षयम् ॥

jahi tvaṃ sadṛśeṣveva mānaṃ darpaṃ ca māgadha | mā gamaḥ sasutāmātyaḥ sabalaśca yamakṣayam

"मगधराज, अपने बराबर वालों के सामने मान और दर्प त्याग दो; ऐसा न हो कि तुम पुत्रों, मंत्रियों और सेना सहित यमलोक चले जाओ।

श्लोक 24 (2.22.24)

दम्भोद्भवः कार्तवीर्य उत्तरश्च बृहद्रथः । श्रेयसो ह्यवमत्येह विनेशुः सबला नृपाः ॥

dambhodbhavaḥ kārtavīrya uttaraśca bṛhadrathaḥ | śreyaso hyavamatyeha vineśuḥ sabalā nṛpāḥ

"दम्भोद्भव, कार्तवीर्य, उत्तर और बृहद्रथ — ये राजा अपने से श्रेष्ठ जनों का अपमान करके सेना सहित नष्ट हो गए।

श्लोक 25 (2.22.25)

युयुक्षमाणास्त्वत्तो हि न वयं ब्राह्मणा ध्रुवम् । शौरिरस्मि हृषीकेशो नृवीरौ पाण्डवाविमौ । अनयोर्मातुलेयं च कृष्णं मां विद्धि ते रिपुम् ॥

yuyukṣamāṇāstvatto hi na vayaṃ brāhmaṇā dhruvam | śaurirasmi hṛṣīkeśo nṛvīrau pāṇḍavāvimau | anayormātuleyaṃ ca kṛṣṇaṃ māṃ viddhi te ripum

"तुमसे भिड़ने को उत्सुक हम निश्चय ही ब्राह्मण नहीं हैं। मैं शौरि हृषीकेश हूँ, और ये दोनों वीर पाण्डव हैं। मुझे इनके मामा का पुत्र कृष्ण और अपना शत्रु जानो।

श्लोक 26 (2.22.26)

त्वामाह्वयामहे राजन्स्थिरो युध्यस्व मागध । मुञ्च वा नृपतीन्सर्वान् गच्छ वा त्वं यमक्षयम् ॥

tvāmāhvayāmahe rājansthiro yudhyasva māgadha | muñca vā nṛpatīnsarvān gaccha vā tvaṃ yamakṣayam

"राजन्, हम तुम्हें ललकारते हैं। मगधराज, डटकर युद्ध करो! या तो सब राजाओं को छोड़ दो, या यमलोक जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (2.22.27)

एतच्छ्रुत्वा जरासन्धः क्रुद्धो वचनमब्रवीत् ॥

etacchrutvā jarāsandhaḥ kruddho vacanamabravīt

यह सुनकर जरासन्ध क्रोधित होकर बोला —

जरासन्ध उवाच

श्लोक 28 (2.22.28)

नाहं कंसः प्रलम्बो वा न बाणो न च मुष्टिकः । नरको नेन्द्रतपनो न केशी न च पूतना ॥

nāhaṃ kaṃsaḥ pralambo vā na bāṇo na ca muṣṭikaḥ | narako nendratapano na keśī na ca pūtanā

"मैं न कंस हूँ, न प्रलम्ब, न बाण, न मुष्टिक; न नरक, न इन्द्रतपन, न केशी और न पूतना,

श्लोक 29 (2.22.29)

न कालयवनो वाऽपि ये त्वया निहता युधि । त्वं तु गोपकुलोत्पन्नो जातिं वै पौर्विकीं स्मर ॥

na kālayavano vā'pi ye tvayā nihatā yudhi | tvaṃ tu gopakulotpanno jātiṃ vai paurvikīṃ smara

"और न कालयवन ही, जिन्हें तुमने युद्ध में मारा। तुम तो ग्वालों के कुल में जन्मे हो; अपनी पुरानी जाति को याद करो,

श्लोक 30 (2.22.30)

योऽस्मद्भयादतिक्रम्य सागरानूपमाश्रितः । जन्मभूमिं परित्यज्य मधुरां प्राकृतो यथा ॥

yo'smadbhayādatikramya sāgarānūpamāśritaḥ | janmabhūmiṃ parityajya madhurāṃ prākṛto yathā

"तुम, जो मेरे भय से भागकर, अपनी जन्मभूमि मधुरा को किसी साधारण मनुष्य की भाँति छोड़कर समुद्र के तटवर्ती प्रदेश में जा छिपे थे।

श्लोक 31 (2.22.31)

सोऽधुना कत्थसे शौरे शरदीव यथा घनः । अद्यानृण्यं करिष्यामि भोजराजस्य धीमतः ॥

so'dhunā katthase śaure śaradīva yathā ghanaḥ | adyānṛṇyaṃ kariṣyāmi bhojarājasya dhīmataḥ

"और अब, शौरि, तुम शरद ऋतु के बादल की तरह गरजकर डींग मार रहे हो। आज मैं बुद्धिमान भोजराज का ऋण चुकाऊँगा —

श्लोक 32 (2.22.32)

जामातुरौग्रसेनस्य त्वां निहत्याद्य माधव । चिरकाङ्क्षितो मे सङ्ग्रामस्त्वां हन्तुं ससुहृद्गणम् ॥

jāmāturaugrasenasya tvāṃ nihatyādya mādhava | cirakāṅkṣito me saṅgrāmastvāṃ hantuṃ sasuhṛdgaṇam

"अपने दामाद उग्रसेनपुत्र का — माधव, आज तुम्हें मारकर। मित्रों के समूह सहित तुम्हें मारने के लिए मैं बहुत समय से इस युद्ध की प्रतीक्षा में था।

श्लोक 33 (2.22.33)

दिष्ट्या मे सफलो यत्नः कृतो देवैः सवासवैः । क्लीबाविमौ च गोविन्द भीमसेनार्जुनावुभौ ॥

diṣṭyā me saphalo yatnaḥ kṛto devaiḥ savāsavaiḥ | klībāvimau ca govinda bhīmasenārjunāvubhau

"सौभाग्य से इन्द्र सहित देवताओं ने मेरा प्रयत्न सफल कर दिया है। और गोविन्द, ये दोनों नपुंसक भीमसेन और अर्जुन —

श्लोक 34 (2.22.34)

हिंस्यामि युधि विक्रम्य सिंहः क्षुद्रमृगाविव ॥

hiṃsyāmi yudhi vikramya siṃhaḥ kṣudramṛgāviva

"इन्हें मैं युद्ध में पराक्रम करके ऐसे मार डालूँगा जैसे सिंह दो छोटे मृगों को।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (2.22.35)

तस्य रोषाभिभूतस्य जरासन्धस्य गर्जतः ॥

tasya roṣābhibhūtasya jarāsandhasya garjataḥ

रोष से भरे जरासन्ध के इस प्रकार गरजने पर

श्लोक 36 (2.22.36)

सर्वभूतानि वित्रेसुर्ये तत्रासन्समागताः ॥

sarvabhūtāni vitresurye tatrāsansamāgatāḥ

वहाँ एकत्र सभी प्राणी काँप उठे।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 37 (2.22.37)

किं गर्जसि जरासन्ध कर्मणा तत्समाचर ॥

kiṃ garjasi jarāsandha karmaṇā tatsamācara

"जरासन्ध, गरजते क्यों हो? जो कहा है, उसे कर्म से करके दिखाओ।

श्लोक 38 (2.22.38)

मम निर्देशकर्तृभ्यां पाण्डवाभ्यां नृपाधम । सामात्यं ससुतं चाद्य घातयिष्याम्यहं रणे । न कथञ्चन जीवन्वै प्रवेक्ष्यसि पुरोत्तमम् ॥

mama nirdeśakartṛbhyāṃ pāṇḍavābhyāṃ nṛpādhama | sāmātyaṃ sasutaṃ cādya ghātayiṣyāmyahaṃ raṇe | na kathañcana jīvanvai pravekṣyasi purottamam

"नीच राजा, अपने आदेश का पालन करने वाले इन दोनों पाण्डवों के द्वारा मैं आज रण में तुम्हें मंत्रियों और पुत्रों सहित मरवा डालूँगा। तुम किसी भी प्रकार जीवित रहते अपने श्रेष्ठ नगर में प्रवेश नहीं कर पाओगे।"

जरासन्ध उवाच

श्लोक 39 (2.22.39)

नाजितान्वै नरपतीनहमादद्मि काश्चन । अजितः पर्यवस्थाता कोऽत्र यो न मया जितः ॥

nājitānvai narapatīnahamādadmi kāścana | ajitaḥ paryavasthātā ko'tra yo na mayā jitaḥ

"मैं किसी अपराजित राजा को बन्दी नहीं बनाता। यहाँ ऐसा कौन अपराजित विरोधी है, जिसे मैंने न जीता हो?

श्लोक 40 (2.22.40)

क्षत्रियस्यैतदेवाहुर्धर्म्यं कृष्णोपजीवनम् । विक्रम्य वशमानीय कामतो यत्समाचरेत् ॥

kṣatriyasyaitadevāhurdharmyaṃ kṛṣṇopajīvanam | vikramya vaśamānīya kāmato yatsamācaret

"कृष्ण, क्षत्रिय की यही धर्मसम्मत आजीविका कही गई है कि वह पराक्रम से दूसरों को वश में करके फिर जैसा चाहे वैसा करे।

श्लोक 41 (2.22.41)

देवतार्थमुपाहृत्य राज्ञः कृष्ण कथं भयात् । अहमद्य विमुञ्चेयं क्षात्रं व्रतमनुस्मरन् ॥

devatārthamupāhṛtya rājñaḥ kṛṣṇa kathaṃ bhayāt | ahamadya vimuñceyaṃ kṣātraṃ vratamanusmaran

"कृष्ण, देवता के लिए इन राजाओं को लाकर, क्षत्रिय-व्रत को स्मरण रखते हुए, मैं आज भय के मारे इन्हें कैसे छोड़ दूँ?

श्लोक 42 (2.22.42)

सैन्यं सैन्येन व्यूढेन एक एकेन वा पुनः । द्वाभ्यां त्रिभिर्वा योत्स्येऽहं युगपत्पृथगेव वा ॥

sainyaṃ sainyena vyūḍhena eka ekena vā punaḥ | dvābhyāṃ tribhirvā yotsye'haṃ yugapatpṛthageva vā

"व्यूहबद्ध सेना से सेना के साथ, या अकेले अकेले से, या दो से, या तीन से — एक साथ या अलग-अलग, मैं युद्ध करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (2.22.43)

एवमुक्त्वा जरासन्धः सहदेवाभिषेचनम् । आज्ञापयत्तदा राजा युयुत्सुर्भीमकर्मभिः ॥

evamuktvā jarāsandhaḥ sahadevābhiṣecanam | ājñāpayattadā rājā yuyutsurbhīmakarmabhiḥ

ऐसा कहकर, उन भयंकर कर्म करने वालों से युद्ध करने को उत्सुक राजा जरासन्ध ने तब सहदेव के अभिषेक की आज्ञा दी।

श्लोक 44 (2.22.44)

स तु सेनापतिं राजा सस्मार भरतर्षभ । कौशिकं चित्रसेनं च तस्मिन्युद्ध उपस्थिते ॥

sa tu senāpatiṃ rājā sasmāra bharatarṣabha | kauśikaṃ citrasenaṃ ca tasminyuddha upasthite

भरतश्रेष्ठ, युद्ध उपस्थित होने पर उस राजा ने अपने सेनापतियों कौशिक और चित्रसेन का स्मरण किया,

श्लोक 45 (2.22.45)

ययोस्ते नामनी राजन्हंसेति डिबिकेति च । पूर्वं सङ्कथिते पुम्भिर्नृलोके लोकसत्कृते ॥

yayoste nāmanī rājanhaṃseti ḍibiketi ca | pūrvaṃ saṅkathite pumbhirnṛloke lokasatkṛte

हे राजन्, जिनके नाम हंस और डिबिक थे — वे नाम जिनकी चर्चा पहले मनुष्यलोक में लोग किया करते थे और जो सर्वत्र सम्मानित थे।

श्लोक 46 (2.22.46)

तं तु राजन्विभुः शौरी राजानं बलिनां वरम् । स्मृत्वा पुरुषशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमम् ॥

taṃ tu rājanvibhuḥ śaurī rājānaṃ balināṃ varam | smṛtvā puruṣaśārdūlaḥ śārdūlasamavikramam

किन्तु राजन्, पुरुषसिंह प्रभु शौरि ने यह स्मरण करके कि बलवानों में श्रेष्ठ वह राजा सिंह के समान पराक्रमी है,

श्लोक 47 (2.22.47)

सत्यसन्धो जरासन्धं भुवि भीमपराक्रमम् । भागमन्यस्य निर्दिष्टमवध्यं मधुभिर्मृधे ॥

satyasandho jarāsandhaṃ bhuvi bhīmaparākramam | bhāgamanyasya nirdiṣṭamavadhyaṃ madhubhirmṛdhe

और सत्यप्रतिज्ञ होकर, पृथ्वी पर भयंकर पराक्रम वाले जरासन्ध को किसी दूसरे के भाग में निर्दिष्ट और युद्ध में मधुवंशियों (यादवों) के लिए अवध्य मानकर,

श्लोक 48 (2.22.48)

नात्मनाऽऽत्मवतां मुख्य इयेष मधुसूदनः । ब्राह्मीमाज्ञां पुरस्कृत्य हन्तुं हलधरानुजः ॥

nātmanā''tmavatāṃ mukhya iyeṣa madhusūdanaḥ | brāhmīmājñāṃ puraskṛtya hantuṃ haladharānujaḥ

आत्मसंयमी पुरुषों में अग्रणी, हलधर के छोटे भाई मधुसूदन ने ब्रह्मा की आज्ञा का आदर करते हुए उसे स्वयं मारने की इच्छा नहीं की।

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