सभा पर्व · अध्याय 23
कृष्ण और जरासन्ध के वैर का कारण
जनमेजय पूछते हैं कि कृष्ण और जरासन्ध शत्रु क्यों थे। वैशम्पायन बताते हैं कि उग्रसेन के पुत्र और जरासन्ध के दामाद कंस ने मथुरा का राज्य हथिया लिया, आकाशवाणी से सुना कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसकी मृत्यु बनेगा, और देवकी के पुत्रों को मार डाला; बलराम रोहिणी के गर्भ में पहुँचाए गए और कृष्ण गोकुल ले जाए गए। गोपों के बीच बड़े होकर कृष्ण ने कंस को मारा और उग्रसेन को राजा बनाया; बदले में जरासन्ध ने कंस के पुत्र को गद्दी पर बिठाया, वृष्णियों को सताया और पराजित राजाओं को शिव के यज्ञ में बलि देने के लिए बन्दी बना रखा।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (2.23.1)
किमर्थं वैरिणावास्तामुभौ तौ कृष्णमागधौ । कथं च निर्जितः सङ्ख्ये जरासन्धेन माधवः ॥
kimarthaṃ vairiṇāvāstāmubhau tau kṛṣṇamāgadhau | kathaṃ ca nirjitaḥ saṅkhye jarāsandhena mādhavaḥ
"कृष्ण और मगधराज, वे दोनों परस्पर शत्रु क्यों थे? और युद्ध में जरासन्ध ने माधव को कैसे परास्त किया?"
श्लोक 2 (2.23.2)
कश्च कंसो मागधस्य यस्य हेतोः स वैरवान् । एतदाचक्ष्व मे सर्वं वैशम्पायन तत्वतः ॥
kaśca kaṃso māgadhasya yasya hetoḥ sa vairavān | etadācakṣva me sarvaṃ vaiśampāyana tatvataḥ
"और कंस मगधराज का क्या लगता था, जिसके कारण जरासन्ध ने यह वैर ठाना? हे वैशम्पायन, यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (2.23.3)
यादवानामन्ववाये वसुदेवो महामतिः । उदपद्यत वार्ष्णेयो ह्युग्रसेनस्य मन्त्रभृत् ॥
yādavānāmanvavāye vasudevo mahāmatiḥ | udapadyata vārṣṇeyo hyugrasenasya mantrabhṛt
यादवों के वंश में परम बुद्धिमान वृष्णिवंशी वसुदेव उत्पन्न हुए, जो उग्रसेन के मन्त्री थे।
श्लोक 4 (2.23.4)
उग्रसेनस्य कंसस्तु बभूव बलवान्सुतः । ज्येष्ठो बहूनां कौरव्य सर्वशस्त्रविशारदः ॥
ugrasenasya kaṃsastu babhūva balavānsutaḥ | jyeṣṭho bahūnāṃ kauravya sarvaśastraviśāradaḥ
हे कुरुवंशी, उग्रसेन का बलवान पुत्र कंस था, जो अनेक भाइयों में सबसे बड़ा और सब शस्त्रों में निपुण था।
श्लोक 5 (2.23.5)
जरासन्धस्य दुहिता तस्य भार्याऽतिविश्रुता । राज्यशुल्केन दत्ता सा जरासन्धेन धीमता ॥
jarāsandhasya duhitā tasya bhāryā'tiviśrutā | rājyaśulkena dattā sā jarāsandhena dhīmatā
उसकी अत्यन्त प्रसिद्ध पत्नी जरासन्ध की पुत्री थी; बुद्धिमान जरासन्ध ने राज्य को ही कन्या-शुल्क ठहराकर उसे कंस को ब्याहा था।
श्लोक 6 (2.23.6)
तदर्थमुग्रसेनस्य मधुरायां सुतस्तदा । अभिषिक्तस्तदाऽमात्यैः स वै तीव्रपराक्रमः ॥
tadarthamugrasenasya madhurāyāṃ sutastadā | abhiṣiktastadā'mātyaiḥ sa vai tīvraparākramaḥ
इसी कारण मन्त्रियों ने तब मथुरा में उग्रसेन के उस प्रचण्ड पराक्रमी पुत्र का राज्याभिषेक कर दिया।
श्लोक 7 (2.23.7)
ऐश्वर्यबलमत्तस्तु स तदा बलमोहितः । निगृह्य पितरं भुङ्क्ते तद्राज्यं मन्त्रिभिः सह ॥
aiśvaryabalamattastu sa tadā balamohitaḥ | nigṛhya pitaraṃ bhuṅkte tadrājyaṃ mantribhiḥ saha
ऐश्वर्य और बल के मद में चूर, अपनी शक्ति से मोहित होकर उसने पिता को बन्दी बना लिया और मन्त्रियों के साथ उस राज्य का भोग करने लगा।
श्लोक 8 (2.23.8)
वसुदेवस्य तत्कृत्यं न शृणोति स मन्दधीः । स तेन सह तद्राज्यं धर्मतः पर्यपालयत् ॥
vasudevasya tatkṛtyaṃ na śṛṇoti sa mandadhīḥ | sa tena saha tadrājyaṃ dharmataḥ paryapālayat
वह मन्दबुद्धि वसुदेव की कर्तव्य-सम्बन्धी बात नहीं सुनता था; फिर भी वसुदेव उसके साथ रहकर उस राज्य का धर्मपूर्वक पालन करते रहे।
श्लोक 9 (2.23.9)
प्रीतिमान्स तु दैत्येन्द्रो वसुदेवस्य देवकीम् । उवाह भार्यां स तदा दुहिता देवकस्य या ॥
prītimānsa tu daityendro vasudevasya devakīm | uvāha bhāryāṃ sa tadā duhitā devakasya yā
तब वसुदेव पर स्नेह रखने वाला वह दैत्यराज देवक की पुत्री देवकी को वसुदेव की पत्नी बनाकर विदा कराने ले चला।
श्लोक 10 (2.23.10)
तस्यामुद्वाह्यमानायां रथेन जनमेजय । उपारुरोह वार्ष्णेयं कंसो भूमिपतिस्तदा ॥
tasyāmudvāhyamānāyāṃ rathena janamejaya | upāruroha vārṣṇeyaṃ kaṃso bhūmipatistadā
हे जनमेजय, जब वह रथ पर विदा होकर जा रही थी, तब राजा कंस स्वयं उस वृष्णिवंशी के पास रथ पर चढ़ बैठा।
श्लोक 11 (2.23.11)
ततोऽन्तरिक्षे वागासीद्देवदूतस्य कस्यचित् । वसुदेवश्च शुश्राव तां वाचं पार्थिवश्च सः ॥
tato'ntarikṣe vāgāsīddevadūtasya kasyacit | vasudevaśca śuśrāva tāṃ vācaṃ pārthivaśca saḥ
तभी आकाश में किसी देवदूत की वाणी गूँजी; वसुदेव ने और उस राजा ने भी वह वाणी सुनी।
देवदूत उवाच
श्लोक 12 (2.23.12)
यामेतां वहमानोऽद्य कंसोद्वहसि देवकीम् । अस्या यश्चाष्टमो गर्भः स ते मृत्युर्भविष्यति ॥
yāmetāṃ vahamāno'dya kaṃsodvahasi devakīm | asyā yaścāṣṭamo garbhaḥ sa te mṛtyurbhaviṣyati
"हे कंस, जिस देवकी को तुम आज वधू बनाकर लिए जा रहे हो, उसका जो आठवाँ गर्भ होगा, वही तुम्हारी मृत्यु बनेगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (2.23.13)
सोऽवतीर्य ततो राजा खड्गमुद्धृत्य निर्मलम् । इयेष तस्या मूर्धानं छेत्तुं परमदुर्मतिः ॥
so'vatīrya tato rājā khaḍgamuddhṛtya nirmalam | iyeṣa tasyā mūrdhānaṃ chettuṃ paramadurmatiḥ
यह सुनकर वह अत्यन्त दुर्बुद्धि राजा रथ से उतरा और चमचमाती तलवार खींचकर उसका सिर काटने को उद्यत हुआ।
श्लोक 14 (2.23.14)
सान्त्वयन्स तदा कंसं हसन्क्रोधवशानुगम् । राजन्ननुनयामास वसुदेवो महामतिः ॥
sāntvayansa tadā kaṃsaṃ hasankrodhavaśānugam | rājannanunayāmāsa vasudevo mahāmatiḥ
तब परम बुद्धिमान वसुदेव ने मुस्कराते हुए क्रोध के वश में पड़े कंस को शान्त किया और राजा से अनुनय करने लगे।
वसुदेव उवाच
श्लोक 15 (2.23.15)
अहिंस्यां प्रमदामाहुः सर्वधर्मेषु पार्थिव । अकस्मादबलां नारीं हन्तासीमामनागसीम् ॥
ahiṃsyāṃ pramadāmāhuḥ sarvadharmeṣu pārthiva | akasmādabalāṃ nārīṃ hantāsīmāmanāgasīm
"हे राजन्, सभी धर्मों में स्त्री को अवध्य कहा गया है। क्या तुम अकारण इस निरपराध अबला नारी का वध करोगे?"
श्लोक 16 (2.23.16)
यच्च तेऽत्र भयं राजञ्शक्यते बाधितुं त्वया । इयं शक्या पालयितुं समयं चैव रक्षितुम् ॥
yacca te'tra bhayaṃ rājañśakyate bādhituṃ tvayā | iyaṃ śakyā pālayituṃ samayaṃ caiva rakṣitum
"हे राजन्, इससे तुम्हें जो भय है, उसे तुम टाल सकते हो। इसकी रक्षा भी हो सकती है और एक शर्त का पालन भी।"
श्लोक 17 (2.23.17)
अस्यास्त्वमष्टमं गर्भं जातमात्रं महीपते । विध्वंसय तदा प्राप्तमेवं परिहृतं भवेत् ॥
asyāstvamaṣṭamaṃ garbhaṃ jātamātraṃ mahīpate | vidhvaṃsaya tadā prāptamevaṃ parihṛtaṃ bhavet
"हे पृथ्वीपति, इसका आठवाँ गर्भ जन्म लेते ही जब तुम्हारे हाथ आए, तब उसे नष्ट कर देना; इस प्रकार संकट टल जाएगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (2.23.18)
एवं स राजा कथितो वसुदेवेन भारत । तस्य तद्वचनं चक्रे शूरसेनपतिस्तदा ॥
evaṃ sa rājā kathito vasudevena bhārata | tasya tadvacanaṃ cakre śūrasenapatistadā
हे भारत, वसुदेव के ऐसा कहने पर शूरसेन देश के उस राजा ने उनकी बात मान ली।
श्लोक 19 (2.23.19)
ततस्तस्यां सम्बभूवुः कुमाराः सूर्यवर्चसः । जाताञ्जातांस्तु तान्सर्वाञ्जघान मधुरेश्वरः ॥
tatastasyāṃ sambabhūvuḥ kumārāḥ sūryavarcasaḥ | jātāñjātāṃstu tānsarvāñjaghāna madhureśvaraḥ
फिर उससे सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए, और मथुरा के स्वामी ने जन्म लेते ही उन सबको मार डाला।
श्लोक 20 (2.23.20)
अथ तस्यां समभवद्बलदेवस्तु सप्तमः । याम्यया मायया तं तु यमो राजा विशाम्पते ॥
atha tasyāṃ samabhavadbaladevastu saptamaḥ | yāmyayā māyayā taṃ tu yamo rājā viśāmpate
इसके बाद सातवें गर्भ के रूप में उसमें बलदेव आए। परन्तु हे प्रजानाथ, यमराज ने अपनी माया से
श्लोक 21 (2.23.21)
देवक्या गर्भमतुलं रोहिण्या जठरेऽक्षिपत् । आकृष्य कर्षणात्सम्यक्सङ्कर्षण इति स्मृतः ॥
devakyā garbhamatulaṃ rohiṇyā jaṭhare'kṣipat | ākṛṣya karṣaṇātsamyaksaṅkarṣaṇa iti smṛtaḥ
देवकी के उस अनुपम गर्भ को रोहिणी के उदर में पहुँचा दिया। भलीभाँति खींचकर (कर्षण द्वारा) ले जाए जाने के कारण वे संकर्षण कहलाए।
श्लोक 22 (2.23.22)
बलश्रेष्ठतया तस्य बलदेव इति स्मृतः । पुनस्तस्यां समभवदष्टमो मधुसूदनः ॥
balaśreṣṭhatayā tasya baladeva iti smṛtaḥ | punastasyāṃ samabhavadaṣṭamo madhusūdanaḥ
बल में श्रेष्ठ होने के कारण वे बलदेव भी कहलाए। फिर उसमें आठवें गर्भ के रूप में मधुसूदन आए।
श्लोक 23 (2.23.23)
तस्य गर्भस्य रक्षां तु स चक्रेऽभ्यधिकं नृपः । ततः काले रक्षणार्थं वसुदेवस्य तत्वतः ॥
tasya garbhasya rakṣāṃ tu sa cakre'bhyadhikaṃ nṛpaḥ | tataḥ kāle rakṣaṇārthaṃ vasudevasya tatvataḥ
राजा ने उस गर्भ की और भी कड़ी रखवाली की। फिर समय आने पर वसुदेव पर कड़ी निगरानी रखने के लिए
श्लोक 24 (2.23.24)
उग्रः प्रयुक्तः कंसेन सचिवः क्रूरकर्मकृत् । विमूढेषु प्रभावेन बालस्योत्तीर्य तत्र वै । उपागम्य स घोषे तु जगाम समहाद्युतिः ॥
ugraḥ prayuktaḥ kaṃsena sacivaḥ krūrakarmakṛt | vimūḍheṣu prabhāvena bālasyottīrya tatra vai | upāgamya sa ghoṣe tu jagāma samahādyutiḥ
कंस ने उग्र नामक एक क्रूरकर्मा मन्त्री को नियुक्त किया। परन्तु जब बालक के प्रभाव से पहरेदार मोहित हो गए, तब वे महातेजस्वी वसुदेव वहाँ पार उतरकर गोपों की बस्ती में जा पहुँचे।
श्लोक 25 (2.23.25)
जातमात्रं वासुदेवमथाकृष्य पिता ततः । उपजह्रे परिक्रीतां सुतां गोपस्य कस्यचित् ॥
jātamātraṃ vāsudevamathākṛṣya pitā tataḥ | upajahre parikrītāṃ sutāṃ gopasya kasyacit
जन्म लेते ही पिता वासुदेव को उठा ले गए और उनके स्थान पर बदले में ली हुई किसी गोप की कन्या को ले आए।
श्लोक 26 (2.23.26)
अमृष्यमाणस्तं शब्दं देवदूतस्य पार्थिवः । वासुदेवं महात्मानमर्पयामास गोकुले ॥
amṛṣyamāṇastaṃ śabdaṃ devadūtasya pārthivaḥ | vāsudevaṃ mahātmānamarpayāmāsa gokule
राजा देवदूत की उस वाणी को सह नहीं पाता था; इसलिए महात्मा वासुदेव को गोकुल में सौंप दिया गया।
श्लोक 27 (2.23.27)
वासुदेवोऽपि गोपेषु ववृधेऽब्जमिवाम्भसि । अज्ञायमानः कंसेन गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥
vāsudevo'pi gopeṣu vavṛdhe'bjamivāmbhasi | ajñāyamānaḥ kaṃsena gūḍho'gniriva dāruṣu
वासुदेव भी गोपों के बीच जल में कमल की भाँति बढ़ने लगे; कंस को उनका पता न चला, जैसे लकड़ी में छिपी अग्नि का पता नहीं चलता।
श्लोक 28 (2.23.28)
विप्रचक्रे तदा सर्वान्बल्लवान्मधुरेश्वरः । वर्धमानो महाबाहुस्तेजोबलसमन्वितः ॥
vipracakre tadā sarvānballavānmadhureśvaraḥ | vardhamāno mahābāhustejobalasamanvitaḥ
तब मथुरा का स्वामी सब ग्वालों को सताने लगा, और उधर तेज और बल से सम्पन्न वे महाबाहु बढ़ते रहे।
श्लोक 29 (2.23.29)
ततस्ते क्लिश्यमानास्तु पुण्डरीकाक्षमच्युतम् । भयेन कामादपरे गणशः पर्यवारयन् ॥
tataste kliśyamānāstu puṇḍarīkākṣamacyutam | bhayena kāmādapare gaṇaśaḥ paryavārayan
तब सताए जा रहे वे ग्वाले झुण्ड के झुण्ड कमलनयन अच्युत के चारों ओर आ जुटे, कुछ भय से और कुछ प्रेम से।
श्लोक 30 (2.23.30)
स तु लब्ध्वा बलं राजन्नुग्रसेनस्य संमतः । वसुदेवात्मजः सर्वैर्भ्रातृभिः सहितं पुनः ॥
sa tu labdhvā balaṃ rājannugrasenasya saṃmataḥ | vasudevātmajaḥ sarvairbhrātṛbhiḥ sahitaṃ punaḥ
हे राजन्, बल प्राप्त करके वसुदेवपुत्र ने उग्रसेन की सम्मति से अपने सब भाइयों के साथ फिर
श्लोक 31 (2.23.31)
निर्जित्य युधि भोजेन्द्रं हत्वा कंसं महाबलः । अभ्यषिञ्चत्ततो राज्य उग्रसेनं विशाम्पते ॥
nirjitya yudhi bhojendraṃ hatvā kaṃsaṃ mahābalaḥ | abhyaṣiñcattato rājya ugrasenaṃ viśāmpate
युद्ध में भोजराज को परास्त करके कंस का वध किया, और फिर, हे प्रजानाथ, उन महाबली ने उग्रसेन का राज्याभिषेक कर दिया।
श्लोक 32 (2.23.32)
ततः श्रुत्वा जरासन्धो माधवेन हतं युधि । शूरसेनाधिपं चक्रे कंसपुत्रं तदा नृप ॥
tataḥ śrutvā jarāsandho mādhavena hataṃ yudhi | śūrasenādhipaṃ cakre kaṃsaputraṃ tadā nṛpa
हे राजन्, जब जरासन्ध ने सुना कि माधव ने कंस को युद्ध में मार डाला है, तो उसने कंस के पुत्र को शूरसेन देश का अधिपति बना दिया।
श्लोक 33 (2.23.33)
ससैन्यं महदुत्थाप्य वासुदेवं तदा नृप । अभ्यषिञ्चत्सुतं तत्र सुताया जनमेजय ॥
sasainyaṃ mahadutthāpya vāsudevaṃ tadā nṛpa | abhyaṣiñcatsutaṃ tatra sutāyā janamejaya
हे राजन्, बड़ी सेना जुटाकर वासुदेव पर चढ़ाई करके, हे जनमेजय, उसने वहाँ अपनी पुत्री के पुत्र का अभिषेक कर दिया।
श्लोक 34 (2.23.34)
उग्रसेनं च वृष्णींश्च महाबलसमन्वितः । स तत्र विप्रकुरुते जरासन्धः प्रतापवान् ॥
ugrasenaṃ ca vṛṣṇīṃśca mahābalasamanvitaḥ | sa tatra viprakurute jarāsandhaḥ pratāpavān
महाबल से सम्पन्न प्रतापी जरासन्ध वहाँ उग्रसेन और वृष्णियों को सताता रहा।
श्लोक 35 (2.23.35)
एतद्वैरं कौरवेय जरासन्धस्य माधवे । आशासितार्थे राजेन्द्र संरुरोध विनिर्जितान् ॥
etadvairaṃ kauraveya jarāsandhasya mādhave | āśāsitārthe rājendra saṃrurodha vinirjitān
हे कौरवनन्दन, माधव के प्रति जरासन्ध का यही वैर है। और हे राजेन्द्र, अपने मनचाहे प्रयोजन के लिए उसने पराजित राजाओं को बन्दी बना रखा था;
श्लोक 36 (2.23.36)
पार्थिवैस्तैर्नृपतिभिर्यक्ष्यमाणः समृद्धिमान् । देवश्रेष्ठं महादेवं कृत्तिवासं त्रियम्बकम् ॥
pārthivaistairnṛpatibhiryakṣyamāṇaḥ samṛddhimān | devaśreṣṭhaṃ mahādevaṃ kṛttivāsaṃ triyambakam
क्योंकि वह समृद्धिशाली राजा उन नरपतियों के द्वारा देवश्रेष्ठ, चर्मधारी, त्र्यम्बक महादेव का यजन करना चाहता था।
श्लोक 37 (2.23.37)
एतत्सर्वं यथावृत्तं कथितं भरतर्षभ । यथा तु स हतो राजा भीमसेनेन तच्छृणु ॥
etatsarvaṃ yathāvṛttaṃ kathitaṃ bharatarṣabha | yathā tu sa hato rājā bhīmasenena tacchṛṇu
हे भरतश्रेष्ठ, यह सब जैसा घटित हुआ था, वैसा तुम्हें कह सुनाया। अब सुनो कि भीमसेन ने उस राजा का वध कैसे किया।