सभा पर्व · अध्याय 24
भीम और जरासन्ध का मल्लयुद्ध आरम्भ
कृष्ण जरासन्ध से पूछते हैं कि वह तीनों में से किससे लड़ेगा; कृष्ण को ग्वाला और अर्जुन को बालक समझकर राजा भीम को चुनता है। पुरोहित के स्वस्तिवाचन के बाद जरासन्ध मुकुट उतारता है और दोनों अनेक दाँवों वाला मल्लयुद्ध आरम्भ करते हैं, जिसे सारा नगर देखने उमड़ पड़ता है। कार्तिक के पहले दिन से युद्ध दिन-रात बिना भोजन और विश्राम के चलता है, और चौदहवीं रात जरासन्ध थककर ढीला पड़ता है; तब कृष्ण भीम को थके राजा को दबाने की प्रेरणा देते हैं और भीम उसे मारने के लिए पकड़ लेते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.24.1)
ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय यदुनन्दनः । उवाच वाग्मी राजानं जरासन्धमधोक्षजः ॥
tatastaṃ niścitātmānaṃ yuddhāya yadunandanaḥ | uvāca vāgmī rājānaṃ jarāsandhamadhokṣajaḥ
तब युद्ध का निश्चय कर चुके राजा जरासन्ध से वाक्पटु यदुनन्दन अधोक्षज ने कहा।
कृष्ण उवाच
श्लोक 2 (2.24.2)
त्रयाणां केन ते राजन्योद्धुमुत्सहते मनः । अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ॥
trayāṇāṃ kena te rājanyoddhumutsahate manaḥ | asmadanyatameneha sajjībhavatu ko yudhi
"हे राजन्, हम तीनों में से किसके साथ तुम्हारा मन युद्ध करना चाहता है? हममें से जिसे तुम चुनो, वही यहाँ युद्ध के लिए तैयार हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (2.24.3)
एवमुक्तः स नृपतिर्युद्धं वव्रे महाद्युतिः । जरासन्धस्ततो राजा भीमसेनेन मागधः ॥
evamuktaḥ sa nṛpatiryuddhaṃ vavre mahādyutiḥ | jarāsandhastato rājā bhīmasenena māgadhaḥ
ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी मगधराज जरासन्ध ने भीमसेन के साथ युद्ध करना चुना।
श्लोक 4 (2.24.4)
धारयन्तं गदां दिव्यां बलं श्रुत्वा च निर्वृतः । अर्जुनं वासुदेवं च वर्जयित्वा स मागधः ॥
dhārayantaṃ gadāṃ divyāṃ balaṃ śrutvā ca nirvṛtaḥ | arjunaṃ vāsudevaṃ ca varjayitvā sa māgadhaḥ
दिव्य गदा धारण करने वाले के बल के विषय में सुनकर मगधराज सन्तुष्ट हुआ; उसने अर्जुन और वासुदेव को छोड़ दिया,
श्लोक 5 (2.24.5)
मत्वा देवं गोप इति बालोऽर्जुन इति स्म ह । आदाय रोचनां माल्यं मङ्गल्यान्यपराणि च ॥
matvā devaṃ gopa iti bālo'rjuna iti sma ha | ādāya rocanāṃ mālyaṃ maṅgalyānyaparāṇi ca
क्योंकि वह उन दिव्य पुरुष को ग्वाला और अर्जुन को बालक समझता था। तब गोरोचन, मालाएँ और अन्य मांगलिक वस्तुएँ लेकर,
श्लोक 6 (2.24.6)
धारयन्नगदान्मुख्यान्निर्वृतीर्वेदनानि च । उपतस्थे जरासन्धं युयुत्सुं वै पुरोहितः ॥
dhārayannagadānmukhyānnirvṛtīrvedanāni ca | upatasthe jarāsandhaṃ yuyutsuṃ vai purohitaḥ
और प्रमुख औषधियाँ तथा पीड़ा और मूर्च्छा में चेतना लौटाने वाले उपचार साथ लेकर, पुरोहित युद्ध के लिए उत्सुक जरासन्ध के पास उपस्थित हुआ।
श्लोक 7 (2.24.7)
कृतस्वस्त्ययनो राजा ब्राह्मणेन यशस्विना । समनह्यज्जरासन्धः क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥
kṛtasvastyayano rājā brāhmaṇena yaśasvinā | samanahyajjarāsandhaḥ kṣātraṃ dharmamanusmaran
यशस्वी ब्राह्मण द्वारा स्वस्तिवाचन हो जाने पर राजा जरासन्ध क्षत्रिय-धर्म का स्मरण करते हुए युद्ध के लिए सन्नद्ध हुआ।
श्लोक 8 (2.24.8)
अवमुच्य किरीटं स केशान्समनुमृज्य च । उदतिष्ठज्जरासन्धो वेलातिग इवार्णवः ॥
avamucya kirīṭaṃ sa keśānsamanumṛjya ca | udatiṣṭhajjarāsandho velātiga ivārṇavaḥ
अपना मुकुट उतारकर और केशों को सँवारकर जरासन्ध तट को लाँघते समुद्र की भाँति उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 9 (2.24.9)
उवाच मतिमान्राजा भीमं भीमपराक्रमः । भीम योत्स्ये त्वया सार्धं श्रेयसा निर्जितं वरम् ॥
uvāca matimānrājā bhīmaṃ bhīmaparākramaḥ | bhīma yotsye tvayā sārdhaṃ śreyasā nirjitaṃ varam
तब भयंकर पराक्रमी उस बुद्धिमान राजा ने भीम से कहा, "भीम, मैं तुमसे लड़ूँगा। अपने से श्रेष्ठ से हारना भी अच्छा है।"
श्लोक 10 (2.24.10)
एवमुक्त्वा जरासन्धो भीमसेनमरिन्दमः । प्रत्युद्ययौ महातेजाः शक्रं बल इवासुरः ॥
evamuktvā jarāsandho bhīmasenamarindamaḥ | pratyudyayau mahātejāḥ śakraṃ bala ivāsuraḥ
ऐसा कहकर शत्रुदमन, महातेजस्वी जरासन्ध भीमसेन का सामना करने आगे बढ़ा, जैसे असुर बल इन्द्र का सामना करने बढ़ा था।
श्लोक 11 (2.24.11)
ततः संमन्त्र्य कृष्णेन कृतस्वस्त्ययनो बली । भीमसेनो जरासन्धमाससाद युयुत्सया ॥
tataḥ saṃmantrya kṛṣṇena kṛtasvastyayano balī | bhīmaseno jarāsandhamāsasāda yuyutsayā
तब बलवान भीमसेन कृष्ण से परामर्श करके और स्वस्तिवाचन कराकर युद्ध की इच्छा से जरासन्ध के पास जा पहुँचे।
श्लोक 12 (2.24.12)
ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुशस्त्रौ समीयतुः । वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ ॥
tatastau naraśārdūlau bāhuśastrau samīyatuḥ | vīrau paramasaṃhṛṣṭāvanyonyajayakāṅkṣiṇau
तब भुजाओं को ही शस्त्र बनाए हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अत्यन्त हर्ष से भरकर, एक-दूसरे पर विजय की कामना करते हुए भिड़ गए।
श्लोक 13 (2.24.13)
करग्रहणपूर्वं तु कृत्वा पादाभिवन्दनम् । कक्षैः कक्षां विधुन्वानावास्फोटं तत्र चक्रतुः ॥
karagrahaṇapūrvaṃ tu kṛtvā pādābhivandanam | kakṣaiḥ kakṣāṃ vidhunvānāvāsphoṭaṃ tatra cakratuḥ
पहले हाथ मिलाकर और चरण-वन्दन करके, वे काँख से काँख रगड़ते हुए वहाँ ताल ठोकने लगे।
श्लोक 14 (2.24.14)
स्कन्धे दोर्भ्यां समाहत्य निहत्य च मुहुर्मुहुः । अङ्गमङ्गैः समाश्लिष्य पुनरास्फालनं च चक्रतुः ॥
skandhe dorbhyāṃ samāhatya nihatya ca muhurmuhuḥ | aṅgamaṅgaiḥ samāśliṣya punarāsphālanaṃ ca cakratuḥ
वे भुजाओं से एक-दूसरे के कन्धों पर बार-बार प्रहार करते, अंग से अंग लिपटाकर फिर ताल ठोकते।
श्लोक 15 (2.24.15)
चित्रहस्तादिकं कृत्वा कक्षाबन्धं च चक्रतुः । गलगण्डाभिघातेन सस्फुलिङ्गेन चाशनिम् ॥
citrahastādikaṃ kṛtvā kakṣābandhaṃ ca cakratuḥ | galagaṇḍābhighātena sasphuliṅgena cāśanim
उन्होंने चित्रहस्त आदि दाँव और कक्षाबन्ध किए, और गले तथा गालों पर ऐसे प्रहार किए मानो चिनगारियाँ छोड़ता वज्र गिर रहा हो।
श्लोक 16 (2.24.16)
बाहुपाशादिकं कृत्वा पादाहतशिरावुभौ । उरोहस्तं ततश्चक्रे पूर्णकुम्भौ प्रयुज्य तौ ॥
bāhupāśādikaṃ kṛtvā pādāhataśirāvubhau | urohastaṃ tataścakre pūrṇakumbhau prayujya tau
उन्होंने बाहुपाश आदि दाँव लगाए और पैरों से एक-दूसरे के सिर पर चोट की; फिर उरोहस्त दाँव चला, और दोनों ने पूर्णकुम्भ दाँव (उँगलियाँ गूँथकर सिर दबाना) लगाया।
श्लोक 17 (2.24.17)
करसम्पीडनं कृत्वा गर्जन्तौ वारणाविव । नर्दन्तौ मेघसङ्काशौ बाहुप्रहरणावुभौ ॥
karasampīḍanaṃ kṛtvā garjantau vāraṇāviva | nardantau meghasaṅkāśau bāhupraharaṇāvubhau
एक-दूसरे के हाथ भींचते हुए वे हाथियों की तरह चिंघाड़ते और मेघों की तरह गरजते थे; दोनों केवल भुजाओं से प्रहार कर रहे थे।
श्लोक 18 (2.24.18)
तलेनाहन्यमानौ तु अन्योन्यं कृतवीक्षणौ । सिंहाविव सुसङ्क्रुद्धावाकृष्याकृष्य युध्यताम् ॥
talenāhanyamānau tu anyonyaṃ kṛtavīkṣaṇau | siṃhāviva susaṅkruddhāvākṛṣyākṛṣya yudhyatām
हथेलियों से एक-दूसरे पर प्रहार करते और एक-दूसरे को घूरते हुए वे दो अत्यन्त क्रुद्ध सिंहों की भाँति खींच-खींचकर लड़ने लगे।
श्लोक 19 (2.24.19)
अङ्गेनाङ्गं समापीड्य बाहुभ्यामुभयोरपि । आवृत्य बाहुभिश्चापि उदरं च प्रचक्रतुः ॥
aṅgenāṅgaṃ samāpīḍya bāhubhyāmubhayorapi | āvṛtya bāhubhiścāpi udaraṃ ca pracakratuḥ
दोनों भुजाओं से अंग से अंग दबाकर और बाँहों में लपेटकर उन्होंने पेट पर भी दाँव लगाए।
श्लोक 20 (2.24.20)
उभौ कट्यां सुपार्श्वे तु तक्षवन्तौ च शिक्षितौ । अधो हस्तं स्वकण्ठे तूदरस्योरसि चाक्षिपत् ॥
ubhau kaṭyāṃ supārśve tu takṣavantau ca śikṣitau | adho hastaṃ svakaṇṭhe tūdarasyorasi cākṣipat
दोनों सधे हुए योद्धा शरीर सिकोड़कर कमर और पसलियों पर पकड़ बनाते; और एक ने अधोहस्त दाँव से हाथ को गले, पेट और छाती की ओर झोंका।
श्लोक 21 (2.24.21)
सर्वातिक्रान्तमर्यादं पृष्ठभङ्गं च चक्रतुः । सम्पूर्णमूर्च्छां बाहुभ्यां पूर्णकुम्भं प्रचक्रतुः ॥
sarvātikrāntamaryādaṃ pṛṣṭhabhaṅgaṃ ca cakratuḥ | sampūrṇamūrcchāṃ bāhubhyāṃ pūrṇakumbhaṃ pracakratuḥ
उन्होंने सारी मर्यादाएँ लाँघने वाला पृष्ठभंग दाँव किया, और भुजाओं से पूरी मूर्च्छा ला देने वाला पूर्णकुम्भ दाँव लगाया।
श्लोक 22 (2.24.22)
तृणपीडं यथाकामं पूर्णयोगं समुष्टिकम् । एवमादीनि युद्धानि प्रकुर्वन्तौ परस्परम् ॥
tṛṇapīḍaṃ yathākāmaṃ pūrṇayogaṃ samuṣṭikam | evamādīni yuddhāni prakurvantau parasparam
इच्छानुसार तृणपीड, पूर्णयोग और मुक्कों के प्रहार; ऐसे अनेक प्रकार के दाँव वे एक-दूसरे पर आजमाते रहे।
श्लोक 23 (2.24.23)
तयोर्युद्धं ततो द्रष्टुं समेताः पुरवासिनः । ब्राह्मणा वणिजश्चैव क्षत्रियाश्च सहस्रशः ॥
tayoryuddhaṃ tato draṣṭuṃ sametāḥ puravāsinaḥ | brāhmaṇā vaṇijaścaiva kṣatriyāśca sahasraśaḥ
तब उनका युद्ध देखने के लिए नगरवासी इकट्ठे हो गए: हजारों ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय,
श्लोक 24 (2.24.24)
शूद्राश्च नरशार्दूल स्त्रियो वृद्धाश्च सर्वशः । निरन्तरमभूत्तत्र जनौघैरभिसंवृतम् ॥
śūdrāśca naraśārdūla striyo vṛddhāśca sarvaśaḥ | nirantaramabhūttatra janaughairabhisaṃvṛtam
और हे नरश्रेष्ठ, शूद्र, स्त्रियाँ और वृद्ध भी सब ओर से आ जुटे। वह स्थान जनसमूह से ठसाठस भर गया।
श्लोक 25 (2.24.25)
तयोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात्तथा । आसीत्सुभीमसम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥
tayoratha bhujāghātānnigrahapragrahāttathā | āsītsubhīmasampāto vajraparvatayoriva
उनकी भुजाओं के आघातों और पकड़ने-जकड़ने से ऐसा भीषण टकराव हुआ, मानो वज्र और पर्वत भिड़ गए हों।
श्लोक 26 (2.24.26)
उभौ परमसंहृष्टौ बलेन बलिनां वरौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥
ubhau paramasaṃhṛṣṭau balena balināṃ varau | anyonyasyāntaraṃ prepsū parasparajayaiṣiṇau
अत्यन्त हर्षित, बल में बलवानों में श्रेष्ठ वे दोनों एक-दूसरे की कमजोरी ढूँढ़ते हुए परस्पर विजय चाहते थे।
श्लोक 27 (2.24.27)
शिरोभिरिव तौ मेषौ वृक्षैरिव निशाचरौ । पदैरिव शुभावश्वौ तुण्डाभ्यां तित्तिरी इव ॥
śirobhiriva tau meṣau vṛkṣairiva niśācarau | padairiva śubhāvaśvau tuṇḍābhyāṃ tittirī iva
वे ऐसे लड़ रहे थे जैसे दो मेढ़े सिरों से, दो निशाचर वृक्षों से, दो सुन्दर घोड़े टापों से और दो तीतर चोंचों से लड़ते हैं।
श्लोक 28 (2.24.28)
तद्भीममुत्सार्य जनं युद्धमासीदुपप्लवे । बलिनोः संयुगे राजन्वृत्रवासवयोरिव ॥
tadbhīmamutsārya janaṃ yuddhamāsīdupaplave | balinoḥ saṃyuge rājanvṛtravāsavayoriva
तब भीड़ को पीछे हटा दिए जाने पर, हे राजन्, उस कोलाहल में उन दोनों बलवानों का वृत्र और इन्द्र के समान भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 29 (2.24.29)
प्रकर्षणाकर्षणाभ्यामनुकर्षविकर्षणैः । आचकर्षतुरन्योन्यं जानुभिश्चावजघ्नतुः ॥
prakarṣaṇākarṣaṇābhyāmanukarṣavikarṣaṇaiḥ | ācakarṣaturanyonyaṃ jānubhiścāvajaghnatuḥ
आगे खींचते, पीछे खींचते, साथ घसीटते और झटककर अलग करते हुए वे एक-दूसरे को खींचते रहे और घुटनों से प्रहार करते रहे।
श्लोक 30 (2.24.30)
ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् । पाषाणसङ्घातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ॥
tataḥ śabdena mahatā bhartsayantau parasparam | pāṣāṇasaṅghātanibhaiḥ prahārairabhijaghnatuḥ
फिर ऊँचे स्वर में एक-दूसरे को ललकारते हुए वे चट्टानों के टकराने जैसे प्रहारों से एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 31 (2.24.31)
ततो भीमं जरासन्धो जघानोरसि मुष्टिना । भीमोऽपि तं जरासन्धं वक्षस्यभिजघान ह ॥
tato bhīmaṃ jarāsandho jaghānorasi muṣṭinā | bhīmo'pi taṃ jarāsandhaṃ vakṣasyabhijaghāna ha
तब जरासन्ध ने भीम की छाती पर मुक्का मारा, और भीम ने भी जरासन्ध के वक्ष पर प्रहार किया।
श्लोक 32 (2.24.32)
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ । बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ॥
vyūḍhoraskau dīrghabhujau niyuddhakuśalāvubhau | bāhubhiḥ samasajjetāmāyasaiḥ parighairiva
चौड़ी छाती और लम्बी भुजाओं वाले, मल्लयुद्ध में कुशल वे दोनों लोहे की अर्गलाओं जैसी भुजाओं से गुँथ गए।
श्लोक 33 (2.24.33)
कार्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि । तदा तद्युद्धमभवद्दिनानि दश पञ्च च । अनाहारं दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत ॥
kārtikasya tu māsasya pravṛttaṃ prathame'hani | tadā tadyuddhamabhavaddināni daśa pañca ca | anāhāraṃ divārātramaviśrāntamavartata
कार्तिक मास के पहले दिन वह युद्ध आरम्भ हुआ और पन्द्रह दिनों तक चला; दिन-रात, बिना भोजन और बिना विश्राम के वह चलता रहा।
श्लोक 34 (2.24.34)
तद्वृत्तं तु त्रयोदश्यां समवेतं महात्मनोः । चतुर्दश्यां निशायां तु निवृत्तो मागधः क्लमात् ॥
tadvṛttaṃ tu trayodaśyāṃ samavetaṃ mahātmanoḥ | caturdaśyāṃ niśāyāṃ tu nivṛtto māgadhaḥ klamāt
उन दोनों महात्माओं का वह गुँथा हुआ युद्ध तेरहवें दिन तक चलता रहा; चौदहवीं की रात मगधराज थकान के कारण पीछे हट गया।
श्लोक 35 (2.24.35)
तं राजानं तथा क्लान्तं दृष्ट्वा राजञ्जनार्दनः । उवाच भीमकर्माणं भीमं सम्बोधयन्निव ॥
taṃ rājānaṃ tathā klāntaṃ dṛṣṭvā rājañjanārdanaḥ | uvāca bhīmakarmāṇaṃ bhīmaṃ sambodhayanniva
हे राजन्, राजा को इस प्रकार थका हुआ देखकर जनार्दन ने भयंकर कर्म करने वाले भीम से मानो उन्हें सचेत करते हुए कहा।
कृष्ण उवाच
श्लोक 36 (2.24.36)
क्लान्तः शत्रुर्हि कौन्तेय शक्यः पीडयितुं रणे । पीड्यमानो हि कार्त्स्न्येन जह्याज्जीवितमात्मनः ॥
klāntaḥ śatrurhi kaunteya śakyaḥ pīḍayituṃ raṇe | pīḍyamāno hi kārtsnyena jahyājjīvitamātmanaḥ
"हे कुन्तीनन्दन, थका हुआ शत्रु युद्ध में दबाया जा सकता है; और पूरी तरह दबाए जाने पर वह अपने प्राण छोड़ सकता है।"
श्लोक 37 (2.24.37)
तस्मात्तेऽद्यैव कौन्तेय पीडनीयो जनाधिपः । सममेतेन युध्यस्व बाहुभ्यां भरतर्षभ ॥
tasmātte'dyaiva kaunteya pīḍanīyo janādhipaḥ | samametena yudhyasva bāhubhyāṃ bharatarṣabha
"इसलिए हे कौन्तेय, आज ही तुम इस राजा को दबाओ। हे भरतश्रेष्ठ, इसके साथ बराबरी से भुजाओं द्वारा युद्ध करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (2.24.38)
एवमुक्तः स कृष्णेन पाण्डवः परवीरहा । जरासन्धस्य तद्रन्ध्रं ज्ञात्वा चक्रे मतिं वधे ॥
evamuktaḥ sa kṛṣṇena pāṇḍavaḥ paravīrahā | jarāsandhasya tadrandhraṃ jñātvā cakre matiṃ vadhe
कृष्ण के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले पाण्डुपुत्र ने जरासन्ध की वह दुर्बलता जान ली और उसके वध का निश्चय किया।
श्लोक 39 (2.24.39)
ततस्तमजितं जेतुं जरासन्धं वृकोदरः । संरम्भाद्बलिनां श्रेष्ठो जग्राह कुरुनन्दनः ॥
tatastamajitaṃ jetuṃ jarāsandhaṃ vṛkodaraḥ | saṃrambhādbalināṃ śreṣṭho jagrāha kurunandanaḥ
तब बलवानों में श्रेष्ठ कुरुनन्दन वृकोदर ने अजेय जरासन्ध को जीतने के लिए क्रोधपूर्वक पकड़ लिया।