सभा पर्व · अध्याय 25
भीम द्वारा जरासन्ध का वध
कृष्ण की प्रेरणा से भीम अपने पिता वायुदेव का स्मरण करते हैं और जरासन्ध को सौ बार घुमाकर तोड़ डालते हैं; जब वह फिर से जुड़ जाता है, तब कृष्ण एक सरकंडे को चीरकर उसके टुकड़े उलटकर फेंकते हैं और भीम उसी प्रकार जरासन्ध को चीर डालते हैं। कृष्ण बन्दी राजाओं को मुक्त करते हैं, जो उनका सम्मान करके युधिष्ठिर के राजसूय में सहायता का वचन देते हैं; अन्त्येष्टि के बाद कृष्ण जरासन्ध के पुत्र सहदेव को मगध का राजा अभिषिक्त करते हैं। जरासन्ध के दिव्य रथ में इन्द्रप्रस्थ लौटकर कृष्ण युधिष्ठिर का आभार ग्रहण करते हैं और द्वारका चले जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.25.1)
भीमसेनस्ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् । बुद्धिमास्थाय विपुलां जरासन्धवधेप्सया ॥
bhīmasenastataḥ kṛṣṇamuvāca yadunandanam | buddhimāsthāya vipulāṃ jarāsandhavadhepsayā
तब जरासन्ध के वध की इच्छा से भीमसेन ने गहन विचार करके यदुनन्दन कृष्ण से कहा—
भीमसेन उवाच
श्लोक 2 (2.25.2)
नायं पापो मया कृष्ण युक्तः स्यादनुरोधितुम् । प्रायेण यदुशार्दूल बान्धवक्षयकृत्तव ॥
nāyaṃ pāpo mayā kṛṣṇa yuktaḥ syādanurodhitum | prāyeṇa yaduśārdūla bāndhavakṣayakṛttava
"हे कृष्ण, हे यदुश्रेष्ठ, इस पापी को अब और छोड़ते रहना मेरे लिए उचित नहीं है, क्योंकि इसने तुम्हारे बहुत-से बन्धु-बान्धवों का विनाश किया है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (2.25.3)
एवमुक्तस्ततः कृष्णः प्रत्युवाच वृकोदरम् । त्वरयन्पुरुषव्याघ्रो जरासन्धवधेप्सया ॥
evamuktastataḥ kṛṣṇaḥ pratyuvāca vṛkodaram | tvarayanpuruṣavyāghro jarāsandhavadhepsayā
यह सुनकर जरासन्ध के वध के इच्छुक पुरुषसिंह कृष्ण ने वृकोदर (भीम) को शीघ्रता के लिए प्रेरित करते हुए उत्तर दिया—
कृष्ण उवाच
श्लोक 4 (2.25.4)
यत्ते दैवं परं सत्त्वं यच्च ते मातरिश्वनः । बलं भीमं जरासन्धे दर्शयाशु तदद्य वै ॥
yatte daivaṃ paraṃ sattvaṃ yacca te mātariśvanaḥ | balaṃ bhīmaṃ jarāsandhe darśayāśu tadadya vai
"हे भीम, तुम्हारे भीतर जो परम दैवी सत्त्व है और वायुदेव से मिला जो भयंकर बल है, उसे आज ही बिना विलम्ब जरासन्ध पर दिखाओ।
श्लोक 5 (2.25.5)
तवैष वध्यो दुर्बुद्धिर्जरासन्धो महारथः । इत्यन्तरिक्षे त्वश्रौषं यदा वायुरवाप्यते ॥
tavaiṣa vadhyo durbuddhirjarāsandho mahārathaḥ | ityantarikṣe tvaśrauṣaṃ yadā vāyuravāpyate
"यह दुर्बुद्धि महारथी जरासन्ध तुम्हारे ही हाथों मारा जाएगा" — यह वाणी मैंने आकाश में तब सुनी थी जब वायुदेव का आवाहन हुआ था।
श्लोक 6 (2.25.6)
गोमन्ते पर्वतश्रेष्ठे येनैष परिमोक्षितः । बलदेवबलं प्राप्य कोऽन्यो जीवेत्तु मागधात् ॥
gomante parvataśreṣṭhe yenaiṣa parimokṣitaḥ | baladevabalaṃ prāpya ko'nyo jīvettu māgadhāt
पर्वतश्रेष्ठ गोमन्त पर बलदेव ने इसे छोड़ दिया था। बलदेव के बल से टकराकर इस मगधराज के सिवा और कौन जीवित बच सकता था?
श्लोक 7 (2.25.7)
तदस्य मृत्युर्विहितस्त्वदृते न महाबल । वायुं चिन्त्य महाबाहो जहीमं मगधाधिपम् ॥
tadasya mṛtyurvihitastvadṛte na mahābala | vāyuṃ cintya mahābāho jahīmaṃ magadhādhipam
अतः हे महाबली, इसकी मृत्यु तुम्हारे सिवा किसी और के हाथों नहीं रची गई है। हे महाबाहु, वायुदेव का स्मरण करके इस मगधराज का वध करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (2.25.8)
एवमुक्तस्ततो भीमो मनसाऽऽचिन्त्य मारुतम् । जनार्दनं नमस्कृत्य परिष्वज्य च फल्गुनम् ॥
evamuktastato bhīmo manasā''cintya mārutam | janārdanaṃ namaskṛtya pariṣvajya ca phalgunam
ऐसा कहे जाने पर भीम ने मन में वायुदेव का ध्यान किया, जनार्दन को प्रणाम किया और फाल्गुन (अर्जुन) को गले लगाया।
श्लोक 9 (2.25.9)
प्रभञ्जनबलाविष्टो जरासन्धमरिन्दमः । उत्क्षिप्य भ्रामयामास बलवन्तं महाबलः ॥
prabhañjanabalāviṣṭo jarāsandhamarindamaḥ | utkṣipya bhrāmayāmāsa balavantaṃ mahābalaḥ
वायु के बल से भरकर उस महाबली शत्रुदमन ने बलवान जरासन्ध को ऊपर उठाया और घुमाने लगा।
श्लोक 10 (2.25.10)
भ्रामयित्वा शतगुणं जानुभ्यां भरतर्षभ । बभञ्ज पृष्ठं सङ्क्षिप्य निष्पिष्य विननाद च ॥
bhrāmayitvā śataguṇaṃ jānubhyāṃ bharatarṣabha | babhañja pṛṣṭhaṃ saṅkṣipya niṣpiṣya vinanāda ca
हे भरतश्रेष्ठ, उसे सौ बार घुमाकर भीम ने उसे घुटनों पर दबाया, उसकी पीठ तोड़ दी, उसे पीस डाला और गर्जना की।
श्लोक 11 (2.25.11)
करे गृहीत्वा चरणं द्विधा चक्रे महाबलः । तस्य निष्पिष्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः ॥
kare gṛhītvā caraṇaṃ dvidhā cakre mahābalaḥ | tasya niṣpiṣyamāṇasya pāṇḍavasya ca garjataḥ
उस महाबली ने हाथ से उसका पैर पकड़कर उसे दो भागों में चीर दिया। जब जरासन्ध पीसा जा रहा था और पाण्डव गरज रहे थे,
श्लोक 12 (2.25.12)
अभवत्तुमुलो नादः सर्वप्राणिभयङ्करः । वित्रेसुर्मागधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुस्रुवुः ॥
abhavattumulo nādaḥ sarvaprāṇibhayaṅkaraḥ | vitresurmāgadhāḥ sarve strīṇāṃ garbhāśca susruvuḥ
तब समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाला भीषण कोलाहल उठा। सारे मगधवासी काँप उठे और स्त्रियों के गर्भ गिर गए —
श्लोक 13 (2.25.13)
भीमसेनस्य नादेन जरासन्धस्य चैव ह । किं नु स्याद्धिमवान्भिन्नः किंनुस्विद्दीर्यते मही ॥
bhīmasenasya nādena jarāsandhasya caiva ha | kiṃ nu syāddhimavānbhinnaḥ kiṃnusviddīryate mahī
भीमसेन और जरासन्ध की गर्जना से। "क्या हिमालय फट गया है? क्या पृथ्वी ही विदीर्ण हो रही है?"
श्लोक 14 (2.25.14)
इति वै मागधा जज्ञुर्भीमसेनस्य निस्वनात् । ततस्तु भगवान्कृष्णो जरासन्धजिघांसया ॥
iti vai māgadhā jajñurbhīmasenasya nisvanāt | tatastu bhagavānkṛṣṇo jarāsandhajighāṃsayā
भीमसेन की गर्जना सुनकर मगधवासी ऐसा ही सोचने लगे। तब जरासन्ध के वध की इच्छा से भगवान कृष्ण ने
श्लोक 15 (2.25.15)
भीमसेनं समालोक्य नलं जग्राह पाणिना । द्विधा चिच्छेद वै तत्तु जरासन्धवधं प्रति ॥
bhīmasenaṃ samālokya nalaṃ jagrāha pāṇinā | dvidhā ciccheda vai tattu jarāsandhavadhaṃ prati
भीमसेन की ओर देखकर हाथ में एक सरकंडा लिया और जरासन्ध के वध का संकेत करते हुए उसे दो भागों में चीर दिया।
श्लोक 16 (2.25.16)
ततस्त्वाज्ञाय तस्यैव पादमुत्क्षिप्य मारुतिः । द्विधा बभञ्ज तद्गात्रं प्राक्षिपद्विननाद च ॥
tatastvājñāya tasyaiva pādamutkṣipya mārutiḥ | dvidhā babhañja tadgātraṃ prākṣipadvinanāda ca
उनका संकेत समझकर वायुपुत्र भीम ने जरासन्ध का पैर उठाकर उसका शरीर दो टुकड़ों में फाड़ डाला, उसे फेंक दिया और गर्जना की।
श्लोक 17 (2.25.17)
पुनः सन्धाय तु तदा जरासन्धः प्रतापवान् । भीमेन च समागम्य बाहुयुद्धं चकार ह ॥
punaḥ sandhāya tu tadā jarāsandhaḥ pratāpavān | bhīmena ca samāgamya bāhuyuddhaṃ cakāra ha
किन्तु प्रतापी जरासन्ध फिर से जुड़ गया और भीम से भिड़कर बाहुयुद्ध करने लगा।
श्लोक 18 (2.25.18)
तयोः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । सर्वलोकक्षयकरं सर्वभूतभयावहम् ॥
tayoḥ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | sarvalokakṣayakaraṃ sarvabhūtabhayāvaham
उन दोनों में रोंगटे खड़े कर देने वाला भीषण युद्ध हुआ, जो सब लोकों का विनाश करने वाला और सब प्राणियों को भय देने वाला था।
श्लोक 19 (2.25.19)
पुनः कृष्णस्तमिरिणं द्विधा विच्छिद्य माधवः । व्यत्यस्य प्राक्षिपत्तत्तु जरासन्धवधेप्सया ॥
punaḥ kṛṣṇastamiriṇaṃ dvidhā vicchidya mādhavaḥ | vyatyasya prākṣipattattu jarāsandhavadhepsayā
तब माधव कृष्ण ने फिर उस सरकंडे को दो भागों में चीरा और जरासन्ध के वध की इच्छा से दोनों टुकड़ों को उलटकर फेंक दिया।
श्लोक 20 (2.25.20)
भीमसेनस्तदा ज्ञात्वा निर्बिभेद च मागधम् । द्विधा व्यत्यस्य पादेन प्राक्षिपच्च ननाद ह ॥
bhīmasenastadā jñātvā nirbibheda ca māgadham | dvidhā vyatyasya pādena prākṣipacca nanāda ha
तब भीमसेन समझ गए। उन्होंने मगधराज को चीर डाला, दोनों भागों को पैर से उलटकर फेंक दिया और गर्जना की।
श्लोक 21 (2.25.21)
शुष्कमांसास्थिमेदस्त्वग्भिन्नमस्तिष्कपिण्डकः । शवभूतस्तदा राजन्पिण्डीकृत इवाबभौ ॥
śuṣkamāṃsāsthimedastvagbhinnamastiṣkapiṇḍakaḥ | śavabhūtastadā rājanpiṇḍīkṛta ivābabhau
हे राजन्, उसका मांस, अस्थि, मेद और त्वचा सूख गए, मस्तिष्क फटकर लोथड़ा बन गया, और वह गूँधकर बनाए गए पिण्ड-सा एक शव दिखाई देने लगा।
श्लोक 22 (2.25.22)
ततो राज्ञः कुलद्वारि प्रसुप्तमिव तं नृपम् । रात्रौ गतासुमुत्सृज्य निश्चक्रमुररिन्दमाः ॥
tato rājñaḥ kuladvāri prasuptamiva taṃ nṛpam | rātrau gatāsumutsṛjya niścakramurarindamāḥ
तब वे शत्रुदमन रात्रि में उस प्राणहीन राजा को राजभवन के द्वार पर सोए हुए-से छोड़कर बाहर निकल आए।
श्लोक 23 (2.25.23)
जरासन्धरथं कृष्णो योजयित्वा पताकिनम् । आरोप्य भ्रातरौ चैव मोक्षयामास बान्धवान् ॥
jarāsandharathaṃ kṛṣṇo yojayitvā patākinam | āropya bhrātarau caiva mokṣayāmāsa bāndhavān
कृष्ण ने जरासन्ध के ध्वजायुक्त रथ को जोता, दोनों भाइयों को उस पर चढ़ाया और बन्दी बान्धवों (राजाओं) को मुक्त कर दिया।
श्लोक 24 (2.25.24)
ते वै रत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हं पृथिवीश्वराः । राजानं चक्रुरासाद्य मोक्षिता महतो भयात् ॥
te vai ratnabhujaṃ kṛṣṇaṃ ratnārhaṃ pṛthivīśvarāḥ | rājānaṃ cakrurāsādya mokṣitā mahato bhayāt
महान भय से मुक्त हुए उन पृथ्वीपतियों ने रत्नों के योग्य कृष्ण के पास आकर उन्हें अपना राजा माना और उन्हें रत्न भेंट किए।
श्लोक 25 (2.25.25)
अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः । रथमास्थाय तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ॥
akṣataḥ śastrasampanno jitāriḥ saha rājabhiḥ | rathamāsthāya taṃ divyaṃ nirjagāma girivrajāt
अक्षत, शस्त्रों से सम्पन्न और शत्रु पर विजयी कृष्ण उस दिव्य रथ पर बैठकर राजाओं के साथ गिरिव्रज से बाहर निकले।
श्लोक 26 (2.25.26)
यः स सोदर्यवान्नाम द्वियोधी कृष्णसारथिः । अभ्यासघाती सन्दृश्यो दुर्जयः सर्वराजभिः ॥
yaḥ sa sodaryavānnāma dviyodhī kṛṣṇasārathiḥ | abhyāsaghātī sandṛśyo durjayaḥ sarvarājabhiḥ
वह रथ 'सोदर्यवान्' नाम से प्रसिद्ध था; उस पर दो योद्धा थे और कृष्ण सारथि थे। वह निकट से शत्रुओं का संहार करने वाला, देखने में शोभायमान और किसी भी राजा के लिए अजेय था।
श्लोक 27 (2.25.27)
भीमार्जुनाभ्यां योधाभ्यामास्थितः कृष्णसारथिः । शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जयः सर्वधन्विभिः ॥
bhīmārjunābhyāṃ yodhābhyāmāsthitaḥ kṛṣṇasārathiḥ | śuśubhe rathavaryo'sau durjayaḥ sarvadhanvibhiḥ
भीम और अर्जुन जैसे योद्धाओं से युक्त और कृष्ण के सारथ्य में वह श्रेष्ठ रथ अत्यन्त शोभा पा रहा था; कोई भी धनुर्धर उसे जीत नहीं सकता था।
श्लोक 28 (2.25.28)
शक्रविष्णू हि सङ्ग्रामे चेरतुस्तारकामये । रथेन तेन वै कृष्ण उपारुह्य ययौ तदा ॥
śakraviṣṇū hi saṅgrāme ceratustārakāmaye | rathena tena vai kṛṣṇa upāruhya yayau tadā
इसी रथ से इन्द्र और विष्णु ने तारकामय संग्राम में विचरण किया था; उसी रथ पर चढ़कर अब कृष्ण चल पड़े।
पौरा ऊचुः
श्लोक 29 (2.25.29)
एवमेतौ महाबाहू तदा दुष्करकारिणौ । कृष्णप्रणीतौ लोकेऽस्मिन्नथ को द्रष्टुमर्हति ॥
evametau mahābāhū tadā duṣkarakāriṇau | kṛṣṇapraṇītau loke'sminnatha ko draṣṭumarhati
"कृष्ण के नेतृत्व में चलने वाले ये दोनों दुष्कर कर्म करने वाले महाबाहु — इस लोक में भला कौन इन्हें देख पाने में समर्थ है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 30 (2.25.30)
इत्यवोचन्व्रजन्तं तं जरासन्धपुरालयाः । वासुदेवं नरश्रेष्ठं युक्तं वातजवैर्हयैः ॥
ityavocanvrajantaṃ taṃ jarāsandhapurālayāḥ | vāsudevaṃ naraśreṣṭhaṃ yuktaṃ vātajavairhayaiḥ
वायु के समान वेग वाले घोड़ों से जुते रथ में जाते हुए नरश्रेष्ठ वासुदेव के विषय में जरासन्ध की नगरी के निवासी ऐसा कहने लगे।
श्लोक 31 (2.25.31)
तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना । मेघनिर्घोषनादेन जैत्रेणामित्रघातिना ॥
taptacāmīkarābheṇa kiṅkiṇījālamālinā | meghanirghoṣanādena jaitreṇāmitraghātinā
वह रथ तपाए हुए सोने के समान चमकता था, छोटी घंटियों की जालियों से सजा था, मेघ-गर्जना जैसा शब्द करता था, विजय दिलाने वाला और शत्रुओं का नाश करने वाला था।
श्लोक 32 (2.25.32)
येन शक्रो दानवानां जघान नवतीर्नव । तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ॥
yena śakro dānavānāṃ jaghāna navatīrnava | taṃ prāpya samahṛṣyanta rathaṃ te puruṣarṣabhāḥ
यह वही रथ था जिससे इन्द्र ने निन्यानबे दानवों का वध किया था। उसे पाकर वे पुरुषश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 33 (2.25.33)
ततः कृष्णं महाबाहुं भ्रातृभ्यां सहितं तदा । रथस्थं मागधा दृष्ट्वा समपद्यन्त विस्मिताः ॥
tataḥ kṛṣṇaṃ mahābāhuṃ bhrātṛbhyāṃ sahitaṃ tadā | rathasthaṃ māgadhā dṛṣṭvā samapadyanta vismitāḥ
तब महाबाहु कृष्ण को दोनों भाइयों के साथ रथ पर खड़ा देखकर मगधवासी विस्मित हो गए।
श्लोक 34 (2.25.34)
हयैर्दिव्यैः समायुक्तो रथो वायुसमो जवे । अधिष्ठितः स शुशुभे कृष्णेनातीव भारत ॥
hayairdivyaiḥ samāyukto ratho vāyusamo jave | adhiṣṭhitaḥ sa śuśubhe kṛṣṇenātīva bhārata
हे भारत, दिव्य घोड़ों से जुता, वायु के समान वेगवान वह रथ कृष्ण के आरूढ़ होने से अत्यन्त शोभायमान हो उठा।
श्लोक 35 (2.25.35)
असङ्गो देवविहितस्तस्मिन्रथवरे ध्वजः । योजनाद्ददृशे श्रीमानिन्द्रायुधसमप्रभः ॥
asaṅgo devavihitastasminrathavare dhvajaḥ | yojanāddadṛśe śrīmānindrāyudhasamaprabhaḥ
उस श्रेष्ठ रथ पर देवताओं का बनाया हुआ एक ध्वज था, जो रथ को स्पर्श नहीं करता था; वह शोभायुक्त, इन्द्रधनुष के समान कान्तिमान और एक योजन दूर से दिखाई देता था।
श्लोक 36 (2.25.36)
चिन्तयामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् । क्षणे तस्मिन्स तेनासीच्चैत्यवृक्ष इवोत्थितः ॥
cintayāmāsa kṛṣṇo'tha garutmantaṃ sa cābhyayāt | kṣaṇe tasminsa tenāsīccaityavṛkṣa ivotthitaḥ
तब कृष्ण ने गरुड़ का स्मरण किया और वे तुरन्त आ पहुँचे; उसी क्षण उनके बैठने से वह ध्वज किसी ऊँचे चैत्यवृक्ष के समान उठा हुआ दिखने लगा।
श्लोक 37 (2.25.37)
व्यादितास्यैर्महानादैः सह भूतैर्ध्वजालयैः । तस्मिन्रथवरे तस्थौ गरुत्मान्पन्नगाशनः ॥
vyāditāsyairmahānādaiḥ saha bhūtairdhvajālayaiḥ | tasminrathavare tasthau garutmānpannagāśanaḥ
मुँह फाड़े हुए, ज़ोर से गरजते ध्वजवासी प्राणियों के साथ सर्पभक्षी गरुड़ उस श्रेष्ठ रथ पर विराजमान हो गए।
श्लोक 38 (2.25.38)
दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसाभ्यधिकं बभौ । आदित्य इव मध्याह्ने सहस्रकिरणावृतः ॥
durnirīkṣyo hi bhūtānāṃ tejasābhyadhikaṃ babhau | āditya iva madhyāhne sahasrakiraṇāvṛtaḥ
प्राणियों के लिए उसकी ओर देख पाना कठिन था; वह दोपहर के सहस्र किरणों से घिरे सूर्य के समान अत्यधिक तेज से दमक रहा था।
श्लोक 39 (2.25.39)
न स सज्जति वृक्षेषु शस्त्रैश्चापि न रिष्यते । दिव्यो ध्वजवरो राजन्दृश्यते चेह मानुषैः ॥
na sa sajjati vṛkṣeṣu śastraiścāpi na riṣyate | divyo dhvajavaro rājandṛśyate ceha mānuṣaiḥ
हे राजन्, वह दिव्य श्रेष्ठ ध्वज न तो वृक्षों में अटकता था और न शस्त्रों से उसकी कोई हानि होती थी; फिर भी मनुष्य उसे यहाँ देख सकते थे।
श्लोक 40 (2.25.40)
तमास्थाय रथं दिव्यं पर्जन्यसमनिःस्वनम् । निर्ययौ पुरुषव्याघ्रः पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ॥
tamāsthāya rathaṃ divyaṃ parjanyasamaniḥsvanam | niryayau puruṣavyāghraḥ pāṇḍavābhyāṃ sahācyutaḥ
मेघ-गर्जना जैसे शब्द वाले उस दिव्य रथ पर बैठकर पुरुषसिंह अच्युत दोनों पाण्डवों के साथ निकल पड़े।
श्लोक 41 (2.25.41)
यं लेभे वासवाद्राजा वसुस्तस्माद्बृहद्रथः । बृहद्रथात्क्रमेणैव प्राप्तो बार्हद्रथो रथम् ॥
yaṃ lebhe vāsavādrājā vasustasmādbṛhadrathaḥ | bṛhadrathātkrameṇaiva prāpto bārhadratho ratham
राजा वसु ने यह रथ इन्द्र से पाया था, उनसे बृहद्रथ को मिला और बृहद्रथ से क्रमशः बार्हद्रथ (जरासन्ध) को प्राप्त हुआ।
श्लोक 42 (2.25.42)
स निर्याय महाबाहुः पुण्डरीकेक्षणस्ततः । गिरिव्रजाद्बहिस्तस्थौ समदेशे महायशाः ॥
sa niryāya mahābāhuḥ puṇḍarīkekṣaṇastataḥ | girivrajādbahistasthau samadeśe mahāyaśāḥ
नगर से निकलकर वे महायशस्वी, कमलनयन महाबाहु गिरिव्रज के बाहर समतल भूमि पर ठहर गए।
श्लोक 43 (2.25.43)
तत्रैनं नागराः सर्वे सत्कारेणाभ्ययुस्तदा । ब्राह्मणप्रमुखा राजन्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
tatrainaṃ nāgarāḥ sarve satkāreṇābhyayustadā | brāhmaṇapramukhā rājanvidhidṛṣṭena karmaṇā
हे राजन्, वहाँ ब्राह्मणों को आगे करके सब नगरवासी शास्त्रविहित विधि से उनका सत्कार करने आए।
श्लोक 44 (2.25.44)
बन्धनाद्विप्रमुक्ताश्च राजानो मधुसूदनम् । पूजयामासुरूचुश्च स्तुतिपूर्वमिदं वचः ॥
bandhanādvipramuktāśca rājāno madhusūdanam | pūjayāmāsurūcuśca stutipūrvamidaṃ vacaḥ
बन्धन से मुक्त हुए राजाओं ने भी मधुसूदन की पूजा की और स्तुतिपूर्वक ये वचन कहे—
राजान ऊचुः
श्लोक 45 (2.25.45)
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने । भीमार्जुनबलोपेते धर्मस्य प्रतिपालनम् ॥
naitaccitraṃ mahābāho tvayi devakinandane | bhīmārjunabalopete dharmasya pratipālanam
"हे महाबाहु देवकीनन्दन, भीम और अर्जुन के बल से युक्त आपके द्वारा धर्म की रक्षा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
श्लोक 46 (2.25.46)
जरासन्धह्रदे घोरे दुःखपङ्के निमज्जताम् । राज्ञां समभ्युद्धरणं यदिदं कृतमद्य वै ॥
jarāsandhahrade ghore duḥkhapaṅke nimajjatām | rājñāṃ samabhyuddharaṇaṃ yadidaṃ kṛtamadya vai
जरासन्ध रूपी भयंकर सरोवर के दुःख-रूपी कीचड़ में डूबते हुए राजाओं का आज आपने जो उद्धार किया है—
श्लोक 47 (2.25.47)
विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे । दिष्ट्या मोक्षाद्यशो दीप्तमाप्तं ते यदुनन्दन ॥
viṣṇo samavasannānāṃ giridurge sudāruṇe | diṣṭyā mokṣādyaśo dīptamāptaṃ te yadunandana
हे विष्णु, हम उस अत्यन्त भयानक पर्वतीय दुर्ग में पड़े दुःख पा रहे थे; हे यदुनन्दन, सौभाग्य से हमें मुक्त करके आपने उज्ज्वल यश पाया है।
श्लोक 48 (2.25.48)
किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र शाधि नः प्रणतिस्थितान् । कृतमित्येव तद्विद्धि नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ॥
kiṃ kurmaḥ puruṣavyāghra śādhi naḥ praṇatisthitān | kṛtamityeva tadviddhi nṛpairyadyapi duṣkaram
हे पुरुषसिंह, हम क्या करें? हम आपके सामने नतमस्तक खड़े हैं, हमें आज्ञा दीजिए। वह कार्य कितना भी कठिन हो, उसे राजाओं द्वारा किया हुआ ही समझिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (2.25.49)
तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः । युधिष्ठिरो राजसूयं क्रतुमाहर्तुमिच्छति ॥
tānuvāca hṛṣīkeśaḥ samāśvāsya mahāmanāḥ | yudhiṣṭhiro rājasūyaṃ kratumāhartumicchati
महामना हृषीकेश ने उन्हें आश्वासन देकर कहा— "युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं।
कृष्ण उवाच
श्लोक 50 (2.25.50)
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । सर्वैर्भवद्भिर्विज्ञाय साहाय्यं क्रियतामिति ॥
tasya dharmapravṛttasya pārthivatvaṃ cikīrṣataḥ | sarvairbhavadbhirvijñāya sāhāyyaṃ kriyatāmiti
वे धर्म में तत्पर हैं और पृथ्वी का सम्राट बनना चाहते हैं। यह जानकर आप सब उनकी सहायता करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (2.25.51)
ततः सुप्रीतमनसस्ते नृपा नृपसत्तम । तथेत्येवाब्रुवन्सर्वे प्रतिगृह्यास्य तां गिरम् ॥
tataḥ suprītamanasaste nṛpā nṛpasattama | tathetyevābruvansarve pratigṛhyāsya tāṃ giram
हे नृपश्रेष्ठ, तब प्रसन्नचित्त होकर उन सभी राजाओं ने "ऐसा ही होगा" कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली।
श्लोक 52 (2.25.52)
रत्नभाजं च दाशार्हं चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः । कृच्छ्राञ्जग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पया ॥
ratnabhājaṃ ca dāśārhaṃ cakruste pṛthivīśvarāḥ | kṛcchrāñjagrāha govindasteṣāṃ tadanukampayā
उन पृथ्वीपतियों ने दाशार्ह (कृष्ण) को रत्न भेंट किए, और गोविन्द ने उन पर कृपा करके बड़े संकोच से उन्हें ग्रहण किया।
श्लोक 53 (2.25.53)
जरासन्धात्मजश्चैव सहदेवो महामनाः । निर्ययौ सजनामात्यः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ॥
jarāsandhātmajaścaiva sahadevo mahāmanāḥ | niryayau sajanāmātyaḥ puraskṛtya purohitam
जरासन्ध का पुत्र महामना सहदेव भी अपने स्वजनों और मन्त्रियों के साथ पुरोहित को आगे करके नगर से बाहर आया।
श्लोक 54 (2.25.54)
स नीचैः प्रणतो भूत्वा बहुरत्नपुरोगमः । सहदेवो नृणां देवं वासुदेवमुपस्थितः ॥
sa nīcaiḥ praṇato bhūtvā bahuratnapurogamaḥ | sahadevo nṛṇāṃ devaṃ vāsudevamupasthitaḥ
नम्रतापूर्वक झुककर, बहुत-से रत्न आगे रखवाकर सहदेव मनुष्यों के देवता वासुदेव के पास उपस्थित हुआ।
श्लोक 55 (2.25.55)
भयार्ताय ततस्तस्मै कृष्णो दत्त्वाऽभयं तदा । आददेऽस्य महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः ॥
bhayārtāya tatastasmai kṛṣṇo dattvā'bhayaṃ tadā | ādade'sya mahārhāṇi ratnāni puruṣottamaḥ
तब पुरुषोत्तम कृष्ण ने भय से पीड़ित उस राजकुमार को अभयदान दिया और उसके बहुमूल्य रत्न स्वीकार किए।
सहदेव उवाच
श्लोक 56 (2.25.56)
यत्कृतं पुरुषव्याघ्र मम पित्रा जनार्दन । तत्ते हृदि महाबाहो न कार्यं पुरुषोत्तम ॥
yatkṛtaṃ puruṣavyāghra mama pitrā janārdana | tatte hṛdi mahābāho na kāryaṃ puruṣottama
"हे पुरुषसिंह जनार्दन, हे महाबाहु पुरुषोत्तम, मेरे पिता ने जो कुछ किया, उसे आप अपने मन में न रखें।
श्लोक 57 (2.25.57)
त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द प्रसादं कुरु मे प्रभो । पितुरिच्छामि संस्कारं कर्तुं देवकिनन्दन ॥
tvāṃ prapanno'smi govinda prasādaṃ kuru me prabho | pituricchāmi saṃskāraṃ kartuṃ devakinandana
हे गोविन्द, मैं आपकी शरण में हूँ; हे प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए। हे देवकीनन्दन, मैं अपने पिता का अन्त्येष्टि-संस्कार करना चाहता हूँ।
श्लोक 58 (2.25.58)
त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य भीमसेनात्तथार्जुनात् । निर्भयो विचरिष्यामि यथाकामं यथासुखम् ॥
tvatto'bhyanujñāṃ samprāpya bhīmasenāttathārjunāt | nirbhayo vicariṣyāmi yathākāmaṃ yathāsukham
आपकी तथा भीमसेन और अर्जुन की अनुमति पाकर मैं निर्भय होकर इच्छानुसार सुखपूर्वक विचरूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 59 (2.25.59)
एवं विज्ञाप्यमानस्य सहदेवस्य मारिष । प्रहृष्टो देवकीपुत्रः पाण्डवौ च महारथौ ॥
evaṃ vijñāpyamānasya sahadevasya māriṣa | prahṛṣṭo devakīputraḥ pāṇḍavau ca mahārathau
हे मान्यवर, सहदेव के इस प्रकार निवेदन करने पर देवकीपुत्र कृष्ण और दोनों महारथी पाण्डव प्रसन्न हुए,
श्लोक 60 (2.25.60)
क्रियतां संस्क्रिया राजन्पितुस्त इति चाब्रुवन् । तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पार्थयोश्च स मागधः ॥
kriyatāṃ saṃskriyā rājanpitusta iti cābruvan | tacchrutvā vāsudevasya pārthayośca sa māgadhaḥ
और उन्होंने कहा— "हे राजन्, अपने पिता का संस्कार करो।" वासुदेव और दोनों पार्थों की यह बात सुनकर वह मगधराज
श्लोक 61 (2.25.61)
प्रविश्य नगरं तूर्णं सह मन्त्रिभिरप्युत । चितां चन्दनकाष्ठैश्च कालेयसरलैस्तथा ॥
praviśya nagaraṃ tūrṇaṃ saha mantribhirapyuta | citāṃ candanakāṣṭhaiśca kāleyasaralaistathā
मन्त्रियों के साथ शीघ्र नगर में गया। चन्दन, कालेय और सरल की लकड़ियों से चिता बनाई गई,
श्लोक 62 (2.25.62)
कालागरुसुगन्धैश्च तैलैश्च विविधैरपि । घृतधाराशतैश्चैव सुमनोभिश्च भारत ॥
kālāgarusugandhaiśca tailaiśca vividhairapi | ghṛtadhārāśataiścaiva sumanobhiśca bhārata
और हे भारत, सुगन्धित काले अगरु, अनेक प्रकार के तेल, घी की सैकड़ों धाराएँ और फूल—
श्लोक 63 (2.25.63)
समन्तादेव कीर्यन्तोऽदहन्त मगधाधिपम् । उदकं तस्य चक्रेऽथ सहदेवः सहानुजः ॥
samantādeva kīryanto'dahanta magadhādhipam | udakaṃ tasya cakre'tha sahadevaḥ sahānujaḥ
इन सबको चारों ओर बिखेरकर उन्होंने मगधराज का दाह-संस्कार किया। फिर सहदेव ने अपने छोटे भाइयों के साथ उसे जलांजलि दी।
श्लोक 64 (2.25.64)
कृत्वा पितुः स्वर्गगतिं निर्ययौ यत्र केशवः । पाण्डवौ च महाभागौ भीमसेनार्जुनावुभौ ॥
kṛtvā pituḥ svargagatiṃ niryayau yatra keśavaḥ | pāṇḍavau ca mahābhāgau bhīmasenārjunāvubhau
पिता की स्वर्गगति का कर्म पूरा करके वह वहाँ गया जहाँ केशव और दोनों महाभाग पाण्डव भीमसेन और अर्जुन थे।
श्लोक 65 (2.25.65)
स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत माधवम् ॥
sa prahvaḥ prāñjalirbhūtvā vyajñāpayata mādhavam
विनम्र होकर, हाथ जोड़कर उसने माधव से निवेदन किया—
सहदेव उवाच
श्लोक 66 (2.25.66)
इमे रत्नानि भूरीणि गोजाविमहिषादयः ॥
ime ratnāni bhūrīṇi gojāvimahiṣādayaḥ
"ये प्रचुर रत्न, गौएँ, बकरियाँ, भेड़ें, भैंसें आदि,
श्लोक 67 (2.25.67)
हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानि च । दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यते भवान् ॥
hastino'śvāśca govinda vāsāṃsi vividhāni ca | dīyatāṃ dharmarājāya yathā vā manyate bhavān
हाथी, घोड़े और अनेक प्रकार के वस्त्र, हे गोविन्द, धर्मराज को दे दिए जाएँ, अथवा जैसा आप उचित समझें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 68 (2.25.68)
भयार्ताय ततस्तस्मै कृत्वा कृष्णोऽभयं तदा । अभ्यषिञ्चत राजानं सहदेवं जनार्दनः ॥
bhayārtāya tatastasmai kṛtvā kṛṣṇo'bhayaṃ tadā | abhyaṣiñcata rājānaṃ sahadevaṃ janārdanaḥ
तब जनार्दन कृष्ण ने भयभीत सहदेव को अभयदान देकर उसका राज्याभिषेक किया—
श्लोक 69 (2.25.69)
मागधानां महीपालं जरासन्धात्मजं तदा । आददे च महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः ॥
māgadhānāṃ mahīpālaṃ jarāsandhātmajaṃ tadā | ādade ca mahārhāṇi ratnāni puruṣottamaḥ
जरासन्ध के पुत्र को मगधवासियों का राजा बनाया; और पुरुषोत्तम ने वे बहुमूल्य रत्न स्वीकार किए।
श्लोक 70 (2.25.70)
गत्वैकत्वं स कृष्णेन पार्थाभ्यां चापि सत्कृतः । विवेश मतिमान्राजा पुनर्बार्हद्रथं पुरम् ॥
gatvaikatvaṃ sa kṛṣṇena pārthābhyāṃ cāpi satkṛtaḥ | viveśa matimānrājā punarbārhadrathaṃ puram
कृष्ण से मैत्री करके और दोनों पार्थों से सम्मानित होकर वह बुद्धिमान राजा फिर बृहद्रथ की नगरी में लौट गया।
श्लोक 71 (2.25.71)
पार्थाभ्यां सहितः कृष्णः सर्वैश्च वसुधाधिपैः । यथावयः समागम्य विससर्ज नराधिपान् ॥
pārthābhyāṃ sahitaḥ kṛṣṇaḥ sarvaiśca vasudhādhipaiḥ | yathāvayaḥ samāgamya visasarja narādhipān
दोनों पार्थों के साथ कृष्ण ने सब पृथ्वीपतियों से आयु के क्रम से भेंट की और फिर उन्हें विदा किया।
श्लोक 72 (2.25.72)
विसृज्य सर्वान्नृपतीन्राजसूये महात्मभिः । आगन्तव्यं भवद्भिश्च धर्मराजप्रियेप्सुभिः ॥
visṛjya sarvānnṛpatīnrājasūye mahātmabhiḥ | āgantavyaṃ bhavadbhiśca dharmarājapriyepsubhiḥ
सब राजाओं को विदा करते हुए उन्होंने कहा— "हे महात्माओ, धर्मराज का प्रिय करने की इच्छा से आप सब राजसूय में अवश्य आइए।"
श्लोक 73 (2.25.73)
एवमुक्ता माधवेन सर्वे ते वसुधाधिपाः । एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा समेताः परया मुदा ॥
evamuktā mādhavena sarve te vasudhādhipāḥ | evamastviti cāpyuktvā sametāḥ parayā mudā
माधव के ऐसा कहने पर उन सभी पृथ्वीपतियों ने "ऐसा ही हो" कहा और बड़े आनन्द से एकत्र हुए।
श्लोक 74 (2.25.74)
भीमार्जुनहृषीकेशैः प्रहृष्टाः प्रययुस्तदा । रत्नान्यादाय भूरीणि ज्वलन्तो रिपुसूदनाः ॥
bhīmārjunahṛṣīkeśaiḥ prahṛṣṭāḥ prayayustadā | ratnānyādāya bhūrīṇi jvalanto ripusūdanāḥ
प्रसन्न होकर तेज से दमकते वे शत्रुनाशक राजा प्रचुर रत्न लेकर भीम, अर्जुन और हृषीकेश के साथ चल पड़े।
श्लोक 75 (2.25.75)
कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिया परमया युतः । रत्नान्यादाय भूरीणि प्रययौ पुरुषर्षभः ॥
kṛṣṇastu saha pārthābhyāṃ śriyā paramayā yutaḥ | ratnānyādāya bhūrīṇi prayayau puruṣarṣabhaḥ
परम श्री से युक्त पुरुषश्रेष्ठ कृष्ण प्रचुर रत्न लेकर दोनों पार्थों के साथ चल पड़े।
श्लोक 76 (2.25.76)
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः । समेत्य धर्मराजानं प्रीयमाणोऽभ्यभाषत ॥
indraprasthamupāgamya pāṇḍavābhyāṃ sahācyutaḥ | sametya dharmarājānaṃ prīyamāṇo'bhyabhāṣata
दोनों पाण्डवों के साथ इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अच्युत धर्मराज से मिले और प्रसन्न होकर बोले—
कृष्ण उवाच
श्लोक 77 (2.25.77)
दिष्ट्या भीमेन बलवाञ्जरासन्धो निपातितः । राजानो मोक्षिताश्चेमे बन्धनान्नृपसत्तम ॥
diṣṭyā bhīmena balavāñjarāsandho nipātitaḥ | rājāno mokṣitāśceme bandhanānnṛpasattama
"हे नृपश्रेष्ठ, सौभाग्य से भीम ने बलवान जरासन्ध को मार गिराया है और ये राजा बन्धन से मुक्त कर दिए गए हैं।
श्लोक 78 (2.25.78)
दिष्ट्या कुशलिनौ चेमौ भीमसेनधनञ्जयौ । पुनः स्वनगरं प्राप्तावक्षताविति भारत ॥
diṣṭyā kuśalinau cemau bhīmasenadhanañjayau | punaḥ svanagaraṃ prāptāvakṣatāviti bhārata
हे भारत, सौभाग्य से ये दोनों, भीमसेन और धनंजय, सकुशल और अक्षत अपने नगर लौट आए हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 79 (2.25.79)
ततो युधिष्ठिरः कृष्णं पूजयित्वा यथार्हतः । भीमसेनार्जुनौ चैव प्रहृष्टः परिषस्वजे ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ kṛṣṇaṃ pūjayitvā yathārhataḥ | bhīmasenārjunau caiva prahṛṣṭaḥ pariṣasvaje
तब युधिष्ठिर ने कृष्ण का यथोचित पूजन किया और हर्षित होकर भीमसेन और अर्जुन को गले लगाया।
श्लोक 80 (2.25.80)
ततः क्षीणे जरासन्धे भ्रातृभ्यां विहितं जयम् । अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ॥
tataḥ kṣīṇe jarāsandhe bhrātṛbhyāṃ vihitaṃ jayam | ajātaśatrurāsādya mumude bhrātṛbhiḥ saha
जरासन्ध के नष्ट हो जाने पर भाइयों द्वारा प्राप्त विजय को पाकर अजातशत्रु युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ आनन्दित हुए।
श्लोक 81 (2.25.81)
हृष्टश्च धर्मराड्वाक्यं जनार्दनमभाषत । त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्र भीमसेनेन पातितः ॥
hṛṣṭaśca dharmarāḍvākyaṃ janārdanamabhāṣata | tvāṃ prāpya puruṣavyāghra bhīmasenena pātitaḥ
प्रसन्न होकर धर्मराज ने जनार्दन से कहा— "हे पुरुषसिंह, आपको पाकर ही भीमसेन ने
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 82 (2.25.82)
मागधोऽसौ बलोन्मत्तो जरासन्धः प्रतापवान् । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं प्राप्स्यामि विगतज्वरः ॥
māgadho'sau balonmatto jarāsandhaḥ pratāpavān | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ prāpsyāmi vigatajvaraḥ
बल के मद में चूर उस प्रतापी मगधराज जरासन्ध को मार गिराया है। अब मैं निश्चिन्त होकर श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय सम्पन्न करूँगा।
श्लोक 83 (2.25.83)
त्वद्बुद्धिबलमाश्रित्य यागार्होऽस्मि जनार्दन । पीतं पृथिव्याः क्रुद्धेन यशस्ते पुरुषोत्तम ॥
tvadbuddhibalamāśritya yāgārho'smi janārdana | pītaṃ pṛthivyāḥ kruddhena yaśaste puruṣottama
हे जनार्दन, आपकी बुद्धि के बल का आश्रय लेकर ही मैं यज्ञ करने योग्य हुआ हूँ। हे पुरुषोत्तम, आपने क्रोध करके पृथ्वी का सारा यश पी लिया है;
श्लोक 84 (2.25.84)
जरासन्धवधेनैव प्राप्तास्ते विपुलाः श्रियः ॥
jarāsandhavadhenaiva prāptāste vipulāḥ śriyaḥ
केवल जरासन्ध के वध से ही आपको विपुल श्री प्राप्त हुई है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 85 (2.25.85)
एवं सम्भाष्य कौन्तेयः प्रादाद्रथवरं प्रभोः ॥
evaṃ sambhāṣya kaunteyaḥ prādādrathavaraṃ prabhoḥ
ऐसा कहकर कुन्तीपुत्र ने वह श्रेष्ठ रथ प्रभु (कृष्ण) को दे दिया।
श्लोक 86 (2.25.86)
प्रतिगृह्य तु गोविन्दो जरासन्धस्य तं रथम् ॥
pratigṛhya tu govindo jarāsandhasya taṃ ratham
गोविन्द ने जरासन्ध का वह रथ स्वीकार कर लिया।
श्लोक 87 (2.25.87)
प्रहृष्टस्तस्य मुमुदे फल्गुनेन जनार्दनः । प्रीतिमानभवद्राजन्धर्मराजपुरस्कृतः ॥
prahṛṣṭastasya mumude phalgunena janārdanaḥ | prītimānabhavadrājandharmarājapuraskṛtaḥ
हे राजन्, हर्षित जनार्दन फाल्गुन के साथ उस रथ से आनन्दित हुए और धर्मराज से सम्मानित होकर प्रसन्न हुए।
श्लोक 88 (2.25.88)
यथावयः समागम्य भ्रातृभिः सह पाण्डवः । सत्कृत्य पूजयित्वा च विससर्ज नराधिपान् ॥
yathāvayaḥ samāgamya bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaḥ | satkṛtya pūjayitvā ca visasarja narādhipān
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ आयु के क्रम से राजाओं से भेंट की, उनका सत्कार और पूजन करके उन्हें विदा किया।
श्लोक 89 (2.25.89)
युधिष्ठिराभ्यनुज्ञातास्ते नृपा हृष्टमानसाः । जग्मुः स्वदेशांस्त्वरिता यानैरुच्चावचैस्ततः ॥
yudhiṣṭhirābhyanujñātāste nṛpā hṛṣṭamānasāḥ | jagmuḥ svadeśāṃstvaritā yānairuccāvacaistataḥ
युधिष्ठिर से अनुमति पाकर वे राजा प्रसन्नचित्त होकर छोटे-बड़े अनेक वाहनों से शीघ्र अपने-अपने देशों को चले गए।
श्लोक 90 (2.25.90)
एवं पुरुषशार्दूलो महाबुद्धिर्जनार्दनः । पाण्डवैर्घातयामास जरासन्धमरिं तदा ॥
evaṃ puruṣaśārdūlo mahābuddhirjanārdanaḥ | pāṇḍavairghātayāmāsa jarāsandhamariṃ tadā
इस प्रकार महाबुद्धिमान पुरुषसिंह जनार्दन ने अपने शत्रु जरासन्ध का पाण्डवों के हाथों वध करवाया।
श्लोक 91 (2.25.91)
घातयित्वा जरासन्धं बुद्धिपूर्वमरिन्दमः । धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ॥
ghātayitvā jarāsandhaṃ buddhipūrvamarindamaḥ | dharmarājamanujñāpya pṛthāṃ kṛṣṇāṃ ca bhārata
सोची-समझी युक्ति से जरासन्ध का वध करवाकर उस शत्रुदमन ने धर्मराज, पृथा और कृष्णा (द्रौपदी) से विदा ली, हे भारत,
श्लोक 92 (2.25.92)
सुभद्रां भीमसेनं च फाल्गुनं यमजौ तथा । धौम्यमामन्त्रयित्वा च प्रययौ स्वां पुरीं प्रति ॥
subhadrāṃ bhīmasenaṃ ca phālgunaṃ yamajau tathā | dhaumyamāmantrayitvā ca prayayau svāṃ purīṃ prati
और सुभद्रा, भीमसेन, फाल्गुन, दोनों जुड़वाँ भाइयों तथा धौम्य से विदा लेकर अपनी नगरी की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 93 (2.25.93)
पाण्डवैरनुधावद्भिर्युधिष्ठिरपुरोगमैः । हर्षेण महता युक्तः प्राप्य चानुत्तमं यशः । जगाम हृष्टः कृष्णस्तु पुनर्द्वारवतीं पुरीम् ॥
pāṇḍavairanudhāvadbhiryudhiṣṭhirapurogamaiḥ | harṣeṇa mahatā yuktaḥ prāpya cānuttamaṃ yaśaḥ | jagāma hṛṣṭaḥ kṛṣṇastu punardvāravatīṃ purīm
युधिष्ठिर के नेतृत्व में पीछे-पीछे चलते पाण्डवों के साथ, अत्यन्त हर्ष से भरे और अनुपम यश पाकर कृष्ण प्रसन्न मन से फिर द्वारका नगरी को लौट गए।
श्लोक 94 (2.25.94)
तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना । धर्मराजविसृष्टेन दिव्येनानादयन्दिशः ॥
tenaiva rathamukhyena manasastulyagāminā | dharmarājavisṛṣṭena divyenānādayandiśaḥ
वे उसी मन के समान वेगवान श्रेष्ठ दिव्य रथ से गए, जो धर्मराज ने उन्हें दिया था, और उसकी ध्वनि से दिशाओं को गुँजा दिया।
श्लोक 95 (2.25.95)
ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ । प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥
tato yudhiṣṭhiramukhāḥ pāṇḍavā bharatarṣabha | pradakṣiṇamakurvanta kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam
हे भरतश्रेष्ठ, तब युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने अनायास महान कर्म करने वाले कृष्ण की प्रदक्षिणा की।
श्लोक 96 (2.25.96)
ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने । जयं लब्ध्वा सुविपुलं राज्ञां दत्त्वाऽभयं तदा ॥
tato gate bhagavati kṛṣṇe devakinandane | jayaṃ labdhvā suvipulaṃ rājñāṃ dattvā'bhayaṃ tadā
भगवान देवकीनन्दन कृष्ण के चले जाने पर, अत्यन्त बड़ी विजय पाकर और राजाओं को अभयदान देकर,
श्लोक 97 (2.25.97)
संवर्धितं यशो भूयः कर्मणा तेन भारत । द्रौपद्याः पाण्डवा राजन्परां प्रीतिमवर्धयन् ॥
saṃvardhitaṃ yaśo bhūyaḥ karmaṇā tena bhārata | draupadyāḥ pāṇḍavā rājanparāṃ prītimavardhayan
हे भारत, उस कर्म से पाण्डवों का यश और भी बढ़ गया; और हे राजन्, पाण्डवों ने द्रौपदी के आनन्द को भी बहुत बढ़ाया।
श्लोक 98 (2.25.98)
तस्मिन्काले तु यद्युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् । तद्राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ॥
tasminkāle tu yadyuktaṃ dharmakāmārthasaṃhitam | tadrājā dharmataścakre prajāpālanakīrtanam
उस समय राजा युधिष्ठिर ने धर्म, काम और अर्थ के अनुरूप जो कुछ उचित था, वह धर्मपूर्वक किया और प्रजापालन के लिए कीर्ति पाई।