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सभा पर्व · अध्याय 103

धृतराष्ट्र का पश्चात्ताप

पाण्डवों के वन चले जाने के बाद संजय धृतराष्ट्र को चिन्ता में डूबा पाते हैं और उनसे कहते हैं कि कुरुओं के सामने खड़ा यह महान् वैर उन्हीं की करनी है: सबके रोकने पर भी दुर्योधन ने द्रौपदी को सभा में घसीटवाया, क्योंकि देवता जिसका नाश चाहते हैं उसकी बुद्धि पहले हर लेते हैं। धृतराष्ट्र स्त्रियों के विलाप, छूटे हुए अग्निहोत्र और भयंकर उत्पातों को, द्रौपदी को दिए वर को, और विदुर की उस चेतावनी को याद करते हैं कि कृष्ण और पांचालों के साथ पाण्डव उसका बदला लेंगे और सन्धि ही एकमात्र मार्ग है। वे स्वीकार करते हैं कि पुत्र-मोह के कारण उन्होंने वह सलाह नहीं मानी। इसी के साथ सभापर्व समाप्त होता है।

अध्याय 102अध्याय-सूची

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.103.1)

वनं गतेषु पार्थेषु निर्जितेषु दुरोदरे । धृतराष्ट्रं महाराज तदा चिन्ता समाविशत् ॥

vanaṃ gateṣu pārtheṣu nirjiteṣu durodare | dhṛtarāṣṭraṃ mahārāja tadā cintā samāviśat

हे महाराज, जब जुए में हारे हुए पृथापुत्र वन को चले गए, तब धृतराष्ट्र को चिन्ता ने घेर लिया।

श्लोक 2 (2.103.2)

तं चिन्तयानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच सञ्जयः ॥

taṃ cintayānamāsīnaṃ dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram | niḥśvasantamanekāgramiti hovāca sañjayaḥ

चिन्ता में डूबे, आहें भरते और अस्थिर चित्त से बैठे जनेश्वर धृतराष्ट्र से संजय ने इस प्रकार कहा —

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (2.103.3)

अवाप्य वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिप । प्रव्राज्य पाण्डवान्राज्याद्राजन्किमनुशोचसि ॥

avāpya vasusampūrṇāṃ vasudhāṃ vasudhādhipa | pravrājya pāṇḍavānrājyādrājankimanuśocasi

"हे पृथ्वीपति, धन-सम्पदा से भरी पृथ्वी पाकर और पाण्डवों को राज्य से निकालकर, हे राजन्, अब आप शोक क्यों करते हैं?"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 4 (2.103.4)

अशोच्यत्वं कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति । पाण्डवैर्युद्धशौण्डैर्हि बलवद्भिर्महारथैः ॥

aśocyatvaṃ kutasteṣāṃ yeṣāṃ vairaṃ bhaviṣyati | pāṇḍavairyuddhaśauṇḍairhi balavadbhirmahārathaiḥ

"जिनका युद्ध में प्रवीण, बलवान महारथी पाण्डवों से वैर होने वाला है, उन्हें शोक से छुटकारा कहाँ?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (2.103.5)

तवेदं सुकृतं राजन्महद्वैरमुपस्थितम् । विनाशो येन लोकस्य सानुबन्धो भविष्यति ॥

tavedaṃ sukṛtaṃ rājanmahadvairamupasthitam | vināśo yena lokasya sānubandho bhaviṣyati

"हे राजन्, यह आपकी ही करनी है: एक बड़ा वैर खड़ा हो गया है, जिससे सब सम्बन्धियों सहित संसार का विनाश होगा।

श्लोक 6 (2.103.6)

वार्यमाणो हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । पाण्डवानां प्रियां भार्यां द्रौपदीं धर्मचारिणीम् ॥

vāryamāṇo hi bhīṣmeṇa droṇena vidureṇa ca | pāṇḍavānāṃ priyāṃ bhāryāṃ draupadīṃ dharmacāriṇīm

भीष्म, द्रोण और विदुर के रोकने पर भी पाण्डवों की प्रिय पत्नी, धर्मचारिणी द्रौपदी को

श्लोक 7 (2.103.7)

प्राहिणोदानयेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव । सूतपुत्रं सुमन्दात्मा निर्लज्जः प्रातिकामिनम् ॥

prāhiṇodānayeheti putro duryodhanastava | sūtaputraṃ sumandātmā nirlajjaḥ prātikāminam

लाने के लिए आपके निर्लज्ज और मन्दबुद्धि पुत्र दुर्योधन ने "उसे यहाँ ले आओ" कहकर सूतपुत्र प्रातिकामी को भेजा।

श्लोक 8 (2.103.8)

यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ॥

yasmai devāḥ prayacchanti puruṣāya parābhavam | buddhiṃ tasyāpakarṣanti so'vācīnāni paśyati

देवता जिस पुरुष को पराजय देना चाहते हैं, पहले उसकी बुद्धि हर लेते हैं; तब वह सब कुछ उलटा देखने लगता है।

श्लोक 9 (2.103.9)

बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे समुपस्थिते । अनयो नयसङ्काशो हृदयान्नापसर्पति ॥

buddhau kaluṣabhūtāyāṃ vināśe samupasthite | anayo nayasaṅkāśo hṛdayānnāpasarpati

जब बुद्धि मलिन हो जाती है और विनाश सामने आ खड़ा होता है, तब नीति जैसी दिखने वाली अनीति हृदय से नहीं हटती।

श्लोक 10 (2.103.10)

अनर्थाश्चार्थरूपेण अर्थाश्चानर्थरूपिणः । उत्तिष्ठन्ति विनाशाय नूनं तच्चास्य रोचते ॥

anarthāścārtharūpeṇa arthāścānartharūpiṇaḥ | uttiṣṭhanti vināśāya nūnaṃ taccāsya rocate

उसके विनाश के लिए अनर्थ अर्थ के रूप में और अर्थ अनर्थ के रूप में सामने आते हैं; और निश्चय ही उसे वही अच्छा लगता है।

श्लोक 11 (2.103.11)

न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् । कालस्य बलमेतावद्विपरीतार्थदर्शनम् ॥

na kālo daṇḍamudyamya śiraḥ kṛntati kasyacit | kālasya balametāvadviparītārthadarśanam

काल डण्डा उठाकर किसी का सिर नहीं काटता। काल का बल बस इतना ही है कि वह मनुष्य को सब कुछ उलटे अर्थ में दिखाता है।

श्लोक 12 (2.103.12)

आसादितमिदं घोरं तुमुलं रोमहर्षणम् । पाञ्चालीमपकर्षद्भिः सभामध्ये तपस्विनीम् ॥

āsāditamidaṃ ghoraṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | pāñcālīmapakarṣadbhiḥ sabhāmadhye tapasvinīm

जिन्होंने तपस्विनी पांचाली को सभा के बीच घसीटा, उन्होंने ही यह भयंकर, कोलाहलपूर्ण और रोंगटे खड़े कर देने वाला संकट बुला लिया है।

श्लोक 13 (2.103.13)

अयोनिजां रूपवतीं कुले जातां विभावसोः । को नु तां सर्वधर्मज्ञां परिभूय यशस्विनीम् ॥

ayonijāṃ rūpavatīṃ kule jātāṃ vibhāvasoḥ | ko nu tāṃ sarvadharmajñāṃ paribhūya yaśasvinīm

वह योनि से उत्पन्न नहीं हुई; वह रूपवती है, अग्नि के कुल में जन्मी है और सब धर्मों को जानती है। उस यशस्विनी का अपमान करके

श्लोक 14 (2.103.14)

पर्यानयेत्सभामध्ये विना दुर्द्यूतदेविनम् । स्त्रीधर्मिणी वरारोहा शोणितेन परिप्लुता ॥

paryānayetsabhāmadhye vinā durdyūtadevinam | strīdharmiṇī varārohā śoṇitena pariplutā

उस दुष्ट जुआरी के सिवा कौन उसे सभा के बीच घसीट लाता? वह सुन्दरी रजस्वला थी और रक्त से भीगी हुई थी;

श्लोक 15 (2.103.15)

एकवस्त्राथ पाञ्चाली पाण्डवानभ्यवैक्षत । हृतस्वान्हृतराज्यांश्च हृतवस्त्रान्हृतश्रियः ॥

ekavastrātha pāñcālī pāṇḍavānabhyavaikṣata | hṛtasvānhṛtarājyāṃśca hṛtavastrānhṛtaśriyaḥ

एक ही वस्त्र पहने पांचाली ने पाण्डवों की ओर देखा, जिनका धन, राज्य, वस्त्र और श्री — सब कुछ हर लिया गया था,

श्लोक 16 (2.103.16)

विहीनान्सर्वकामेभ्यो दासभावमुपागतान् । धर्मपाशपरिक्षिप्तानशक्तानिव विक्रमे ॥

vihīnānsarvakāmebhyo dāsabhāvamupāgatān | dharmapāśaparikṣiptānaśaktāniva vikrame

जो सब कामनाओं से वंचित, दासभाव को प्राप्त, धर्म के पाश में बँधे और पराक्रम में मानो असमर्थ थे।

श्लोक 17 (2.103.17)

क्रुद्धां चानर्हतीं कृष्णां दुःखितां कुरुसंसदि । दुर्योधनश्च कर्णश्च कटुकान्यभ्यभाषताम् ॥

kruddhāṃ cānarhatīṃ kṛṣṇāṃ duḥkhitāṃ kurusaṃsadi | duryodhanaśca karṇaśca kaṭukānyabhyabhāṣatām

क्रुद्ध, ऐसे व्यवहार के अयोग्य और कुरुसभा में दुःखी कृष्णा से दुर्योधन और कर्ण ने कटु वचन कहे।

श्लोक 18 (2.103.18)

इति सर्वमिदं राजन्नाकुलं प्रतिभाति मे ॥

iti sarvamidaṃ rājannākulaṃ pratibhāti me

हे राजन्, इस प्रकार यह सब मुझे अस्त-व्यस्त-सा प्रतीत होता है।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 19 (2.103.19)

तस्याः कृपणचक्षुर्भ्यां प्रदह्येतापि मेदिनी ॥

tasyāḥ kṛpaṇacakṣurbhyāṃ pradahyetāpi medinī

"उसकी करुण आँखों से तो पृथ्वी भी जल उठे।

श्लोक 20 (2.103.20)

अपि शेषं भवेदद्य पुत्राणां मम सञ्जय । भरतानां स्त्रियः सर्वा गान्धार्या सह सङ्गताः ॥

api śeṣaṃ bhavedadya putrāṇāṃ mama sañjaya | bharatānāṃ striyaḥ sarvā gāndhāryā saha saṅgatāḥ

हे संजय, क्या अब मेरे पुत्रों में से कुछ भी शेष रहेगा? भरतकुल की सब स्त्रियाँ गान्धारी के साथ इकट्ठी होकर

श्लोक 21 (2.103.21)

प्राक्रोशन्भैरवं तत्र दृष्ट्वा कृष्णां सभागताम् । धर्मिष्ठां धर्मपत्नीं च रूपयौवनशालिनीम् ॥

prākrośanbhairavaṃ tatra dṛṣṭvā kṛṣṇāṃ sabhāgatām | dharmiṣṭhāṃ dharmapatnīṃ ca rūpayauvanaśālinīm

कृष्णा को सभा में लाई गई देखकर वहाँ भयानक रूप से चीख उठीं। उस धर्मिष्ठा, धर्मपत्नी, रूप और यौवन से सम्पन्न (द्रौपदी) के लिए

श्लोक 22 (2.103.22)

प्रजाभिः सह सङ्गम्य ह्यनुशोचन्ति नित्यशः । अग्निहोत्राणि सायाह्ने न चाहूयन्त सर्वशः ॥

prajābhiḥ saha saṅgamya hyanuśocanti nityaśaḥ | agnihotrāṇi sāyāhne na cāhūyanta sarvaśaḥ

वे प्रजा के साथ मिलकर निरन्तर शोक करती हैं। सन्ध्या के समय कहीं भी अग्निहोत्र नहीं हुए;

श्लोक 23 (2.103.23)

ब्राह्मणाः कुपिताश्चासन्द्रौपद्याः परिकर्षणे । आसीन्निष्ठानको घोरो निर्घातश्च महानभूत् ॥

brāhmaṇāḥ kupitāścāsandraupadyāḥ parikarṣaṇe | āsīnniṣṭhānako ghoro nirghātaśca mahānabhūt

द्रौपदी को घसीटे जाने पर ब्राह्मण कुपित थे। भयंकर प्रचण्ड आँधी उठी और बड़े ज़ोर का वज्र-सा शब्द हुआ।

श्लोक 24 (2.103.24)

दिव उल्काश्चापतन्त राहुश्चार्कमुपाग्रसत् । अपर्वणि महाघोरं प्रजानां जनयन्भयम् ॥

diva ulkāścāpatanta rāhuścārkamupāgrasat | aparvaṇi mahāghoraṃ prajānāṃ janayanbhayam

आकाश से उल्काएँ गिरीं और बिना पर्व के ही राहु ने सूर्य को ग्रस लिया; यह अत्यन्त भयंकर घटना प्रजा में भय उत्पन्न कर रही थी।

श्लोक 25 (2.103.25)

तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्धुताशनः । ध्वजाश्चापि व्यशीर्यन्त भरतानामभूतये ॥

tathaiva rathaśālāsu prādurāsīddhutāśanaḥ | dhvajāścāpi vyaśīryanta bharatānāmabhūtaye

इसी प्रकार रथशालाओं में आग भड़क उठी, और भरतवंशियों के अमंगल की सूचना देते हुए ध्वज फटकर गिर पड़े।

श्लोक 26 (2.103.26)

दुर्योधनस्याग्निहोत्रे प्राक्रोशन्भैरवं शिवाः । तास्तदा प्रत्यभाषन्त रासभाः सर्वतो दिशः ॥

duryodhanasyāgnihotre prākrośanbhairavaṃ śivāḥ | tāstadā pratyabhāṣanta rāsabhāḥ sarvato diśaḥ

दुर्योधन के अग्निहोत्र-स्थल पर सियारिनें भयानक रूप से चिल्लाईं, और चारों दिशाओं से गधे उनके उत्तर में रेंकने लगे।

श्लोक 27 (2.103.27)

प्रातिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह सञ्जय । कृपश्च सोमदत्तश्च बाह्लीकश्च महामनाः ॥

prātiṣṭhata tato bhīṣmo droṇena saha sañjaya | kṛpaśca somadattaśca bāhlīkaśca mahāmanāḥ

हे संजय, तब भीष्म द्रोण के साथ उठकर चल दिए, और कृप, सोमदत्त तथा महामना बाह्लीक भी।

श्लोक 28 (2.103.28)

ततोऽहमब्रुवं तत्र विदुरेण प्रचोदितः । वरं ददानि कृष्णायै काङ्क्षितं यद्यदिच्छति ॥

tato'hamabruvaṃ tatra vidureṇa pracoditaḥ | varaṃ dadāni kṛṣṇāyai kāṅkṣitaṃ yadyadicchati

तब विदुर की प्रेरणा से मैंने वहाँ कहा: "मैं कृष्णा को वर देता हूँ; वह जो-जो चाहे, माँग ले।"

श्लोक 29 (2.103.29)

अवृणोत्तत्र पाञ्चाली पाण्डवानामदासताम् । सरथान्सधनुष्कांश्चाप्यनुज्ञासिषमप्यहम् ॥

avṛṇottatra pāñcālī pāṇḍavānāmadāsatām | sarathānsadhanuṣkāṃścāpyanujñāsiṣamapyaham

पांचाली ने वहाँ पाण्डवों की दासता से मुक्ति माँगी, और मैंने उन्हें रथों और धनुषों सहित जाने की अनुमति दे दी।

श्लोक 30 (2.103.30)

अथाब्रवीन्महाप्राज्ञो विदुरः सर्वधर्मवित् । एतदन्तास्तु भरता यद्वः कृष्णा सभां गता ॥

athābravīnmahāprājño viduraḥ sarvadharmavit | etadantāstu bharatā yadvaḥ kṛṣṇā sabhāṃ gatā

तब सब धर्मों के ज्ञाता महाप्राज्ञ विदुर ने कहा: "हे भरतवंशियो, कृष्णा का सभा में लाया जाना ही तुम्हारा अन्त है।

विदुर उवाच

श्लोक 31 (2.103.31)

यैषा पाञ्चालराजस्य सुता सा श्रीरनुत्तमा । पाञ्चाली पाण्डवानेतान्दैवसृष्टोपसर्पति ॥

yaiṣā pāñcālarājasya sutā sā śrīranuttamā | pāñcālī pāṇḍavānetāndaivasṛṣṭopasarpati

यह जो पांचालराज की पुत्री है, वह स्वयं अनुपम श्री है। देवताओं द्वारा रची गई यह पांचाली इन पाण्डवों के पास आई है।

श्लोक 32 (2.103.32)

तस्याः पार्थाः परिक्लेशं न क्षंस्यन्ते ह्यमर्षणाः । वृष्णयो वा महेष्वासाः पाञ्चाला वा महारथाः ॥

tasyāḥ pārthāḥ parikleśaṃ na kṣaṃsyante hyamarṣaṇāḥ | vṛṣṇayo vā maheṣvāsāḥ pāñcālā vā mahārathāḥ

असहिष्णु पृथापुत्र उसके इस क्लेश को क्षमा नहीं करेंगे; न महाधनुर्धर वृष्णि क्षमा करेंगे, न महारथी पांचाल।

श्लोक 33 (2.103.33)

तेन सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः । आगमिष्यति बीभत्सुः पञ्चालैः परिवारितः ॥

tena satyābhisandhena vāsudevena rakṣitāḥ | āgamiṣyati bībhatsuḥ pañcālaiḥ parivāritaḥ

सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव से रक्षित होकर, पांचालों से घिरे हुए बीभत्सु (अर्जुन) आएँगे।

श्लोक 34 (2.103.34)

तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महाबलः । आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवान्तकः ॥

teṣāṃ madhye maheṣvāso bhīmaseno mahābalaḥ | āgamiṣyati dhunvāno gadāṃ daṇḍamivāntakaḥ

उनके बीच महाधनुर्धर, महाबली भीमसेन गदा घुमाते हुए आएँगे, जैसे यमराज अपना दण्ड घुमाते हैं।

श्लोक 35 (2.103.35)

ततो गाण्डीवनिर्घोषं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः । गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥

tato gāṇḍīvanirghoṣaṃ śrutvā pārthasya dhīmataḥ | gadāvegaṃ ca bhīmasya nālaṃ soḍhuṃ narādhipāḥ

तब बुद्धिमान पार्थ के गाण्डीव का घोष सुनकर और भीम की गदा का वेग देखकर राजा लोग उसे सह नहीं सकेंगे।

श्लोक 36 (2.103.36)

तत्र मे रोचते नित्यं पार्थैः साम न विग्रहः । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान्बलवत्तरान् ॥

tatra me rocate nityaṃ pārthaiḥ sāma na vigrahaḥ | kurubhyo hi sadā manye pāṇḍavānbalavattarān

इसलिए मुझे पार्थों के साथ सदा सन्धि ही प्रिय है, युद्ध नहीं; क्योंकि मैं पाण्डवों को कुरुओं से सदा अधिक बलवान मानता हूँ।

श्लोक 37 (2.103.37)

तथा हि बलवान्राजा जरासन्धो महाद्युतिः । बाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि ॥

tathā hi balavānrājā jarāsandho mahādyutiḥ | bāhupraharaṇenaiva bhīmena nihato yudhi

देखिए, महातेजस्वी और बलवान राजा जरासन्ध को भीम ने युद्ध में केवल भुजाओं के प्रहार से मार डाला था।

श्लोक 38 (2.103.38)

तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ । उभयोः पक्षयोर्युक्तं क्रियतामविशङ्कया ॥

tasya te śama evāstu pāṇḍavairbharatarṣabha | ubhayoḥ pakṣayoryuktaṃ kriyatāmaviśaṅkayā

इसलिए, हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों के साथ आपकी सन्धि ही हो। दोनों पक्षों के लिए जो उचित हो, वह निःसंकोच कीजिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 39 (2.103.39)

एवं कृते महाराज परं श्रेयस्त्वमाप्स्यसि । एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः ॥

evaṃ kṛte mahārāja paraṃ śreyastvamāpsyasi | evaṃ gāvalgaṇe kṣattā dharmārthasahitaṃ vacaḥ

ऐसा करने पर, हे महाराज, आप परम कल्याण प्राप्त करेंगे।" हे गावल्गणपुत्र (संजय), इस प्रकार क्षत्ता विदुर ने धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहे,

श्लोक 40 (2.103.40)

उक्तवान्न गृहीतं वै मया पुत्रहितैषिणा ॥

uktavānna gṛhītaṃ vai mayā putrahitaiṣiṇā

किन्तु अपने पुत्र का हित चाहने वाले मैंने उन्हें स्वीकार नहीं किया।"

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