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सभा पर्व · अध्याय 102

विदुर द्वारा पाण्डवों के वनगमन का वर्णन

धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि पाण्डव और द्रौपदी किस प्रकार वन को गए, और विदुर एक-एक की चेष्टा का वर्णन करके उसका अभिप्राय बताते हैं: युधिष्ठिर मुख ढके हैं कि उनकी क्रुद्ध दृष्टि से लोग भस्म न हो जाएँ, भीम अपनी भुजाएँ दिखा रहे हैं, अर्जुन बालू बिखेर रहे हैं जैसे आगे बाण बिखेरेंगे, नकुल-सहदेव अपना मुख और रूप छिपाए हैं, द्रौपदी कौरव-स्त्रियों के वैधव्य की भविष्यवाणी करती है, और धौम्य मृतकों के साम गाते हैं। फिर विदुर पुरवासियों का विलाप और वनगमन के समय हुए उत्पात बताते हैं। नारद सभा में प्रकट होकर चौदहवें वर्ष में कौरवों के विनाश की भविष्यवाणी करते हैं; द्रोण दुर्योधन का साथ देने का वचन देते हैं, पर चेताते हैं कि धृष्टद्युम्न उनके वध के लिए जन्मा है और सन्धि की सलाह देते हैं, और धृतराष्ट्र विदुर से पाण्डवों को लौटा लाने को कहते हैं।

अध्याय 101अध्याय-सूचीअध्याय 103

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.102.1)

तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् । साशङ्क इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥

tamāgatamatho rājā viduraṃ dīrghadarśinam | sāśaṅka iva papraccha dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ

तब अम्बिकापुत्र राजा धृतराष्ट्र ने, मानो किसी आशंका से घिरे हुए, अपने पास आए दूरदर्शी विदुर से पूछा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 2 (2.102.2)

कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनः सव्यसाची माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

kathaṃ gacchati kaunteyo dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | bhīmasenaḥ savyasācī mādrīputrau ca pāṇḍavau

"कुन्तीपुत्र धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? और भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन तथा माद्री के दोनों पुत्र पाण्डव किस प्रकार जा रहे हैं?

श्लोक 3 (2.102.3)

धौम्यश्चैव कथं क्षत्तर्द्रौपदी च यशस्विनी । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं तेषां शंस विचेष्टितम् ॥

dhaumyaścaiva kathaṃ kṣattardraupadī ca yaśasvinī | śrotumicchāmyahaṃ sarvaṃ teṣāṃ śaṃsa viceṣṭitam

हे क्षत्ता, धौम्य और यशस्विनी द्रौपदी किस प्रकार जा रहे हैं? मैं सब कुछ सुनना चाहता हूँ; उनकी एक-एक चेष्टा मुझे बताओ।"

विदुर उवाच

श्लोक 4 (2.102.4)

वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । बाहू विशालौ सम्पश्यन्भीमो गच्छति पाण्डवः ॥

vastreṇa saṃvṛtya mukhaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bāhū viśālau sampaśyanbhīmo gacchati pāṇḍavaḥ

"कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर वस्त्र से मुख ढककर जा रहे हैं। पाण्डुपुत्र भीम अपनी विशाल भुजाओं को देखते हुए चल रहे हैं।

श्लोक 5 (2.102.5)

सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति । माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति ॥

sikatā vapansavyasācī rājānamanugacchati | mādrīputraḥ sahadevo mukhamālipya gacchati

सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा के पीछे-पीछे चल रहे हैं। माद्रीपुत्र सहदेव मुख पर लेप पोतकर जा रहे हैं।

श्लोक 6 (2.102.6)

पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलश्चित्तविह्वलः । दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति ॥

pāṃsūpaliptasarvāṅgo nakulaścittavihvalaḥ | darśanīyatamo loke rājānamanugacchati

संसार में सबसे सुन्दर नकुल सारे शरीर पर धूल लपेटे, व्याकुल चित्त से राजा के पीछे चल रहे हैं।

श्लोक 7 (2.102.7)

कृष्णा तु केशैः प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना । दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति ॥

kṛṣṇā tu keśaiḥ pracchādya mukhamāyatalocanā | darśanīyā prarudatī rājānamanugacchati

विशाल नेत्रों वाली सुन्दरी कृष्णा केशों से मुख ढककर रोती हुई राजा के पीछे चल रही है।

श्लोक 8 (2.102.8)

धौम्यो रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते । गायन्गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना ॥

dhaumyo raudrāṇi sāmāni yāmyāni ca viśāmpate | gāyangacchati mārgeṣu kuśānādāya pāṇinā

हे प्रजानाथ, धौम्य हाथ में कुशा लिए मार्ग पर यम-सम्बन्धी रौद्र साम गाते हुए चल रहे हैं।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 9 (2.102.9)

विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः । तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते ॥

vividhānīha rūpāṇi kṛtvā gacchanti pāṇḍavāḥ | tanmamācakṣva vidura kasmādevaṃ vrajanti te

"पाण्डव ये भाँति-भाँति के रूप धारण करके जा रहे हैं। विदुर, मुझे बताओ कि वे इस प्रकार क्यों जा रहे हैं।"

विदुर उवाच

श्लोक 10 (2.102.10)

निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च । न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः ॥

nikṛtasyāpi te putrairhṛte rājye dhaneṣu ca | na dharmāccalate buddhirdharmarājasya dhīmataḥ

"यद्यपि तुम्हारे पुत्रों ने छल करके उनका राज्य और धन हर लिया है, फिर भी बुद्धिमान धर्मराज की बुद्धि धर्म से विचलित नहीं होती।

श्लोक 11 (2.102.11)

योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत । निकृत्या भ्रंशितः क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने ॥

yo'sau rājā ghṛṇī nityaṃ dhārtarāṣṭreṣu bhārata | nikṛtyā bhraṃśitaḥ krodhānnonmīlayati locane

हे भारत, वे राजा जो धृतराष्ट्र के पुत्रों पर सदा दयालु रहे, छल से गिराए जाने के बाद क्रोध के कारण अपनी आँखें नहीं खोलते।

श्लोक 12 (2.102.12)

नाहं जनं निर्दहेयं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा । स पिधाय मुखं राजा तस्माद्गच्छति पाण्डवः ॥

nāhaṃ janaṃ nirdaheyaṃ dṛṣṭvā ghoreṇa cakṣuṣā | sa pidhāya mukhaṃ rājā tasmādgacchati pāṇḍavaḥ

"मैं अपनी भयंकर दृष्टि से देखकर लोगों को भस्म न कर दूँ" — इसी कारण पाण्डुपुत्र राजा मुख ढककर जा रहे हैं।

श्लोक 13 (2.102.13)

यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदतः शृणु । बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ ॥

yathā ca bhīmo vrajati tanme nigadataḥ śṛṇu | bāhvorbale nāsti samo mameti bharatarṣabha

अब मुझसे सुनो कि भीम किस प्रकार जा रहे हैं। हे भरतश्रेष्ठ, "भुजबल में मेरे समान कोई नहीं है" — ऐसा मानकर

श्लोक 14 (2.102.14)

बाहू विशालौ कृत्वाऽसौ तेन भीमोऽपि गच्छति । बाहू विदर्शयन्राजन्बाहुद्रविणदर्पितः ॥

bāhū viśālau kṛtvā'sau tena bhīmo'pi gacchati | bāhū vidarśayanrājanbāhudraviṇadarpitaḥ

भीम अपनी विशाल भुजाएँ फैलाकर चल रहे हैं; हे राजन्, अपने भुजबल रूपी धन पर गर्व करते हुए वे अपनी भुजाएँ दिखा रहे हैं,

श्लोक 15 (2.102.15)

चिकीर्षन्कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपतः । प्रदिशञ्शरसम्पातान्कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा ॥

cikīrṣankarma śatrubhyo bāhudravyānurūpataḥ | pradiśañśarasampātānkuntīputro'rjunastadā

क्योंकि वे शत्रुओं के साथ अपनी भुजाओं की शक्ति के अनुरूप कर्म करना चाहते हैं। कुन्तीपुत्र अर्जुन अपने बाणों की वर्षा का संकेत देते हुए

श्लोक 16 (2.102.16)

सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति । असक्ताः सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत । असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु ॥

sikatā vapansavyasācī rājānamanugacchati | asaktāḥ sikatāstasya yathā samprati bhārata | asaktaṃ śaravarṣāṇi tathā mokṣyati śatruṣu

सव्यसाची होकर बालू बिखेरते हुए राजा के पीछे चल रहे हैं। हे भारत, जैसे अभी उनके बिखेरे बालू के कण एक-दूसरे से अलग गिर रहे हैं, वैसे ही वे शत्रुओं पर बिना रुके बाणों की वर्षा करेंगे।

श्लोक 17 (2.102.17)

न मे कश्चिद्विजानीयान्मुखमद्येति भारत । मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ॥

na me kaścidvijānīyānmukhamadyeti bhārata | mukhamālipya tenāsau sahadevo'pi gacchati

"आज कोई मेरा मुख न पहचाने" — हे भारत, इसी कारण सहदेव भी मुख पर लेप पोतकर जा रहे हैं।

श्लोक 18 (2.102.18)

नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो । पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ॥

nāhaṃ manāṃsyādadeyaṃ mārge strīṇāmiti prabho | pāṃsūpaliptasarvāṅgo nakulastena gacchati

"मार्ग में मैं स्त्रियों के मन न हर लूँ" — हे प्रभो, इसी कारण नकुल सारे शरीर पर धूल लपेटकर जा रहे हैं।

श्लोक 19 (2.102.19)

एकवस्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला । शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत् ॥

ekavastrā prarudatī muktakeśī rajasvalā | śoṇitenāktavasanā draupadī vākyamabravīt

एक ही वस्त्र पहने, रोती हुई, खुले केशों वाली, रजस्वला और रक्त से सने वस्त्र वाली द्रौपदी ने यह वचन कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 20 (2.102.20)

यत्कृतेऽहमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे । हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रियाः ॥

yatkṛte'hamidaṃ prāptā teṣāṃ varṣe caturdaśe | hatapatyo hatasutā hatabandhujanapriyāḥ

"जिनके कारण मेरी यह दशा हुई है, आज से चौदहवें वर्ष में उनकी पत्नियाँ — जिनके पति मारे गए, पुत्र मारे गए, बन्धु-बान्धव और प्रियजन मारे गए —

श्लोक 21 (2.102.21)

बन्धुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेश्यो रजस्वलाः । एवं कृतोदका भार्याः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वयम् ॥

bandhuśoṇitadigdhāṅgyo muktakeśyo rajasvalāḥ | evaṃ kṛtodakā bhāryāḥ pravekṣyanti gajāhvayam

अपने बन्धुओं के रक्त से सने अंगों वाली, खुले केशों वाली, रजस्वला होकर, मृतकों को जलांजलि देकर इसी प्रकार हस्तिनापुर में प्रवेश करेंगी।"

विदुर उवाच

श्लोक 22 (2.102.22)

कृत्वा तु नैर्ऋतान्दर्भान्धीरो धौम्यः पुरोहितः । सामानि गायन्याम्यानि पुरतो याति भारत ॥

kṛtvā tu nairṛtāndarbhāndhīro dhaumyaḥ purohitaḥ | sāmāni gāyanyāmyāni purato yāti bhārata

हे भारत, धीर पुरोहित धौम्य कुशाओं को निर्ऋति की दिशा (नैर्ऋत्य) की ओर करके यम-सम्बन्धी साम गाते हुए आगे-आगे चल रहे हैं।

श्लोक 23 (2.102.23)

हतेषु भरतेष्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति ॥

hateṣu bharateṣvājau kurūṇāṃ guravastadā | evaṃ sāmāni gāsyantītyuktvā dhaumyo'pi gacchati

"जब युद्ध में भरतवंशी मारे जाएँगे, तब कुरुओं के गुरु इसी प्रकार साम गाएँगे" — यह कहकर धौम्य भी जा रहे हैं।

श्लोक 24 (2.102.24)

प्रस्थाप्य पाण्डवाञ्शेषान्निःशेषस्ते भविष्यति । इति धौम्यो व्यवसितो रौद्रसामानि गायति ॥

prasthāpya pāṇḍavāñśeṣānniḥśeṣaste bhaviṣyati | iti dhaumyo vyavasito raudrasāmāni gāyati

"पाण्डवों को, जो तुम्हारे शेष सहारे थे, निकाल देने के बाद तुम्हारा कुछ भी शेष नहीं बचेगा" — ऐसा निश्चय करके धौम्य रौद्र साम गा रहे हैं।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 25 (2.102.25)

किमब्रुवन्नैकृतिकः किं वा नागरिका जनाः । तथ्येन मे समाचक्ष्व क्षत्तः सर्वमशेषतः ॥

kimabruvannaikṛtikaḥ kiṃ vā nāgarikā janāḥ | tathyena me samācakṣva kṣattaḥ sarvamaśeṣataḥ

"कुटिल लोगों ने क्या कहा, और नगर के लोगों ने क्या कहा? हे क्षत्ता, मुझे सब कुछ ठीक-ठीक, बिना कुछ छोड़े बताओ।"

विदुर उवाच

श्लोक 26 (2.102.26)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा येऽन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ॥

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā ye'nye vadantyatha | tacchṛṇuṣva mahārāja vakṣyate ca mayā tava

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और दूसरे लोग भी जो कुछ कह रहे हैं, हे महाराज, उसे सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ।

प्रकृतय ऊचुः

श्लोक 27 (2.102.27)

हाहा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक्कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम् ॥

hāhā gacchanti no nāthāḥ samavekṣadhvamīdṛśam | aho dhikkuruvṛddhānāṃ bālānāmiva ceṣṭitam

"हाय, हाय! हमारे स्वामी जा रहे हैं! देखो तो, यह क्या हो रहा है! धिक्कार है कुरुवंश के उन वृद्धों को, जिनका आचरण बालकों जैसा है!

श्लोक 28 (2.102.28)

राष्ट्रेभ्यः पाण्डुदायादाँल्लोभान्निर्वासयन्ति ये । अनाथाः स्म वयं सर्वे वियुक्ताः पाण्डुनन्दनैः ॥

rāṣṭrebhyaḥ pāṇḍudāyādām̐llobhānnirvāsayanti ye | anāthāḥ sma vayaṃ sarve viyuktāḥ pāṇḍunandanaiḥ

वे लोभवश पाण्डु के उत्तराधिकारियों को राज्य से निकाल रहे हैं। पाण्डुपुत्रों से बिछुड़कर अब हम सब अनाथ हो गए हैं।

श्लोक 29 (2.102.29)

दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीतिः कौरवेषु नः । इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म पुनः पुनः ॥

durvinīteṣu lubdheṣu kā prītiḥ kauraveṣu naḥ | iti paurāḥ suduḥkhārtāḥ krośanti sma punaḥ punaḥ

इन उद्दण्ड और लोभी कौरवों से हमें क्या प्रेम हो सकता है?" इस प्रकार अत्यन्त दुःख से पीड़ित पुरवासी बार-बार विलाप कर रहे थे।

विदुर उवाच

श्लोक 30 (2.102.30)

एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम् । कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विनः ॥

evamākāraliṅgaiste vyavasāyaṃ manogatam | kathayantaśca kaunteyā vanaṃ jagmurmanasvinaḥ

"इस प्रकार अपने बाहरी रूप और चेष्टाओं से मन में ठाने हुए निश्चय को प्रकट करते हुए मनस्वी कुन्तीपुत्र वन को चले गए।

श्लोक 31 (2.102.31)

एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् । अनभ्रे विद्युतश्चासन्भूमिश्च समकम्पत ॥

evaṃ teṣu narāgryeṣu niryatsu gajasāhvayāt | anabhre vidyutaścāsanbhūmiśca samakampata

जब वे नरश्रेष्ठ हस्तिनापुर से निकल रहे थे, तब बिना बादलों के बिजलियाँ चमकीं और पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 32 (2.102.32)

राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ॥

rāhuragrasadādityamaparvaṇi viśāmpate | ulkā cāpyapasavyena puraṃ kṛtvā vyaśīryata

हे प्रजानाथ, बिना पर्व के ही राहु ने सूर्य को ग्रस लिया, और एक उल्का नगर को अशुभ ओर रखकर टूटकर बिखर गई।

श्लोक 33 (2.102.33)

प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसाः । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च ॥

pratyāharanti kravyādā gṛdhragomāyuvāyasāḥ | devāyatanacaityeṣu prākārāṭṭālakeṣu ca

मांसाहारी जीव — गिद्ध, सियार और कौए — देवालयों, चैत्यों, परकोटों और अटारियों पर मांस ला-लाकर रख रहे हैं।

श्लोक 34 (2.102.34)

एवमेते महोत्पाताः प्रादुरासन्दुरासदाः । भरतानामभावाय राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

evamete mahotpātāḥ prādurāsandurāsadāḥ | bharatānāmabhāvāya rājandurmantrite tava

हे राजन्, तुम्हारी कुमन्त्रणा के कारण भरतवंशियों के विनाश की सूचना देने वाले ऐसे ही भयंकर महान् उत्पात प्रकट हुए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (2.102.35)

एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्च विदुरस्य च धीमतः ॥

evaṃ pravadatoreva tayostatra viśāmpate | dhṛtarāṣṭrasya rājñaśca vidurasya ca dhīmataḥ

हे प्रजानाथ, जब राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर दोनों वहाँ इस प्रकार बातें कर ही रहे थे,

श्लोक 36 (2.102.36)

नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रतः स्थितः । महर्षिभिः परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह ॥

nāradaśca sabhāmadhye kurūṇāmagrataḥ sthitaḥ | maharṣibhiḥ parivṛto raudraṃ vākyamuvāca ha

तभी महर्षियों से घिरे नारद सभा के बीच कुरुओं के सामने आ खड़े हुए और यह भयंकर वचन बोले —

नारद उवाच

श्लोक 37 (2.102.37)

इतश्चतुर्दशे वर्षे विनङ्क्ष्यन्तीह कौरवाः । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥

itaścaturdaśe varṣe vinaṅkṣyantīha kauravāḥ | duryodhanāparādhena bhīmārjunabalena ca

"आज से चौदहवें वर्ष में दुर्योधन के अपराध के कारण और भीम तथा अर्जुन के बल से यहाँ कौरव नष्ट हो जाएँगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (2.102.38)

इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिभ्रद्देवर्षिसत्तमः ॥

ityuktvā divamākramya kṣipramantaradhīyata | brāhmīṃ śriyaṃ suvipulāṃ bibhraddevarṣisattamaḥ

यह कहकर ब्राह्मी तेज की विपुल शोभा धारण किए देवर्षिश्रेष्ठ आकाश में ऊपर उठकर शीघ्र ही अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 39 (2.102.39)

ततो दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्यवेदयन् ॥

tato duryodhanaḥ karṇaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | droṇaṃ dvīpamamanyanta rājyaṃ cāsmai nyavedayan

तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि ने द्रोण को अपना द्वीप (आश्रय) माना और राज्य उन्हें सौंप दिया।

श्लोक 40 (2.102.40)

अथाब्रवीत्ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम् । दुःशासनं च कर्णं च सर्वानेव च भारतान् ॥

athābravīttato droṇo duryodhanamamarṣaṇam | duḥśāsanaṃ ca karṇaṃ ca sarvāneva ca bhāratān

तब द्रोण ने असहिष्णु दुर्योधन से, दुःशासन और कर्ण से तथा सभी भरतवंशियों से कहा —

द्रोण उवाच

श्लोक 41 (2.102.41)

अवध्यान्पाण्डवान्प्राहुर्देवपुत्रान्द्विजातयः । अहं तु शरणं प्राप्तान्वर्तमानो यथाबलम् ॥

avadhyānpāṇḍavānprāhurdevaputrāndvijātayaḥ | ahaṃ tu śaraṇaṃ prāptānvartamāno yathābalam

"ब्राह्मण कहते हैं कि देवताओं के पुत्र पाण्डव अवध्य हैं। फिर भी मैं अपनी शक्ति भर आचरण करता हुआ

श्लोक 42 (2.102.42)

गन्ता सर्वात्मना भक्त्या धार्तराष्ट्रान्सराजकान् । नोत्सहेयं परित्यक्तुं दैवं हि बलवत्तरम् ॥

gantā sarvātmanā bhaktyā dhārtarāṣṭrānsarājakān | notsaheyaṃ parityaktuṃ daivaṃ hi balavattaram

अपनी शरण में आए राजा सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों का पूरे मन और निष्ठा से साथ दूँगा। मैं उन्हें छोड़ नहीं सकता; दैव ही अधिक बलवान है।

श्लोक 43 (2.102.43)

धर्मतः पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिताः । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ॥

dharmataḥ pāṇḍuputrā vai vanaṃ gacchanti nirjitāḥ | te ca dvādaśa varṣāṇi vane vatsyanti pāṇḍavāḥ

पाण्डुपुत्र पराजित होकर धर्मपूर्वक वन जा रहे हैं, और वे पाण्डव बारह वर्ष तक वन में रहेंगे।

श्लोक 44 (2.102.44)

चरितब्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगाः । वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद्दुःखाय पाण्डवाः ॥

caritabrahmacaryāśca krodhāmarṣavaśānugāḥ | vairaṃ niryātayiṣyanti mahadduḥkhāya pāṇḍavāḥ

ब्रह्मचर्य का पालन करके, क्रोध और असहिष्णुता के वश में होकर पाण्डव इस वैर का बदला लेंगे, जो बड़े दुःख का कारण होगा।

श्लोक 45 (2.102.45)

मया च भ्रंशितो राजन्द्रुपदः सखिविग्रहे । पुत्रार्थमयजद्राजा वधाय मम भारत ॥

mayā ca bhraṃśito rājandrupadaḥ sakhivigrahe | putrārthamayajadrājā vadhāya mama bhārata

हे राजन्, मैंने मित्रता के झगड़े में द्रुपद को नीचा दिखाया था; हे भारत, तब उस राजा ने मेरे वध के लिए पुत्र-प्राप्ति का यज्ञ किया।

श्लोक 46 (2.102.46)

याजोपयाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात् । धृष्टद्युम्नं द्रौपदीं च वेदीमध्यात्सुमध्यमाम् ॥

yājopayājatapasā putraṃ lebhe sa pāvakāt | dhṛṣṭadyumnaṃ draupadīṃ ca vedīmadhyātsumadhyamām

याज और उपयाज के तप से उसने अग्नि से पुत्र धृष्टद्युम्न को, और वेदी के मध्य से पतली कमर वाली द्रौपदी को प्राप्त किया।

श्लोक 47 (2.102.47)

धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां स्यालः सम्बन्धतो मतः । पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत् ॥

dhṛṣṭadyumnastu pārthānāṃ syālaḥ sambandhato mataḥ | pāṇḍavānāṃ priyaratastasmānmāṃ bhayamāviśat

इस सम्बन्ध से धृष्टद्युम्न पृथापुत्रों का साला माना जाता है और पाण्डवों के हित में लगा रहता है; इसीलिए मेरे मन में भय समा गया है।

श्लोक 48 (2.102.48)

ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान्कवची शरी । मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान् ॥

jvālāvarṇo devadatto dhanuṣmānkavacī śarī | martyadharmatayā tasmādadya me sādhvaso mahān

वह अग्नि-ज्वाला के समान वर्ण वाला, देवताओं का दिया हुआ, धनुष, कवच और बाणों से युक्त है; और मैं मरणधर्मा हूँ, इसलिए आज मुझे बड़ा भय है।

श्लोक 49 (2.102.49)

गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः परवीरहा । रथातिरथसङ्ख्यायां योऽग्रणीरर्जुनो युवा ॥

gato hi pakṣatāṃ teṣāṃ pārṣataḥ paravīrahā | rathātirathasaṅkhyāyāṃ yo'graṇīrarjuno yuvā

क्योंकि शत्रुवीरों का संहार करने वाला पार्षत (धृष्टद्युम्न) उनके पक्ष में चला गया है — उस पक्ष में, जिसके रथियों और अतिरथियों की गणना में युवा अर्जुन सबसे आगे है।

श्लोक 50 (2.102.50)

सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत्सङ्गमो मम । किमन्यद्दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवाः ॥

sṛṣṭaprāṇo bhṛśataraṃ tena cetsaṅgamo mama | kimanyadduḥkhamadhikaṃ paramaṃ bhuvi kauravāḥ

वह अत्यन्त प्राणबल से भरा है; यदि युद्ध में उससे मेरा सामना हुआ, तो हे कौरवो, पृथ्वी पर इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?

श्लोक 51 (2.102.51)

धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरिति विप्रथितं वचः । मद्वधायाश्रितोऽप्येष लोके चाप्यतिविश्रुतः ॥

dhṛṣṭadyumno droṇamṛtyuriti viprathitaṃ vacaḥ | madvadhāyāśrito'pyeṣa loke cāpyativiśrutaḥ

"धृष्टद्युम्न द्रोण की मृत्यु है" — यह बात सब ओर फैल चुकी है। उसे मेरे वध के लिए ही पाया गया है, और यह भी संसार में भली-भाँति प्रसिद्ध है।

श्लोक 52 (2.102.52)

सोऽयं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते कालपर्ययः । त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम् ॥

so'yaṃ nūnamanuprāptastvatkṛte kālaparyayaḥ | tvaritaṃ kuruta śreyo naitadetāvatā kṛtam

निश्चय ही तुम्हारे किए के कारण समय का यह फेर आ पहुँचा है। शीघ्र अपने कल्याण का उपाय करो; इतने भर से यह बात समाप्त नहीं हुई है।

श्लोक 53 (2.102.53)

मुहूर्तं सुखमेवैतत्तालच्छायेव हैमनी । यजध्वं च महायज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च ॥

muhūrtaṃ sukhamevaitattālacchāyeva haimanī | yajadhvaṃ ca mahāyajñairbhogānaśnīta datta ca

यह सुख क्षणभर का है, जैसे जाड़े में ताड़ की छाया। बड़े-बड़े यज्ञ करो, भोग भोगो और दान दो;

श्लोक 54 (2.102.54)

इतश्चतुर्दशे वर्षे महत्प्राप्स्यथ वैशसम् । दुर्योधन निशम्यैतत्प्रतिपद्य यथेच्छसि ॥

itaścaturdaśe varṣe mahatprāpsyatha vaiśasam | duryodhana niśamyaitatpratipadya yathecchasi

क्योंकि आज से चौदहवें वर्ष में तुम पर बड़ा संहार आ पड़ेगा। दुर्योधन, यह सुनकर जैसा उचित समझो वैसा करो —

श्लोक 55 (2.102.55)

शमं वा पाण्डुपुत्रेण प्रयुङ्क्ष्व यदि मन्यसे ॥

śamaṃ vā pāṇḍuputreṇa prayuṅkṣva yadi manyase

अथवा, यदि उचित समझो, तो पाण्डुपुत्र के साथ सन्धि कर लो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 56 (2.102.56)

द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥

droṇasya vacanaṃ śrutvā dhṛtarāṣṭro'bravīdidam

द्रोण का वचन सुनकर धृतराष्ट्र ने यह कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 57 (2.102.57)

सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान् । यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवाः ॥

samyagāha guruḥ kṣattarupāvartaya pāṇḍavān | yadi te na nivartante satkṛtā yāntu pāṇḍavāḥ

"हे क्षत्ता, गुरु ने ठीक कहा है। पाण्डवों को लौटा लाओ। यदि वे न लौटें, तो पाण्डव सम्मान के साथ जाएँ —

श्लोक 58 (2.102.58)

सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्च पुत्रकाः ॥

saśastrarathapādātā bhogavantaśca putrakāḥ

शस्त्रों, रथों और पैदल सैनिकों सहित, भोग-सामग्री से सम्पन्न होकर — वे मेरे पुत्र।"

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