सभा पर्व · अध्याय 101
नगर का शोक और कुन्ती का विलाप
छाल और मृगचर्म पहने युधिष्ठिर जब पैदल नगर से निकलते हैं, तब हस्तिनापुर के लोग छतों पर चढ़कर विलाप करते हैं और अपने घर छोड़कर उनके पीछे वन चलने का निश्चय करते हैं; एक वस्त्र में पैदल जाती द्रौपदी को देखकर स्त्रियाँ रो पड़ती हैं। द्रौपदी कुन्ती से विदा लेती है; कुन्ती उसे उपदेश देती हैं, सहदेव की देखभाल सौंपती हैं और फिर वनवासी पुत्रों के लिए विलाप करती हुई कृष्ण और स्वर्गीय पाण्डु को पुकारती हैं। विदुर कुन्ती को अपने घर ले जाते हैं, धृतराष्ट्र के अन्तःपुर की स्त्रियाँ रोती हैं और व्याकुल धृतराष्ट्र विदुर को बुलवा भेजते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.101.1)
ततः सम्प्रस्थिते तत्र धर्मराजे तदा नृप । जनाः समन्ताद्द्रष्टुं तं समारुरुहुरातुराः ॥
tataḥ samprasthite tatra dharmarāje tadā nṛpa | janāḥ samantāddraṣṭuṃ taṃ samāruruhurāturāḥ
हे राजन्, तब धर्मराज के प्रस्थान करने पर चारों ओर के लोग व्याकुल होकर उन्हें देखने के लिए ऊँचे स्थानों पर चढ़ गए।
श्लोक 2 (2.101.2)
ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च । गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्च सर्वशः ॥
tataḥ prāsādavaryāṇi vimānaśikharāṇi ca | gopurāṇi ca sarvāṇi vṛkṣānanyāṃśca sarvaśaḥ
वे श्रेष्ठ महलों पर, विमान जैसे भवनों के शिखरों पर, सभी नगरद्वारों पर और जहाँ-तहाँ के वृक्षों पर भी चढ़ गए;
श्लोक 3 (2.101.3)
अथाधिरुह्य सस्त्रीका उदासीना व्यलोकयन् । न हि रथ्यास्तदा शक्या गन्तुं ताश्च जनाकुलाः ॥
athādhiruhya sastrīkā udāsīnā vyalokayan | na hi rathyāstadā śakyā gantuṃ tāśca janākulāḥ
और वहाँ चढ़कर वे अपनी स्त्रियों सहित असहाय-से देखते रहे; क्योंकि उस समय गलियाँ लोगों से इतनी भरी थीं कि उनमें चलना सम्भव न था।
श्लोक 4 (2.101.4)
आरुह्य स्मानतास्तत्र दीनाः पश्यन्ति पाण्डवान् । पदातिं वर्जितच्छत्रं चेलभूषणवर्जितम् ॥
āruhya smānatāstatra dīnāḥ paśyanti pāṇḍavān | padātiṃ varjitacchatraṃ celabhūṣaṇavarjitam
वहाँ चढ़े हुए, शोक से झुके वे दुःखी लोग पाण्डवों को देख रहे थे: पार्थ पैदल थे, उनके ऊपर छत्र नहीं था, न सुन्दर वस्त्र थे, न आभूषण;
श्लोक 5 (2.101.5)
वल्कलाजिनसंवीतं पार्थं दृष्ट्वा जनास्तदा । ऊचुर्बहुविधा वाचो भृशोपहतचेतसः ॥
valkalājinasaṃvītaṃ pārthaṃ dṛṣṭvā janāstadā | ūcurbahuvidhā vāco bhṛśopahatacetasaḥ
वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे। उस समय पार्थ को इस दशा में देखकर गहरे आघात से व्यथित लोग तरह-तरह की बातें कहने लगे:
जना ऊचुः
श्लोक 6 (2.101.6)
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् । तमेकं कृष्णया सार्धमनुगच्छन्ति पाण्डवाः ॥
yaṃ yāntamanuyāti sma caturaṅgabalaṃ mahat | tamekaṃ kṛṣṇayā sārdhamanugacchanti pāṇḍavāḥ
जिनके चलने पर चतुरंगिणी विशाल सेना उनके पीछे चलती थी, उन्हीं के पीछे आज केवल कृष्णा (द्रौपदी) के साथ पाण्डव चल रहे हैं;
श्लोक 7 (2.101.7)
चत्वारो भ्रातरश्चैव धौम्यश्चैव पुरोहितः । भीमार्जुनौ वारयित्वा निकृत्या बद्धकार्मुकौ ॥
catvāro bhrātaraścaiva dhaumyaścaiva purohitaḥ | bhīmārjunau vārayitvā nikṛtyā baddhakārmukau
उनके चार भाई और पुरोहित धौम्य। छल से जिनके धनुष बँध गए हैं, उन भीम और अर्जुन को भी उन्होंने रोक रखा है।
श्लोक 8 (2.101.8)
धर्म एवास्थितो येन त्यक्त्वा राज्यं महात्मना । या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि ॥
dharma evāsthito yena tyaktvā rājyaṃ mahātmanā | yā na śakyā purā draṣṭuṃ bhūtairākāśagairapi
जिस महात्मा ने केवल धर्म का ही आश्रय लिया, उसने राज्य त्याग दिया है। जिसे पहले आकाश में विचरने वाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे,
श्लोक 9 (2.101.9)
तामद्य कृष्णां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः । अङ्गरागोचितां कृष्णां रक्तचन्दनसेविनीम् ॥
tāmadya kṛṣṇāṃ paśyanti rājamārgagatā janāḥ | aṅgarāgocitāṃ kṛṣṇāṃ raktacandanasevinīm
उसी कृष्णा को आज राजमार्ग पर चलते लोग देख रहे हैं; वही कृष्णा, जो अंगराग और लाल चन्दन लगाने की अभ्यस्त है।
श्लोक 10 (2.101.10)
वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् । अद्य नूनं पृथा देवी सत्यमाविश्य भाषते ॥
varṣamuṣṇaṃ ca śītaṃ ca neṣyatyāśu vivarṇatām | adya nūnaṃ pṛthā devī satyamāviśya bhāṣate
वर्षा, धूप और शीत शीघ्र ही उसका रंग फीका कर देंगे। निश्चय ही आज देवी पृथा पूरे सत्य के साथ यह कह रही हैं कि
श्लोक 11 (2.101.11)
पुत्रान्स्नुषां च देवी तु द्रष्टुमद्याथ नार्हति । निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद्दुःखदर्शनम् ॥
putrānsnuṣāṃ ca devī tu draṣṭumadyātha nārhati | nirguṇasyāpi putrasya kathaṃ syādduḥkhadarśanam
वे आज अपने पुत्रों और पुत्रवधू को देख नहीं सकतीं। गुणहीन पुत्र को भी दुःख में देखना कैसे सहा जाए?
श्लोक 12 (2.101.12)
किम्पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् । आनृशंस्यमनुक्रोशो धृतिः शीलं दमः शमः ॥
kimpunaryasya loko'yaṃ jito vṛttena kevalam | ānṛśaṃsyamanukrośo dhṛtiḥ śīlaṃ damaḥ śamaḥ
फिर उसकी तो बात ही क्या, जिसने केवल अपने आचरण से यह लोक जीत लिया है! दयालुता, करुणा, धैर्य, शील, इन्द्रियनिग्रह और शान्ति,
श्लोक 13 (2.101.13)
पाण्डवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषोत्तमम् । तस्मादस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः ॥
pāṇḍavaṃ śobhayantyete ṣaḍguṇāḥ puruṣottamam | tasmādasyopaghātena prajāḥ paramapīḍitāḥ
ये छह गुण उस पुरुषोत्तम पाण्डव की शोभा बढ़ाते हैं। इसीलिए उन पर आघात होने से प्रजा अत्यन्त पीड़ित है,
श्लोक 14 (2.101.14)
औदकानीव सत्वानि ग्रीष्मे सलिलसङ्क्षयात् । पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पतेः ॥
audakānīva satvāni grīṣme salilasaṅkṣayāt | pīḍayā pīḍitaṃ sarvaṃ jagadasya jagatpateḥ
जैसे गर्मी में पानी सूख जाने पर जलचर जीव पीड़ित होते हैं। इस जगत्पति की पीड़ा से सारा जगत् पीड़ित है।
श्लोक 15 (2.101.15)
मूलस्यैवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः । मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युतिः ॥
mūlasyaivopaghātena vṛkṣaḥ puṣpaphalopagaḥ | mūlaṃ hyeṣa manuṣyāṇāṃ dharmarājo mahādyutiḥ
जड़ पर चोट पहुँचने से फूलों और फलों से लदा वृक्ष भी नष्ट हो जाता है; और यह महातेजस्वी धर्मराज मनुष्यों की जड़ हैं।
श्लोक 16 (2.101.16)
पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जनाः । ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्राः सहबान्धवाः ॥
puṣpaṃ phalaṃ ca patraṃ ca śākhāstasyetare janāḥ | te bhrātara iva kṣipraṃ saputrāḥ sahabāndhavāḥ
बाकी सब लोग उस वृक्ष के फूल, फल, पत्ते और शाखाएँ हैं। आओ, उनके भाइयों की तरह हम भी अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ शीघ्र ही
श्लोक 17 (2.101.17)
गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डवः । उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥
gacchantamanugacchāmo yena gacchati pāṇḍavaḥ | udyānāni parityajya kṣetrāṇi ca gṛhāṇi ca
जिस मार्ग से पाण्डव जा रहे हैं, उसी से उनके पीछे चलें। अपने उपवन, खेत और घर छोड़कर,
श्लोक 18 (2.101.18)
एकदुःखसुखाः पार्थमनुयाम सुधार्मिकम् । समुच्छ्रितपताकानि परिध्वस्ताजिराणि च ॥
ekaduḥkhasukhāḥ pārthamanuyāma sudhārmikam | samucchritapatākāni paridhvastājirāṇi ca
एक ही दुःख-सुख के भागी बनकर हम परम धर्मात्मा पार्थ के पीछे चलें। जिन घरों पर पताकाएँ अब भी फहरा रही हैं, जिनके आँगन उजड़ गए हैं,
श्लोक 19 (2.101.19)
उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः । रजसाऽप्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः ॥
upāttadhanadhānyāni hṛtasārāṇi sarvaśaḥ | rajasā'pyavakīrṇāni parityaktāni daivataiḥ
जिनका धन-धान्य उठा लिया गया है, जिनकी सारी मूल्यवान वस्तुएँ हटा दी गई हैं, जो धूल से भरे हैं और जिन्हें देवताओं ने त्याग दिया है,
श्लोक 20 (2.101.20)
मूषकैः परिधावद्भिरुद्बिलैरावृतानि च । अपेतोदकधूमानि हीनसंमार्जनानि च ॥
mūṣakaiḥ paridhāvadbhirudbilairāvṛtāni ca | apetodakadhūmāni hīnasaṃmārjanāni ca
जिनमें चूहे दौड़ रहे हैं और बिल-ही-बिल खुद गए हैं, जहाँ न जल है, न चूल्हे का धुआँ, न झाड़ू-बुहारी होती है,
श्लोक 21 (2.101.21)
प्रनष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च । दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च ॥
pranaṣṭabalikarmejyāmantrahomajapāni ca | duṣkāleneva bhagnāni bhinnabhājanavanti ca
जहाँ बलिकर्म, यज्ञ, मन्त्र, होम और जप सब बन्द हो गए हैं, जो मानो अकाल से टूट गए हैं और जिनमें फूटे बर्तन पड़े हैं,
श्लोक 22 (2.101.22)
अस्मत्त्यक्तानि वेश्मानि सौबलः प्रतिपद्यताम् । वनं नगरमेवास्तु येन गच्छन्ति पाण्डवाः ॥
asmattyaktāni veśmāni saubalaḥ pratipadyatām | vanaṃ nagaramevāstu yena gacchanti pāṇḍavāḥ
हमारे त्यागे हुए ऐसे घरों को सुबलपुत्र शकुनि ले ले। जिस वन में पाण्डव जा रहे हैं, वही नगर बन जाए।
श्लोक 23 (2.101.23)
अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् । बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे स्थानानि मृगपक्षिणः ॥
asmābhiśca parityaktaṃ puraṃ sampadyatāṃ vanam | bilāni daṃṣṭriṇaḥ sarve sthānāni mṛgapakṣiṇaḥ
और हमारा छोड़ा हुआ यह नगर वन बन जाए। सभी दाढ़ों वाले पशु अपनी माँदें और मृग-पक्षी अपने ठिकाने छोड़ दें;
श्लोक 24 (2.101.24)
त्यजन्त्वस्मद्भयाद्भीता गजाः सिंहा वनान्यपि । अनाक्रान्तं प्रपद्यन्तः सेवमानं त्यजन्तु च ॥
tyajantvasmadbhayādbhītā gajāḥ siṃhā vanānyapi | anākrāntaṃ prapadyantaḥ sevamānaṃ tyajantu ca
हमारे भय से डरे हुए हाथी और सिंह वनों को भी छोड़ दें; वे अछूते प्रदेशों में चले जाएँ और जिन स्थानों पर लोग आते-जाते हैं, उन्हें छोड़ दें।
श्लोक 25 (2.101.25)
तृणमांसफलादानां देशांस्त्यक्त्वा मृगद्विजाः । वयं पार्थैर्वने सम्यक्सह वत्स्याम निर्वृताः ॥
tṛṇamāṃsaphalādānāṃ deśāṃstyaktvā mṛgadvijāḥ | vayaṃ pārthairvane samyaksaha vatsyāma nirvṛtāḥ
मृग और पक्षी घास, मांस और फल खाने वालों के प्रदेश छोड़ दें। हम पार्थों के साथ वन में आनन्द से रहेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (2.101.26)
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः । शुश्राव पार्थः श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम् ॥
ityevaṃ vividhā vāco nānājanasamīritāḥ | śuśrāva pārthaḥ śrutvā ca na vicakre'sya mānasam
इस प्रकार भाँति-भाँति के लोगों द्वारा कही गई ये अनेक बातें पार्थ ने सुनीं, पर सुनकर भी उनका मन विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 27 (2.101.27)
ततः प्रासादसंस्थास्तु समन्ताद्वै गृहे गृहे । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषितः ॥
tataḥ prāsādasaṃsthāstu samantādvai gṛhe gṛhe | brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ caiva yoṣitaḥ
तब चारों ओर घर-घर में महलों पर खड़ी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों की स्त्रियों ने
श्लोक 28 (2.101.28)
गत्वा स्वगृहजालानि उत्पाट्यावरणानि च । ददृशुः पाण्डवान्दीनान्वल्कलाजिनवाससः ॥
gatvā svagṛhajālāni utpāṭyāvaraṇāni ca | dadṛśuḥ pāṇḍavāndīnānvalkalājinavāsasaḥ
अपने घरों के झरोखों पर जाकर और उनके पर्दे हटाकर वल्कल और मृगचर्म पहने दीन पाण्डवों को देखा;
श्लोक 29 (2.101.29)
कृष्णां त्वदृष्टपूर्वां तां व्रजन्तीं पद्भिरेव च । एकवस्त्रां रुदन्तीं तां मुक्तकेशीं रजस्वलाम् ॥
kṛṣṇāṃ tvadṛṣṭapūrvāṃ tāṃ vrajantīṃ padbhireva ca | ekavastrāṃ rudantīṃ tāṃ muktakeśīṃ rajasvalām
और उस कृष्णा को भी, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था, पैदल चलते, एक ही वस्त्र पहने, रोते हुए, केश खोले और रजस्वला अवस्था में देखा।
श्लोक 30 (2.101.30)
दृष्ट्वा तदा स्त्रियः सर्वा विवर्णवदना भृशम् । विलप्य बहुधा मोहाद्दुःखशोकेन पीडिताः । हाहा धिग्धिग्धिगित्युक्त्वा नेत्रैरश्रूण्यवर्तयन् ॥
dṛṣṭvā tadā striyaḥ sarvā vivarṇavadanā bhṛśam | vilapya bahudhā mohādduḥkhaśokena pīḍitāḥ | hāhā dhigdhigdhigityuktvā netrairaśrūṇyavartayan
उसे देखकर सब स्त्रियों के मुख एकदम फीके पड़ गए; दुःख और शोक से पीड़ित होकर वे मोहवश तरह-तरह से विलाप करने लगीं और "हाय, हाय! धिक्कार है, धिक्कार है, धिक्कार है!" कहती हुई आँखों से आँसू बहाने लगीं।
श्लोक 31 (2.101.31)
जनस्याथ वचः श्रुत्वा स राजा भ्रातृभिः सह । उद्दिश्य वनावासाय प्रतस्थे कृतनिश्चयः ॥
janasyātha vacaḥ śrutvā sa rājā bhrātṛbhiḥ saha | uddiśya vanāvāsāya pratasthe kṛtaniścayaḥ
लोगों की ये बातें सुनकर राजा युधिष्ठिर वनवास का दृढ़ निश्चय करके भाइयों के साथ चल पड़े।
श्लोक 32 (2.101.32)
तस्मिन्सम्प्रस्थिते कृष्णा पृथां प्राप्य यशस्विनीम् । अपृच्छद्भृशदुःखार्ता याश्चान्यास्तत्र योषितः ॥
tasminsamprasthite kṛṣṇā pṛthāṃ prāpya yaśasvinīm | apṛcchadbhṛśaduḥkhārtā yāścānyāstatra yoṣitaḥ
उनके प्रस्थान करने पर अत्यन्त दुःखी कृष्णा यशस्विनी पृथा के पास गई और उनसे तथा वहाँ उपस्थित अन्य स्त्रियों से विदा माँगी।
श्लोक 33 (2.101.33)
यथार्हं वन्दनाश्लेषान्कृत्वा गन्तुमियेष सा । ततो निनादः सुमहान्पाण्डवान्तःपुरेऽभवत् ॥
yathārhaṃ vandanāśleṣānkṛtvā gantumiyeṣa sā | tato ninādaḥ sumahānpāṇḍavāntaḥpure'bhavat
यथायोग्य सबको प्रणाम करके और गले मिलकर उसने जाना चाहा। तब पाण्डवों के अन्तःपुर में बड़ा भारी आर्तनाद उठा।
श्लोक 34 (2.101.34)
कुन्ती च भृशसन्तप्ता द्रौपदीं प्रेक्ष्य गच्छतीम् । शोकविह्वलया वाचा कृच्छ्राद्वचनमब्रवीत् ॥
kuntī ca bhṛśasantaptā draupadīṃ prekṣya gacchatīm | śokavihvalayā vācā kṛcchrādvacanamabravīt
और द्रौपदी को जाती देखकर अत्यन्त संतप्त कुन्ती शोक से काँपती वाणी में बड़ी कठिनाई से बोलीं:
कुन्त्युवाच
श्लोक 35 (2.101.35)
वत्से शोको न ते कार्यः प्राप्येदं व्यसनं महत् । स्त्रीधर्माणामभिज्ञाऽसि शीलाचारवती तथा ॥
vatse śoko na te kāryaḥ prāpyedaṃ vyasanaṃ mahat | strīdharmāṇāmabhijñā'si śīlācāravatī tathā
बेटी, इस महान संकट के आ पड़ने पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। तुम स्त्रियों के धर्मों को जानती हो और शील तथा सदाचार से सम्पन्न हो।
श्लोक 36 (2.101.36)
न त्वां सन्देष्टुमर्हामि भर्तॄन्प्रति शुचिस्मिते । साध्वी गुणसमापन्ना भूषितं ते कुलद्वयम् ॥
na tvāṃ sandeṣṭumarhāmi bhartṝnprati śucismite | sādhvī guṇasamāpannā bhūṣitaṃ te kuladvayam
हे शुचिस्मिते, पतियों के प्रति तुम्हारे कर्तव्य के विषय में मुझे तुम्हें कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं। तुम गुणवती साध्वी हो; तुमने दोनों कुलों को सुशोभित किया है।
श्लोक 37 (2.101.37)
सभाग्याः कुरवश्चेमे ये न दग्धास्त्वयाऽनघे । अरिष्टं व्रज पन्थानं मदनुध्यानबृंहिता ॥
sabhāgyāḥ kuravaśceme ye na dagdhāstvayā'naghe | ariṣṭaṃ vraja panthānaṃ madanudhyānabṛṃhitā
हे निष्पाप, ये कुरुवंशी भाग्यशाली हैं कि तुमने इन्हें भस्म नहीं कर दिया। मेरे शुभ चिन्तन से बल पाकर तुम कुशलपूर्वक अपने मार्ग पर जाओ।
श्लोक 38 (2.101.38)
भाविन्यर्थे हि सत्स्त्रीणां वैकृतं नोपजायते । गुरुधर्माभिगुप्ता च श्रेयः क्षिप्रमवप्स्यसि ॥
bhāvinyarthe hi satstrīṇāṃ vaikṛtaṃ nopajāyate | gurudharmābhiguptā ca śreyaḥ kṣipramavapsyasi
जो होनी है, उससे सती स्त्रियों का मन विचलित नहीं होता। गुरुजनों के प्रति धर्म से सुरक्षित रहकर तुम शीघ्र ही कल्याण पाओगी।
श्लोक 39 (2.101.39)
सहदेवश्च मे पुत्रः सदाऽवेक्ष्यो वने वसन् । यथेदं व्यसनं प्राप्य नायं सीदेन्महामतिः ॥
sahadevaśca me putraḥ sadā'vekṣyo vane vasan | yathedaṃ vyasanaṃ prāpya nāyaṃ sīdenmahāmatiḥ
और वन में रहते समय मेरे पुत्र सहदेव का सदा ध्यान रखना, ताकि इस संकट में पड़कर यह बुद्धिमान दुःख से टूट न जाए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (2.101.40)
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी स्रवन्नेत्रजलाविला । शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेशी विनिर्ययौ ॥
tathetyuktvā tu sā devī sravannetrajalāvilā | śoṇitāktaikavasanā muktakeśī viniryayau
"ऐसा ही होगा" कहकर आँसुओं से भीगे नेत्रों वाली वह देवी, रक्त से सने एक ही वस्त्र में, केश खोले हुए बाहर निकल गई।
श्लोक 41 (2.101.41)
तां क्रोशन्तीं पृथा दुःखादनुवव्राज गच्छतीम् । अथापश्यत्सुतान्सर्वान्हृताभरणवाससः ॥
tāṃ krośantīṃ pṛthā duḥkhādanuvavrāja gacchatīm | athāpaśyatsutānsarvānhṛtābharaṇavāsasaḥ
रोती हुई जाती उस द्रौपदी के पीछे-पीछे पृथा भी दुःख से भरी चलीं। तब उन्होंने अपने सब पुत्रों को देखा, जिनके आभूषण और वस्त्र छिन चुके थे,
श्लोक 42 (2.101.42)
रुरुचर्मावृततनून्ह्रिया किञ्चिदवाङ्मुखान् । परैः परीतान्संहृष्टैः सुहृद्भिश्चानुशोचितान् ॥
rurucarmāvṛtatanūnhriyā kiñcidavāṅmukhān | paraiḥ parītānsaṃhṛṣṭaiḥ suhṛdbhiścānuśocitān
जिनके शरीर रुरु मृग की खालों से ढके थे, जिनके मुख लज्जा से कुछ झुके हुए थे, जो हर्षित शत्रुओं से घिरे थे और जिन पर उनके सुहृद् शोक कर रहे थे।
श्लोक 43 (2.101.43)
तदवस्थान्सुतान्सर्वानुपसृत्यातिवत्सला । स्वजमानाऽवदच्छोकात्तत्तद्विलपती बहु ॥
tadavasthānsutānsarvānupasṛtyātivatsalā | svajamānā'vadacchokāttattadvilapatī bahu
उस दशा में पड़े अपने सब पुत्रों के पास जाकर अत्यन्त वात्सल्य से भरी कुन्ती ने उन्हें गले लगाया और शोक से बहुत प्रकार विलाप करती हुई बोलीं:
कुन्त्युवाच
श्लोक 44 (2.101.44)
कथं सद्धर्मचारित्रान्वृत्तस्थितिविभूषितान् । अक्षुद्रान्दृढभक्तांश्च दैवतेज्यापरान्सदा ॥
kathaṃ saddharmacāritrānvṛttasthitivibhūṣitān | akṣudrāndṛḍhabhaktāṃśca daivatejyāparānsadā
तुम तो सद्धर्म, सदाचार और मर्यादा से विभूषित हो, उदार हो, दृढ़ भक्ति वाले हो और सदा देवपूजा में लगे रहते हो;
श्लोक 45 (2.101.45)
व्यसनं वः समभ्यागात्कोऽयं विधिविपर्ययः । कस्यापध्यानजं चेदमागः पश्यामि वो धिया ॥
vyasanaṃ vaḥ samabhyāgātko'yaṃ vidhiviparyayaḥ | kasyāpadhyānajaṃ cedamāgaḥ paśyāmi vo dhiyā
फिर तुम पर यह विपत्ति कैसे आ पड़ी? विधाता का यह कैसा उलटफेर है? किसके अनिष्ट चिन्तन से तुम पर यह अपराध आ पड़ा? मैं मन-ही-मन इसे खोज रही हूँ।
श्लोक 46 (2.101.46)
स्यात्तु मद्भाग्यदोषोऽयं याऽहं युष्मानजीजनम् । दुःखायासभुजोऽत्यर्थं युक्तानप्युत्तमैर्गुणैः ॥
syāttu madbhāgyadoṣo'yaṃ yā'haṃ yuṣmānajījanam | duḥkhāyāsabhujo'tyarthaṃ yuktānapyuttamairguṇaiḥ
यह मेरे ही भाग्य का दोष होगा, क्योंकि मैंने ही तुम्हें जन्म दिया; इसीलिए उत्तम गुणों से युक्त होकर भी तुम अत्यधिक दुःख और कष्ट भोग रहे हो।
श्लोक 47 (2.101.47)
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृताः । वीर्यसत्वबलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः ॥
kathaṃ vatsyatha durgeṣu vane ṛddhivinākṛtāḥ | vīryasatvabalotsāhatejobhirakṛśāḥ kṛśāḥ
वैभव से वंचित होकर तुम वन के दुर्गम स्थानों में कैसे रहोगे? पराक्रम, धैर्य, बल, उत्साह और तेज में तुम किसी से कम नहीं, फिर भी आज तुम कितने दुर्बल हो गए हो!
श्लोक 48 (2.101.48)
यद्येवमहमज्ञास्यं वने वासं हि वो ध्रुवम् । शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वयम् ॥
yadyevamahamajñāsyaṃ vane vāsaṃ hi vo dhruvam | śataśṛṅgānmṛte pāṇḍau nāgamiṣyaṃ gajāhvayam
यदि मैं जानती कि तुम्हारे भाग्य में निश्चय ही वनवास लिखा है, तो पाण्डु की मृत्यु के बाद मैं शतशृंग से हस्तिनापुर न आती।
श्लोक 49 (2.101.49)
धन्यं वः पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा । यः पुत्राधिमसम्प्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत्प्रियाम् ॥
dhanyaṃ vaḥ pitaraṃ manye tapomedhānvitaṃ tathā | yaḥ putrādhimasamprāpya svargecchāmakarotpriyām
मैं तुम्हारे पिता को धन्य मानती हूँ, जो तप और बुद्धि से सम्पन्न थे और जिन्होंने पुत्रों का दुःख देखे बिना ही स्वर्ग की इच्छा को अपनाया।
श्लोक 50 (2.101.50)
धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् । मन्ये तु माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव तु ॥
dhanyāṃ cātīndriyajñānāmimāṃ prāptāṃ parāṃ gatim | manye tu mādrīṃ dharmajñāṃ kalyāṇīṃ sarvathaiva tu
और धर्म को जानने वाली, सब प्रकार से कल्याणी माद्री को भी मैं धन्य मानती हूँ, जिसने अतीन्द्रिय ज्ञान से यह परम गति पा ली।
श्लोक 51 (2.101.51)
रत्या मत्या च गत्या च ययाऽहमभिसन्धिता । जीवितप्रियतां मह्यं धिङ्मां सङ्क्लेशभागिनीम् ॥
ratyā matyā ca gatyā ca yayā'hamabhisandhitā | jīvitapriyatāṃ mahyaṃ dhiṅmāṃ saṅkleśabhāginīm
धिक्कार है मेरे जीवन-मोह को, जिसके कारण आसक्ति, बुद्धि और भाग्य ने मुझे छल लिया; क्लेश की भागिनी मुझे धिक्कार है!
श्लोक 52 (2.101.52)
पुत्रका न विहास्ये वः कृच्छ्रलब्धान्प्रियान्सतः । साऽहं यास्यामि हि वनं हा कृष्णे किं जहासि माम् ॥
putrakā na vihāsye vaḥ kṛcchralabdhānpriyānsataḥ | sā'haṃ yāsyāmi hi vanaṃ hā kṛṣṇe kiṃ jahāsi mām
मेरे बच्चो, मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी; बड़ी कठिनाई से पाए हुए तुम मेरे प्रिय और सज्जन पुत्र हो। मैं भी वन चलूँगी। हाय कृष्णे, तू मुझे क्यों छोड़ रही है?
श्लोक 53 (2.101.53)
अन्तवत्यसुधर्मेऽस्मिन्धात्रा किं नु प्रमादतः । ममान्तो नैव विहितस्तेनायुर्न जहाति माम् ॥
antavatyasudharme'smindhātrā kiṃ nu pramādataḥ | mamānto naiva vihitastenāyurna jahāti mām
इस नश्वर प्राणधारण में क्या विधाता ने भूल से मेरा अन्त ही नहीं रचा? इसीलिए प्राण मुझे नहीं छोड़ते।
श्लोक 54 (2.101.54)
हा कृष्ण द्वारकावासिन्क्वासि सङ्कर्षणानुज । कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्च नरोत्तमान् ॥
hā kṛṣṇa dvārakāvāsinkvāsi saṅkarṣaṇānuja | kasmānna trāyase duḥkhānmāṃ cemāṃśca narottamān
हा कृष्ण! हे द्वारकावासी, हे संकर्षण के छोटे भाई, तुम कहाँ हो? मुझे और इन नरश्रेष्ठों को तुम इस दुःख से क्यों नहीं बचाते?
श्लोक 55 (2.101.55)
अनादिनिधनं ये त्वामनुध्यायन्ति वै नराः । तांस्त्वं पासीत्ययं वादः स गतो व्यर्थतां कथम् ॥
anādinidhanaṃ ye tvāmanudhyāyanti vai narāḥ | tāṃstvaṃ pāsītyayaṃ vādaḥ sa gato vyarthatāṃ katham
कहा जाता है कि जो मनुष्य तुम अनादि-अनन्त का ध्यान करते हैं, उनकी तुम रक्षा करते हो। वह कथन व्यर्थ कैसे हो गया?
श्लोक 56 (2.101.56)
इमे सद्धर्ममाहात्म्ययशोवीर्यानुवर्तिनः । नार्हन्ति व्यसनं भोक्तुं नन्वेषां क्रियतां दया ॥
ime saddharmamāhātmyayaśovīryānuvartinaḥ | nārhanti vyasanaṃ bhoktuṃ nanveṣāṃ kriyatāṃ dayā
ये सद्धर्म, महिमा, यश और पराक्रम का अनुसरण करने वाले हैं; ये विपत्ति भोगने योग्य नहीं हैं। इन पर तो दया होनी ही चाहिए।
श्लोक 57 (2.101.57)
सेयं नीत्यर्थविज्ञेषु कथमापदुपागता । स्थितेषु कुलनाथेषु कथमापदुपागता ॥
seyaṃ nītyarthavijñeṣu kathamāpadupāgatā | sthiteṣu kulanātheṣu kathamāpadupāgatā
नीति और उसके प्रयोजन को जानने वालों के रहते यह विपत्ति कैसे आ पड़ी? कुल के स्वामियों के रहते यह विपत्ति कैसे आ गई?
श्लोक 58 (2.101.58)
हा पाण्डो हा महाराज क्वासि किं समुपेक्षसे । पुत्रान्विवास्यतः साधूनरिभिर्द्यूतनिर्जितान् ॥
hā pāṇḍo hā mahārāja kvāsi kiṃ samupekṣase | putrānvivāsyataḥ sādhūnaribhirdyūtanirjitān
हा पाण्डु! हा महाराज! तुम कहाँ हो? शत्रु जुए में हराकर तुम्हारे सज्जन पुत्रों को देश से निकाल रहे हैं, और तुम क्यों उपेक्षा कर रहे हो?
श्लोक 59 (2.101.59)
सहदेव निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रियः । शरीरादपि माद्रेय मां मा त्याक्षीः कुपुत्रवत् ॥
sahadeva nivartasva nanu tvamasi me priyaḥ | śarīrādapi mādreya māṃ mā tyākṣīḥ kuputravat
सहदेव, लौट आ! हे माद्रीनन्दन, तू तो मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्रिय है। कुपुत्र की तरह मुझे छोड़कर मत जा।
श्लोक 60 (2.101.60)
व्रजन्तु भ्रातरस्तेऽमी यदि सत्याभिसन्धिनः । मत्परित्राणजं धर्ममिहैव त्वमवाप्नुहि ॥
vrajantu bhrātaraste'mī yadi satyābhisandhinaḥ | matparitrāṇajaṃ dharmamihaiva tvamavāpnuhi
तेरे ये भाई यदि सत्य की प्रतिज्ञा से बँधे हैं तो जाएँ; पर तू यहीं रहकर मेरी रक्षा से मिलने वाला धर्म प्राप्त कर।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 61 (2.101.61)
एवं विलपतीं कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्य च । पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवव्रजुः ॥
evaṃ vilapatīṃ kuntīmabhivādya praṇamya ca | pāṇḍavā vigatānandā vanāyaiva pravavrajuḥ
इस प्रकार विलाप करती कुन्ती का अभिवादन करके और उन्हें प्रणाम करके आनन्दहीन पाण्डव वन को चल दिए।
श्लोक 62 (2.101.62)
विदुरश्चापि तामार्तां कुन्तीमाश्वास्य हेतुभिः । प्रावेशयद्गृहं क्षत्ता स्वयमार्ततरः शनैः ॥
viduraścāpi tāmārtāṃ kuntīmāśvāsya hetubhiḥ | prāveśayadgṛhaṃ kṣattā svayamārtataraḥ śanaiḥ
और स्वयं अत्यधिक दुःखी विदुर ने भी उस पीड़ित कुन्ती को युक्तियों से सान्त्वना दी और धीरे-धीरे घर के भीतर ले गए।
श्लोक 63 (2.101.63)
धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ताश्च निखिलेनोपलभ्य तत् । गमनं परिकर्षं च कृष्णाया द्यूतमण्डले ॥
dhārtarāṣṭrastriyastāśca nikhilenopalabhya tat | gamanaṃ parikarṣaṃ ca kṛṣṇāyā dyūtamaṇḍale
धृतराष्ट्र के घर की स्त्रियों ने जब यह सब पूरी तरह जाना, पाण्डवों का प्रस्थान और द्यूतसभा में कृष्णा का घसीटा जाना,
श्लोक 64 (2.101.64)
रुरुदुः सुस्वनं सर्वा विनिन्दन्त्यः कुरून्भृशम् । दध्युश्च सुचिरं कालं करासक्तमुखाम्बुजाः ॥
ruruduḥ susvanaṃ sarvā vinindantyaḥ kurūnbhṛśam | dadhyuśca suciraṃ kālaṃ karāsaktamukhāmbujāḥ
तो वे सब कुरुओं की कड़ी निन्दा करती हुई ऊँचे स्वर में रो पड़ीं और हथेलियों पर कमल जैसे मुख टिकाए बहुत देर तक चिन्ता में डूबी रहीं।
श्लोक 65 (2.101.65)
राजा च धृतराष्ट्रस्तु पुत्राणामनयं तदा । ध्यायन्नुद्विग्नहृदयो न शान्तिमधिजग्मिवान् ॥
rājā ca dhṛtarāṣṭrastu putrāṇāmanayaṃ tadā | dhyāyannudvignahṛdayo na śāntimadhijagmivān
राजा धृतराष्ट्र भी उस समय अपने पुत्रों के अन्याय पर विचार करते हुए उद्विग्न हृदय से किसी प्रकार शान्ति न पा सके।
श्लोक 66 (2.101.66)
स चिन्तयन्ननेकाग्रः शोकव्याकुलचेतनः । क्षत्तुः सम्प्रेषयामास शीघ्रमागम्यतामिति ॥
sa cintayannanekāgraḥ śokavyākulacetanaḥ | kṣattuḥ sampreṣayāmāsa śīghramāgamyatāmiti
चिन्ता में डूबे, शोक से व्याकुल चित्त वाले उन्होंने विदुर के पास संदेश भेजा कि "वे शीघ्र आएँ।"
श्लोक 67 (2.101.67)
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । तं पर्यपृच्छत्संविग्नो धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥
tato jagāma viduro dhṛtarāṣṭraniveśanam | taṃ paryapṛcchatsaṃvigno dhṛtarāṣṭro janādhipaḥ
तब विदुर धृतराष्ट्र के महल में गए, और प्रजापालक धृतराष्ट्र ने अत्यन्त उद्विग्न होकर उनसे पूछा।