सभा पर्व · अध्याय 100
युधिष्ठिर की विदा और विदुर का उपदेश
युधिष्ठिर बड़ों और समस्त कुरुसभा से विदा माँगते हैं; लज्जा के कारण कोई कुछ बोल नहीं पाता। विदुर कुन्ती को अपने घर में रखते हैं और युधिष्ठिर को ढाढ़स बँधाते हैं कि अधर्म से मिली हार पर शोक नहीं करना चाहिए। वे उन्हें उन ऋषियों का स्मरण कराते हैं जिनसे उन्होंने शिक्षा पाई है और देवताओं तथा पंचभूतों से उनके अपने-अपने गुण ग्रहण करने को कहते हैं। युधिष्ठिर भीष्म और द्रोण को प्रणाम करके चल पड़ते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (2.100.1)
आमन्त्रयामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् । राजानं सोमदत्तं च महाराजं च बाह्लिकम् ॥
āmantrayāmi bharatāṃstathā vṛddhaṃ pitāmaham | rājānaṃ somadattaṃ ca mahārājaṃ ca bāhlikam
मैं भरतवंशियों से, वृद्ध पितामह से, राजा सोमदत्त से और महाराज बाह्लीक से विदा माँगता हूँ;
श्लोक 2 (2.100.2)
द्रोणं कृपं नृपांश्चान्यानश्वत्थामानमेव च । विदुरं धृतराष्ट्रं च धार्तराष्ट्रांश्च सर्वशः ॥
droṇaṃ kṛpaṃ nṛpāṃścānyānaśvatthāmānameva ca | viduraṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca dhārtarāṣṭrāṃśca sarvaśaḥ
द्रोण, कृप, अन्य राजाओं और अश्वत्थामा से, विदुर, धृतराष्ट्र और धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों से;
श्लोक 3 (2.100.3)
सौमदत्तिं महावीर्यं विकर्णं च महामतिम् । युयुत्सुं सञ्जयं चैव तथैवान्यान्सभासदः ॥
saumadattiṃ mahāvīryaṃ vikarṇaṃ ca mahāmatim | yuyutsuṃ sañjayaṃ caiva tathaivānyānsabhāsadaḥ
सोमदत्त के महापराक्रमी पुत्र से, महाबुद्धिमान विकर्ण से, युयुत्सु और संजय से तथा अन्य सभासदों से भी;
श्लोक 4 (2.100.4)
गान्धारीं च महाभागां मातरं च तथा पृथाम् । सर्वानामन्त्र्य गच्छामि द्रष्टाऽस्मि पुनरेत्य वः ॥
gāndhārīṃ ca mahābhāgāṃ mātaraṃ ca tathā pṛthām | sarvānāmantrya gacchāmi draṣṭā'smi punaretya vaḥ
महाभागा गान्धारी से और अपनी माता पृथा से भी। आप सबसे विदा लेकर मैं जाता हूँ; लौटकर फिर आपके दर्शन करूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (2.100.5)
न च किञ्चिदथोचुस्तं ह्रियाऽऽसन्ना युधिष्ठिरम् । मनोभिरेव कल्याणं दध्युस्ते तस्य धीमतः ॥
na ca kiñcidathocustaṃ hriyā''sannā yudhiṣṭhiram | manobhireva kalyāṇaṃ dadhyuste tasya dhīmataḥ
लज्जा से दबे हुए वे उस समय युधिष्ठिर से कुछ भी न कह सके; केवल मन-ही-मन उन्होंने उस बुद्धिमान का कल्याण चाहा।
विदुर उवाच
श्लोक 6 (2.100.6)
आर्या पृथा राजपुत्री नारण्यं गन्तुमर्हति । सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता ॥
āryā pṛthā rājaputrī nāraṇyaṃ gantumarhati | sukumārī ca vṛddhā ca nityaṃ caiva sukhocitā
आर्या पृथा राजपुत्री हैं; उन्हें वन नहीं जाना चाहिए। वे सुकुमार हैं, वृद्ध हैं और सदा सुख में ही रही हैं।
श्लोक 7 (2.100.7)
इह वत्स्यति कल्याणी सत्कृता मम वेश्मनि । इति पार्था विजानीध्वमगदं वोऽस्तु सर्वशः ॥
iha vatsyati kalyāṇī satkṛtā mama veśmani | iti pārthā vijānīdhvamagadaṃ vo'stu sarvaśaḥ
वे कल्याणी मेरे घर में सम्मान के साथ रहेंगी। हे पार्थो, यह जान लो; तुम सब हर प्रकार से सकुशल रहो।
पाण्डवा ऊचुः
श्लोक 8 (2.100.8)
तथेत्युक्त्वाऽब्रुवन्सर्वे यथा नो वदसेऽनघ । त्वं पितृव्यः पितृसमो वयं च त्वत्परायणाः ॥
tathetyuktvā'bruvansarve yathā no vadase'nagha | tvaṃ pitṛvyaḥ pitṛsamo vayaṃ ca tvatparāyaṇāḥ
"ऐसा ही हो" कहकर उन सबने उत्तर दिया: "हे निष्पाप, जैसा आप हमसे कहते हैं, वैसा ही होगा। आप हमारे चाचा हैं, पिता के समान हैं, और हम आपके ही आश्रित हैं।
श्लोक 9 (2.100.9)
यथाऽऽज्ञापयसे विद्वंस्त्वं हि नः परमो गुरुः । यच्चान्यदपि कर्तव्यं तद्विधत्स्व महामते ॥
yathā''jñāpayase vidvaṃstvaṃ hi naḥ paramo guruḥ | yaccānyadapi kartavyaṃ tadvidhatsva mahāmate
हे विद्वन्, जैसी आप आज्ञा देंगे वैसा ही करेंगे, क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। हे महामते, और जो कुछ भी करना हो, उसकी व्यवस्था आप ही करें।"
विदुर उवाच
श्लोक 10 (2.100.10)
युधिष्ठिर विजानीहि ममेदं भरतर्षभ । नाधर्मेण जितः कश्चिद्व्यथते वै पराजये ॥
yudhiṣṭhira vijānīhi mamedaṃ bharatarṣabha | nādharmeṇa jitaḥ kaścidvyathate vai parājaye
हे भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर, मेरी यह बात समझ लो: जो अधर्म से जीता गया हो, उसे अपनी पराजय पर दुःखी नहीं होना चाहिए।
श्लोक 11 (2.100.11)
त्वं वै धर्मं विजानीषे युद्धे जेता धनञ्जयः । हन्ताऽरीणां भीमसेनो नकुलस्त्वर्थसङ्ग्रही ॥
tvaṃ vai dharmaṃ vijānīṣe yuddhe jetā dhanañjayaḥ | hantā'rīṇāṃ bhīmaseno nakulastvarthasaṅgrahī
तुम धर्म को जानते हो; धनञ्जय युद्ध में विजयी हैं; भीमसेन शत्रुओं का संहार करने वाले हैं; नकुल धन का संग्रह करने वाले हैं;
श्लोक 12 (2.100.12)
संयन्ता सहदेवस्तु धौम्यो ब्रह्मविदुत्तमः । धर्मार्थकुशला चैव द्रौपदी धर्मचारिणी ॥
saṃyantā sahadevastu dhaumyo brahmaviduttamaḥ | dharmārthakuśalā caiva draupadī dharmacāriṇī
सहदेव अनुशासन रखने वाले हैं; धौम्य ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं; और धर्म का आचरण करने वाली द्रौपदी धर्म और अर्थ दोनों में कुशल हैं।
श्लोक 13 (2.100.13)
अन्योन्यस्य प्रियाः सर्वे तथैव प्रियदर्शनाः । परैरभेद्याः सन्तुष्टाः को वो न स्पृहयेदिह ॥
anyonyasya priyāḥ sarve tathaiva priyadarśanāḥ | parairabhedyāḥ santuṣṭāḥ ko vo na spṛhayediha
तुम सब एक-दूसरे के प्रिय हो और देखने में भी प्रिय लगते हो; शत्रु तुममें फूट नहीं डाल सकते और तुम संतुष्ट रहते हो। यहाँ कौन तुमसे ईर्ष्या न करेगा?
श्लोक 14 (2.100.14)
एष वै सर्वकल्याणः समाधिस्तव भारत । नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोऽप्युत ॥
eṣa vai sarvakalyāṇaḥ samādhistava bhārata | nainaṃ śatrurviṣahate śakreṇāpi samo'pyuta
हे भारत, तुम्हारा यह आत्मसंयम सब प्रकार के कल्याण का मूल है। कोई शत्रु, चाहे वह इन्द्र के समान ही क्यों न हो, इसे नहीं सह सकता।
श्लोक 15 (2.100.15)
हिमवत्यनुशिष्टोऽसि मेरुसावर्णिना पुरा । द्वैपायनेन कृष्णेन नगरे वारणावते ॥
himavatyanuśiṣṭo'si merusāvarṇinā purā | dvaipāyanena kṛṣṇena nagare vāraṇāvate
पूर्वकाल में हिमालय पर मेरुसावर्णि ने और वारणावत नगर में कृष्ण द्वैपायन ने तुम्हें उपदेश दिया है;
श्लोक 16 (2.100.16)
भृगुतुङ्गे च रामेण दृषद्वत्यां च शम्भुना । अश्रौषीरसितस्यापि महर्षेरञ्जनं प्रति ॥
bhṛgutuṅge ca rāmeṇa dṛṣadvatyāṃ ca śambhunā | aśrauṣīrasitasyāpi maharṣerañjanaṃ prati
भृगुतुंग पर परशुराम ने और दृषद्वती के तट पर शम्भु ने भी; और अंजन पर्वत के पास तुमने महर्षि असित के वचन भी सुने हैं।
श्लोक 17 (2.100.17)
कल्माषीतीरसंस्थस्य गतस्त्वं शिष्यतां भृगोः । द्रष्टा सदा नारदस्ते धौम्यस्तेऽयं पुरोहितः ॥
kalmāṣītīrasaṃsthasya gatastvaṃ śiṣyatāṃ bhṛgoḥ | draṣṭā sadā nāradaste dhaumyaste'yaṃ purohitaḥ
कल्माषी नदी के तट पर रहने वाले भृगु के तुम शिष्य बने; नारद सदा तुम पर दृष्टि रखते हैं और ये धौम्य तुम्हारे पुरोहित हैं।
श्लोक 18 (2.100.18)
माहासीः साम्पराये त्वं बुद्धिं तामृषिपूजिताम् । पुरूरवसमैलं त्वं बुद्ध्या जयसि पाण्डव ॥
māhāsīḥ sāmparāye tvaṃ buddhiṃ tāmṛṣipūjitām | purūravasamailaṃ tvaṃ buddhyā jayasi pāṇḍava
परलोक को ध्यान में रखते हुए ऋषियों द्वारा पूजित उस बुद्धि को मत छोड़ना। हे पाण्डव, बुद्धि में तुम इलापुत्र पुरूरवा से भी बढ़कर हो;
श्लोक 19 (2.100.19)
शक्त्या जयसि राज्ञोऽन्यानृषीन्धर्मोपसेवया । ऐन्द्रे जये धृतमना याम्ये कोपविधारणे ॥
śaktyā jayasi rājño'nyānṛṣīndharmopasevayā | aindre jaye dhṛtamanā yāmye kopavidhāraṇe
शक्ति में तुम अन्य राजाओं से और धर्म की सेवा में ऋषियों से भी आगे हो। विजय में इन्द्र की भाँति और क्रोध को रोकने में यम की भाँति मन को दृढ़ रखो;
श्लोक 20 (2.100.20)
तथा विसर्गे कौबेरे वारुणे चैव संयमे । आत्मप्रदानं सौम्यत्वमद्भ्यश्चैवोपजीवनम् ॥
tathā visarge kaubere vāruṇe caiva saṃyame | ātmapradānaṃ saumyatvamadbhyaścaivopajīvanam
दान में कुबेर की भाँति और संयम में वरुण की भाँति रहो। चन्द्रमा से आत्मदान और सौम्यता, और जल से दूसरों को जीवन देने का गुण ग्रहण करो;
श्लोक 21 (2.100.21)
भूमेः क्षमा च तेजश्च समग्रं सूर्यमण्डलात् । वायोर्बलं प्राप्नुहि त्वं भूतेभ्यश्चात्मसम्पदम् ॥
bhūmeḥ kṣamā ca tejaśca samagraṃ sūryamaṇḍalāt | vāyorbalaṃ prāpnuhi tvaṃ bhūtebhyaścātmasampadam
पृथ्वी से क्षमा, सूर्यमण्डल से सम्पूर्ण तेज, वायु से बल और पंचभूतों से आत्मबल प्राप्त करो।
श्लोक 22 (2.100.22)
अगदं वोऽस्तु भद्रं वो द्रष्टाऽस्मि पुनरागतान् । आपद्धर्मार्थकृच्छ्रेषु सर्वकार्येषु वा पुनः ॥
agadaṃ vo'stu bhadraṃ vo draṣṭā'smi punarāgatān | āpaddharmārthakṛcchreṣu sarvakāryeṣu vā punaḥ
तुम सब सकुशल रहो, तुम्हारा कल्याण हो; लौटने पर मैं तुम्हें देखूँगा। आपद्धर्म और अर्थ के संकटों में तथा सभी कार्यों में,
श्लोक 23 (2.100.23)
यथावत्प्रतिपद्येथाः काले काले युधिष्ठिर । आपृष्टोऽसीह कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारत ॥
yathāvatpratipadyethāḥ kāle kāle yudhiṣṭhira | āpṛṣṭo'sīha kaunteya svasti prāpnuhi bhārata
हे युधिष्ठिर, समय-समय पर उचित रीति से आचरण करना। हे कुन्तीनन्दन, मैं तुम्हें विदा देता हूँ; हे भारत, तुम्हारा मंगल हो।
श्लोक 24 (2.100.24)
कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामः पुनरागतम् । न हि वो वृजिनं किञ्चिद्वेद कश्चित्पुराकृतम् ॥
kṛtārthaṃ svastimantaṃ tvāṃ drakṣyāmaḥ punarāgatam | na hi vo vṛjinaṃ kiñcidveda kaścitpurākṛtam
हम तुम्हें कृतार्थ और सकुशल लौटा हुआ देखेंगे। क्योंकि तुम्हारा पहले किया हुआ कोई भी पाप किसी को ज्ञात नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (2.100.25)
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पाण्डवः सत्यविक्रमः । भीष्मद्रोणौ नमस्कृत्य प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥
evamuktastathetyuktvā pāṇḍavaḥ satyavikramaḥ | bhīṣmadroṇau namaskṛtya prātiṣṭhata yudhiṣṭhiraḥ
ऐसा कहे जाने पर सत्यपराक्रमी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने "ऐसा ही हो" कहा और भीष्म तथा द्रोण को प्रणाम करके प्रस्थान किया।