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सभा पर्व · अध्याय 99

दुःशासन के ताने और पाण्डवों की प्रतिज्ञाएँ

पराजित पाण्डव जब वन जाने के लिए मृगचर्म धारण करते हैं, तब दुःशासन उन्हें थोथे तिल कहकर चिढ़ाता है और द्रौपदी से कुरुओं में से कोई दूसरा पति चुनने को कहता है। भीम प्रतिज्ञा करते हैं कि वे गदा से दुर्योधन को मारेंगे और दुःशासन का रक्त पिएँगे; अर्जुन कर्ण के वध की, सहदेव शकुनि के वध की और नकुल धृतराष्ट्रपुत्रों के संहार की प्रतिज्ञा करते हैं। प्रतिज्ञाएँ करके सब भाई धृतराष्ट्र के पास जाते हैं।

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.99.1)

ततः पराजिताः पार्था वनावासाय दीक्षिताः । अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम् ॥

tataḥ parājitāḥ pārthā vanāvāsāya dīkṣitāḥ | ajinānyuttarīyāṇi jagṛhuśca yathākramam

तब पराजित पृथापुत्रों ने वनवास की दीक्षा लेकर क्रम से मृगचर्म को उत्तरीय के रूप में धारण किया।

श्लोक 2 (2.99.2)

अजिनैः संवृतान्दृष्ट्वा हृतराज्यानरिन्दमान् । प्रस्थितान्वनवासाय ततो दुःशासनोऽब्रवीत् ॥

ajinaiḥ saṃvṛtāndṛṣṭvā hṛtarājyānarindamān | prasthitānvanavāsāya tato duḥśāsano'bravīt

शत्रुओं का दमन करने वाले उन वीरों को, जिनका राज्य छिन चुका था, मृगचर्म ओढ़े वनवास के लिए निकलते देखकर दुःशासन बोला—

दुःशासन उवाच

श्लोक 3 (2.99.3)

प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्रं राज्ञो महात्मनः । पराजिताः पाण्डवेया विपत्तिं परमां गताः ॥

pravṛttaṃ dhārtarāṣṭrasya cakraṃ rājño mahātmanaḥ | parājitāḥ pāṇḍaveyā vipattiṃ paramāṃ gatāḥ

महात्मा राजा धृतराष्ट्रपुत्र (दुर्योधन) का शासनचक्र चल पड़ा है। पाण्डुपुत्र पराजित होकर घोर विपत्ति में पड़ गए हैं।

श्लोक 4 (2.99.4)

अद्य देवाः सम्प्रयाताः समैर्वर्त्मभिरस्थलैः । गुणज्येष्ठास्तथा श्रेष्ठाः श्रेयांसो यद्वयं परैः ॥

adya devāḥ samprayātāḥ samairvartmabhirasthalaiḥ | guṇajyeṣṭhāstathā śreṣṭhāḥ śreyāṃso yadvayaṃ paraiḥ

आज देवता समतल और निष्कण्टक मार्गों से हमारे पास आ पहुँचे हैं, क्योंकि गुणों में हम अपने शत्रुओं से ज्येष्ठ हैं, श्रेष्ठ हैं और बढ़कर हैं।

श्लोक 5 (2.99.5)

नरकं पातिताः पार्था दीर्घकालमनन्तकम् । सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥

narakaṃ pātitāḥ pārthā dīrghakālamanantakam | sukhācca hīnā rājyācca vinaṣṭāḥ śāśvatīḥ samāḥ

पृथा के पुत्र दीर्घ और अनन्त काल के लिए नरक में गिरा दिए गए हैं; सुख और राज्य दोनों से वंचित होकर वे सदा के लिए नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 6 (2.99.6)

धनेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान्प्रहासिषुः । ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवाः ॥

dhanena mattā ye te sma dhārtarāṣṭrānprahāsiṣuḥ | te nirjitā hṛtadhanā vanameṣyanti pāṇḍavāḥ

जो पाण्डव धन के मद में धृतराष्ट्रपुत्रों की हँसी उड़ाया करते थे, वे अब हारकर और धन गँवाकर वन को जाएँगे।

श्लोक 7 (2.99.7)

चित्रान्सन्नाहानवमुञ्चन्तु चैषां । वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति । विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे । यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेताः ॥

citrānsannāhānavamuñcantu caiṣāṃ | vāsāṃsi divyāni ca bhānumanti | vivāsyantāṃ rurucarmāṇi sarve | yathā glahaṃ saubalasyābhyupetāḥ

इनके रंग-बिरंगे कवच और चमचमाते दिव्य वस्त्र उतरवा लिए जाएँ, और जैसा सुबलपुत्र के दाँव को स्वीकार करने वालों के योग्य है, इन सबको रुरु मृग की खालें पहनाई जाएँ।

श्लोक 8 (2.99.8)

न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा । इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा । ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा । विपर्यये षण्ढतिला इवाफलाः ॥

na santi lokeṣu pumāṃsa īdṛśā | ityeva ye bhāvitabuddhayaḥ sadā | jñāsyanti te''tmānamime'dya pāṇḍavā | viparyaye ṣaṇḍhatilā ivāphalāḥ

जो सदा यही मानते रहे कि "संसार में हम जैसे पुरुष हैं ही नहीं", वे पाण्डव आज इस उलटफेर में अपने को पहचान लेंगे कि वे थोथे तिलों की तरह निष्फल हैं।

श्लोक 9 (2.99.9)

इदं हि वासो यदि वेदृशानां । मनस्विनां रौरवमाहवेषु । आदीक्षितानामजिनानि यद्व- । द्बलीयसां पश्यत पाण्डवानाम् ॥

idaṃ hi vāso yadi vedṛśānāṃ | manasvināṃ rauravamāhaveṣu | ādīkṣitānāmajināni yadva- | dbalīyasāṃ paśyata pāṇḍavānām

भला क्या ऐसे मनस्वी वीरों के लिए युद्धों में यही रुरु-चर्म का वस्त्र है? देखो, ये बलशाली पाण्डव यज्ञ की दीक्षा लिए हुए लोगों की तरह मृगचर्म ओढ़े हुए हैं!

श्लोक 10 (2.99.10)

महाप्राज्ञः सौमकिर्यज्ञसेनः । कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेभ्यः प्रदाय । अकार्षीद्वै सुकृतं नेह किञ्चित् । क्लीबाः पार्थाः पतयो याज्ञसेन्याः ॥

mahāprājñaḥ saumakiryajñasenaḥ | kanyāṃ pāñcālīṃ pāṇḍavebhyaḥ pradāya | akārṣīdvai sukṛtaṃ neha kiñcit | klībāḥ pārthāḥ patayo yājñasenyāḥ

महाबुद्धिमान सोमकवंशी यज्ञसेन ने अपनी पुत्री पाञ्चाली को पाण्डवों को देकर कोई भी पुण्य का काम नहीं किया। याज्ञसेनी के पति ये पार्थ तो नपुंसक हैं।

श्लोक 11 (2.99.11)

सूक्ष्मप्रावारानजिनोत्तरीयान् । दृष्ट्वाऽरण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् । कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि । पतिं वृणीष्वेह यमन्यमिच्छसि ॥

sūkṣmaprāvārānajinottarīyān | dṛṣṭvā'raṇye nirdhanānapratiṣṭhān | kāṃ tvaṃ prītiṃ lapsyase yājñaseni | patiṃ vṛṇīṣveha yamanyamicchasi

हे याज्ञसेनी, इन्हें वन में महीन चादरों की जगह मृगचर्म ओढ़े, निर्धन और बेघर देखकर तुम्हें इनसे क्या सुख मिलेगा? यहाँ जिसे चाहो, किसी दूसरे को पति चुन लो।

श्लोक 12 (2.99.12)

एते हि सर्वे कुरवः समेताः । क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः । एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे । न त्वां नयेत्कालविपर्ययोऽयम् ॥

ete hi sarve kuravaḥ sametāḥ | kṣāntā dāntāḥ sudraviṇopapannāḥ | eṣāṃ vṛṇīṣvaikatamaṃ patitve | na tvāṃ nayetkālaviparyayo'yam

यहाँ एकत्र ये सब कुरुवंशी क्षमाशील, संयमी और धन-सम्पन्न हैं। इनमें से किसी एक को पति चुन लो, ताकि समय का यह उलटफेर तुम्हें भी न ले डूबे।

श्लोक 13 (2.99.13)

यथाऽफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः । तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा अपि ॥

yathā'phalāḥ ṣaṇḍhatilā yathā carmamayā mṛgāḥ | tathaiva pāṇḍavāḥ sarve yathā kākayavā api

जैसे थोथे तिल निष्फल होते हैं, जैसे चमड़े के बने मृग होते हैं और जैसे दानों से रहित काकयव होते हैं, वैसे ही ये सारे पाण्डव हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (2.99.14)

किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य । मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य । एवं नृशंसः परुषाणि पार्था- । नश्रावयद्धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ॥

kiṃ pāṇḍavāṃste patitānupāsya | moghaḥ śramaḥ ṣaṇḍhatilānupāsya | evaṃ nṛśaṃsaḥ paruṣāṇi pārthā- | naśrāvayaddhṛtarāṣṭrasya putraḥ

"इन पतित पाण्डवों की सेवा से तुम्हें क्या मिलेगा? थोथे तिलों की उपासना व्यर्थ परिश्रम है।" इस प्रकार धृतराष्ट्र के उस क्रूर पुत्र ने पार्थों को कठोर वचन सुनाए।

श्लोक 15 (2.99.15)

तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी । निर्भर्त्स्योच्चैः सन्निगृह्यैव रोषात् । उवाच चैनं सहसैवोपगम्य । सिंहो यथा हैमवतः शृगालम् ॥

tadvai śrutvā bhīmaseno'tyamarṣī | nirbhartsyoccaiḥ sannigṛhyaiva roṣāt | uvāca cainaṃ sahasaivopagamya | siṃho yathā haimavataḥ śṛgālam

यह सुनकर अत्यन्त असहिष्णु भीमसेन ने ऊँचे स्वर में उसे फटकारा और क्रोध को किसी प्रकार रोककर, सहसा उसके पास जाकर उससे वैसे ही बोले जैसे हिमालय का सिंह किसी सियार से बोले।

भीमसेन उवाच

श्लोक 16 (2.99.16)

क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे । गान्धारविद्यया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे ॥

krūra pāpajanairjuṣṭamakṛtārthaṃ prabhāṣase | gāndhāravidyayā hi tvaṃ rājamadhye vikatthase

अरे क्रूर! तू वही निरर्थक बातें बक रहा है जो पापी लोगों को भाती हैं। गान्धारराज की विद्या के बल पर ही तू राजाओं के बीच डींग मार रहा है।

श्लोक 17 (2.99.17)

यथा तुदसि मर्माणि वाक्छरैरिह नो भृशम् । तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन्मर्माणि संयुगे ॥

yathā tudasi marmāṇi vākcharairiha no bhṛśam | tathā smārayitā te'haṃ kṛntanmarmāṇi saṃyuge

जैसे तू यहाँ वाणी के बाणों से हमारे मर्मों को बुरी तरह बेध रहा है, वैसे ही मैं युद्ध में तेरे मर्मों को काटते हुए तुझे इसकी याद दिलाऊँगा।

श्लोक 18 (2.99.18)

ये च त्वामनुवर्तन्ते क्रोधलोभवशानुगाः । गोप्तारः सानुबन्धांस्तान्नेताऽस्मि यमसादनम् ॥

ye ca tvāmanuvartante krodhalobhavaśānugāḥ | goptāraḥ sānubandhāṃstānnetā'smi yamasādanam

और जो क्रोध और लोभ के वश होकर तेरा अनुसरण करते हैं, तेरे उन रक्षकों को भी मैं उनके सगे-सम्बन्धियों सहित यमलोक पहुँचा दूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (2.99.19)

एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं । दुःशासनस्तं परिनृत्यति स्म । मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्गं । गौर्गौरिति स्माह्वयन्मुक्तलज्जः ॥

evaṃ bruvāṇamajinairvivāsitaṃ | duḥśāsanastaṃ parinṛtyati sma | madhye kurūṇāṃ dharmanibaddhamārgaṃ | gaurgauriti smāhvayanmuktalajjaḥ

मृगचर्म पहने भीमसेन जब ऐसा कह रहे थे, तब दुःशासन निर्लज्ज होकर कुरुओं के बीच धर्म की मर्यादा में बँधे उन भीम के चारों ओर नाचने लगा और "बैल! बैल!" कहकर उन्हें पुकारने लगा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 20 (2.99.20)

नृशंस परुषं वक्तुं शक्यं दुःशासन त्वया । निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकत्थितुमर्हति ॥

nṛśaṃsa paruṣaṃ vaktuṃ śakyaṃ duḥśāsana tvayā | nikṛtyā hi dhanaṃ labdhvā ko vikatthitumarhati

हे नृशंस दुःशासन! कठोर वचन बोलना तेरे लिए सहज है; पर छल से धन पाकर भला कौन डींग मारने का अधिकारी है?

श्लोक 21 (2.99.21)

मैव स्म सुकृतां लोकान्गच्छेत्पार्थो वृकोदरः । यदि वक्षो हि ते भित्त्वा न पिबेच्छोणितं रणे ॥

maiva sma sukṛtāṃ lokāngacchetpārtho vṛkodaraḥ | yadi vakṣo hi te bhittvā na pibecchoṇitaṃ raṇe

यदि युद्ध में तेरी छाती चीरकर पृथापुत्र वृकोदर तेरा रक्त न पिए, तो उसे पुण्यात्माओं के लोक कभी प्राप्त न हों!

श्लोक 22 (2.99.22)

धार्तराष्ट्रान्रणे हत्त्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् । शमं गन्ताऽस्मि नचिरात्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

dhārtarāṣṭrānraṇe hattvā miṣatāṃ sarvadhanvinām | śamaṃ gantā'smi nacirātsatyametadbravīmi te

सब धनुर्धरों के देखते-देखते मैं रण में धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर शीघ्र ही शान्ति पाऊँगा; यह मैं तुझसे सत्य कहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (2.99.23)

तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं । दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् । गतिं स्वगत्याऽनुचकार मन्दो । निर्गच्छतां पाण्डवानां सभायाः ॥

tasya rājā siṃhagateḥ sakhelaṃ | duryodhano bhīmasenasya harṣāt | gatiṃ svagatyā'nucakāra mando | nirgacchatāṃ pāṇḍavānāṃ sabhāyāḥ

जब पाण्डव सभा से निकल रहे थे, तब मूर्ख राजा दुर्योधन हर्ष में भरकर सिंह जैसी चाल वाले भीमसेन की चाल की अपनी चाल से खिल्ली उड़ाते हुए नकल करने लगा।

श्लोक 24 (2.99.24)

नैतावता कृतमित्यब्रवीत्तं । वृकोदरः सन्निवृत्तार्धकायः । शीघ्रं हि त्वां निहतं सानुबन्धं । संस्मार्याहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ ॥

naitāvatā kṛtamityabravīttaṃ | vṛkodaraḥ sannivṛttārdhakāyaḥ | śīghraṃ hi tvāṃ nihataṃ sānubandhaṃ | saṃsmāryāhaṃ prativakṣyāmi mūḍha

वृकोदर ने आधा शरीर पीछे मोड़कर उससे कहा, "इतने से कुछ नहीं होता। मूर्ख! शीघ्र ही तुझे तेरे बन्धु-बान्धवों सहित मारकर और यह सब याद दिलाकर मैं तुझे इसका उत्तर दूँगा।"

श्लोक 25 (2.99.25)

एवं समीक्ष्यात्मनि चावमानं । नियम्य मन्युं बलवान्स मानी । राजानुगः संसदि कौरवाणां । विनिष्क्रामन्वाक्यमुवाच भीमः ॥

evaṃ samīkṣyātmani cāvamānaṃ | niyamya manyuṃ balavānsa mānī | rājānugaḥ saṃsadi kauravāṇāṃ | viniṣkrāmanvākyamuvāca bhīmaḥ

इस प्रकार अपने अपमान को देखकर बलवान और स्वाभिमानी भीम ने अपने क्रोध को रोका और राजा के पीछे-पीछे कौरवों की सभा से निकलते हुए यह वचन कहा—

भीमसेन उवाच

श्लोक 26 (2.99.26)

अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनञ्जयः । शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति ॥

ahaṃ duryodhanaṃ hantā karṇaṃ hantā dhanañjayaḥ | śakuniṃ cākṣakitavaṃ sahadevo haniṣyati

मैं दुर्योधन को मारूँगा, धनञ्जय कर्ण को मारेंगे और सहदेव पासों के उस धूर्त शकुनि का वध करेंगे।

श्लोक 27 (2.99.27)

इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद्वचः । सत्यं देवाः करिष्यन्ति यन्नो युद्धं भविष्यति ॥

idaṃ ca bhūyo vakṣyāmi sabhāmadhye bṛhadvacaḥ | satyaṃ devāḥ kariṣyanti yanno yuddhaṃ bhaviṣyati

और सभा के बीच मैं यह बड़ी बात फिर कहता हूँ: जब हमारा युद्ध होगा, तब देवता इसे सत्य कर दिखाएँगे।

श्लोक 28 (2.99.28)

सुयोधनमिमं पापं हन्ताऽस्मि गदया युधि । शिरः पादेन चास्याहमधिष्ठास्यामि भूतले ॥

suyodhanamimaṃ pāpaṃ hantā'smi gadayā yudhi | śiraḥ pādena cāsyāhamadhiṣṭhāsyāmi bhūtale

इस पापी सुयोधन को मैं युद्ध में गदा से मारूँगा और धरती पर पड़े उसके सिर पर पैर रखूँगा।

श्लोक 29 (2.99.29)

वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः । दुःशासनस्य रुधिरं पाताऽस्मि मृगराडिव ॥

vākyaśūrasya caivāsya paruṣasya durātmanaḥ | duḥśāsanasya rudhiraṃ pātā'smi mṛgarāḍiva

और बातों के इस शूर, कठोरभाषी, दुष्टात्मा दुःशासन का रक्त मैं सिंह की तरह पिऊँगा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 30 (2.99.30)

भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया त्विह । मत्ता मृगेषु सुखिनो न बुद्ध्यन्ते महद्भयम् ॥

bhīmasena na te santi yeṣāṃ vairaṃ tvayā tviha | mattā mṛgeṣu sukhino na buddhyante mahadbhayam

भीमसेन! जिनसे तुम्हारा यह वैर है, उन्हें अब रहा ही मत समझो। मतवाले और सुख में डूबे वे लापरवाह मृगों की भाँति इस महान भय को नहीं समझ पा रहे।

श्लोक 31 (2.99.31)

नैवं वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् । इतश्चतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद्भविष्यति ॥

naivaṃ vācā vyavasitaṃ bhīma vijñāyate satām | itaścaturdaśe varṣe draṣṭāro yadbhaviṣyati

भीम! सज्जनों का निश्चय केवल वाणी से नहीं जाना जाता। आज से चौदहवें वर्ष में लोग देखेंगे कि क्या होता है।

भीमसेन उवाच

श्लोक 32 (2.99.32)

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥

duryodhanasya karṇasya śakuneśca durātmanaḥ | duḥśāsanacaturthānāṃ bhūmiḥ pāsyati śoṇitam

दुर्योधन, कर्ण, दुष्टात्मा शकुनि और चौथे दुःशासन का रक्त धरती पिएगी।

अर्जुन उवाच

श्लोक 33 (2.99.33)

असूयितारं द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम् । भीमसेन नियोगात्ते हन्ताहं कर्णमाहवे ॥

asūyitāraṃ draṣṭāraṃ pravaktāraṃ vikatthanam | bhīmasena niyogātte hantāhaṃ karṇamāhave

भीमसेन! तुम्हारी आज्ञा से मैं युद्ध में उस कर्ण को मारूँगा जो ईर्ष्यालु है, तमाशा देखने वाला है, बढ़-चढ़कर बोलने वाला और डींग हाँकने वाला है।

श्लोक 34 (2.99.34)

अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया । कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्ताऽस्मि पत्रिभिः ॥

arjunaḥ pratijānīte bhīmasya priyakāmyayā | karṇaṃ karṇānugāṃścaiva raṇe hantā'smi patribhiḥ

भीम को प्रसन्न करने के लिए अर्जुन प्रतिज्ञा करता है कि वह युद्ध में कर्ण और कर्ण के अनुयायियों को बाणों से मार डालेगा।

श्लोक 35 (2.99.35)

ये चान्ये प्रतियोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः । तांश्च सर्वानहं बाणैर्नेताऽस्मि यमसादनम् ॥

ye cānye pratiyotsyanti buddhimohena māṃ nṛpāḥ | tāṃśca sarvānahaṃ bāṇairnetā'smi yamasādanam

और जो दूसरे राजा मोहवश मुझसे लड़ेंगे, उन सबको भी मैं अपने बाणों से यमलोक भेज दूँगा।

श्लोक 36 (2.99.36)

चलेद्धि हिमवान्स्थानान्निष्प्रभः स्याद्दिवाकरः । शैत्यं सोमात्प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद्यदि ॥

caleddhi himavānsthānānniṣprabhaḥ syāddivākaraḥ | śaityaṃ somātpraṇaśyeta matsatyaṃ vicaledyadi

यदि मेरा सत्य डिगे, तो हिमालय अपने स्थान से हिल जाए, सूर्य प्रभाहीन हो जाए और चन्द्रमा से शीतलता मिट जाए।

श्लोक 37 (2.99.37)

न प्रदास्यति चेद्राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे । दुर्योधनोऽभिसत्कृत्य सत्यमेतद्भविष्यति ॥

na pradāsyati cedrājyamito varṣe caturdaśe | duryodhano'bhisatkṛtya satyametadbhaviṣyati

यदि आज से चौदहवें वर्ष में दुर्योधन सत्कारपूर्वक राज्य नहीं लौटाएगा, तो यह सब सत्य होकर रहेगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (2.99.38)

इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान्माद्रवतीसुतः । प्रगृह्य विपुलं बाहुं सहदेवः प्रतापवान् ॥

ityuktavati pārthe tu śrīmānmādravatīsutaḥ | pragṛhya vipulaṃ bāhuṃ sahadevaḥ pratāpavān

पार्थ के ऐसा कहने पर माद्री के तेजस्वी और प्रतापी पुत्र सहदेव ने अपनी विशाल भुजा उठाई

श्लोक 39 (2.99.39)

सौबलस्य वधं प्रेप्सुरिदं वचनमब्रवीत् । क्रोधसंरक्तनयनो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥

saubalasya vadhaṃ prepsuridaṃ vacanamabravīt | krodhasaṃraktanayano niḥśvasanniva pannagaḥ

और सुबलपुत्र के वध की इच्छा से, क्रोध से लाल आँखें किए, साँप की तरह फुफकारते हुए यह वचन कहा—

सहदेव उवाच

श्लोक 40 (2.99.40)

अक्षान्यान्मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर । नैतेऽक्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृताः ॥

akṣānyānmanyase mūḍha gāndhārāṇāṃ yaśohara | naite'kṣā niśitā bāṇāstvayaite samare vṛtāḥ

अरे मूर्ख, गान्धारों के यश को मिटाने वाले! जिन्हें तू पासे समझ रहा है, वे पासे नहीं, तीखे बाण हैं, जिन्हें तूने युद्ध के लिए चुन लिया है।

श्लोक 41 (2.99.41)

यथा चैवोक्तवान्भीमस्त्वामुद्दिश्य सबान्धवम् । कर्ताहं कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वशः ॥

yathā caivoktavānbhīmastvāmuddiśya sabāndhavam | kartāhaṃ karmaṇastasya kuru kāryāṇi sarvaśaḥ

भीम ने तुझे और तेरे बन्धुओं को लक्ष्य करके जैसा कहा है, वह काम मैं पूरा करूँगा। तू अपनी सारी तैयारियाँ कर ले।

श्लोक 42 (2.99.42)

हन्ताऽस्मि तरसा युद्धे त्वामेवेह सबान्धवम् । यदि स्थास्यसि सङ्ग्रामे क्षत्रधर्मेण सौबल ॥

hantā'smi tarasā yuddhe tvāmeveha sabāndhavam | yadi sthāsyasi saṅgrāme kṣatradharmeṇa saubala

हे सौबल! यदि तू क्षत्रिय-धर्म के अनुसार संग्राम में डटा रहा, तो मैं युद्ध में वेग से तुझे ही तेरे बन्धुओं सहित यहीं मार डालूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (2.99.43)

सहदेववचः श्रुत्वा नकुलोऽपि विशाम्पते । दर्शनीयतमो नॄणामिदं वचनमब्रवीत् ॥

sahadevavacaḥ śrutvā nakulo'pi viśāmpate | darśanīyatamo nṝṇāmidaṃ vacanamabravīt

हे प्रजानाथ! सहदेव के वचन सुनकर मनुष्यों में सबसे दर्शनीय नकुल ने भी यह वचन कहा—

नकुल उवाच

श्लोक 44 (2.99.44)

सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन्धृतराष्ट्रजैः । यैर्वाचः श्राविता रूक्षाः स्थितैर्दुर्योधनप्रिये ॥

suteyaṃ yajñasenasya dyūte'smindhṛtarāṣṭrajaiḥ | yairvācaḥ śrāvitā rūkṣāḥ sthitairduryodhanapriye

जिन धृतराष्ट्रपुत्रों ने इस द्यूत में खड़े रहकर दुर्योधन का प्रिय करने के लिए यज्ञसेन की इस पुत्री को रूखे वचन सुनाए,

श्लोक 45 (2.99.45)

तान्धार्तराष्ट्रान्दुर्वृत्तान्मुमूर्षून्कालनोदितान् । गमयिष्यामि भूयिष्ठानहं वैवस्वतक्षयम् ॥

tāndhārtarāṣṭrāndurvṛttānmumūrṣūnkālanoditān | gamayiṣyāmi bhūyiṣṭhānahaṃ vaivasvatakṣayam

उन दुराचारी, मरने को उतावले और काल से प्रेरित धृतराष्ट्रपुत्रों में से अधिकांश को मैं यमराज के धाम भेज दूँगा।

श्लोक 46 (2.99.46)

उलूकं च दुरात्मानं सौबलस्य सुतं प्रियम् । क्रूरं हन्ताऽस्मि समरे तं वै क्रूरं नराधमम् ॥

ulūkaṃ ca durātmānaṃ saubalasya sutaṃ priyam | krūraṃ hantā'smi samare taṃ vai krūraṃ narādhamam

और सुबलपुत्र शकुनि के उस प्रिय पुत्र, दुष्टात्मा, क्रूर और नराधम उलूक को मैं युद्ध में मार डालूँगा।

श्लोक 47 (2.99.47)

निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् । निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्ताऽस्मि नचिरादिव ॥

nideśāddharmarājasya draupadyāḥ padavīṃ caran | nirdhārtarāṣṭrāṃ pṛthivīṃ kartā'smi nacirādiva

धर्मराज की आज्ञा से और द्रौपदी के मार्ग पर चलते हुए मैं शीघ्र ही पृथ्वी को धृतराष्ट्रपुत्रों से रहित कर दूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (2.99.48)

एवं ते पुरुषव्याघ्राः सर्वे व्यायतबाहवः । प्रतिज्ञा बहुलाः कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन् ॥

evaṃ te puruṣavyāghrāḥ sarve vyāyatabāhavaḥ | pratijñā bahulāḥ kṛtvā dhṛtarāṣṭramupāgaman

इस प्रकार अनेक प्रतिज्ञाएँ करके वे सभी लंबी भुजाओं वाले पुरुषसिंह धृतराष्ट्र के पास गए।

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