सभा पर्व · अध्याय 98
अनुद्यूत: वनवास की बाज़ी पर युधिष्ठिर की हार
प्रातिकामी मार्ग में युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र का बुलावा सुनाता है, और युधिष्ठिर यह कहकर कि विधाता के विधान से कोई नहीं बचता, भाइयों के साथ सभा में लौट आते हैं। शकुनि एक ही दाँव रखता है: हारने वाले बारह वर्ष मृगचर्म पहनकर वन में रहेंगे और तेरहवाँ वर्ष अज्ञात रहकर बिताएँगे, पहचाने जाने पर फिर से वनवास करेंगे। सभासद व्याकुल होकर पुकार उठते हैं और सब बड़े उन्हें रोकते हैं, पर कलि से आविष्ट-से युधिष्ठिर दाँव स्वीकार कर लेते हैं; शकुनि पासा फेंककर घोषणा करता है कि वह जीत गया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.98.1)
ततो व्यध्वगतं पार्थं प्रातिकामी युधिष्ठिरम् । उवाच वचनाद्राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥
tato vyadhvagataṃ pārthaṃ prātikāmī yudhiṣṭhiram | uvāca vacanādrājño dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ
तब बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र के कहने पर प्रातिकामी ने मार्ग में दूर तक जा चुके पार्थ युधिष्ठिर से कहा —
प्रातिकाम्युवाच
श्लोक 2 (2.98.2)
उपास्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिर । एहि पाण्डव दीव्येति पिता त्वाह नराधिपः ॥
upāstīrṇā sabhā rājannakṣānuptvā yudhiṣṭhira | ehi pāṇḍava dīvyeti pitā tvāha narādhipaḥ
"हे राजन् युधिष्ठिर, सभा बिछ गई है और पासे डाल दिए गए हैं। आपके पिता नरेश कहते हैं — 'आओ पाण्डव, खेलो।'"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (2.98.3)
धातुर्नियोगाद्भूतानि प्राप्नुवन्ति शुभाशुभम् । न निवृत्तिस्तयोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि ॥
dhāturniyogādbhūtāni prāpnuvanti śubhāśubham | na nivṛttistayorasti devitavyaṃ punaryadi
विधाता के विधान से ही प्राणी शुभ और अशुभ पाते हैं; उनसे छुटकारा नहीं है। यदि फिर से खेलना ही है, तो खेलूँगा।
श्लोक 4 (2.98.4)
अक्षद्यूते समाह्वानं नियोगात्स्थविरस्य च । जानन्नपि क्षयकरं नातिक्रमितुमुत्सहे ॥
akṣadyūte samāhvānaṃ niyogātsthavirasya ca | jānannapi kṣayakaraṃ nātikramitumutsahe
जुए का बुलावा है, और वह भी वृद्ध राजा की आज्ञा से; यह जानते हुए भी कि यह विनाशकारी है, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (2.98.5)
असम्भवो हेममयस्य जन्तो- । स्तथापि रामो लुलुभे मृगाय । प्रायः समासन्नपराभवाणां । धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति ॥
asambhavo hemamayasya janto- | stathāpi rāmo lulubhe mṛgāya | prāyaḥ samāsannaparābhavāṇāṃ | dhiyo viparyastatarā bhavanti
सोने का मृग असम्भव है, फिर भी राम मृग के लोभ में पड़ गए। प्रायः जिनकी पराजय निकट होती है, उनकी बुद्धि उलटी हो जाती है।
श्लोक 6 (2.98.6)
इति ब्रुवन्निववृते भ्रातृभिः सह पाण्डवः । जानंश्च शकुनेर्मायां पार्थो द्यूतमियात्पुनः ॥
iti bruvannivavṛte bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaḥ | jānaṃśca śakunermāyāṃ pārtho dyūtamiyātpunaḥ
ऐसा कहकर पाण्डव भाइयों के साथ लौट पड़े; और शकुनि की माया को जानते हुए भी पार्थ फिर जुए के लिए गए।
श्लोक 7 (2.98.7)
विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथाः । व्यथयन्ति स्म चेतांसि सुहृदां भरतर्षभाः ॥
viviśuste sabhāṃ tāṃ tu punareva mahārathāḥ | vyathayanti sma cetāṃsi suhṛdāṃ bharatarṣabhāḥ
वे महारथी भरतश्रेष्ठ फिर उसी सभा में प्रविष्ट हुए, और उन्होंने अपने सुहृदों के हृदय व्यथित कर दिए।
श्लोक 8 (2.98.8)
यथोपजोषमासीनाः पुनर्द्यूतप्रवृत्तये । सर्वलोकविनाशाय दैवेनोपनिपीडिताः ॥
yathopajoṣamāsīnāḥ punardyūtapravṛttaye | sarvalokavināśāya daivenopanipīḍitāḥ
वे फिर से जुआ आरम्भ करने के लिए यथास्थान बैठ गए — दैव से प्रेरित, समस्त लोक के विनाश की ओर।
शकुनिरुवाच
श्लोक 9 (2.98.9)
अमुञ्चत्स्थविरो यद्वो धनं पूजितमेव तत् । महाधनं ग्लहं त्वेकं शृणु भो भरतर्षभ ॥
amuñcatsthaviro yadvo dhanaṃ pūjitameva tat | mahādhanaṃ glahaṃ tvekaṃ śṛṇu bho bharatarṣabha
वृद्ध राजा ने तुम्हारा जो धन छोड़ दिया, वह तुम्हारा ही माना गया। पर हे भरतश्रेष्ठ, एक बड़े मूल्य वाला दाँव सुनो।
श्लोक 10 (2.98.10)
वयं वा द्वादशाब्दानि युष्माभिर्द्यूतनिर्जिताः । प्रविशेम महारण्यं रौरवाजिनवाससः ॥
vayaṃ vā dvādaśābdāni yuṣmābhirdyūtanirjitāḥ | praviśema mahāraṇyaṃ rauravājinavāsasaḥ
या तो हम, तुमसे जुए में हारकर, रुरु मृग की खाल पहनकर बारह वर्ष के लिए महावन में प्रवेश करें,
श्लोक 11 (2.98.11)
त्रयोदशं च स्वजनैरज्ञाताः परिवत्सरम् । ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥
trayodaśaṃ ca svajanairajñātāḥ parivatsaram | jñātāśca punaranyāni vane varṣāṇi dvādaśa
और तेरहवाँ वर्ष अपने लोगों से अज्ञात रहकर बिताएँ, और पहचाने जाने पर फिर से बारह वर्ष वन में रहें;
श्लोक 12 (2.98.12)
अस्माभिर्निर्जिता यूयं वने द्वादश वत्सरान् । वसध्वं कृष्णया सार्धमजिनैः प्रतिवासिताः ॥
asmābhirnirjitā yūyaṃ vane dvādaśa vatsarān | vasadhvaṃ kṛṣṇayā sārdhamajinaiḥ prativāsitāḥ
या तुम, हमसे हारकर, मृगचर्म पहनकर कृष्णा (द्रौपदी) के साथ बारह वर्ष वन में रहो,
श्लोक 13 (2.98.13)
त्रयोदशं च स्वजनैरज्ञाताः परिवत्सरम् । ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥
trayodaśaṃ ca svajanairajñātāḥ parivatsaram | jñātāśca punaranyāni vane varṣāṇi dvādaśa
और तेरहवाँ वर्ष अपने लोगों से अज्ञात रहकर बिताओ, और पहचाने जाने पर फिर से बारह वर्ष वन में रहो।
श्लोक 14 (2.98.14)
त्रयोदशे च निर्वृत्ते पुनरेव यथोचितम् । स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथवेतरैः ॥
trayodaśe ca nirvṛtte punareva yathocitam | svarājyaṃ pratipattavyamitarairathavetaraiḥ
तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर, एक पक्ष हो या दूसरा, उसे यथोचित रूप से अपना राज्य फिर प्राप्त होगा।
श्लोक 15 (2.98.15)
अनेन व्यवसायेन सहास्माभिर्युधिष्ठिर । अक्षानुप्त्वा पुनर्द्यूतमेहि दीव्यस्व भारत ॥
anena vyavasāyena sahāsmābhiryudhiṣṭhira | akṣānuptvā punardyūtamehi dīvyasva bhārata
हे युधिष्ठिर, हे भारत, इसी निश्चय के साथ आओ, पासे डालकर हमारे साथ फिर से खेलो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (2.98.16)
अथ सभ्याः सभामध्ये समुच्छ्रितकरास्तदा । ऊचुरुद्विग्नमनसः संवेगात्सर्व एव हि ॥
atha sabhyāḥ sabhāmadhye samucchritakarāstadā | ūcurudvignamanasaḥ saṃvegātsarva eva hi
तब सभा के बीच बैठे सभासदों ने हाथ उठाए, और व्याकुल मन से अत्यन्त उद्वेग में सब एक साथ बोल उठे —
सभ्या ऊचुः
श्लोक 17 (2.98.17)
अहो धिग्बान्धवा नैनं बोधयन्ति महद्भयम् । बुद्ध्या बुद्ध्येन्न वा बुद्ध्येदयं वै भरतर्षभ ॥
aho dhigbāndhavā nainaṃ bodhayanti mahadbhayam | buddhyā buddhyenna vā buddhyedayaṃ vai bharatarṣabha
"हाय, धिक्कार है! इनके बन्धु इन्हें इस महान भय का बोध नहीं कराते। ये भरतश्रेष्ठ अपनी बुद्धि से इसे समझेंगे या नहीं, कौन जाने?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (2.98.18)
जनप्रवादान्सुबहूञ्शृण्वन्नपि नराधिपः । ह्रिया च धर्मसंयोगात्पार्थो द्यूतमियात्पुनः ॥
janapravādānsubahūñśṛṇvannapi narādhipaḥ | hriyā ca dharmasaṃyogātpārtho dyūtamiyātpunaḥ
लोगों की बहुत-सी ऐसी बातें सुनकर भी नरेश पार्थ लज्जा और धर्म के बन्धन के कारण फिर जुए के लिए गए।
श्लोक 19 (2.98.19)
जानन्नपि महाबुद्धिः पुनर्द्यूतमवर्तयत् । अप्यासन्नो विनाशः स्यात्कुरूणामितिचिन्तयन् ॥
jānannapi mahābuddhiḥ punardyūtamavartayat | apyāsanno vināśaḥ syātkurūṇāmiticintayan
सब जानते हुए भी उन महाबुद्धिमान ने फिर से जुआ आरम्भ किया, यह सोचते हुए कि "कदाचित् कुरुओं का विनाश निकट आ गया है।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (2.98.20)
कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन् । आहूतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने त्वया ॥
kathaṃ vai madvidho rājā svadharmamanupālayan | āhūto vinivarteta dīvyāmi śakune tvayā
अपने धर्म का पालन करने वाला मेरे जैसा राजा बुलाए जाने पर कैसे लौट सकता है? शकुनि, मैं तुम्हारे साथ खेलूँगा।
शकुनिरुवाच
श्लोक 21 (2.98.21)
गवाश्वं बहुधेनुकमपर्यन्तमजाविकम् । गजाः कोशो हिरण्यं च दासीदासाश्च सर्वशः ॥
gavāśvaṃ bahudhenukamaparyantamajāvikam | gajāḥ kośo hiraṇyaṃ ca dāsīdāsāśca sarvaśaḥ
गाय और घोड़े, बहुत-सी दुधारू गायें, असंख्य बकरियाँ और भेड़ें, हाथी, कोष, सोना, और सब प्रकार के दासी-दास —
श्लोक 22 (2.98.22)
हित्वा नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवाः । यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिताः ॥
hitvā no glaha evaiko vanavāsāya pāṇḍavāḥ | yūyaṃ vayaṃ vā vijitā vasema vanamāśritāḥ
इन सबको छोड़कर, हे पाण्डवो, हमारा एक ही दाँव है — वनवास। तुम या हम, जो भी हारे, वन में जाकर रहें,
श्लोक 23 (2.98.23)
त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाताः स्वजनैस्तथा । अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभाः ॥
trayodaśaṃ ca vai varṣamajñātāḥ svajanaistathā | anena vyavasāyena dīvyāma puruṣarṣabhāḥ
और तेरहवाँ वर्ष भी अपने लोगों से अज्ञात रहकर। हे पुरुषश्रेष्ठो, इसी निश्चय के साथ हम खेलें —
श्लोक 24 (2.98.24)
समुत्क्षेपेण चैकेन वनवासाय भारत ॥
samutkṣepeṇa caikena vanavāsāya bhārata
हे भारत, वनवास के लिए एक ही दाँव में।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (2.98.25)
एवं दैवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता ॥
evaṃ daivabalāviṣṭo dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhīṣmadroṇairvāryamāṇo vidureṇa ca dhīmatā
इस प्रकार दैव के बल से आविष्ट धर्मराज युधिष्ठिर को भीष्म और द्रोण ने रोका, बुद्धिमान विदुर ने रोका,
श्लोक 26 (2.98.26)
युयुत्सुना कृपेणाथ सञ्जयेन च भारत । गान्धार्या पृथया चैव भीमार्जुनयमैस्तथा ॥
yuyutsunā kṛpeṇātha sañjayena ca bhārata | gāndhāryā pṛthayā caiva bhīmārjunayamaistathā
हे भारत, युयुत्सु, कृप और संजय ने, गान्धारी और पृथा ने, और भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव ने,
श्लोक 27 (2.98.27)
विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा । सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता ॥
vikarṇena ca vīreṇa draupadyā drauṇinā tathā | somadattena ca tathā bāhlīkena ca dhīmatā
वीर विकर्ण, द्रौपदी और द्रोणपुत्र ने, सोमदत्त और बुद्धिमान बाह्लीक ने —
श्लोक 28 (2.98.28)
वार्यमाणोऽपि सततं न च राजन्नियच्छति । एवं संवार्यमाणोऽपि कौन्तेयो हितकाम्यया ॥
vāryamāṇo'pi satataṃ na ca rājanniyacchati | evaṃ saṃvāryamāṇo'pi kaunteyo hitakāmyayā
उनके निरन्तर रोकने पर भी, हे राजन्, वे रुके नहीं। हितैषी होकर इस प्रकार रोके जाने पर भी कुन्तीपुत्र
श्लोक 29 (2.98.29)
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं मुहूर्तं कलिमाविशत् । आविष्टः कलिना राजञ्छकुनिं प्रत्यभाषत ॥
devakāryārthasiddhyarthaṃ muhūrtaṃ kalimāviśat | āviṣṭaḥ kalinā rājañchakuniṃ pratyabhāṣata
देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए क्षण भर को कलि के वश में आ गए। कलि से आविष्ट होकर, हे राजन्, उन्होंने शकुनि को उत्तर दिया,
श्लोक 30 (2.98.30)
एवं भवत्विति तदा वनवासाय दीव्यति । प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौबलः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
evaṃ bhavatviti tadā vanavāsāya dīvyati | pratijagrāha taṃ pārtho glahaṃ jagrāha saubalaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
"ऐसा ही हो," और तब वनवास के लिए खेले। पार्थ ने वह दाँव स्वीकार किया और सौबल ने पासा फेंका। "मैं जीत गया!" — शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा।