सभा पर्व · अध्याय 97
दुर्योधन का अर्जुन-भय और पुनः द्यूत का आह्वान
दुर्योधन धृतराष्ट्र को अर्जुन के पराक्रम सुनाता है — द्रौपदी को जीतना, तीर्थयात्रा और विवाह, सुभद्रा-हरण, खाण्डव-दाह के समय इन्द्र और देवताओं की पराजय, और राजसूय के लिए जम्बूद्वीप की विजय; वह स्वीकार करता है कि उसे हर ओर पार्थ ही दिखते हैं और वह उनके भय में जीता है। धृतराष्ट्र पाण्डवों से स्नेह रखने को कहते हैं, पर दुर्योधन बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास की शर्त पर फिर से द्यूत का प्रस्ताव रखता है। बड़ों के विरोध और कुल-नाशक पुत्र को त्याग देने की गान्धारी की विनती के बावजूद धृतराष्ट्र पाण्डवों को फिर खेलने के लिए बुलवा भेजते हैं।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (2.97.1)
शृणु राजन्पुराऽचिन्त्यानर्जुनस्य च साहसान् । अर्जुनो धन्विनां श्रेष्ठो दुष्करं कृतवान्पुरा ॥
śṛṇu rājanpurā'cintyānarjunasya ca sāhasān | arjuno dhanvināṃ śreṣṭho duṣkaraṃ kṛtavānpurā
हे राजन्, अर्जुन के उन पुराने साहसिक कर्मों को सुनिए जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। धनुर्धारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने पहले बड़े दुष्कर कार्य किए हैं।
श्लोक 2 (2.97.2)
द्रुपदस्य पुरे राजन्द्रौपद्याश्च स्वयंवरे । आबालवृद्धसङ्क्षोभे सर्वक्षत्रसमागमे । क्षिप्रकारी जले मत्स्यं दुर्निरीक्ष्यं ससर्ज ह ॥
drupadasya pure rājandraupadyāśca svayaṃvare | ābālavṛddhasaṅkṣobhe sarvakṣatrasamāgame | kṣiprakārī jale matsyaṃ durnirīkṣyaṃ sasarja ha
हे राजन्, द्रुपद के नगर में द्रौपदी के स्वयंवर में, जहाँ सब क्षत्रिय एकत्र थे और बालक से वृद्ध तक सब उत्तेजित थे, फुर्तीले अर्जुन ने जल में कठिनाई से दिखने वाली मछली को बेधकर गिरा दिया।
श्लोक 3 (2.97.3)
सर्वैर्नृपैरसाध्यं तत्कार्मुकप्रवरं च वै । क्षणेन सज्यमकरोत्सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥
sarvairnṛpairasādhyaṃ tatkārmukapravaraṃ ca vai | kṣaṇena sajyamakarotsarvakṣatrasya paśyataḥ
जिस श्रेष्ठ धनुष को कोई भी राजा साध न सका, उस पर उन्होंने सब क्षत्रियों के देखते-देखते क्षण भर में प्रत्यंचा चढ़ा दी।
श्लोक 4 (2.97.4)
ततो यन्त्रमयं विद्ध्वा विसारं फल्गुनो बली । कृष्णया हेममाल्येन स्कन्धे स परिवेष्टितः ॥
tato yantramayaṃ viddhvā visāraṃ phalguno balī | kṛṣṇayā hemamālyena skandhe sa pariveṣṭitaḥ
तब बलवान फाल्गुन ने यन्त्र से बनी मछली को बेध दिया, और कृष्णा (द्रौपदी) ने उनके कंधों पर सोने की माला डाल दी।
श्लोक 5 (2.97.5)
ततस्तया वृतं पार्थं दृष्ट्वा सर्वे नृपास्तदा । रोषात्सर्वायुधान्गृह्य क्रुद्धा वीरा महौजसः । वैकर्तनं पुरस्कृत्य सर्वे पार्थमुपाद्रवन् ॥
tatastayā vṛtaṃ pārthaṃ dṛṣṭvā sarve nṛpāstadā | roṣātsarvāyudhāngṛhya kruddhā vīrā mahaujasaḥ | vaikartanaṃ puraskṛtya sarve pārthamupādravan
उसके द्वारा पार्थ का वरण होते देखकर सब राजा क्रोध से भर उठे; उन महान ओजस्वी वीरों ने सब प्रकार के अस्त्र उठा लिए और वैकर्तन (कर्ण) को आगे करके पार्थ पर टूट पड़े।
श्लोक 6 (2.97.6)
स सर्वान्पार्थिवान्दृष्ट्वा क्रुद्धान्पार्थो महाबलः । वारयित्वा शरैस्तीक्ष्णैरजयत्तत्र स स्वयम् ॥
sa sarvānpārthivāndṛṣṭvā kruddhānpārtho mahābalaḥ | vārayitvā śaraistīkṣṇairajayattatra sa svayam
सब राजाओं को क्रुद्ध देखकर महाबली पार्थ ने तीखे बाणों से उन्हें रोक दिया और वहाँ अकेले ही उन्हें जीत लिया।
श्लोक 7 (2.97.7)
जित्वा तु तान्महीपालान्सर्वान्कर्णपुरोगमान् । लेभे कृष्णां शुभां पार्थो युद्ध्वा वीर्यबलात्तदा ॥
jitvā tu tānmahīpālānsarvānkarṇapurogamān | lebhe kṛṣṇāṃ śubhāṃ pārtho yuddhvā vīryabalāttadā
कर्ण आदि उन सब राजाओं को जीतकर पार्थ ने तब पराक्रम और बल से युद्ध करके सुन्दरी कृष्णा को प्राप्त किया,
श्लोक 8 (2.97.8)
सर्वक्षत्रसमूहेषु अम्बां भीष्मो यथा पुरा । ततः कदाचिद्बीभत्सुस्तीर्थयात्रां ययौ स्वयम् ॥
sarvakṣatrasamūheṣu ambāṃ bhīṣmo yathā purā | tataḥ kadācidbībhatsustīrthayātrāṃ yayau svayam
सब क्षत्रियों के समूह के बीच, जैसे पहले भीष्म ने अम्बा को जीता था। फिर एक समय बीभत्सु स्वयं तीर्थयात्रा पर निकले।
श्लोक 9 (2.97.9)
अथोलूपीं शुभां तात नागराजसुतां तदा । नागेष्वाप वराग्र्येषु प्रार्थितोऽथ यथा तथा ॥
atholūpīṃ śubhāṃ tāta nāgarājasutāṃ tadā | nāgeṣvāpa varāgryeṣu prārthito'tha yathā tathā
हे तात, तब श्रेष्ठ नागों के बीच उन्होंने नागराज की सुन्दर पुत्री उलूपी को, उसकी प्रार्थना पर, जैसा संयोग बना वैसे प्राप्त किया।
श्लोक 10 (2.97.10)
ततो गोदावरीं कृष्णां कावेरीं चावगाहत । तत्र पाण्ड्यं समासाद्य तस्य कन्यामवाप सः ॥
tato godāvarīṃ kṛṣṇāṃ kāverīṃ cāvagāhata | tatra pāṇḍyaṃ samāsādya tasya kanyāmavāpa saḥ
फिर उन्होंने गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में स्नान किया; और वहाँ पाण्ड्य राजा के पास जाकर उसकी कन्या को प्राप्त किया।
श्लोक 11 (2.97.11)
लब्ध्वा जिष्णुर्मुदं तत्र ततो याम्यां दिशं ययौ ॥
labdhvā jiṣṇurmudaṃ tatra tato yāmyāṃ diśaṃ yayau
वहाँ आनन्द पाकर जिष्णु फिर दक्षिण दिशा की ओर गए।
श्लोक 12 (2.97.12)
स दक्षिणं समुद्रान्तं गत्वा चाप्सरसां च वै । कुमारतीर्थमासाद्य मोक्षयामास चार्जुनः ॥
sa dakṣiṇaṃ samudrāntaṃ gatvā cāpsarasāṃ ca vai | kumāratīrthamāsādya mokṣayāmāsa cārjunaḥ
दक्षिण समुद्र के तट तक जाकर अर्जुन ने कुमारतीर्थ में पहुँचकर अप्सराओं को मुक्त किया,
श्लोक 13 (2.97.13)
ग्राहरूपाश्च ताः पञ्च अतिशौर्येण वै बलात् । कन्यातीर्थं समभ्येत्य ततो द्वारवतीं ययौ ॥
grāharūpāśca tāḥ pañca atiśauryeṇa vai balāt | kanyātīrthaṃ samabhyetya tato dvāravatīṃ yayau
उन पाँचों को, जो ग्राह (मगर) के रूप में थीं, अपने अत्यन्त शौर्य और बल से। फिर कन्यातीर्थ पहुँचकर वे द्वारका गए।
श्लोक 14 (2.97.14)
तत्र कृष्णनिदेशात्स सुभद्रां प्राप्य फल्गुनः । तामारोप्य रथोपस्थे प्रययौ स्वपुरीं प्रति ॥
tatra kṛṣṇanideśātsa subhadrāṃ prāpya phalgunaḥ | tāmāropya rathopasthe prayayau svapurīṃ prati
वहाँ कृष्ण के निर्देश से फाल्गुन ने सुभद्रा को प्राप्त किया और उसे रथ पर बिठाकर अपने नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 15 (2.97.15)
अथादाय गते पार्थे ते श्रुत्वा सर्वयादवाः । तमभ्यधावन्त्सङ्क्रुद्धाः सिंहव्याघ्रगणा इव ॥
athādāya gate pārthe te śrutvā sarvayādavāḥ | tamabhyadhāvantsaṅkruddhāḥ siṃhavyāghragaṇā iva
पार्थ के उसे लेकर चले जाने पर सब यादव यह सुनकर सिंहों और बाघों के झुंडों की तरह क्रोध से भरकर उनके पीछे दौड़े।
श्लोक 16 (2.97.16)
प्रद्युम्नः कृतवर्मा च गदः सारणसात्यकी । आहुकश्चैव साम्बश्च चारुदेष्णो विदूरथः ॥
pradyumnaḥ kṛtavarmā ca gadaḥ sāraṇasātyakī | āhukaścaiva sāmbaśca cārudeṣṇo vidūrathaḥ
प्रद्युम्न, कृतवर्मा, गद, सारण और सात्यकि, आहुक, साम्ब, चारुदेष्ण और विदूरथ,
श्लोक 17 (2.97.17)
अन्ये च यादवाः सर्वे बलदेवपुरोगमाः । एकमेव परे कृष्णं गजवाजिरथैर्युताः ॥
anye ca yādavāḥ sarve baladevapurogamāḥ | ekameva pare kṛṣṇaṃ gajavājirathairyutāḥ
और बलदेव के नेतृत्व में अन्य सब यादव, एक कृष्ण को छोड़कर, हाथियों, घोड़ों और रथों के साथ आए।
श्लोक 18 (2.97.18)
अथासाद्य वने यान्तं परिवार्य धनञ्जयम् । चक्रुर्युद्धं सुसङ्क्रुद्धा बहुकोट्यश्च यादवाः ॥
athāsādya vane yāntaṃ parivārya dhanañjayam | cakruryuddhaṃ susaṅkruddhā bahukoṭyaśca yādavāḥ
वन में जाते हुए धनञ्जय को पाकर यादवों ने उन्हें घेर लिया, और करोड़ों की संख्या में वे अत्यन्त क्रोध से उनसे लड़ने लगे।
श्लोक 19 (2.97.19)
एक एव तु पार्थस्तैर्युद्धं चक्रे सुदारुणम् । तेन तेषां समं युद्धं मुहूर्तं प्रबभूव ह ॥
eka eva tu pārthastairyuddhaṃ cakre sudāruṇam | tena teṣāṃ samaṃ yuddhaṃ muhūrtaṃ prababhūva ha
पार्थ ने अकेले ही उनसे अत्यन्त भयंकर युद्ध किया, और कुछ देर तक उनके और उनके बीच बराबर का युद्ध चलता रहा।
श्लोक 20 (2.97.20)
ततः पार्थो रणे सर्वान्वारयित्वा शितैः शरैः । बलाद्विजित्य राजेन्द्र वीरस्तान्सर्वयादवान् । तां सुभद्रामथादाय शक्रप्रस्थं विवेश ह ॥
tataḥ pārtho raṇe sarvānvārayitvā śitaiḥ śaraiḥ | balādvijitya rājendra vīrastānsarvayādavān | tāṃ subhadrāmathādāya śakraprasthaṃ viveśa ha
हे राजेन्द्र, तब वीर पार्थ ने रण में तीखे बाणों से सबको रोककर उन सब यादवों को बलपूर्वक जीत लिया, और सुभद्रा को लेकर शक्रप्रस्थ में प्रवेश किया।
श्लोक 21 (2.97.21)
भूयः शृणु महाराज फल्गुनस्य च साहसम् । ददौ स वह्नेर्बीभत्सुः प्रार्थितं खाण्डवं वनम् ॥
bhūyaḥ śṛṇu mahārāja phalgunasya ca sāhasam | dadau sa vahnerbībhatsuḥ prārthitaṃ khāṇḍavaṃ vanam
हे महाराज, फाल्गुन का और भी साहस सुनिए। बीभत्सु ने अग्नि को उसका माँगा हुआ खाण्डव वन दे दिया।
श्लोक 22 (2.97.22)
लब्धमात्रे तु तेनाथ भगवान्हव्यवाहनः । भक्षितुं खाण्डवं राजंस्तत्रस्थानुपचक्रमे ॥
labdhamātre tu tenātha bhagavānhavyavāhanaḥ | bhakṣituṃ khāṇḍavaṃ rājaṃstatrasthānupacakrame
हे राजन्, उसे पाते ही हव्य-वाहक भगवान अग्नि वहाँ रहने वाले प्राणियों को भक्षण करने लगे।
श्लोक 23 (2.97.23)
ततस्तं भक्षयन्तं वै सव्यसाची विभावसुम् । रथी धन्वी शरान्गृह्य स कलापयुतः प्रभुः । पालयामास राजेन्द्र स्ववीर्येण महाबलः ॥
tatastaṃ bhakṣayantaṃ vai savyasācī vibhāvasum | rathī dhanvī śarāngṛhya sa kalāpayutaḥ prabhuḥ | pālayāmāsa rājendra svavīryeṇa mahābalaḥ
हे राजेन्द्र, जब अग्नि उसे भक्षण कर रहे थे, तब महाबली प्रभु सव्यसाची रथ पर धनुष, बाण और तूणीर लेकर अपने पराक्रम से उसकी रक्षा करते रहे।
श्लोक 24 (2.97.24)
ततः श्रुत्वा महेन्द्रस्तु मेघांस्तान्सन्दिदेश ह । तेनोक्ता मेघसङ्घास्ते ववर्षुरतिवृष्टिभिः ॥
tataḥ śrutvā mahendrastu meghāṃstānsandideśa ha | tenoktā meghasaṅghāste vavarṣurativṛṣṭibhiḥ
यह सुनकर महेन्द्र ने अपने मेघों को आदेश दिया, और उनके कहने पर मेघों के समूह मूसलाधार वर्षा करने लगे।
श्लोक 25 (2.97.25)
ततो मेघगणान्पार्थः शरव्रातैः समन्ततः । खगमैर्वारयामास तदाश्चर्यमिवाभवत् ॥
tato meghagaṇānpārthaḥ śaravrātaiḥ samantataḥ | khagamairvārayāmāsa tadāścaryamivābhavat
तब पार्थ ने आकाशगामी बाणों की बौछार से चारों ओर मेघों के समूहों को रोक दिया; यह आश्चर्य-सा लगा।
श्लोक 26 (2.97.26)
वारितान्मेघसङ्घांश्च श्रुत्वा क्रुद्धः पुरन्दरः । पाण्डरं गजमास्थाय सर्वदेवगणैर्वृतः । ययौ पार्थेन संयोद्धुं रक्षार्थं खाण्डवस्य च ॥
vāritānmeghasaṅghāṃśca śrutvā kruddhaḥ purandaraḥ | pāṇḍaraṃ gajamāsthāya sarvadevagaṇairvṛtaḥ | yayau pārthena saṃyoddhuṃ rakṣārthaṃ khāṇḍavasya ca
मेघों के रोक दिए जाने की बात सुनकर पुरन्दर क्रुद्ध हुए; श्वेत हाथी पर चढ़कर, सब देवगणों से घिरे हुए, वे खाण्डव की रक्षा के लिए पार्थ से लड़ने चले।
श्लोक 27 (2.97.27)
रुद्राश्च मरुतश्चैव वसवश्चाश्विनौ तदा । आदित्याश्चैव साध्याश्च विश्वेदेवाश्च भारत । गन्धर्वाश्चैव सहिता अन्ये देवगणाश्च ये ॥
rudrāśca marutaścaiva vasavaścāśvinau tadā | ādityāścaiva sādhyāśca viśvedevāśca bhārata | gandharvāścaiva sahitā anye devagaṇāśca ye
हे भारत, रुद्र और मरुद्गण, वसु और दोनों अश्विनीकुमार, आदित्य, साध्य और विश्वेदेव, उनके साथ गन्धर्व और अन्य देवगण,
श्लोक 28 (2.97.28)
ते सर्वे शस्त्रसम्पन्ना दीप्यमानाः स्वतेजसा । धनञ्जयं जिघांसन्तः प्रपेतुर्विबुधाधिपाः ॥
te sarve śastrasampannā dīpyamānāḥ svatejasā | dhanañjayaṃ jighāṃsantaḥ prapeturvibudhādhipāḥ
वे सब देवाधिपति शस्त्रों से सज्जित, अपने तेज से दमकते हुए, धनञ्जय को मारने की इच्छा से टूट पड़े।
श्लोक 29 (2.97.29)
युगान्ते यानि दृश्यन्ते निमित्तानि महान्त्यपि । सर्वाणि तत्र दृश्यन्ते निमित्तानि महीपते ॥
yugānte yāni dṛśyante nimittāni mahāntyapi | sarvāṇi tatra dṛśyante nimittāni mahīpate
हे पृथ्वीपति, युग के अन्त में जो बड़े-बड़े अपशकुन दिखाई देते हैं, वे सब वहाँ दिखाई दिए।
श्लोक 30 (2.97.30)
ततो देवगणाः सर्वे पार्थं समभिदुद्रुवुः । असम्भ्रान्तस्तु तान्दृष्ट्वा स तां देवमयीं चमूम् ॥
tato devagaṇāḥ sarve pārthaṃ samabhidudruvuḥ | asambhrāntastu tāndṛṣṭvā sa tāṃ devamayīṃ camūm
तब सब देवगण एक साथ पार्थ पर टूट पड़े। पर वे उस देवसेना को देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुए;
श्लोक 31 (2.97.31)
त्वरितः फल्गुनो गृह्य तीक्ष्णांस्तानाशुगांस्तदा । इन्द्रं देवांश्च सम्प्रेक्ष्य तस्थौ काल इवात्यये ॥
tvaritaḥ phalguno gṛhya tīkṣṇāṃstānāśugāṃstadā | indraṃ devāṃśca samprekṣya tasthau kāla ivātyaye
फाल्गुन ने शीघ्रता से अपने तीखे, वेगगामी बाण उठाए और इन्द्र तथा देवताओं को देखते हुए प्रलय-काल के काल की भाँति खड़े हो गए।
श्लोक 32 (2.97.32)
ततो देवगणाः सर्वे बीभत्सुं सपुरन्दराः । अवाकिरञ्छरव्रातैर्मानुषं तं महीपते ॥
tato devagaṇāḥ sarve bībhatsuṃ sapurandarāḥ | avākirañcharavrātairmānuṣaṃ taṃ mahīpate
हे पृथ्वीपति, तब पुरन्दर सहित सब देवगणों ने उस मनुष्य बीभत्सु को बाणों की बौछार से ढक दिया।
श्लोक 33 (2.97.33)
ततः पार्थो महातेजा गाण्डिवं गृह्य सत्वरः । वारयामास देवानां शरव्रातैः शरांस्तदा ॥
tataḥ pārtho mahātejā gāṇḍivaṃ gṛhya satvaraḥ | vārayāmāsa devānāṃ śaravrātaiḥ śarāṃstadā
तब महातेजस्वी पार्थ ने तुरन्त गाण्डीव उठाया और अपने बाणों की बौछार से देवताओं के बाणों को रोक दिया।
श्लोक 34 (2.97.34)
पुनः क्रुद्धाः सुराः सर्वे मर्त्यं तं सुमहाबलाः । नानाशस्त्रैर्ववर्षुस्तं सव्यसाचिं महीपते ॥
punaḥ kruddhāḥ surāḥ sarve martyaṃ taṃ sumahābalāḥ | nānāśastrairvavarṣustaṃ savyasāciṃ mahīpate
हे पृथ्वीपति, फिर सब महाबली देवता क्रुद्ध होकर उस मनुष्य सव्यसाची पर अनेक प्रकार के शस्त्र बरसाने लगे।
श्लोक 35 (2.97.35)
तान्पार्थः शस्त्रवर्षान्वै विसृष्टान्विबुधैस्तदा । द्विधा त्रिधा स चिच्छेद स एव निशितैः शरैः ॥
tānpārthaḥ śastravarṣānvai visṛṣṭānvibudhaistadā | dvidhā tridhā sa ciccheda sa eva niśitaiḥ śaraiḥ
देवताओं द्वारा छोड़ी गई उन शस्त्र-वर्षाओं को पार्थ ने स्वयं अपने तीखे बाणों से दो-दो, तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 36 (2.97.36)
पुनश्च पार्थः सङ्क्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुकः । देवसङ्घाञ्छरैस्तीक्ष्णैरर्पयन्वै समन्ततः ॥
punaśca pārthaḥ saṅkruddho maṇḍalīkṛtakārmukaḥ | devasaṅghāñcharaistīkṣṇairarpayanvai samantataḥ
और फिर क्रुद्ध पार्थ ने धनुष को मण्डलाकार खींचकर चारों ओर देवसमूहों को तीखे बाणों से बेध डाला।
श्लोक 37 (2.97.37)
ततो देवगणाः सर्वे युद्ध्वा पार्थेन वै मुहुः । रणे जेतुमशक्यं तं ज्ञात्वा ते भरतर्षभ ॥
tato devagaṇāḥ sarve yuddhvā pārthena vai muhuḥ | raṇe jetumaśakyaṃ taṃ jñātvā te bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, तब सब देवगण बार-बार पार्थ से लड़कर और उन्हें रण में अजेय जानकर,
श्लोक 38 (2.97.38)
शान्तास्ते विबुधाः सर्वे पार्थबाणाभिपीडिताः । सद्विपं वासवं त्यक्त्वा दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥
śāntāste vibudhāḥ sarve pārthabāṇābhipīḍitāḥ | sadvipaṃ vāsavaṃ tyaktvā dudruvuḥ sarvato diśam
पार्थ के बाणों से पीड़ित होकर, थके हुए वे सब देवता हाथी सहित वासव को छोड़कर सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 39 (2.97.39)
प्राचीं रुद्राः सगन्धर्वा दक्षिणां मरुतो ययुः । दिशं प्रतीचीं भीतास्ते वसवश्च तथाऽश्विनौ ॥
prācīṃ rudrāḥ sagandharvā dakṣiṇāṃ maruto yayuḥ | diśaṃ pratīcīṃ bhītāste vasavaśca tathā'śvinau
गन्धर्वों सहित रुद्र पूर्व की ओर गए, मरुद्गण दक्षिण की ओर; वसु और दोनों अश्विनीकुमार डरकर पश्चिम दिशा में भागे।
श्लोक 40 (2.97.40)
आदित्याश्चैव विश्वे च दुद्रुवुर्वा उदङ्मुखाः । साध्याश्चोर्ध्वमुखा भीताश्चिन्तयन्तोऽस्य सायकान् ॥
ādityāścaiva viśve ca dudruvurvā udaṅmukhāḥ | sādhyāścordhvamukhā bhītāścintayanto'sya sāyakān
आदित्य और विश्वेदेव उत्तर की ओर भागे, और साध्य उनके बाणों का स्मरण करते हुए भय से ऊपर की ओर भागे।
श्लोक 41 (2.97.41)
एवं सुरगणाः सर्वे प्राद्रवन्त्सर्वतो दिशम् । मुहुर्मुहुः प्रेक्षमाणाः पार्थमेव सकार्मुकम् ॥
evaṃ suragaṇāḥ sarve prādravantsarvato diśam | muhurmuhuḥ prekṣamāṇāḥ pārthameva sakārmukam
इस प्रकार सब देवगण बार-बार धनुषधारी पार्थ की ओर ही देखते हुए सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 42 (2.97.42)
विद्रुतान्देवसङ्घांस्तान्रणे दृष्ट्वा पुरन्दरः । ततः क्रुद्धो महातेजाः पार्थं बाणैरवाकिरत् ॥
vidrutāndevasaṅghāṃstānraṇe dṛṣṭvā purandaraḥ | tataḥ kruddho mahātejāḥ pārthaṃ bāṇairavākirat
रण में देवसमूहों को भागते देखकर महातेजस्वी पुरन्दर क्रुद्ध हुए और उन्होंने पार्थ को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 43 (2.97.43)
पार्थोऽपि शक्रं विव्याध मानुषो विबुधाधिपम् ॥
pārtho'pi śakraṃ vivyādha mānuṣo vibudhādhipam
मनुष्य होते हुए भी पार्थ ने देवताओं के स्वामी शक्र को बेध दिया।
श्लोक 44 (2.97.44)
ततः सोऽश्ममयं वर्षं व्यसृजद्विबुधाधिपः । तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षणः ॥
tataḥ so'śmamayaṃ varṣaṃ vyasṛjadvibudhādhipaḥ | taccharairarjuno varṣaṃ pratijaghne'tyamarṣaṇaḥ
तब देवाधिपति ने पत्थरों की वर्षा की; अत्यन्त अमर्षशील अर्जुन ने अपने बाणों से उस वर्षा को नष्ट कर दिया।
श्लोक 45 (2.97.45)
अथ संवर्धयामास तद्वर्षं देवराडपि । भूय एव महावीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः ॥
atha saṃvardhayāmāsa tadvarṣaṃ devarāḍapi | bhūya eva mahāvīryaṃ jijñāsuḥ savyasācinaḥ
तब देवराज ने सव्यसाची के महान पराक्रम को फिर से परखने की इच्छा से उस वर्षा को और बढ़ा दिया।
श्लोक 46 (2.97.46)
सोऽश्मवर्षं महावेगमिषुभिः पाण्डवोऽपि च । विलयं गमयामास हर्षयन्पाकशासनम् ॥
so'śmavarṣaṃ mahāvegamiṣubhiḥ pāṇḍavo'pi ca | vilayaṃ gamayāmāsa harṣayanpākaśāsanam
और पाण्डव ने भी अपने बाणों से उस प्रचण्ड वेग वाली पत्थर-वर्षा को नष्ट कर दिया, जिससे पाकशासन (इन्द्र) प्रसन्न हुए।
श्लोक 47 (2.97.47)
उपादाय तु पाणिभ्यामङ्गदं नाम पर्वतम् । सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः श्वेतवाहनम् ॥
upādāya tu pāṇibhyāmaṅgadaṃ nāma parvatam | sadrumaṃ vyasṛjacchakro jighāṃsuḥ śvetavāhanam
तब शक्र ने अंगद नाम के पर्वत को वृक्षों सहित दोनों हाथों में उठाकर श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन को मारने की इच्छा से फेंका।
श्लोक 48 (2.97.48)
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलमानैरजिह्यगैः । बाणैर्विध्वंसयामास गिरिराजं सहस्रधा ॥
tato'rjuno vegavadbhirjvalamānairajihyagaiḥ | bāṇairvidhvaṃsayāmāsa girirājaṃ sahasradhā
तब अर्जुन ने वेगवान, दहकते, सीधे जाने वाले बाणों से उस पर्वतराज के हजारों टुकड़े कर दिए।
श्लोक 49 (2.97.49)
शक्रं च पातयामास शरैः पार्थो महान्युधि । ततः शक्रो महाराज रणे वीरं धनञ्जयम् ॥
śakraṃ ca pātayāmāsa śaraiḥ pārtho mahānyudhi | tataḥ śakro mahārāja raṇe vīraṃ dhanañjayam
और उस महान युद्ध में पार्थ ने बाणों से शक्र को भी गिरा दिया। तब, हे महाराज, शक्र ने रण में वीर धनञ्जय को
श्लोक 50 (2.97.50)
ज्ञात्वा जेतुमशक्यं तं तेजोबलसमन्वितम् । परां प्रीतिं ययौ तत्र पुत्रशौर्येण वासवः ॥
jñātvā jetumaśakyaṃ taṃ tejobalasamanvitam | parāṃ prītiṃ yayau tatra putraśauryeṇa vāsavaḥ
तेज और बल से सम्पन्न तथा अजेय जाना, और वासव को अपने पुत्र के शौर्य से वहाँ परम प्रसन्नता हुई।
श्लोक 51 (2.97.51)
तदा तत्र न तस्यास्ति दिवि कश्चिन्महायशाः । समर्थो निर्जये राजन्नपि साक्षात्प्रजापतिः ॥
tadā tatra na tasyāsti divi kaścinmahāyaśāḥ | samartho nirjaye rājannapi sākṣātprajāpatiḥ
हे राजन्, उस समय स्वर्ग में कोई भी महायशस्वी उन्हें जीतने में समर्थ नहीं था, स्वयं प्रजापति भी नहीं।
श्लोक 52 (2.97.52)
ततः पार्थः शरैर्हत्वा यक्षराक्षसपन्नगान् । दीप्ते चाग्नौ महातेजाः पातयामास सन्ततम् ॥
tataḥ pārthaḥ śarairhatvā yakṣarākṣasapannagān | dīpte cāgnau mahātejāḥ pātayāmāsa santatam
तब महातेजस्वी पार्थ ने बाणों से यक्षों, राक्षसों और सर्पों को मारकर उन्हें लगातार प्रज्वलित अग्नि में गिराया।
श्लोक 53 (2.97.53)
प्रतिषेधयितुं पार्थं न शेकुस्तत्र केचन । दृष्ट्वा निवारितं शक्रं दिवि देवगणैः सह ॥
pratiṣedhayituṃ pārthaṃ na śekustatra kecana | dṛṣṭvā nivāritaṃ śakraṃ divi devagaṇaiḥ saha
स्वर्ग में देवगणों सहित शक्र को रोका गया देखकर वहाँ कोई भी पार्थ को रोक न सका।
श्लोक 54 (2.97.54)
यथा सुपर्णः सोमार्थं विबुधानजयत्पुरा । तथा जित्वा सुरान्पार्थस्तर्पयामास पावकम् ॥
yathā suparṇaḥ somārthaṃ vibudhānajayatpurā | tathā jitvā surānpārthastarpayāmāsa pāvakam
जैसे पहले सुपर्ण (गरुड़) ने सोम के लिए देवताओं को जीता था, वैसे ही पार्थ ने देवताओं को जीतकर अग्नि को तृप्त किया।
श्लोक 55 (2.97.55)
ततोऽर्जुनः स्ववीर्येण तर्पयित्वा विभावसुम् । रथं ध्वजं च सहयं दिव्यानस्त्रांश्च पाण्डवः ॥
tato'rjunaḥ svavīryeṇa tarpayitvā vibhāvasum | rathaṃ dhvajaṃ ca sahayaṃ divyānastrāṃśca pāṇḍavaḥ
अपने पराक्रम से अग्नि को तृप्त करके पाण्डुपुत्र अर्जुन ने रथ, ध्वजा और घोड़े, दिव्य अस्त्र,
श्लोक 56 (2.97.56)
गाण्डीवं च धनुः श्रेष्ठं तूणी चाक्षयसायकौ । एतान्यपि च बीभत्सुर्लेभे कीर्तिं च भारत ॥
gāṇḍīvaṃ ca dhanuḥ śreṣṭhaṃ tūṇī cākṣayasāyakau | etānyapi ca bībhatsurlebhe kīrtiṃ ca bhārata
श्रेष्ठ धनुष गाण्डीव और अक्षय बाणों वाले दो तूणीर — हे भारत, ये सब बीभत्सु ने पाए, और कीर्ति भी।
श्लोक 57 (2.97.57)
भूयोऽपि शृणु राजेन्द्र पार्थो गत्वोत्तरां दिशम् । विजित्य नववर्षांश्च सपुरांश्च सपर्वतान् ॥
bhūyo'pi śṛṇu rājendra pārtho gatvottarāṃ diśam | vijitya navavarṣāṃśca sapurāṃśca saparvatān
हे राजेन्द्र, और भी सुनिए — पार्थ ने उत्तर दिशा में जाकर नगरों और पर्वतों सहित नौ वर्षों (भूखण्डों) को जीता;
श्लोक 58 (2.97.58)
जम्बुद्वीपं वशे कृत्वा सर्वं तद्भरतर्षभ । बलाज्जित्वा नृपान्सर्वान्करे च विनिवेश्य च ॥
jambudvīpaṃ vaśe kṛtvā sarvaṃ tadbharatarṣabha | balājjitvā nṛpānsarvānkare ca viniveśya ca
हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने सारे जम्बूद्वीप को वश में किया, सब राजाओं को बलपूर्वक जीतकर उनसे कर लिया;
श्लोक 59 (2.97.59)
रत्नान्यादाय सर्वाणि गत्वा चैव पुनः पुरीम् । ततो ज्येष्ठं महात्मानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं कारयामास भारत ॥
ratnānyādāya sarvāṇi gatvā caiva punaḥ purīm | tato jyeṣṭhaṃ mahātmānaṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ kārayāmāsa bhārata
सब रत्न लेकर वे फिर नगर लौटे, और तब, हे भारत, उन्होंने अपने बड़े भाई महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर से श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय करवाया।
श्लोक 60 (2.97.60)
स तान्यन्यानि कर्माणि कृतवानर्जुनः पुरा । अर्जुनेन समो वीर्ये त्रिषु लोकेषु न क्वचित् ॥
sa tānyanyāni karmāṇi kṛtavānarjunaḥ purā | arjunena samo vīrye triṣu lokeṣu na kvacit
अर्जुन ने पहले ये और अन्य कर्म किए हैं। तीनों लोकों में कहीं भी पराक्रम में अर्जुन के समान कोई नहीं है।
श्लोक 61 (2.97.61)
देवदानवयक्षाश्च पिशाचोरगराक्षसाः । भीष्मद्रोणादयः सर्वे कुरवश्च महारथाः ॥
devadānavayakṣāśca piśācoragarākṣasāḥ | bhīṣmadroṇādayaḥ sarve kuravaśca mahārathāḥ
देवता, दानव और यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षस, भीष्म, द्रोण आदि सब, और महारथी कौरव,
श्लोक 62 (2.97.62)
लोके सर्वनृपाश्चैव वीराश्चान्ये धनुर्धराः । एते पार्थं रणे युक्ताः प्रतियोद्धुं न शक्नुयुः ॥
loke sarvanṛpāścaiva vīrāścānye dhanurdharāḥ | ete pārthaṃ raṇe yuktāḥ pratiyoddhuṃ na śaknuyuḥ
संसार के सब राजा और अन्य वीर धनुर्धर — ये सब मिलकर भी रण में पार्थ का सामना नहीं कर सकते।
श्लोक 63 (2.97.63)
अहं हि नित्यं कौरव्य फल्गुनं हृदि संस्थितम् । अपश्यं चिन्तयित्वा तं समुद्विग्नोऽस्मि तद्भयात् ॥
ahaṃ hi nityaṃ kauravya phalgunaṃ hṛdi saṃsthitam | apaśyaṃ cintayitvā taṃ samudvigno'smi tadbhayāt
हे कौरव्य, मैं फाल्गुन को सदा अपने हृदय में बैठा देखता हूँ; उनका चिन्तन करके मैं उनके भय से व्याकुल हूँ।
श्लोक 64 (2.97.64)
गृहे गृहे च पश्यामि तात पार्थमहं सदा । शरगाण्डीवसंयुक्तं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥
gṛhe gṛhe ca paśyāmi tāta pārthamahaṃ sadā | śaragāṇḍīvasaṃyuktaṃ pāśahastamivāntakam
हे तात, मैं घर-घर में सदा पार्थ को देखता हूँ — बाण और गाण्डीव लिए, हाथ में पाश लिए यमराज की भाँति।
श्लोक 65 (2.97.65)
अपि पार्थसहस्राणि भीतः पश्यामि भारत । पार्थभूतमिदं सर्वं नगरं प्रतिभाति मे ॥
api pārthasahasrāṇi bhītaḥ paśyāmi bhārata | pārthabhūtamidaṃ sarvaṃ nagaraṃ pratibhāti me
हे भारत, भय के कारण मुझे हजारों पार्थ दिखाई देते हैं; यह सारा नगर मुझे पार्थमय प्रतीत होता है।
श्लोक 66 (2.97.66)
पार्थमेव हि पश्यामि रहिते तात भारत । दृष्ट्वा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि विचेतनः ॥
pārthameva hi paśyāmi rahite tāta bhārata | dṛṣṭvā svapnagataṃ pārthamudbhramāmi vicetanaḥ
हे तात, हे भारत, एकान्त में भी मुझे पार्थ ही दिखते हैं। स्वप्न में पार्थ को देखकर मैं अचेत-सा होकर चौंक उठता हूँ।
श्लोक 67 (2.97.67)
अकारादीनि नामानि अर्जुनग्रस्तचेतसः । अश्वाक्षराम्बुजाश्चैव त्रासं सञ्जनयन्ति मे ॥
akārādīni nāmāni arjunagrastacetasaḥ | aśvākṣarāmbujāścaiva trāsaṃ sañjanayanti me
अर्जुन से मेरा मन ऐसा ग्रस्त है कि 'अ' से आरम्भ होने वाले नाम — अश्व, अक्षर और अम्बुज भी — मुझमें त्रास उत्पन्न करते हैं।
श्लोक 68 (2.97.68)
नास्ति पार्थादृते तात परवीराद्भयं मम । प्रह्लादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ॥
nāsti pārthādṛte tāta paravīrādbhayaṃ mama | prahlādaṃ vā baliṃ vāpi hanyāddhi vijayo raṇe
हे तात, पार्थ के सिवा मुझे किसी शत्रु वीर से भय नहीं है। विजय (अर्जुन) तो रण में प्रह्लाद या बलि को भी मार सकते हैं।
श्लोक 69 (2.97.69)
तस्मात्तेन महाराज युद्धं नस्तात न क्षमम् । अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ॥
tasmāttena mahārāja yuddhaṃ nastāta na kṣamam | ahaṃ tasya prabhāvajño nityaṃ duḥkhaṃ vahāmi ca
इसलिए, हे महाराज, हे तात, उनसे युद्ध करना हमारे लिए उचित नहीं है। मैं उनका प्रभाव जानता हूँ और सदा यह दुःख ढोता रहता हूँ।
श्लोक 70 (2.97.70)
पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम् । भवेद्रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ॥
purā hi daṇḍakāraṇye mārīcasya yathā bhayam | bhavedrāme mahāvīrye tathā pārthe bhayaṃ mama
जैसे पहले दण्डकारण्य में मारीच को महापराक्रमी राम से भय था, वैसे ही मुझे पार्थ से भय है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 71 (2.97.71)
जानाम्येव महद्वीर्यं जिष्णोरेतद्दुरासदम् । एतद्वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम् ॥
jānāmyeva mahadvīryaṃ jiṣṇoretaddurāsadam | etadvīrasya pārthasya mā kārṣīstvaṃ tu vipriyam
मैं जिष्णु के इस महान, दुर्जेय पराक्रम को भली-भाँति जानता हूँ। उस वीर पार्थ का कोई अप्रिय न करना —
श्लोक 72 (2.97.72)
द्यूतं वा शस्त्रयुद्धं वा दुर्वाक्यं वा कथञ्चन । एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत् ॥
dyūtaṃ vā śastrayuddhaṃ vā durvākyaṃ vā kathañcana | eteṣvevaṃ kṛte tasya vigrahaścaiva vo bhavet
न जुआ, न शस्त्र-युद्ध, न कभी कटु वचन। इनमें से कुछ भी करने पर उनसे तुम्हारा वैर अवश्य होगा।
श्लोक 73 (2.97.73)
तस्मात्त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय । यश्च पार्थेन सम्बन्धो वर्तते चेन्नरो भुवि ॥
tasmāttvaṃ putra pārthena nityaṃ snehena vartaya | yaśca pārthena sambandho vartate cennaro bhuvi
इसलिए, पुत्र, पार्थ के साथ सदा स्नेह से व्यवहार करो। पृथ्वी पर जो मनुष्य पार्थ से सम्बन्ध बनाए रखता है,
श्लोक 74 (2.97.74)
तस्य नास्ति भयं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु भारत । तस्मात्त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
tasya nāsti bhayaṃ kiñcittriṣu lokeṣu bhārata | tasmāttvaṃ jiṣṇunā vatsa nityaṃ snehena vartaya
हे भारत, उसे तीनों लोकों में कोई भय नहीं रहता। इसलिए, वत्स, जिष्णु के साथ सदा स्नेह से व्यवहार करो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 75 (2.97.75)
द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृतिः कृता । तस्माद्धि नो जयस्तात अन्योपायेन नो भवेत् ॥
dyūte pārthasya kauravya māyayā nikṛtiḥ kṛtā | tasmāddhi no jayastāta anyopāyena no bhavet
हे कौरव्य, द्यूत में पार्थ को छल से ही हराया गया था। इसलिए, तात, किसी अन्य उपाय से हमारी विजय नहीं हो सकती।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 76 (2.97.76)
उपायश्च न कर्तव्यः पाण्डवान्प्रति भारत । पार्थान्प्रति पुरा वत्स बहूपायाः कृतास्त्वया ॥
upāyaśca na kartavyaḥ pāṇḍavānprati bhārata | pārthānprati purā vatsa bahūpāyāḥ kṛtāstvayā
हे भारत, पाण्डवों के विरुद्ध कोई चाल नहीं चलनी चाहिए। वत्स, तुमने पहले पार्थों के विरुद्ध बहुत-सी चालें चलीं,
श्लोक 77 (2.97.77)
तानुपायान्हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमुः । तस्माद्धितं जीविताय नः कुलस्य जनस्य च ॥
tānupāyānhi kaunteyā bahuśo vyaticakramuḥ | tasmāddhitaṃ jīvitāya naḥ kulasya janasya ca
और कुन्तीपुत्र उन चालों से बार-बार बच निकले। इसलिए यदि तुम हमारे जीवन, कुल और प्रजा का हित करना चाहते हो,
श्लोक 78 (2.97.78)
त्वं चिकीर्षसि चेद्वत्स समित्रः सहबान्धवः । सभ्रातृकस्त्वं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
tvaṃ cikīrṣasi cedvatsa samitraḥ sahabāndhavaḥ | sabhrātṛkastvaṃ pārthena nityaṃ snehena vartaya
यदि तुम यह चाहते हो, वत्स, तो अपने मित्रों, बन्धुओं और भाइयों सहित पार्थ के साथ सदा स्नेह से व्यवहार करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 79 (2.97.79)
धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु विधिना चोदितोऽब्रवीत् ॥
dhṛtarāṣṭravacaḥ śrutvā rājā duryodhanastadā | cintayitvā muhūrtaṃ tu vidhinā codito'bravīt
धृतराष्ट्र के वचन सुनकर राजा दुर्योधन ने क्षण भर विचार किया और फिर विधाता से प्रेरित होकर बोला —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 80 (2.97.80)
पुनर्दीव्याम भद्रं ते वनवासाय पाण्डवैः । एवमेतान्वशे कर्तुं शक्ष्यामः पुरुषर्षभ ॥
punardīvyāma bhadraṃ te vanavāsāya pāṇḍavaiḥ | evametānvaśe kartuṃ śakṣyāmaḥ puruṣarṣabha
आपका कल्याण हो — हम पाण्डवों के साथ वनवास की शर्त पर फिर से जुआ खेलें। हे पुरुषश्रेष्ठ, इस प्रकार हम उन्हें वश में कर सकेंगे।
श्लोक 81 (2.97.81)
ते वा द्वादश वर्षाणि वयं वा द्यूतनिर्जिताः । प्रविशेम महारण्यमजिनैः प्रतिवासिताः ॥
te vā dvādaśa varṣāṇi vayaṃ vā dyūtanirjitāḥ | praviśema mahāraṇyamajinaiḥ prativāsitāḥ
या तो वे, या हम — जो भी द्यूत में हारे — मृगचर्म धारण करके बारह वर्ष के लिए महावन में प्रवेश करें,
श्लोक 82 (2.97.82)
त्रयोदशं च स्वजनैरज्ञाताः परिवत्सरम् । ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥
trayodaśaṃ ca svajanairajñātāḥ parivatsaram | jñātāśca punaranyāni vane varṣāṇi dvādaśa
और तेरहवाँ वर्ष अपने लोगों से अज्ञात रहकर बिताएँ; और यदि पहचान लिए जाएँ तो फिर से बारह वर्ष वन में रहें।
श्लोक 83 (2.97.83)
निवसेम वयं ते वा तथा द्यूतं प्रवर्तताम् । अक्षानुप्त्वा पुनर्द्यूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥
nivasema vayaṃ te vā tathā dyūtaṃ pravartatām | akṣānuptvā punardyūtamidaṃ kurvantu pāṇḍavāḥ
हम रहें या वे — इसी शर्त पर द्यूत चले। पासे डाले जाएँ और पाण्डव फिर से यह जुआ खेलें।
श्लोक 84 (2.97.84)
एतत्कृत्यतमं राजन्नस्माकं भरतर्षभ । अयं हि शकुनिर्वेद सविद्यामक्षसम्पदम् ॥
etatkṛtyatamaṃ rājannasmākaṃ bharatarṣabha | ayaṃ hi śakunirveda savidyāmakṣasampadam
हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, हमारे लिए यही सबसे करणीय है। क्योंकि ये शकुनि पासों की पूरी विद्या और कौशल जानते हैं।
श्लोक 85 (2.97.85)
दृढमूलं वयं राज्ये मित्राणि परिगृह्य च । सारवद्विपुलं सैन्यं सत्कृत्य च दुरासदम् ॥
dṛḍhamūlaṃ vayaṃ rājye mitrāṇi parigṛhya ca | sāravadvipulaṃ sainyaṃ satkṛtya ca durāsadam
हम राज्य में दृढ़ता से जड़ जमा लेंगे, मित्रों को अपने पक्ष में कर लेंगे और एक विशाल, शक्तिशाली, दुर्जेय सेना को सत्कार से अपनी बना लेंगे;
श्लोक 86 (2.97.86)
ते च त्रयोदशं वर्षं पारयिष्यन्ति चेद्व्रतम् । जेष्यामस्तान्वयं राजन्रोचतां ते परन्तप ॥
te ca trayodaśaṃ varṣaṃ pārayiṣyanti cedvratam | jeṣyāmastānvayaṃ rājanrocatāṃ te parantapa
और यदि वे तेरहवें वर्ष तक अपना व्रत निभा भी लें, तो हे राजन्, हम उन्हें जीत लेंगे। हे परन्तप, यह आपको स्वीकार हो।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 87 (2.97.87)
तूर्णं प्रत्यानयस्वैतान्कामं व्यध्वगतानपि । आगच्छन्तु पुनर्द्यूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥
tūrṇaṃ pratyānayasvaitānkāmaṃ vyadhvagatānapi | āgacchantu punardyūtamidaṃ kurvantu pāṇḍavāḥ
उन्हें शीघ्र लौटा लाओ, चाहे वे मार्ग में दूर तक चले गए हों। पाण्डव आएँ और फिर यह जुआ खेलें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 88 (2.97.88)
ततो द्रोणः सोमदत्तो बाह्लीकश्चैव गौतमः । विदुरो द्रोणपुत्रश्च वैश्यापुत्रश्च वीर्यवान् ॥
tato droṇaḥ somadatto bāhlīkaścaiva gautamaḥ | viduro droṇaputraśca vaiśyāputraśca vīryavān
तब द्रोण, सोमदत्त, बाह्लीक और गौतम (कृप), विदुर, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) और वैश्या का पराक्रमी पुत्र (युयुत्सु),
श्लोक 89 (2.97.89)
भूरिश्रवाः शान्तनवो विकर्णश्च महारथः । मा द्यूतमित्यभाषन्त शमोऽस्त्विति च सर्वशः ॥
bhūriśravāḥ śāntanavo vikarṇaśca mahārathaḥ | mā dyūtamityabhāṣanta śamo'stviti ca sarvaśaḥ
भूरिश्रवा, शान्तनुपुत्र (भीष्म) और महारथी विकर्ण — सबने कहा, "जुआ न हो! शान्ति बनी रहे।"
श्लोक 90 (2.97.90)
अकामानां च सर्वेषां सुहृदामर्थदर्शिनाम् । अकरोत्पाण्डवाह्वानं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः ॥
akāmānāṃ ca sarveṣāṃ suhṛdāmarthadarśinām | akarotpāṇḍavāhvānaṃ dhṛtarāṣṭraḥ sutapriyaḥ
पर हित देखने वाले उन सब सुहृदों की इच्छा के विरुद्ध पुत्र-प्रेमी धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को बुलवाया।
श्लोक 91 (2.97.91)
अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । पुत्रहार्दाद्धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्शिता ॥
athābravīnmahārāja dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram | putrahārdāddharmayuktā gāndhārī śokakarśitā
हे महाराज, तब शोक से दुर्बल गान्धारी ने पुत्र-स्नेह के कारण धर्मयुक्त होकर राजा धृतराष्ट्र से कहा —
गान्धार्युवाच
श्लोक 92 (2.97.92)
जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत । नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥
jāte duryodhane kṣattā mahāmatirabhāṣata | nīyatāṃ paralokāya sādhvayaṃ kulapāṃsanaḥ
"जब दुर्योधन का जन्म हुआ था, तब महाबुद्धिमान विदुर ने कहा था — 'कुल को कलंकित करने वाले इसे परलोक भेज देना ही अच्छा है।'
श्लोक 93 (2.97.93)
व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत । अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निबोधत ॥
vyanadajjātamātro hi gomāyuriva bhārata | anto nūnaṃ kulasyāsya kuravastannibodhata
हे भारत, जन्म लेते ही वह गीदड़ की तरह चिल्लाया था। निश्चय ही वह इस कुल का अन्त करेगा; हे कौरवो, यह समझ लो।
श्लोक 94 (2.97.94)
मा निमज्जीः स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत । मा बालानामशिष्टानामभिमंस्था मतिं प्रभो ॥
mā nimajjīḥ svadoṣeṇa mahāpsu tvaṃ hi bhārata | mā bālānāmaśiṣṭānāmabhimaṃsthā matiṃ prabho
हे भारत, अपने ही दोष से गहरे जल में मत डूबो। हे प्रभो, मूर्ख और अशिक्षित बालकों की बुद्धि को मत मानो।
श्लोक 95 (2.97.95)
मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि । बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद्धमेच्छान्तं च पावकम् ॥
mā kulasya kṣaye ghore kāraṇaṃ tvaṃ bhaviṣyasi | baddhaṃ setuṃ ko nu bhindyāddhamecchāntaṃ ca pāvakam
कुल के भयंकर विनाश का कारण मत बनो। बँधे हुए बाँध को कौन तोड़ेगा, और बुझी हुई आग को कौन फिर से धौंकेगा?
श्लोक 96 (2.97.96)
शमे स्थितान्को नु पार्थान्कोपयेद्भरतर्षभ । स्मरन्तं त्वामाजमीढं स्मारयिष्याम्यहं पुनः ॥
śame sthitānko nu pārthānkopayedbharatarṣabha | smarantaṃ tvāmājamīḍhaṃ smārayiṣyāmyahaṃ punaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, शान्ति में स्थित पार्थों को कौन क्रोध दिलाएगा? हे आजमीढ, तुम्हें यह स्मरण है, फिर भी मैं तुम्हें फिर याद दिलाती हूँ।
श्लोक 97 (2.97.97)
शास्त्रं न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च । न वै वृद्धो बालमतिर्भवेद्राजन्कथञ्चन ॥
śāstraṃ na śāsti durbuddhiṃ śreyase cetarāya ca | na vai vṛddho bālamatirbhavedrājankathañcana
शास्त्र दुर्बुद्धि को न भलाई की शिक्षा देता है, न बुराई की। हे राजन्, वृद्ध व्यक्ति को कभी बालक जैसी बुद्धि वाला नहीं होना चाहिए।
श्लोक 98 (2.97.98)
त्वन्नेत्राः सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णाः प्रहासिषुः । तस्मादयं मद्वचनात्त्यज्यतां कुलपांसनः ॥
tvannetrāḥ santu te putrā mā tvāṃ dīrṇāḥ prahāsiṣuḥ | tasmādayaṃ madvacanāttyajyatāṃ kulapāṃsanaḥ
तुम्हारे पुत्र तुम्हें ही अपना नेता मानें; ऐसा न हो कि वे मर्यादा तोड़कर तुम्हें छोड़ दें। इसलिए मेरे कहने से कुल को कलंकित करने वाले इसे त्याग दो।
श्लोक 99 (2.97.99)
तथा ते न कृतं राजन्पुत्रस्नेहान्नराधिप । तस्य प्राप्तं फलं विद्धि कुलान्तकरणाय यत् ॥
tathā te na kṛtaṃ rājanputrasnehānnarādhipa | tasya prāptaṃ phalaṃ viddhi kulāntakaraṇāya yat
हे राजन्, हे नराधिप, तुमने पुत्र-स्नेह के कारण तब ऐसा नहीं किया। जान लो, उसका फल अब आ पहुँचा है, जो कुल का अन्त करने वाला है।
श्लोक 100 (2.97.100)
शमेन धर्मेण नयेन युक्ता । या ते बुद्धिः साऽस्तु ते मा प्रमादीः । प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री- । र्मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ॥
śamena dharmeṇa nayena yuktā | yā te buddhiḥ sā'stu te mā pramādīḥ | pradhvaṃsinī krūrasamāhitā śrī- | rmṛduprauḍhā gacchati putrapautrān
तुम्हारी बुद्धि शान्ति, धर्म और नीति से युक्त रहे; असावधान मत होओ। क्रूरता से जुटाई गई लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, और कोमलता से बढ़ी हुई लक्ष्मी पुत्रों-पौत्रों तक जाती है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 101 (2.97.101)
अथाब्रवीन्महाराजो गान्धारीं धर्मदर्शिनीम् । अन्तः कामं कुलस्यास्तु न शक्नोमि निवारितुम् ॥
athābravīnmahārājo gāndhārīṃ dharmadarśinīm | antaḥ kāmaṃ kulasyāstu na śaknomi nivāritum
तब महाराज ने धर्म को देखने वाली गान्धारी से कहा — "कुल का अन्त होना है तो भले हो; मैं उसे रोक नहीं सकता।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 102 (2.97.102)
यथेच्छन्ति तथैवास्तु प्रत्यागच्छन्तु पाण्डवाः । पुनर्द्यूतं च कुर्वन्तु मामकाः पाण्डवैः सह ॥
yathecchanti tathaivāstu pratyāgacchantu pāṇḍavāḥ | punardyūtaṃ ca kurvantu māmakāḥ pāṇḍavaiḥ saha
जैसा वे चाहते हैं वैसा ही हो। पाण्डव लौट आएँ, और मेरे पुत्र पाण्डवों के साथ फिर से जुआ खेलें।"