सभा पर्व · अध्याय 96
दुर्योधन द्वारा कार्तवीर्य अर्जुन की कथा
दुःशासन दुर्योधन को बताता है कि पिता ने जीता हुआ सब कुछ लौटा दिया है, और दुर्योधन, कर्ण तथा शकुनि धृतराष्ट्र के पास जाकर तर्क देते हैं कि शस्त्रधारी और क्रुद्ध पाण्डवों के वार करने से पहले ही उन्हें नष्ट कर देना चाहिए। दुर्योधन कहता है कि कोई कौरव योद्धा उस अर्जुन का सामना नहीं कर सकता जो सहस्रबाहु अर्जुन के समान है, और धृतराष्ट्र के पूछने पर कार्तवीर्य अर्जुन की कथा सुनाता है — उसका वंश, दत्त से मिले वर, रावण को बन्दी बनाना, और परशुराम के हाथों उसकी मृत्यु, जिसके बाद परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया, जब तक पितरों ने उन्हें रोका नहीं। अन्त में वह कहता है कि पार्थ इन दोनों के समान है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (2.96.1)
अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा सरत्नधनसञ्चयान् । पाण्डवान्धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा ॥
anujñātāṃstānviditvā saratnadhanasañcayān | pāṇḍavāndhārtarāṣṭrāṇāṃ kathamāsīnmanastadā
जब धृतराष्ट्र के पुत्रों को पता चला कि पाण्डवों को रत्नों और धन के संचय सहित जाने की अनुमति मिल गई है, तब उनके मन की क्या दशा हुई?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (2.96.2)
अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा धृतराष्ट्रेण धीमता । राजन्दुःशासनः क्षिप्रं जगाम भ्रातरं प्रति ॥
anujñātāṃstānviditvā dhṛtarāṣṭreṇa dhīmatā | rājanduḥśāsanaḥ kṣipraṃ jagāma bhrātaraṃ prati
हे राजन्, जैसे ही दुःशासन को पता चला कि बुद्धिमान धृतराष्ट्र ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी है, वह तुरन्त अपने भाई के पास गया।
श्लोक 3 (2.96.3)
दुर्योधनं समासाद्य सामात्यं भरतर्षभ । दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ॥
duryodhanaṃ samāsādya sāmātyaṃ bharatarṣabha | duḥkhārto bharataśreṣṭha idaṃ vacanamabravīt
हे भरतर्षभ, मन्त्रियों के बीच बैठे दुर्योधन के पास पहुँचकर, हे भरतश्रेष्ठ, उसने दुःखी होकर यह बात कही —
दुःशासन उवाच
श्लोक 4 (2.96.4)
दुःखेनैतत्समानीतं स्थविरो नाशयत्यसौ । शत्रुसाद्गमयद्द्रव्यं तद्बुध्यध्वं महारथाः ॥
duḥkhenaitatsamānītaṃ sthaviro nāśayatyasau | śatrusādgamayaddravyaṃ tadbudhyadhvaṃ mahārathāḥ
"जो कुछ हमने इतने कष्ट से प्राप्त किया था, उसे यह बूढ़ा नष्ट किए दे रहा है। उसने सारा धन शत्रुओं के हाथ में लौटा दिया है। हे महारथियो, इसे समझ लो!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (2.96.5)
अथ दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । मिथः सङ्गम्य सहिताः पाण्डवान्प्रति मानिनः ॥
atha duryodhanaḥ karṇaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | mithaḥ saṅgamya sahitāḥ pāṇḍavānprati māninaḥ
तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि — ये अभिमानी पुरुष — पाण्डवों के विरुद्ध मन्त्रणा करने के लिए आपस में मिले,
श्लोक 6 (2.96.6)
वैचित्रवीर्यं राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् । अभिगम्य त्वरायुक्ताः श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन् ॥
vaicitravīryaṃ rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ manīṣiṇam | abhigamya tvarāyuktāḥ ślakṣṇaṃ vacanamabruvan
और शीघ्रता से विचित्रवीर्य के पुत्र बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र के पास जाकर उनसे मीठे वचनों में बोले।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 7 (2.96.7)
न त्वयेदं श्रुतं राजन्यज्जगाद बृहस्पतिः । शक्रस्य नीतिं प्रवदन्विद्वान्देवपुरोहितः ॥
na tvayedaṃ śrutaṃ rājanyajjagāda bṛhaspatiḥ | śakrasya nītiṃ pravadanvidvāndevapurohitaḥ
हे राजन्, क्या आपने वह नहीं सुना जो देवताओं के विद्वान पुरोहित बृहस्पति ने इन्द्र की नीति बताते हुए कहा था?
श्लोक 8 (2.96.8)
सर्वोपायैर्निहन्तव्याः शत्रवः शत्रुसूदन । पुरा युद्धाद्बलाद्वापि प्रकुर्वन्ति तवाहितम् ॥
sarvopāyairnihantavyāḥ śatravaḥ śatrusūdana | purā yuddhādbalādvāpi prakurvanti tavāhitam
"हे शत्रुसूदन, शत्रु युद्ध से या बल से तुम्हारा अहित करें, उससे पहले ही उन्हें हर उपाय से नष्ट कर देना चाहिए।"
श्लोक 9 (2.96.9)
ते वयं पाण्डवधनैः सर्वान्सम्पूज्य पार्थिवान् । यदि तान्योधयिष्यामः किं वै नः परिहास्यति ॥
te vayaṃ pāṇḍavadhanaiḥ sarvānsampūjya pārthivān | yadi tānyodhayiṣyāmaḥ kiṃ vai naḥ parihāsyati
यदि हम पाण्डवों के धन से सब राजाओं का सत्कार करके उन्हें अपनी ओर कर लें और फिर पाण्डवों से युद्ध करें, तो हमारा क्या बिगड़ेगा?
श्लोक 10 (2.96.10)
अहीनाशीविषान्क्रुद्धान्नाशाय समुपस्थितान् । कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च कः समुत्स्रष्टुमर्हति ॥
ahīnāśīviṣānkruddhānnāśāya samupasthitān | kṛtvā kaṇṭhe ca pṛṣṭhe ca kaḥ samutsraṣṭumarhati
क्रोध में भरे, विनाश के लिए तैयार विषैले साँपों को गले और पीठ पर डाल लेने के बाद कौन उन्हें छोड़ देने की सोचेगा?
श्लोक 11 (2.96.11)
आत्तशस्त्रा रथगताः कुपितास्तात पाण्डवाः । निःशेषान्नः करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्याशीविषा इव ॥
āttaśastrā rathagatāḥ kupitāstāta pāṇḍavāḥ | niḥśeṣānnaḥ kariṣyanti kruddhā hyāśīviṣā iva
पिताजी, शस्त्र धारण किए, रथों पर सवार और क्रोध से भरे पाण्डव क्रुद्ध विषधर साँपों की तरह हमें पूरी तरह नष्ट कर देंगे।
श्लोक 12 (2.96.12)
सन्नद्धो ह्यर्जुनो याति विधृत्य परमेषुधी । गाण्डीवं मुहुरादत्ते निःश्वसंश्च निरीक्षते ॥
sannaddho hyarjuno yāti vidhṛtya parameṣudhī | gāṇḍīvaṃ muhurādatte niḥśvasaṃśca nirīkṣate
अर्जुन कवच पहनकर, अपने दोनों बड़े तरकश बाँधकर निकल रहा है। वह बार-बार गाण्डीव उठाता है, लम्बी साँसें लेता है और चारों ओर देखता है।
श्लोक 13 (2.96.13)
गदां गुर्वीं समुद्यम्य त्वरितश्च वृकोदरः । स्वरथं योजयित्वाशु निर्यात इति नः श्रुतम् ॥
gadāṃ gurvīṃ samudyamya tvaritaśca vṛkodaraḥ | svarathaṃ yojayitvāśu niryāta iti naḥ śrutam
हमने सुना है कि वृकोदर (भीम) अपनी भारी गदा उठाकर, जल्दी से अपना रथ जुतवाकर निकल पड़ा है।
श्लोक 14 (2.96.14)
नकुलः खड्गमादाय चर्म चाप्यर्धचन्द्रवत् । सहदेवश्च राजा च चक्रुराकारमिङ्गितैः ॥
nakulaḥ khaḍgamādāya carma cāpyardhacandravat | sahadevaśca rājā ca cakrurākāramiṅgitaiḥ
नकुल ने अपनी तलवार और अर्धचन्द्राकार ढाल उठा ली है, और सहदेव तथा राजा युधिष्ठिर ने संकेतों और चेष्टाओं से अपना इरादा प्रकट कर दिया है।
श्लोक 15 (2.96.15)
ते त्वास्थाय रथान्सर्वे बहुशस्त्रपरिच्छदान् । अभिघ्नन्तो रथव्रातान्सेनायोगाय निर्ययुः ॥
te tvāsthāya rathānsarve bahuśastraparicchadān | abhighnanto rathavrātānsenāyogāya niryayuḥ
वे सब अनेक शस्त्रों से सजे रथों पर सवार होकर, अपने घोड़ों को हाँकते हुए सेना जुटाने के लिए निकल पड़े हैं।
श्लोक 16 (2.96.16)
न क्षंस्यन्ते तथाऽस्माभिर्जातु विप्रकृता हि ते । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं कस्तेषां क्षन्तुमर्हति ॥
na kṣaṃsyante tathā'smābhirjātu viprakṛtā hi te | draupadyāśca parikleśaṃ kasteṣāṃ kṣantumarhati
वे हमें कभी क्षमा नहीं करेंगे, क्योंकि हमने उनका अपकार किया है। और द्रौपदी को जो क्लेश दिया गया — उसे उनमें से कौन क्षमा कर सकता है?
श्लोक 17 (2.96.17)
न पश्यामि रणे क्रुद्धं बीभत्सुं प्रतिवारणम् । भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च द्रौणिश्च रथिनां वरः ॥
na paśyāmi raṇe kruddhaṃ bībhatsuṃ prativāraṇam | bhīṣmo droṇaśca karṇaśca drauṇiśca rathināṃ varaḥ
युद्ध में क्रुद्ध बीभत्सु (अर्जुन) को रोक सकने वाला मुझे कोई दिखाई नहीं देता। भीष्म, द्रोण, कर्ण और रथियों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र,
श्लोक 18 (2.96.18)
कृपश्च वृषसेनश्च विकर्णश्च जयद्रथः । वाह्लीकः सोमदत्तश्च भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ॥
kṛpaśca vṛṣasenaśca vikarṇaśca jayadrathaḥ | vāhlīkaḥ somadattaśca bhūrirbhūriśravāḥ śalaḥ
कृप, वृषसेन, विकर्ण, जयद्रथ, बाह्लीक, सोमदत्त, भूरि, भूरिश्रवा, शल,
श्लोक 19 (2.96.19)
शकुनिः ससुतश्चैव नृपाश्चान्ये च कौरवाः । नैते सर्वे रणोद्युक्ताः पार्थं सोढुमशक्नुवन् ॥
śakuniḥ sasutaścaiva nṛpāścānye ca kauravāḥ | naite sarve raṇodyuktāḥ pārthaṃ soḍhumaśaknuvan
पुत्रों सहित शकुनि, और अन्य राजा तथा कौरव — ये सब मिलकर, युद्ध के लिए तैयार होकर भी, पार्थ का सामना नहीं कर सके।
श्लोक 20 (2.96.20)
अर्जुनेन समो लोके नास्ति वीर्ये धनुर्धरः । योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ॥
arjunena samo loke nāsti vīrye dhanurdharaḥ | yo'rjunenārjunastulyo dvibāhurbahubāhunā
संसार में पराक्रम में अर्जुन के बराबर कोई धनुर्धर नहीं है — यह दो भुजाओं वाला अर्जुन, जो अनेक भुजाओं वाले अर्जुन के समान है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 21 (2.96.21)
कस्त्वयोक्तः पुमान्वीरो बीभत्सुसमविक्रमः । तं मे ब्रूहि महावीर्यं श्रोतुमिच्छामि पुत्रक ॥
kastvayoktaḥ pumānvīro bībhatsusamavikramaḥ | taṃ me brūhi mahāvīryaṃ śrotumicchāmi putraka
बेटा, तुम जिस वीर पुरुष की बात कर रहे हो, जिसका पराक्रम बीभत्सु के समान है, वह कौन है? उस महापराक्रमी के विषय में मुझे बताओ; मैं सुनना चाहता हूँ।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 22 (2.96.22)
कार्तवीर्यस्य चरितं शृणु राजन्महात्मनः । अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥
kārtavīryasya caritaṃ śṛṇu rājanmahātmanaḥ | avyaktaprabhavo brahmā sarvalokapitāmahaḥ
हे राजन्, महात्मा कार्तवीर्य का चरित्र सुनिए। अव्यक्त से उत्पन्न ब्रह्मा समस्त लोकों के पितामह हैं।
श्लोक 23 (2.96.23)
ब्रह्मणोऽत्रिः सुतो विद्वानत्रेः पुत्रो निशाकरः । सोमस्य तु बुधः पुत्रो बुधस्य तु पुरूरवाः ॥
brahmaṇo'triḥ suto vidvānatreḥ putro niśākaraḥ | somasya tu budhaḥ putro budhasya tu purūravāḥ
ब्रह्मा के पुत्र विद्वान अत्रि थे, और अत्रि के पुत्र चन्द्रमा। चन्द्रमा के पुत्र बुध थे, और बुध के पुरूरवा।
श्लोक 24 (2.96.24)
तस्याप्यथ सुतोऽप्यायुरायोस्तु नहुषः सुतः । नहुषस्य ययातिस्तु ययातेस्तनुजो यदुः ॥
tasyāpyatha suto'pyāyurāyostu nahuṣaḥ sutaḥ | nahuṣasya yayātistu yayātestanujo yaduḥ
उनके पुत्र आयु थे, और आयु के पुत्र नहुष। नहुष के पुत्र ययाति थे, और ययाति के पुत्र यदु।
श्लोक 25 (2.96.25)
यदोः पुत्रो महाराज सहस्रौजेति विश्रुतः । सहस्रौजसुतो राजञ्छक्रदासेति विश्रुतः ॥
yadoḥ putro mahārāja sahasraujeti viśrutaḥ | sahasraujasuto rājañchakradāseti viśrutaḥ
हे महाराज, यदु के पुत्र सहस्रौज नाम से विख्यात थे; और हे राजन्, सहस्रौज के पुत्र शक्रदास नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 26 (2.96.26)
शक्रदासस्य दायादो हेहयो नाम पार्थिवः । हेहयस्याभवत्पुत्रो धर्मनेत्र इति श्रुतः ॥
śakradāsasya dāyādo hehayo nāma pārthivaḥ | hehayasyābhavatputro dharmanetra iti śrutaḥ
शक्रदास के उत्तराधिकारी हेहय नाम के राजा थे, और हेहय के पुत्र धर्मनेत्र नाम से जाने गए।
श्लोक 27 (2.96.27)
धर्मनेत्रस्य तु कृती कृतवीर्यस्तु कार्तिजः । कृतवीर्यस्य तनयो ह्यर्जुनो बलिनां वरः ॥
dharmanetrasya tu kṛtī kṛtavīryastu kārtijaḥ | kṛtavīryasya tanayo hyarjuno balināṃ varaḥ
धर्मनेत्र के पुत्र कृती थे, और कृती से कृतवीर्य उत्पन्न हुए। कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन थे, जो बलवानों में श्रेष्ठ थे।
श्लोक 28 (2.96.28)
स चार्जुनो महाराज तपो घोरं चकार ह । साग्रं वर्षायुतं जज्ञ इत्येवं मे श्रुतं पुरा ॥
sa cārjuno mahārāja tapo ghoraṃ cakāra ha | sāgraṃ varṣāyutaṃ jajña ityevaṃ me śrutaṃ purā
हे महाराज, उस अर्जुन ने घोर तपस्या की, और उसमें दस हज़ार वर्ष से भी अधिक बीत गए — ऐसा मैंने पहले सुना है।
श्लोक 29 (2.96.29)
तथेयं पृथिवी राजन्सप्तद्वीपा सपत्तना । ससमुद्राकरा तात विधिनोग्रेण वै जिता ॥
tatheyaṃ pṛthivī rājansaptadvīpā sapattanā | sasamudrākarā tāta vidhinogreṇa vai jitā
और इस प्रकार, हे राजन्, सात द्वीपों और नगरों वाली, समुद्रों और खानों सहित यह पृथ्वी, पिताजी, उसके कठोर अनुशासन से जीत ली गई।
श्लोक 30 (2.96.30)
स चार्जुनोऽथ तेजस्वी तपः परमदुश्चरम् । दत्तमाराधयामास सोऽर्जुनोऽत्रिसुतं मुनिम् ॥
sa cārjuno'tha tejasvī tapaḥ paramaduścaram | dattamārādhayāmāsa so'rjuno'trisutaṃ munim
तब उस तेजस्वी अर्जुन ने अत्यन्त कठिन तपस्या के द्वारा अत्रिपुत्र मुनि दत्त की आराधना की।
श्लोक 31 (2.96.31)
तस्य दत्तो वरान्प्रादाच्चतुरः पार्थिवस्य वै । पूर्वं बाहुसहस्रं तु प्रार्थितः परमो वरः ॥
tasya datto varānprādāccaturaḥ pārthivasya vai | pūrvaṃ bāhusahasraṃ tu prārthitaḥ paramo varaḥ
दत्त ने उस राजा को चार वर दिए। पहला, जो परम वर उसने माँगा था, वह था सहस्र भुजाएँ;
श्लोक 32 (2.96.32)
अधर्मे प्रीयमाणस्य सद्भिस्तत्र निवारणम् । धर्मेण पृथिवीं जित्वा धर्मेणैव हि रञ्जनम् ॥
adharme prīyamāṇasya sadbhistatra nivāraṇam | dharmeṇa pṛthivīṃ jitvā dharmeṇaiva hi rañjanam
दूसरा, कि जब वह अधर्म में रुचि ले, तब सज्जन उसे रोकें; तीसरा, कि धर्म से पृथ्वी जीतकर वह धर्म से ही प्रजा को प्रसन्न रखे;
श्लोक 33 (2.96.33)
सङ्ग्रामान्सुबहून्कृत्वा हत्वा चारीन्सहस्रशः । सङ्ग्रामे यतमानस्य वधश्चैवाधिकाद्रणे ॥
saṅgrāmānsubahūnkṛtvā hatvā cārīnsahasraśaḥ | saṅgrāme yatamānasya vadhaścaivādhikādraṇe
और चौथा, कि बहुत से संग्राम लड़कर और हज़ारों शत्रुओं को मारकर, युद्ध में जूझते हुए उसकी मृत्यु अपने से श्रेष्ठ के हाथों हो।
श्लोक 34 (2.96.34)
तस्य बाहुसहस्रं तु युध्यतः किल भारत । रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञ इत्येवं मे श्रुतं पुरा ॥
tasya bāhusahasraṃ tu yudhyataḥ kila bhārata | ratho dhvajaśca sañjajña ityevaṃ me śrutaṃ purā
हे भारत, जब वह युद्ध करता था, तब उसकी सहस्र भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं, और साथ ही रथ और ध्वज भी — ऐसा मैंने पहले सुना है।
श्लोक 35 (2.96.35)
तथेयं पृथिवी राजन्त्सप्तद्वीपा सपत्तना । ससमुद्राकरा तात विधिनोग्रेण वै जिता ॥
tatheyaṃ pṛthivī rājantsaptadvīpā sapattanā | sasamudrākarā tāta vidhinogreṇa vai jitā
और इस प्रकार, हे राजन्, सात द्वीपों और नगरों वाली, समुद्रों और खानों सहित यह पृथ्वी, पिताजी, उसके कठोर अनुशासन से जीत ली गई।
श्लोक 36 (2.96.36)
स चार्जुनोऽथ तेजस्वी सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत् । स च राजा महायज्ञानाजहार महाबलः । प्रशशास महाबाहुर्महीं स च समा बहूः ॥
sa cārjuno'tha tejasvī saptadvīpeśvaro'bhavat | sa ca rājā mahāyajñānājahāra mahābalaḥ | praśaśāsa mahābāhurmahīṃ sa ca samā bahūḥ
तब वह तेजस्वी अर्जुन सातों द्वीपों का स्वामी बन गया। उस महाबली राजा ने बड़े-बड़े यज्ञ किए, और उस महाबाहु ने बहुत वर्षों तक पृथ्वी पर शासन किया।
श्लोक 37 (2.96.37)
ततोऽर्जुनः कदाचिद्वै राजन्माहिष्मतीपतिः । नर्मदां भरतश्रेष्ठ तां तु दारैर्ययौ सह ॥
tato'rjunaḥ kadācidvai rājanmāhiṣmatīpatiḥ | narmadāṃ bharataśreṣṭha tāṃ tu dārairyayau saha
फिर एक बार, हे राजन्, माहिष्मती का स्वामी अर्जुन अपनी पत्नियों के साथ नर्मदा के तट पर गया, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 38 (2.96.38)
ततस्तां स नदीं गत्वा प्रविश्यान्तर्जले तदा । कर्तुं राजञ्जलक्रीडां ततो राजोपचक्रमे ॥
tatastāṃ sa nadīṃ gatvā praviśyāntarjale tadā | kartuṃ rājañjalakrīḍāṃ tato rājopacakrame
हे राजन्, उस नदी पर पहुँचकर और उसके जल में उतरकर राजा जलक्रीड़ा करने लगा।
श्लोक 39 (2.96.39)
तस्मिन्नेव ततः काले रावणो राक्षसैः सह । लङ्काया ईश्वरस्तात तं देशं प्रययौ बली ॥
tasminneva tataḥ kāle rāvaṇo rākṣasaiḥ saha | laṅkāyā īśvarastāta taṃ deśaṃ prayayau balī
उसी समय, पिताजी, लंका का बलवान स्वामी रावण अपने राक्षसों के साथ उस प्रदेश में आया।
श्लोक 40 (2.96.40)
ततस्तमर्जुनं दृष्ट्वा नर्मदायां दशाननः । नित्यं क्रोधपरो धीरो वरदानेन मोहितः ॥
tatastamarjunaṃ dṛṣṭvā narmadāyāṃ daśānanaḥ | nityaṃ krodhaparo dhīro varadānena mohitaḥ
नर्मदा में अर्जुन को देखकर वह दशानन, जो सदा क्रोध में रहता था, साहसी था और वरदान से मोहित था,
श्लोक 41 (2.96.41)
अभ्यधावत्सुसङ्क्रुद्धो महेन्द्रं शम्बरो यथा । अर्जुनोऽप्यथ तं दृष्ट्वा रावणं प्रत्यवारयत् ॥
abhyadhāvatsusaṅkruddho mahendraṃ śambaro yathā | arjuno'pyatha taṃ dṛṣṭvā rāvaṇaṃ pratyavārayat
अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस पर ऐसे टूट पड़ा जैसे शम्बर महेन्द्र पर टूटा था। अर्जुन ने भी रावण को देखकर उसे रोका।
श्लोक 42 (2.96.42)
ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं रावणश्चार्जुनश्च वै । ततस्तु दुर्जयं वीरं वरदानेन दर्पितम् ॥
tatastau cakraturyuddhaṃ rāvaṇaścārjunaśca vai | tatastu durjayaṃ vīraṃ varadānena darpitam
तब रावण और अर्जुन दोनों में युद्ध हुआ। फिर उस दुर्जय वीर को, जो वरदान से घमण्डी हो गया था,
श्लोक 43 (2.96.43)
राक्षसेन्द्रं मनुष्येन्द्रो जित्वा बद्ध्वा रणे बलात् । बद्ध्वा धनुर्ज्यया राजन्विवेशाथ पुरीं स्वकाम् ॥
rākṣasendraṃ manuṣyendro jitvā baddhvā raṇe balāt | baddhvā dhanurjyayā rājanviveśātha purīṃ svakām
उस राक्षसराज को मनुष्यों के राजा ने युद्ध में बलपूर्वक जीतकर पकड़ लिया; और हे राजन्, उसे धनुष की डोरी से बाँधकर वह अपने नगर में प्रवेश कर गया।
श्लोक 44 (2.96.44)
स तु तं बन्धितं श्रुत्वा पुलस्त्यो रावणं तदा । मोक्षयामास बन्धाद्वै पुरे दृष्ट्वाऽर्जुनं तदा ॥
sa tu taṃ bandhitaṃ śrutvā pulastyo rāvaṇaṃ tadā | mokṣayāmāsa bandhādvai pure dṛṣṭvā'rjunaṃ tadā
रावण के बन्दी होने की बात सुनकर पुलस्त्य उस नगर में आए, अर्जुन से मिले और रावण को बन्धन से छुड़वाया।
श्लोक 45 (2.96.45)
ततः कदाचित्तेजस्वी कार्तवीर्योऽर्जुनो बली । समुद्रतीरं गत्वाथ विचरन्दर्पमोहितः ॥
tataḥ kadācittejasvī kārtavīryo'rjuno balī | samudratīraṃ gatvātha vicarandarpamohitaḥ
फिर एक बार तेजस्वी और बलवान कार्तवीर्य अर्जुन, घमण्ड में चूर होकर समुद्र के किनारे घूमते हुए,
श्लोक 46 (2.96.46)
अवाकिरच्छितशरैः समुद्रं स तु भारत । तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरभाषत ॥
avākiracchitaśaraiḥ samudraṃ sa tu bhārata | taṃ samudro namaskṛtya kṛtāñjalirabhāṣata
हे भारत, समुद्र पर तीखे बाणों की वर्षा करने लगा। तब समुद्र ने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा —
समुद्र उवाच
श्लोक 47 (2.96.47)
आशुगान्वीर मा मुञ्च ब्रूहि किं करवाणि ते । मदाश्रयाणि सत्वानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः । बाध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥
āśugānvīra mā muñca brūhi kiṃ karavāṇi te | madāśrayāṇi satvāni tvadvisṛṣṭairmaheṣubhiḥ | bādhyante rājaśārdūla tebhyo dehyabhayaṃ vibho
"हे वीर, अपने शीघ्रगामी बाण मत छोड़ो। बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? हे राजसिंह, मेरे आश्रय में रहने वाले जीव तुम्हारे छोड़े हुए बड़े-बड़े बाणों से पीड़ित हो रहे हैं। हे प्रभो, उन्हें अभय दो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 48 (2.96.48)
देहि सिन्धुपते युद्धमद्यैव त्वरया मम । अथवा पीडयामि त्वां तस्मात्त्वं कुरु माचिरम् ॥
dehi sindhupate yuddhamadyaiva tvarayā mama | athavā pīḍayāmi tvāṃ tasmāttvaṃ kuru māciram
हे सिन्धुपति, मुझसे अभी, इसी समय, तुरन्त युद्ध करो। नहीं तो मैं तुम्हें पीड़ा दूँगा — इसलिए देर मत करो।
समुद्र उवाच
श्लोक 49 (2.96.49)
लोके राजन्महावीर्या बहवो निवसन्ति ये । तेषामेकेन राजेन्द्र कुरु युद्धं महाबल ॥
loke rājanmahāvīryā bahavo nivasanti ye | teṣāmekena rājendra kuru yuddhaṃ mahābala
हे राजन्, संसार में बहुत से महापराक्रमी पुरुष रहते हैं। हे महाबली राजेन्द्र, उनमें से किसी एक से युद्ध करो।
अर्जुन उवाच
श्लोक 50 (2.96.50)
मत्समो यदि सङ्ग्रामे वरायुधधरः क्वचित् । विद्यते तं ममाचक्ष्व यः समासेत मा मृधे ॥
matsamo yadi saṅgrāme varāyudhadharaḥ kvacit | vidyate taṃ mamācakṣva yaḥ samāseta mā mṛdhe
यदि कहीं कोई युद्ध में मेरे समान, श्रेष्ठ अस्त्र धारण करने वाला ऐसा पुरुष है जो संग्राम में मेरा सामना कर सके, तो मुझे उसका नाम बताओ।
समुद्र उवाच
श्लोक 51 (2.96.51)
महर्षिर्जमदग्निस्तु यदि राजन्परिश्रुतः । तस्य पुत्रो रणं दातुं यथावद्वै तवार्हति ॥
maharṣirjamadagnistu yadi rājanpariśrutaḥ | tasya putro raṇaṃ dātuṃ yathāvadvai tavārhati
हे राजन्, यदि तुमने महर्षि जमदग्नि का नाम सुना है, तो उनका पुत्र ही तुम्हें यथोचित युद्ध देने में समर्थ है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 52 (2.96.52)
समुद्रस्य वचः श्रुत्वा राजा माहिष्मतीपतिः । नारदस्य च वै पूर्वं क्रोधेन महता वृतः ॥
samudrasya vacaḥ śrutvā rājā māhiṣmatīpatiḥ | nāradasya ca vai pūrvaṃ krodhena mahatā vṛtaḥ
समुद्र की बात सुनकर, और उससे पहले नारद की बात भी सुन चुका होने के कारण, माहिष्मती का स्वामी वह राजा भारी क्रोध से भर गया।
श्लोक 53 (2.96.53)
ततः प्रतिययौ शीघ्रं क्रोधेन सह भारत । स तमाश्रममागत्य काममेवान्वपद्यत ॥
tataḥ pratiyayau śīghraṃ krodhena saha bhārata | sa tamāśramamāgatya kāmamevānvapadyata
हे भारत, वह क्रोध में भरकर शीघ्र ही चल पड़ा, और उस आश्रम में पहुँचकर उसने मनमानी की।
श्लोक 54 (2.96.54)
स कामं प्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः । आयासं जनयामास रामस्य स महात्मनः ॥
sa kāmaṃ pratikūlāni cakāra saha bandhubhiḥ | āyāsaṃ janayāmāsa rāmasya sa mahātmanaḥ
अपने बन्धुओं के साथ मिलकर उसने मनमाने ढंग से अनेक विरोधी काम किए और महात्मा राम को बहुत कष्ट पहुँचाया।
श्लोक 55 (2.96.55)
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः । प्रदहन्निव सैन्यानि रश्मिमानिव तेजसा ॥
tatastejaḥ prajajvāla rāmasyāmitatejasaḥ | pradahanniva sainyāni raśmimāniva tejasā
तब अपरिमित तेज वाले राम का तेज भड़क उठा, मानो वह सूर्य की किरणों की तरह सेनाओं को जला देगा।
श्लोक 56 (2.96.56)
अथ तौ चक्रतुर्युद्धं वृत्रवासवयोरिव ॥
atha tau cakraturyuddhaṃ vṛtravāsavayoriva
तब उन दोनों में वृत्र और इन्द्र के समान युद्ध हुआ।
श्लोक 57 (2.96.57)
ततः परशुमादाय नृपं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् ॥
tataḥ paraśumādāya nṛpaṃ bāhusahasriṇam | ciccheda sahasā rāmo bahuśākhamiva drumam
तब राम ने परशु उठाकर उस सहस्रबाहु राजा को सहसा ऐसे काट डाला जैसे अनेक शाखाओं वाले वृक्ष को काट दिया जाता है।
श्लोक 58 (2.96.58)
तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेतास्तस्य बान्धवाः । असीनादाय शक्तीश्च रामं ते प्रत्यवारयन् ॥
taṃ hataṃ patitaṃ dṛṣṭvā sametāstasya bāndhavāḥ | asīnādāya śaktīśca rāmaṃ te pratyavārayan
उसे मारा गया और गिरा हुआ देखकर उसके बन्धु-बान्धव इकट्ठे हो गए और तलवारें तथा शक्तियाँ लेकर राम पर टूट पड़े।
श्लोक 59 (2.96.59)
रामोऽपि रथमास्थाय धनुरायम्य सत्वरः । विसृजन्परमास्त्राणि व्यधमत्पार्थिवान्बली ॥
rāmo'pi rathamāsthāya dhanurāyamya satvaraḥ | visṛjanparamāstrāṇi vyadhamatpārthivānbalī
राम ने भी रथ पर चढ़कर तुरन्त धनुष ताना, और श्रेष्ठ अस्त्र छोड़ते हुए उस बलवान ने उन राजाओं का संहार कर दिया।
श्लोक 60 (2.96.60)
ततस्तु क्षत्रिया राजञ्जामदग्न्यभयार्दिताः । विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहभयादिव ॥
tatastu kṣatriyā rājañjāmadagnyabhayārditāḥ | viviśurgiridurgāṇi mṛgāḥ siṃhabhayādiva
तब, हे राजन्, जमदग्निपुत्र के भय से पीड़ित क्षत्रिय पहाड़ी दुर्गों में ऐसे जा छिपे जैसे सिंह के डर से हिरन छिपते हैं।
श्लोक 61 (2.96.61)
तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठति । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥
teṣāṃ svavihitaṃ karma tadbhayānnānutiṣṭhati | prajā vṛṣalatāṃ prāptā brāhmaṇānāmadarśanāt
उसके भय से वे अपने लिए विहित कर्म नहीं करते थे, और ब्राह्मणों के दर्शन न होने से उनकी प्रजा शूद्रभाव को प्राप्त हो गई।
श्लोक 62 (2.96.62)
तथा च द्रविडाः काचाः पुण्ड्राश्च शबरैः सह । वृषलत्वं परिगता विच्छिन्नाः क्षत्रधर्मिणः ॥
tathā ca draviḍāḥ kācāḥ puṇḍrāśca śabaraiḥ saha | vṛṣalatvaṃ parigatā vicchinnāḥ kṣatradharmiṇaḥ
इसी प्रकार द्रविड, काच और पुण्ड्र, शबरों के साथ — जो कभी क्षत्रिय-धर्म का पालन करते थे — उससे कटकर शूद्रभाव को प्राप्त हो गए।
श्लोक 63 (2.96.63)
ततस्तु हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः । द्विजैरभ्युदितं क्षत्रं तानि रामो निहत्य च ॥
tatastu hatavīrāsu kṣatriyāsu punaḥ punaḥ | dvijairabhyuditaṃ kṣatraṃ tāni rāmo nihatya ca
फिर, बार-बार, जब क्षत्रिय स्त्रियों के वीर मारे जा चुके थे, तब ब्राह्मणों ने उनसे क्षत्रिय वंश को फिर से उत्पन्न किया; और राम ने उन्हें भी बार-बार मार डाला।
श्लोक 64 (2.96.64)
ततस्त्रिःसप्तमे याते रामं वागशरीरिणी । दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता ॥
tatastriḥsaptame yāte rāmaṃ vāgaśarīriṇī | divyā provāca madhurā sarvalokapariśrutā
फिर जब इक्कीसवीं बार पूरी हुई, तब समस्त लोकों में सुनाई देने वाली एक मधुर, दिव्य, अशरीरी वाणी ने राम से कहा —
वागुवाच
श्लोक 65 (2.96.65)
रामराम निवर्तस्व स्वगुणं नात्र पश्यसि । क्षत्रबन्धूनिमान्प्राणैर्विप्रयुज्य पुनः पुनः ॥
rāmarāma nivartasva svaguṇaṃ nātra paśyasi | kṣatrabandhūnimānprāṇairviprayujya punaḥ punaḥ
"राम, राम, लौट जाओ! इन क्षत्रियों को बार-बार प्राणों से वियुक्त करने में तुम्हें अपना कोई हित दिखाई नहीं देगा।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 66 (2.96.66)
तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तथा । रामराम महावीर्य निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन् ॥
tathaiva taṃ mahātmānamṛcīkapramukhāstathā | rāmarāma mahāvīrya nivartasvetyathābruvan
इसी प्रकार ऋचीक आदि पितरों ने भी उस महात्मा से कहा — "राम, राम, हे महापराक्रमी, लौट जाओ।"
श्लोक 67 (2.96.67)
पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन् । नार्हा हन्त भवन्तो मां निवारयितुमित्युत ॥
piturvadhamamṛṣyaṃstu rāmaḥ provāca tānṛṣīn | nārhā hanta bhavanto māṃ nivārayitumityuta
परन्तु पिता के वध को सहन न कर पाने वाले राम ने उन ऋषियों से कहा — "आप लोगों को मुझे रोकना नहीं चाहिए।"
पितर ऊचुः
श्लोक 68 (2.96.68)
नार्हसि क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतां वर । न हि युक्तं त्वया तात ब्राह्मणेन सता नृपान् ॥
nārhasi kṣatrabandhūṃstvaṃ nihantuṃ jayatāṃ vara | na hi yuktaṃ tvayā tāta brāhmaṇena satā nṛpān
हे विजेताओं में श्रेष्ठ, तुम्हें इन क्षत्रियों को नहीं मारना चाहिए। तात, तुम ब्राह्मण होकर राजाओं का वध करो, यह उचित नहीं है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 69 (2.96.69)
पितॄणां वचनं श्रुत्वा क्रोधं त्यक्त्वा स भार्गवः । अश्वमेधसहस्राणि नरमेधशतानि च ॥
pitṝṇāṃ vacanaṃ śrutvā krodhaṃ tyaktvā sa bhārgavaḥ | aśvamedhasahasrāṇi naramedhaśatāni ca
पितरों की बात सुनकर भृगुवंशी राम ने क्रोध त्याग दिया। उन्होंने एक हज़ार अश्वमेध और सौ नरमेध यज्ञ किए,
श्लोक 70 (2.96.70)
इष्ट्वा सागरपर्यन्तां काश्यपाय ददौ महीम् । तेन रामेण सङ्ग्रामे तुल्यस्तात धनञ्जयः ॥
iṣṭvā sāgaraparyantāṃ kāśyapāya dadau mahīm | tena rāmeṇa saṅgrāme tulyastāta dhanañjayaḥ
और उन्हें सम्पन्न करके उन्होंने समुद्र तक फैली पृथ्वी कश्यप को दान कर दी। पिताजी, युद्ध में धनंजय उन्हीं राम के समान है,
श्लोक 71 (2.96.71)
कार्तवीर्येण च रणे तुल्यः पार्थो न संशयः । रणे विक्रम्य राजेन्द्र पार्थं जेतुं न शक्यते ॥
kārtavīryeṇa ca raṇe tulyaḥ pārtho na saṃśayaḥ | raṇe vikramya rājendra pārthaṃ jetuṃ na śakyate
और युद्ध में कार्तवीर्य के समान भी है, इसमें कोई सन्देह नहीं। हे राजेन्द्र, पराक्रम दिखाकर भी युद्ध में पार्थ को जीता नहीं जा सकता।