सभा पर्व · अध्याय 95
धृतराष्ट्र द्वारा पाण्डवों की विदाई
युधिष्ठिर धृतराष्ट्र से पूछते हैं कि पाण्डव उनके लिए क्या करें, और वृद्ध राजा उन्हें सारे धन के साथ घर लौटने की अनुमति दे देते हैं। वे युधिष्ठिर को सज्जनों के आचरण का उपदेश देते हैं, जो अपकार भूल जाते हैं और कठोरता का उत्तर संयम से देते हैं; वे उनसे दुर्योधन के अपमान को मन से निकाल देने को कहते हैं और कहते हैं कि उन्होंने द्यूत केवल मित्रों और पुत्रों को परखने के लिए होने दिया था। युधिष्ठिर विधिपूर्वक विदा लेते हैं और भाई द्रौपदी के साथ इन्द्रप्रस्थ की ओर चल पड़ते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (2.95.1)
राजन्किं करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमीश्वरः । नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत शासने ॥
rājankiṃ karavāmaste praśādhyasmāṃstvamīśvaraḥ | nityaṃ hi sthātumicchāmastava bhārata śāsane
हे राजन्, हम आपके लिए क्या करें? आप हमारे स्वामी हैं, हमें आज्ञा दीजिए। हे भारत, हम सदा आपके ही शासन में रहना चाहते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 2 (2.95.2)
अजातशत्रो भद्रं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत । अनुज्ञाताः सहधनाः स्वराज्यमनुशासत ॥
ajātaśatro bhadraṃ te ariṣṭaṃ svasti gacchata | anujñātāḥ sahadhanāḥ svarājyamanuśāsata
अजातशत्रु, तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब सकुशल और सुरक्षित जाओ। मेरी अनुमति है — अपना धन साथ लेकर जाओ और अपने राज्य का शासन करो।
श्लोक 3 (2.95.3)
इदं चैवावबोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् । मया निगदितं सर्वं पथ्यं निःश्रेयसं परम् ॥
idaṃ caivāvaboddhavyaṃ vṛddhasya mama śāsanam | mayā nigaditaṃ sarvaṃ pathyaṃ niḥśreyasaṃ param
और मुझ वृद्ध की यह बात भी मन में बिठा लो — मैंने जो कुछ कहा है, वह सब हितकर है और परम कल्याण देने वाला है।
श्लोक 4 (2.95.4)
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर । विनीतोऽसि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता ॥
vettha tvaṃ tāta dharmāṇāṃ gatiṃ sūkṣmāṃ yudhiṣṭhira | vinīto'si mahāprājña vṛddhānāṃ paryupāsitā
बेटा युधिष्ठिर, तुम धर्म की सूक्ष्म गति को जानते हो। हे महाबुद्धिमान, तुम विनयी हो और तुमने बड़े-बूढ़ों की सेवा की है।
श्लोक 5 (2.95.5)
यतो बुद्धिस्ततः शान्तिः प्रशमं गच्छ भारत । नादारुणि पतेच्छस्त्रं दारुण्येतन्निपात्यते ॥
yato buddhistataḥ śāntiḥ praśamaṃ gaccha bhārata | nādāruṇi patecchastraṃ dāruṇyetannipātyate
जहाँ विवेक है, वहीं शान्ति है। हे भारत, अपने मन को शान्त करो। जहाँ लकड़ी नहीं होती, वहाँ कुल्हाड़ी नहीं गिरती; वह लकड़ी पर ही चलाई जाती है।
श्लोक 6 (2.95.6)
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान्पश्यन्ति नागुणान् । विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषाः ॥
na vairāṇyabhijānanti guṇānpaśyanti nāguṇān | virodhaṃ nādhigacchanti ye ta uttamapūruṣāḥ
उत्तम पुरुष वैर का हिसाब नहीं रखते। वे दूसरों में गुण देखते हैं, दोष नहीं, और विरोध में नहीं पड़ते।
श्लोक 7 (2.95.7)
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ति प्रतिक्रियाम् ॥
smaranti sukṛtānyeva na vairāṇi kṛtānyapi | santaḥ parārthaṃ kurvāṇā nāvekṣanti pratikriyām
सज्जन केवल अपने प्रति किए गए उपकारों को याद रखते हैं, किए गए वैर को नहीं — भले ही वैर किया गया हो। वे दूसरों के हित के लिए काम करते हैं और बदले की आशा नहीं रखते।
श्लोक 8 (2.95.8)
संवादे परुषाण्याहुर्युधिष्ठिर नराधमाः । प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेऽनुक्ता नराधमाः ॥
saṃvāde paruṣāṇyāhuryudhiṣṭhira narādhamāḥ | pratyāhurmadhyamāstvete'nuktā narādhamāḥ
युधिष्ठिर, विवाद में कठोर वचन अधम पुरुष बोलते हैं। मध्यम पुरुष पलटकर उत्तर देते हैं; और जो बिना कुछ कहे गए ही कठोर बोलते हैं, वे सबसे नीच हैं।
श्लोक 9 (2.95.9)
न चोक्ता नैव चानुक्तास्त्वहिताः परुषा गिरः । प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा तूत्तमपुरुषाः ॥
na coktā naiva cānuktāstvahitāḥ paruṣā giraḥ | pratijalpanti vai dhīrāḥ sadā tūttamapuruṣāḥ
परन्तु धीर और उत्तम पुरुष, चाहे उनसे कठोर बात कही गई हो या न कही गई हो, कभी अहितकर और कठोर वचनों से प्रत्युत्तर नहीं देते।
श्लोक 10 (2.95.10)
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ॥
smaranti sukṛtānyeva na vairāṇi kṛtānyapi | santaḥ prativijānanto labdhvā pratyayamātmanaḥ
सज्जन केवल उपकारों को याद रखते हैं, किए गए वैर को नहीं; अपने ऊपर भरोसा पाकर वे दूसरों को ठीक-ठीक समझते हैं।
श्लोक 11 (2.95.11)
असम्भिन्नार्यमर्यादाः साधवः प्रियदर्शनाः । तथा चरितमार्येण त्वयाऽस्मिन्सत्समागमे ॥
asambhinnāryamaryādāḥ sādhavaḥ priyadarśanāḥ | tathā caritamāryeṇa tvayā'sminsatsamāgame
साधु पुरुष, जिनका दर्शन ही सुखद होता है, आर्यों की मर्यादा कभी नहीं तोड़ते। तुमने भी, आर्य होकर, सज्जनों की इस सभा में वैसा ही आचरण किया है।
श्लोक 12 (2.95.12)
दुर्योधनस्य पारुष्यं तत्तात हृदि मा कृथाः । मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वं गुणकाङ्क्षया ॥
duryodhanasya pāruṣyaṃ tattāta hṛdi mā kṛthāḥ | mātaraṃ caiva gāndhārīṃ māṃ ca tvaṃ guṇakāṅkṣayā
इसलिए, बेटा, दुर्योधन की कठोरता को हृदय में मत रखो। सद्गुणों के प्रति अपने प्रेम के कारण अपनी माता गान्धारी का और मेरा ध्यान करो —
श्लोक 13 (2.95.13)
उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत । प्रेक्षापूर्वं मया द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम् ॥
upasthitaṃ vṛddhamandhaṃ pitaraṃ paśya bhārata | prekṣāpūrvaṃ mayā dyūtamidamāsīdupekṣitam
हे भारत, अपने सामने खड़े इस वृद्ध और अन्धे पिता की ओर देखो। मैंने सोच-समझकर ही इस द्यूत को होने दिया था,
श्लोक 14 (2.95.14)
मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च बलाबलम् । अशोच्याः कुरवो राजन्येषां त्वमनुशासिता ॥
mitrāṇi draṣṭukāmena putrāṇāṃ ca balābalam | aśocyāḥ kuravo rājanyeṣāṃ tvamanuśāsitā
क्योंकि मैं मित्रों को और अपने पुत्रों के बल और दुर्बलता को परखना चाहता था। हे राजन्, जिन कुरुओं के मार्गदर्शक तुम हो, उनके लिए शोक करने की कोई बात नहीं,
श्लोक 15 (2.95.15)
मन्त्री च विदुरो धीमान्सर्वशास्त्रविशारदः । त्वयि धर्मोऽर्जुने धैर्यं भीमसेने पराक्रमः ॥
mantrī ca viduro dhīmānsarvaśāstraviśāradaḥ | tvayi dharmo'rjune dhairyaṃ bhīmasene parākramaḥ
और जब समस्त शास्त्रों में निपुण बुद्धिमान विदुर उनके मन्त्री हैं। तुममें धर्म है, अर्जुन में धैर्य है, भीमसेन में पराक्रम है,
श्लोक 16 (2.95.16)
शुद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयोः पुरुषाग्र्ययोः । अजातशत्रो भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश । भ्रातृभिस्तेऽस्तु सौभ्रात्रं धर्मे ते धीयतां मनः ॥
śuddhā ca guruśuśrūṣā yamayoḥ puruṣāgryayoḥ | ajātaśatro bhadraṃ te khāṇḍavaprasthamāviśa | bhrātṛbhiste'stu saubhrātraṃ dharme te dhīyatāṃ manaḥ
और पुरुषों में श्रेष्ठ दोनों जुड़वाँ भाइयों में गुरुजनों की निर्मल सेवा है। अजातशत्रु, तुम्हारा कल्याण हो — खाण्डवप्रस्थ लौट जाओ। भाइयों के साथ तुम्हारा सच्चा भ्रातृप्रेम बना रहे और तुम्हारा मन धर्म में लगा रहे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (2.95.17)
इत्युक्तो भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिरः । कृत्वाऽऽर्यसमयं सर्वं प्रतस्थे भ्रातृभिः सह ॥
ityukto bharataśreṣṭha dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | kṛtvā''ryasamayaṃ sarvaṃ pratasthe bhrātṛbhiḥ saha
हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा कहे जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने आर्यजनों की सारी मर्यादाओं का पालन किया और भाइयों के साथ प्रस्थान किया।
श्लोक 18 (2.95.18)
ते रथान्मेघसङ्काशानास्थाय सह कृष्णया । प्रययुर्हृष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥
te rathānmeghasaṅkāśānāsthāya saha kṛṣṇayā | prayayurhṛṣṭamanasa indraprasthaṃ purottamam
बादलों जैसे दिखने वाले रथों पर सवार होकर वे कृष्णा (द्रौपदी) के साथ प्रसन्न मन से श्रेष्ठ नगर इन्द्रप्रस्थ की ओर चल पड़े।