सभा पर्व · अध्याय 94
कर्ण का व्यंग्य और भीम का क्रोध
कर्ण पाण्डवों का उपहास करता है कि एक स्त्री ही उन्हें पार लगाने वाली नौका बनी। इससे आहत भीम देवल के अनुसार पुरुष की तीन ज्योतियों की बात कहकर पूछते हैं कि अपमानित पत्नी से उत्पन्न सन्तान उनकी कैसे हो सकती है, जबकि अर्जुन समझाते हैं कि उत्तम पुरुष कठोर वचनों का उत्तर नहीं देते। भीम वहीं शत्रुओं को मार डालने को तैयार हो जाते हैं और क्रोध से उनके शरीर से आग निकलने लगती है, तब युधिष्ठिर उन्हें रोकते हैं और हाथ जोड़कर धृतराष्ट्र के पास जाते हैं।
कर्ण उवाच
श्लोक 1 (2.94.1)
या नः श्रुता मनुष्येषु स्त्रियो रूपेण संमताः । तासामेतादृशं कर्म न कस्याश्चन शुश्रुम ॥
yā naḥ śrutā manuṣyeṣu striyo rūpeṇa saṃmatāḥ | tāsāmetādṛśaṃ karma na kasyāścana śuśruma
मनुष्यों में जितनी स्त्रियाँ सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध सुनी गई हैं, उनमें से किसी ने ऐसा काम किया हो, यह हमने कभी नहीं सुना।
श्लोक 2 (2.94.2)
क्रोधाविष्टेषु पार्थेषु धार्तराष्ट्रेषु चाप्यति । द्रौपदी पाण्डुपुत्राणां कृष्णा शान्तिरिहाभवत् ॥
krodhāviṣṭeṣu pārtheṣu dhārtarāṣṭreṣu cāpyati | draupadī pāṇḍuputrāṇāṃ kṛṣṇā śāntirihābhavat
जब पार्थ और धृतराष्ट्रपुत्र दोनों अत्यन्त क्रोध में भरे थे, तब यहाँ कृष्णा द्रौपदी पाण्डुपुत्रों के लिए शान्ति बन गई।
श्लोक 3 (2.94.3)
अप्लवेऽम्भसि मग्नानामप्रतिष्ठे निमज्जताम् । पाञ्चाली पाण्डुपुत्राणां नौरेषां पारगाऽभवत् ॥
aplave'mbhasi magnānāmapratiṣṭhe nimajjatām | pāñcālī pāṇḍuputrāṇāṃ naureṣāṃ pāragā'bhavat
बिना नौका के, बिना किसी आधार के जल में डूबते पाण्डुपुत्रों के लिए पाञ्चाली पार ले जाने वाली नौका बन गई।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (2.94.4)
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनः कुरुमध्येऽत्यमर्षणः । स्त्री गतिः पाण्डुपुत्राणामित्युवाच सुदुर्मनाः ॥
tadvai śrutvā bhīmasenaḥ kurumadhye'tyamarṣaṇaḥ | strī gatiḥ pāṇḍuputrāṇāmityuvāca sudurmanāḥ
यह सुनकर कौरवों के बीच अत्यन्त असहिष्णु भीमसेन ने बड़े दुःखी मन से कहा — 'एक स्त्री पाण्डुपुत्रों का सहारा बनी!'
भीम उवाच
श्लोक 5 (2.94.5)
त्रीणि ज्योतींषि पुरुष इति वै देवलोऽब्रवीत् । अपत्यं कर्म विद्या च यतः सृष्टाः प्रजास्ततः ॥
trīṇi jyotīṃṣi puruṣa iti vai devalo'bravīt | apatyaṃ karma vidyā ca yataḥ sṛṣṭāḥ prajāstataḥ
देवल ने कहा है कि मनुष्य में तीन ज्योतियाँ होती हैं — सन्तान, कर्म और विद्या; क्योंकि इन्हीं से प्रजा की सृष्टि होती है।
श्लोक 6 (2.94.6)
अमेध्ये वै गतप्राणे शून्ये ज्ञातिभिरुज्झिते । देहे त्रितयमेवैतत्पुरुषस्योपयुज्यते ॥
amedhye vai gataprāṇe śūnye jñātibhirujjhite | dehe tritayamevaitatpuruṣasyopayujyate
जब शरीर अपवित्र, प्राणहीन, सूना और बन्धुओं द्वारा त्यागा हुआ हो जाता है, तब मनुष्य के काम यही तीन आते हैं।
श्लोक 7 (2.94.7)
तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात् । धनञ्जय कथं स्वित्स्यादपत्यमभिमृष्टजम् ॥
tanno jyotirabhihataṃ dārāṇāmabhimarśanāt | dhanañjaya kathaṃ svitsyādapatyamabhimṛṣṭajam
हमारी पत्नी के अपमान से हमारी वह ज्योति आहत हो गई है। धनंजय! अपमानित स्त्री से उत्पन्न सन्तान भला कैसे हमारी हो सकती है?
अर्जुन उवाच
श्लोक 8 (2.94.8)
न चैवोक्ता न चानुक्ता हीनतः परुषा गिरः । भारत प्रतिजल्पन्ति सदा तूत्तमपूरुषाः ॥
na caivoktā na cānuktā hīnataḥ paruṣā giraḥ | bhārata pratijalpanti sadā tūttamapūruṣāḥ
भारत! नीच लोगों के कहे या बिना कहे कठोर वचनों का उत्तम पुरुष कभी प्रत्युत्तर नहीं देते।
श्लोक 9 (2.94.9)
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्धसम्भावनाः स्वयम् ॥
smaranti sukṛtānyeva na vairāṇi kṛtānyapi | santaḥ prativijānanto labdhasambhāvanāḥ svayam
सज्जन लोग सब कुछ समझते हुए केवल किए गए उपकारों को ही याद रखते हैं, किए गए वैर को नहीं; क्योंकि उन्हें अपने ही गुणों से सम्मान प्राप्त होता है।
भीम उवाच
श्लोक 10 (2.94.10)
इहैवैतानहं सर्वान्हन्मि शत्रून्समागतान् । अथ निष्क्रम्य राजेन्द्र समूलान्हन्मि भारत ॥
ihaivaitānahaṃ sarvānhanmi śatrūnsamāgatān | atha niṣkramya rājendra samūlānhanmi bhārata
मैं यहीं इन सब इकट्ठे हुए शत्रुओं को मार डालता हूँ; अथवा, राजेन्द्र, बाहर निकलकर इन्हें जड़ सहित नष्ट कर देता हूँ, भारत!
श्लोक 11 (2.94.11)
किं नो विवदितेनेह किमुक्तेन च भारत । अद्यैवैतान्निहन्मीह प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ॥
kiṃ no vivaditeneha kimuktena ca bhārata | adyaivaitānnihanmīha praśādhi pṛthivīmimām
भारत! यहाँ विवाद से या बातों से हमें क्या लाभ? मैं आज ही इन्हें यहीं मार डालता हूँ; आप इस पृथ्वी पर शासन कीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (2.94.12)
इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठैर्भ्रातृभिः सह । मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुर्मुहुरुदैक्षत ॥
ityuktvā bhīmasenastu kaniṣṭhairbhrātṛbhiḥ saha | mṛgamadhye yathā siṃho muhurmuhurudaikṣata
ऐसा कहकर भीमसेन अपने छोटे भाइयों के साथ हिरनों के बीच सिंह की भाँति बार-बार इधर-उधर देखने लगे।
श्लोक 13 (2.94.13)
सान्त्व्यमानो वीक्षमाणः पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । खिद्यत्येव महाबाहुरन्तर्दाहेन वीर्यवान् ॥
sāntvyamāno vīkṣamāṇaḥ pārthenākliṣṭakarmaṇā | khidyatyeva mahābāhurantardāhena vīryavān
अनायास महान् कर्म करने वाले पार्थ उन्हें सान्त्वना दे रहे थे, फिर भी वे महाबाहु पराक्रमी भीम भीतर की जलन से व्याकुल हो रहे थे।
श्लोक 14 (2.94.14)
क्रुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः कर्णादिभ्यो नराधिप । सधूमः सस्फुलिङ्गार्चिः पावकः समजायत ॥
kruddhasya tasya srotobhyaḥ karṇādibhyo narādhipa | sadhūmaḥ sasphuliṅgārciḥ pāvakaḥ samajāyata
नराधिप! क्रोध में भरे भीम के कान आदि छिद्रों से धुएँ, चिनगारियों और लपटों के साथ आग प्रकट हो गई।
श्लोक 15 (2.94.15)
भ्रुकुटीकृतदुष्प्रेक्ष्यमभवत्तस्य तन्मुखम् । युगान्तकाले सम्प्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिणः ॥
bhrukuṭīkṛtaduṣprekṣyamabhavattasya tanmukham | yugāntakāle samprāpte kṛtāntasyeva rūpiṇaḥ
भौंहें तनी होने से उनका मुख देखने में ऐसा भयानक हो गया जैसे प्रलयकाल आने पर साक्षात् देहधारी यमराज का मुख।
श्लोक 16 (2.94.16)
युधिष्ठिरस्तमावार्य बाहुना बाहुशालिनम् । मैवमित्यब्रवीच्चैनं जोषमास्वेति भारत ॥
yudhiṣṭhirastamāvārya bāhunā bāhuśālinam | maivamityabravīccainaṃ joṣamāsveti bhārata
भारत! युधिष्ठिर ने उस बलशाली भुजाओं वाले भाई को अपनी भुजा से रोककर कहा — 'ऐसा नहीं! चुप रहो।'
श्लोक 17 (2.94.17)
निवार्य च महाबाहुं कोपसंरक्तलोचनम् । पितरं समुपातिष्ठद्धृतराष्ट्रं कृताञ्जलिः ॥
nivārya ca mahābāhuṃ kopasaṃraktalocanam | pitaraṃ samupātiṣṭhaddhṛtarāṣṭraṃ kṛtāñjaliḥ
क्रोध से लाल आँखों वाले महाबाहु भीम को रोककर वे हाथ जोड़े हुए अपने पितृतुल्य धृतराष्ट्र के पास पहुँचे।