सभा पर्व · अध्याय 93
द्रौपदी के वरदान
द्रौपदी के वचनों से उत्तेजित होकर अर्जुन क्रोध में धनुष लेकर उठ खड़े होते हैं और सारा जगत् काँप उठता है, जब तक युधिष्ठिर उन्हें थामकर शान्त नहीं कर देते। धृतराष्ट्र के भवन में अपशकुन होने लगते हैं; अन्धे राजा दुर्योधन को फटकारते हैं और द्रौपदी को वर देने का प्रस्ताव करते हैं। वह पहले युधिष्ठिर की दासता से मुक्ति माँगती है, ताकि उसके पुत्र को कोई दासपुत्र न कहे; फिर रथों और धनुषों सहित भीम, अर्जुन और दोनों यमजों की मुक्ति माँगती है, किन्तु यह कहकर तीसरा वर लेने से मना कर देती है कि लोभ धर्म का नाश करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.93.1)
द्रौपद्या वचनं श्रुत्वा चुकोपाथ धनञ्जयः । स तदा क्रोधताम्राक्ष इदं वचनमब्रवीत् ॥
draupadyā vacanaṃ śrutvā cukopātha dhanañjayaḥ | sa tadā krodhatāmrākṣa idaṃ vacanamabravīt
द्रौपदी का वचन सुनकर धनंजय कुपित हो उठे और क्रोध से ताँबे-सी लाल आँखें करके यह वचन बोले —
श्लोक 2 (2.93.2)
अयं तु मां वारयते धर्मराजो युधिष्ठिरः । इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो धनुरादाय वीर्यवान् ॥
ayaṃ tu māṃ vārayate dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | ityuktvā krodhatāmrākṣo dhanurādāya vīryavān
'मुझे तो ये धर्मराज युधिष्ठिर रोक रहे हैं।' ऐसा कहकर क्रोध से लाल आँखों वाले उस पराक्रमी वीर ने धनुष उठा लिया।
श्लोक 3 (2.93.3)
सव्यसाची समुत्पत्य ताञ्छत्रून्समुदैक्षत । उद्यतं फल्गुनं तत्र ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥
savyasācī samutpatya tāñchatrūnsamudaikṣata | udyataṃ phalgunaṃ tatra dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ
सव्यसाची ने उछलकर अपने शत्रुओं की ओर देखा। वहाँ सब राजाओं ने उठे हुए फाल्गुन को देखा —
श्लोक 4 (2.93.4)
युगान्ते सर्वलोकांस्तु दहन्तमिव पावकम् । वीक्षमाणं धनुष्पाणिं हन्तुकामं मुहुर्मुहुः ॥
yugānte sarvalokāṃstu dahantamiva pāvakam | vīkṣamāṇaṃ dhanuṣpāṇiṃ hantukāmaṃ muhurmuhuḥ
प्रलयकाल में सब लोकों को जलाती अग्नि के समान, हाथ में धनुष लिए, चारों ओर देखते हुए, बार-बार मारने को उद्यत —
श्लोक 5 (2.93.5)
हन्तुकामं पशून्क्रुद्धं रुद्रं दक्षक्रतौ यथा । तथाभूतं नरं दृष्ट्वा विषेदुस्तत्र मानवाः ॥
hantukāmaṃ paśūnkruddhaṃ rudraṃ dakṣakratau yathā | tathābhūtaṃ naraṃ dṛṣṭvā viṣedustatra mānavāḥ
दक्ष के यज्ञ में पशुओं को मारने को उद्यत क्रुद्ध रुद्र के समान। उस पुरुष को ऐसी अवस्था में देखकर वहाँ के लोग विषाद में डूब गए।
श्लोक 6 (2.93.6)
धनञ्जयस्य वीर्यज्ञा निराशा जीविते तदा । मृतभूताभवन्सर्वे नेत्रैरनिमिषैरिव ॥
dhanañjayasya vīryajñā nirāśā jīvite tadā | mṛtabhūtābhavansarve netrairanimiṣairiva
धनंजय के पराक्रम को जानने वाले वे सब तब जीवन से निराश हो गए; सब मृतक-से हो गए, मानो उनकी आँखें अपलक हो गई हों।
श्लोक 7 (2.93.7)
अर्जुनं धर्मपुत्रं च समुदैक्षन्त पार्थिवाः । क्रुद्धं तदाऽर्जुनं दृष्ट्वा पृथिवी च चचाल ह ॥
arjunaṃ dharmaputraṃ ca samudaikṣanta pārthivāḥ | kruddhaṃ tadā'rjunaṃ dṛṣṭvā pṛthivī ca cacāla ha
राजा अर्जुन और धर्मपुत्र युधिष्ठिर की ओर देखने लगे। तब अर्जुन को क्रुद्ध देखकर पृथ्वी भी काँप उठी।
श्लोक 8 (2.93.8)
खेचराणि च भूतानि वित्रेसुर्वै भयार्दिताः । नादित्यो विरराजाथ नापि वान्ति च मारुताः ॥
khecarāṇi ca bhūtāni vitresurvai bhayārditāḥ | nādityo virarājātha nāpi vānti ca mārutāḥ
आकाश में विचरने वाले प्राणी भय से पीड़ित होकर काँपने लगे। सूर्य का तेज मन्द पड़ गया और वायु भी नहीं बहती थी;
श्लोक 9 (2.93.9)
न चन्द्रो न च नक्षत्रं द्यौर्दिशो न विभान्ति ह । सर्वमाविद्धमभवज्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
na candro na ca nakṣatraṃ dyaurdiśo na vibhānti ha | sarvamāviddhamabhavajjagatsthāvarajaṅgamam
न चन्द्रमा, न नक्षत्र, न आकाश, न दिशाएँ प्रकाशित होती थीं। सारा चराचर जगत् व्याकुल हो उठा।
श्लोक 10 (2.93.10)
उत्पतन्स बभौ पार्थो दिवाकर इवाम्बरे ॥
utpatansa babhau pārtho divākara ivāmbare
उछलते हुए पार्थ आकाश में सूर्य के समान दीप्त हो उठे।
श्लोक 11 (2.93.11)
पार्थं दृष्ट्वान्तरे क्रुद्धं कालान्तकयमोपमम् । भीमसेनो मुदा युक्तो युद्धायैव मनो दधे ॥
pārthaṃ dṛṣṭvāntare kruddhaṃ kālāntakayamopamam | bhīmaseno mudā yukto yuddhāyaiva mano dadhe
पार्थ को बीच में काल, अन्तक और यम के समान क्रुद्ध देखकर भीमसेन हर्ष से भर गए और उन्होंने युद्ध का ही निश्चय कर लिया।
श्लोक 12 (2.93.12)
पाञ्चाली च ददर्शाथ सुसङ्क्रुद्धं धनञ्जयम् । हन्तुकामं रिपून्सर्वान्सुपर्णमिव पन्नगान् ॥
pāñcālī ca dadarśātha susaṅkruddhaṃ dhanañjayam | hantukāmaṃ ripūnsarvānsuparṇamiva pannagān
पाञ्चाली ने भी अत्यन्त क्रुद्ध धनंजय को देखा, जो सब शत्रुओं को मारने के लिए वैसे ही उद्यत थे जैसे गरुड सर्पों को मारने के लिए।
श्लोक 13 (2.93.13)
दुष्प्रेक्षः सोऽभवत्क्रुद्धो युगान्ताग्निरिव ज्वलन् । तं दृष्ट्वा तेजसा युक्तं विव्यथुः पुरवासिनः ॥
duṣprekṣaḥ so'bhavatkruddho yugāntāgniriva jvalan | taṃ dṛṣṭvā tejasā yuktaṃ vivyathuḥ puravāsinaḥ
क्रुद्ध अर्जुन प्रलय की अग्नि के समान जलते हुए देखने में भयंकर हो गए। उन्हें ऐसे तेज से भरा देखकर नगरवासी काँप उठे।
श्लोक 14 (2.93.14)
उत्पतन्तं तु वेगेन ततो दृष्ट्वा धनञ्जयम् । जग्राह स तदा राजा पुरुहूतो यथा हरिम् ॥
utpatantaṃ tu vegena tato dṛṣṭvā dhanañjayam | jagrāha sa tadā rājā puruhūto yathā harim
तब धनंजय को वेग से उछलते देखकर राजा युधिष्ठिर ने उन्हें ऐसे थाम लिया जैसे इन्द्र विष्णु को थाम लेते हैं।
श्लोक 15 (2.93.15)
उवाच स घृणी ज्येष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः । मा पार्थ साहसं कार्षीर्मा विनाशं गमेद्यशः ॥
uvāca sa ghṛṇī jyeṣṭho dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | mā pārtha sāhasaṃ kārṣīrmā vināśaṃ gamedyaśaḥ
तब दयालु ज्येष्ठ भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर बोले — 'पार्थ! दुस्साहस मत करो, जिससे तुम्हारा यश नष्ट न हो।'
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 16 (2.93.16)
अहमेतान्पापकृतो द्यूतज्ञान्दग्धुमुत्सहे । किन्त्वसत्यगतिं दृष्ट्वा क्रोधो नाशमुपैति मे ॥
ahametānpāpakṛto dyūtajñāndagdhumutsahe | kintvasatyagatiṃ dṛṣṭvā krodho nāśamupaiti me
मैं स्वयं इन पापियों और जुआरियों को भस्म कर सकता हूँ; किन्तु असत्य के मार्ग को देखकर मेरा क्रोध शान्त हो जाता है।
श्लोक 17 (2.93.17)
त्वमिमं जगतोऽर्थे वै कोपं संयच्छ पाण्डव ॥
tvamimaṃ jagato'rthe vai kopaṃ saṃyaccha pāṇḍava
पाण्डुनन्दन! संसार के हित के लिए तुम अपने इस क्रोध को रोक लो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (2.93.18)
एवमुक्तस्तदा राज्ञा पाण्डवोऽथ धनञ्जयः । क्रोधं संशमयन्पार्थो धार्तराष्ट्रं प्रति स्थितः ॥
evamuktastadā rājñā pāṇḍavo'tha dhanañjayaḥ | krodhaṃ saṃśamayanpārtho dhārtarāṣṭraṃ prati sthitaḥ
राजा के ऐसा कहने पर पाण्डुपुत्र पार्थ धनंजय अपने क्रोध को शान्त करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्र के सामने खड़े रहे।
श्लोक 19 (2.93.19)
तस्मिन्वीरे प्रशान्ते तु पाण्डवे फल्गुने पुनः । सुसम्प्रहृष्टमभवज्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
tasminvīre praśānte tu pāṇḍave phalgune punaḥ | susamprahṛṣṭamabhavajjagatsthāvarajaṅgamam
जब वीर पाण्डुपुत्र फाल्गुन फिर से शान्त हो गए, तब सारा चराचर जगत् अत्यन्त प्रसन्न हो उठा।
श्लोक 20 (2.93.20)
वारितं च तथा दृष्ट्वा भ्रात्रा पार्थं वृकोदरः । बभूव विमना राजन्नभून्निश्शब्दमत्र वै ॥
vāritaṃ ca tathā dṛṣṭvā bhrātrā pārthaṃ vṛkodaraḥ | babhūva vimanā rājannabhūnniśśabdamatra vai
राजन्! इस प्रकार भाई द्वारा पार्थ को रोका गया देखकर वृकोदर उदास हो गए, और वहाँ सन्नाटा छा गया।
श्लोक 21 (2.93.21)
ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे । गोमायुरुच्चैर्व्याहरदग्निहोत्रे । तं रासभाः प्रत्यभाषन्त राज- । न्समन्ततः पक्षिणश्चैव रौद्राः ॥
tato rājño dhṛtarāṣṭrasya gehe | gomāyuruccairvyāharadagnihotre | taṃ rāsabhāḥ pratyabhāṣanta rāja- | nsamantataḥ pakṣiṇaścaiva raudrāḥ
तब राजा धृतराष्ट्र के भवन में अग्निहोत्र के स्थान पर एक सियार ज़ोर से चिल्लाया; राजन्! उसके उत्तर में गधे रेंकने लगे और चारों ओर भयानक पक्षी भी बोलने लगे।
श्लोक 22 (2.93.22)
तं वै शब्दं विदुरस्तत्त्ववेदी । शुश्राव घोरं सुबलात्मजा च । भीष्मो द्रोणो गौतमश्चापि विद्वान् । स्वस्तिस्वस्तीत्यपि चैवाहुरुच्चैः ॥
taṃ vai śabdaṃ vidurastattvavedī | śuśrāva ghoraṃ subalātmajā ca | bhīṣmo droṇo gautamaścāpi vidvān | svastisvastītyapi caivāhuruccaiḥ
तत्त्वज्ञ विदुर ने वह भयानक शब्द सुना, सुबलपुत्री गान्धारी ने भी सुना; और भीष्म, द्रोण तथा विद्वान् गौतम कृपाचार्य ऊँचे स्वर में 'स्वस्ति, स्वस्ति' कहने लगे।
श्लोक 23 (2.93.23)
ततो गान्धारी विदुरश्चापि विद्वां- । स्तमुत्पातं घोरमालक्ष्य राज्ञे । निवेदयामासतुरार्तवत्तदा । ततो राजा वाक्यमिदं बभाषे ॥
tato gāndhārī viduraścāpi vidvāṃ- | stamutpātaṃ ghoramālakṣya rājñe | nivedayāmāsaturārtavattadā | tato rājā vākyamidaṃ babhāṣe
तब गान्धारी और विद्वान् विदुर ने उस भयंकर उत्पात को देखकर दुःखी होकर राजा को उसकी सूचना दी; तब राजा ने यह वचन कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 24 (2.93.24)
हतोऽसि दुर्योधन मन्दबुद्धे । यस्त्वं सभायां कुरुपुङ्गवानाम् । स्त्रियं समाभाषसि दुर्विनीत । विशेषतो द्रौपदीं धर्मपत्नीम् ॥
hato'si duryodhana mandabuddhe | yastvaṃ sabhāyāṃ kurupuṅgavānām | striyaṃ samābhāṣasi durvinīta | viśeṣato draupadīṃ dharmapatnīm
मन्दबुद्धि दुर्योधन! तू मारा गया, जो कुरुश्रेष्ठों की सभा में एक स्त्री से — विशेषकर धर्मपत्नी द्रौपदी से — ऐसी उद्दण्डता से बात करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (2.93.25)
एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी । हितान्वेषी बान्धवानामपायात् । कृष्णां पाञ्चालीमब्रवीत्सान्त्वपूर्वं । विमृश्यैतत्प्रज्ञया तत्त्वबुद्धिः ॥
evamuktvā dhṛtarāṣṭro manīṣī | hitānveṣī bāndhavānāmapāyāt | kṛṣṇāṃ pāñcālīmabravītsāntvapūrvaṃ | vimṛśyaitatprajñayā tattvabuddhiḥ
ऐसा कहकर, अपने बन्धुओं के हित और विनाश से उनकी रक्षा चाहने वाले बुद्धिमान् धृतराष्ट्र ने अपनी प्रज्ञा से विचार करके, तत्त्व को समझते हुए, कृष्णा पाञ्चाली से सान्त्वनापूर्वक कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 26 (2.93.26)
वरं वृणीष्व पाञ्चालि मत्तो यदभिवाञ्छसि । वधूनां हि विशिष्टा मे त्वं धर्मपरमा सती ॥
varaṃ vṛṇīṣva pāñcāli matto yadabhivāñchasi | vadhūnāṃ hi viśiṣṭā me tvaṃ dharmaparamā satī
पाञ्चाली! तुम जो चाहो, मुझसे वर माँग लो। मेरी पुत्रवधुओं में तुम धर्मपरायण, सती और सबसे श्रेष्ठ हो।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 27 (2.93.27)
ददासि चेद्वरं मह्यं वृणोमि भरतर्षभ । सर्वधर्मानुगः श्रीमानदासोऽस्तु युधिष्ठिरः ॥
dadāsi cedvaraṃ mahyaṃ vṛṇomi bharatarṣabha | sarvadharmānugaḥ śrīmānadāso'stu yudhiṣṭhiraḥ
भरतश्रेष्ठ! यदि आप मुझे वर देते हैं, तो मैं यह माँगती हूँ — सब धर्मों का पालन करने वाले श्रीमान् युधिष्ठिर दास न रहें,
श्लोक 28 (2.93.28)
मनस्विनमजानन्तो मैवं ब्रूयुः कुमारकाः । एतं वै दासपुत्रेति प्रतिविन्ध्यं ममात्मजम् ॥
manasvinamajānanto maivaṃ brūyuḥ kumārakāḥ | etaṃ vai dāsaputreti prativindhyaṃ mamātmajam
ताकि मेरे स्वाभिमानी पुत्र प्रतिविन्ध्य को न जानने वाले बालक उसे 'यह दास का पुत्र है' ऐसा न कहें।
श्लोक 29 (2.93.29)
राजपुत्रः पुरा भूत्वा यथा नान्यः पुमान्क्वचित् । लालितो दासपुत्रत्वं पश्यन्नश्येद्धि भारत ॥
rājaputraḥ purā bhūtvā yathā nānyaḥ pumānkvacit | lālito dāsaputratvaṃ paśyannaśyeddhi bhārata
भारत! जो पहले राजकुमार रहा हो और ऐसे लाड़-प्यार में पला हो जैसा कोई दूसरा नहीं, वह स्वयं को दासपुत्र बना देखकर अवश्य ही नष्ट हो जाएगा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 30 (2.93.30)
एवं भवतु कल्याणि यथा त्वमभिभाषसे । द्वितीयं ते वरं भद्रे ददानि वरयस्व ह । मनो हि मे वितरति नैकं त्वं वरमर्हसि ॥
evaṃ bhavatu kalyāṇi yathā tvamabhibhāṣase | dvitīyaṃ te varaṃ bhadre dadāni varayasva ha | mano hi me vitarati naikaṃ tvaṃ varamarhasi
कल्याणी! जैसा तुम कहती हो, वैसा ही हो। भद्रे! मैं तुम्हें दूसरा वर देता हूँ, उसे माँगो। मेरा मन कहता है कि तुम केवल एक वर की ही अधिकारिणी नहीं हो।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 31 (2.93.31)
सरथौ सधनुष्कौ च भीमसेनधनञ्जयौ । यमौ च वरये राजन्नदासान्स्ववशानहम् ॥
sarathau sadhanuṣkau ca bhīmasenadhanañjayau | yamau ca varaye rājannadāsānsvavaśānaham
राजन्! रथों और धनुषों सहित भीमसेन और धनंजय, तथा दोनों यमज — इन्हें मैं दासता से मुक्त और स्वाधीन माँगती हूँ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 32 (2.93.32)
तथाऽस्तु ते महाभागे यथा त्वं नन्दिनीच्छसि । तृतीयं वरयास्मत्तो नासि द्वाभ्यां सुसंस्कृता । त्वं हि सर्वस्नुषाणां मे श्रेयसी धर्मचारिणी ॥
tathā'stu te mahābhāge yathā tvaṃ nandinīcchasi | tṛtīyaṃ varayāsmatto nāsi dvābhyāṃ susaṃskṛtā | tvaṃ hi sarvasnuṣāṇāṃ me śreyasī dharmacāriṇī
महाभागे! पुत्री! जैसा तुम चाहती हो, वैसा ही हो। मुझसे तीसरा वर भी माँगो; दो वरों से तुम्हारा पर्याप्त सम्मान नहीं हुआ। तुम मेरी सब पुत्रवधुओं में श्रेष्ठ और धर्म का आचरण करने वाली हो।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 33 (2.93.33)
लोभो धर्मस्य नाशाय भगवन्नाहमुत्सहे । अनर्हा वरमादातुं तृतीयं राजसत्तम ॥
lobho dharmasya nāśāya bhagavannāhamutsahe | anarhā varamādātuṃ tṛtīyaṃ rājasattama
भगवन्! लोभ धर्म का नाश करता है; मैं ऐसा साहस नहीं कर सकती। राजश्रेष्ठ! मैं तीसरा वर लेने के योग्य नहीं हूँ।
श्लोक 34 (2.93.34)
एकमाहुर्वैश्यवरं द्वौ तु क्षत्रस्त्रियो वरौ । त्रयस्तु राज्ञो राजेन्द्र ब्राह्मणस्य शतं वराः ॥
ekamāhurvaiśyavaraṃ dvau tu kṣatrastriyo varau | trayastu rājño rājendra brāhmaṇasya śataṃ varāḥ
राजेन्द्र! कहते हैं कि वैश्य को एक वर, क्षत्रिय स्त्री को दो वर, राजा को तीन और ब्राह्मण को सौ वर लेने का अधिकार है।
श्लोक 35 (2.93.35)
पापीयांस इमे भूत्वा सन्तीर्णाः पतयो मम । वेत्स्यन्ति चैव भद्राणि राजन्पुण्येन कर्मणा ॥
pāpīyāṃsa ime bhūtvā santīrṇāḥ patayo mama | vetsyanti caiva bhadrāṇi rājanpuṇyena karmaṇā
राजन्! मेरे पति दुर्दशा में पड़कर अब उससे पार हो गए हैं; अपने पुण्यकर्मों से वे कल्याण प्राप्त करेंगे।