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सभा पर्व · अध्याय 92

भीम की प्रतिज्ञा और द्रौपदी का शाप

दुर्योधन द्रौपदी से कहता है कि उसके पति ही बताएँ कि युधिष्ठिर अब भी उसके स्वामी हैं या नहीं; भीम कहते हैं कि केवल बड़े भाई का अधिकार ही उन्हें रोके हुए है। कर्ण द्रौपदी को दासी कहता है, दुर्योधन उसे अपनी जाँघ दिखाता है और भीम गदा से उस जाँघ को तोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं, जबकि विदुर कौरवों को चेताते हैं कि जो स्वयं को हार चुका हो, वह दूसरे को दाँव पर नहीं लगा सकता। जब दुःशासन द्रौपदी को घसीटने लगता है और वह बड़ों से व्यर्थ ही रक्षा की गुहार लगाती है, तब विदुर धृतराष्ट्र को विनाश की चेतावनी देते हैं। भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल अपने उत्पीड़कों के वध की प्रतिज्ञा करते हैं, द्रौपदी दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि को शाप देती है, और आकाश से पुष्पवर्षा होती है।

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.92.1)

तथा तु दृष्ट्वा बहु तत्र देवीं । रोरूयमाणां कुररीमिवार्ताम् । नोचुर्वचः साध्वथवाऽप्यसाधु । महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीताः ॥

tathā tu dṛṣṭvā bahu tatra devīṃ | rorūyamāṇāṃ kurarīmivārtām | nocurvacaḥ sādhvathavā'pyasādhu | mahīkṣito dhārtarāṣṭrasya bhītāḥ

वहाँ उस रानी को आर्त कुररी पक्षी की तरह बार-बार विलाप करते देखकर भी राजाओं ने धृतराष्ट्र के पुत्र के भय से न कोई भली बात कही, न बुरी।

श्लोक 2 (2.92.2)

दृष्ट्वा तथा पार्थिवपुत्रपौत्रां- । स्तूष्णींभूतान्धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । स्मयन्निवेदं वचनं बभाषे । पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम् ॥

dṛṣṭvā tathā pārthivaputrapautrāṃ- | stūṣṇīṃbhūtāndhṛtarāṣṭrasya putraḥ | smayannivedaṃ vacanaṃ babhāṣe | pāñcālarājasya sutāṃ tadānīm

राजाओं के पुत्र-पौत्रों को इस प्रकार मौन देखकर धृतराष्ट्र का पुत्र मानो मुस्कराता हुआ उस समय पाञ्चालराज की पुत्री से यह बोला —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 3 (2.92.3)

तिष्ठत्वयं प्रश्न उदारसत्वे । भीमेऽर्जुने सहदेवे तथैव । पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि । वदन्त्वेते वचनं त्वत्प्रसूतम् ॥

tiṣṭhatvayaṃ praśna udārasatve | bhīme'rjune sahadeve tathaiva | patyau ca te nakule yājñaseni | vadantvete vacanaṃ tvatprasūtam

याज्ञसेनी! यह प्रश्न तुम्हारे उदार हृदय वाले पतियों — भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल — पर छोड़ दिया जाए। वे ही तुम्हारे पूछे प्रश्न का उत्तर दें।

श्लोक 4 (2.92.4)

अनीश्वरं विब्रुवन्त्वार्यमध्ये । युधिष्ठिरं तव पाञ्चालि हेतोः । कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं । पाञ्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात् ॥

anīśvaraṃ vibruvantvāryamadhye | yudhiṣṭhiraṃ tava pāñcāli hetoḥ | kurvantu sarve cānṛtaṃ dharmarājaṃ | pāñcāli tvaṃ mokṣyase dāsabhāvāt

पाञ्चाली! वे सब आर्यजनों के बीच तुम्हारे लिए यह कह दें कि युधिष्ठिर तुम्हारे स्वामी नहीं हैं; वे सब धर्मराज को असत्यवादी ठहरा दें, तो तुम दासभाव से छूट जाओगी।

श्लोक 5 (2.92.5)

धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा । स्वयं चेदं कथयत्विन्द्रकल्पः । ईशो वा ते ह्यनीशोऽथवैष । वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व ॥

dharme sthito dharmasuto mahātmā | svayaṃ cedaṃ kathayatvindrakalpaḥ | īśo vā te hyanīśo'thavaiṣa | vākyādasya kṣipramekaṃ bhajasva

अथवा धर्म में स्थित, इन्द्र के समान महात्मा धर्मपुत्र स्वयं ही कह दें कि वे तुम्हारे स्वामी हैं या नहीं। उनके वचन के अनुसार तुम शीघ्र ही दोनों में से एक बात स्वीकार कर लो।

श्लोक 6 (2.92.6)

सर्वे हीमे कौरवेयाः सभायां । दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव । न विब्रुवन्त्यार्यसत्वा यथाव- । त्पतींश्च ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान् ॥

sarve hīme kauraveyāḥ sabhāyāṃ | duḥkhāntare vartamānāstavaiva | na vibruvantyāryasatvā yathāva- | tpatīṃśca te samavekṣyālpabhāgyān

सभा में बैठे ये सभी कौरव तुम्हारे ही दुःख में डूबे हैं। ये श्रेष्ठ स्वभाव वाले लोग तुम्हारे अभागे पतियों को देखकर ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पा रहे हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (2.92.7)

ततः सभ्याः कुरुराजस्य तस्य । वाक्यं सर्वे प्रशशंसुस्तथोच्चैः । चेलावेधांश्चापि चक्रुर्नदन्तो । हाहेत्यासीदपि चैवार्तनादः ॥

tataḥ sabhyāḥ kururājasya tasya | vākyaṃ sarve praśaśaṃsustathoccaiḥ | celāvedhāṃścāpi cakrurnadanto | hāhetyāsīdapi caivārtanādaḥ

तब सब सभासदों ने कुरुराज के उस वचन की ऊँचे स्वर में प्रशंसा की। वे गर्जना करते हुए अपने वस्त्र हिलाने लगे; पर साथ ही 'हाय! हाय!' का आर्त स्वर भी उठा।

श्लोक 8 (2.92.8)

श्रुत्वा तु तद्वाक्यमनोहरं त- । द्धर्षश्चासीत्कौरवाणां सभायाम् । सर्वे चासन्पार्थिवाः प्रीतिमन्तः । कुरुश्रेष्ठं धार्मिकं पूजयन्तः ॥

śrutvā tu tadvākyamanoharaṃ ta- | ddharṣaścāsītkauravāṇāṃ sabhāyām | sarve cāsanpārthivāḥ prītimantaḥ | kuruśreṣṭhaṃ dhārmikaṃ pūjayantaḥ

उस मनोहर वचन को सुनकर सभा में कौरवों को हर्ष हुआ, और सब राजा प्रसन्न होकर धर्मात्मा कुरुश्रेष्ठ का सम्मान करने लगे।

श्लोक 9 (2.92.9)

युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवाः । किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृताननाः ॥

yudhiṣṭhiraṃ ca te sarve samudaikṣanta pārthivāḥ | kiṃ nu vakṣyati dharmajña iti sācīkṛtānanāḥ

और सब राजा तिरछे मुख करके युधिष्ठिर की ओर देखने लगे — 'धर्म के ज्ञाता अब क्या कहेंगे?'

श्लोक 10 (2.92.10)

किं नु वक्ष्यति बीभत्सुरजितो युधि पाण्डवः । भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विताः ॥

kiṃ nu vakṣyati bībhatsurajito yudhi pāṇḍavaḥ | bhīmaseno yamau cobhau bhṛśaṃ kautūhalānvitāḥ

'युद्ध में अजेय पाण्डुपुत्र बीभत्सु (अर्जुन) क्या कहेंगे? भीमसेन और दोनों यमज क्या कहेंगे?' — इस प्रकार वे अत्यन्त उत्सुक हो उठे।

श्लोक 11 (2.92.11)

तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनोऽब्रवीदिदम् । प्रगृह्य रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम् ॥

tasminnuparate śabde bhīmaseno'bravīdidam | pragṛhya ruciraṃ divyaṃ bhujaṃ candanacarcitam

जब वह कोलाहल शान्त हुआ, तब भीमसेन ने चन्दन से लिप्त अपनी सुन्दर, दिव्य भुजा उठाकर यह कहा —

भीम उवाच

श्लोक 12 (2.92.12)

यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो महामनाः । न प्रभुः स्यात्कुलस्यास्य न वयं मर्षयेमहि ॥

yadyeṣa gururasmākaṃ dharmarājo mahāmanāḥ | na prabhuḥ syātkulasyāsya na vayaṃ marṣayemahi

यदि ये उदारचित्त धर्मराज, हमारे गुरुजन, इस कुल के स्वामी न होते, तो हम यह सब कदापि सहन न करते।

श्लोक 13 (2.92.13)

ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वरः । मन्यते जितमात्मानं यद्येष विजिता वयम् ॥

īśo naḥ puṇyatapasāṃ prāṇānāmapi ceśvaraḥ | manyate jitamātmānaṃ yadyeṣa vijitā vayam

वे हमारे पुण्य और तप के स्वामी हैं, हमारे प्राणों के भी स्वामी हैं। यदि वे स्वयं को हारा हुआ मानते हैं, तो हम भी हारे हुए हैं।

श्लोक 14 (2.92.14)

न हि मुच्येत मे जीवन्पदा भूमिमुपस्पृशन् । मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ॥

na hi mucyeta me jīvanpadā bhūmimupaspṛśan | martyadharmā parāmṛśya pāñcālyā mūrdhajānimān

अन्यथा पाञ्चाली के इन केशों को छूने वाला कोई भी मनुष्य धरती पर पाँव रखते हुए मुझसे जीवित न छूट पाता।

श्लोक 15 (2.92.15)

पश्यध्वं ह्यायतौ वृत्तौ भुजौ मे परिघाविव । नैतयोरन्तरं प्राप्य मुच्येतापि शतक्रतुः ॥

paśyadhvaṃ hyāyatau vṛttau bhujau me parighāviva | naitayorantaraṃ prāpya mucyetāpi śatakratuḥ

मेरी इन लम्बी, गोल, परिघ-जैसी भुजाओं को देखो। इनके बीच आ जाने पर शतक्रतु इन्द्र भी नहीं छूट सकते।

श्लोक 16 (2.92.16)

धर्मपाशसितस्त्वेवमधिगच्छामि सङ्कटम् । गौरवेण निरुद्धश्च निग्रहादर्जुनस्य च ॥

dharmapāśasitastvevamadhigacchāmi saṅkaṭam | gauraveṇa niruddhaśca nigrahādarjunasya ca

किन्तु धर्म के पाश में बँधा होने से मैं इस संकट में पड़ा हूँ; बड़े भाई के प्रति आदर ने मुझे रोक रखा है और अर्जुन भी मुझे रोक रहे हैं।

श्लोक 17 (2.92.17)

धर्मराजनिसृष्टस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव । धार्तराष्ट्रानिमान्पापान्निष्पिषेयं तलासिभिः ॥

dharmarājanisṛṣṭastu siṃhaḥ kṣudramṛgāniva | dhārtarāṣṭrānimānpāpānniṣpiṣeyaṃ talāsibhiḥ

यदि धर्मराज मुझे छोड़ दें, तो जैसे सिंह छोटे पशुओं को कुचल देता है, वैसे ही मैं धृतराष्ट्र के इन पापी पुत्रों को अपनी हथेलियों के प्रहार से पीस डालूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (2.92.18)

तमुवाच तदा भीष्मो द्रोणो विदुर एव च । क्षम्यतामिदमित्येवं सर्वं सम्भाव्यते त्वयि ॥

tamuvāca tadā bhīṣmo droṇo vidura eva ca | kṣamyatāmidamityevaṃ sarvaṃ sambhāvyate tvayi

तब भीष्म, द्रोण और विदुर ने उनसे कहा — 'क्षमा करो; तुम्हारे लिए सब कुछ सम्भव है।'

कर्ण उवाच

श्लोक 19 (2.92.19)

त्रयः किलेमे ह्यधना भवन्ति । दासः पुत्रश्चास्वतन्त्रा च नारी । दासस्य पत्नी त्वधनस्य भद्रे । हीनेश्वरा दासधनं च सर्वम् ॥

trayaḥ kileme hyadhanā bhavanti | dāsaḥ putraścāsvatantrā ca nārī | dāsasya patnī tvadhanasya bhadre | hīneśvarā dāsadhanaṃ ca sarvam

कहते हैं, तीन व्यक्ति धन के स्वामी नहीं होते — दास, पुत्र और पराधीन स्त्री। भद्रे! तुम एक निर्धन दास की पत्नी हो; तुम्हारा स्वामी तुमसे छिन गया है, और यह सब दास का धन है।

श्लोक 20 (2.92.20)

प्रविश्य राज्ञः परिवारं भजस्व । तत्ते कार्यं शिष्टमादिश्यतेऽत्र । ईशास्तु सर्वे तव राजपुत्रि । भवन्ति वै धार्तराष्ट्रा न पार्थाः ॥

praviśya rājñaḥ parivāraṃ bhajasva | tatte kāryaṃ śiṣṭamādiśyate'tra | īśāstu sarve tava rājaputri | bhavanti vai dhārtarāṣṭrā na pārthāḥ

राजा के अन्तःपुर में जाकर उनके परिजनों की सेवा करो; यहाँ तुम्हारे लिए यही कार्य निर्धारित है। राजपुत्री! अब धृतराष्ट्र के सभी पुत्र तुम्हारे स्वामी हैं, कुन्ती के पुत्र नहीं।

श्लोक 21 (2.92.21)

अन्यं वृणीष्व पतिमाशु भामिनि । यस्माद्दास्यं न लभसि देवनेन । अवाच्या वै पतिषु कामवृत्ति- । र्नित्यं दास्ये विदितं तत्तवास्तु ॥

anyaṃ vṛṇīṣva patimāśu bhāmini | yasmāddāsyaṃ na labhasi devanena | avācyā vai patiṣu kāmavṛtti- | rnityaṃ dāsye viditaṃ tattavāstu

भामिनी! शीघ्र ही कोई दूसरा पति चुन लो, जिसके कारण तुम्हें जुए में दासी न बनना पड़े। दासी होने पर पतियों के विषय में इच्छानुसार आचरण करना कभी निन्दनीय नहीं माना जाता — यह तुम जान लो।

श्लोक 22 (2.92.22)

पराजितो नकुलो भीमसेनो । युधिष्ठिरः सहदेवार्जुनौ च । दासीभूता त्वं हि वै याज्ञसेनि । पराजितास्ते पतयो नैव सन्ति ॥

parājito nakulo bhīmaseno | yudhiṣṭhiraḥ sahadevārjunau ca | dāsībhūtā tvaṃ hi vai yājñaseni | parājitāste patayo naiva santi

नकुल, भीमसेन, युधिष्ठिर, सहदेव और अर्जुन — सब हार चुके हैं। याज्ञसेनी! तुम दासी बन चुकी हो; तुम्हारे पराजित पति अब तुम्हारे पति नहीं रहे।

श्लोक 23 (2.92.23)

प्रयोजनं जन्मनि किं न मन्यते । पराक्रमं पौरुषं चैव पार्थः । पाञ्चाल्यस्य द्रुपदस्यात्मजामिमां । सभामध्ये यो व्यदेवीद्‌ग्लहेषु ॥

prayojanaṃ janmani kiṃ na manyate | parākramaṃ pauruṣaṃ caiva pārthaḥ | pāñcālyasya drupadasyātmajāmimāṃ | sabhāmadhye yo vyadevīdglaheṣu

जिसने सभा के बीच पाञ्चालराज द्रुपद की इस पुत्री को दाँव पर लगा दिया, वह पार्थ अपने जन्म, पराक्रम और पौरुष का भला क्या प्रयोजन समझता है?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (2.92.24)

तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी । भृशं निशश्वास तदाऽर्तरूपः । राजानुगो धर्मपाशानुबद्धो । दहन्निवैनं क्रोधसंरक्तदृष्टिः ॥

tadvai śrutvā bhīmaseno'tyamarṣī | bhṛśaṃ niśaśvāsa tadā'rtarūpaḥ | rājānugo dharmapāśānubaddho | dahannivainaṃ krodhasaṃraktadṛṣṭiḥ

यह सुनकर अत्यन्त असहिष्णु भीमसेन व्यथित होकर गहरी साँसें लेने लगे। राजा के अनुगामी और धर्म के पाश में बँधे होने के कारण वे क्रोध से लाल आँखों से उन्हें ऐसे देखते रहे मानो भस्म कर देंगे।

भीम उवाच

श्लोक 25 (2.92.25)

नाहं कुप्ये सूतपुत्रस्य राज- । न्नेष सत्यं दासधर्मः प्रदिष्टः । किं विद्विषो वै मामेवं व्याहरेयु- । र्नादेवीस्त्वं यद्यनया नरेन्द्र ॥

nāhaṃ kupye sūtaputrasya rāja- | nneṣa satyaṃ dāsadharmaḥ pradiṣṭaḥ | kiṃ vidviṣo vai māmevaṃ vyāhareyu- | rnādevīstvaṃ yadyanayā narendra

राजन्! मैं सूतपुत्र पर क्रोध नहीं करता; सचमुच दासों का धर्म यही बताया गया है। किन्तु नरेन्द्र! यदि आप इसे दाँव पर लगाकर न खेलते, तो क्या शत्रु मुझसे इस प्रकार बोल सकते थे?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (2.92.26)

भीमसेनवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । युधिष्ठिरमुवाचेदं तूष्णीम्भूतमचेतनम् ॥

bhīmasenavacaḥ śrutvā rājā duryodhanastadā | yudhiṣṭhiramuvācedaṃ tūṣṇīmbhūtamacetanam

भीमसेन का वचन सुनकर राजा दुर्योधन ने तब मौन और चेतनाशून्य-से बैठे युधिष्ठिर से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 27 (2.92.27)

भीमार्जुनौ यमौ चैव स्थितौ ते नृप शासने । प्रश्नं ब्रूहि च कृष्णां त्वमजितां यदि मन्यसे ॥

bhīmārjunau yamau caiva sthitau te nṛpa śāsane | praśnaṃ brūhi ca kṛṣṇāṃ tvamajitāṃ yadi manyase

राजन्! भीम, अर्जुन और दोनों यमज आपकी आज्ञा में स्थित हैं। आप प्रश्न का उत्तर दीजिए — क्या आप कृष्णा को अविजित मानते हैं?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (2.92.28)

एवमुक्त्वा तु कौन्तेयमपोह्य वसनं स्वकम् । स्मयन्निवेक्ष्य पाञ्चालीमैश्वर्यमदमोहितः ॥

evamuktvā tu kaunteyamapohya vasanaṃ svakam | smayannivekṣya pāñcālīmaiśvaryamadamohitaḥ

कुन्तीपुत्र से ऐसा कहकर ऐश्वर्य के मद से मोहित दुर्योधन ने अपना वस्त्र हटाया और मुस्कराते हुए पाञ्चाली की ओर देखा;

श्लोक 29 (2.92.29)

कदलीदण्डसदृशं सर्वलक्षणसंयुतम् । गजहस्तप्रतीकाशं वज्रप्रतिमगौरवम् ॥

kadalīdaṇḍasadṛśaṃ sarvalakṣaṇasaṃyutam | gajahastapratīkāśaṃ vajrapratimagauravam

और वह जाँघ, जो केले के तने के समान, सब शुभ लक्षणों से युक्त, हाथी की सूँड़-सी और वज्र के समान भारी थी —

श्लोक 30 (2.92.30)

अभ्युत्स्मयित्वा राधेयं भीममाधर्षयन्निव । द्रौपद्याः प्रेक्षमाणायाः सव्यमूरुमदर्शयत् ॥

abhyutsmayitvā rādheyaṃ bhīmamādharṣayanniva | draupadyāḥ prekṣamāṇāyāḥ savyamūrumadarśayat

अपनी वह बाईं जाँघ उसने राधापुत्र कर्ण की ओर मुस्कराकर, मानो भीम को चिढ़ाते हुए, द्रौपदी के देखते-देखते उघाड़ दी।

श्लोक 31 (2.92.31)

भीमसेनस्तमालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहिते । प्रोवाच राजमध्ये तं सभां विश्रावयन्निव ॥

bhīmasenastamālokya netre utphālya lohite | provāca rājamadhye taṃ sabhāṃ viśrāvayanniva

यह देखकर भीमसेन ने अपनी लाल आँखें फाड़कर राजाओं के बीच उससे ऐसे कहा मानो पूरी सभा को सुना रहे हों —

भीम उवाच

श्लोक 32 (2.92.32)

पितृभिः सह सालोक्यं मा स्म गच्छेद्वृकोदरः । यद्येतमूरुं गदया न भिन्द्यां ते महाहवे ॥

pitṛbhiḥ saha sālokyaṃ mā sma gacchedvṛkodaraḥ | yadyetamūruṃ gadayā na bhindyāṃ te mahāhave

यदि मैं महायुद्ध में गदा से तुम्हारी इस जाँघ को न तोड़ दूँ, तो यह वृकोदर अपने पितरों के लोक को प्राप्त न हो!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (2.92.33)

क्रुद्धस्य तस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यः पावकार्चिषः । वृक्षस्येव विनिश्चेरुः कोटरेभ्यः प्रदह्यतः ॥

kruddhasya tasya sarvebhyaḥ srotobhyaḥ pāvakārciṣaḥ | vṛkṣasyeva viniśceruḥ koṭarebhyaḥ pradahyataḥ

क्रुद्ध भीमसेन के शरीर के सभी रोमछिद्रों से आग की लपटें ऐसे निकलने लगीं जैसे जलते हुए वृक्ष के कोटरों से निकलती हैं।

विदुर उवाच

श्लोक 34 (2.92.34)

परं भयं पश्यत भीमसेना- । त्तद्बुध्यध्वं पार्थिवाः प्रातिपेयाः । दैवेरितो नूनमयं पुरस्ता- । त्परोऽनयो भरतेषूदपादि ॥

paraṃ bhayaṃ paśyata bhīmasenā- | ttadbudhyadhvaṃ pārthivāḥ prātipeyāḥ | daiverito nūnamayaṃ purastā- | tparo'nayo bharateṣūdapādi

प्रतीप के वंशज राजाओ! भीमसेन से उत्पन्न इस महान् भय को देखो और समझो। निश्चय ही दैव की प्रेरणा से भरतवंशियों के सामने यह घोर अनीति आ खड़ी हुई है।

श्लोक 35 (2.92.35)

अतिद्यूतं कृतमिदं धार्तराष्ट्र । यस्मात्स्त्रियं विवदध्वं सभायाम् । योगक्षेमौ नश्यतो वः समग्रौ । पापान्मन्त्रान्कुरवो मन्त्रयन्ति ॥

atidyūtaṃ kṛtamidaṃ dhārtarāṣṭra | yasmātstriyaṃ vivadadhvaṃ sabhāyām | yogakṣemau naśyato vaḥ samagrau | pāpānmantrānkuravo mantrayanti

धृतराष्ट्रपुत्र! यह जुआ सीमा लाँघ गया है, क्योंकि तुम लोग सभा में एक स्त्री के लिए विवाद कर रहे हो। तुम्हारा योग-क्षेम पूरी तरह नष्ट हो रहा है; कौरव पापपूर्ण मन्त्रणाएँ कर रहे हैं।

श्लोक 36 (2.92.36)

इमं धर्मं कुरवो जानताशु । ध्वस्ते धर्मे परिषत्सम्प्रदुष्येत् । इमां चेत्पूर्वं कितवोऽग्लहिष्य- । दीशोऽभविष्यदपराजितात्मा ॥

imaṃ dharmaṃ kuravo jānatāśu | dhvaste dharme pariṣatsampraduṣyet | imāṃ cetpūrvaṃ kitavo'glahiṣya- | dīśo'bhaviṣyadaparājitātmā

कौरवो! इस धर्म को शीघ्र समझ लो — धर्म के नष्ट होने पर सभा भी दूषित हो जाती है। यदि वह जुआरी स्वयं हारने से पहले इसे दाँव पर लगाता, तो वह इसका स्वामी होता।

श्लोक 37 (2.92.37)

स्वप्ने यथैतद्विजितं धनं स्या- । देवं मन्ये यस्य दीव्यत्यनीशः । गान्धारराजस्य वचो निशम्य । धर्मादस्मात्कुरवो माऽपयात ॥

svapne yathaitadvijitaṃ dhanaṃ syā- | devaṃ manye yasya dīvyatyanīśaḥ | gāndhārarājasya vaco niśamya | dharmādasmātkuravo mā'payāta

जो स्वयं स्वामी न रहकर दाँव लगाता है, उसका जीता हुआ धन मेरी समझ में स्वप्न में जीते धन के समान है। कौरवो! गान्धारराज की बातें सुनकर इस धर्म से विचलित मत होओ।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 38 (2.92.38)

भीमस्य वाक्ये तद्वदेवार्जुनस्य । स्थितोऽहं वै यमयोश्चैवमेव । युधिष्ठिरं ते प्रवदन्त्वनीश- । मथो दास्यान्मोक्षसे याज्ञसेनि ॥

bhīmasya vākye tadvadevārjunasya | sthito'haṃ vai yamayoścaivameva | yudhiṣṭhiraṃ te pravadantvanīśa- | matho dāsyānmokṣase yājñaseni

मैं भीम के कथन पर स्थित हूँ, वैसे ही अर्जुन और दोनों यमजों के कथन पर भी। वे युधिष्ठिर को स्वामी न होने वाला कह दें, तो याज्ञसेनी, तुम दासभाव से मुक्त हो जाओगी।

अर्जुन उवाच

श्लोक 39 (2.92.39)

ईशो राजा पूर्वमासीद्‌ग्लहे नः । कुन्तीसुतो धर्मराजो महात्मा । ईशस्त्वयं कस्य पराजितात्मा । तज्जानीध्वं कुरवः सर्व एव ॥

īśo rājā pūrvamāsīdglahe naḥ | kuntīsuto dharmarājo mahātmā | īśastvayaṃ kasya parājitātmā | tajjānīdhvaṃ kuravaḥ sarva eva

पहले दाँव के समय कुन्तीपुत्र महात्मा धर्मराज हमारे स्वामी थे। पर स्वयं को हार चुकने पर वे किसके स्वामी रहे? कौरवो, आप सब इस पर विचार करें।

कर्ण उवाच

श्लोक 40 (2.92.40)

दुश्शासन निबोधेदं वचनं वै प्रभाषितम् । किमनेन चिरं वीर नयस्व द्रुपदात्मजाम् । दासीभावेन भुङ्क्ष्व त्वं यथेष्टं कुरुनन्दन ॥

duśśāsana nibodhedaṃ vacanaṃ vai prabhāṣitam | kimanena ciraṃ vīra nayasva drupadātmajām | dāsībhāvena bhuṅkṣva tvaṃ yatheṣṭaṃ kurunandana

दुःशासन! मेरी यह बात सुनो। वीर, इसमें इतनी देर क्यों? द्रुपदकुमारी को ले जाओ। कुरुनन्दन! दासी के रूप में जैसे चाहो उससे सेवा लो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (2.92.41)

ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् । साधु कर्ण महाबाहो यथेष्टं क्रियतामिति ॥

tato gāndhārarājasya putraḥ śakunirabravīt | sādhu karṇa mahābāho yatheṣṭaṃ kriyatāmiti

तब गान्धारराज के पुत्र शकुनि ने कहा — 'महाबाहु कर्ण! ठीक कहा; जैसा चाहो वैसा किया जाए।'

श्लोक 42 (2.92.42)

ततो दुश्शासनस्तूर्णं द्रुपदस्य सुतां बलात् । प्रवेशयितुमारब्धः स चकर्ष दुरात्मवान् । ततो विक्रोशति तदा पाञ्चाली वरवर्णिनी ॥

tato duśśāsanastūrṇaṃ drupadasya sutāṃ balāt | praveśayitumārabdhaḥ sa cakarṣa durātmavān | tato vikrośati tadā pāñcālī varavarṇinī

तब दुरात्मा दुःशासन तुरन्त द्रुपदपुत्री को बलपूर्वक भीतर ले जाने लगा और उसे घसीटने लगा। तब सुन्दरी पाञ्चाली पुकार उठी —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 43 (2.92.43)

परित्रायस्व मां भीष्म द्रोण द्रौणे तथा कृप । परित्रायस्व विदुर धर्मिष्ठो धर्मवत्सल ॥

paritrāyasva māṃ bhīṣma droṇa drauṇe tathā kṛpa | paritrāyasva vidura dharmiṣṭho dharmavatsala

भीष्म! द्रोण! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा! कृप! मेरी रक्षा करो। धर्मिष्ठ, धर्मप्रेमी विदुर! मेरी रक्षा करो।

श्लोक 44 (2.92.44)

धृतराष्ट्र महाराज परित्रायस्व वै स्नुषाम् । गान्धारि त्वं महाभागे सर्वज्ञे सर्वदर्शिनि । परित्रायस्व मां भीरुं सुयोधनभयार्दिताम् ॥

dhṛtarāṣṭra mahārāja paritrāyasva vai snuṣām | gāndhāri tvaṃ mahābhāge sarvajñe sarvadarśini | paritrāyasva māṃ bhīruṃ suyodhanabhayārditām

महाराज धृतराष्ट्र! अपनी पुत्रवधू की रक्षा कीजिए। महाभागा, सर्वज्ञा, सर्वदर्शिनी गान्धारी! सुयोधन के भय से पीड़ित मुझ डरी हुई की रक्षा कीजिए।

श्लोक 45 (2.92.45)

त्वमार्ये वीरजननि किं मां पश्यसि यादवि । क्लिश्यमानामनार्येण न त्रायसि वधूं स्वकाम् ॥

tvamārye vīrajanani kiṃ māṃ paśyasi yādavi | kliśyamānāmanāryeṇa na trāyasi vadhūṃ svakām

आर्ये! वीरों की जननी, यदुकुल की पुत्री! आप मुझे केवल देख क्यों रही हैं? एक अनार्य द्वारा सताई जा रही अपनी ही पुत्रवधू की रक्षा क्यों नहीं करतीं?

श्लोक 46 (2.92.46)

यदि लालप्यमानां मां न कश्चित्किञ्चिदब्रवीत् । हा हताऽस्मि सुमन्दात्मा सुयोधनवशं गता ॥

yadi lālapyamānāṃ māṃ na kaścitkiñcidabravīt | hā hatā'smi sumandātmā suyodhanavaśaṃ gatā

मैं इस प्रकार विलाप कर रही हूँ, फिर भी कोई कुछ नहीं कहता। हाय! मैं अभागिनी मारी गई, सुयोधन के वश में पड़ गई।

श्लोक 47 (2.92.47)

न वै पाण्डुर्नरपतिर्न धर्मो न च देवराट् । न वायुर्नाश्विनौ वाऽपि परित्रायन्ति वै स्नुषाम् । धिक्कष्टं यदि जीवेयं मन्दभाग्या पतिव्रता ॥

na vai pāṇḍurnarapatirna dharmo na ca devarāṭ | na vāyurnāśvinau vā'pi paritrāyanti vai snuṣām | dhikkaṣṭaṃ yadi jīveyaṃ mandabhāgyā pativratā

न राजा पाण्डु, न धर्म, न देवराज इन्द्र, न वायु, न अश्विनीकुमार — कोई भी अपनी पुत्रवधू की रक्षा नहीं करता। धिक्कार है! बड़े कष्ट की बात है यदि मैं अभागिनी पतिव्रता अब भी जीवित रहूँ।

विदुर उवाच

श्लोक 48 (2.92.48)

शृणोमि वाक्यं तव राजपुत्रि । नेमे पार्थाः किञ्चिदपि ब्रुवन्ति । सा त्वं प्रियार्थं शृणु वाक्यमेत- । द्यदुच्यते पापमतिः कृतघ्नः ॥

śṛṇomi vākyaṃ tava rājaputri | neme pārthāḥ kiñcidapi bruvanti | sā tvaṃ priyārthaṃ śṛṇu vākyameta- | dyaducyate pāpamatiḥ kṛtaghnaḥ

राजपुत्री! मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ, और ये पार्थ कुछ भी नहीं बोलते। इसलिए तुम्हारे हित के लिए यह वचन सुनो जो मैं कहता हूँ। पापबुद्धि, कृतघ्न

श्लोक 49 (2.92.49)

सुयोधनः सानुचरः सुदुष्टः । सहैव राजा निकृतः सूनुना च । यद्येष वाचं महदुच्यमानां । न श्रोष्यते पापमतिः सुदुष्टः ॥

suyodhanaḥ sānucaraḥ suduṣṭaḥ | sahaiva rājā nikṛtaḥ sūnunā ca | yadyeṣa vācaṃ mahaducyamānāṃ | na śroṣyate pāpamatiḥ suduṣṭaḥ

अपने अनुचरों सहित अत्यन्त दुष्ट सुयोधन, और पुत्र के द्वारा भटकाए गए राजा भी — दोनों नष्ट हो जाएँगे, यदि यह पापबुद्धि दुष्ट कहे जा रहे इस महान् वचन को नहीं सुनेगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (2.92.50)

इत्येवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रीं । क्षत्ताऽब्रवीद्धृतराष्ट्रस्य पुत्रम् ॥

ityevamuktvā drupadasya putrīṃ | kṣattā'bravīddhṛtarāṣṭrasya putram

द्रुपदपुत्री से ऐसा कहकर क्षत्ता विदुर ने धृतराष्ट्र के पुत्र से कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 51 (2.92.51)

मा क्लिश्यतां वै द्रुपदस्य पुत्री । मा त्वं चारीन् द्रक्ष्यसि राजपुत्र ॥

mā kliśyatāṃ vai drupadasya putrī | mā tvaṃ cārīn drakṣyasi rājaputra

राजकुमार! द्रुपदपुत्री को कष्ट न दिया जाए, अन्यथा तुम्हें अपने चारों ओर शत्रु के गुप्तचर दिखाई देंगे।

श्लोक 52 (2.92.52)

यद्येवं त्वं महाराज सङ्क्लेशयसि द्रौपदीम् । अचिरेणैव कालेन पुत्रस्ते सह मन्त्रिभिः । गमिष्यति क्षयं पापः पाण्डवक्षयकारणात् ॥

yadyevaṃ tvaṃ mahārāja saṅkleśayasi draupadīm | acireṇaiva kālena putraste saha mantribhiḥ | gamiṣyati kṣayaṃ pāpaḥ pāṇḍavakṣayakāraṇāt

महाराज! यदि आप इस प्रकार द्रौपदी को क्लेश पहुँचने देते हैं, तो पाण्डवों के विनाश का कारण बनने से आपका यह पापी पुत्र अपने मन्त्रियों सहित शीघ्र ही विनाश को प्राप्त होगा —

श्लोक 53 (2.92.53)

भीमार्जुनाभ्यां क्रुद्धाभ्यां माद्रीपुत्रद्वयेन च । तस्मान्निवारय सुतं मा विनाशं विचिन्तय ॥

bhīmārjunābhyāṃ kruddhābhyāṃ mādrīputradvayena ca | tasmānnivāraya sutaṃ mā vināśaṃ vicintaya

क्रुद्ध भीम और अर्जुन तथा माद्री के दोनों पुत्रों के हाथों। इसलिए अपने पुत्र को रोकिए; विनाश की बात मत सोचिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 54 (2.92.54)

एतच्छुत्वा मन्दबुद्धिर्नोत्तरं किञ्चिदब्रवीत् । ततो दुर्योधनस्तत्र दैवमोहबलात्कृतः ॥

etacchutvā mandabuddhirnottaraṃ kiñcidabravīt | tato duryodhanastatra daivamohabalātkṛtaḥ

यह सुनकर मन्दबुद्धि राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब वहाँ दैव से उत्पन्न मोह के वश में पड़ा दुर्योधन

श्लोक 55 (2.92.55)

अचिन्त्य क्षत्तुर्वचनं हर्षेणायतलोचनः । ऊरू दर्शयते पापो द्रौपद्या वै मुहुर्मुहुः ॥

acintya kṣatturvacanaṃ harṣeṇāyatalocanaḥ | ūrū darśayate pāpo draupadyā vai muhurmuhuḥ

क्षत्ता के वचन की उपेक्षा करके हर्ष से आँखें फैलाए वह पापी बार-बार द्रौपदी को अपनी जाँघें दिखाने लगा।

श्लोक 56 (2.92.56)

ऊरौ सन्दर्श्यमाने तु निरीक्ष्य तु सुयोधनम् । वृकोदरस्तदालोक्य नेत्रे चोत्फाल्य लोहिते ॥

ūrau sandarśyamāne tu nirīkṣya tu suyodhanam | vṛkodarastadālokya netre cotphālya lohite

जाँघ दिखाई जाने पर सुयोधन को देखते हुए वृकोदर ने यह देखकर अपनी लाल आँखें फाड़ीं।

श्लोक 57 (2.92.57)

एतत्समीक्ष्यात्मनि चावमानं । नियम्य मन्युं बलवान्स मानी । राजानुजः संसदि कौरवाणां । विनिष्क्रमन्वाक्यमुवाच भीमः ॥

etatsamīkṣyātmani cāvamānaṃ | niyamya manyuṃ balavānsa mānī | rājānujaḥ saṃsadi kauravāṇāṃ | viniṣkramanvākyamuvāca bhīmaḥ

इसे अपना अपमान देखकर राजा के छोटे भाई, बलवान् और स्वाभिमानी भीम ने अपने क्रोध को रोका और कौरवों की सभा से निकलते हुए यह वचन कहा —

भीम उवाच

श्लोक 58 (2.92.58)

अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनञ्जयः । शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति ॥

ahaṃ duryodhanaṃ hantā karṇaṃ hantā dhanañjayaḥ | śakuniṃ cākṣakitavaṃ sahadevo haniṣyati

मैं दुर्योधन को मारूँगा, धनंजय कर्ण को मारेंगे, और पासों के धूर्त शकुनि को सहदेव मारेंगे।

श्लोक 59 (2.92.59)

इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद्वचः । सत्यं देवाः करिष्यन्ति यदा युद्धं भविष्यति ॥

idaṃ ca bhūyo vakṣyāmi sabhāmadhye bṛhadvacaḥ | satyaṃ devāḥ kariṣyanti yadā yuddhaṃ bhaviṣyati

और मैं सभा के बीच यह महान् वचन फिर कहता हूँ — जब युद्ध होगा, तब देवता इसे सत्य कर दिखाएँगे।

श्लोक 60 (2.92.60)

सुयोधनमिमं पापं हन्तास्मि गदया युधि । शिरः पादेन चास्याहमधितिष्ठामि भूतले ॥

suyodhanamimaṃ pāpaṃ hantāsmi gadayā yudhi | śiraḥ pādena cāsyāhamadhitiṣṭhāmi bhūtale

मैं इस पापी सुयोधन को युद्ध में गदा से मारूँगा और धरती पर पड़े इसके सिर पर अपना पैर रखूँगा।

श्लोक 61 (2.92.61)

वक्षः शूरस्य निर्भिद्य पुरुषस्य दुरात्मनः । दुश्शासनस्य रुधिरं पास्यामि मृगराडिव ॥

vakṣaḥ śūrasya nirbhidya puruṣasya durātmanaḥ | duśśāsanasya rudhiraṃ pāsyāmi mṛgarāḍiva

और उस दुरात्मा, अपने को शूर मानने वाले दुःशासन की छाती चीरकर मैं सिंह की भाँति उसका रक्त पीऊँगा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 62 (2.92.62)

भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया सह । मन्दा गृहेषु सुखिनो न बुद्ध्यन्ते महद्भयम् ॥

bhīmasena na te santi yeṣāṃ vairaṃ tvayā saha | mandā gṛheṣu sukhino na buddhyante mahadbhayam

भीमसेन! जिनका तुमसे वैर है, वे अब रहे ही नहीं समझो। वे मूर्ख अपने घरों में सुख से बैठे हैं और इस महान् भय को नहीं समझते।

श्लोक 63 (2.92.63)

नैव वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् । यदि स्थास्यन्ति सङ्ग्रामे क्षत्रधर्मेण वै सह ॥

naiva vācā vyavasitaṃ bhīma vijñāyate satām | yadi sthāsyanti saṅgrāme kṣatradharmeṇa vai saha

भीम! सज्जनों का निश्चय वचनों से नहीं जाना जाता। यदि वे क्षत्रियधर्म के अनुसार संग्राम में डटे रहे,

श्लोक 64 (2.92.64)

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुश्शासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥

duryodhanasya karṇasya śakuneśca durātmanaḥ | duśśāsanacaturthānāṃ bhūmiḥ pāsyati śoṇitam

तो दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि और चौथे दुःशासन का रक्त यह धरती पीएगी।

श्लोक 65 (2.92.65)

असूयितारं वक्तारं प्रहृष्टानां दुरात्मनाम् । भीमसेन नियोगात्ते हन्ताऽहं कर्णमाहवे ॥

asūyitāraṃ vaktāraṃ prahṛṣṭānāṃ durātmanām | bhīmasena niyogātte hantā'haṃ karṇamāhave

भीमसेन! तुम्हारी आज्ञा से मैं युद्ध में उस ईर्ष्यालु कर्ण को मारूँगा, जो इन हर्षित दुरात्माओं का प्रवक्ता बना हुआ है।

श्लोक 66 (2.92.66)

कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्ताऽस्मि पत्रिभिः । ये चान्ये विप्रयोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः । तान्स्म सर्वाञ्छितैर्बाणैर्नेताऽस्मि यमसादनम् ॥

karṇaṃ karṇānugāṃścaiva raṇe hantā'smi patribhiḥ | ye cānye viprayotsyanti buddhimohena māṃ nṛpāḥ | tānsma sarvāñchitairbāṇairnetā'smi yamasādanam

मैं युद्ध में अपने बाणों से कर्ण और उसके अनुयायियों को मारूँगा; और जो दूसरे राजा बुद्धि के मोह से मुझसे लड़ेंगे, उन सबको भी अपने तीखे बाणों से यमलोक पहुँचा दूँगा।

श्लोक 67 (2.92.67)

चलेद्धि हिमवान्स्थानान्निष्प्रभः स्याद्दिवाकरः । शैत्यं सोमात्प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद्यदि ॥

caleddhi himavānsthānānniṣprabhaḥ syāddivākaraḥ | śaityaṃ somātpraṇaśyeta matsatyaṃ vicaledyadi

हिमालय अपने स्थान से हट जाए, सूर्य प्रभाहीन हो जाए, चन्द्रमा की शीतलता नष्ट हो जाए — तभी मेरा यह सत्य डिग सकता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (2.92.68)

इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान्माद्रवतीसुतः । प्रगृह्य विपुलं बाहुं सहदेवः प्रतापवान् ॥

ityuktavati pārthe tu śrīmānmādravatīsutaḥ | pragṛhya vipulaṃ bāhuṃ sahadevaḥ pratāpavān

पार्थ के ऐसा कहने पर माद्री के तेजस्वी और प्रतापी पुत्र सहदेव ने अपनी विशाल भुजा उठाई

श्लोक 69 (2.92.69)

सौबलस्य वधप्रेप्सुरिदं वचनमब्रवीत् । क्रोधसंरक्तनयनो निश्वस्य च मुहुर्मुहुः ॥

saubalasya vadhaprepsuridaṃ vacanamabravīt | krodhasaṃraktanayano niśvasya ca muhurmuhuḥ

और सुबलपुत्र शकुनि के वध की इच्छा से, क्रोध से लाल आँखें किए, बार-बार लम्बी साँसें लेते हुए यह वचन कहा —

सहदेव उवाच

श्लोक 70 (2.92.70)

यानक्षान्मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर । नैते ह्यक्षाः शिता बाणास्त्वयैते समरे धृताः ॥

yānakṣānmanyase mūḍha gāndhārāṇāṃ yaśohara | naite hyakṣāḥ śitā bāṇāstvayaite samare dhṛtāḥ

मूर्ख! गान्धारों के यश को नष्ट करने वाले! जिन्हें तुम पासे समझते हो, वे पासे नहीं, बल्कि तुम्हारे द्वारा युद्ध में धारण किए गए तीखे बाण हैं।

श्लोक 71 (2.92.71)

यथा चैवोक्तवान्भीमस्त्वामुद्दिश्य सबान्धवम् । कर्ताऽहं कर्मणा चास्य कुरुकार्याणि सर्वशः । यदि स्थास्यसि सङ्ग्रामे क्षत्रधर्मेण सौबल ॥

yathā caivoktavānbhīmastvāmuddiśya sabāndhavam | kartā'haṃ karmaṇā cāsya kurukāryāṇi sarvaśaḥ | yadi sthāsyasi saṅgrāme kṣatradharmeṇa saubala

जैसा भीम ने तुम्हें और तुम्हारे बन्धुओं को लक्ष्य करके कहा है, वैसा ही मैं कर्म से कर दिखाऊँगा। सौबल! अपने सब काम निपटा लो — यदि तुम क्षत्रियधर्म के अनुसार संग्राम में टिके रहे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 72 (2.92.72)

सहदेववचः श्रुत्वा नकुलोऽपि विशाम्पते । दर्शनीयतमो नॄणामिदं वचनमब्रवीत् ॥

sahadevavacaḥ śrutvā nakulo'pi viśāmpate | darśanīyatamo nṝṇāmidaṃ vacanamabravīt

प्रजानाथ! सहदेव का वचन सुनकर मनुष्यों में सबसे दर्शनीय नकुल ने भी यह वचन कहा —

नकुल उवाच

श्लोक 73 (2.92.73)

सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन्धृतराष्ट्रजैः । यैर्वाचः श्राविता रूक्षा धूर्तैर्दुर्योधनप्रियैः ॥

suteyaṃ yajñasenasya dyūte'smindhṛtarāṣṭrajaiḥ | yairvācaḥ śrāvitā rūkṣā dhūrtairduryodhanapriyaiḥ

इस जुए में दुर्योधन के प्रिय उन धूर्त धृतराष्ट्रपुत्रों ने यज्ञसेन की इस पुत्री को कठोर वचन सुनाए हैं।

श्लोक 74 (2.92.74)

धार्तराष्ट्रान्सुदुर्वृत्तान्मुमूर्षून्कालचोदितान् । दर्शयिष्यामि भूयिष्ठमहं वैवस्वतक्षयम् ॥

dhārtarāṣṭrānsudurvṛttānmumūrṣūnkālacoditān | darśayiṣyāmi bhūyiṣṭhamahaṃ vaivasvatakṣayam

उन दुराचारी, मरणासन्न, काल से प्रेरित धृतराष्ट्रपुत्रों में से अधिकांश को मैं वैवस्वत यम का लोक दिखा दूँगा।

श्लोक 75 (2.92.75)

उलूकं च दुरात्मानं सौबलस्य प्रियं सुतम् । हन्ताऽहमस्मि समरे मम शत्रुं नराधमम् ॥

ulūkaṃ ca durātmānaṃ saubalasya priyaṃ sutam | hantā'hamasmi samare mama śatruṃ narādhamam

और सुबलपुत्र शकुनि के प्रिय पुत्र, उस दुरात्मा नराधम उलूक को, जो मेरा शत्रु है, मैं युद्ध में मारूँगा।

श्लोक 76 (2.92.76)

निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् । निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव ॥

nideśāddharmarājasya draupadyāḥ padavīṃ caran | nirdhārtarāṣṭrāṃ pṛthivīṃ kartāsmi nacirādiva

धर्मराज की आज्ञा से, द्रौपदी के मार्ग का अनुसरण करते हुए, मैं शीघ्र ही पृथ्वी को धृतराष्ट्रपुत्रों से रहित कर दूँगा।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 77 (2.92.77)

यस्माच्चोरुं दर्शयसे यस्माच्चोरुं निरीक्षसे । तस्मात्तव ह्यधर्मिष्ठ ऊरौ मृत्युर्भविष्यति ॥

yasmāccoruṃ darśayase yasmāccoruṃ nirīkṣase | tasmāttava hyadharmiṣṭha ūrau mṛtyurbhaviṣyati

क्योंकि तुम अपनी जाँघ दिखाते हो और उसी पर दृष्टि गड़ाए रहते हो, इसलिए हे अधर्मी, तुम्हारी मृत्यु जाँघ में ही होगी।

श्लोक 78 (2.92.78)

यस्माच्चैवं क्लेशयति भ्राता ते मां दुरात्मवान् । तस्माद्रुधिरमेवास्य पास्यते वै वृकोदरः ॥

yasmāccaivaṃ kleśayati bhrātā te māṃ durātmavān | tasmādrudhiramevāsya pāsyate vai vṛkodaraḥ

और क्योंकि तुम्हारा दुरात्मा भाई मुझे इस प्रकार क्लेश दे रहा है, इसलिए वृकोदर उसका रक्त ही पीएँगे।

श्लोक 79 (2.92.79)

इमं च पापिष्ठमतिं कर्णं ससुतबान्धवम् । सामात्यं सपरीवारं हनिष्यति धनञ्जयः ॥

imaṃ ca pāpiṣṭhamatiṃ karṇaṃ sasutabāndhavam | sāmātyaṃ saparīvāraṃ haniṣyati dhanañjayaḥ

और इस अत्यन्त पापबुद्धि कर्ण को उसके पुत्रों, बन्धुओं, मन्त्रियों और परिवार सहित धनंजय मारेंगे।

श्लोक 80 (2.92.80)

क्षुद्रधर्मं नैकृतिकं शकुनिं पापचेतसम् । सहदेवो रणे क्रुद्धो हनिष्यति सबान्धवम् ॥

kṣudradharmaṃ naikṛtikaṃ śakuniṃ pāpacetasam | sahadevo raṇe kruddho haniṣyati sabāndhavam

और नीच आचरण वाले, कपटी, पापचित्त शकुनि को सहदेव रण में क्रुद्ध होकर उसके बन्धुओं सहित मारेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 81 (2.92.81)

एवमुक्ते तु वचने द्रौपद्या धर्मशीलया । ततोऽन्तरिक्षात्सुमहत्पुष्पवर्षमवापतत् ॥

evamukte tu vacane draupadyā dharmaśīlayā | tato'ntarikṣātsumahatpuṣpavarṣamavāpatat

धर्मशीला द्रौपदी के ये वचन कहने पर आकाश से फूलों की भारी वर्षा हुई।

श्लोक 82 (2.92.82)

तेषां तु वचनं श्रुत्वा नोचुस्तत्र सभासदः । अर्जुनस्य भयाद्राजन्नभून्निश्शब्दमत्र वै ॥

teṣāṃ tu vacanaṃ śrutvā nocustatra sabhāsadaḥ | arjunasya bhayādrājannabhūnniśśabdamatra vai

राजन्! उनके वचन सुनकर वहाँ सभासदों ने कुछ नहीं कहा; अर्जुन के भय से वहाँ सन्नाटा छा गया।

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