Skip to main content

सभा पर्व · अध्याय 91

द्रौपदी का विलाप और भीष्म का उत्तर

सभा में फिर घसीटी गई द्रौपदी पहले कुरु-वृद्धों को प्रणाम करती है, फिर गिरकर विलाप करती है कि जिसे कभी वायु और सूर्य ने भी नहीं देखा था, वह आज अपने पतियों और कौरवों के सामने भरी सभा में खड़ी है। वह फिर पूछती है कि वह दासी है या नहीं। भीष्म उत्तर देते हैं कि परम धर्म को जानना कठिन है और बलवान जो कहे वही धर्म मान लिया जाता है; वे उसके प्रश्न का निर्णय नहीं कर पाते, कुरुकुल के विनाश की आशंका व्यक्त करते हैं और कहते हैं कि वह जीती गई या नहीं, यह युधिष्ठिर स्वयं बताएँ।

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92

द्रौपद्युवाच

श्लोक 1 (2.91.1)

पुरस्तात्करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम् । विह्वलाऽस्मि कृताऽनेन कर्षता बलिना बलात् ॥

purastātkaraṇīyaṃ me na kṛtaṃ kāryamuttaram | vihvalā'smi kṛtā'nena karṣatā balinā balāt

जो कार्य मुझे पहले करना चाहिए था, वह मैंने अभी तक नहीं किया। इस बलवान ने मुझे बलपूर्वक घसीटकर व्याकुल कर दिया।

श्लोक 2 (2.91.2)

अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि । न मे स्यादपराधोऽयं तदिदं न कृतं मया ॥

abhivādaṃ karomyeṣāṃ kurūṇāṃ kurusaṃsadi | na me syādaparādho'yaṃ tadidaṃ na kṛtaṃ mayā

कुरुओं की इस सभा में मैं इन कुरुजनों को प्रणाम करती हूँ। यह मेरा अपराध न माना जाए कि मैंने यह पहले नहीं किया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (2.91.3)

सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी । पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता ॥

sā tena ca samādhūtā duḥkhena ca tapasvinī | patitā vilalāpedaṃ sabhāyāmatathocitā

दुःशासन के झकझोरने और दुख से व्याकुल वह तपस्विनी, जो ऐसे व्यवहार की अभ्यस्त नहीं थी, सभा में गिर पड़ी और इस प्रकार विलाप करने लगी —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 4 (2.91.4)

स्वयंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रङ्गे समागतैः । न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साऽहमद्य सभां गता ॥

svayaṃvare yāsmi nṛpairdṛṣṭā raṅge samāgataiḥ | na dṛṣṭapūrvā cānyatra sā'hamadya sabhāṃ gatā

स्वयंवर के समय रंगभूमि में एकत्र राजाओं ने मुझे देखा था; उससे पहले कहीं और किसी ने मुझे नहीं देखा था। वही मैं आज सभा में लाई गई हूँ।

श्लोक 5 (2.91.5)

यां न वायुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे । साऽहमद्य सभामध्ये दृष्टास्मि जनसंसदि ॥

yāṃ na vāyurna cādityo dṛṣṭavantau purā gṛhe | sā'hamadya sabhāmadhye dṛṣṭāsmi janasaṃsadi

जिसे पहले घर में न वायु ने देखा था न सूर्य ने, वही मैं आज भरी सभा में लोगों के सामने देखी जा रही हूँ।

श्लोक 6 (2.91.6)

यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा । स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना ॥

yāṃ na mṛṣyanti vātena spṛśyamānāṃ gṛhe purā | spṛśyamānāṃ sahante'dya pāṇḍavāstāṃ durātmanā

जो पाण्डव पहले घर में मुझे वायु का स्पर्श भी सहन नहीं करते थे, वे आज इस दुष्ट द्वारा मुझे छुए जाने को सह रहे हैं।

श्लोक 7 (2.91.7)

मृष्यन्ति कुरवश्चेमे मन्ये कालस्य पर्ययम् । स्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनर्हतीम् ॥

mṛṣyanti kuravaśceme manye kālasya paryayam | snuṣāṃ duhitaraṃ caiva kliśyamānāmanarhatīm

और ये कुरुवंशी भी अपनी बहू और बेटी को, जो इसके योग्य नहीं, सताई जाती देखकर सह रहे हैं। मुझे लगता है कि समय उलट गया है।

श्लोक 8 (2.91.8)

किंन्वतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेऽद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम् ॥

kiṃnvataḥ kṛpaṇaṃ bhūyo yadahaṃ strī satī śubhā | sabhāmadhyaṃ vigāhe'dya kva nu dharmo mahīkṣitām

इससे बढ़कर दयनीय बात और क्या होगी कि मुझ सती और कुलीन स्त्री को आज सभा के बीच आना पड़ा? राजाओं का धर्म अब कहाँ गया?

श्लोक 9 (2.91.9)

धर्म्यं स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति नः श्रुतम् । स नष्टः कौरवेयेषु पूर्वो धर्मः सनातनः ॥

dharmyaṃ striyaṃ sabhāṃ pūrve na nayantīti naḥ śrutam | sa naṣṭaḥ kauraveyeṣu pūrvo dharmaḥ sanātanaḥ

हमने सुना है कि पुराने लोग धर्म का पालन करते हुए किसी स्त्री को सभा में नहीं लाते थे। कौरवों में वह प्राचीन सनातन धर्म नष्ट हो गया है।

श्लोक 10 (2.91.10)

कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती । वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम् ॥

kathaṃ hi bhāryā pāṇḍūnāṃ pārṣatasya svasā satī | vāsudevasya ca sakhī pārthivānāṃ sabhāmiyām

मैं पाण्डवों की पत्नी, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न की बहन और वासुदेव की सखी, एक सती स्त्री — मैं राजाओं की सभा में कैसे आ गई?

श्लोक 11 (2.91.11)

तामिमां धर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णजाम् । ब्रूत दासीमदासीं वा तत्करिष्यामि कौरवाः ॥

tāmimāṃ dharmarājasya bhāryāṃ sadṛśavarṇajām | brūta dāsīmadāsīṃ vā tatkariṣyāmi kauravāḥ

मैं धर्मराज की पत्नी हूँ, उन्हीं के समान वर्ण में जन्मी। हे कौरवो, बताइए कि मैं दासी हूँ या नहीं — मैं वैसा ही करूँगी।

श्लोक 12 (2.91.12)

अयं मां सुदृढं क्षुद्रः कौरवाणां यशोहरः । क्लिश्नाति नाहं तत्सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवाः ॥

ayaṃ māṃ sudṛḍhaṃ kṣudraḥ kauravāṇāṃ yaśoharaḥ | kliśnāti nāhaṃ tatsoḍhuṃ ciraṃ śakṣyāmi kauravāḥ

कौरवों के यश को नष्ट करने वाला यह नीच मुझे बुरी तरह सता रहा है। हे कौरवो, मैं इसे अधिक देर तक सहन नहीं कर सकूँगी।

श्लोक 13 (2.91.13)

जितां वाऽप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपाः । तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्करिष्यामि कौरवाः ॥

jitāṃ vā'pyajitāṃ vāpi manyadhvaṃ māṃ yathā nṛpāḥ | tathā pratyuktamicchāmi tatkariṣyāmi kauravāḥ

हे राजाओ! आप मुझे जीती हुई मानें या न जीती हुई, मैं उसी के अनुसार स्पष्ट उत्तर चाहती हूँ; हे कौरवो, मैं वैसा ही करूँगी।

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (2.91.14)

उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गतिः । लोके न शक्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभिः ॥

uktavānasmi kalyāṇi dharmasya paramā gatiḥ | loke na śakyate jñātumapi vijñairmahātmabhiḥ

हे कल्याणी! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्म की परम गति को इस संसार में बुद्धिमान महात्मा भी नहीं जान पाते।

श्लोक 15 (2.91.15)

बलवांश्च यथा धर्मं लोके पश्यति पुरुषः । स धर्मो धर्मवेलायां भवत्यभिहतः परः ॥

balavāṃśca yathā dharmaṃ loke paśyati puruṣaḥ | sa dharmo dharmavelāyāṃ bhavatyabhihataḥ paraḥ

संसार में बलवान पुरुष जिसे धर्म मानता है, धर्म-विचार के समय वही धर्म ठहरता है; दूसरे का मत दब जाता है।

श्लोक 16 (2.91.16)

न विवेक्तुं च ते प्रश्नमिमं शक्नोमि निश्चयात् । सूक्ष्मत्वाद्गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात् ॥

na vivektuṃ ca te praśnamimaṃ śaknomi niścayāt | sūkṣmatvādgahanatvācca kāryasyāsya ca gauravāt

इस विषय की सूक्ष्मता, गहनता और गंभीरता के कारण मैं तुम्हारे इस प्रश्न का निश्चित निर्णय नहीं कर सकता।

श्लोक 17 (2.91.17)

नूनमन्तः कुलस्यास्य भविता न चिरादिव । तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपरायणाः ॥

nūnamantaḥ kulasyāsya bhavitā na cirādiva | tathā hi kuravaḥ sarve lobhamohaparāyaṇāḥ

निश्चय ही इस कुल का अंत अब दूर नहीं है, क्योंकि सभी कौरव लोभ और मोह में डूबे हुए हैं।

श्लोक 18 (2.91.18)

कुलेषु जाताः कल्याणि व्यसनैराहता भृशम् । धर्म्यान्मार्गान्न च्यवन्ते येषां नस्त्वं बधूः स्थिता ॥

kuleṣu jātāḥ kalyāṇi vyasanairāhatā bhṛśam | dharmyānmārgānna cyavante yeṣāṃ nastvaṃ badhūḥ sthitā

हे कल्याणी! उत्तम कुलों में जन्मे लोग विपत्तियों से कितने ही पीड़ित हों, धर्म के मार्ग से नहीं डिगते; और तुम ऐसे ही हमारे कुल की वधू हो।

श्लोक 19 (2.91.19)

उपपन्नं च पाञ्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम् । यत्कृच्छ्रमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे ॥

upapannaṃ ca pāñcāli tavedaṃ vṛttamīdṛśam | yatkṛcchramapi samprāptā dharmamevānvavekṣase

हे पाञ्चाली! तुम्हारा यह आचरण उचित ही है कि इतने कष्ट में पड़कर भी तुम धर्म की ओर ही देखती हो।

श्लोक 20 (2.91.20)

एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जनाः । शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानताः ॥

ete droṇādayaścaiva vṛddhā dharmavido janāḥ | śūnyaiḥ śarīraistiṣṭhanti gatāsava ivānatāḥ

द्रोण आदि ये धर्म के ज्ञाता वृद्ध जन सिर झुकाए, निष्प्राण-से, सूने शरीर लिए बैठे हैं।

श्लोक 21 (2.91.21)

युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेऽस्मिन्प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याख्यातुमर्हति ॥

yudhiṣṭhirastu praśne'sminpramāṇamiti me matiḥ | ajitāṃ vā jitāṃ veti svayaṃ vyākhyātumarhati

मेरे विचार से इस प्रश्न में युधिष्ठिर ही प्रमाण हैं। तुम जीती गई हो या नहीं, यह वे स्वयं बताएँ।

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92