सभा पर्व · अध्याय 90
द्रौपदी का वस्त्रहरण
द्रौपदी को दाँव पर लगाने पर भीम युधिष्ठिर पर क्रोधित होते हैं, तब अर्जुन उन्हें रोकते हैं। अकेले विकर्ण सभा से द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर देने का आग्रह करता है और कहता है कि वह जीती नहीं गई, पर कर्ण उसे डाँटता है, द्रौपदी को कुलटा कहता है और पाण्डवों तथा द्रौपदी के वस्त्र उतारने का आदेश देता है। दुःशासन जब द्रौपदी का वस्त्र खींचता है तो वह श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती है, और उनकी कृपा से एक के बाद एक वस्त्र प्रकट होते जाते हैं, यहाँ तक कि दुःशासन थककर बैठ जाता है; भीम युद्ध में उसका रक्त पीने की प्रतिज्ञा करते हैं। विदुर मौन राजाओं को प्रह्लाद की कथा सुनाते हैं, जिन्होंने अपने पुत्र विरोचन और सुधन्वा के बीच सत्य निर्णय दिया था, पर कोई उत्तर नहीं देता और कर्ण द्रौपदी को दासी के रूप में ले जाने को कहता है।
भीम उवाच
श्लोक 1 (2.90.1)
भवन्ति गेहे बन्धक्यः कितवानां युधिष्ठिर । न ताभिरुत दीव्यन्ति दया चैवास्ति तास्वपि ॥
bhavanti gehe bandhakyaḥ kitavānāṃ yudhiṣṭhira | na tābhiruta dīvyanti dayā caivāsti tāsvapi
युधिष्ठिर! जुआरियों के घरों में व्यभिचारिणी स्त्रियाँ रहती हैं, फिर भी वे उन्हें दाँव पर लगाकर जुआ नहीं खेलते; उनके प्रति भी उनमें दया होती है।
श्लोक 2 (2.90.2)
काश्यो यद्धनमाहार्षीद्द्रव्यं यच्चान्यदुत्तमम् । तथाऽन्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन् ॥
kāśyo yaddhanamāhārṣīddravyaṃ yaccānyaduttamam | tathā'nye pṛthivīpālā yāni ratnānyupāharan
काशीराज जो धन लाए थे, और जो अन्य उत्तम वस्तुएँ थीं, तथा अन्य राजाओं ने जो रत्न भेंट किए थे;
श्लोक 3 (2.90.3)
वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि च । राज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परैः ॥
vāhanāni dhanaṃ caiva kavacānyāyudhāni ca | rājyamātmā vayaṃ caiva kaitavena hṛtaṃ paraiḥ
वाहन, धन, कवच और अस्त्र-शस्त्र, राज्य, आप स्वयं और हम सब — यह सब शत्रुओं ने छल से हर लिया।
श्लोक 4 (2.90.4)
न च मे तत्र कोपोऽभूत्सर्वस्येशो हि नो भवान् । इमं त्वतिक्रमं मन्ये द्रौपदी यत्र पण्यते ॥
na ca me tatra kopo'bhūtsarvasyeśo hi no bhavān | imaṃ tvatikramaṃ manye draupadī yatra paṇyate
उस पर भी मुझे क्रोध नहीं आया, क्योंकि आप हमारी हर वस्तु के स्वामी हैं। किंतु इसे मैं मर्यादा का उल्लंघन मानता हूँ कि द्रौपदी को दाँव पर लगाया गया।
श्लोक 5 (2.90.5)
एषा ह्यनर्हती बाला पाण्डवान्प्राप्य कौरवैः । त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ॥
eṣā hyanarhatī bālā pāṇḍavānprāpya kauravaiḥ | tvatkṛte kliśyate kṣudrairnṛśaṃsairakṛtātmabhiḥ
यह युवती इसके योग्य नहीं थी। पाण्डवों को पाकर अब यह आपके कारण नीच, क्रूर और अजितात्मा कौरवों द्वारा सताई जा रही है।
श्लोक 6 (2.90.6)
अस्याः कृते मन्युरयं त्वयि राजन्निपात्यते । बाहू ते सम्प्रधक्ष्यामि सहदेवाग्निमानय ॥
asyāḥ kṛte manyurayaṃ tvayi rājannipātyate | bāhū te sampradhakṣyāmi sahadevāgnimānaya
हे राजन्! इसी के कारण यह क्रोध आप पर गिर रहा है। मैं आपकी भुजाएँ जला डालूँगा। सहदेव, अग्नि ले आओ!
अर्जुन उवाच
श्लोक 7 (2.90.7)
न पुरा भीमसेन त्वमीदृशीर्वदिता गिरः । परैस्ते नाशितं नूनं नृशंसैर्धर्मगौरवम् ॥
na purā bhīmasena tvamīdṛśīrvaditā giraḥ | paraiste nāśitaṃ nūnaṃ nṛśaṃsairdharmagauravam
भीमसेन! पहले तुमने कभी ऐसी बातें नहीं कहीं। निश्चय ही क्रूर शत्रुओं ने तुम्हारे भीतर धर्म के प्रति आदर को नष्ट कर दिया है।
श्लोक 8 (2.90.8)
न सकामाः परे कार्या धर्ममेवाचरोत्तमम् । भ्रातरं धार्मिकं ज्येष्ठं कोऽतिवर्तितुमर्हति ॥
na sakāmāḥ pare kāryā dharmamevācarottamam | bhrātaraṃ dhārmikaṃ jyeṣṭhaṃ ko'tivartitumarhati
शत्रुओं की इच्छा पूरी न होने दो; उत्तम धर्म का ही आचरण करो। अपने धर्मात्मा बड़े भाई का उल्लंघन कौन कर सकता है?
श्लोक 9 (2.90.9)
आहूतो हि परै राजा क्षात्रं व्रतमनुस्मरन् । दीव्यते परकामेन तन्नः कीर्तिकरं महत् ॥
āhūto hi parai rājā kṣātraṃ vratamanusmaran | dīvyate parakāmena tannaḥ kīrtikaraṃ mahat
शत्रुओं ने राजा को ललकारा, और क्षत्रिय के व्रत का स्मरण करके वे दूसरे की इच्छा पर जुआ खेल रहे हैं। यह हमारे लिए बड़े यश की बात है।
भीमसेन उवाच
श्लोक 10 (2.90.10)
एवमस्मिन्कृतं विद्यां यदि नाहं धनञ्जय । दीप्तेऽग्नौ सहितौ बाहू निर्दहेयं बलादिव ॥
evamasminkṛtaṃ vidyāṃ yadi nāhaṃ dhanañjaya | dīpte'gnau sahitau bāhū nirdaheyaṃ balādiva
धनञ्जय! यदि मैं यह न जानता कि उन्होंने यह कार्य इसी भाव से किया है, तो उनकी दोनों भुजाओं को एक साथ पकड़कर धधकती आग में जला देता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (2.90.11)
तथा तान्दुःखितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्धृतराष्ट्रजः । कृष्यमाणां च पाञ्चालीं विकर्ण इदमब्रवीत् ॥
tathā tānduḥkhitāndṛṣṭvā pāṇḍavāndhṛtarāṣṭrajaḥ | kṛṣyamāṇāṃ ca pāñcālīṃ vikarṇa idamabravīt
पाण्डवों को इस प्रकार दुखी और पाञ्चाली को घसीटी जाती देखकर धृतराष्ट्र के पुत्र विकर्ण ने यह कहा —
विकर्ण उवाच
श्लोक 12 (2.90.12)
याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्वाक्यं विब्रूत पार्थिवाः । अविवेकेन वाक्यस्य नरकः सद्य एव नः ॥
yājñasenyā yaduktaṃ tadvākyaṃ vibrūta pārthivāḥ | avivekena vākyasya narakaḥ sadya eva naḥ
हे राजाओ! याज्ञसेनी ने जो प्रश्न पूछा है, उसका उत्तर दीजिए। इस प्रश्न का निर्णय न करने से हमें तुरंत नरक मिलेगा।
श्लोक 13 (2.90.13)
भीष्मश्च धृतराष्ट्रश्च कुरुवृद्धतमावुभौ । समेत्य नाहतुः किञ्चिद्विदुरश्च महामतिः ॥
bhīṣmaśca dhṛtarāṣṭraśca kuruvṛddhatamāvubhau | sametya nāhatuḥ kiñcidviduraśca mahāmatiḥ
कुरुवंश के दोनों सबसे वृद्ध पुरुष, भीष्म और धृतराष्ट्र, यहाँ उपस्थित होकर भी कुछ नहीं बोले; न ही महामति विदुर।
श्लोक 14 (2.90.14)
भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्यः कृप एव च । कुत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ ॥
bhāradvājaśca sarveṣāmācāryaḥ kṛpa eva ca | kuta etāvapi praśnaṃ nāhaturdvijasattamau
और हम सबके आचार्य भरद्वाजपुत्र द्रोण तथा कृप — ये दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण भी प्रश्न का उत्तर क्यों नहीं देते?
श्लोक 15 (2.90.15)
ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतोदिशम् । कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते ब्रुवन्तु यथामति ॥
ye tvanye pṛthivīpālāḥ sametāḥ sarvatodiśam | kāmakrodhau samutsṛjya te bruvantu yathāmati
चारों दिशाओं से यहाँ एकत्र अन्य राजा काम और क्रोध को त्यागकर अपनी बुद्धि के अनुसार बोलें।
श्लोक 16 (2.90.16)
यदिदं द्रौपदी वाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा । विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा वदतोत्तरम् ॥
yadidaṃ draupadī vākyamuktavatyasakṛcchubhā | vimṛśya kasya kaḥ pakṣaḥ pārthivā vadatottaram
हे राजाओ! कल्याणी द्रौपदी ने बार-बार जो बात कही है, उस पर विचार करके उत्तर दीजिए कि कौन किस पक्ष में है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (2.90.17)
एवं स बहुशः सर्वानुक्तवांस्तान्सभासदः । न च ते पृथिवीपालास्तमूचुः साध्वसाधु वा ॥
evaṃ sa bahuśaḥ sarvānuktavāṃstānsabhāsadaḥ | na ca te pṛthivīpālāstamūcuḥ sādhvasādhu vā
उसने सभा में बैठे सब लोगों से बार-बार ऐसा कहा, किंतु उन राजाओं ने उससे भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा।
श्लोक 18 (2.90.18)
उक्त्वाऽसकृत्तथा सर्वान्विकर्णः पृथिवीपतीन् । पाणौ पाणिं विनिष्पिष्य निःश्वसन्निदमब्रवीत् ॥
uktvā'sakṛttathā sarvānvikarṇaḥ pṛthivīpatīn | pāṇau pāṇiṃ viniṣpiṣya niḥśvasannidamabravīt
सब राजाओं से बार-बार ऐसा कहकर विकर्ण ने हाथ मलते हुए लंबी साँस ली और यह कहा —
विकर्ण उवाच
श्लोक 19 (2.90.19)
विब्रूत पृथिवीपाला वाक्यं मा वा कथञ्चन । मन्ये न्याय्यं यदत्राहं तद्धि वक्ष्यामि कौरवाः ॥
vibrūta pṛthivīpālā vākyaṃ mā vā kathañcana | manye nyāyyaṃ yadatrāhaṃ taddhi vakṣyāmi kauravāḥ
राजाओ, आप उत्तर दें या न दें; हे कौरवो, इस विषय में जो मुझे न्यायसंगत लगता है, वह मैं कहूँगा।
श्लोक 20 (2.90.20)
चत्वार्याहुर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम् । मृगयां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिरक्तताम् ॥
catvāryāhurnaraśreṣṭhā vyasanāni mahīkṣitām | mṛgayāṃ pānamakṣāṃśca grāmye caivātiraktatām
श्रेष्ठ पुरुष राजाओं के चार व्यसन बताते हैं — शिकार, मद्यपान, जुआ और विषय-भोग में अत्यधिक आसक्ति।
श्लोक 21 (2.90.21)
एतेषु हि नरः सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते । यथाऽयुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते ॥
eteṣu hi naraḥ sakto dharmamutsṛjya vartate | yathā'yuktena ca kṛtāṃ kriyāṃ loko na manyate
इनमें आसक्त मनुष्य धर्म को छोड़कर चलने लगता है; और जैसे असंयत व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को लोग मान्य नहीं समझते,
श्लोक 22 (2.90.22)
तथेयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम् । समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपणः ॥
tatheyaṃ pāṇḍuputreṇa vyasane vartatā bhṛśam | samāhūtena kitavairāsthito draupadīpaṇaḥ
वैसे ही पाण्डुपुत्र ने व्यसन में बुरी तरह फँसे रहते हुए, जुआरियों द्वारा ललकारे जाने पर, द्रौपदी को दाँव पर लगाया।
श्लोक 23 (2.90.23)
साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता । जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन कृतः पणः ॥
sādhāraṇī ca sarveṣāṃ pāṇḍavānāmaninditā | jitena pūrvaṃ cānena pāṇḍavena kṛtaḥ paṇaḥ
फिर, यह निर्दोष स्त्री सभी पाण्डवों की समान रूप से पत्नी है; और इस पाण्डव ने स्वयं को पहले ही हार जाने के बाद यह दाँव लगाया।
श्लोक 24 (2.90.24)
इयं च कीर्तिता कृष्णा सौबलेन पणार्थिना । एतत्सर्वं विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम् ॥
iyaṃ ca kīrtitā kṛṣṇā saubalena paṇārthinā | etatsarvaṃ vicāryāhaṃ manye na vijitāmimām
और दाँव के लिए उत्सुक सुबलपुत्र शकुनि ने ही कृष्णा का नाम लिया था। इन सब बातों पर विचार करके मैं मानता हूँ कि यह जीती नहीं गई।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (2.90.25)
एतच्छ्रुत्वा महान्नादः सभ्यानामुदतिष्ठत । विकर्णं शंसमानानां सौबलं चापि निन्दताम् ॥
etacchrutvā mahānnādaḥ sabhyānāmudatiṣṭhata | vikarṇaṃ śaṃsamānānāṃ saubalaṃ cāpi nindatām
यह सुनकर सभासदों में बड़ा कोलाहल उठा; वे विकर्ण की प्रशंसा और सुबलपुत्र की निंदा करने लगे।
श्लोक 26 (2.90.26)
तस्मिन्नुपरते शब्दे राधेयः क्रोधमूर्छितः । प्रगृह्य रुचिरं बाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥
tasminnuparate śabde rādheyaḥ krodhamūrchitaḥ | pragṛhya ruciraṃ bāhumidaṃ vacanamabravīt
वह शोर थमने पर क्रोध से तमतमाए राधापुत्र कर्ण ने अपनी सुंदर भुजा उठाकर यह कहा —
कर्ण उवाच
श्लोक 27 (2.90.27)
दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि बहून्यपि । तज्जातस्तद्विनाशाय यथाऽग्निररणिप्रजः ॥
dṛśyante vai vikarṇeha vaikṛtāni bahūnyapi | tajjātastadvināśāya yathā'gniraraṇiprajaḥ
विकर्ण! यहाँ बहुत-सी विकृतियाँ दिखाई देती हैं। जिस कुल में तुम जन्मे, उसी के विनाश के लिए तत्पर हो, जैसे अरणि से उत्पन्न अग्नि उसी अरणि को जला देती है।
श्लोक 28 (2.90.28)
एते न किञ्चिदप्याहुश्चोदिता ह्यपि कृष्णया । धर्मेण विजितामेतां मन्यन्ते द्रुपदात्मजाम् ॥
ete na kiñcidapyāhuścoditā hyapi kṛṣṇayā | dharmeṇa vijitāmetāṃ manyante drupadātmajām
कृष्णा के प्रेरित करने पर भी ये लोग कुछ नहीं बोले; ये द्रुपदकुमारी को धर्मपूर्वक जीती हुई मानते हैं।
श्लोक 29 (2.90.29)
त्वं तु केवलबाल्येन धार्तराष्ट्र विदीर्यसे । यद्ब्रवीषि सभामध्ये बालः स्थविरभाषितम् ॥
tvaṃ tu kevalabālyena dhārtarāṣṭra vidīryase | yadbravīṣi sabhāmadhye bālaḥ sthavirabhāṣitam
परंतु धृतराष्ट्रपुत्र! तुम केवल बचपने के कारण फटे जा रहे हो, क्योंकि बालक होकर भी तुम भरी सभा में बड़े-बूढ़ों की तरह बोल रहे हो।
श्लोक 30 (2.90.30)
न च धर्मं यथावत्त्वं वेत्सि दुर्योधनावर । यद्ब्रवीषि जितां कृष्णां न जितेति सुमन्दधीः ॥
na ca dharmaṃ yathāvattvaṃ vetsi duryodhanāvara | yadbravīṣi jitāṃ kṛṣṇāṃ na jiteti sumandadhīḥ
हे दुर्योधन के छोटे भाई! तुम धर्म को ठीक-ठीक नहीं जानते, तभी तो मन्दबुद्धि होकर जीती हुई कृष्णा को "नहीं जीती गई" कहते हो।
श्लोक 31 (2.90.31)
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज । यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान्पाण्डवाग्रजः ॥
kathaṃ hyavijitāṃ kṛṣṇāṃ manyase dhṛtarāṣṭraja | yadā sabhāyāṃ sarvasvaṃ nyastavānpāṇḍavāgrajaḥ
धृतराष्ट्रपुत्र! जब पाण्डवों के ज्येष्ठ भाई ने सभा में अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया, तब तुम कृष्णा को अविजित कैसे मानते हो?
श्लोक 32 (2.90.32)
अभ्यन्तरा च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ । एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम् ॥
abhyantarā ca sarvasve draupadī bharatarṣabha | evaṃ dharmajitāṃ kṛṣṇāṃ manyase na jitāṃ katham
हे भरतश्रेष्ठ! द्रौपदी भी उस सर्वस्व के भीतर ही आती है। इस प्रकार धर्मपूर्वक जीती गई कृष्णा को तुम अविजित कैसे मानते हो?
श्लोक 33 (2.90.33)
कीर्तिता द्रौपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवैः । भवत्यविजिता केन हेतुनैषा मता तव ॥
kīrtitā draupadī vācā anujñātā ca pāṇḍavaiḥ | bhavatyavijitā kena hetunaiṣā matā tava
द्रौपदी का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और पाण्डवों ने उसकी अनुमति दी। फिर किस कारण तुम उसे अविजित मानते हो?
श्लोक 34 (2.90.34)
मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम् । अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तमम् ॥
manyase vā sabhāmetāmānītāmekavāsasam | adharmeṇeti tatrāpi śṛṇu me vākyamuttamam
अथवा यदि तुम मानते हो कि इसे एक ही वस्त्र में सभा में लाना अधर्म है, तो इस विषय में भी मेरी उत्तम बात सुनो।
श्लोक 35 (2.90.35)
एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरुनन्दन । इयं त्वनेकवशगा बन्धकीति विनिश्चिता ॥
eko bhartā striyā devairvihitaḥ kurunandana | iyaṃ tvanekavaśagā bandhakīti viniścitā
हे कुरुनन्दन! देवताओं ने स्त्री के लिए एक ही पति का विधान किया है। यह तो अनेक पुरुषों के वश में है, अतः निश्चय ही यह कुलटा है।
श्लोक 36 (2.90.36)
अस्याः सभामानयनं न चित्रमिति मे मतिः । एकाम्बरधरत्वं वाऽप्यथवाऽपि विवस्त्रता ॥
asyāḥ sabhāmānayanaṃ na citramiti me matiḥ | ekāmbaradharatvaṃ vā'pyathavā'pi vivastratā
इसलिए मेरे विचार से इसे सभा में लाना कोई आश्चर्य की बात नहीं, चाहे यह एक वस्त्र में हो या निर्वस्त्र।
श्लोक 37 (2.90.37)
यच्चैषां द्रविणं किञ्चिद्या चैषा ये च पाण्डवाः । सौबलेनेह तत्सर्वं धर्मेण विजितं वसु ॥
yaccaiṣāṃ draviṇaṃ kiñcidyā caiṣā ye ca pāṇḍavāḥ | saubaleneha tatsarvaṃ dharmeṇa vijitaṃ vasu
इनका जो कुछ धन था, यह स्त्री और ये पाण्डव भी — यह सारा वैभव सुबलपुत्र ने यहाँ धर्मपूर्वक जीत लिया है।
श्लोक 38 (2.90.38)
दुःशासन सुबालोऽयं विकर्णः प्राज्ञवादिकः । पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर ॥
duḥśāsana subālo'yaṃ vikarṇaḥ prājñavādikaḥ | pāṇḍavānāṃ ca vāsāṃsi draupadyāścāpyupāhara
दुःशासन! यह विकर्ण निरा बालक है, जो विद्वानों की तरह बातें करता है। पाण्डवों के और द्रौपदी के भी वस्त्र उतार लो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (2.90.39)
तच्छ्रुत्वा पाण्डवाः सर्वे स्वानि वासांसि भारत । अवकीर्योत्तरीयाणि सभायां समुपाविशन् ॥
tacchrutvā pāṇḍavāḥ sarve svāni vāsāṃsi bhārata | avakīryottarīyāṇi sabhāyāṃ samupāviśan
हे भारत! यह सुनकर सब पाण्डव अपने उत्तरीय वस्त्र उतारकर सभा में बैठ गए।
श्लोक 40 (2.90.40)
ततो दुःशासनो राजन्द्रौपद्या वसनं बलात् । सभामध्ये समाक्षिप्य व्यपाक्रष्टुं प्रचक्रमे ॥
tato duḥśāsano rājandraupadyā vasanaṃ balāt | sabhāmadhye samākṣipya vyapākraṣṭuṃ pracakrame
हे राजन्! तब दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का वस्त्र बलपूर्वक पकड़कर खींचना आरंभ किया।
श्लोक 41 (2.90.41)
आकृष्यमाणे वसने विललाप सुदुःखिता । ज्ञातं मया वसिष्ठेन पुरा गीतं महात्मना ॥
ākṛṣyamāṇe vasane vilalāpa suduḥkhitā | jñātaṃ mayā vasiṣṭhena purā gītaṃ mahātmanā
वस्त्र खींचे जाने पर वह अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगी — "मुझे ज्ञात है कि महात्मा वसिष्ठ ने पहले यह कहा था —
श्लोक 42 (2.90.42)
महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान्हरिः । इति निश्चित्य मनसा शरणागतवत्सलम् । आकृष्यमाणे वसने द्रौपदी कृष्णमस्मरत् ॥
mahatyāpadi samprāpte smartavyo bhagavānhariḥ | iti niścitya manasā śaraṇāgatavatsalam | ākṛṣyamāṇe vasane draupadī kṛṣṇamasmarat
बड़ी विपत्ति आने पर भगवान् हरि का स्मरण करना चाहिए।" मन में ऐसा निश्चय करके, वस्त्र खींचे जाते समय द्रौपदी ने शरणागतवत्सल श्रीकृष्ण का स्मरण किया।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 43 (2.90.43)
शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत । गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम् ॥
śaṅkhacakragadāpāṇe dvārakānilayācyuta | govinda puṇḍarīkākṣa rakṣa māṃ śaraṇāgatām
हे शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, द्वारका-निवासी अच्युत! हे गोविन्द, हे कमलनयन! मैं आपकी शरण में आई हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 44 (2.90.44)
हा कृष्ण द्वारकावासिन्क्वासि यादवनन्दन । इमामवस्थां सम्प्राप्तामनाथां किमुपेक्षसे ॥
hā kṛṣṇa dvārakāvāsinkvāsi yādavanandana | imāmavasthāṃ samprāptāmanāthāṃ kimupekṣase
हा कृष्ण! हे द्वारकावासी, हे यादवनन्दन, आप कहाँ हैं? इस दशा को पहुँची मुझ अनाथ की आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?
श्लोक 45 (2.90.45)
गोविन्द द्वारकावासिन्कृष्ण गोपीजनप्रिय । कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव ॥
govinda dvārakāvāsinkṛṣṇa gopījanapriya | kauravaiḥ paribhūtāṃ māṃ kiṃ na jānāsi keśava
हे गोविन्द, हे द्वारकावासी, हे गोपीजनों के प्रिय कृष्ण! हे केशव, क्या आप नहीं जानते कि कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं?
श्लोक 46 (2.90.46)
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन । कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ॥
he nātha he ramānātha vrajanāthārtināśana | kauravārṇavamagnāṃ māmuddharasva janārdana
हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ, हे दुख हरने वाले! हे जनार्दन, कौरवरूपी सागर में डूबती हुई मेरा उद्धार कीजिए।
श्लोक 47 (2.90.47)
कृष्णकृष्ण महायोगिन्विश्वात्मन्विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ॥
kṛṣṇakṛṣṇa mahāyoginviśvātmanviśvabhāvana | prapannāṃ pāhi govinda kurumadhye'vasīdatīm
हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे महायोगी, हे विश्वात्मा, हे विश्व के रचयिता! हे गोविन्द, कुरुओं के बीच डूबती, आपकी शरण आई मेरी रक्षा कीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (2.90.48)
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम् । प्रारुदद्दुःखिता राजन्मुखमाच्छाद्य भामिनी ॥
ityanusmṛtya kṛṣṇaṃ sā hariṃ tribhuvaneśvaram | prārudadduḥkhitā rājanmukhamācchādya bhāminī
हे राजन्! इस प्रकार त्रिभुवन के स्वामी श्रीहरि कृष्ण का स्मरण करके वह सुंदरी मुख ढँककर दुख से रोने लगी।
श्लोक 49 (2.90.49)
तस्य प्रसादाद्द्रौपद्याः कृष्यमाणेऽम्बरे तदा । तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः ॥
tasya prasādāddraupadyāḥ kṛṣyamāṇe'mbare tadā | tadrūpamaparaṃ vastraṃ prādurāsīdanekaśaḥ
तब उनकी कृपा से, जब द्रौपदी का वस्त्र खींचा जा रहा था, उसी के समान दूसरा वस्त्र बार-बार प्रकट होता गया।
श्लोक 50 (2.90.50)
नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो । प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात् ॥
nānārāgavirāgāṇi vasanānyatha vai prabho | prādurbhavanti śataśo dharmasya paripālanāt
हे प्रभो! धर्म की रक्षा होने के कारण अनेक रंगों के और श्वेत वस्त्र सैकड़ों की संख्या में प्रकट होने लगे।
श्लोक 51 (2.90.51)
ततो हलहलाशब्दस्तत्रासीद्घोरदर्शनः । तदद्भुततमं लोके वीक्ष्य सर्वे महीभृतः ॥
tato halahalāśabdastatrāsīdghoradarśanaḥ | tadadbhutatamaṃ loke vīkṣya sarve mahībhṛtaḥ
तब वहाँ भयंकर कोलाहल मच गया, जब सब राजाओं ने संसार का वह सबसे अद्भुत दृश्य देखा।
श्लोक 52 (2.90.52)
शशंसुर्द्रौपदीं तत्र कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् । धिग्धिगित्यशिवां वाचमुत्सृजन्कौरवान्प्रति ॥
śaśaṃsurdraupadīṃ tatra kutsanto dhṛtarāṣṭrajam | dhigdhigityaśivāṃ vācamutsṛjankauravānprati
वे वहाँ द्रौपदी की प्रशंसा और धृतराष्ट्रपुत्र की निंदा करने लगे, तथा "धिक्कार है, धिक्कार है!" कहते हुए कौरवों के प्रति कठोर वचन बोलने लगे।
श्लोक 53 (2.90.53)
यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः । तदा दुःशासनः श्रान्तो व्रीडितः समुपाविशत् ॥
yadā tu vāsasāṃ rāśiḥ sabhāmadhye samācitaḥ | tadā duḥśāsanaḥ śrānto vrīḍitaḥ samupāviśat
जब सभा के बीच वस्त्रों का ढेर लग गया, तब थका हुआ और लज्जित दुःशासन बैठ गया।
श्लोक 54 (2.90.54)
शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये बृहत्स्वनः । क्रोधाद्विस्फुरमाणौष्ठो विनिष्पिष्य करे करम् ॥
śaśāpa tatra bhīmastu rājamadhye bṛhatsvanaḥ | krodhādvisphuramāṇauṣṭho viniṣpiṣya kare karam
तब क्रोध से फड़कते होंठों वाले भीम ने हाथ से हाथ मसलते हुए राजाओं के बीच ऊँचे स्वर में शपथ ली —
भीम उवाच
श्लोक 55 (2.90.55)
इदं मे वाक्यमादद्ध्वं क्षत्रिया लोकवासिनः । नोक्तपूर्वं नरैरन्यैर्न चान्यो यद्वदिष्यति ॥
idaṃ me vākyamādaddhvaṃ kṣatriyā lokavāsinaḥ | noktapūrvaṃ narairanyairna cānyo yadvadiṣyati
हे संसार के क्षत्रियो! मेरी यह बात ध्यान से सुनो, जो न पहले किसी ने कही है और न आगे कोई कहेगा।
श्लोक 56 (2.90.56)
यद्येतदेवमुक्त्वाऽहं न कुर्यां पृथिवीश्वराः । पितामहानां पूर्वेषां नाहं गतिमवाप्नुयाम् ॥
yadyetadevamuktvā'haṃ na kuryāṃ pṛthivīśvarāḥ | pitāmahānāṃ pūrveṣāṃ nāhaṃ gatimavāpnuyām
हे राजाओ! यदि ऐसा कहकर मैं इसे पूरा न करूँ, तो मुझे अपने पूर्वज पितामहों की गति प्राप्त न हो,
श्लोक 57 (2.90.57)
अस्य पापस्य दुर्बुद्धेर्भारतापसदस्य च । न पिबेयं बलाद्वक्षो भित्त्वा चेद्रुधिरं युधि ॥
asya pāpasya durbuddherbhāratāpasadasya ca | na pibeyaṃ balādvakṣo bhittvā cedrudhiraṃ yudhi
यदि युद्ध में इस पापी, दुर्बुद्धि, भरतवंश के कलंक की छाती बलपूर्वक फाड़कर मैं इसका रक्त न पीऊँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 58 (2.90.58)
तस्य ते तद्वचः श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम् । प्रचक्रुर्बहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् ॥
tasya te tadvacaḥ śrutvā raudraṃ lomapraharṣaṇam | pracakrurbahulāṃ pūjāṃ kutsanto dhṛtarāṣṭrajam
उसके वे भयंकर, रोंगटे खड़े कर देने वाले वचन सुनकर लोगों ने उसका बहुत सम्मान किया और धृतराष्ट्रपुत्र की निंदा की।
श्लोक 59 (2.90.59)
न विब्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह । सुजनः क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्रं विगर्हयन् ॥
na vibruvanti kauravyāḥ praśnametamiti sma ha | sujanaḥ krośati smātra dhṛtarāṣṭraṃ vigarhayan
"कौरव इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे," ऐसा कहते हुए वहाँ के सज्जन धृतराष्ट्र की निंदा करते हुए पुकार उठे।
श्लोक 60 (2.90.60)
ततो बाहू समुत्क्षिप्य निवार्य च सभासदः । विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥
tato bāhū samutkṣipya nivārya ca sabhāsadaḥ | viduraḥ sarvadharmajña idaṃ vacanamabravīt
तब सब धर्मों के ज्ञाता विदुर ने भुजाएँ उठाकर सभासदों को शांत किया और यह कहा —
विदुर उवाच
श्लोक 61 (2.90.61)
द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति त्वनाथवत् । न च विब्रूत तं प्रश्नं सभ्या धर्मोऽत्र पीड्यते ॥
draupadī praśnamuktvaivaṃ roravīti tvanāthavat | na ca vibrūta taṃ praśnaṃ sabhyā dharmo'tra pīḍyate
द्रौपदी अपना प्रश्न पूछकर अनाथ की भाँति रो रही है, और आप सभासद उस प्रश्न का उत्तर नहीं देते। यहाँ धर्म को पीड़ा पहुँच रही है।
श्लोक 62 (2.90.62)
सभां प्रपद्यते प्रश्नः प्रज्वलन्निव हव्यवाट् । तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमयन्त्युत ॥
sabhāṃ prapadyate praśnaḥ prajvalanniva havyavāṭ | taṃ vai satyena dharmeṇa sabhyāḥ praśamayantyuta
प्रश्न सभा के सामने धधकती अग्नि के समान आता है; सभासद सत्य और धर्म से उसे शांत करते हैं।
श्लोक 63 (2.90.63)
धर्म्यं प्रश्नमतो ब्रूयादार्यः सत्येन मानवः । विब्रूयुस्तत्र तं प्रश्नं कामक्रोधबलातिगाः ॥
dharmyaṃ praśnamato brūyādāryaḥ satyena mānavaḥ | vibrūyustatra taṃ praśnaṃ kāmakrodhabalātigāḥ
अतः श्रेष्ठ पुरुष को सत्यपूर्वक धर्मसंगत प्रश्न पूछना चाहिए, और वहाँ उपस्थित लोग काम और क्रोध के वेग से ऊपर उठकर उसका उत्तर दें।
श्लोक 64 (2.90.64)
विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः । भवन्तोऽपि हि तं प्रश्नं विब्रुवन्तु यथामति ॥
vikarṇena yathāprajñamuktaḥ praśno narādhipāḥ | bhavanto'pi hi taṃ praśnaṃ vibruvantu yathāmati
हे नरेशो! विकर्ण ने अपनी बुद्धि के अनुसार प्रश्न का उत्तर दे दिया है। आप भी अपनी समझ के अनुसार उसका उत्तर दें।
श्लोक 65 (2.90.65)
यो हि प्रश्नं न विब्रूयाद्धर्मदर्शी सभां गतः । अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते ॥
yo hi praśnaṃ na vibrūyāddharmadarśī sabhāṃ gataḥ | anṛte yā phalāvāptistasyāḥ so'rdhaṃ samaśnute
जो धर्मदर्शी सभा में जाकर प्रश्न का उत्तर नहीं देता, उसे असत्य बोलने के फल का आधा भाग मिलता है।
श्लोक 66 (2.90.66)
यः पुनर्वितथं ब्रूयाद्धर्मदर्शी सभां गतः । अनृतस्य फलं कृत्स्नं स प्राप्नोतीति निश्चयः ॥
yaḥ punarvitathaṃ brūyāddharmadarśī sabhāṃ gataḥ | anṛtasya phalaṃ kṛtsnaṃ sa prāpnotīti niścayaḥ
और जो धर्मदर्शी सभा में जाकर झूठा उत्तर देता है, उसे असत्य का पूरा फल मिलता है — यह निश्चित है।
श्लोक 67 (2.90.67)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prahlādasya ca saṃvādaṃ munerāṅgirasasya ca
इस विषय में प्रह्लाद और अंगिरा के पुत्र मुनि के संवाद का यह प्राचीन इतिहास उदाहरण के रूप में कहा जाता है।
श्लोक 68 (2.90.68)
प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः । कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् ॥
prahlādo nāma daityendrastasya putro virocanaḥ | kanyāhetorāṅgirasaṃ sudhanvānamupādravat
प्रह्लाद नाम के एक दैत्यराज थे; उनका पुत्र विरोचन था। एक कन्या के लिए विरोचन ने अंगिरा के पुत्र सुधन्वा को चुनौती दी।
श्लोक 69 (2.90.69)
अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा । तयोर्देवनमत्रासीत्प्राणयोरिति नः श्रुतम् ॥
ahaṃ jyāyānahaṃ jyāyāniti kanyepsayā tadā | tayordevanamatrāsītprāṇayoriti naḥ śrutam
कन्या पाने की इच्छा से दोनों कहने लगे — "मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ"; और हमने सुना है कि उन्होंने इस पर अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी।
श्लोक 70 (2.90.70)
तयोः प्रश्नविवादोऽभूत्प्रह्लादं तावपृच्छताम् । ज्यायान्क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृषा ॥
tayoḥ praśnavivādo'bhūtprahlādaṃ tāvapṛcchatām | jyāyānka āvayorekaḥ praśnaṃ prabrūhi mā mṛṣā
उनका विवाद एक प्रश्न बन गया और उन्होंने प्रह्लाद से पूछा — "हम दोनों में कौन श्रेष्ठ है? इस प्रश्न का उत्तर दीजिए, झूठ मत बोलिए।"
श्लोक 71 (2.90.71)
स वै विवदनाद्भीतः सुधन्वानं विलोकयन् । तं सुधन्वाब्रवीत्क्रुद्धो ब्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ॥
sa vai vivadanādbhītaḥ sudhanvānaṃ vilokayan | taṃ sudhanvābravītkruddho brahmadaṇḍa iva jvalan
विवाद से डरकर प्रह्लाद ने सुधन्वा की ओर देखा; तब ब्रह्मदण्ड के समान प्रज्वलित, क्रोधित सुधन्वा ने उनसे कहा —
सुधन्वोवाच
श्लोक 72 (2.90.72)
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि । शतधा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति ॥
yadi vai vakṣyasi mṛṣā prahlādātha na vakṣyasi | śatadhā te śiro vajrī vajreṇa prahariṣyati
प्रह्लाद! यदि तुम झूठ बोलोगे या कुछ नहीं बोलोगे, तो वज्रधारी इन्द्र अपने वज्र से तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े कर देंगे।
विदुर उवाच
श्लोक 73 (2.90.73)
सुधन्वना तथोक्तः सन्व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् । जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम् ॥
sudhanvanā tathoktaḥ sanvyathito'śvatthaparṇavat | jagāma kaśyapaṃ daityaḥ paripraṣṭuṃ mahaujasam
सुधन्वा के ऐसा कहने पर वह दैत्य पीपल के पत्ते की तरह काँप उठा और महातेजस्वी कश्यप से पूछने गया।
प्रह्लाद उवाच
श्लोक 74 (2.90.74)
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च । ब्राह्मणस्य महाभाग धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ॥
tvaṃ vai dharmasya vijñātā daivasyehāsurasya ca | brāhmaṇasya mahābhāga dharmakṛcchramidaṃ śṛṇu
हे महाभाग! आप देवताओं, असुरों और ब्राह्मणों के धर्म के ज्ञाता हैं। धर्म के इस संकट को सुनिए।
श्लोक 75 (2.90.75)
यो वै प्रश्नं न विब्रूयाद्वितथं चैव निर्दिशेत् । के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥
yo vai praśnaṃ na vibrūyādvitathaṃ caiva nirdiśet | ke vai tasya pare lokāstanmamācakṣva pṛcchataḥ
जो प्रश्न का उत्तर नहीं देता, या झूठा उत्तर देता है, उसे परलोक में कौन-से लोक मिलते हैं? मैं पूछ रहा हूँ, मुझे बताइए।
कश्यप उवाच
श्लोक 76 (2.90.76)
जानन्नविब्रुवन्प्रश्नान्कामात्क्रोधाद्भयात्तथा । सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥
jānannavibruvanpraśnānkāmātkrodhādbhayāttathā | sahasraṃ vāruṇānpāśānātmani pratimuñcati
जो जानते हुए भी काम, क्रोध या भय से प्रश्नों का उत्तर नहीं देता, वह अपने ऊपर वरुण के हज़ार पाश डाल लेता है।
श्लोक 77 (2.90.77)
साक्षी वा विब्रुवन्साक्ष्यं गोकर्णशिथिलश्चरन् । सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥
sākṣī vā vibruvansākṣyaṃ gokarṇaśithilaścaran | sahasraṃ vāruṇānpāśānātmani pratimuñcati
इसी प्रकार जो साक्षी गवाही देते समय गाय के कान की तरह कभी इधर कभी उधर डोलता है, वह भी अपने ऊपर वरुण के हज़ार पाश डाल लेता है।
श्लोक 78 (2.90.78)
तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते । तस्मात्सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमञ्जसा ॥
tasya saṃvatsare pūrṇe pāśa ekaḥ pramucyate | tasmātsatyaṃ tu vaktavyaṃ jānatā satyamañjasā
पूरा एक वर्ष बीतने पर उसका एक पाश खुलता है। इसलिए सत्य जानने वाले को सीधे-सीधे सत्य ही कहना चाहिए।
श्लोक 79 (2.90.79)
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते । न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥
viddho dharmo hyadharmeṇa sabhāṃ yatropapadyate | na cāsya śalyaṃ kṛntanti viddhāstatra sabhāsadaḥ
जहाँ अधर्म से बिंधा हुआ धर्म सभा में आता है और सभासद उसका काँटा नहीं निकालते, वहाँ वे सभासद स्वयं भी बिंध जाते हैं।
श्लोक 80 (2.90.80)
अर्धं हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृषु । पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम् ॥
ardhaṃ harati vai śreṣṭhaḥ pādo bhavati kartṛṣu | pādaścaiva sabhāsatsu ye na nindanti ninditam
आधा पाप प्रधान पुरुष पर पड़ता है, एक चौथाई करने वालों पर, और एक चौथाई उन सभासदों पर जो निंदनीय की निंदा नहीं करते।
श्लोक 81 (2.90.81)
अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः । एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥
anenā bhavati śreṣṭho mucyante ca sabhāsadaḥ | eno gacchati kartāraṃ nindārho yatra nindyate
किंतु जहाँ निंदा के योग्य व्यक्ति की निंदा की जाती है, वहाँ प्रधान पुरुष निष्पाप हो जाता है, सभासद मुक्त हो जाते हैं और पाप करने वाले को ही लगता है।
श्लोक 82 (2.90.82)
वितथं तु वदेयुर्ये धर्मं प्रह्लाद पृच्छते । इष्टापूर्तं च ते घ्नन्ति सप्तसप्त परावरान् ॥
vitathaṃ tu vadeyurye dharmaṃ prahlāda pṛcchate | iṣṭāpūrtaṃ ca te ghnanti saptasapta parāvarān
हे प्रह्लाद! जो लोग धर्म के विषय में पूछने वाले को झूठा उत्तर देते हैं, वे अपने यज्ञ और पुण्यकर्मों का फल नष्ट कर देते हैं, और अपने से पहले की सात तथा बाद की सात पीढ़ियों को भी।
श्लोक 83 (2.90.83)
हृतस्वस्य हि यद्दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत् । ऋणिनः प्रति यच्चैव स्वार्थाद्भ्रष्टस्य चैव यत् ॥
hṛtasvasya hi yadduḥkhaṃ hataputrasya caiva yat | ṛṇinaḥ prati yaccaiva svārthādbhraṣṭasya caiva yat
जिसका धन छिन गया हो उसका दुख, जिसका पुत्र मारा गया हो उसका दुख, ऋणी का दुख, और जो अपने अर्थ से वंचित हो गया हो उसका दुख;
श्लोक 84 (2.90.84)
स्त्रियाः पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत् । अपुत्रायाश्च यद्दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत् ॥
striyāḥ patyā vihīnāyā rājñā grastasya caiva yat | aputrāyāśca yadduḥkhaṃ vyāghrāghrātasya caiva yat
पति से वियुक्त स्त्री का दुख, राजा द्वारा पकड़े गए व्यक्ति का दुख, पुत्रहीन स्त्री का दुख और बाघ द्वारा सूँघे गए व्यक्ति का दुख;
श्लोक 85 (2.90.85)
अध्यूढायाश्च यद्दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत् । एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदिवेश्वराः ॥
adhyūḍhāyāśca yadduḥkhaṃ vyāghrāghrātasya caiva yat | etāni vai samānyāhurduḥkhāni tridiveśvarāḥ
जिस स्त्री के पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो उसका दुख, और बाघ द्वारा सूँघे गए व्यक्ति का दुख — स्वर्ग के स्वामी इन सब दुखों को समान बताते हैं।
श्लोक 86 (2.90.86)
तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन् । समक्षदर्शनात्साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात् ॥
tāni sarvāṇi duḥkhāni prāpnoti vitathaṃ bruvan | samakṣadarśanātsākṣī śravaṇācceti dhāraṇāt
झूठ बोलने वाले को ये सभी दुख प्राप्त होते हैं। अपनी आँखों से देखने, सुनने और स्मरण रखने से कोई साक्षी होता है।
श्लोक 87 (2.90.87)
तस्मात्सत्यं ब्रुवन्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥
tasmātsatyaṃ bruvansākṣī dharmārthābhyāṃ na hīyate
इसलिए सत्य बोलने वाला साक्षी न धर्म से वंचित होता है, न अर्थ से।
विदुर उवाच
श्लोक 88 (2.90.88)
कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमब्रवीत् ॥
kaśyapasya vacaḥ śrutvā prahlādaḥ putramabravīt
कश्यप के वचन सुनकर प्रह्लाद ने अपने पुत्र से कहा —
प्रह्लाद उवाच
श्लोक 89 (2.90.89)
श्रेयान्सुधन्वा त्वत्तो वै मत्तः श्रेयांस्तथाङ्गिराः । माता सुधन्वनश्चापि श्रेयसी मातृतस्तव । विरोचन सुधन्वाऽयं प्राणानामीश्वरस्तव ॥
śreyānsudhanvā tvatto vai mattaḥ śreyāṃstathāṅgirāḥ | mātā sudhanvanaścāpi śreyasī mātṛtastava | virocana sudhanvā'yaṃ prāṇānāmīśvarastava
सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, और अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं। सुधन्वा की माता भी तुम्हारी माता से श्रेष्ठ है। विरोचन! अब यह सुधन्वा तुम्हारे प्राणों का स्वामी है।
सुधन्वोवाच
श्लोक 90 (2.90.90)
पुत्रस्नेहं परित्यज्य यस्त्वं धर्मे व्यवस्थितः । अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेव शतं समाः ॥
putrasnehaṃ parityajya yastvaṃ dharme vyavasthitaḥ | anujānāmi te putraṃ jīvatveva śataṃ samāḥ
क्योंकि आपने पुत्र-स्नेह को त्यागकर धर्म का पालन किया है, मैं आपका पुत्र आपको लौटाता हूँ। वह सौ वर्ष तक जीवित रहे।
विदुर उवाच
श्लोक 91 (2.90.91)
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः । यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम् ॥
evaṃ vai paramaṃ dharmaṃ śrutvā sarve sabhāsadaḥ | yathāpraśnaṃ tu kṛṣṇāyā manyadhvaṃ tatra kiṃ param
आप सब सभासदों ने यह परम धर्म सुन लिया है; अब कृष्णा के प्रश्न के विषय में विचार कीजिए कि उसका उत्तर क्या है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 92 (2.90.92)
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किञ्चन पार्थिवाः । कर्णो दुःशासनं त्वाह कृष्णां दासीं गृहान्नय ॥
vidurasya vacaḥ śrutvā nocuḥ kiñcana pārthivāḥ | karṇo duḥśāsanaṃ tvāha kṛṣṇāṃ dāsīṃ gṛhānnaya
विदुर के वचन सुनकर राजाओं ने कुछ नहीं कहा। तब कर्ण ने दुःशासन से कहा — "इस दासी कृष्णा को घर ले जाओ।"
श्लोक 93 (2.90.93)
तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान् । दुःशासनः सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम् ॥
tāṃ vepamānāṃ savrīḍāṃ pralapantīṃ sma pāṇḍavān | duḥśāsanaḥ sabhāmadhye vicakarṣa tapasvinīm
तब दुःशासन भरी सभा में उस काँपती, लज्जित और पाण्डवों को पुकारती हुई दुखिया को घसीटने लगा।