सभा पर्व · अध्याय 89
द्रौपदी का सभा में घसीटकर लाया जाना
दुर्योधन विदुर को आदेश देता है कि द्रौपदी को दासी बनाकर लाओ; विदुर मना करते हैं और चेताते हैं कि जो राजा स्वयं को हार चुका था, उसके द्वारा दाँव पर लगाई गई द्रौपदी दासी नहीं हो सकती और यह जुआ कौरवों का नाश करेगा। उसकी जगह भेजा गया प्रातिकामी द्रौपदी का प्रश्न लेकर लौटता है कि युधिष्ठिर ने पहले स्वयं को हारा या उसे, और सभा मौन रह जाती है। तब दुःशासन उसे केशों से पकड़कर सभा में घसीट लाता है, जहाँ वह बड़ों को धिक्कारती है; भीष्म कहते हैं कि धर्म इतना सूक्ष्म है कि वे निर्णय नहीं कर सकते, द्रौपदी फिर अपना प्रश्न दोहराती है, और भीम का क्रोध बढ़ता जाता है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (2.89.1)
एहि क्षत्तर्द्रौपदीमानयस्व । प्रियां भार्यां संमतां पाण्डवानाम् । संमार्जतां वेश्म परैतु शीघ्रं । तत्रास्तु दासीभिरपुण्यशीला ॥
ehi kṣattardraupadīmānayasva | priyāṃ bhāryāṃ saṃmatāṃ pāṇḍavānām | saṃmārjatāṃ veśma paraitu śīghraṃ | tatrāstu dāsībhirapuṇyaśīlā
आओ क्षत्ता, पाण्डवों की प्रिय और सम्मानित पत्नी द्रौपदी को यहाँ ले आओ। वह घर में झाड़ू लगाए; शीघ्र वहाँ जाए, और वह पुण्यहीन आचरण वाली दासियों के बीच रहे।
विदुर उवाच
श्लोक 2 (2.89.2)
दुर्विभाषं भाषितं त्वादृशेन । न मन्द सम्बुद्ध्यसि पाशबद्धः । प्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि । व्याघ्रान्मृगः कोपयसेऽतिवेलम् ॥
durvibhāṣaṃ bhāṣitaṃ tvādṛśena | na manda sambuddhyasi pāśabaddhaḥ | prapāte tvaṃ lambamāno na vetsi | vyāghrānmṛgaḥ kopayase'tivelam
तुम जैसा व्यक्ति ही ऐसे दुर्वचन बोल सकता है। हे मूर्ख, तुम पाश में बँधे हो और समझते नहीं। तुम खाई के ऊपर लटके हो और यह नहीं जानते; तुम हिरन होकर सीमा से परे बाघों को क्रोधित कर रहे हो।
श्लोक 3 (2.89.3)
आशीविषास्ते शिरसि पूर्णकोपा महाविषाः । मा कोपिष्ठाः सुमन्दात्मन्मा गमस्त्वं यमक्षयम् ॥
āśīviṣāste śirasi pūrṇakopā mahāviṣāḥ | mā kopiṣṭhāḥ sumandātmanmā gamastvaṃ yamakṣayam
तुम्हारे सिर पर क्रोध से भरे, महाविषैले सर्प हैं। हे अत्यन्त मूढ़, उन्हें कुपित मत करो; यमलोक की ओर मत जाओ।
श्लोक 4 (2.89.4)
न हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवितुमर्हति । अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्तेति मे मतिः ॥
na hi dāsītvamāpannā kṛṣṇā bhavitumarhati | anīśena hi rājñaiṣā paṇe nyasteti me matiḥ
कृष्णा दासी नहीं बनी है, न वह दासी हो सकती है; क्योंकि राजा ने उसे तब दाँव पर लगाया जब वह स्वयं अपना स्वामी नहीं रह गया था। यही मेरा मत है।
श्लोक 5 (2.89.5)
अयं दत्ते वेणुरिवात्मघाती । फलं राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । द्यूतं हि वैराय महाभयाय । मत्तो न बुध्यत्ययमन्तकालम् ॥
ayaṃ datte veṇurivātmaghātī | phalaṃ rājā dhṛtarāṣṭrasya putraḥ | dyūtaṃ hi vairāya mahābhayāya | matto na budhyatyayamantakālam
धृतराष्ट्र का यह पुत्र राजा उस बाँस की भाँति फल दे रहा है जो फल देकर स्वयं नष्ट हो जाता है। यह जुआ वैर और महाभय की ओर ले जाता है; पर मद में चूर यह अपना अन्तकाल नहीं पहचानता।
श्लोक 6 (2.89.6)
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी । न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत । न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम् ॥
nāruntudaḥ syānna nṛśaṃsavādī | na hīnataḥ paramabhyādadīta | yayāsya vācā para udvijeta | na tāṃ vadedruśatīṃ pāpalokyām
किसी के मर्म को न छेदे, न कठोर बोले, न नीच उपायों से दूसरे का कुछ ले। जिस वाणी से दूसरा उद्विग्न हो, ऐसी जलाने वाली, पापलोक में ले जाने वाली वाणी न बोले।
श्लोक 7 (2.89.7)
समुच्चरन्त्यतिवादाश्च वक्त्रा- । द्यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति । तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥
samuccarantyativādāśca vaktrā- | dyairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya nāmarmasu te patanti | tānpaṇḍito nāvasṛjetpareṣu
मुख से कटु वचन निकलते हैं, जिनसे आहत मनुष्य रात-दिन शोक करता है। वे दूसरे के मर्मस्थलों पर ही चोट करते हैं; इसलिए बुद्धिमान दूसरों पर उन्हें कभी न छोड़े।
श्लोक 8 (2.89.8)
अजो हि शस्त्रमगिलत्किलैकः । शस्त्रे विपन्ने शिरसास्य भूमौ । निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं । तद्वद्वैरं मा कृथाः पाण्डुपुत्रैः ॥
ajo hi śastramagilatkilaikaḥ | śastre vipanne śirasāsya bhūmau | nikṛntanaṃ svasya kaṇṭhasya ghoraṃ | tadvadvairaṃ mā kṛthāḥ pāṇḍuputraiḥ
कहते हैं, एक बकरे ने छुरा निगल लिया था; छुरा अटक गया तो धरती पर सिर टिकाए उसने अपने ही गले को भयंकर रूप से काट डाला। उसी प्रकार तुम पाण्डुपुत्रों से वैर मत करो।
श्लोक 9 (2.89.9)
न किञ्चिदित्थं प्रवदन्ति पार्था । वनेचरं वा गृहमेधिनं वा । तपस्विनं वा परिपूर्णविद्यं । भषन्ति हैवं श्वनराः सदैव ॥
na kiñciditthaṃ pravadanti pārthā | vanecaraṃ vā gṛhamedhinaṃ vā | tapasvinaṃ vā paripūrṇavidyaṃ | bhaṣanti haivaṃ śvanarāḥ sadaiva
पृथा के पुत्र किसी से भी, चाहे वह वनवासी हो या गृहस्थ, तपस्वी हो या पूर्ण विद्वान, ऐसी बातें कभी नहीं कहते। इस प्रकार तो कुत्तों जैसे मनुष्य ही सदा भौंकते हैं।
श्लोक 10 (2.89.10)
द्वारं सुघोरं नरकस्य जिह्यं । न बुध्यते धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । तमन्वेतारो बहवः कुरूणां । द्यूतोदये सह दुःशासनेन ॥
dvāraṃ sughoraṃ narakasya jihyaṃ | na budhyate dhṛtarāṣṭrasya putraḥ | tamanvetāro bahavaḥ kurūṇāṃ | dyūtodaye saha duḥśāsanena
धृतराष्ट्र का पुत्र नरक का यह भयंकर, कुटिल द्वार नहीं देख पा रहा। जब यह जुआ अपना फल देगा, तब दुःशासन सहित बहुत-से कौरव उसके पीछे उसी द्वार से जाएँगे।
श्लोक 11 (2.89.11)
मज्जन्त्यलाबूनि शिलाः प्लवन्ते । मुह्यन्ति नावोम्भसि शश्वदेव । मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो । न मे वाचः पथ्यरूपाः शृणोति ॥
majjantyalābūni śilāḥ plavante | muhyanti nāvombhasi śaśvadeva | mūḍho rājā dhṛtarāṣṭrasya putro | na me vācaḥ pathyarūpāḥ śṛṇoti
तूँबियाँ डूब रही हैं और पत्थर तैर रहे हैं, नावें जल में सदा भटक रही हैं, क्योंकि धृतराष्ट्र का यह मूढ़ पुत्र राजा मेरे हितकर वचन नहीं सुनता।
श्लोक 12 (2.89.12)
अन्तो नूनं भवितायं कुरूणां । सुदारुणः सर्वहरो विनाशः । वाचः काव्याः सुहृदां पथ्यरूपा । न श्रूयन्ते वर्धते लोभ एव ॥
anto nūnaṃ bhavitāyaṃ kurūṇāṃ | sudāruṇaḥ sarvaharo vināśaḥ | vācaḥ kāvyāḥ suhṛdāṃ pathyarūpā | na śrūyante vardhate lobha eva
निश्चय ही यह कौरवों का अन्त होगा, सब कुछ हर लेने वाला अत्यन्त भयंकर विनाश। मित्रों के विवेकपूर्ण, हितकर वचन सुने नहीं जाते; केवल लोभ बढ़ता जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (2.89.13)
धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो । दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । अवैक्षत प्रातिकामीं सभाया- । मुवाच चैनं परमार्यमध्ये ॥
dhigastu kṣattāramiti bruvāṇo | darpeṇa matto dhṛtarāṣṭrasya putraḥ | avaikṣata prātikāmīṃ sabhāyā- | muvāca cainaṃ paramāryamadhye
"धिक्कार है क्षत्ता को!" यह कहते हुए अभिमान में मत्त धृतराष्ट्रपुत्र ने सभा में प्रातिकामी की ओर देखा और उन श्रेष्ठ पुरुषों के बीच उससे कहा—
दुर्योधन उवाच
श्लोक 14 (2.89.14)
त्वं प्रातिकामिन्द्रौपदीमानयस्व । न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः । क्षत्ता ह्ययं विवदत्येव भीतो । न चास्माकं वृद्धिकामः सदैव ॥
tvaṃ prātikāmindraupadīmānayasva | na te bhayaṃ vidyate pāṇḍavebhyaḥ | kṣattā hyayaṃ vivadatyeva bhīto | na cāsmākaṃ vṛddhikāmaḥ sadaiva
प्रातिकामी, तुम द्रौपदी को ले आओ। तुम्हें पाण्डवों से कोई भय नहीं है। यह क्षत्ता तो डरकर केवल विवाद करता है; यह कभी हमारी उन्नति नहीं चाहता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (2.89.15)
एवमुक्तः प्रातिकामी स सूतः । प्रायाच्छीघ्रं राजवचो निशम्य । प्रविश्य च श्वेव हि सिंहगोष्ठं । समासदन्महिषीं पाण्डवानाम् ॥
evamuktaḥ prātikāmī sa sūtaḥ | prāyācchīghraṃ rājavaco niśamya | praviśya ca śveva hi siṃhagoṣṭhaṃ | samāsadanmahiṣīṃ pāṇḍavānām
ऐसा कहे जाने पर वह सूत प्रातिकामी राजा की आज्ञा सुनकर तुरन्त चल पड़ा, और सिंह की माँद में घुसते कुत्ते की भाँति भीतर जाकर पाण्डवों की महारानी के पास पहुँचा।
प्रातिकाम्युवाच
श्लोक 16 (2.89.16)
युधिष्ठिरो द्यूतमदेन मत्तो । दुर्योधनो द्रौपदि त्वामजैषीत् । सा त्वं प्रपद्यस्व धृतराष्ट्रस्य वेश्म । नयामि त्वां कर्मणि याज्ञसेनि ॥
yudhiṣṭhiro dyūtamadena matto | duryodhano draupadi tvāmajaiṣīt | sā tvaṃ prapadyasva dhṛtarāṣṭrasya veśma | nayāmi tvāṃ karmaṇi yājñaseni
युधिष्ठिर जुए के मद में उन्मत्त हो गए, और दुर्योधन ने तुम्हें जीत लिया है, द्रौपदी। इसलिए तुम धृतराष्ट्र के भवन में चलो; याज्ञसेनी, मैं तुम्हें काम पर ले चलता हूँ।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 17 (2.89.17)
कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामिन् । को हि दीव्येद्भार्यया राजपुत्रः । मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तो । ह्यभून्नान्यत्कैतवमस्य किञ्चित् ॥
kathaṃ tvevaṃ vadasi prātikāmin | ko hi dīvyedbhāryayā rājaputraḥ | mūḍho rājā dyūtamadena matto | hyabhūnnānyatkaitavamasya kiñcit
प्रातिकामी, तुम ऐसा कैसे कह रहे हो? कौन राजकुमार अपनी पत्नी को दाँव पर लगाकर जुआ खेलेगा? राजा मूढ़ थे, जुए के मद में उन्मत्त थे; क्या उनके पास दाँव पर लगाने को और कुछ भी नहीं था?
प्रातिकाम्युवाच
श्लोक 18 (2.89.18)
यदा नाभूत्कैतवमन्यदस्य । तदाऽदेवीत्पाण्डवोऽजातशत्रुः । न्यस्ताः पूर्वं भ्रातरस्तेन राज्ञा । स्वयं चात्मा त्वमथो राजपुत्रि ॥
yadā nābhūtkaitavamanyadasya | tadā'devītpāṇḍavo'jātaśatruḥ | nyastāḥ pūrvaṃ bhrātarastena rājñā | svayaṃ cātmā tvamatho rājaputri
जब उनके पास दाँव पर लगाने को और कुछ नहीं बचा, तब अजातशत्रु पाण्डव ने खेलना जारी रखा। उस राजा ने पहले अपने भाइयों को दाँव पर लगाया, फिर स्वयं को, और फिर तुम्हें, राजकुमारी।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 19 (2.89.19)
गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभायां पृच्छ सूतज । किं तु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथवा नु माम् ॥
gaccha tvaṃ kitavaṃ gatvā sabhāyāṃ pṛccha sūtaja | kiṃ tu pūrvaṃ parājaiṣīrātmānamathavā nu mām
हे सूतपुत्र, जाओ, सभा में जाकर उस जुआरी से पूछो: तुमने पहले किसे हारा, स्वयं को या मुझे?
श्लोक 20 (2.89.20)
एतज्ज्ञात्वा समागच्छ ततो मां नय सूतज । ज्ञात्वा चिकीर्षितमहं राज्ञो यास्यामि दुःखिता ॥
etajjñātvā samāgaccha tato māṃ naya sūtaja | jñātvā cikīrṣitamahaṃ rājño yāsyāmi duḥkhitā
यह जानकर लौट आओ, सूतपुत्र, फिर मुझे ले चलना। राजा क्या करना चाहते हैं, यह जान लूँ, तब दुःखी होते हुए भी मैं चलूँगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (2.89.21)
सभां गत्वा स चोवाच द्रौपद्यास्तद्वचस्तदा । युधिष्ठिरं नरेन्द्राणां मध्ये स्थितमिदं वचः ॥
sabhāṃ gatvā sa covāca draupadyāstadvacastadā | yudhiṣṭhiraṃ narendrāṇāṃ madhye sthitamidaṃ vacaḥ
उसने सभा में जाकर द्रौपदी के वे वचन कह सुनाए; राजाओं के बीच बैठे युधिष्ठिर से उसने यह कहा—
प्रातिकाम्युवाच
श्लोक 22 (2.89.22)
कस्येशो नः पराजैषीरिति त्वामाह द्रौपदी । किं नु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथवापि माम् ॥
kasyeśo naḥ parājaiṣīriti tvāmāha draupadī | kiṃ nu pūrvaṃ parājaiṣīrātmānamathavāpi mām
द्रौपदी आपसे पूछती हैं: "आप किसके स्वामी रहते हुए हमें हारे? आपने पहले किसे हारा, स्वयं को या मुझे?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (2.89.23)
युधिष्ठिरस्तु निश्चेता गतसत्व इवाभवत् । न तं सूतं प्रत्युवाच वचनं साध्वसाधु वा ॥
yudhiṣṭhirastu niścetā gatasatva ivābhavat | na taṃ sūtaṃ pratyuvāca vacanaṃ sādhvasādhu vā
पर युधिष्ठिर मानो चेतनाहीन, प्राणहीन-से हो गए। उन्होंने उस सूत को भला-बुरा कोई उत्तर नहीं दिया।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 24 (2.89.24)
इहैवागत्य पाञ्चाली प्रश्नमेनं प्रभाषताम् । इहैव सर्वे शृण्वन्तु तस्याश्चैतस्य यद्वचः ॥
ihaivāgatya pāñcālī praśnamenaṃ prabhāṣatām | ihaiva sarve śṛṇvantu tasyāścaitasya yadvacaḥ
पाञ्चाली यहीं आकर यह प्रश्न करे। वह जो कहे और यह जो उत्तर दे, उसे सब यहीं सुनें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (2.89.25)
स गत्वा राजभवनं दुर्योधनवशानुगः । उवाच द्रौपदीं सूतः प्रातिकामी व्यथन्निव ॥
sa gatvā rājabhavanaṃ duryodhanavaśānugaḥ | uvāca draupadīṃ sūtaḥ prātikāmī vyathanniva
दुर्योधन के वश में चलने वाला सूत प्रातिकामी राजभवन में गया और मानो व्यथित होकर द्रौपदी से बोला—
प्रातिकाम्युवाच
श्लोक 26 (2.89.26)
सभ्यास्त्वमी राजपुत्र्याह्वयन्ति । मन्ये प्राप्तः संशयः कौरवाणाम् । न वै समृद्धिं पालयते लघीयान् । यस्त्वां सभां नेष्यति राजपुत्रि ॥
sabhyāstvamī rājaputryāhvayanti | manye prāptaḥ saṃśayaḥ kauravāṇām | na vai samṛddhiṃ pālayate laghīyān | yastvāṃ sabhāṃ neṣyati rājaputri
राजकुमारी, ये सभासद तुम्हें बुला रहे हैं। मुझे लगता है कौरवों पर संकट आ पहुँचा है। राजकुमारी, जो ओछा व्यक्ति तुम्हें सभा में ले जाएगा, उसे अपनी समृद्धि की रक्षा की कोई चिन्ता नहीं।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 27 (2.89.27)
एवं नूनं व्यदधात्संविधाता । स्पर्शावुभौ स्पृशतो वृद्धबालौ । धर्मं त्वेकं परमं प्राह लोके । स नः शमं धास्यति गोप्यमानः ॥
evaṃ nūnaṃ vyadadhātsaṃvidhātā | sparśāvubhau spṛśato vṛddhabālau | dharmaṃ tvekaṃ paramaṃ prāha loke | sa naḥ śamaṃ dhāsyati gopyamānaḥ
निश्चय ही विधाता ने ऐसा ही विधान किया है। सुख और दुःख, दोनों ही बूढ़ों और बालकों को समान रूप से छूते हैं। पर उसने संसार में एक धर्म को ही परम बताया है; यदि हम उसकी रक्षा करें तो वह हमें शान्ति देगा।
श्लोक 28 (2.89.28)
सोऽयं धर्मो मा त्यगात्कौरवान्वै । सभ्यान्गत्वा पृच्छ धर्म्यं वचो मे । ते मां ब्रूयुर्निश्चितं तत्करिष्ये । धर्मात्मानो नीतिमन्तो वरिष्ठाः ॥
so'yaṃ dharmo mā tyagātkauravānvai | sabhyāngatvā pṛccha dharmyaṃ vaco me | te māṃ brūyurniścitaṃ tatkariṣye | dharmātmāno nītimanto variṣṭhāḥ
यह धर्म कौरवों को न छोड़े। सभासदों के पास जाकर उनसे मेरा यह धर्मसंगत प्रश्न पूछो। वे धर्मात्मा, नीतिज्ञ और श्रेष्ठ जन मुझसे निश्चित रूप से जो कहें, मैं वही करूँगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (2.89.29)
श्रुत्वा सूतस्तद्वचो याज्ञसेन्याः । सभां गत्वा प्राह वाक्यं तदानीम् । अधोमुखास्ते न च किञ्चिदूचु- । र्निर्बन्धं तं धार्तराष्ट्रस्य बुद्ध्वा ॥
śrutvā sūtastadvaco yājñasenyāḥ | sabhāṃ gatvā prāha vākyaṃ tadānīm | adhomukhāste na ca kiñcidūcu- | rnirbandhaṃ taṃ dhārtarāṣṭrasya buddhvā
याज्ञसेनी की बात सुनकर सूत ने सभा में जाकर वही वचन कहे। धृतराष्ट्रपुत्र का हठ जानकर वे सब सिर झुकाए बैठे रहे और कुछ न बोले।
श्लोक 30 (2.89.30)
युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा दुर्योधनचिकीर्षितम् । द्रौपद्याः संमतं दूतं प्राहिणोद्भरतर्षभ ॥
yudhiṣṭhirastu tacchrutvā duryodhanacikīrṣitam | draupadyāḥ saṃmataṃ dūtaṃ prāhiṇodbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, दुर्योधन का अभिप्राय सुनकर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के विश्वासपात्र एक दूत को यह सन्देश देकर भेजा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 31 (2.89.31)
एकवस्त्रा त्वधोनीवी रोदमाना रजस्वला । सभामागम्य पाञ्चालि श्वशुरस्याग्रतो भव ॥
ekavastrā tvadhonīvī rodamānā rajasvalā | sabhāmāgamya pāñcāli śvaśurasyāgrato bhava
पाञ्चाली, जैसी हो वैसी ही, एक वस्त्र में, नीवी नीचे बाँधे, रजस्वला अवस्था में रोती हुई सभा में आओ और अपने ससुर के सामने खड़ी हो जाओ।
श्लोक 32 (2.89.32)
अथ त्वामागतां दृष्ट्वा राजपुत्रीं सभां तदा । सभ्याः सर्वे विनिन्देरन्मनोभिर्धृतराष्ट्रजम् ॥
atha tvāmāgatāṃ dṛṣṭvā rājaputrīṃ sabhāṃ tadā | sabhyāḥ sarve vininderanmanobhirdhṛtarāṣṭrajam
तब तुम्हें, एक राजकुमारी को, सभा में आई देखकर सब सभासद मन ही मन धृतराष्ट्रपुत्र की निन्दा करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (2.89.33)
स गत्वा त्वरितं दूतः कृष्णाया भवनं नृप । न्यवेदयन्मतं धीमान्धर्मराजस्य निश्चितम् ॥
sa gatvā tvaritaṃ dūtaḥ kṛṣṇāyā bhavanaṃ nṛpa | nyavedayanmataṃ dhīmāndharmarājasya niścitam
हे राजन्, वह बुद्धिमान दूत शीघ्र कृष्णा के भवन में गया और उसे धर्मराज का निश्चित मत बता दिया।
श्लोक 34 (2.89.34)
पाण्डवाश्च महात्मानो दीना दुःखसमन्विताः । सत्येनातिपरीताङ्गा नोदीक्षन्ते स्म किञ्चन ॥
pāṇḍavāśca mahātmāno dīnā duḥkhasamanvitāḥ | satyenātiparītāṅgā nodīkṣante sma kiñcana
और महात्मा पाण्डव दीन और दुःख में डूबे थे; सत्य से बँधे अंगों वाले वे किसी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख पा रहे थे।
श्लोक 35 (2.89.35)
ततस्त्वेषां मुखमालोक्य राजा । दुर्योधनः सूतमुवाच हृष्टः । इहैवैतामानय प्रातिकामिन् । प्रत्यक्षमस्याः कुरवो ब्रुवन्तु ॥
tatastveṣāṃ mukhamālokya rājā | duryodhanaḥ sūtamuvāca hṛṣṭaḥ | ihaivaitāmānaya prātikāmin | pratyakṣamasyāḥ kuravo bruvantu
तब राजा दुर्योधन ने उनके मुख देखकर हर्षित होकर सूत से कहा: "प्रातिकामी, उसे यहीं ले आओ; कौरव उसके सामने ही बोलें।"
श्लोक 36 (2.89.36)
ततः सूतस्तस्य वशानुगामी । भीतश्च कोपाद्द्रुपदात्मजायाः । विहाय मानं पुनरेव सभ्या- । नुवाच कृष्णां किमहं ब्रवीमि ॥
tataḥ sūtastasya vaśānugāmī | bhītaśca kopāddrupadātmajāyāḥ | vihāya mānaṃ punareva sabhyā- | nuvāca kṛṣṇāṃ kimahaṃ bravīmi
तब उसके वश में चलने वाले उस सूत ने, जो द्रुपदकुमारी के क्रोध से भी डरता था, अपना मान छोड़कर फिर सभासदों से पूछा: "मैं कृष्णा से क्या कहूँ?"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 37 (2.89.37)
दुःशासनैष मम सूतपुत्रो । वृकोदरादुद्विजतेऽल्पचेताः । स्वयं प्रगृह्यानय याज्ञसेनीं । किं ते करिष्यन्त्यवशाः सपत्नाः ॥
duḥśāsanaiṣa mama sūtaputro | vṛkodarādudvijate'lpacetāḥ | svayaṃ pragṛhyānaya yājñasenīṃ | kiṃ te kariṣyantyavaśāḥ sapatnāḥ
दुःशासन, मेरा यह सूतपुत्र अल्पबुद्धि है और वृकोदर से डरता है। तुम स्वयं जाकर याज्ञसेनी को पकड़ लाओ। हमारे ये विवश शत्रु तुम्हारा क्या कर लेंगे?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (2.89.38)
ततः समुत्थाय स राजपुत्रः । श्रुत्वा भ्रातुः शासनं रक्तदृष्टिः । प्रविश्य तद्वेश्म महारथाना- । मित्यब्रवीद्द्रौपदीं राजपुत्रीम् ॥
tataḥ samutthāya sa rājaputraḥ | śrutvā bhrātuḥ śāsanaṃ raktadṛṣṭiḥ | praviśya tadveśma mahārathānā- | mityabravīddraupadīṃ rājaputrīm
तब भाई की आज्ञा सुनकर वह राजकुमार लाल आँखें किए उठा, और उन महारथियों के भवन में प्रवेश करके राजकुमारी द्रौपदी से बोला—
दुःशासन उवाच
श्लोक 39 (2.89.39)
एह्येहि पाञ्चालि राजपुत्रि । दुर्योधनं पश्य विमुक्तलज्जा । कुरून्भजस्वायतपत्रनेत्रे । धर्मेण लब्धाऽसि सभां परैहि ॥
ehyehi pāñcāli rājaputri | duryodhanaṃ paśya vimuktalajjā | kurūnbhajasvāyatapatranetre | dharmeṇa labdhā'si sabhāṃ paraihi
आओ, आओ, पाञ्चाली राजकुमारी! लाज छोड़कर दुर्योधन की ओर देखो। हे कमल-दल जैसे विशाल नेत्रों वाली, कौरवों की सेवा करो; तुम धर्मपूर्वक जीती गई हो। सभा में चलो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (2.89.40)
ततः समुत्थाय सुदुर्मनाः सा । विवर्णमामृज्य मुखं करेण । आर्ता प्रदुद्राव यतः स्त्रियस्ता । वृद्धस्य राज्ञः कुरुपुङ्गवस्य ॥
tataḥ samutthāya sudurmanāḥ sā | vivarṇamāmṛjya mukhaṃ kareṇa | ārtā pradudrāva yataḥ striyastā | vṛddhasya rājñaḥ kurupuṅgavasya
तब वह अत्यन्त दुःखी होकर उठी, अपने विवर्ण मुख को हाथ से पोंछा और व्याकुल होकर उस ओर दौड़ी जहाँ कुरुश्रेष्ठ वृद्ध राजा की स्त्रियाँ थीं।
श्लोक 41 (2.89.41)
ततो जवेनाभिससार रोषा- । द्दुःशासनस्तामभिगर्जमानः । दीर्घेषु नीलेष्वथ चोर्मिमत्सु । जग्राह केशेषु नरेन्द्रपत्नीम् ॥
tato javenābhisasāra roṣā- | dduḥśāsanastāmabhigarjamānaḥ | dīrgheṣu nīleṣvatha cormimatsu | jagrāha keśeṣu narendrapatnīm
तब क्रोध में गरजता हुआ दुःशासन वेग से उसके पीछे दौड़ा और उसने उस राजपत्नी को उसके लम्बे, काले, लहराते केशों से पकड़ लिया।
श्लोक 42 (2.89.42)
ये राजसूयावभृथे जलेन । महाक्रतौ मन्त्रपूतेन सिक्ताः । ते पाण्डवानां परिभूय वीर्यं । बलात्प्रमृष्टा धृतराष्ट्रजेन ॥
ye rājasūyāvabhṛthe jalena | mahākratau mantrapūtena siktāḥ | te pāṇḍavānāṃ paribhūya vīryaṃ | balātpramṛṣṭā dhṛtarāṣṭrajena
जो केश महायज्ञ राजसूय के अवभृथ-स्नान में मन्त्रों से पवित्र जल से सींचे गए थे, उन्हीं को धृतराष्ट्रपुत्र ने पाण्डवों के पराक्रम का तिरस्कार करते हुए बलपूर्वक पकड़ लिया।
श्लोक 43 (2.89.43)
स तां पराकृष्य सभासमीप- । मानीय कृष्णामतिदीर्घकेशीम् । दुःशासनो नाथवतीमनाथव- । च्चकर्ष वायुः कदलीमिवार्ताम् ॥
sa tāṃ parākṛṣya sabhāsamīpa- | mānīya kṛṣṇāmatidīrghakeśīm | duḥśāsano nāthavatīmanāthava- | ccakarṣa vāyuḥ kadalīmivārtām
अत्यन्त लम्बे केशों वाली कृष्णा को खींचते हुए दुःशासन सभा के समीप ले आया। रक्षकों के होते हुए भी उसने उसे अनाथ की भाँति ऐसे घसीटा, जैसे आँधी किसी पीड़ित कदली को झकझोरती है।
श्लोक 44 (2.89.44)
सा कृष्यमाणा नमिताङ्गयष्टिः । शनैरुवाचाथ रजस्वलाऽस्मि । एकं च वासो मम मन्दबुद्धे । सभां नेतुं नार्हसि मामनार्य ॥
sā kṛṣyamāṇā namitāṅgayaṣṭiḥ | śanairuvācātha rajasvalā'smi | ekaṃ ca vāso mama mandabuddhe | sabhāṃ netuṃ nārhasi māmanārya
घसीटी जाती हुई, झुकी हुई कोमल देह वाली द्रौपदी ने धीरे से कहा: "मैं रजस्वला हूँ और मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र है, हे मूर्ख। हे अनार्य, तुम मुझे सभा में नहीं ले जा सकते।"
श्लोक 45 (2.89.45)
ततोऽब्रवीत्तां प्रसभं निगृह्य । केशेषु कृष्णेषु तदा स कृष्णाम् । कृष्णं च जिष्णुं च हरिं नरं च । त्राणाय विक्रोशसि याज्ञसेनि ॥
tato'bravīttāṃ prasabhaṃ nigṛhya | keśeṣu kṛṣṇeṣu tadā sa kṛṣṇām | kṛṣṇaṃ ca jiṣṇuṃ ca hariṃ naraṃ ca | trāṇāya vikrośasi yājñaseni
तब उसने कृष्णा को उसके काले केशों से बलपूर्वक पकड़कर कहा: "याज्ञसेनी, तुम रक्षा के लिए कृष्ण और जिष्णु को, हरि और नर को जितना चाहो पुकारो!"
दुःशासन उवाच
श्लोक 46 (2.89.46)
रजस्वला वा भव याज्ञसेनि । एकाम्बरा वाप्यथवा विवस्त्रा । द्यूते जिता चासि कृताऽसि दासी । दासीषु वासश्च यथोपजोषम् ॥
rajasvalā vā bhava yājñaseni | ekāmbarā vāpyathavā vivastrā | dyūte jitā cāsi kṛtā'si dāsī | dāsīṣu vāsaśca yathopajoṣam
याज्ञसेनी, तुम रजस्वला हो, एकवस्त्रा हो, या निर्वस्त्र ही क्यों न हो; तुम जुए में जीती गई हो और दासी बना दी गई हो, अब हमारी इच्छा के अनुसार दासियों के बीच ही तुम्हारा स्थान है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (2.89.47)
प्रकीर्णकेशी पतितार्धवस्त्रा । दुःशासनेन व्यवधूयमाना । ह्रीमत्यमर्षेण च दह्यमाना । शनैरिदं वाक्यमुवाच कृष्णा ॥
prakīrṇakeśī patitārdhavastrā | duḥśāsanena vyavadhūyamānā | hrīmatyamarṣeṇa ca dahyamānā | śanairidaṃ vākyamuvāca kṛṣṇā
बिखरे केश, आधा वस्त्र खिसका हुआ, दुःशासन द्वारा झकझोरी जाती हुई लज्जाशील कृष्णा ने अमर्ष से जलते हुए धीरे से यह वचन कहा—
द्रौपद्युवाच
श्लोक 48 (2.89.48)
इमे सभायामुपनीतशास्त्राः । क्रियावन्तः सर्व एवेन्द्रकल्पाः । गुरुस्थाना गुरवश्चैव सर्वे । तेषामग्रे नोत्सहे स्थातुमेवम् ॥
ime sabhāyāmupanītaśāstrāḥ | kriyāvantaḥ sarva evendrakalpāḥ | gurusthānā guravaścaiva sarve | teṣāmagre notsahe sthātumevam
इस सभा में शास्त्रों में दीक्षित, कर्मनिष्ठ, सब के सब इन्द्र के समान पुरुष बैठे हैं; ये सब मेरे गुरुजन हैं या गुरु के समान हैं। उनके सामने मैं इस दशा में खड़ी नहीं रह सकती।
श्लोक 49 (2.89.49)
नृशंसकर्मंस्त्वमनार्यवृत्त । मा मां विवस्त्रां कुरु मा विकार्षीः । न मर्षयेयुस्तव राजपुत्राः । सेन्द्रापि देवा यदि ते सहायाः ॥
nṛśaṃsakarmaṃstvamanāryavṛtta | mā māṃ vivastrāṃ kuru mā vikārṣīḥ | na marṣayeyustava rājaputrāḥ | sendrāpi devā yadi te sahāyāḥ
हे क्रूरकर्मा, हे अनार्य आचरण वाले, मुझे निर्वस्त्र मत करो, मुझे मत घसीटो। इन्द्र सहित देवता भी तुम्हारे सहायक हों, तब भी ये राजपुत्र तुम्हें क्षमा नहीं करेंगे।
श्लोक 50 (2.89.50)
धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा । धर्मश्च सूक्ष्मो निपुणोपलक्ष्यः । वाचापि भर्तुः परमाणुमात्र- । मिच्छामि दोषं न गुणान्विसृज्य ॥
dharme sthito dharmasuto mahātmā | dharmaśca sūkṣmo nipuṇopalakṣyaḥ | vācāpi bhartuḥ paramāṇumātra- | micchāmi doṣaṃ na guṇānvisṛjya
धर्मपुत्र महात्मा धर्म में स्थित हैं, और धर्म सूक्ष्म है, जिसे निपुण लोग ही देख पाते हैं। उनके गुणों को छोड़कर मैं वाणी से भी अपने पति में परमाणु भर दोष नहीं देखना चाहती।
श्लोक 51 (2.89.51)
इदं त्वकार्यं कुरुवीरमध्ये । रजस्वलां यत्परिकर्षसे माम् । न चापि कश्चित्कुरुतेऽत्र कुत्सां । ध्रुवं तवेदं मतमभ्युपेतः ॥
idaṃ tvakāryaṃ kuruvīramadhye | rajasvalāṃ yatparikarṣase mām | na cāpi kaścitkurute'tra kutsāṃ | dhruvaṃ tavedaṃ matamabhyupetaḥ
पर यह अनुचित कर्म है कि कुरुवीरों के बीच तुम मुझ रजस्वला को घसीट रहे हो। और यहाँ कोई इसकी निन्दा भी नहीं करता; निश्चय ही सबने तुम्हारा यह मत अपना लिया है।
श्लोक 52 (2.89.52)
धिगस्तु नष्टः खलु भारतानां । धर्मस्तथा क्षत्रविदां च वृत्तम् । यत्र ह्यतीतां कुरुधर्मवेलां । प्रेक्षन्ति सर्वे कुरवः सभायाम् ॥
dhigastu naṣṭaḥ khalu bhāratānāṃ | dharmastathā kṣatravidāṃ ca vṛttam | yatra hyatītāṃ kurudharmavelāṃ | prekṣanti sarve kuravaḥ sabhāyām
धिक्कार है! भरतवंशियों का धर्म और क्षत्रधर्म जानने वालों का आचरण भी सचमुच नष्ट हो गया, जब सभा में सब कौरव कुरुधर्म की मर्यादा का उल्लंघन होते देख रहे हैं।
श्लोक 53 (2.89.53)
द्रोणस्य भीष्मस्य च नास्ति सत्त्वं । क्षत्तुस्तथैवास्य महात्मनोपि । राज्ञस्तथा हीममधर्ममुग्रं । न लक्षयन्ति कुरुवृद्धमुख्याः ॥
droṇasya bhīṣmasya ca nāsti sattvaṃ | kṣattustathaivāsya mahātmanopi | rājñastathā hīmamadharmamugraṃ | na lakṣayanti kuruvṛddhamukhyāḥ
द्रोण और भीष्म में कोई सत्त्व नहीं रह गया, न इन महात्मा क्षत्ता में, और न राजा में ही; तभी तो कुरुवंश के मुख्य वृद्ध इस घोर अधर्म पर ध्यान नहीं दे रहे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (2.89.54)
तथा ब्रुवन्ती करुणं सुमध्यमा । भर्तॄन्कटाक्षैः कुपितानपश्यत् । सा पाण्डवान्कोपपरीतदेहा- । न्सन्दीपयामास कटाक्षपातैः ॥
tathā bruvantī karuṇaṃ sumadhyamā | bhartṝnkaṭākṣaiḥ kupitānapaśyat | sā pāṇḍavānkopaparītadehā- | nsandīpayāmāsa kaṭākṣapātaiḥ
इस प्रकार करुण वचन कहती हुई उस सुन्दर कटि वाली ने अपने कुपित पतियों की ओर कटाक्ष से देखा, और उन कटाक्षों से क्रोध से व्याप्त शरीर वाले पाण्डवों को और भी प्रज्वलित कर दिया।
श्लोक 55 (2.89.55)
हृतेन राज्येन तथा धनेन । रत्नैश्च मुख्यैर्न तथा बभूव । यथा त्रपाकोपसमीरितेन । कृष्णाकटाक्षेण बभूव दुःखम् ॥
hṛtena rājyena tathā dhanena | ratnaiśca mukhyairna tathā babhūva | yathā trapākopasamīritena | kṛṣṇākaṭākṣeṇa babhūva duḥkham
राज्य, धन और श्रेष्ठ रत्नों के छिन जाने से उन्हें उतना दुःख नहीं हुआ, जितना लज्जा और क्रोध से प्रेरित कृष्णा के कटाक्ष से हुआ।
श्लोक 56 (2.89.56)
दुःशासनश्चापि समीक्ष्य कृष्णा- । मवेक्षमाणां कृपणान्पतींस्तान् । आधूय वेगेन विसञ्ज्ञकल्पा- । मुवाच दासीति हसन्सशब्दम् ॥
duḥśāsanaścāpi samīkṣya kṛṣṇā- | mavekṣamāṇāṃ kṛpaṇānpatīṃstān | ādhūya vegena visañjñakalpā- | muvāca dāsīti hasansaśabdam
दुःशासन ने भी कृष्णा को अपने दीन पतियों की ओर देखते पाकर उसे इतने वेग से झकझोरा कि वह अचेत-सी हो गई, और ठहाका लगाकर उसे "दासी!" कहा।
श्लोक 57 (2.89.57)
कर्णस्तु तद्वाक्यमतीव हृष्टः । सम्पूजयामास हसन्सशब्दम् । गान्धारराजः सुबलस्य पुत्र- । स्तथैव दुःशासनमभ्यनन्दत् ॥
karṇastu tadvākyamatīva hṛṣṭaḥ | sampūjayāmāsa hasansaśabdam | gāndhārarājaḥ subalasya putra- | stathaiva duḥśāsanamabhyanandat
कर्ण ने अत्यन्त प्रसन्न होकर ठहाका लगाते हुए उस वचन की सराहना की, और गान्धारराज सुबलपुत्र ने भी उसी प्रकार दुःशासन का अभिनन्दन किया।
श्लोक 58 (2.89.58)
सभ्यास्तु ये तत्र बभूवुरन्ये । ताभ्यामृते धार्तराष्ट्रेण चैव । तेषामभूद्दुःखमतीव कृष्णां । दृष्ट्वा सभायां परिकृष्यमाणाम् ॥
sabhyāstu ye tatra babhūvuranye | tābhyāmṛte dhārtarāṣṭreṇa caiva | teṣāmabhūdduḥkhamatīva kṛṣṇāṃ | dṛṣṭvā sabhāyāṃ parikṛṣyamāṇām
किन्तु उन दोनों और धृतराष्ट्रपुत्र को छोड़कर सभा में जो अन्य सभासद थे, उन्हें कृष्णा को सभा में घसीटी जाती देखकर अत्यन्त दुःख हुआ।
भीष्म उवाच
श्लोक 59 (2.89.59)
न धर्मसौक्ष्म्यात्सुभगे विवेक्तुं । शक्नोमि ते प्रश्नमिमं यथावत् । अस्वाम्यशक्तः पणितुं परस्वं । स्त्रियाश्च भर्तुर्वशतां समीक्ष्य ॥
na dharmasaukṣmyātsubhage vivektuṃ | śaknomi te praśnamimaṃ yathāvat | asvāmyaśaktaḥ paṇituṃ parasvaṃ | striyāśca bharturvaśatāṃ samīkṣya
हे सौभाग्यवती, धर्म की सूक्ष्मता के कारण मैं तुम्हारे इस प्रश्न का ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पा रहा। जो स्वामी नहीं, वह पराया धन दाँव पर नहीं लगा सकता; पर यह भी देखना होगा कि पत्नी पति के अधीन होती है।
श्लोक 60 (2.89.60)
त्यजेत सर्वां पृथिवीं समृद्धां । युधिष्ठिरो धर्ममथो न जह्यात् । उक्तं जितोऽस्मीति च पाण्डवेन । तस्मान्न शक्नोमि विवेक्तुमेतत् ॥
tyajeta sarvāṃ pṛthivīṃ samṛddhāṃ | yudhiṣṭhiro dharmamatho na jahyāt | uktaṃ jito'smīti ca pāṇḍavena | tasmānna śaknomi vivektumetat
युधिष्ठिर समृद्ध सारी पृथ्वी छोड़ सकते हैं, पर धर्म नहीं छोड़ेंगे। और स्वयं पाण्डुपुत्र ने कहा है, "मैं हार गया।" इसलिए मैं इसका निर्णय नहीं कर सकता।
श्लोक 61 (2.89.61)
द्यूतेऽद्वितीयः शकुनिर्नरेषु । कुन्तीसुतस्तेन निसृष्टकामः । न मन्यते तां निकृतिं युधिष्ठिर- । स्तस्मान्न ते प्रश्नमिमं ब्रवीमि ॥
dyūte'dvitīyaḥ śakunirnareṣu | kuntīsutastena nisṛṣṭakāmaḥ | na manyate tāṃ nikṛtiṃ yudhiṣṭhira- | stasmānna te praśnamimaṃ bravīmi
जुए में मनुष्यों में शकुनि का कोई जोड़ नहीं, और कुन्तीपुत्र ने स्वेच्छा से उसके साथ खेला। युधिष्ठिर उसे छल नहीं मानते; इसलिए मैं तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 62 (2.89.62)
आहूय राजा कुशलैरनार्यै- । र्दुष्टात्मभिर्नैकृतिकैः सभायाम् । द्यूतप्रियैर्नातिकृतप्रयत्नः । कस्मादयं नाम निसृष्टकामः ॥
āhūya rājā kuśalairanāryai- | rduṣṭātmabhirnaikṛtikaiḥ sabhāyām | dyūtapriyairnātikṛtaprayatnaḥ | kasmādayaṃ nāma nisṛṣṭakāmaḥ
राजा को जुए के प्रेमी, चतुर, अनार्य, दुष्टात्मा और कपटी लोगों ने सभा में बुलाया था, और उन्हें स्वयं इसका कोई विशेष अभ्यास भी नहीं था। फिर उन्हें स्वेच्छा से खेलने वाला कैसे कहा जाए?
श्लोक 63 (2.89.63)
अशुद्धभावैर्निकृतिप्रवृत्तै- । रबुध्यमानः कुरुपाण्डवाग्र्यः । सम्भूय सर्वैश्च जितोऽपि यस्मा- । त्पश्चादयं कैतवमभ्युपेतः ॥
aśuddhabhāvairnikṛtipravṛttai- | rabudhyamānaḥ kurupāṇḍavāgryaḥ | sambhūya sarvaiśca jito'pi yasmā- | tpaścādayaṃ kaitavamabhyupetaḥ
कुरुओं और पाण्डवों में अग्रणी ये राजा उन अशुद्ध भाव वाले, छल में लगे लोगों को पहचान न सके। सबने मिलकर उन्हें हराया, और उसके बाद ही उन्होंने यह दाँव स्वीकार किया।
श्लोक 64 (2.89.64)
तिष्ठन्ति चेमे कुरवः सभाया- । मीशाः सुतानां च तथा स्नुषाणाम् । समीक्ष्य सर्वे मम चापि वाक्यं । विब्रूत मे प्रश्नमिमं यथावत् ॥
tiṣṭhanti ceme kuravaḥ sabhāyā- | mīśāḥ sutānāṃ ca tathā snuṣāṇām | samīkṣya sarve mama cāpi vākyaṃ | vibrūta me praśnamimaṃ yathāvat
ये कौरव सभा में उपस्थित हैं, जो पुत्रों और पुत्रवधुओं के भी स्वामी हैं। आप सब मेरी बात पर विचार करके मेरे इस प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर दें।
श्लोक 65 (2.89.65)
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा । न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् । नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति । न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ॥
na sā sabhā yatra na santi vṛddhā | na te vṛddhā ye na vadanti dharmam | nāsau dharmo yatra na satyamasti | na tatsatyaṃ yacchalenānuviddham
वह सभा नहीं जहाँ वृद्ध न हों; वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें; वह धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो; और वह सत्य नहीं जो छल से बिंधा हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 66 (2.89.66)
तथा ब्रुवन्तीं करुणं रुदन्ती- । मवेक्षमाणां कृपणान्पतींस्तान् । दुःशासनः परुषाण्यप्रियाणि । वाक्यान्युवाचामधुराणि चैव ॥
tathā bruvantīṃ karuṇaṃ rudantī- | mavekṣamāṇāṃ kṛpaṇānpatīṃstān | duḥśāsanaḥ paruṣāṇyapriyāṇi | vākyānyuvācāmadhurāṇi caiva
इस प्रकार करुण स्वर में बोलती, रोती और अपने दीन पतियों की ओर देखती द्रौपदी से दुःशासन ने कठोर, अप्रिय और कड़वे वचन कहे।
श्लोक 67 (2.89.67)
तां कृष्यमाणां च रजस्वलां च । स्रस्तोत्तरीयामतदर्हमाणाम् । वृकोदरः प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च । चकार कोपं परमार्तरूपः ॥
tāṃ kṛṣyamāṇāṃ ca rajasvalāṃ ca | srastottarīyāmatadarhamāṇām | vṛkodaraḥ prekṣya yudhiṣṭhiraṃ ca | cakāra kopaṃ paramārtarūpaḥ
रजस्वला अवस्था में घसीटी जाती, खिसकते उत्तरीय वाली, इस व्यवहार के सर्वथा अयोग्य द्रौपदी को देखकर वृकोदर ने युधिष्ठिर की ओर देखा और अत्यन्त पीड़ित होकर क्रोध से भर उठे।