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सभा पर्व · अध्याय 88

युधिष्ठिर का भाइयों, स्वयं और द्रौपदी को दाँव पर लगाना

शकुनि के उकसाने पर युधिष्ठिर अपना अगणित धन, पशुधन, नगर और भूमि, राजकुमारों के आभूषण, फिर नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम को, और अन्त में स्वयं को दाँव पर लगाते हैं, और शकुनि हर दाँव जीत लेता है। तब शकुनि उन्हें द्रौपदी को दाँव पर लगाने को कहता है, और वे उसके रूप और गुणों का बखान करते हुए ऐसा ही करते हैं। वृद्धजन धिक्कार करते हैं, विदुर स्तब्ध बैठे रह जाते हैं, धृतराष्ट्र उत्सुकता से बार-बार पूछते हैं कि क्या जीता, और शकुनि फिर पासे उठाकर जीत जाता है।

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शकुनिरुवाच

श्लोक 1 (2.88.1)

बहुवित्तं पराजैषीः पाण्डवानां युधिष्ठिर । आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥

bahuvittaṃ parājaiṣīḥ pāṇḍavānāṃ yudhiṣṭhira | ācakṣva vittaṃ kaunteya yadi te'styaparājitam

युधिष्ठिर, तुम पाण्डवों का बहुत-सा धन हार चुके हो। कुन्तीनन्दन, यदि तुम्हारे पास कोई धन बिना हारा बचा हो तो बताओ।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (2.88.2)

मम वित्तमसङ्ख्येयं यदहं वेद सौबल । अथ त्वं शकुने कस्माद्वित्तं समनुपृच्छसि ॥

mama vittamasaṅkhyeyaṃ yadahaṃ veda saubala | atha tvaṃ śakune kasmādvittaṃ samanupṛcchasi

सुबलपुत्र, जहाँ तक मैं जानता हूँ, मेरा धन अगणित है। पर शकुनि, तुम मेरे धन के बारे में क्यों पूछ रहे हो?

श्लोक 3 (2.88.3)

अयुतं प्रयुतं चैव शङ्कुं पद्मं तथार्बुदम् । खर्वं शङ्खं निखर्वं च महापद्मं च कोटयः ॥

ayutaṃ prayutaṃ caiva śaṅkuṃ padmaṃ tathārbudam | kharvaṃ śaṅkhaṃ nikharvaṃ ca mahāpadmaṃ ca koṭayaḥ

अयुत और प्रयुत, शंकु, पद्म और अर्बुद, खर्व, शंख, निखर्व, महापद्म और कोटियाँ,

श्लोक 4 (2.88.4)

मध्यं चैव परार्धं च सपरं चात्र पण्यताम् । एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥

madhyaṃ caiva parārdhaṃ ca saparaṃ cātra paṇyatām | etanmama dhanaṃ rājaṃstena dīvyāmyahaṃ tvayā

मध्य और परार्ध, और उससे भी अधिक—यह सब यहाँ दाँव पर लगे। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (2.88.5)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (2.88.6)

गवाश्वं बहुधेनूकमसङ्ख्येयमजाविकम् । यत्किञ्चिदनु पर्णाशां प्राक् सिन्धोरपि सौबल । एतन्मम धनं सर्वं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥

gavāśvaṃ bahudhenūkamasaṅkhyeyamajāvikam | yatkiñcidanu parṇāśāṃ prāk sindhorapi saubala | etanmama dhanaṃ sarvaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā

गाय-बैल और घोड़े, बहुत-सी दुधारू गायें, अगणित भेड़-बकरियाँ—सुबलपुत्र, पर्णाशा नदी के किनारे और सिन्धु के पूर्व तक जो कुछ भी है, यह सब मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (2.88.7)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 8 (2.88.8)

पुरं जनपदो भूमिरब्राह्मणधनैः सह । अब्राह्मणाश्च पुरुषा राजञ्शिष्टं धनं मम । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥

puraṃ janapado bhūmirabrāhmaṇadhanaiḥ saha | abrāhmaṇāśca puruṣā rājañśiṣṭaṃ dhanaṃ mama | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā

मेरा नगर, जनपद और भूमि, ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य सबका धन, और ब्राह्मणों के अतिरिक्त सब पुरुष—हे राजन्, यही मेरा शेष धन है। राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (2.88.9)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (2.88.10)

राजपुत्रा इमे राजञ्छोभन्ते यैर्विभूषिताः । कुण्डलानि च निष्काश्च सर्वं राजविभूषणम् । एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥

rājaputrā ime rājañchobhante yairvibhūṣitāḥ | kuṇḍalāni ca niṣkāśca sarvaṃ rājavibhūṣaṇam | etanmama dhanaṃ rājaṃstena dīvyāmyahaṃ tvayā

हे राजन्, जिन आभूषणों से सजकर ये राजकुमार शोभा पा रहे हैं—कुण्डल, स्वर्ण के कण्ठहार और सब राजोचित आभूषण—यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (2.88.11)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 12 (2.88.12)

श्यामो युवा लोहिताक्षः सिंहस्कन्धो महाभुजः । नकुलो ग्लह एवैको विद्ध्येतन्मम तद्धनम् ॥

śyāmo yuvā lohitākṣaḥ siṃhaskandho mahābhujaḥ | nakulo glaha evaiko viddhyetanmama taddhanam

साँवला, युवा, लाल नेत्रों वाला, सिंह जैसे कन्धों और विशाल भुजाओं वाला नकुल—केवल यही मेरा दाँव है। जानो कि यही मेरा वह धन है।

शकुनिरुवाच

श्लोक 13 (2.88.13)

प्रियस्ते नकुलो राजन्राजपुत्रो युधिष्ठिर । अस्माकं वशतां प्राप्तो भूयः केनेह दीव्यसे ॥

priyaste nakulo rājanrājaputro yudhiṣṭhira | asmākaṃ vaśatāṃ prāpto bhūyaḥ keneha dīvyase

राजा युधिष्ठिर, तुम्हारा प्रिय राजकुमार नकुल अब हमारे वश में आ गया है। अब तुम किसे दाँव पर लगाकर खेलोगे?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (2.88.14)

एवमुक्त्वा तु तानक्षाञ्शकुनिः प्रत्यदीव्यत । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

evamuktvā tu tānakṣāñśakuniḥ pratyadīvyata | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

ऐसा कहकर शकुनि ने वे पासे फेंके और युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (2.88.15)

अयं धर्मान्सहदेवोऽनुशास्ति । लोके ह्यस्मिन्पण्डिताख्यां गतश्च । अनर्हता राजपुत्रेण तेन । दीव्याम्यहं चाप्रियवत्प्रियेण ॥

ayaṃ dharmānsahadevo'nuśāsti | loke hyasminpaṇḍitākhyāṃ gataśca | anarhatā rājaputreṇa tena | dīvyāmyahaṃ cāpriyavatpriyeṇa

यह सहदेव धर्म की शिक्षा देता है और इस संसार में पण्डित के नाम से प्रसिद्ध है। दाँव पर लगाए जाने के अयोग्य इस प्रिय राजकुमार को, मानो वह प्रिय न हो, दाँव पर रखकर मैं खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (2.88.16)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

शकुनिरुवाच

श्लोक 17 (2.88.17)

माद्रीपुत्रौ प्रियौ राजंस्तवेमौ विजितौ मया । गरीयांसौ तु मन्ये भीमसेनधनञ्जयौ ॥

mādrīputrau priyau rājaṃstavemau vijitau mayā | garīyāṃsau tu manye bhīmasenadhanañjayau

हे राजन्, माद्री के ये दोनों प्रिय पुत्र मैंने जीत लिए। पर मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए भीमसेन और धनंजय इनसे भी अधिक मूल्यवान हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (2.88.18)

अधर्मं चरसे नूनं यो नावेक्षसि वै नयम् । यो नः सुमनसां मूढ विभेदं कर्तुमिच्छसि ॥

adharmaṃ carase nūnaṃ yo nāvekṣasi vai nayam | yo naḥ sumanasāṃ mūḍha vibhedaṃ kartumicchasi

मूर्ख, तुम निश्चय ही अधर्म कर रहे हो, जो नीति की ओर ध्यान नहीं देते और हम एकचित्त भाइयों में फूट डालना चाहते हो।

शकुनिरुवाच

श्लोक 19 (2.88.19)

गर्ते मत्तः प्रपतते प्रमत्तः स्थाणुमृच्छति । ज्येष्ठो राजन्वरिष्ठोऽसि नमस्ते भरतर्षभ ॥

garte mattaḥ prapatate pramattaḥ sthāṇumṛcchati | jyeṣṭho rājanvariṣṭho'si namaste bharatarṣabha

मतवाला गड्ढे में गिरता है और असावधान व्यक्ति खूँटे से टकरा जाता है। हे राजन्, तुम ज्येष्ठ हो और श्रेष्ठ हो; हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 20 (2.88.20)

स्वप्ने तानि न दृश्यन्ते जाग्रतो वा युधिष्ठिर । कितवा यानि दीव्यन्तः प्रलपन्त्युत्कटा इव ॥

svapne tāni na dṛśyante jāgrato vā yudhiṣṭhira | kitavā yāni dīvyantaḥ pralapantyutkaṭā iva

युधिष्ठिर, जुआरी खेलते समय उन्मत्तों की तरह जो-जो बकते हैं, वे बातें न सपने में दिखाई देती हैं, न जागते हुए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (2.88.21)

यो नः सङ्ख्ये नौरिव पारनेता । जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी । अनर्हता लोकवीरेण तेन । दीव्याम्यहं शकुने फाल्गुनेन ॥

yo naḥ saṅkhye nauriva pāranetā | jetā ripūṇāṃ rājaputrastarasvī | anarhatā lokavīreṇa tena | dīvyāmyahaṃ śakune phālgunena

जो युद्ध में नौका की तरह हमें पार लगाता है, जो शत्रुओं को जीतने वाला वेगशाली राजकुमार है, दाँव के अयोग्य उस लोकवीर फाल्गुन को लेकर, शकुनि, मैं खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (2.88.22)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

शकुनिरुवाच

श्लोक 23 (2.88.23)

अयं मया पाण्डवानां धनुर्धरः । पराजितः पाण्डवः सव्यसाची । भीमेन राजन्दयितेन दीव्य । यत्कैतवं पाण्डव तेऽवशिष्टम् ॥

ayaṃ mayā pāṇḍavānāṃ dhanurdharaḥ | parājitaḥ pāṇḍavaḥ savyasācī | bhīmena rājandayitena dīvya | yatkaitavaṃ pāṇḍava te'vaśiṣṭam

पाण्डवों के धनुर्धर सव्यसाची पाण्डुपुत्र को मैंने जीत लिया। अब, हे राजन्, अपने प्रिय भीम को दाँव पर लगाकर खेलो; पाण्डुनन्दन, जुए के लिए तुम्हारे पास यही बचा है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (2.88.24)

यो नो नेता यो युधि नः प्रणेता । यथा वज्री दानवशत्रुरेकः । तिर्यक्प्रेक्षी सन्नतभ्रूर्महात्मा । सिंहस्कन्धो यश्च सदाऽत्यमर्षी ॥

yo no netā yo yudhi naḥ praṇetā | yathā vajrī dānavaśatrurekaḥ | tiryakprekṣī sannatabhrūrmahātmā | siṃhaskandho yaśca sadā'tyamarṣī

जो हमारा नेता है, जो युद्ध में वैसे ही हमारा अग्रणी है जैसे दानवों के एकमात्र शत्रु वज्रधारी इन्द्र; जो तिरछी दृष्टि से देखने वाला, झुकी भौंहों वाला, महामना, सिंह जैसे कन्धों वाला और सदा अत्यन्त असहिष्णु है;

श्लोक 25 (2.88.25)

बलेन तुल्यो यस्य पुमान्न विद्यते । गदाभृतामग्र्य इहारिमर्दनः । अनर्हता राजपुत्रेण तेन । दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन् ॥

balena tulyo yasya pumānna vidyate | gadābhṛtāmagrya ihārimardanaḥ | anarhatā rājaputreṇa tena | dīvyāmyahaṃ bhīmasenena rājan

बल में जिसकी बराबरी का कोई पुरुष नहीं, जो गदाधारियों में अग्रणी और शत्रुओं का मर्दन करने वाला है—दाँव के अयोग्य उस राजकुमार भीमसेन को लेकर, हे राजन्, मैं खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (2.88.26)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

शकुनिरुवाच

श्लोक 27 (2.88.27)

बहुवित्तं पराजैषीर्भ्रातॄंश्च सहयद्विपान् । आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥

bahuvittaṃ parājaiṣīrbhrātṝṃśca sahayadvipān | ācakṣva vittaṃ kaunteya yadi te'styaparājitam

तुम बहुत-सा धन और घोड़ों-हाथियों सहित अपने भाइयों को हार चुके हो। कुन्तीनन्दन, यदि कोई धन बिना हारा बचा हो तो बताओ।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (2.88.28)

अहं विशिष्टः सर्वेषां भ्रातॄणां दयितस्तथा । कुर्यामहं जितः कर्म स्वयमात्मन्युपप्लुते ॥

ahaṃ viśiṣṭaḥ sarveṣāṃ bhrātṝṇāṃ dayitastathā | kuryāmahaṃ jitaḥ karma svayamātmanyupaplute

सब भाइयों में श्रेष्ठ और उनका प्रिय मैं स्वयं शेष हूँ। यदि मैं हार गया, तो इस विपत्ति में स्वयं तुम्हारा काम करूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (2.88.29)

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥

etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata

यह सुनकर छल का सहारा लेने वाले, दृढ़निश्चयी शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा—"जीत लिया!"

शकुनिरुवाच

श्लोक 30 (2.88.30)

एतत्पापिष्ठमकरोर्यदात्मानं पराजयेः । शिष्टे सति धने राजन्पाप आत्मपराजयः ॥

etatpāpiṣṭhamakaroryadātmānaṃ parājayeḥ | śiṣṭe sati dhane rājanpāpa ātmaparājayaḥ

यह तुमने सबसे बड़ा पाप किया कि स्वयं को ही हार बैठे। हे राजन्, धन शेष रहते हुए अपने को हार जाना पाप है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (2.88.31)

एवमुक्त्वा मताक्षस्तान् ग्लहे सर्वानवस्थितान् । पराजयल्लोकवीरानुक्त्वा राज्ञां पृथक् पृथक् ॥

evamuktvā matākṣastān glahe sarvānavasthitān | parājayallokavīrānuktvā rājñāṃ pṛthak pṛthak

ऐसा कहकर पासों के उस निपुण खिलाड़ी ने दाँव पर रखे गए उन सब लोकवीरों को जीत लिया और एक-एक करके राजाओं के सामने उनका नाम लेकर घोषणा की।

शकुनिरुवाच

श्लोक 32 (2.88.32)

अस्ति ते वै प्रिया राजन् ग्लह एकोऽपराजितः । पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तयात्मानं पुनर्जय ॥

asti te vai priyā rājan glaha eko'parājitaḥ | paṇasva kṛṣṇāṃ pāñcālīṃ tayātmānaṃ punarjaya

हे राजन्, तुम्हारे पास अभी एक प्रिय दाँव बचा है जो हारा नहीं गया। पाञ्चालराजकुमारी कृष्णा को दाँव पर लगाओ और उसके द्वारा फिर से स्वयं को जीत लो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 33 (2.88.33)

नैव ह्रस्वा न महती न कृशा नातिरोहिणी । नीलकुञ्चितकेशी च तया दीव्याम्यहं त्वया ॥

naiva hrasvā na mahatī na kṛśā nātirohiṇī | nīlakuñcitakeśī ca tayā dīvyāmyahaṃ tvayā

वह न नाटी है न बहुत लम्बी, न दुबली है न अधिक लाल वर्ण की; उसके केश काले और घुँघराले हैं। उसी को दाँव पर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ—

श्लोक 34 (2.88.34)

शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया । शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया ॥

śāradotpalapatrākṣyā śāradotpalagandhayā | śāradotpalasevinyā rūpeṇa śrīsamānayā

उसके साथ, जिसकी आँखें शरद ऋतु के कमल की पंखुड़ियों जैसी हैं, जिससे शरद के कमल की सुगन्ध आती है, जो शरद के कमलों से प्रेम करती है और रूप में लक्ष्मी के समान है;

श्लोक 35 (2.88.35)

तथैव स्यादानृशंस्यात्तथा स्याद्रूपसम्पदा । तथा स्याच्छीलसम्पत्त्या यामिच्छेत्पुरुषः स्त्रियम् ॥

tathaiva syādānṛśaṃsyāttathā syādrūpasampadā | tathā syācchīlasampattyā yāmicchetpuruṣaḥ striyam

जैसी स्त्री को पुरुष उसकी दयालुता, रूप-सम्पदा और शील-सम्पदा के कारण चाहता है, वैसी ही;

श्लोक 36 (2.88.36)

सर्वैर्गुणैर्हि सम्पन्नामनुकूलां प्रियंवदाम् । यादृशीं धर्मकामार्थसिद्धिमिच्छेन्नरः स्त्रियम् ॥

sarvairguṇairhi sampannāmanukūlāṃ priyaṃvadām | yādṛśīṃ dharmakāmārthasiddhimicchennaraḥ striyam

जो सब गुणों से सम्पन्न, अनुकूल और मधुरभाषिणी है—धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए पुरुष जैसी स्त्री चाहता है, वैसी;

श्लोक 37 (2.88.37)

चरमं संविशति या प्रथमं प्रतिबुध्यते । आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥

caramaṃ saṃviśati yā prathamaṃ pratibudhyate | āgopālāvipālebhyaḥ sarvaṃ veda kṛtākṛtam

जो सबसे बाद में सोती है और सबसे पहले जागती है, जो ग्वालों और गड़रियों तक के किए-अनकिए सब कामों को जानती है;

श्लोक 38 (2.88.38)

आभाति पद्मवद्वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव च । वेदीमध्या दीर्घकेशी ताम्रास्या नातिलोमशा ॥

ābhāti padmavadvaktraṃ sasvedaṃ mallikeva ca | vedīmadhyā dīrghakeśī tāmrāsyā nātilomaśā

जिसका पसीने की बूँदों से भीगा मुख कमल और मल्लिका की भाँति दमकता है; जिसकी कमर वेदी के समान पतली है, केश लम्बे हैं, अधर लाल हैं और शरीर पर अधिक रोम नहीं हैं—

श्लोक 39 (2.88.39)

तयैवंविधया राजन्पाञ्चाल्याहं सुमध्यमा । ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्ग्या द्रौपद्या हन्त सौबल ॥

tayaivaṃvidhayā rājanpāñcālyāhaṃ sumadhyamā | glahaṃ dīvyāmi cārvaṅgyā draupadyā hanta saubala

हे राजन्, ऐसी ही, पतली कमर वाली, सुन्दर अंगों वाली पाञ्चाली द्रौपदी को दाँव पर रखकर, सुबलपुत्र, लो, मैं खेलता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (2.88.40)

एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता । धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः ॥

evamukte tu vacane dharmarājena dhīmatā | dhigdhigityeva vṛddhānāṃ sabhyānāṃ niḥsṛtā giraḥ

बुद्धिमान धर्मराज के ऐसा कहने पर सभा में बैठे वृद्धों के मुख से "धिक्कार है, धिक्कार है!" की वाणी निकल पड़ी।

श्लोक 41 (2.88.41)

चुक्षुभे सा सभा राजन्राज्ञां सञ्जज्ञिरे शुचः । भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्च समजायत ॥

cukṣubhe sā sabhā rājanrājñāṃ sañjajñire śucaḥ | bhīṣmadroṇakṛpādīnāṃ svedaśca samajāyata

हे राजन्, वह सभा क्षुब्ध हो उठी और राजाओं में शोक छा गया। भीष्म, द्रोण, कृप आदि के शरीर से पसीना छूटने लगा।

श्लोक 42 (2.88.42)

शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् । आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥

śiro gṛhītvā viduro gatasattva ivābhavat | āste dhyāyannadhovaktro niḥśvasanniva pannagaḥ

विदुर सिर पकड़कर ऐसे हो गए मानो उनके प्राण निकल गए हों। वे मुँह नीचा किए, सर्प की तरह लम्बी साँसें लेते हुए चिन्ता में डूबे बैठे रहे।

श्लोक 43 (2.88.43)

बाह्लीकः सोमदत्तश्च प्रातिपेयश्च सञ्जयः । द्रौणिर्भूरिश्रवाश्चैव युयुत्सुर्धृतराष्ट्रजः । आसुर्वीक्ष्य त्वधोवक्त्रा निश्वसन्त इवोरगाः ॥

bāhlīkaḥ somadattaśca prātipeyaśca sañjayaḥ | drauṇirbhūriśravāścaiva yuyutsurdhṛtarāṣṭrajaḥ | āsurvīkṣya tvadhovaktrā niśvasanta ivoragāḥ

बाह्लीक और सोमदत्त, प्रातिपेय और संजय, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, भूरिश्रवा तथा धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु—ये सब यह देखकर मुँह नीचा किए साँपों की तरह साँसें भरते बैठे रहे।

श्लोक 44 (2.88.44)

धृतराष्ट्रस्तु संहृष्टः पर्यपृच्छत्पुनः पुनः । किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत ॥

dhṛtarāṣṭrastu saṃhṛṣṭaḥ paryapṛcchatpunaḥ punaḥ | kiṃ jitaṃ kiṃ jitamiti hyākāraṃ nābhyarakṣata

पर धृतराष्ट्र प्रसन्न होकर बार-बार पूछने लगे—"क्या जीता? क्या जीता?" वे अपने मन के भाव को छिपा न सके।

श्लोक 45 (2.88.45)

जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः । इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतञ्जलम् ॥

jaharṣa karṇo'tibhṛśaṃ saha duḥśāsanādibhiḥ | itareṣāṃ tu sabhyānāṃ netrebhyaḥ prāpatañjalam

दुःशासन आदि के साथ कर्ण अत्यन्त हर्षित हुआ; पर सभा के अन्य सब लोगों की आँखों से आँसू गिरने लगे।

श्लोक 46 (2.88.46)

सौबलस्त्वभिधायैव जितकाशी मदोत्कटः । जितमित्येव तानक्षान्पुनरेवान्वपद्यत ॥

saubalastvabhidhāyaiva jitakāśī madotkaṭaḥ | jitamityeva tānakṣānpunarevānvapadyata

विजय से दमकता और मद से उन्मत्त सुबलपुत्र शकुनि बोल उठा और "जीत लिया!" कहते हुए उसने फिर से उन पासों को उठा लिया।

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