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सभा पर्व · अध्याय 3

मय द्वारा सभा का निर्माण

मय अर्जुन से कहता है कि वह कैलास के उत्तर में मैनाक पर्वत के पास बिन्दुसरोवर से वह मणिमय सामग्री लाएगा जो उसने कभी दानवराज वृषपर्वा के लिए बनाई थी, साथ ही भीम के लिए यौवनाश्व की महान् गदा और अर्जुन के लिए वरुण का देवदत्त शंख भी। वैशम्पायन उस पवित्र सरोवर का वर्णन करते हैं जहाँ भगीरथ, इन्द्र, शिव और श्रीकृष्ण ने तप और यज्ञ किए थे; मय सब कुछ लाकर गदा और शंख भेंट करता है। फिर वह दस हजार किष्कु विस्तार वाली दीप्तिमान सभा बनाता है, जिसकी रक्षा और वहन आठ हजार किंकर राक्षस करते हैं और जिसमें आने वाले राजाओं को भ्रम में डालने वाला मणिमय कमल-सरोवर है; चौदह महीनों में सभा पूरी कर वह युधिष्ठिर को सूचित करता है।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.3.1)

अथाब्रवीन्मयः पार्थमर्जुनं जयतां वरम् । आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाप्यहम् ॥

athābravīnmayaḥ pārthamarjunaṃ jayatāṃ varam | āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi punareṣyāmi cāpyaham

तब मय ने विजेताओं में श्रेष्ठ पार्थ अर्जुन से कहा—"मैं तुमसे विदा लेता हूँ; मैं जाऊँगा और फिर लौट आऊँगा।

मय उवाच

श्लोक 2 (2.3.2)

विश्रुतां त्रिषु लोकेषु पार्थ दिव्यां सभां तव । प्राणिनां विस्मयकरीं तव प्रियविवर्धिनीम् । पाण्डवानां च सर्वेषां करिष्यामि धनञ्जय ॥

viśrutāṃ triṣu lokeṣu pārtha divyāṃ sabhāṃ tava | prāṇināṃ vismayakarīṃ tava priyavivardhinīm | pāṇḍavānāṃ ca sarveṣāṃ kariṣyāmi dhanañjaya

हे पार्थ, हे धनञ्जय, मैं तुम्हारे और सब पाण्डवों के लिए तीनों लोकों में विख्यात एक दिव्य सभा बनाऊँगा, जो प्राणियों को विस्मित कर देगी और तुम्हारा आनन्द बढ़ाएगी।

श्लोक 3 (2.3.3)

उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति । यियक्षमाणेषु पुरा दानवेषु मया कृतम् ॥

uttareṇa tu kailāsaṃ mainākaṃ parvataṃ prati | yiyakṣamāṇeṣu purā dānaveṣu mayā kṛtam

कैलास के उत्तर में मैनाक पर्वत के पास, पूर्वकाल में जब दानव यज्ञ करने वाले थे, तब मैंने

श्लोक 4 (2.3.4)

चित्रं मणिमयं भाण्डं रम्यं बिन्दुसरः प्रति । सभायां सत्यसन्धस्य यदासीद्वृषपर्वणः ॥

citraṃ maṇimayaṃ bhāṇḍaṃ ramyaṃ bindusaraḥ prati | sabhāyāṃ satyasandhasya yadāsīdvṛṣaparvaṇaḥ

बिन्दुसरोवर के पास मणियों की एक अद्भुत और सुन्दर सामग्री तैयार की थी, जो सत्यप्रतिज्ञ वृषपर्वा की सभा में रखी थी।

श्लोक 5 (2.3.5)

आगमिष्यामि तद्गृह्य यदि तिष्ठति भारत । ततः सभां करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम् ॥

āgamiṣyāmi tadgṛhya yadi tiṣṭhati bhārata | tataḥ sabhāṃ kariṣyāmi pāṇḍavasya yaśasvinīm

हे भारत, यदि वह अब भी वहाँ हो, तो मैं उसे लेकर आऊँगा और फिर पाण्डुपुत्र के लिए एक यशस्वी सभा बनाऊँगा,

श्लोक 6 (2.3.6)

मनः प्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् । अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन ॥

manaḥ prahlādinīṃ citrāṃ sarvaratnavibhūṣitām | asti bindusarasyugrā gadā ca kurunandana

जो मन को आनन्दित करने वाली, विचित्र और सब प्रकार के रत्नों से विभूषित होगी। हे कुरुनन्दन, बिन्दुसरोवर में एक भयंकर गदा भी है,

श्लोक 7 (2.3.7)

निहिता यौवनाश्वेन राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णबिन्दुभिश्चित्रा गुर्वी भारसहा दृढा ॥

nihitā yauvanāśvena rājñā hatvā raṇe ripūn | suvarṇabindubhiścitrā gurvī bhārasahā dṛḍhā

जिसे राजा यौवनाश्व ने युद्ध में शत्रुओं को मारकर वहाँ रखा था। वह सोने की बिन्दियों से चित्रित, भारी, भार सहने में समर्थ और दृढ़ है।

श्लोक 8 (2.3.8)

सा वै शतसहस्रस्य सम्मिता शत्रुघातिनी । अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा ॥

sā vai śatasahasrasya sammitā śatrughātinī | anurūpā ca bhīmasya gāṇḍīvaṃ bhavato yathā

शत्रुओं का नाश करने वाली वह गदा एक लाख गदाओं के बराबर है, और वह भीम के योग्य है, जैसे गाण्डीव तुम्हारे योग्य है।

श्लोक 9 (2.3.9)

वारुणश्च महाशङ्खो देवदत्तः सुघोषवान् । सर्वमेतत्प्रदास्यामि भवते नात्र संशयः ॥

vāruṇaśca mahāśaṅkho devadattaḥ sughoṣavān | sarvametatpradāsyāmi bhavate nātra saṃśayaḥ

वहीं वरुण का महान् शंख देवदत्त भी है, जिसका नाद अत्यन्त गम्भीर है। यह सब मैं तुम्हें दूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (2.3.10)

इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थं प्रागुदीचीं दिशं गतः । अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वतं प्रति ॥

ityuktvā so'suraḥ pārthaṃ prāgudīcīṃ diśaṃ gataḥ | athottareṇa kailāsānmainākaṃ parvataṃ prati

पार्थ से ऐसा कहकर वह असुर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चला गया, कैलास के उत्तर में मैनाक पर्वत की ओर,

श्लोक 11 (2.3.11)

हिरण्यशृङ्गः सुमहान्महामणिमयो गिरिः । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥

hiraṇyaśṛṅgaḥ sumahānmahāmaṇimayo giriḥ | ramyaṃ bindusaro nāma yatra rājā bhagīrathaḥ

जो सुवर्ण-शिखरों वाला, महामणियों से बना एक विशाल पर्वत है। वहीं बिन्दुसर नाम का रमणीय सरोवर है, जहाँ राजा भगीरथ

श्लोक 12 (2.3.12)

द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । यत्रेष्टं सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना ॥

draṣṭuṃ bhāgīrathīṃ gaṅgāmuvāsa bahulāḥ samāḥ | yatreṣṭaṃ sarvabhūtānāmīśvareṇa mahātmanā

भागीरथी गंगा के दर्शन के लिए बहुत वर्षों तक रहे थे। वहीं समस्त प्राणियों के स्वामी महात्मा ईश्वर ने

श्लोक 13 (2.3.13)

आहृताः क्रतवो मुख्याः शतं भरतसत्तम । यत्र यूपा मणिमयाश्चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥

āhṛtāḥ kratavo mukhyāḥ śataṃ bharatasattama | yatra yūpā maṇimayāścaityāścāpi hiraṇmayāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, सौ मुख्य यज्ञ किए थे। वहाँ यज्ञ-स्तम्भ मणियों के और वेदियाँ सोने की बनी थीं,

श्लोक 14 (2.3.14)

शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः । यत्रेष्ट्वा स गतः सिद्धिं सहस्राक्षः शचीपतिः ॥

śobhārthaṃ vihitāstatra na tu dṛṣṭāntataḥ kṛtāḥ | yatreṣṭvā sa gataḥ siddhiṃ sahasrākṣaḥ śacīpatiḥ

जो वहाँ शोभा के लिए बनाई गई थीं, विधि के अनुसार अनिवार्य होने के कारण नहीं। वहीं यज्ञ करके सहस्रनेत्र शचीपति इन्द्र ने सिद्धि पाई थी।

श्लोक 15 (2.3.15)

यत्र भूतपतिः सृष्ट्वा सर्वाँल्लोकान्सनातनः । उपास्यते तिग्मतेजाः स्थितो भूतैः सहस्रशः ॥

yatra bhūtapatiḥ sṛṣṭvā sarvām̐llokānsanātanaḥ | upāsyate tigmatejāḥ sthito bhūtaiḥ sahasraśaḥ

वहीं सब लोकों की सृष्टि करने वाले, प्रचण्ड तेज वाले सनातन भूतपति हजारों भूतगणों के बीच विराजमान होकर उपासित होते हैं।

श्लोक 16 (2.3.16)

नरनारायणौ ब्रह्मा यमः स्थाणुश्च पञ्चमः । उपासते यत्र परं सहस्रयुगपर्यये ॥

naranārāyaṇau brahmā yamaḥ sthāṇuśca pañcamaḥ | upāsate yatra paraṃ sahasrayugaparyaye

वहीं नर और नारायण, ब्रह्मा, यम और पाँचवें स्थाणु (शिव) सहस्र युगों के अन्त में परम तत्त्व की उपासना करते हैं।

श्लोक 17 (2.3.17)

यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्त्रैर्वर्षगणान्बहून् । श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये ॥

yatreṣṭaṃ vāsudevena sattrairvarṣagaṇānbahūn | śraddadhānena satataṃ dharmasampratipattaye

वहीं वासुदेव ने श्रद्धापूर्वक अनेक वर्षों तक निरन्तर सत्र-यज्ञ किए, ताकि धर्म की प्रतिष्ठा हो।

श्लोक 18 (2.3.18)

सुवर्णमालिनो यूपाश्चैत्याश्चाप्यतिभास्वराः । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशवः ॥

suvarṇamālino yūpāścaityāścāpyatibhāsvarāḥ | dadau yatra sahasrāṇi prayutāni ca keśavaḥ

वहीं केशव ने स्वर्ण-मालाओं से सजे यज्ञ-स्तम्भ और अत्यन्त दीप्तिमान वेदियाँ हजारों-लाखों की संख्या में प्रदान कीं।

श्लोक 19 (2.3.19)

तत्र गत्वा स जग्राह गदां शङ्खं च भारत । तस्माद्गिरेरुपादाय शिलाः सुरुचिरावहाः । स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद्वृषपर्वणः ॥

tatra gatvā sa jagrāha gadāṃ śaṅkhaṃ ca bhārata | tasmādgirerupādāya śilāḥ surucirāvahāḥ | sphāṭikaṃ ca sabhādravyaṃ yadāsīdvṛṣaparvaṇaḥ

हे भारत, वहाँ जाकर मय ने गदा और शंख ले लिए, और उस पर्वत से अत्यन्त सुन्दर शिलाएँ लेकर वृषपर्वा की सभा की स्फटिक-सामग्री भी ले ली।

श्लोक 20 (2.3.20)

किङ्करैः सह रक्षोभिर्यदरक्षन्महद्धनम् । तदगृह्णान्मयस्तत्र गत्वा सर्वं महाऽसुरः ॥

kiṅkaraiḥ saha rakṣobhiryadarakṣanmahaddhanam | tadagṛhṇānmayastatra gatvā sarvaṃ mahā'suraḥ

जिस महान् सम्पदा की रक्षा किंकर नामक राक्षस करते थे, उस सबको महासुर मय ने वहाँ जाकर ले लिया।

श्लोक 21 (2.3.21)

तदाहृत्य च तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम् ॥

tadāhṛtya ca tāṃ cakre so'suro'pratimāṃ sabhām | viśrutāṃ triṣu lokeṣu divyāṃ maṇimayīṃ śubhām

उसे लाकर उस असुर ने वह अनुपम सभा बनाई, जो तीनों लोकों में विख्यात, दिव्य, मणिमयी और सुन्दर थी।

श्लोक 22 (2.3.22)

गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा । देवदत्तं चार्जुनाय शङ्खप्रवरमुत्तमम् ॥

gadāṃ ca bhīmasenāya pravarāṃ pradadau tadā | devadattaṃ cārjunāya śaṅkhapravaramuttamam

फिर उसने वह श्रेष्ठ गदा भीमसेन को और शंखों में उत्तम देवदत्त शंख अर्जुन को दिया,

श्लोक 23 (2.3.23)

यस्य शङ्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे । स कालं कञ्चिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य च ॥

yasya śaṅkhasya nādena bhūtāni pracakampire | sa kālaṃ kañcidāśvasya viśvakarmā vicintya ca

जिसके नाद से सब प्राणी काँप उठे। कुछ समय विश्राम करके और विचार करके उस विश्वकर्मा ने

श्लोक 24 (2.3.24)

सभां प्रचक्रमे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् । अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः ॥

sabhāṃ pracakrame kartuṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | abhiprāyeṇa pārthānāṃ kṛṣṇasya ca mahātmanaḥ

पार्थों और महात्मा श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार महात्मा पाण्डवों के लिए सभा बनाना आरम्भ किया।

श्लोक 25 (2.3.25)

सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपामलङ्कृताम् । तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान्पायसेन सहस्रशः । सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा ॥

sarvartuguṇasampannāṃ divyarūpāmalaṅkṛtām | tarpayitvā dvijaśreṣṭhānpāyasena sahasraśaḥ | sabhā ca sā mahārāja śātakumbhamayadrumā

हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को खीर से तृप्त करके उसने सभा को सब ऋतुओं के गुणों से युक्त, दिव्य रूप वाली और अलंकृत बनाया। हे महाराज, उस सभा में सोने के वृक्ष थे,

श्लोक 26 (2.3.26)

दशकिष्कुसहस्राणि समन्तादायताभवत् । यथा वह्नेर्यथार्कस्य सोमस्य च यथा सभा ॥

daśakiṣkusahasrāṇi samantādāyatābhavat | yathā vahneryathārkasya somasya ca yathā sabhā

और वह चारों ओर दस हजार किष्कु तक फैली थी। अग्नि, सूर्य या चन्द्रमा की सभा के समान

श्लोक 27 (2.3.27)

भ्राजमाना तथाऽत्यर्थं दधार परमं वपुः । अभिघ्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम् ॥

bhrājamānā tathā'tyarthaṃ dadhāra paramaṃ vapuḥ | abhighnatīva prabhayā prabhāmarkasya bhāsvarām

वह अत्यन्त जगमगाती थी और उसने परम रूप धारण किया था। अपनी प्रभा से वह मानो सूर्य की दीप्त प्रभा को भी परास्त कर रही थी।

श्लोक 28 (2.3.28)

प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा । नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता । आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक्लमा ॥

prababhau jvalamāneva divyā divyena varcasā | navameghapratīkāśā divamāvṛtya viṣṭhitā | āyatā vipulā ramyā vipāpmā vigataklamā

वह दिव्य सभा दिव्य तेज से मानो जलती हुई चमक रही थी। नए मेघ के समान वह आकाश को घेरकर खड़ी थी; लम्बी, चौड़ी, रमणीय, दोषरहित और थकान मिटाने वाली।

श्लोक 29 (2.3.29)

उत्तमद्रव्यसम्पन्ना रत्नप्राकारतोरणा । बहुचित्रा बहुधना सुकृता विश्वकर्मणा ॥

uttamadravyasampannā ratnaprākāratoraṇā | bahucitrā bahudhanā sukṛtā viśvakarmaṇā

वह उत्तम सामग्रियों से सम्पन्न थी, उसके परकोटे और तोरण रत्नों के थे; वह अनेक चित्रों और अपार धन से युक्त थी और उस विश्वकर्मा ने उसे बड़ी कुशलता से बनाया था।

श्लोक 30 (2.3.30)

न दाशार्ही सुधर्मा वा ब्रह्मणो वाथ तादृशी । सभा रूपेण सम्पन्ना यां चक्रे मतिमान्मयः ॥

na dāśārhī sudharmā vā brahmaṇo vātha tādṛśī | sabhā rūpeṇa sampannā yāṃ cakre matimānmayaḥ

न तो दाशार्हों (यादवों) की सुधर्मा सभा और न ब्रह्मा की सभा ही रूप में वैसी सम्पन्न थी, जैसी सभा बुद्धिमान् मय ने बनाई।

श्लोक 31 (2.3.31)

तां स्म तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च । सभामष्टौ सहस्राणि किङ्करा नाम राक्षसाः ॥

tāṃ sma tatra mayenoktā rakṣanti ca vahanti ca | sabhāmaṣṭau sahasrāṇi kiṅkarā nāma rākṣasāḥ

मय की आज्ञा से किंकर नामक आठ हजार राक्षस उस सभा की रक्षा करते और उसे उठाकर ले चलते थे।

श्लोक 32 (2.3.32)

अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महाबलाः । रक्ताक्षाः पिङ्गलाक्षाश्च शुक्तिकर्णाः प्रहारिणः ॥

antarikṣacarā ghorā mahākāyā mahābalāḥ | raktākṣāḥ piṅgalākṣāśca śuktikarṇāḥ prahāriṇaḥ

वे आकाश में विचरने वाले, भयंकर, विशालकाय और महाबली थे; उनकी आँखें लाल और पीली थीं, कान सीपी के समान थे और वे प्रहार करने में कुशल थे।

श्लोक 33 (2.3.33)

तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मयः । वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम् ॥

tasyāṃ sabhāyāṃ nalinīṃ cakārāpratimāṃ mayaḥ | vaidūryapatravitatāṃ maṇinālamayāmbujām

उस सभा में मय ने एक अनुपम कमल-सरोवर बनाया, जो वैदूर्य मणि के पत्तों से ढका था और जिसके कमलों की नालें मणियों की थीं;

श्लोक 34 (2.3.34)

पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम् । पुष्पितैः पङ्कजैश्चित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्च काञ्चनैः । चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम् ॥

padmasaugandhikavatīṃ nānādvijagaṇāyutām | puṣpitaiḥ paṅkajaiścitrāṃ kūrmairmatsyaiśca kāñcanaiḥ | citrasphaṭikasopānāṃ niṣpaṅkasalilāṃ śubhām

वह पद्मों और सुगन्धित सौगन्धिक कमलों से भरा, नाना प्रकार के पक्षियों से युक्त, खिले कमलों और सोने के कछुओं-मछलियों से चित्रित था; उसकी सीढ़ियाँ रंग-बिरंगे स्फटिक की थीं और जल कीचड़-रहित तथा निर्मल था;

श्लोक 35 (2.3.35)

मन्दानिलसमुद्धूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम् । महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम् ॥

mandānilasamuddhūtāṃ muktābindubhirācitām | mahāmaṇiśilāpaṭṭabaddhaparyantavedikām

मन्द पवन से उसका जल लहराता था, मोतियों जैसी बूँदों से वह भरा था, और उसके किनारे की वेदिकाएँ बड़ी-बड़ी मणियों की शिलाओं से जड़ी थीं।

श्लोक 36 (2.3.36)

मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः । दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात्प्रपतन्त्युत ॥

maṇiratnacitāṃ tāṃ tu kecidabhyetya pārthivāḥ | dṛṣṭvāpi nābhyajānanta te'jñānātprapatantyuta

मणियों और रत्नों से जड़े उस सरोवर के पास आकर कुछ राजा उसे देखकर भी पहचान न सके और अज्ञानवश उसमें गिर पड़ते थे।

श्लोक 37 (2.3.37)

तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमाः । आसन्नानाविधा लोलाः शीतच्छाया मनोरमाः ॥

tāṃ sabhāmabhito nityaṃ puṣpavanto mahādrumāḥ | āsannānāvidhā lolāḥ śītacchāyā manoramāḥ

उस सभा के चारों ओर सदा फूलों से लदे, नाना प्रकार के, हिलते-डुलते, शीतल छाया वाले और मनोहर विशाल वृक्ष थे।

श्लोक 38 (2.3.38)

काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः । हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥

kānanāni sugandhīni puṣkariṇyaśca sarvaśaḥ | haṃsakāraṇḍavopetāścakravākopaśobhitāḥ

चारों ओर सुगन्धित उपवन और कमल-ताल थे, जिनमें हंस और कारण्डव पक्षी रहते थे और चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते थे।

श्लोक 39 (2.3.39)

जलजानां च पद्मानां स्थलजानां च सर्वशः । मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान्स्म निषेवते ॥

jalajānāṃ ca padmānāṃ sthalajānāṃ ca sarvaśaḥ | māruto gandhamādāya pāṇḍavānsma niṣevate

चारों ओर से जल और थल में उत्पन्न कमलों की सुगन्ध लेकर वायु पाण्डवों की सेवा करता था।

श्लोक 40 (2.3.40)

ईदृशीं तां सभां कृत्वा मासैः परिचतुर्दशैः । निष्ठितां धर्मराजाय मयो राजन्न्यवेदयत् ॥

īdṛśīṃ tāṃ sabhāṃ kṛtvā māsaiḥ paricaturdaśaiḥ | niṣṭhitāṃ dharmarājāya mayo rājannyavedayat

हे राजन्, ऐसी सभा चौदह महीनों में बनाकर मय ने धर्मराज को सूचित किया कि वह बनकर तैयार है।

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