सभा पर्व · अध्याय 36
श्रीकृष्ण का आगमन और राजसूय का आरम्भ
युधिष्ठिर के धर्मपूर्ण शासन में राज्य समृद्ध होता है, उनका कोष अपार हो जाता है और मित्र आग्रह करते हैं कि यज्ञ का समय आ गया है। श्रीकृष्ण द्वारका से विपुल धन लेकर आते हैं और अनुमति देते हैं, तथा युधिष्ठिर सहदेव को यज्ञ की सारी सामग्री जुटाने का आदेश देते हैं। व्यास ऋत्विजों को लाते हैं और स्वयं ब्रह्मा का पद ग्रहण करते हैं; दूत सभी देशों से ब्राह्मणों, राजाओं, वैश्यों और शूद्रों को निमन्त्रित करते हैं, नकुल हस्तिनापुर भेजे जाते हैं, और युधिष्ठिर राजसूय की दीक्षा लेते हैं — यज्ञ भोज और उदार दानों के बीच आरम्भ होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.36.1)
रक्षणाद्धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ॥
rakṣaṇāddharmarājasya satyasya paripālanāt | śatrūṇāṃ kṣapaṇāccaiva svakarmaniratāḥ prajāḥ
धर्मराज की रक्षा, सत्य के पालन और शत्रुओं के नाश के कारण प्रजा अपने-अपने कर्मों में लगी रहती थी।
श्लोक 2 (2.36.2)
बलीनां सम्यगादानाद्धर्मतश्चानुशासनात् । निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ॥
balīnāṃ samyagādānāddharmataścānuśāsanāt | nikāmavarṣī parjanyaḥ sphīto janapado'bhavat
करों के न्यायपूर्वक संग्रह और धर्म के अनुसार शासन के कारण मेघ इच्छानुसार बरसते थे और सारा जनपद समृद्ध हो गया।
श्लोक 3 (2.36.3)
सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक् । विशेषात्सर्वमेवैतत्सञ्जज्ञे राजकर्मणः ॥
sarvārambhāḥ supravṛttā gorakṣā karṣaṇaṃ vaṇik | viśeṣātsarvamevaitatsañjajñe rājakarmaṇaḥ
सभी उद्यम — पशुपालन, खेती और व्यापार — भली-भाँति चलने लगे। यह सब विशेष रूप से राजा के आचरण का ही फल था।
श्लोक 4 (2.36.4)
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन्प्रति परस्परम् । राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषागिरः ॥
dasyubhyo vañcakebhyo vā rājanprati parasparam | rājavallabhataścaiva nāśrūyanta mṛṣāgiraḥ
हे राजन्, न लुटेरों से, न आपस में ठगों से, और न राजा के कृपापात्रों से — कहीं झूठी बात सुनाई नहीं पड़ती थी।
श्लोक 5 (2.36.5)
अवर्षं चातिवर्षं च व्याधिपावकमूर्छनम् । सर्वमेतत्तदा नासीद्धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ॥
avarṣaṃ cātivarṣaṃ ca vyādhipāvakamūrchanam | sarvametattadā nāsīddharmanitye yudhiṣṭhire
अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग और अग्नि का प्रकोप — धर्मपरायण युधिष्ठिर के राज्य में उस समय इनमें से कुछ भी नहीं था।
श्लोक 6 (2.36.6)
प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वभावजम् । अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नान्यैः कार्यैः कथञ्चन ॥
priyaṃ kartumupasthātuṃ balikarma svabhāvajam | abhihartuṃ nṛpā jagmurnānyaiḥ kāryaiḥ kathañcana
राजा लोग उनका प्रिय करने, उनकी सेवा में उपस्थित होने और स्वभावतः देय कर भेंट करने के लिए आते थे — किसी अन्य प्रयोजन से कदापि नहीं।
श्लोक 7 (2.36.7)
धर्म्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान् । कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि ॥
dharmyairdhanāgamaistasya vavṛdhe nicayo mahān | kartuṃ yasya na śakyeta kṣayo varṣaśatairapi
धर्मसम्मत आय के साधनों से उनका भण्डार इतना बढ़ गया कि सौ वर्षों में भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था।
श्लोक 8 (2.36.8)
स्वकोष्ठस्य परीमाणं कोशस्य च महीपतिः । विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दधे ॥
svakoṣṭhasya parīmāṇaṃ kośasya ca mahīpatiḥ | vijñāya rājā kaunteyo yajñāyaiva mano dadhe
अपने अन्न-भण्डार और कोष का परिमाण जानकर पृथ्वीपति कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने यज्ञ करने का निश्चय किया।
श्लोक 9 (2.36.9)
सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक्च सहचाब्रुवन् । यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम् ॥
suhṛdaścaiva ye sarve pṛthakca sahacābruvan | yajñakālastava vibho kriyatāmatra sāmpratam
उनके सभी हितैषी मित्र अलग-अलग और मिलकर भी उनसे कहने लगे — "हे प्रभो, आपके यज्ञ का समय आ गया है; अब इसे सम्पन्न कीजिए।"
श्लोक 10 (2.36.10)
अथैवं ब्रुवतामेव तेषामभ्याययौ हरिः । ऋषिः पुराणो वेदात्मा दृश्यश्चैव विजानताम् ॥
athaivaṃ bruvatāmeva teṣāmabhyāyayau hariḥ | ṛṣiḥ purāṇo vedātmā dṛśyaścaiva vijānatām
वे ऐसा कह ही रहे थे कि श्रीहरि वहाँ आ पहुँचे — वे पुरातन ऋषि, वेदस्वरूप, जिन्हें ज्ञानी जन ही देख पाते हैं;
श्लोक 11 (2.36.11)
जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठः प्रभवश्चाप्ययश्च ह । भूतभव्यभवन्नाथः केशवः केशिसूदनः ॥
jagatastasthuṣāṃ śreṣṭhaḥ prabhavaścāpyayaśca ha | bhūtabhavyabhavannāthaḥ keśavaḥ keśisūdanaḥ
जो चर-अचर जगत में श्रेष्ठ हैं, उसके उद्गम और लय हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी हैं — केशी का वध करने वाले केशव;
श्लोक 12 (2.36.12)
प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदोऽरिहा । बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम् ॥
prākāraḥ sarvavṛṣṇīnāmāpatsvabhayado'rihā | balādhikāre nikṣipya samyagānakadundubhim
जो सब वृष्णियों के रक्षक-प्राकार, विपत्ति में अभय देने वाले और शत्रुनाशक हैं। आनकदुन्दुभि (वसुदेव) को भली-भाँति सेना का अधिपति बनाकर
श्लोक 13 (2.36.13)
उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः । धनौघं पुरुषव्याघ्रो बलेन महता वृतः ॥
uccāvacamupādāya dharmarājāya mādhavaḥ | dhanaughaṃ puruṣavyāghro balena mahatā vṛtaḥ
पुरुषसिंह माधव विशाल सेना के साथ धर्मराज के लिए भाँति-भाँति का अपार धन लेकर आए।
श्लोक 14 (2.36.14)
तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम् । नादयन्रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥
taṃ dhanaughamaparyantaṃ ratnasāgaramakṣayam | nādayanrathaghoṣeṇa praviveśa purottamam
उस अपार धनराशि, रत्नों के अक्षय सागर के साथ, रथों के घोष से नगर को गुँजाते हुए उन्होंने उस श्रेष्ठ नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 15 (2.36.15)
पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् । असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना । कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम् ॥
pūrṇamāpūrayaṃsteṣāṃ dviṣacchokāvaho'bhavat | asūryamiva sūryeṇa nivātamiva vāyunā | kṛṣṇena samupetena jahṛṣe bhārataṃ puram
उनके कोष को लबालब भरकर वे शत्रुओं के लिए शोक का कारण बने। जैसे सूर्यहीन स्थान सूर्य से और वायुहीन स्थान पवन से प्रसन्न हो उठता है, वैसे ही कृष्ण के आगमन से भरतवंशियों का नगर हर्षित हो उठा।
श्लोक 16 (2.36.16)
तं मुदाऽभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि । स पृष्ट्वा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिरः ॥
taṃ mudā'bhisamāgamya satkṛtya ca yathāvidhi | sa pṛṣṭvā kuśalaṃ caiva sukhāsīnaṃ yudhiṣṭhiraḥ
युधिष्ठिर ने प्रसन्नतापूर्वक उनसे भेंट की, विधिपूर्वक उनका सत्कार किया और जब वे सुख से बैठ गए तो उनका कुशल-समाचार पूछा।
श्लोक 17 (2.36.17)
धौम्यद्वैपायनमुखैर्ऋत्विग्भिः पुरुषर्षभः । भीमार्जुनयमैश्चैव सहितः कृष्णमब्रवीत् ॥
dhaumyadvaipāyanamukhairṛtvigbhiḥ puruṣarṣabhaḥ | bhīmārjunayamaiścaiva sahitaḥ kṛṣṇamabravīt
फिर धौम्य और द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव के साथ उस पुरुषश्रेष्ठ ने कृष्ण से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (2.36.18)
त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते । धनं च बहु वार्ष्णेय त्वत्प्रसादादुपार्जितम् ॥
tvatkṛte pṛthivī sarvā madvaśe kṛṣṇa vartate | dhanaṃ ca bahu vārṣṇeya tvatprasādādupārjitam
हे कृष्ण, आपके कारण ही सारी पृथ्वी मेरे वश में है, और हे वार्ष्णेय, आपकी कृपा से ही बहुत-सा धन प्राप्त हुआ है।
श्लोक 19 (2.36.19)
सोऽहमिच्छामि तत्सर्वं विधिवद्देवकीसुत । उपयोक्तुं द्विजाग्र्येभ्यो हव्यवाहे च माधव ॥
so'hamicchāmi tatsarvaṃ vidhivaddevakīsuta | upayoktuṃ dvijāgryebhyo havyavāhe ca mādhava
हे देवकीनन्दन माधव, मैं चाहता हूँ कि उस सारे धन का विधिपूर्वक उपयोग श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिए और हव्य वहन करने वाली अग्नि में करूँ।
श्लोक 20 (2.36.20)
तदहं यष्टुमिच्छामि दाशार्ह सहितस्त्वया । अनुजैश्च महाबाहो तन्माऽनुज्ञातुमर्हसि ॥
tadahaṃ yaṣṭumicchāmi dāśārha sahitastvayā | anujaiśca mahābāho tanmā'nujñātumarhasi
हे दाशार्ह, मैं आपके और अपने छोटे भाइयों के साथ यज्ञ करना चाहता हूँ। हे महाबाहो, मुझे इसकी अनुमति दीजिए।
श्लोक 21 (2.36.21)
तद्दीक्षापय गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ॥
taddīkṣāpaya govinda tvamātmānaṃ mahābhuja | tvayīṣṭavati dāśārha vipāpmā bhavitā hyaham
अथवा हे महाबाहु गोविन्द, आप स्वयं यज्ञ की दीक्षा लीजिए; हे दाशार्ह, आपके यज्ञ कर लेने पर मैं भी निष्पाप हो जाऊँगा।
श्लोक 22 (2.36.22)
मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो । अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण प्राप्नुयां क्रतुमुत्तमम् ॥
māṃ vāpyabhyanujānīhi sahaibhiranujairvibho | anujñātastvayā kṛṣṇa prāpnuyāṃ kratumuttamam
अथवा हे प्रभो, इन भाइयों सहित मुझे अनुमति दीजिए; हे कृष्ण, आपकी अनुमति पाकर मैं इस उत्तम यज्ञ को सम्पन्न कर सकूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (2.36.23)
तं कृष्णः प्रत्युवाचेदं बहूक्त्वा गुणविस्तरम् । त्वमेव राजशार्दूल सम्राडर्हो महाक्रतुम् । सम्प्राप्नुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम् ॥
taṃ kṛṣṇaḥ pratyuvācedaṃ bahūktvā guṇavistaram | tvameva rājaśārdūla samrāḍarho mahākratum | samprāpnuhi tvayā prāpte kṛtakṛtyāstato vayam
कृष्ण ने उनके गुणों का विस्तार से बखान करके उत्तर दिया — "हे राजसिंह, आप ही सम्राट हैं और इस महायज्ञ के योग्य हैं। इसे सम्पन्न कीजिए; आपके इसे प्राप्त कर लेने पर हम भी कृतार्थ हो जाएँगे।
कृष्ण उवाच
श्लोक 24 (2.36.24)
यजस्वाभीप्सितं यज्ञं मयि श्रेयस्यवस्थिते । नियुङ्क्ष्व त्वं च मां कृत्ये सर्वं कर्तास्मि ते वचः ॥
yajasvābhīpsitaṃ yajñaṃ mayi śreyasyavasthite | niyuṅkṣva tvaṃ ca māṃ kṛtye sarvaṃ kartāsmi te vacaḥ
आप अपना अभीष्ट यज्ञ कीजिए; मैं आपके कल्याण के लिए तत्पर हूँ। मुझे भी किसी कार्य में लगाइए; आप जो कहेंगे, वह सब मैं करूँगा।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (2.36.25)
सफलः कृष्ण सङ्कल्पः सिद्धिश्च नियता मम । यस्य मे त्वं हृषीकेश यथेप्सितमुपस्थितः ॥
saphalaḥ kṛṣṇa saṅkalpaḥ siddhiśca niyatā mama | yasya me tvaṃ hṛṣīkeśa yathepsitamupasthitaḥ
हे कृष्ण, मेरा संकल्प सफल हो गया और मेरी सिद्धि निश्चित है, क्योंकि हे हृषीकेश, आप मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरे पास आ पहुँचे हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (2.36.26)
अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभिः सह । ईजितुं राजसूयेन साधनान्युपचक्रमे ॥
anujñātastu kṛṣṇena pāṇḍavo bhrātṛbhiḥ saha | ījituṃ rājasūyena sādhanānyupacakrame
कृष्ण की अनुमति पाकर पाण्डुपुत्र ने भाइयों के साथ राजसूय यज्ञ करने के लिए साधन जुटाने आरम्भ किए।
श्लोक 27 (2.36.27)
ततस्त्वाज्ञापयामास पाण्डवोऽरिनिबर्हणः । सहदेवं युधां श्रेष्ठं मन्त्रिणश्चैव सर्वशः ॥
tatastvājñāpayāmāsa pāṇḍavo'rinibarhaṇaḥ | sahadevaṃ yudhāṃ śreṣṭhaṃ mantriṇaścaiva sarvaśaḥ
तब शत्रुनाशक पाण्डुपुत्र ने योद्धाओं में श्रेष्ठ सहदेव और सभी मन्त्रियों को आज्ञा दी —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (2.36.28)
अस्मिन्क्रतौ यथोक्तानि यज्ञाङ्गानि द्विजातिभिः । यथोपकरणं सर्वं मङ्गलानि च सर्वशः ॥
asminkratau yathoktāni yajñāṅgāni dvijātibhiḥ | yathopakaraṇaṃ sarvaṃ maṅgalāni ca sarvaśaḥ
इस यज्ञ के लिए ब्राह्मणों द्वारा बताए गए यज्ञ के सभी अंग, आवश्यकतानुसार सारी सामग्री और सभी मंगल-द्रव्य,
श्लोक 29 (2.36.29)
अधियज्ञांश्च सम्भारान्धौम्योक्तान्क्षिप्रमेव हि । समानयन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम् ॥
adhiyajñāṃśca sambhārāndhaumyoktānkṣiprameva hi | samānayantu puruṣā yathāyogaṃ yathākramam
तथा धौम्य द्वारा बताई गई यज्ञ-सामग्री — लोग इन सबको यथायोग्य और क्रम से शीघ्र ले आएँ।
श्लोक 30 (2.36.30)
इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चार्जुनसारथिः । अन्नाद्याहरणे युक्ताः सन्तु मत्प्रियकाम्यया ॥
indraseno viśokaśca pūruścārjunasārathiḥ | annādyāharaṇe yuktāḥ santu matpriyakāmyayā
इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुन के सारथि पूरु मेरी प्रसन्नता के लिए अन्न आदि भोजन-सामग्री जुटाने के काम में लगें।
श्लोक 31 (2.36.31)
सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विताः । मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम ॥
sarvakāmāśca kāryantāṃ rasagandhasamanvitāḥ | manorathaprītikarā dvijānāṃ kurusattama
हे कुरुश्रेष्ठ, रस और सुगन्ध से युक्त सभी मनचाहे पदार्थ तैयार कराए जाएँ, जो ब्राह्मणों के मन को प्रसन्न करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (2.36.32)
तद्वाक्यसमकालं च कृतं सर्वं न्यवेदयत् । सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिष्ठिरे ॥
tadvākyasamakālaṃ ca kṛtaṃ sarvaṃ nyavedayat | sahadevo yudhāṃ śreṣṭho dharmarāje yudhiṣṭhire
आज्ञा मिलते ही योद्धाओं में श्रेष्ठ सहदेव ने धर्मराज युधिष्ठिर को सूचना दी कि सब कुछ हो चुका है।
श्लोक 33 (2.36.33)
ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विजः समुपानयत् । वेदानिव महाभागान्साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान् ॥
tato dvaipāyano rājannṛtvijaḥ samupānayat | vedāniva mahābhāgānsākṣānmūrtimato dvijān
हे राजन्, तब द्वैपायन व्यास ऋत्विजों को ले आए — वे महाभाग ब्राह्मण मानो साक्षात् मूर्तिमान वेद थे।
श्लोक 34 (2.36.34)
स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत्तस्य सत्यवतीसुतः । धनञ्जयानामृषभः सुसामा सामगोऽभवत् ॥
svayaṃ brahmatvamakarottasya satyavatīsutaḥ | dhanañjayānāmṛṣabhaḥ susāmā sāmago'bhavat
सत्यवतीनन्दन व्यास ने स्वयं ब्रह्मा का पद ग्रहण किया; धनञ्जय-गोत्रियों में श्रेष्ठ सुसामा साम-गान करने वाले (उद्गाता) बने।
श्लोक 35 (2.36.35)
याज्ञवल्क्यो बभूवाथ ब्रह्मिष्ठोऽध्वर्युसत्तमः । पैलो होता वसोः पुत्रो धौम्येन सहितोऽभवत् ॥
yājñavalkyo babhūvātha brahmiṣṭho'dhvaryusattamaḥ | pailo hotā vasoḥ putro dhaumyena sahito'bhavat
वेदनिष्ठों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य प्रमुख अध्वर्यु बने; वसु के पुत्र पैल धौम्य के साथ होता बने।
श्लोक 36 (2.36.36)
एतेषां पुत्रवर्गाश्च शिष्याश्च भरतर्षभ । बभूवुर्होत्रगाः सर्वे वेदवेदाङ्गपारगाः ॥
eteṣāṃ putravargāśca śiṣyāśca bharatarṣabha | babhūvurhotragāḥ sarve vedavedāṅgapāragāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, इनके पुत्र और शिष्य, जो सभी वेद-वेदाङ्गों के पारंगत थे, सहायक ऋत्विज बने।
श्लोक 37 (2.36.37)
ते वाचयित्वा पुण्याहमूहयित्वा च तं विधिम् । शास्त्रोक्तं पूजयामासुस्तद्देवयजनं महत् ॥
te vācayitvā puṇyāhamūhayitvā ca taṃ vidhim | śāstroktaṃ pūjayāmāsustaddevayajanaṃ mahat
पुण्याहवाचन कराकर और उस विधि पर विचार करके उन्होंने शास्त्रोक्त रीति से उस विशाल यज्ञभूमि का पूजन किया।
श्लोक 38 (2.36.38)
तत्र चक्रुरनुज्ञाताः शरणान्युत शिल्पिनः । गन्धवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम् ॥
tatra cakruranujñātāḥ śaraṇānyuta śilpinaḥ | gandhavanti viśālāni veśmānīva divaukasām
वहाँ आज्ञा पाकर शिल्पियों ने सुगन्धित और विशाल आवास बनाए, जो देवताओं के भवनों के समान थे।
श्लोक 39 (2.36.39)
तत आज्ञापयामास स राजा राजसत्तमः । सहदेवं तदा सद्यो मन्त्रिणं पुरुषर्षभः ॥
tata ājñāpayāmāsa sa rājā rājasattamaḥ | sahadevaṃ tadā sadyo mantriṇaṃ puruṣarṣabhaḥ
तब राजाओं में श्रेष्ठ उस पुरुषश्रेष्ठ राजा ने तुरंत अपने मन्त्री सहदेव को आज्ञा दी —
श्लोक 40 (2.36.40)
आमन्त्रणार्थं दूतांस्त्वं प्रेषयस्वाशुगान्द्रुतम् । उपश्रुत्य वचो राज्ञः स दूतान्प्राहिणोत्तदा ॥
āmantraṇārthaṃ dūtāṃstvaṃ preṣayasvāśugāndrutam | upaśrutya vaco rājñaḥ sa dūtānprāhiṇottadā
"निमन्त्रण के लिए शीघ्रगामी दूतों को तुरंत भेजो।" राजा का वचन सुनकर सहदेव ने तब दूतों को भेजा —
श्लोक 41 (2.36.41)
आमन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान्भूमिपानथ । विशश्च मान्याञ्शूद्रांश्च सर्वानानयतेति च ॥
āmantrayadhvaṃ rāṣṭreṣu brāhmaṇānbhūmipānatha | viśaśca mānyāñśūdrāṃśca sarvānānayateti ca
"सभी राष्ट्रों में ब्राह्मणों और भूमिपतियों को, सम्मानित वैश्यों और शूद्रों को निमन्त्रण दो — सबको ले आओ।"
श्लोक 42 (2.36.42)
ते सर्वान्पृथिवीपालान्पाण्डवेयस्य शासनात् । आमन्त्रयाम्बभूवुस्ते प्रेषयामास चापरान् ॥
te sarvānpṛthivīpālānpāṇḍaveyasya śāsanāt | āmantrayāmbabhūvuste preṣayāmāsa cāparān
पाण्डुपुत्र की आज्ञा से दूतों ने पृथ्वी के सभी राजाओं को निमन्त्रित किया, और सहदेव ने और भी दूत भेजे।
श्लोक 43 (2.36.43)
दूताश्च वाहनैर्जग्मू राष्ट्राणि सुबहून्यपि । ततो युधिष्ठिरो राजा प्रेषयामास पाण्डवम् ॥
dūtāśca vāhanairjagmū rāṣṭrāṇi subahūnyapi | tato yudhiṣṭhiro rājā preṣayāmāsa pāṇḍavam
दूत वाहनों पर सवार होकर बहुत-से राष्ट्रों में गए। तब राजा युधिष्ठिर ने पाण्डुपुत्र
श्लोक 44 (2.36.44)
नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय भरतर्षभ । द्रोणाय धृतराष्ट्राय विदुराय कृपाय च । भ्रातृणां चैव सर्वेषां येऽनुरक्ता युधिष्ठिरे ॥
nakulaṃ hāstinapuraṃ bhīṣmāya bharatarṣabha | droṇāya dhṛtarāṣṭrāya vidurāya kṛpāya ca | bhrātṛṇāṃ caiva sarveṣāṃ ye'nuraktā yudhiṣṭhire
नकुल को, हे भरतश्रेष्ठ, हस्तिनापुर भेजा — भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विदुर और कृप के लिए, तथा उन सब भाइयों के लिए जो युधिष्ठिर से स्नेह रखते थे।
श्लोक 45 (2.36.45)
ततस्ते तु यथाकालं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । दीक्षयाञ्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत ॥
tataste tu yathākālaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | dīkṣayāñcakrire viprā rājasūyāya bhārata
तब हे भारत, ब्राह्मणों ने उचित समय पर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ की दीक्षा दी।
श्लोक 46 (2.36.46)
ज्येष्ठामूले अमावास्यां मृगाजिनसमावृतः । रौरवाजिनसंवीतो नवनीताक्तदेहवान् ॥
jyeṣṭhāmūle amāvāsyāṃ mṛgājinasamāvṛtaḥ | rauravājinasaṃvīto navanītāktadehavān
ज्येष्ठ मास की अमावस्या को, कृष्णमृग का चर्म ओढ़े, रुरु मृग का चर्म लपेटे और शरीर पर नवनीत का लेप किए हुए
श्लोक 47 (2.36.47)
दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः । जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रैः सहस्रशः ॥
dīkṣitaḥ sa tu dharmātmā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | jagāma yajñāyatanaṃ vṛto vipraiḥ sahasraśaḥ
दीक्षित हुए धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर हज़ारों ब्राह्मणों से घिरे हुए यज्ञशाला में गए,
श्लोक 48 (2.36.48)
भ्रातृभिर्ज्ञातिभिश्चैव सुहृद्भिः सचिवैः सह । क्षत्रियैश्च मनुष्येन्द्रैर्नानादेशसमागतैः ॥
bhrātṛbhirjñātibhiścaiva suhṛdbhiḥ sacivaiḥ saha | kṣatriyaiśca manuṣyendrairnānādeśasamāgataiḥ
अपने भाइयों, बन्धु-बान्धवों, मित्रों और सचिवों के साथ, अनेक देशों से आए क्षत्रिय नरेशों
श्लोक 49 (2.36.49)
अमात्यैश्च नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव । आजग्मुर्ब्राह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्ततः ॥
amātyaiśca naraśreṣṭho dharmo vigrahavāniva | ājagmurbrāhmaṇāstatra viṣayebhyastatastataḥ
और मन्त्रियों के साथ वे नरश्रेष्ठ मानो देहधारी धर्म थे। विभिन्न देशों से वहाँ ब्राह्मण आए,
श्लोक 50 (2.36.50)
सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाङ्गपारगाः । तेषामावसथांश्चक्रुर्धर्मराजस्य शासनात् ॥
sarvavidyāsu niṣṇātā vedavedāṅgapāragāḥ | teṣāmāvasathāṃścakrurdharmarājasya śāsanāt
जो सभी विद्याओं में निपुण और वेद-वेदाङ्गों के पारंगत थे। धर्मराज की आज्ञा से उनके लिए आवास बनाए गए,
श्लोक 51 (2.36.51)
बह्वन्नाच्छादनैर्युक्तान्सगणानां पृथक् पृथक् । सर्वर्तुगुणसम्पन्नाञ्शिल्पिनोऽथ सहस्रशः ॥
bahvannācchādanairyuktānsagaṇānāṃ pṛthak pṛthak | sarvartuguṇasampannāñśilpino'tha sahasraśaḥ
जो प्रचुर अन्न और वस्त्रों से युक्त थे, प्रत्येक समूह के लिए उसके अनुचरों सहित अलग-अलग थे और सभी ऋतुओं की सुविधाओं से सम्पन्न थे; उन्हें हज़ारों शिल्पियों ने बनाया।
श्लोक 52 (2.36.52)
तेषु ते न्यवसन्राजन्ब्राह्मणा नृपसत्कृताः । कथयन्तः कथा बह्वीः पश्यन्तो नटनर्तकान् ॥
teṣu te nyavasanrājanbrāhmaṇā nṛpasatkṛtāḥ | kathayantaḥ kathā bahvīḥ paśyanto naṭanartakān
हे राजन्, राजा से सम्मानित वे ब्राह्मण वहाँ रहते हुए अनेक कथाएँ कहते और नटों तथा नर्तकों का खेल देखते थे।
श्लोक 53 (2.36.53)
भुञ्जतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वनः । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् ॥
bhuñjatāṃ caiva viprāṇāṃ vadatāṃ ca mahāsvanaḥ | aniśaṃ śrūyate tatra muditānāṃ mahātmanām
भोजन करते और वार्तालाप करते उन प्रसन्नचित्त महात्मा ब्राह्मणों का भारी कोलाहल वहाँ दिन-रात सुनाई देता था।
श्लोक 54 (2.36.54)
दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवम्प्रकाराः सञ्जल्पाः श्रूयन्ते स्मात्र नित्यशः ॥
dīyatāṃ dīyatāmeṣāṃ bhujyatāṃ bhujyatāmiti | evamprakārāḥ sañjalpāḥ śrūyante smātra nityaśaḥ
"इन्हें दो, दो! खाइए, खाइए!" — ऐसी पुकारें वहाँ निरन्तर सुनाई देती थीं।
श्लोक 55 (2.36.55)
गवां शतसहस्राणि शयनानां च भारत । रुक्मस्य योषितां चैव धर्मराजः पृथक् ददौ ॥
gavāṃ śatasahasrāṇi śayanānāṃ ca bhārata | rukmasya yoṣitāṃ caiva dharmarājaḥ pṛthak dadau
हे भारत, धर्मराज ने लाखों गौएँ, शय्याएँ, सोना और कन्याएँ अलग-अलग दान कीं।
श्लोक 56 (2.36.56)
प्रावर्ततैव यज्ञः स पाण्डवस्य महात्मनः । पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे ॥
prāvartataiva yajñaḥ sa pāṇḍavasya mahātmanaḥ | pṛthivyāmekavīrasya śakrasyeva triviṣṭape
इस प्रकार पृथ्वी के अद्वितीय वीर महात्मा पाण्डुपुत्र का वह यज्ञ वैसे ही चल पड़ा, जैसे स्वर्ग में इन्द्र का यज्ञ।