सभा पर्व · अध्याय 35
नकुल की पश्चिम-दिग्विजय
वैशम्पायन नकुल के पश्चिमी अभियान का वर्णन करते हैं — उस दिशा का, जिसे कभी वासुदेव ने जीता था। विशाल सेना के साथ खाण्डवप्रस्थ से निकलकर नकुल रोहीतक, मरुभूमि, शैरीषक और महेत्थ को जीतते हैं, राजर्षि आक्रोश से युद्ध करते हैं और दशार्ण, शिबि, त्रिगर्त से लेकर सरस्वती-तट के आभीरों, पञ्चनद प्रदेश और सुदूर पश्चिम के राजाओं तक अनेक जातियों को वश में करते हैं। उनके मामा मद्रराज शल्य प्रेमवश अधीनता स्वीकार करते हैं, समुद्र-तट के भयंकर म्लेच्छ गण पराजित होते हैं, और नकुल दस हज़ार ऊँटों पर लदा धन लेकर इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के पास लौटते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.35.1)
नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा । वासुदेवजितामाशां यथाऽसावजयत्प्रभुः ॥
nakulasya tu vakṣyāmi karmāṇi vijayaṃ tathā | vāsudevajitāmāśāṃ yathā'sāvajayatprabhuḥ
अब मैं नकुल के पराक्रम और उनकी विजय का वर्णन करूँगा — कि उस समर्थ वीर ने उस दिशा को कैसे जीता, जिसे पहले वासुदेव जीत चुके थे।
श्लोक 2 (2.35.2)
निर्याय खाण्डवप्रस्थात्प्रतीचीमभितो दिशम् । उद्दिश्य मतिमान्प्रायान्महत्या सेनया सह ॥
niryāya khāṇḍavaprasthātpratīcīmabhito diśam | uddiśya matimānprāyānmahatyā senayā saha
खाण्डवप्रस्थ से निकलकर बुद्धिमान नकुल विशाल सेना के साथ पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (2.35.3)
सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च । रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन्वसुधामिमाम् ॥
siṃhanādena mahatā yodhānāṃ garjitena ca | rathanemininādaiśca kampayanvasudhāmimām
योद्धाओं के प्रचण्ड सिंहनाद और गर्जना तथा रथों के पहियों की घरघराहट से वे इस पृथ्वी को कँपाते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 4 (2.35.4)
ततो बहु धनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् । कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत् ॥
tato bahu dhanaṃ ramyaṃ gavāḍhyaṃ dhanadhānyavat | kārtikeyasya dayitaṃ rohītakamupādravat
फिर उन्होंने रोहीतक पर धावा बोला — जो बड़ा धनी और रमणीय देश था, गौओं, धन और अन्न से भरपूर, और कार्तिकेय को प्रिय था।
श्लोक 5 (2.35.5)
तत्र युद्धं महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकैः । मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥
tatra yuddhaṃ mahaccāsīcchūrairmattamayūrakaiḥ | marubhūmiṃ sa kārtsnyena tathaiva bahudhānyakam
वहाँ वीर मत्तमयूरकों के साथ भारी युद्ध हुआ। फिर समूची मरुभूमि को, और बहुधान्यक को भी,
श्लोक 6 (2.35.6)
शैरीषकं महेत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः । आक्रोशं चैव राजर्षिं तेन युद्धमभून्महत् ॥
śairīṣakaṃ mahetthaṃ ca vaśe cakre mahādyutiḥ | ākrośaṃ caiva rājarṣiṃ tena yuddhamabhūnmahat
तथा शैरीषक और महेत्थ को उस तेजस्वी वीर ने अपने वश में कर लिया। राजर्षि आक्रोश के साथ भी उनका बड़ा युद्ध हुआ।
श्लोक 7 (2.35.7)
तान्दशार्णान्स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः । शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठान्मालवान्पञ्च कर्पटान् ॥
tāndaśārṇānsa jitvā ca pratasthe pāṇḍunandanaḥ | śibīṃstrigartānambaṣṭhānmālavānpañca karpaṭān
दशार्णों को जीतकर पाण्डुनन्दन आगे बढ़े और उन्होंने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पञ्चकर्पट,
श्लोक 8 (2.35.8)
तथा मध्यमकेयांश्च वाटधानान्द्विजानथ । पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः ॥
tathā madhyamakeyāṃśca vāṭadhānāndvijānatha | punaśca parivṛtyātha puṣkarāraṇyavāsinaḥ
मध्यमकेय और वाटधान ब्राह्मणों को जीत लिया। फिर लौटकर उस पुरुषश्रेष्ठ ने पुष्करारण्य के निवासियों को
श्लोक 9 (2.35.9)
गणानुत्सवसङ्केतान्व्यजयत्पुरुषर्षभः । सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः ॥
gaṇānutsavasaṅketānvyajayatpuruṣarṣabhaḥ | sindhukūlāśritā ye ca grāmaṇīyā mahābalāḥ
और उत्सवसंकेत गणों को भी जीत लिया। सिन्धु के तटों पर बसे महाबली ग्रामणीय,
श्लोक 10 (2.35.10)
शूराऽऽभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् । वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिनः ॥
śūrā''bhīragaṇāścaiva ye cāśritya sarasvatīm | vartayanti ca ye matsyairye ca parvatavāsinaḥ
वीर आभीरों के गण, सरस्वती के किनारे बसने वाले, मछलियों से जीविका चलाने वाले और पर्वतों में रहने वाले लोग,
श्लोक 11 (2.35.11)
कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम् । उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम् ॥
kṛtsnaṃ pañcanadaṃ caiva tathaivāmaraparvatam | uttarajyotiṣaṃ caiva tathā divyakaṭaṃ puram
समूचा पञ्चनद प्रदेश, अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष और दिव्यकट नगर,
श्लोक 12 (2.35.12)
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः । रामठान्हारहूणांश्च प्रतीच्याश्चैव ये नृपाः ॥
dvārapālaṃ ca tarasā vaśe cakre mahādyutiḥ | rāmaṭhānhārahūṇāṃśca pratīcyāścaiva ye nṛpāḥ
तथा द्वारपाल को भी उस तेजस्वी वीर ने वेग से वश में कर लिया। रामठ, हारहूण और पश्चिम के जो राजा थे,
श्लोक 13 (2.35.13)
तान्सर्वान्स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः । तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत ॥
tānsarvānsa vaśe cakre śāsanādeva pāṇḍavaḥ | tatrasthaḥ preṣayāmāsa vāsudevāya bhārata
उन सबको पाण्डुपुत्र ने केवल आज्ञा से ही अपने अधीन कर लिया। वहीं रहते हुए, हे भारत, उन्होंने वासुदेव के पास संदेश भेजा,
श्लोक 14 (2.35.14)
स चास्य गतभी राजन्प्रतिजग्राह शासनम् । ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम् ॥
sa cāsya gatabhī rājanpratijagrāha śāsanam | tataḥ śākalamabhyetya madrāṇāṃ puṭabhedanam
और उन्होंने, हे राजन्, निर्भय होकर उसका शासन स्वीकार कर लिया। फिर मद्रों की राजधानी शाकल पहुँचकर
श्लोक 15 (2.35.15)
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली । स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्कारार्हो विशाम्पते ॥
mātulaṃ prītipūrveṇa śalyaṃ cakre vaśe balī | sa tena satkṛto rājñā satkārārho viśāmpate
उस बलवान ने अपने मामा शल्य को प्रेमपूर्वक अपने वश में कर लिया। हे प्रजानाथ, सत्कार के योग्य नकुल का उस राजा ने भली-भाँति सत्कार किया,
श्लोक 16 (2.35.16)
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधां पतिः । ततः सागरकुक्षिस्थान्म्लेच्छान्परमदारुणान् ॥
ratnāni bhūrīṇyādāya sampratasthe yudhāṃ patiḥ | tataḥ sāgarakukṣisthānmlecchānparamadāruṇān
और योद्धाओं के स्वामी नकुल बहुत-से रत्न लेकर आगे चल पड़े। फिर समुद्र के तटवर्ती प्रदेशों में बसे अत्यन्त भयंकर म्लेच्छों,
श्लोक 17 (2.35.17)
पह्लवान्वर्बरांश्चैव किरातान्यवनाञ्शकान् । ततो रत्नान्यपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् । न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित् ॥
pahlavānvarbarāṃścaiva kirātānyavanāñśakān | tato ratnānyapādāya vaśe kṛtvā ca pārthivān | nyavartata kuruśreṣṭho nakulaścitramārgavit
पह्लवों, बर्बरों, किरातों, यवनों और शकों को भी उन्होंने जीत लिया। फिर रत्न लेकर और राजाओं को वश में करके, युद्ध के विचित्र मार्गों के ज्ञाता कुरुश्रेष्ठ नकुल लौट पड़े।
श्लोक 18 (2.35.18)
करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः । ऊहुर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम् ॥
karabhāṇāṃ sahasrāṇi kośaṃ tasya mahātmanaḥ | ūhurdaśa mahārāja kṛcchrādiva mahādhanam
हे महाराज, दस हज़ार ऊँट उस महात्मा का कोष ढोकर लाए; उस विशाल धन को वे मानो बड़ी कठिनाई से ढो पा रहे थे।
श्लोक 19 (2.35.19)
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् । ततो माद्रीसुतः श्रीमान्धनं तस्मै न्यवेदयत् ॥
indraprasthagataṃ vīramabhyetya sa yudhiṣṭhiram | tato mādrīsutaḥ śrīmāndhanaṃ tasmai nyavedayat
इन्द्रप्रस्थ में वीर युधिष्ठिर के पास पहुँचकर श्रीमान माद्रीपुत्र ने वह सारा धन उन्हें अर्पित कर दिया।
श्लोक 20 (2.35.20)
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् । प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ ॥
evaṃ vijitya nakulo diśaṃ varuṇapālitām | pratīcīṃ vāsudevena nirjitāṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार नकुल ने वरुण द्वारा रक्षित वह पश्चिम दिशा जीत ली, जिसे पहले वासुदेव जीत चुके थे।