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सभा पर्व · अध्याय 34

लंका में विभीषण के पास घटोत्कच का दूत-कार्य

दक्षिणी समुद्र-तट पर डेरा डाले सहदेव अपने भतीजे घटोत्कच का स्मरण करता है; वह तुरन्त प्रकट होता है और राजसूय के लिए विभीषण से कर माँगने लंका भेजा जाता है। घटोत्कच राम-सेतु को देखते हुए समुद्र पार करता है, विभीषण की भव्य सभा में पहुँचता है और उन्हें पाण्डवों तथा उनकी विजयों का परिचय देता है। विभीषण इसे श्रीकृष्ण की इच्छा मानकर कर देना स्वीकार करते हैं और अठासी हजार राक्षसों के हाथ विपुल रत्न भेजते हैं; सहदेव उन्हें लेकर इन्द्रप्रस्थ लौटता है और युधिष्ठिर को अर्पित करता है।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.34.1)

सहदेवस्ततो राजा मन्त्रिभिः सह भारत । सम्प्रधार्य महाबाहुः सचिवैर्बुद्धिमत्तरैः ॥

sahadevastato rājā mantribhiḥ saha bhārata | sampradhārya mahābāhuḥ sacivairbuddhimattaraiḥ

हे भारत, तब राजा सहदेव ने मन्त्रियों के साथ विचार किया; उस महाबाहु ने अपने सबसे बुद्धिमान सचिवों के साथ मन्त्रणा की।

श्लोक 2 (2.34.2)

स विचार्य तदा राजन्सहदेवस्त्वरान्वितः । चिन्तयामास राजेन्द्र भ्रातुः पुत्रं घटोत्कचम् ॥

sa vicārya tadā rājansahadevastvarānvitaḥ | cintayāmāsa rājendra bhrātuḥ putraṃ ghaṭotkacam

हे राजन्, विचार करके सहदेव ने शीघ्रता से, हे राजेन्द्र, अपने भाई के पुत्र घटोत्कच का स्मरण किया।

श्लोक 3 (2.34.3)

ततश्चिन्तितमात्रे तु राक्षसः प्रत्यदृश्यत । अतिदीर्घो महाबाहुः सर्वाभरणभूषितः ॥

tataścintitamātre tu rākṣasaḥ pratyadṛśyata | atidīrgho mahābāhuḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ

स्मरण करते ही वह राक्षस प्रकट हो गया: अत्यन्त लम्बा, महाबाहु, सब प्रकार के आभूषणों से सजा हुआ,

श्लोक 4 (2.34.4)

नीलजीमूतसङ्काशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः । विचित्रहारकेयूरः किङ्किणीमणिभूषितः ॥

nīlajīmūtasaṅkāśastaptakāñcanakuṇḍalaḥ | vicitrahārakeyūraḥ kiṅkiṇīmaṇibhūṣitaḥ

नीले मेघ के समान श्याम, तपाए हुए सोने के कुण्डल पहने, रंग-बिरंगे हारों और बाजूबन्दों से युक्त, घुँघरुओं और मणियों से विभूषित,

श्लोक 5 (2.34.5)

हेममाली महादंष्ट्रः किरीटी कुक्षिबन्धनः । ताम्रकेशो हरिश्मश्रुर्भीमाङ्गः कटकाङ्गदः ॥

hemamālī mahādaṃṣṭraḥ kirīṭī kukṣibandhanaḥ | tāmrakeśo hariśmaśrurbhīmāṅgaḥ kaṭakāṅgadaḥ

सोने की माला पहने, बड़े-बड़े दाँतों वाला, किरीटधारी, कमर में पेटी बाँधे, ताँबे जैसे लाल केशों और भूरी दाढ़ी वाला, भयंकर शरीर वाला, कड़े और बाजूबन्द पहने,

श्लोक 6 (2.34.6)

रक्तचन्दनदिग्धाङ्गः सूक्ष्माम्बरधरो बली । बलेन स ययौ तत्र चालयन्निव मेदिनीम् ॥

raktacandanadigdhāṅgaḥ sūkṣmāmbaradharo balī | balena sa yayau tatra cālayanniva medinīm

लाल चन्दन से लिपे अंगों वाला और महीन वस्त्र पहने। वह बलवान अपने बल से मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ वहाँ आया।

श्लोक 7 (2.34.7)

ततो दृष्ट्वा जना राजन्नायान्तं पर्वतोपमम् । भयाद्धि दुद्रुवुः सर्वे सिंहात्क्षुद्रमृगा यथा ॥

tato dṛṣṭvā janā rājannāyāntaṃ parvatopamam | bhayāddhi dudruvuḥ sarve siṃhātkṣudramṛgā yathā

हे राजन्, उसे पर्वत के समान आते देखकर सब लोग भय से ऐसे भाग खड़े हुए जैसे सिंह से छोटे पशु भागते हैं।

श्लोक 8 (2.34.8)

आससाद च माद्रेयं पुलस्त्यं रावणो यथा । अभिवाद्य ततो राजन्सहदेवं घटोत्कचः ॥

āsasāda ca mādreyaṃ pulastyaṃ rāvaṇo yathā | abhivādya tato rājansahadevaṃ ghaṭotkacaḥ

वह माद्रीपुत्र के पास वैसे ही आया जैसे रावण पुलस्त्य के पास आता था। तब हे राजन्, घटोत्कच ने सहदेव को प्रणाम किया,

श्लोक 9 (2.34.9)

प्रह्वः कृताञ्जलिस्तस्थौ किं कार्यमिति चाब्रवीत् । तं परिष्वज्य बाहुभ्यां मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवः ॥

prahvaḥ kṛtāñjalistasthau kiṃ kāryamiti cābravīt | taṃ pariṣvajya bāhubhyāṃ mūrdhnyupāghrāya pāṇḍavaḥ

और हाथ जोड़कर विनीत भाव से खड़ा होकर बोला, "क्या कार्य है?" पाण्डुपुत्र ने उसे दोनों भुजाओं में भरकर गले लगाया और उसका मस्तक सूँघा।

श्लोक 10 (2.34.10)

तं मेरुशिखराकारमागतं पाण्डुनन्दनः । पूजयित्वा सहामात्यः प्रीतो वाक्यमुवाच ह ॥

taṃ meruśikharākāramāgataṃ pāṇḍunandanaḥ | pūjayitvā sahāmātyaḥ prīto vākyamuvāca ha

मेरु के शिखर जैसे विशाल उस आए हुए घटोत्कच का सत्कार करके पाण्डुनन्दन ने मन्त्रियों के साथ प्रसन्न होकर यह वचन कहा:

सहदेव उवाच

श्लोक 11 (2.34.11)

गच्छ लङ्कां पुरीं वत्स करार्थं मम शासनात् । तत्र दृष्ट्वा महात्मानं राक्षसेन्द्रं बिभीषणम् ॥

gaccha laṅkāṃ purīṃ vatsa karārthaṃ mama śāsanāt | tatra dṛṣṭvā mahātmānaṃ rākṣasendraṃ bibhīṣaṇam

वत्स, मेरी आज्ञा से कर लेने के लिए लंकापुरी जाओ। वहाँ महात्मा राक्षसराज विभीषण से मिलकर,

श्लोक 12 (2.34.12)

रत्नानि राजसूयार्थं विविधानि बहूनि च । उपादाय च सर्वाणि प्रत्यागच्छ महाबल ॥

ratnāni rājasūyārthaṃ vividhāni bahūni ca | upādāya ca sarvāṇi pratyāgaccha mahābala

राजसूय के लिए अनेक प्रकार के बहुत-से रत्न लेकर, हे महाबली, उन सब के साथ लौट आओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (2.34.13)

पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः । तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ॥

pāṇḍavenaivamuktastu mudā yukto ghaṭotkacaḥ | tathetyuktvā mahārāja pratasthe dakṣiṇāṃ diśam

पाण्डुपुत्र के ऐसा कहने पर घटोत्कच आनन्द से भर गया। "ऐसा ही हो" कहकर, हे महाराज, वह दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा।

श्लोक 14 (2.34.14)

प्रययौ दक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः । लङ्कामभिमुखो राजन्समुद्रं स व्यलोकयत् ॥

prayayau dakṣiṇaṃ kṛtvā sahadevaṃ ghaṭotkacaḥ | laṅkāmabhimukho rājansamudraṃ sa vyalokayat

सहदेव की प्रदक्षिणा करके घटोत्कच चल पड़ा। हे राजन्, लंका की ओर मुख करके उसने समुद्र को देखा,

श्लोक 15 (2.34.15)

कूर्मग्राहझषाकीर्णं मीननक्रैस्तथाऽऽकुलम् । शुक्तिव्रातसमाकीर्णं शङ्खानां निचयाकुलम् ॥

kūrmagrāhajhaṣākīrṇaṃ mīnanakraistathā''kulam | śuktivrātasamākīrṇaṃ śaṅkhānāṃ nicayākulam

जो कछुओं, घड़ियालों और मछलियों से भरा था, मीनों और नक्रों से व्याप्त था, सीपियों के समूहों से भरा और शंखों के ढेरों से युक्त था।

श्लोक 16 (2.34.16)

स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन्रामविक्रमम् । गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः ॥

sa dṛṣṭvā rāmasetuṃ ca cintayanrāmavikramam | gatvā pāraṃ samudrasya dakṣiṇaṃ sa ghaṭotkacaḥ

राम-सेतु को देखकर और राम के पराक्रम का चिन्तन करते हुए घटोत्कच समुद्र के दक्षिणी पार पहुँचा,

श्लोक 17 (2.34.17)

ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम् । प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम् ॥

dadarśa laṅkāṃ rājendra nākapṛṣṭhopamāṃ śubhām | prākāreṇāvṛtāṃ ramyāṃ śubhadvāraiśca śobhitām

और हे राजेन्द्र, उसने स्वर्ग के समान सुन्दर लंका को देखा, जो रमणीय परकोटे से घिरी और सुन्दर द्वारों से सुशोभित थी,

श्लोक 18 (2.34.18)

प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च सङ्कुलाम् । दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादामुद्यानवनशोभिताम् ॥

prāsādairbahusāhasraiḥ śvetaraktaiśca saṅkulām | divyadundubhinirhrādāmudyānavanaśobhitām

जो हजारों श्वेत और लाल भवनों से भरी थी, दिव्य दुन्दुभियों के नाद से गूँजती थी और उद्यानों तथा वनों से शोभित थी,

श्लोक 19 (2.34.19)

सर्वकालफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम् । पुष्पगन्धैश्च सङ्कीर्णां रमणीयमहारथाम् ॥

sarvakālaphalairvṛkṣaiḥ puṣpitairupaśobhitām | puṣpagandhaiśca saṅkīrṇāṃ ramaṇīyamahārathām

जो सब ऋतुओं में फल देने वाले फूले वृक्षों से सुशोभित थी, फूलों की सुगन्ध से भरी थी और जिसमें सुन्दर बड़े-बड़े रथ थे,

श्लोक 20 (2.34.20)

नानारत्नैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम् । विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम् ॥

nānāratnaiśca sampūrṇāmindrasyevāmarāvatīm | viveśa sa purīṃ laṅkāṃ rākṣasaiśca niṣevitām

जो नाना प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण इन्द्र की अमरावती जैसी थी। वह राक्षसों से बसी लंकापुरी में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 21 (2.34.21)

ददर्श राक्षसव्राताञ्शूलप्रासधरान्बहून् । नानावेषधरान्दक्षान्नारीश्च प्रियदर्शनाः ॥

dadarśa rākṣasavrātāñśūlaprāsadharānbahūn | nānāveṣadharāndakṣānnārīśca priyadarśanāḥ

उसने शूल और प्रास धारण किए बहुत-से राक्षसों के झुंड देखे, जो नाना वेष धारण किए हुए और कुशल थे, और देखने में सुन्दर स्त्रियाँ भी,

श्लोक 22 (2.34.22)

दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्यभूषणभूषिताः । मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः ॥

divyamālyāmbaradharā divyabhūṣaṇabhūṣitāḥ | madaraktāntanayanāḥ pīnaśroṇipayodharāḥ

जो दिव्य मालाएँ और वस्त्र पहने, दिव्य आभूषणों से सजी थीं, जिनकी आँखों के कोने मद से लाल थे, और जो भरे नितम्बों तथा उन्नत स्तनों वाली थीं।

श्लोक 23 (2.34.23)

भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः । आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम् ॥

bhaimaseniṃ tato dṛṣṭvā hṛṣṭāste vismayaṃ gatāḥ | āsasāda gṛhaṃ rājña indrasya sadanopamam

भीमसेन के पुत्र को देखकर वे प्रसन्न और विस्मित हुए। वह राजा के भवन पर पहुँचा, जो इन्द्र के महल जैसा था।

श्लोक 24 (2.34.24)

स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥

sa dvārapālamāsādya vākyametaduvāca ha

द्वारपाल के पास जाकर उसने यह वचन कहा:

घटोत्कच उवाच

श्लोक 25 (2.34.25)

कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः ॥

kurūṇāmṛṣabho rājā pāṇḍurnāma mahābalaḥ

"कुरुओं में श्रेष्ठ एक राजा थे, महाबली पाण्डु नाम के।

श्लोक 26 (2.34.26)

कनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः । तेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च ॥

kanīyāṃstasya dāyādaḥ sahadeva iti śrutaḥ | tenāhaṃ preṣito dūtaḥ karārthaṃ kauravasya ca

उनका सबसे छोटा पुत्र सहदेव नाम से प्रसिद्ध है। उसी ने मुझे कौरव (युधिष्ठिर) के लिए कर माँगने को दूत बनाकर भेजा है।

श्लोक 27 (2.34.27)

द्रष्टुमिच्छामि राजेन्द्रं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय ॥

draṣṭumicchāmi rājendraṃ tvaṃ kṣipraṃ māṃ nivedaya

मैं तुम्हारे राजा से मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र मेरे आने की सूचना दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (2.34.28)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā dvārapālo mahīpate

हे पृथ्वीपति, उसकी यह बात सुनकर द्वारपाल ने

श्लोक 29 (2.34.29)

तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः । प्राञ्जलिः सर्वमाचष्ट सर्वां दूतगिरं तदा ॥

tathetyuktvā viveśātha bhavanaṃ sa nivedakaḥ | prāñjaliḥ sarvamācaṣṭa sarvāṃ dūtagiraṃ tadā

"ठीक है" कहकर सूचना देने के लिए भवन में प्रवेश किया, और हाथ जोड़कर दूत की सारी बात कह सुनाई।

श्लोक 30 (2.34.30)

द्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः । उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपं मे प्रवेश्यताम् ॥

dvārapālavacaḥ śrutvā rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ | uvāca vākyaṃ dharmātmā samīpaṃ me praveśyatām

द्वारपाल की बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ।"

श्लोक 31 (2.34.31)

एवमुक्तस्तु राज्ञा स धर्मज्ञेन महात्मना । अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वार्स्थो हैडिम्बमब्रवीत् ॥

evamuktastu rājñā sa dharmajñena mahātmanā | atha niṣkramya sambhrānto dvārstho haiḍimbamabravīt

धर्मज्ञ महात्मा राजा के ऐसा कहने पर द्वारपाल हड़बड़ी में बाहर निकला और हिडिम्बा के पुत्र से बोला,

श्लोक 32 (2.34.32)

एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम् । द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः ॥

ehi dūta nṛpaṃ draṣṭuṃ kṣipraṃ praviśa ca svayam | dvārapālavacaḥ śrutvā praviveśa ghaṭotkacaḥ

"आओ दूत, राजा से मिलने के लिए स्वयं शीघ्र भीतर चलो।" द्वारपाल की बात सुनकर घटोत्कच भीतर गया।

श्लोक 33 (2.34.33)

स प्रविश्य ददर्शाथ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम् । ततः कैलाससङ्काशं तप्तकाञ्चनतोरणम् ॥

sa praviśya dadarśātha rākṣasendrasya mandiram | tataḥ kailāsasaṅkāśaṃ taptakāñcanatoraṇam

भीतर जाकर उसने राक्षसराज का भवन देखा, जो कैलास पर्वत के समान था और जिसके तोरण तपाए हुए सोने के थे,

श्लोक 34 (2.34.34)

प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम् । हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नोपशोभितम् ॥

prākāreṇa parikṣiptaṃ gopuraiścāpi śobhitam | harmyaprāsādasambādhaṃ nānāratnopaśobhitam

जो परकोटे से घिरा था, गोपुरों से सुशोभित था, अटारियों और प्रासादों से भरा था और नाना रत्नों से सजा था,

श्लोक 35 (2.34.35)

काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि । वज्रवैडूर्यजुष्टैश्च स्तम्भैश्च सुमनोहरैः ॥

kāñcanaistāpanīyaiśca sphāṭikai rājatairapi | vajravaiḍūryajuṣṭaiśca stambhaiśca sumanoharaiḥ

जिसमें सोने, तपाए हुए स्वर्ण, स्फटिक और चाँदी के, हीरों और वैदूर्य से जड़े अत्यन्त मनोहर खम्भे थे,

श्लोक 36 (2.34.36)

नानाध्वजपताकाभिर्युक्तं मणिविचित्रितम् । चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ॥

nānādhvajapatākābhiryuktaṃ maṇivicitritam | citramālyāvṛtaṃ ramyaṃ taptakāñcanavedikam

जो नाना प्रकार की ध्वजाओं और पताकाओं से युक्त, मणियों से चित्रित, रंग-बिरंगी मालाओं से ढका, रमणीय और तपाए सोने की वेदियों वाला था।

श्लोक 37 (2.34.37)

स दृष्ट्वा तत्र सर्वं च भैमसेनिर्मनोहरम् । प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मधुरस्वरम् ॥

sa dṛṣṭvā tatra sarvaṃ ca bhaimasenirmanoharam | praviśanneva haiḍimbaḥ śuśrāva madhurasvaram

वहाँ वह सब मनोहर दृश्य देखकर भीमसेन के पुत्र हैडिम्ब ने भीतर प्रवेश करते ही एक मधुर स्वर सुना:

श्लोक 38 (2.34.38)

तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालमिताक्षरम् । दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादं वादित्रसततं शुभम् ॥

tantrīgītasamākīrṇaṃ samatālamitākṣaram | divyadundubhinirhrādaṃ vāditrasatataṃ śubham

वीणा के साथ गाया जाता गीत, सम ताल और नपे-तुले अक्षरों में, दिव्य दुन्दुभियों का नाद और वाद्यों का निरन्तर बजता सुन्दर संगीत।

श्लोक 39 (2.34.39)

स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत्तदा । ततो विगाह्य हैडिम्बो बहुकक्ष्यां मनोरमाम् ॥

sa śrutvā madhuraṃ śabdaṃ prītimānabhavattadā | tato vigāhya haiḍimbo bahukakṣyāṃ manoramām

वह मधुर ध्वनि सुनकर वह प्रसन्न हुआ। फिर हैडिम्ब अनेक मनोरम कक्षों को पार करता हुआ आगे बढ़ा,

श्लोक 40 (2.34.40)

स ददर्श महात्मानं द्वार्स्थेन सह भारत । तं विभीषणमासीनं काञ्चने परमासने ॥

sa dadarśa mahātmānaṃ dvārsthena saha bhārata | taṃ vibhīṣaṇamāsīnaṃ kāñcane paramāsane

और हे भारत, द्वारपाल के साथ उसने महात्मा विभीषण को सोने के उत्तम आसन पर बैठे देखा,

श्लोक 41 (2.34.41)

दिवि भास्करसङ्काशं मुक्तामणिविभूषितम् । दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपधरं विभुम् ॥

divi bhāskarasaṅkāśaṃ muktāmaṇivibhūṣitam | divyābharaṇacitrāṅgaṃ divyarūpadharaṃ vibhum

जो आकाश में सूर्य के समान थे, मोतियों और मणियों से विभूषित, दिव्य आभूषणों से चित्रित अंगों वाले, दिव्य रूपधारी और समर्थ स्वामी,

श्लोक 42 (2.34.42)

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम् । विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥

divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhokṣitaṃ śubham | vibhrājamānaṃ vapuṣā sūryavaiśvānaraprabham

दिव्य मालाएँ और वस्त्र पहने, दिव्य सुगन्ध से सिंचित, मंगलमय, और अपने शरीर से सूर्य तथा अग्नि की प्रभा के समान दमकते हुए,

श्लोक 43 (2.34.43)

उपोपविष्टं सचिवैर्देवैरिव शतक्रतुम् । यक्षैर्महात्मभिर्दिव्यनारीभिर्हृद्यकान्तिभिः ॥

upopaviṣṭaṃ sacivairdevairiva śatakratum | yakṣairmahātmabhirdivyanārībhirhṛdyakāntibhiḥ

मन्त्रियों से घिरे हुए, जैसे देवताओं के बीच शतक्रतु (इन्द्र); महात्मा यक्ष और मन को हरने वाली कान्ति की दिव्य नारियाँ उनकी सेवा में थीं,

श्लोक 44 (2.34.44)

गीतैर्मङ्गलयुक्तैश्च पूज्यमानं यथा दिवि । चामरे व्यजने चाग्र्ये हेमदण्डे महाधने ॥

gītairmaṅgalayuktaiśca pūjyamānaṃ yathā divi | cāmare vyajane cāgrye hemadaṇḍe mahādhane

स्वर्ग की भाँति गीतों और मंगल-वचनों से उनका सम्मान हो रहा था; सोने की डण्डियों वाले बहुमूल्य, उत्तम चँवर और पंखे

श्लोक 45 (2.34.45)

गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि । अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम् ॥

gṛhīte varanārībhyāṃ dhūyamāne ca mūrdhani | arciṣmantaṃ śriyā juṣṭaṃ kuberavaruṇopamam

दो सुन्दर स्त्रियाँ थामे हुए उनके सिर पर डुला रही थीं; वे तेजस्वी थे, लक्ष्मी से सेवित, कुबेर और वरुण के समान,

श्लोक 46 (2.34.46)

धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेश्वरम् । राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा ॥

dharme caiva sthitaṃ nityamadbhutaṃ rākṣaseśvaram | rāmamikṣvākunāthaṃ vai smarantaṃ manasā sadā

सदा धर्म में स्थित, अद्भुत राक्षसेश्वर, जो इक्ष्वाकुओं के स्वामी राम का मन में निरन्तर स्मरण करते रहते थे।

श्लोक 47 (2.34.47)

दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन्ववन्दे तं कृताञ्जलिः । प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा ॥

dṛṣṭvā ghaṭotkaco rājanvavande taṃ kṛtāñjaliḥ | prahvastasthau mahāvīryaḥ śakraṃ citraratho yathā

हे राजन्, उन्हें देखकर महापराक्रमी घटोत्कच ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनीत होकर ऐसे खड़ा रहा जैसे चित्ररथ इन्द्र के सामने खड़ा होता है।

श्लोक 48 (2.34.48)

तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः । पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् ॥

taṃ dūtamāgataṃ dṛṣṭvā rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ | pūjayitvā yathānyāyaṃ sāntvapūrvaṃ vaco'bravīt

आए हुए दूत को देखकर राक्षसराज विभीषण ने उसका यथोचित सत्कार किया और मधुर वचनों में कहा:

विभीषण उवाच

श्लोक 49 (2.34.49)

कस्य वंशे स सञ्जातः करमिच्छन्महीपतिः । तस्यानुजान्समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै ॥

kasya vaṃśe sa sañjātaḥ karamicchanmahīpatiḥ | tasyānujānsamastāṃśca puraṃ deśaṃ ca tasya vai

कर चाहने वाला वह राजा किस वंश में उत्पन्न हुआ है? उसके सब भाइयों के विषय में, उसके नगर और देश के विषय में,

श्लोक 50 (2.34.50)

त्वां च कार्यं च तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानेतान्पृथक्पृथक् ॥

tvāṃ ca kāryaṃ ca tatsarvaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ | vistareṇa mama brūhi sarvānetānpṛthakpṛthak

तुम्हारे और तुम्हारे कार्य के विषय में, यह सब मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। इन सब को अलग-अलग विस्तार से मुझे बताओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (2.34.51)

एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना । कृताञ्जलिरुवाचाथ समर्थमिदमुत्तरम् ॥

evamuktastu haiḍimbaḥ paulastyena mahātmanā | kṛtāñjaliruvācātha samarthamidamuttaram

पुलस्त्य-वंशी महात्मा के ऐसा कहने पर हैडिम्ब ने हाथ जोड़कर यह समुचित उत्तर दिया:

घटोत्कच उवाच

श्लोक 52 (2.34.52)

सोमवंशोद्भवो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः । पाण्डोश्च पुत्राः पञ्चासञ्छक्रतुल्यपराक्रमाः ॥

somavaṃśodbhavo rājā pāṇḍurnāma mahābalaḥ | pāṇḍośca putrāḥ pañcāsañchakratulyaparākramāḥ

चन्द्रवंश में उत्पन्न एक महाबली राजा थे, पाण्डु नाम के। पाण्डु के पाँच पुत्र हुए, जो पराक्रम में इन्द्र के समान थे।

श्लोक 53 (2.34.53)

तेषां ज्येष्ठस्तु नाम्ना वै युधिष्ठिर इति श्रुतः । अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ॥

teṣāṃ jyeṣṭhastu nāmnā vai yudhiṣṭhira iti śrutaḥ | ajātaśatrurdharmātmā dharmo vigrahavāniva

उनमें सबसे बड़े युधिष्ठिर नाम से प्रसिद्ध हैं: अजातशत्रु, धर्मात्मा, मानो देहधारी धर्म।

श्लोक 54 (2.34.54)

ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत् । गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā prāpya rājyamakārayat | gaṅgāyā dakṣiṇe tīre nagare nāgasāhvaye

फिर राजा युधिष्ठिर ने राज्य पाकर गंगा के दक्षिणी तट पर हाथी के नाम वाले नगर (हस्तिनापुर) में शासन किया।

श्लोक 55 (2.34.55)

तद्दत्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः । भ्रातृभिः सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थेऽन्वमोदत ॥

taddatvā dhṛtarāṣṭrāya śakraprasthaṃ yayau tataḥ | bhrātṛbhiḥ saha rājendra śakraprasthe'nvamodata

वह नगर धृतराष्ट्र को देकर वे शक्रप्रस्थ चले गए, और हे राजेन्द्र, वहाँ शक्रप्रस्थ में भाइयों के साथ आनन्द से रहने लगे।

श्लोक 56 (2.34.56)

गङ्गायमुनयोर्मध्ये ते उभे नगरोत्तमे । नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशास्ति नः ॥

gaṅgāyamunayormadhye te ubhe nagarottame | nityaṃ dharme sthito rājā śakraprasthe praśāsti naḥ

ये दोनों उत्तम नगर गंगा और यमुना के बीच स्थित हैं। सदा धर्म में स्थित राजा शक्रप्रस्थ से हम पर शासन करते हैं।

श्लोक 57 (2.34.57)

तस्यानुजो महाबाहुर्भीमसेन इति श्रुतः । महातेजा महाकीर्तिः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥

tasyānujo mahābāhurbhīmasena iti śrutaḥ | mahātejā mahākīrtiḥ śakratulyaparākramaḥ

उनके छोटे भाई महाबाहु भीमसेन नाम से प्रसिद्ध हैं: महातेजस्वी, महायशस्वी और पराक्रम में इन्द्र के समान।

श्लोक 58 (2.34.58)

दशनागसहस्राणां बले तुल्यः स पाण्डवः । तस्यानुजोऽर्जुनो नाम महाबलपराक्रमः ॥

daśanāgasahasrāṇāṃ bale tulyaḥ sa pāṇḍavaḥ | tasyānujo'rjuno nāma mahābalaparākramaḥ

वह पाण्डुपुत्र बल में दस हजार हाथियों के बराबर है। उसके छोटे भाई अर्जुन नाम के हैं, जो महान् बल और पराक्रम वाले हैं,

श्लोक 59 (2.34.59)

सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुतः । कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ॥

sukumāro mahāsattvo loke vīryeṇa viśrutaḥ | kārtavīryasamo vīrye sāgarapratimo bale

सुकुमार, महान् सत्त्व वाले, संसार में अपनी वीरता के लिए विख्यात, वीरता में कार्तवीर्य के समान और बल में समुद्र जैसे,

श्लोक 60 (2.34.60)

जामदग्न्यसमश्चास्त्रे सङ्ख्ये रामसमोऽर्जुनः । रूपे शक्रसमः पार्थस्तेजसा भास्करोपमः ॥

jāmadagnyasamaścāstre saṅkhye rāmasamo'rjunaḥ | rūpe śakrasamaḥ pārthastejasā bhāskaropamaḥ

अस्त्र-विद्या में जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) के समान और युद्ध में राम के समान; रूप में वह पार्थ इन्द्र के समान और तेज में सूर्य जैसे हैं।

श्लोक 61 (2.34.61)

देवदानवगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः । मानुषैश्च समस्तैस्तु अजेयः फल्गुनो रणे ॥

devadānavagandharvaiḥ piśācoragarākṣasaiḥ | mānuṣaiśca samastaistu ajeyaḥ phalguno raṇe

देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और समस्त मनुष्य मिलकर भी युद्ध में फाल्गुन (अर्जुन) को नहीं जीत सकते।

श्लोक 62 (2.34.62)

तेन तत्खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे । विजित्य तरसा शक्रं युधि देवगणैः सह ॥

tena tatkhāṇḍavaṃ dāvaṃ tarpitaṃ jātavedase | vijitya tarasā śakraṃ yudhi devagaṇaiḥ saha

उन्होंने ही खाण्डव वन जातवेदा (अग्नि) को तृप्त करने के लिए दिया, और देवगणों सहित इन्द्र को युद्ध में वेग से जीत लिया।

श्लोक 63 (2.34.63)

लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम् । तेन लब्धा महाराज दुर्लभा दैवतैरपि ॥

labdhānyastrāṇi divyāni tarpayitvā hutāśanam | tena labdhā mahārāja durlabhā daivatairapi

हुताशन (अग्नि) को तृप्त करके उन्होंने दिव्य अस्त्र पाए। और हे महाराज, उन्होंने उसे पाया जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है,

श्लोक 64 (2.34.64)

वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्रुता । अर्जुनस्यानुजो राजन्नकुलश्चेति विश्रुतः ॥

vāsudevasya bhaginī subhadrā nāma viśrutā | arjunasyānujo rājannakulaśceti viśrutaḥ

वासुदेव की बहन, जो सुभद्रा नाम से विख्यात हैं। हे राजन्, अर्जुन के छोटे भाई नकुल नाम से प्रसिद्ध हैं,

श्लोक 65 (2.34.65)

दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथः । तस्यानुजो महातेजाः सहदेव इति श्रुतः ॥

darśanīyatamo loke mūrtimāniva manmathaḥ | tasyānujo mahātejāḥ sahadeva iti śrutaḥ

जो संसार में सबसे सुन्दर हैं, मानो देहधारी कामदेव। उनके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेव नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 66 (2.34.66)

तेनाहं प्रेषितो राजन्कुमारेण समो रणे । अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली ॥

tenāhaṃ preṣito rājankumāreṇa samo raṇe | ahaṃ ghaṭotkaco nāma bhīmasenasuto balī

हे राजन्, युद्ध में कुमार (स्कन्द) के समान उन्हीं ने मुझे भेजा है। मैं घटोत्कच नाम का, भीमसेन का बलवान पुत्र हूँ।

श्लोक 67 (2.34.67)

मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी । पार्थानामुपकारार्थं चरामि पृथिवीमिमाम् ॥

mama mātā mahābhāgā hiḍimbā nāma rākṣasī | pārthānāmupakārārthaṃ carāmi pṛthivīmimām

मेरी माता महाभागा हिडिम्बा नाम की राक्षसी हैं। मैं पृथा के पुत्रों की सेवा के लिए इस पृथ्वी पर विचरता हूँ।

श्लोक 68 (2.34.68)

आसीत्पृथिव्याः सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिरः । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ॥

āsītpṛthivyāḥ sarvasyā mahīpālo yudhiṣṭhiraḥ | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhamāhartumupacakrame

युधिष्ठिर सम्पूर्ण पृथ्वी के पालक हुए, और उन्होंने यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय करने का उपक्रम किया।

श्लोक 69 (2.34.69)

सन्दिदेश च स भ्रातॄन्करार्थं सर्वतोदिशम् । वृष्णिवीरेण सहितः सन्दिदेशानुजान्नृपः ॥

sandideśa ca sa bhrātṝnkarārthaṃ sarvatodiśam | vṛṣṇivīreṇa sahitaḥ sandideśānujānnṛpaḥ

उन्होंने कर के लिए अपने भाइयों को सब दिशाओं में भेजा; वृष्णिवीर (श्रीकृष्ण) के साथ मिलकर राजा ने अपने छोटे भाइयों को आदेश दिया।

श्लोक 70 (2.34.70)

उदीचीमर्जुनस्तूर्णं गत्वा मेरोरथोत्तमः । गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः ॥

udīcīmarjunastūrṇaṃ gatvā merorathottamaḥ | gatvā śatasahasrāṇi yojanāni mahābalaḥ

रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन शीघ्र ही उत्तर दिशा में मेरु की ओर गए; उस महाबली ने लाखों योजन की यात्रा की,

श्लोक 71 (2.34.71)

जित्वा सर्वान्नृपान्युद्धे हत्वा च तरसा वशी । स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम् ॥

jitvā sarvānnṛpānyuddhe hatvā ca tarasā vaśī | svargadvāramupāgamya ratnānyādāya vai bhṛśam

सब राजाओं को युद्ध में जीतकर और वेग से उन्हें परास्त करके, उस जितेन्द्रिय वीर ने स्वर्गद्वार तक पहुँचकर प्रचुर रत्न लिए,

श्लोक 72 (2.34.72)

अश्वांश्च विविधान्दिव्यान्सर्वानादाय फल्गुनः । धनं बहुविधं राजन्धर्मपुत्राय वै ददौ ॥

aśvāṃśca vividhāndivyānsarvānādāya phalgunaḥ | dhanaṃ bahuvidhaṃ rājandharmaputrāya vai dadau

और अनेक प्रकार के दिव्य घोड़े लेकर, हे राजन्, फाल्गुन ने वह सब नाना प्रकार का धन धर्मपुत्र को दे दिया।

श्लोक 73 (2.34.73)

भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात् । वशे कृत्वा महीपालान्पाण्डवाय धनं ददौ ॥

bhīmaseno hi rājendra jitvā prācīṃ diśaṃ balāt | vaśe kṛtvā mahīpālānpāṇḍavāya dhanaṃ dadau

हे राजेन्द्र, भीमसेन ने बलपूर्वक पूर्व दिशा को जीतकर वहाँ के राजाओं को वश में किया और पाण्डुपुत्र (युधिष्ठिर) को धन दिया।

श्लोक 74 (2.34.74)

दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा । सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान्महीक्षितः ॥

diśaṃ pratīcīṃ nakulaḥ karārthaṃ prayayau tathā | sahadevo diśaṃ yāmyāṃ jitvā sarvānmahīkṣitaḥ

इसी प्रकार नकुल कर के लिए पश्चिम दिशा में गए। सहदेव ने दक्षिण दिशा के सब राजाओं को जीतकर,

श्लोक 75 (2.34.75)

मां सन्दिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः । पार्थानां चरितं तुभ्यं सङ्क्षेपात्समुदाहृतम् ॥

māṃ sandideśa rājendra karārthamiha satkṛtaḥ | pārthānāṃ caritaṃ tubhyaṃ saṅkṣepātsamudāhṛtam

हे राजेन्द्र, सम्मानपूर्वक मुझे यहाँ कर लेने भेजा है। मैंने पृथा के पुत्रों का चरित संक्षेप में आपको सुना दिया।

श्लोक 76 (2.34.76)

तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् । पावनं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम् । एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं दातुमिहार्हसि ॥

tamavekṣya mahārāja dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | pāvanaṃ rājasūyaṃ ca bhagavantaṃ hariṃ prabhum | etānavekṣya dharmajña karaṃ dātumihārhasi

हे महाराज, धर्मराज युधिष्ठिर का, पवित्र करने वाले राजसूय यज्ञ का, और भगवान् प्रभु हरि का ध्यान कीजिए। हे धर्मज्ञ, इनका ध्यान रखकर आपको यहाँ कर देना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 77 (2.34.77)

तेन तद्भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो बिभीषणः । शासनं प्रतिजग्राह धर्मात्मा राक्षसैः सह ॥

tena tadbhāṣitaṃ śrutvā rākṣasendro bibhīṣaṇaḥ | śāsanaṃ pratijagrāha dharmātmā rākṣasaiḥ saha

उसकी कही बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण ने अपने राक्षसों सहित वह आज्ञा स्वीकार कर ली।

श्लोक 78 (2.34.78)

तच्च कृष्णकृतं धीमानित्यमन्यत स प्रभुः । ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च ॥

tacca kṛṣṇakṛtaṃ dhīmānityamanyata sa prabhuḥ | tato dadau vicitrāṇi kambalāni kuthāni ca

उस बुद्धिमान स्वामी ने माना कि यह श्रीकृष्ण का ही किया हुआ है। तब उन्होंने रंग-बिरंगे कम्बल और हाथियों की झूलें दीं,

श्लोक 79 (2.34.79)

दान्तकाञ्चनपर्यङ्कान्मणिहेमविचित्रितान् । भूषणानि महार्हाणि प्रवालानि मणींश्च सः ॥

dāntakāñcanaparyaṅkānmaṇihemavicitritān | bhūṣaṇāni mahārhāṇi pravālāni maṇīṃśca saḥ

मणियों और सोने से जड़े हाथीदाँत और सोने के पलंग, बहुमूल्य आभूषण, मूँगे और मणियाँ;

श्लोक 80 (2.34.80)

काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च । कटाहानि विचित्राणि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः ॥

kāñcanāni ca bhāṇḍāni kalaśāni ghaṭāni ca | kaṭāhāni vicitrāṇi droṇyaścaiva sahasraśaḥ

सोने के पात्र, कलश और घड़े, चमकीले कड़ाह और हजारों द्रोणियाँ;

श्लोक 81 (2.34.81)

राजतानि च भाण्डानि रत्नगर्भांश्च कुण्डलान् । हेमपुष्पाणि चान्यानि रुक्ममुख्यानि चापरान् ॥

rājatāni ca bhāṇḍāni ratnagarbhāṃśca kuṇḍalān | hemapuṣpāṇi cānyāni rukmamukhyāni cāparān

चाँदी के पात्र, रत्नजड़ित कुण्डल, सोने के फूल और अन्य वस्तुएँ, तथा सोने की और भी श्रेष्ठ चीज़ें;

श्लोक 82 (2.34.82)

शङ्खांश्च चन्द्रसङ्काशांश्चित्रावर्तविचित्रितान् । यज्ञस्य तोरणे युक्तान्ददौ तालांश्चतुर्दश ॥

śaṅkhāṃśca candrasaṅkāśāṃścitrāvartavicitritān | yajñasya toraṇe yuktāndadau tālāṃścaturdaśa

चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, विचित्र आवर्तों से चित्रित शंख; और यज्ञ के तोरण पर लगाने योग्य चौदह ताड़-वृक्ष दिए;

श्लोक 83 (2.34.83)

रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः । मुकुटानि महार्हाणि रत्नगर्भांश्च कङ्कणान् ॥

rukmapaṅkajapuṣpāṇi śibikā maṇibhūṣitāḥ | mukuṭāni mahārhāṇi ratnagarbhāṃśca kaṅkaṇān

सोने के कमल-पुष्प, मणियों से सजी पालकियाँ, बहुमूल्य मुकुट और रत्नजड़ित कंगन;

श्लोक 84 (2.34.84)

चन्दनानि च मुख्यानि वासांसि विविधानि च । स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणः ॥

candanāni ca mukhyāni vāsāṃsi vividhāni ca | sa dadau sahadevāya tadā rājā vibhīṣaṇaḥ

उत्तम चन्दन और अनेक प्रकार के वस्त्र: यह सब तब राजा विभीषण ने सहदेव के लिए दिया।

श्लोक 85 (2.34.85)

तानि सर्वाणि रत्नानि आजह्रुस्ते निशाचराः । अष्टाशीतिसहस्राणि समदा रक्तलोचनाः ॥

tāni sarvāṇi ratnāni ājahruste niśācarāḥ | aṣṭāśītisahasrāṇi samadā raktalocanāḥ

वे सब रत्न अठासी हजार निशाचर उठाकर ले चले, जो मद से भरे और लाल आँखों वाले थे।

श्लोक 86 (2.34.86)

रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः । विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥

ratnānyādāya sarvāṇi pratasthe sa ghaṭotkacaḥ | vibhīṣaṇaṃ ca rājānamabhivādya kṛtāñjaliḥ

सब रत्न लेकर घटोत्कच चल पड़ा; उसने हाथ जोड़कर राजा विभीषण को प्रणाम किया।

श्लोक 87 (2.34.87)

प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः । ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह ॥

pradakṣiṇaṃ parītyaiva nirjagāma ghaṭotkacaḥ | tato ratnānyupādāya haiḍimbo rākṣasaiḥ saha

उनकी प्रदक्षिणा करके घटोत्कच बाहर निकला। फिर हैडिम्ब रत्न लेकर राक्षसों के साथ

श्लोक 88 (2.34.88)

जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति । आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम् ॥

jagāma tūrṇaṃ laṅkāyāḥ sahadevapadaṃ prati | āseduḥ pāṇḍavaṃ sarve laṅghayitvā mahodadhim

शीघ्र ही लंका से सहदेव के स्थान की ओर गया। महासागर को लाँघकर वे सब पाण्डुपुत्र के पास आ पहुँचे।

श्लोक 89 (2.34.89)

सहदेवो ददर्शाथ रत्नाहारान्निशाचरान् । आगतान्भीमसङ्काशान्हैडिम्बं च तथा नृप ॥

sahadevo dadarśātha ratnāhārānniśācarān | āgatānbhīmasaṅkāśānhaiḍimbaṃ ca tathā nṛpa

हे राजन्, सहदेव ने रत्न ढोकर लाए उन भयानक निशाचरों को और हैडिम्ब को भी देखा।

श्लोक 90 (2.34.90)

द्रमिला नैरृतान्दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः । भैमसेनिस्ततो गत्वा माद्रेयं प्राञ्जलिः स्थितः ॥

dramilā nairṛtāndṛṣṭvā dudruvuste bhayārditāḥ | bhaimasenistato gatvā mādreyaṃ prāñjaliḥ sthitaḥ

उन नैर्ऋतों (राक्षसों) को देखकर द्रमिल लोग भय से व्याकुल होकर भाग गए। तब भीमसेन का पुत्र माद्रीपुत्र के पास जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

श्लोक 91 (2.34.91)

प्रीतिमानभवद्दृष्ट्वा रत्नौघं तं च पाण्डवः । तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान्प्रीतिमानभूत् ॥

prītimānabhavaddṛṣṭvā ratnaughaṃ taṃ ca pāṇḍavaḥ | taṃ pariṣvajya pāṇibhyāṃ dṛṣṭvā tānprītimānabhūt

रत्नों का वह ढेर देखकर पाण्डुपुत्र प्रसन्न हुआ। उसने दोनों हाथों से उसे गले लगाया, और उन राक्षसों को देखकर भी उसे हर्ष हुआ।

श्लोक 92 (2.34.92)

विसृज्य द्रविडान्सर्वान्गमनायोपचक्रमे । न्यवर्तत ततो धीमान्सहदेवो नराधिपः ॥

visṛjya draviḍānsarvāngamanāyopacakrame | nyavartata tato dhīmānsahadevo narādhipaḥ

सब द्रविड़ों को विदा करके उसने प्रस्थान की तैयारी की। तब बुद्धिमान नरेश सहदेव लौट पड़ा।

श्लोक 93 (2.34.93)

एवं विजित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च । करदान्पार्थिवान्कृत्वा प्रत्यागच्छदरिन्दमः ॥

evaṃ vijitya tarasā sāntvena vijayena ca | karadānpārthivānkṛtvā pratyāgacchadarindamaḥ

इस प्रकार वेग से, कभी समझा-बुझाकर और कभी युद्ध में जीतकर, राजाओं को करदाता बनाकर वह शत्रुदमन वीर लौट आया।

श्लोक 94 (2.34.94)

रत्नसारमुपादाय ययौ सहनिशाचरः । इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥

ratnasāramupādāya yayau sahaniśācaraḥ | indraprasthaṃ viveśātha kampayanniva medinīm

रत्नों में से सर्वश्रेष्ठ लेकर वह निशाचरों के साथ चला, और मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ इन्द्रप्रस्थ में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 95 (2.34.95)

दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन्सहदेवः कृताञ्जलिः । प्रह्वोऽभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्चापि तेन वै ॥

dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraṃ rājansahadevaḥ kṛtāñjaliḥ | prahvo'bhivādya tasthau sa pūjitaścāpi tena vai

हे राजन्, युधिष्ठिर को देखकर सहदेव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनीत भाव से खड़ा रहा, और उन्होंने भी उसका सम्मान किया।

श्लोक 96 (2.34.96)

लङ्काप्राप्तान्धनौघांश्च दृष्ट्वा तान्दुर्लभान्बहून् । प्रीतिमानभवद्राजा विस्मयं परमं ययौ ॥

laṅkāprāptāndhanaughāṃśca dṛṣṭvā tāndurlabhānbahūn | prītimānabhavadrājā vismayaṃ paramaṃ yayau

लंका से लाए गए धन के उन बहुत-से दुर्लभ ढेरों को देखकर राजा प्रसन्न हुए और अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 97 (2.34.97)

धर्मराजाय तत्सर्वं निवेद्य भरतर्षभ । कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने ॥

dharmarājāya tatsarvaṃ nivedya bharatarṣabha | koṭīsahasramadhikaṃ hiraṇyasya mahātmane

हे भरतश्रेष्ठ, वह सब धर्मराज को अर्पित करके, उस महात्मा को एक हजार करोड़ से भी अधिक स्वर्ण,

श्लोक 98 (2.34.98)

विविधानि च रत्नानि गोजाविमहिषांस्तथा । कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय ॥

vividhāni ca ratnāni gojāvimahiṣāṃstathā | kṛtakarmā sukhaṃ rājannuvāsa janamejaya

अनेक प्रकार के रत्न, और गायें, बकरियाँ, भेड़ें तथा भैंसें, यह सब देकर अपना कार्य पूरा करके, हे राजा जनमेजय, वह सुखपूर्वक रहने लगा।

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