सभा पर्व · अध्याय 33
कावेरी के तट पर और पाण्ड्य देश में सहदेव
जनमेजय के अनुरोध पर वैशम्पायन सहदेव के दक्षिण-अभियान का विस्तार से वर्णन करते हैं। सहदेव चोल देश पहुँचकर कावेरी को देखकर मुग्ध होता है; उसके वनों से भरे तटों, पक्षियों और आश्रमों का विस्तृत वर्णन है, और द्रविड़ लोग उसे देखने उमड़ पड़ते हैं। वह दूतों के द्वारा चोल राजा को और अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा के पिता पाण्ड्य राजा मलयध्वज को वश में करता है, बभ्रुवाहन को रत्न देता है, और फिर मलय पर्वत तथा ताम्रपर्णी नदी को पार करके समुद्र-तट पर डेरा डालता है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (2.33.1)
इच्छाम्यागमनं श्रोतुं हैडिम्बस्य द्विजोत्तम । लङ्कायां च गतिं ब्रह्मन्पौलस्त्यस्य च दर्शनम् ॥
icchāmyāgamanaṃ śrotuṃ haiḍimbasya dvijottama | laṅkāyāṃ ca gatiṃ brahmanpaulastyasya ca darśanam
हे द्विजश्रेष्ठ, मैं हिडिम्बा के पुत्र की यात्रा के विषय में सुनना चाहता हूँ। हे ब्रह्मन्, उसका लंका जाना और पुलस्त्य-वंशी (विभीषण) से उसकी भेंट,
श्लोक 2 (2.33.2)
कावेरीदर्शनं चैव आनुपूर्व्या वदस्व मे ॥
kāverīdarśanaṃ caiva ānupūrvyā vadasva me
और कावेरी के दर्शन का वृत्तान्त भी। यह सब मुझे क्रम से सुनाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (2.33.3)
शृणु राजन्यथा वृत्तं सहदेवस्य साहसम् ॥
śṛṇu rājanyathā vṛttaṃ sahadevasya sāhasam
हे राजन्, सुनो कि सहदेव का वह साहसिक अभियान किस प्रकार हुआ।
श्लोक 4 (2.33.4)
कालनद्वीपगांश्चैव तरसा जित्य चाहवे । दक्षिणां च दिशं जित्वा चोलस्य विषयं ययौ ॥
kālanadvīpagāṃścaiva tarasā jitya cāhave | dakṣiṇāṃ ca diśaṃ jitvā colasya viṣayaṃ yayau
कालन द्वीपों के निवासियों को युद्ध में वेग से जीतकर और दक्षिण दिशा पर विजय पाकर वह चोल देश में पहुँचा।
श्लोक 5 (2.33.5)
ददर्श पुण्यतोयां वै कावेरीं सरितां वराम् । नानापक्षिगणैर्जुष्टां तापसैरुपशोभिताम् ॥
dadarśa puṇyatoyāṃ vai kāverīṃ saritāṃ varām | nānāpakṣigaṇairjuṣṭāṃ tāpasairupaśobhitām
वहाँ उसने पवित्र जल वाली, नदियों में श्रेष्ठ कावेरी को देखा, जहाँ अनेक प्रकार के पक्षियों के झुंड रहते थे और जो तपस्वियों से सुशोभित थी।
श्लोक 6 (2.33.6)
साललोध्रार्जुनैर्बिल्वैर्जम्बूशाल्मलकिंशुकैः । कदम्बैः सप्तपर्णैश्च कश्मर्यामलकैर्वृताम् ॥
sālalodhrārjunairbilvairjambūśālmalakiṃśukaiḥ | kadambaiḥ saptaparṇaiśca kaśmaryāmalakairvṛtām
उसके तट साल, लोध्र, अर्जुन और बेल के वृक्षों से, जामुन, सेमल और किंशुक से, कदम्ब और सप्तपर्ण से, तथा काश्मर्य (गम्भारी) और आँवले के वृक्षों से घिरे थे;
श्लोक 7 (2.33.7)
न्यग्रोधैश्च महाशाखैः प्लक्षैरौदुम्बरैरपि । शमीपलाशवृक्षैश्च अश्वत्थैः खदिरैर्वृताम् ॥
nyagrodhaiśca mahāśākhaiḥ plakṣairaudumbarairapi | śamīpalāśavṛkṣaiśca aśvatthaiḥ khadirairvṛtām
बड़ी-बड़ी शाखाओं वाले बरगदों से, पाकड़ और गूलर से, शमी और पलाश के वृक्षों से, तथा पीपल और खैर के वृक्षों से वह घिरी थी;
श्लोक 8 (2.33.8)
बदरीभिश्च सञ्छन्नामश्वकर्णैश्च शोभिताम् । चूतैः पुण्ड्रकपत्रैश्च कदलीवनसंवृताम् ॥
badarībhiśca sañchannāmaśvakarṇaiśca śobhitām | cūtaiḥ puṇḍrakapatraiśca kadalīvanasaṃvṛtām
वह बेर के वृक्षों से ढकी थी, अश्वकर्ण वृक्षों से शोभित थी, और आम, पुण्ड्रकपत्र तथा केले के वनों से घिरी थी।
श्लोक 9 (2.33.9)
चक्रवाकगणैः कीर्णां प्लवैश्च जलवायसैः । समुद्रकाकैः क्रौञ्चैश्च नादितां जलकुक्कुटैः ॥
cakravākagaṇaiḥ kīrṇāṃ plavaiśca jalavāyasaiḥ | samudrakākaiḥ krauñcaiśca nāditāṃ jalakukkuṭaiḥ
वह चक्रवाकों के झुंडों, प्लवों और जलकौओं से भरी थी, और समुद्री कौओं, क्रौंचों तथा जलमुर्गियों के कलरव से गूँजती रहती थी।
श्लोक 10 (2.33.10)
एवं खगैश्च बहुभिः सङ्घुष्टां जलवासिभिः । आश्रमैर्बहुभिः सक्तां चैत्यवृक्षैश्च शोभिताम् ॥
evaṃ khagaiśca bahubhiḥ saṅghuṣṭāṃ jalavāsibhiḥ | āśramairbahubhiḥ saktāṃ caityavṛkṣaiśca śobhitām
इस प्रकार जल में रहने वाले बहुत-से पक्षियों से गूँजती वह नदी अनेक आश्रमों से जुड़ी थी और पवित्र चैत्य-वृक्षों से शोभित थी।
श्लोक 11 (2.33.11)
शोभितां ब्राह्मणैः शुभ्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः । क्वचित्तीररुहैर्वृक्षैर्मालाभिरिव शोभिताम् ॥
śobhitāṃ brāhmaṇaiḥ śubhrairvedavedāṅgapāragaiḥ | kvacittīraruhairvṛkṣairmālābhiriva śobhitām
वेद और वेदांगों में पारंगत तेजस्वी ब्राह्मणों से वह शोभित थी, और कहीं-कहीं तट पर उगे वृक्ष उसे मालाओं की तरह सजा रहे थे।
श्लोक 12 (2.33.12)
क्वचित्सुपुष्पितैर्वृक्षैः क्वचित्सौगन्धिकोत्पलैः । कह्लारकुमुदोत्फुल्लैः कमलैरुपशोभिताम् ॥
kvacitsupuṣpitairvṛkṣaiḥ kvacitsaugandhikotpalaiḥ | kahlārakumudotphullaiḥ kamalairupaśobhitām
कहीं वह भली-भाँति फूले वृक्षों से, कहीं सुगन्धित सौगन्धिक और नीलकमलों से, तथा खिले हुए कह्लार, कुमुद और कमलों से सुशोभित थी।
श्लोक 13 (2.33.13)
कावेरीं तादृशीं दृष्ट्वा प्रीतिमान्पाण्डवस्तदा । अस्मद्राष्ट्रे यथा गङ्गा कावेरी च तथा शुभा ॥
kāverīṃ tādṛśīṃ dṛṣṭvā prītimānpāṇḍavastadā | asmadrāṣṭre yathā gaṅgā kāverī ca tathā śubhā
कावेरी को ऐसा देखकर पाण्डुपुत्र प्रसन्न हुआ: "जैसी हमारे राज्य में गंगा है, वैसी ही सुन्दर यह कावेरी है।"
श्लोक 14 (2.33.14)
सहदेवस्तु तां तीर्त्वा नदीमनुचरैः सह । दक्षिणं तीरमासाद्य गमनायोपचक्रमे ॥
sahadevastu tāṃ tīrtvā nadīmanucaraiḥ saha | dakṣiṇaṃ tīramāsādya gamanāyopacakrame
सहदेव अपने अनुचरों के साथ उस नदी को पार करके दक्षिणी तट पर पहुँचा और आगे बढ़ने लगा।
श्लोक 15 (2.33.15)
आगतं पाण्डवं तत्र श्रुत्वा विषयवासिनः । दर्शनार्थं ययुस्ते तु कौतूहलसमन्विताः ॥
āgataṃ pāṇḍavaṃ tatra śrutvā viṣayavāsinaḥ | darśanārthaṃ yayuste tu kautūhalasamanvitāḥ
पाण्डुपुत्र के वहाँ आने की बात सुनकर उस देश के निवासी कौतूहल से भरकर उसे देखने निकल पड़े।
श्लोक 16 (2.33.16)
द्रमिडाः पुरुषा राजन्स्त्रियश्च प्रियदर्शनाः । गत्वा पाण्डुसुतं तत्र ददृशुस्ते मुदाऽन्विताः ॥
dramiḍāḥ puruṣā rājanstriyaśca priyadarśanāḥ | gatvā pāṇḍusutaṃ tatra dadṛśuste mudā'nvitāḥ
हे राजन्, द्रविड़ पुरुष और सुन्दर स्त्रियाँ वहाँ पाण्डुपुत्र के पास जाकर आनन्द से उसे निहारने लगे,
श्लोक 17 (2.33.17)
सुकुमारं विशालाक्षं व्रजन्तं त्रिदशोपमम् । दर्शनीयतमं लोके नेत्रैरनिमिषैरिव ॥
sukumāraṃ viśālākṣaṃ vrajantaṃ tridaśopamam | darśanīyatamaṃ loke netrairanimiṣairiva
उस सुकुमार, विशाल नेत्रों वाले, देवताओं की भाँति चलते हुए, संसार में सबसे दर्शनीय राजकुमार को वे मानो पलक झपकाए बिना देखते रहे।
श्लोक 18 (2.33.18)
आश्चर्यभूतं ददृशुर्द्रमिडास्ते समागताः । महासेनोपमं दृष्ट्वा पूजां चक्रुश्च तस्य वै ॥
āścaryabhūtaṃ dadṛśurdramiḍāste samāgatāḥ | mahāsenopamaṃ dṛṣṭvā pūjāṃ cakruśca tasya vai
वहाँ एकत्र हुए द्रविड़ों ने उसे एक आश्चर्य की तरह देखा। उसे महासेन (स्कन्द) के समान देखकर उन्होंने उसका पूजन किया,
श्लोक 19 (2.33.19)
रत्नैश्च विविधैरिष्टैर्भोगैरन्यैश्च संमतैः । गीतमङ्गलयुक्ताभिः स्तुवन्तो नकुलानुजम् ॥
ratnaiśca vividhairiṣṭairbhogairanyaiśca saṃmataiḥ | gītamaṅgalayuktābhiḥ stuvanto nakulānujam
अनेक प्रकार के प्रिय रत्नों और अन्य मनभावन भेंटों से, और गीतों तथा मंगल-स्तुतियों से नकुल के छोटे भाई की प्रशंसा करते हुए।
श्लोक 20 (2.33.20)
सहदेवस्तु तान्दृष्ट्वा द्रमिलानागतान्मुदा । विसृज्य तान्महाबाहुः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम् ॥
sahadevastu tāndṛṣṭvā dramilānāgatānmudā | visṛjya tānmahābāhuḥ prasthito dakṣiṇāṃ diśam
आए हुए द्रमिलों को देखकर महाबाहु सहदेव ने प्रसन्नता से उन्हें विदा किया और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा।
श्लोक 21 (2.33.21)
दूतेन तरसा चोलं विजित्य द्रमिडेश्वरम् । ततो रत्नान्युपादाय पाण्ड्यस्य विषयं ययौ ॥
dūtena tarasā colaṃ vijitya dramiḍeśvaram | tato ratnānyupādāya pāṇḍyasya viṣayaṃ yayau
दूत के द्वारा द्रविड़ों के स्वामी चोल नरेश को शीघ्र वश में करके और उससे रत्न लेकर वह पाण्ड्य देश की ओर गया।
श्लोक 22 (2.33.22)
दर्शने सहदेवस्य न च तृप्ता नराः परे । गच्छन्तमनुगच्छन्तः प्राप्ताः कौतूहलान्विताः ॥
darśane sahadevasya na ca tṛptā narāḥ pare | gacchantamanugacchantaḥ prāptāḥ kautūhalānvitāḥ
सहदेव के दर्शन से तृप्त न होने वाले दूसरे लोग भी कौतूहल से भरे उसके पीछे-पीछे चलते हुए आ पहुँचे।
श्लोक 23 (2.33.23)
ततो माद्रीसुतो राजन्मृगसङ्घान्विलोकयन् । गजान्वनचरानन्यान्व्याघ्रान्कृष्णमृगान्बहून् ॥
tato mādrīsuto rājanmṛgasaṅghānvilokayan | gajānvanacarānanyānvyāghrānkṛṣṇamṛgānbahūn
तब हे राजन्, माद्रीपुत्र पशुओं के झुंडों को देखता हुआ, हाथियों, अन्य वनचरों, बाघों और बहुत-से काले हिरनों को देखता हुआ,
श्लोक 24 (2.33.24)
शुकान्मयूरान्दृष्ट्वा तु गृध्रानारण्यकुक्कुटान् । ततो देशं समासाद्य श्वशुरस्य महीपतेः ॥
śukānmayūrāndṛṣṭvā tu gṛdhrānāraṇyakukkuṭān | tato deśaṃ samāsādya śvaśurasya mahīpateḥ
और तोते, मोर, गिद्ध तथा जंगली मुर्गे देखकर, अन्त में अर्जुन के ससुर राजा के देश में पहुँचा।
श्लोक 25 (2.33.25)
प्रेषयामास माद्रेयो दूतान्पाण्ड्याय वै तदा । प्रतिजग्राह तस्याज्ञां सम्प्रीत्या मलयध्वजः ॥
preṣayāmāsa mādreyo dūtānpāṇḍyāya vai tadā | pratijagrāha tasyājñāṃ samprītyā malayadhvajaḥ
वहाँ माद्रीपुत्र ने पाण्ड्य नरेश के पास दूत भेजे, और मलयध्वज ने प्रसन्नतापूर्वक उसकी आज्ञा स्वीकार कर ली।
श्लोक 26 (2.33.26)
भार्या रूपवती जिष्णोः पाण्ड्यस्य तनया शुभा । चित्राङ्गदेति विख्याता द्रमिडी योषितां वरा ॥
bhāryā rūpavatī jiṣṇoḥ pāṇḍyasya tanayā śubhā | citrāṅgadeti vikhyātā dramiḍī yoṣitāṃ varā
पाण्ड्य नरेश की सुन्दर पुत्री, जिष्णु (अर्जुन) की रूपवती पत्नी, स्त्रियों में श्रेष्ठ वह द्रविड़ राजकुमारी चित्रांगदा नाम से विख्यात थी।
श्लोक 27 (2.33.27)
आगतं सहदेवं तु सा श्रुत्वाऽन्तः पुरे पितुः । प्रेषयामास सम्प्रीत्या पूजारत्नं च वै बहु ॥
āgataṃ sahadevaṃ tu sā śrutvā'ntaḥ pure pituḥ | preṣayāmāsa samprītyā pūjāratnaṃ ca vai bahu
पिता के अन्तःपुर में सहदेव के आने का समाचार सुनकर उसने प्रसन्नता से उसके लिए सम्मान की भेंट और बहुत-से रत्न भेजे।
श्लोक 28 (2.33.28)
पाण्ड्योऽपि बहुरत्नानि दूतैः सह मुमोच ह । मणिमुक्ताप्रवालानि सहदेवाय कीर्तिमान् ॥
pāṇḍyo'pi bahuratnāni dūtaiḥ saha mumoca ha | maṇimuktāpravālāni sahadevāya kīrtimān
यशस्वी पाण्ड्य नरेश ने भी दूतों के साथ सहदेव के लिए बहुत-से रत्न भेजे: मणियाँ, मोती और मूँगे।
श्लोक 29 (2.33.29)
तां दृष्ट्वाऽप्रतिमां पूजां पाण्डवोऽपि मुदा नृप । भ्रातुः पुत्रे बहून्रत्नान्दत्वा वै बभ्रुवाहने ॥
tāṃ dṛṣṭvā'pratimāṃ pūjāṃ pāṇḍavo'pi mudā nṛpa | bhrātuḥ putre bahūnratnāndatvā vai babhruvāhane
हे राजन्, वह अनुपम सत्कार देखकर पाण्डुपुत्र भी प्रसन्न हुआ और उसने अपने भाई के पुत्र बभ्रुवाहन को बहुत-से रत्न दिए।
श्लोक 30 (2.33.30)
पाण्ड्यं द्रमिडराजानं श्वशुरं मलयध्वजम् । स दूतैस्तं वशे कृत्वा मणलूरेश्वरं तदा ॥
pāṇḍyaṃ dramiḍarājānaṃ śvaśuraṃ malayadhvajam | sa dūtaistaṃ vaśe kṛtvā maṇalūreśvaraṃ tadā
द्रविड़ों के राजा, अर्जुन के ससुर, मणलूर के स्वामी पाण्ड्य मलयध्वज को दूतों के द्वारा वश में करके,
श्लोक 31 (2.33.31)
ततो रत्नान्युपादाय द्रमिडैरावृतो ययौ । अगस्त्यस्यालयं दिव्यं देवलोकसमं गिरिम् ॥
tato ratnānyupādāya dramiḍairāvṛto yayau | agastyasyālayaṃ divyaṃ devalokasamaṃ girim
रत्न लेकर, द्रविड़ों से घिरा हुआ, वह अगस्त्य के निवास, देवलोक के समान उस दिव्य पर्वत की ओर गया।
श्लोक 32 (2.33.32)
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा मलयं भरतर्षभ । लङ्घयित्वा तु माद्रेयस्ताम्रपर्णीं नदीं शुभाम् ॥
sa taṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā malayaṃ bharatarṣabha | laṅghayitvā tu mādreyastāmraparṇīṃ nadīṃ śubhām
हे भरतश्रेष्ठ, उस मलय पर्वत की प्रदक्षिणा करके माद्रीपुत्र ने सुन्दर ताम्रपर्णी नदी को पार किया,
श्लोक 33 (2.33.33)
प्रसन्नसलिलां दिव्यां सुशीतां च मनोहराम् । समुद्रतीरमासाद्य न्यविशत्पाण्डुनन्दनः ॥
prasannasalilāṃ divyāṃ suśītāṃ ca manoharām | samudratīramāsādya nyaviśatpāṇḍunandanaḥ
जिसका जल निर्मल, शीतल और मनोहर था; उस दिव्य नदी के पार समुद्र-तट पर पहुँचकर पाण्डुनन्दन ने वहीं डेरा डाला।