सभा पर्व · अध्याय 32
सहदेव की दक्षिण-विजय; माहिष्मती के रक्षक अग्नि
सहदेव दक्षिण की ओर बढ़ते हैं और शूरसेनों, मत्स्यों, दन्तवक्र, कुन्तिभोज, जम्भक के पुत्र, अवन्ति के विन्द-अनुविन्द तथा भोजकट के भीष्मक को वश में करते हैं; किष्किन्धा में वे वानर मैन्द और द्विविद से सात दिन युद्ध करते हैं, जो प्रसन्न होकर उन्हें रत्न देकर विदा करते हैं। माहिष्मती में राजा नील की सहायता अग्नि करते हैं, जिनकी ज्वालाएँ सहदेव की सेना को घेर लेती हैं; वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि नील की पुत्री पर आसक्त होने पर दण्डित अग्नि किस प्रकार उस नगर के रक्षक बने। सहदेव स्तुति से अग्नि को प्रसन्न करते हैं, अग्नि शान्त होते हैं और नील सम्मानपूर्वक कर देता है। फिर सहदेव बल से या दूतों द्वारा दक्षिण के अनेक जनपदों को वश में करते हैं, घटोत्कच को बुलाकर लङ्का में विभीषण के पास भेजते हैं, और विभीषण आज्ञा स्वीकार करके बहुमूल्य उपहार भेजते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.32.1)
तथैव सहदेवोऽपि धर्मराजेन पूजितः । महत्या सेनया राजन्प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥
tathaiva sahadevo'pi dharmarājena pūjitaḥ | mahatyā senayā rājanprayayau dakṣiṇāṃ diśam
हे राजन्! इसी प्रकार धर्मराज से सम्मानित होकर सहदेव भी विशाल सेना के साथ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (2.32.2)
स शूरसेनान्कार्त्स्न्येन पूर्वमेवाजयत्प्रभुः । मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे बलाद्बली ॥
sa śūrasenānkārtsnyena pūrvamevājayatprabhuḥ | matsyarājaṃ ca kauravyo vaśe cakre balādbalī
प्रभु सहदेव ने पहले शूरसेनों को पूरी तरह जीत लिया, और उस बलवान् कुरुवंशी ने मत्स्यराज को बलपूर्वक वश में कर लिया।
श्लोक 3 (2.32.3)
अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाबलम् । जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत् ॥
adhirājādhipaṃ caiva dantavakraṃ mahābalam | jigāya karadaṃ caiva kṛtvā rājye nyaveśayat
उन्होंने राजाधिराज महाबली दन्तवक्र को जीतकर करदाता बनाया और फिर उसे उसके राज्य पर बिठा दिया।
श्लोक 4 (2.32.4)
सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् । तथैवापरमत्स्यांश्च व्यजयत्स पटच्चरान् ॥
sukumāraṃ vaśe cakre sumitraṃ ca narādhipam | tathaivāparamatsyāṃśca vyajayatsa paṭaccarān
उन्होंने सुकुमार और राजा सुमित्र को वश में किया, और इसी प्रकार पश्चिमी मत्स्यों तथा पटच्चरों को भी जीत लिया।
श्लोक 5 (2.32.5)
निषादभूमिं गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा । तरसैवाजयद्धीमाञ्श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ॥
niṣādabhūmiṃ gośṛṅgaṃ parvatapravaraṃ tathā | tarasaivājayaddhīmāñśreṇimantaṃ ca pārthivam
उस बुद्धिमान् ने शीघ्र ही निषादभूमि, पर्वतश्रेष्ठ गोशृङ्ग और राजा श्रेणिमान् को जीत लिया।
श्लोक 6 (2.32.6)
नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत् । प्रीतिपूर्वं च तस्यासौ प्रतिजग्राह शासनम् ॥
nararāṣṭraṃ ca nirjitya kuntibhojamupādravat | prītipūrvaṃ ca tasyāsau pratijagrāha śāsanam
नरराष्ट्र को जीतकर वे कुन्तिभोज की ओर बढ़े, और उस राजा ने प्रेमपूर्वक उनका आदेश स्वीकार कर लिया।
श्लोक 7 (2.32.7)
ततश्चर्मण्वतीकूले जम्भकस्यात्मजं नृपम् । ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा ॥
tataścarmaṇvatīkūle jambhakasyātmajaṃ nṛpam | dadarśa vāsudevena śeṣitaṃ pūrvavairiṇā
फिर चर्मण्वती के तट पर उन्होंने जम्भक के पुत्र राजा को देखा, जिसे उसके पुराने शत्रु वासुदेव ने जीवित छोड़ दिया था।
श्लोक 8 (2.32.8)
चक्रे तेन स सङ्ग्रामं सहदेवेन भारत । स तमाजौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ ॥
cakre tena sa saṅgrāmaṃ sahadevena bhārata | sa tamājau vinirjitya dakṣiṇābhimukho yayau
हे भारत! उस राजा ने सहदेव से युद्ध किया; और उसे युद्ध में हराकर सहदेव दक्षिण की ओर चल पड़े।
श्लोक 9 (2.32.9)
सेकानपरसेकांश्च रत्नानि विविधानि च । ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ ॥
sekānaparasekāṃśca ratnāni vividhāni ca | tatastenaiva sahito narmadāmabhito yayau
उन्होंने सेकों और अपरसेकों को जीतकर अनेक प्रकार के रत्न लिए; फिर उसी राजा को साथ लेकर वे नर्मदा की ओर गए।
श्लोक 10 (2.32.10)
भगदत्तं महाबाहुं क्षत्रियं नरकात्मजम् । अर्जुनाय करं दत्तं श्रुत्वा तत्र न्यवर्तत ॥
bhagadattaṃ mahābāhuṃ kṣatriyaṃ narakātmajam | arjunāya karaṃ dattaṃ śrutvā tatra nyavartata
यह सुनकर कि नरक के पुत्र, महाबाहु क्षत्रिय भगदत्त ने अर्जुन को कर दे दिया है, वे वहाँ से लौट आए।
श्लोक 11 (2.32.11)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महतावृतौ । जिगाय समरे वीरावाश्विनेयः प्रतापवान् ॥
vindānuvindāvāvantyau sainyena mahatāvṛtau | jigāya samare vīrāvāśvineyaḥ pratāpavān
प्रतापी अश्विनीपुत्र ने विशाल सेना से घिरे अवन्ति के दोनों वीरों, विन्द और अनुविन्द को युद्ध में जीत लिया।
श्लोक 12 (2.32.12)
ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ । तत्र युद्धमभूद्राजन्दिवसद्वयमच्युत ॥
tato ratnānyupādāya puraṃ bhojakaṭaṃ yayau | tatra yuddhamabhūdrājandivasadvayamacyuta
फिर रत्न लेकर वे भोजकट नगर गए। हे अच्युत राजन्! वहाँ दो दिन तक युद्ध हुआ।
श्लोक 13 (2.32.13)
स विजित्य दुराधर्षं भीष्मकं माद्रिनन्दनः । कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम् ॥
sa vijitya durādharṣaṃ bhīṣmakaṃ mādrinandanaḥ | kosalādhipatiṃ caiva tathā veṇātaṭādhipam
दुर्जय भीष्मक को जीतकर माद्रीपुत्र ने कोसल के अधिपति और वेणा-तट के अधिपति को,
श्लोक 14 (2.32.14)
कान्तारकांश्च समरे तथा प्राकोटकान्नृपान् । नाटकेयांश्च समरे तथा हेरम्बकान्युधि ॥
kāntārakāṃśca samare tathā prākoṭakānnṛpān | nāṭakeyāṃśca samare tathā herambakānyudhi
युद्ध में कान्तारकों को, प्राकोटक राजाओं को, संग्राम में नाटकेयों को और रण में हेरम्बकों को जीत लिया;
श्लोक 15 (2.32.15)
मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो बलात् । नाचीनानर्बुकांश्चैव राजानश्च महाबलः ॥
mārudhaṃ ca vinirjitya ramyagrāmamatho balāt | nācīnānarbukāṃścaiva rājānaśca mahābalaḥ
मारुध को और बलपूर्वक रम्यग्राम को जीतकर, नाचीनों, अर्बुकों और उनके राजाओं को भी जीतकर, उस महाबली
श्लोक 16 (2.32.16)
तांस्तानाटविकान्सर्वानजयत्पाण्डुनन्दनः । वाताधिपं च नृपतिं वशे चक्रे महाबलः ॥
tāṃstānāṭavikānsarvānajayatpāṇḍunandanaḥ | vātādhipaṃ ca nṛpatiṃ vaśe cakre mahābalaḥ
पाण्डुनन्दन ने उन सभी वनवासी जातियों को जीत लिया, और उस महाबली ने राजा वाताधिप को भी वश में कर लिया।
श्लोक 17 (2.32.17)
पुलिन्दांश्च रणे जित्वा ययौ दक्षिणतः पुरः । युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुजः ॥
pulindāṃśca raṇe jitvā yayau dakṣiṇataḥ puraḥ | yuyudhe pāṇḍyarājena divasaṃ nakulānujaḥ
युद्ध में पुलिन्दों को जीतकर वे दक्षिण की ओर आगे बढ़े। नकुल के छोटे भाई ने पाण्ड्यराज से दिन भर युद्ध किया।
श्लोक 18 (2.32.18)
तं जित्वा स महाबाहुः प्रययौ दक्षिणापथम् । गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम् ॥
taṃ jitvā sa mahābāhuḥ prayayau dakṣiṇāpatham | guhāmāsādayāmāsa kiṣkindhāṃ lokaviśrutām
उसे जीतकर वे महाबाहु दक्षिणापथ पर चल पड़े और लोकविख्यात किष्किन्धा गुफा तक जा पहुँचे,
श्लोक 19 (2.32.19)
पुरा वानरराजेन वालिना चाभिरक्षिताम् । ततः कोसलराजस्य रामस्यैवानुगेन च । सुग्रीवेणाभिगुप्तां तां प्रविष्टस्तमथाह्वयत् ॥
purā vānararājena vālinā cābhirakṣitām | tataḥ kosalarājasya rāmasyaivānugena ca | sugrīveṇābhiguptāṃ tāṃ praviṣṭastamathāhvayat
जिसकी रक्षा पहले वानरराज वाली करते थे और फिर कोसलराज श्रीराम के अनुचर सुग्रीव करते थे। उसमें प्रवेश करके उन्होंने वहाँ के स्वामी को ललकारा।
श्लोक 20 (2.32.20)
तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च । युयुधे दिवसान्सप्त न च तौ विकृतिं गतौ ॥
tatra vānararājābhyāṃ maindena dvividena ca | yuyudhe divasānsapta na ca tau vikṛtiṃ gatau
वहाँ उन्होंने दो वानरराजों, मैन्द और द्विविद से सात दिन तक युद्ध किया, पर वे दोनों विचलित नहीं हुए।
श्लोक 21 (2.32.21)
ततस्तुष्टौ महात्मानौ सहदेवाय वानरौ । ऊचतुश्चैव संहृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥
tatastuṣṭau mahātmānau sahadevāya vānarau | ūcatuścaiva saṃhṛṣṭau prītipūrvamidaṃ vacaḥ
तब वे दोनों महात्मा वानर सहदेव से सन्तुष्ट होकर, हर्षित मन से प्रेमपूर्वक यह वचन बोले —
वानरावूचतुः
श्लोक 22 (2.32.22)
गच्छ पाण्डवशार्दूल रत्नान्यादाय सर्वशः । अविघ्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते ॥
gaccha pāṇḍavaśārdūla ratnānyādāya sarvaśaḥ | avighnamastu kāryāya dharmarājāya dhīmate
"हे पाण्डवसिंह! सब प्रकार के रत्न लेकर जाइए। बुद्धिमान् धर्मराज के कार्य में कोई विघ्न न आए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (2.32.23)
ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ । तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः ॥
tato ratnānyupādāya purīṃ māhiṣmatīṃ yayau | tatra nīlena rājñā sa cakre yuddhaṃ nararṣabhaḥ
फिर रत्न लेकर वे माहिष्मती नगरी गए, और वहाँ उस नरश्रेष्ठ ने राजा नील से युद्ध किया।
श्लोक 24 (2.32.24)
पाण्डवः परवीरघ्नः सहदेवः प्रतापवान् । ततोऽस्य सुमहद्युद्धमासीद्भीरुभयङ्करम् ॥
pāṇḍavaḥ paravīraghnaḥ sahadevaḥ pratāpavān | tato'sya sumahadyuddhamāsīdbhīrubhayaṅkaram
वे शत्रुवीरों का संहार करने वाले प्रतापी पाण्डव सहदेव थे। तब उनके बीच भीरुओं को भयभीत करने वाला अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ,
श्लोक 25 (2.32.25)
सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम् । चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान्हव्यवाहनः ॥
sainyakṣayakaraṃ caiva prāṇānāṃ saṃśayāvaham | cakre tasya hi sāhāyyaṃ bhagavānhavyavāhanaḥ
जो सेनाओं का संहार करने वाला और प्राणों को संकट में डालने वाला था; क्योंकि भगवान् हव्यवाहन अग्नि ने नील की सहायता की।
श्लोक 26 (2.32.26)
ततो रथा हया नागाः पुरुषाः कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा ॥
tato rathā hayā nāgāḥ puruṣāḥ kavacāni ca | pradīptāni vyadṛśyanta sahadevabale tadā
तब सहदेव की सेना में रथ, घोड़े, हाथी, पुरुष और कवच — सब जलते हुए दिखाई देने लगे।
श्लोक 27 (2.32.27)
ततः सुसंभ्रान्तमना बभूव कुरुनन्दनः । नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तोऽभूज्जनमेजय ॥
tataḥ susaṃbhrāntamanā babhūva kurunandanaḥ | nottaraṃ prativaktuṃ ca śakto'bhūjjanamejaya
हे जनमेजय! इससे कुरुनन्दन सहदेव का मन अत्यन्त व्याकुल हो गया, और वे कोई उत्तर न दे सके।
जनमेजय उवाच
श्लोक 28 (2.32.28)
किमर्थं भगवान्वह्निः प्रत्यमित्रोऽभवद्युधि । सहदेवस्य यज्ञार्थं घटमानस्य वै द्विज ॥
kimarthaṃ bhagavānvahniḥ pratyamitro'bhavadyudhi | sahadevasya yajñārthaṃ ghaṭamānasya vai dvija
हे द्विज! यज्ञ के लिए प्रयत्न कर रहे सहदेव के विरुद्ध भगवान् अग्नि युद्ध में शत्रु क्यों बन गए?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (2.32.29)
तत्र माहिष्मतीवासी भगवान्हव्यवाहनः । श्रूयते हि गृहीतो वै पुरस्तात्पारदारिकः ॥
tatra māhiṣmatīvāsī bhagavānhavyavāhanaḥ | śrūyate hi gṛhīto vai purastātpāradārikaḥ
कहा जाता है कि माहिष्मती में निवास करने वाले भगवान् हव्यवाहन पहले वहाँ परस्त्रीगामी के रूप में पकड़े गए थे।
श्लोक 30 (2.32.30)
नीलस्य राज्ञो दुहिता बभूवातीव शोभना । साऽग्निहोत्रमुपातिष्ठद्बोधनाय पितुः सदा ॥
nīlasya rājño duhitā babhūvātīva śobhanā | sā'gnihotramupātiṣṭhadbodhanāya pituḥ sadā
राजा नील की एक अत्यन्त सुन्दर पुत्री थी। वह अपने पिता के अग्निहोत्र की अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए सदा उसकी सेवा करती थी।
श्लोक 31 (2.32.31)
व्यजनैर्धूयमानोऽपि तावत्प्रज्वलते न सः । यावच्चारुपुटौष्ठेन वायुना न विधूयते ॥
vyajanairdhūyamāno'pi tāvatprajvalate na saḥ | yāvaccārupuṭauṣṭhena vāyunā na vidhūyate
पंखों से हवा करने पर भी वह अग्नि तब तक प्रज्वलित नहीं होती थी, जब तक उसके सुन्दर अधरों से निकली वायु उसे न छूती।
श्लोक 32 (2.32.32)
ततः स भगवानग्निश्चकमे तां सुदर्शनाम् । नीलस्य राज्ञः सर्वेषामुपनीतश्च सोऽभवत् ॥
tataḥ sa bhagavānagniścakame tāṃ sudarśanām | nīlasya rājñaḥ sarveṣāmupanītaśca so'bhavat
तब भगवान् अग्नि उस सुन्दरी पर आसक्त हो गए; वे राजा नील के समस्त कुल द्वारा स्थापित गृह-अग्नि थे।
श्लोक 33 (2.32.33)
ततो ब्राह्मणरूपेण रममाणो यदृच्छया । चकमे तां वरारोहां कन्यामुत्पललोचनाम् । तं तु राजा यथाशास्त्रमशासद्धार्मिकस्तदा ॥
tato brāhmaṇarūpeṇa ramamāṇo yadṛcchayā | cakame tāṃ varārohāṃ kanyāmutpalalocanām | taṃ tu rājā yathāśāstramaśāsaddhārmikastadā
तब ब्राह्मण का रूप धारण करके, इच्छानुसार विचरते हुए उन्होंने उस सुन्दर, कमलनयनी कन्या की कामना की। परन्तु धर्मात्मा राजा ने शास्त्र के अनुसार उन्हें दण्ड दिया।
श्लोक 34 (2.32.34)
प्रजज्वाल ततः कोपाद्भगवान्हव्यवाहनः । तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा जगाम शिरसाऽवनिम् ॥
prajajvāla tataḥ kopādbhagavānhavyavāhanaḥ | taṃ dṛṣṭvā vismito rājā jagāma śirasā'vanim
तब भगवान् हव्यवाहन क्रोध से प्रज्वलित हो उठे। यह देखकर विस्मित राजा ने धरती पर सिर टेक दिया।
श्लोक 35 (2.32.35)
ततः कालेन तां कन्यां तथैव हि तदा नृपः । प्रददौ विप्ररूपाय वह्नये शिरसा नतः ॥
tataḥ kālena tāṃ kanyāṃ tathaiva hi tadā nṛpaḥ | pradadau viprarūpāya vahnaye śirasā nataḥ
फिर समय आने पर राजा ने सिर झुकाकर वह कन्या ब्राह्मण-रूपधारी अग्नि को दे दी।
श्लोक 36 (2.32.36)
प्रतिगृह्य च तां सुभ्रुं नीलराज्ञः सुतां तदा । चक्रे प्रसादं भगवांस्तस्य राज्ञो विभावसुः ॥
pratigṛhya ca tāṃ subhruṃ nīlarājñaḥ sutāṃ tadā | cakre prasādaṃ bhagavāṃstasya rājño vibhāvasuḥ
राजा नील की उस सुन्दर भौंहों वाली पुत्री को स्वीकार करके भगवान् विभावसु ने तब उस राजा पर कृपा की।
श्लोक 37 (2.32.37)
वरेण च्छन्दयामास तं नृपं स्विष्टकृत्तमः । अभयं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ॥
vareṇa cchandayāmāsa taṃ nṛpaṃ sviṣṭakṛttamaḥ | abhayaṃ ca sa jagrāha svasainye vai mahīpatiḥ
स्विष्टकृत् कर्म करने वालों में श्रेष्ठ अग्नि ने राजा से वर माँगने को कहा, और उस पृथ्वीपति ने अपनी सेना के लिए अभय माँगा।
श्लोक 38 (2.32.38)
ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात्तां पुरीं नृपाः । जिगीषन्ति बलाद्राजंस्ते दह्यन्ते स्म वह्निना ॥
tataḥ prabhṛti ye kecidajñānāttāṃ purīṃ nṛpāḥ | jigīṣanti balādrājaṃste dahyante sma vahninā
हे राजन्! तब से जो भी राजा अज्ञानवश उस नगरी को बलपूर्वक जीतना चाहते हैं, वे अग्नि से जल जाते हैं।
श्लोक 39 (2.32.39)
तस्यां पुर्यां तदा चैव माहिष्मत्यां कुरूद्वह । बभूवुरनभिग्राह्या योषितश्छन्दतः किल ॥
tasyāṃ puryāṃ tadā caiva māhiṣmatyāṃ kurūdvaha | babhūvuranabhigrāhyā yoṣitaśchandataḥ kila
हे कुरुश्रेष्ठ! और कहते हैं कि तब से उस माहिष्मती नगरी में स्त्रियाँ किसी के नियन्त्रण में नहीं रहीं और अपनी इच्छा के अनुसार चलने लगीं।
श्लोक 40 (2.32.40)
एवमग्निर्वरं प्रादात्स्त्रीणामप्रतिवारणे । स्वैरिण्यस्तत्र नार्यो हि यथेष्टं प्रचरन्त्युत ॥
evamagnirvaraṃ prādātstrīṇāmaprativāraṇe | svairiṇyastatra nāryo hi yatheṣṭaṃ pracarantyuta
इस प्रकार अग्नि ने स्त्रियों को न रोके जाने का वर दिया; इसलिए वहाँ की स्त्रियाँ स्वच्छन्द हैं और अपनी इच्छा के अनुसार विचरती हैं।
श्लोक 41 (2.32.41)
वर्जयन्ति च राजानस्तत्पुरं भरतर्षभ । भयादग्नेर्महाराज तदाप्रभृति सर्वदा ॥
varjayanti ca rājānastatpuraṃ bharatarṣabha | bhayādagnermahārāja tadāprabhṛti sarvadā
हे भरतश्रेष्ठ महाराज! तभी से राजा अग्नि के भय से उस नगर को सदा छोड़कर चलते हैं।
श्लोक 42 (2.32.42)
सहदेवस्तु धर्मात्मा सैन्यं दृष्ट्वा भयार्दितम् । परीतमग्निना राजन्नाकम्पत यथाऽचलः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सोऽब्रवीत्पावकं ततः ॥
sahadevastu dharmātmā sainyaṃ dṛṣṭvā bhayārditam | parītamagninā rājannākampata yathā'calaḥ | upaspṛśya śucirbhūtvā so'bravītpāvakaṃ tataḥ
परन्तु धर्मात्मा सहदेव अपनी सेना को भयभीत और अग्नि से घिरी देखकर भी, हे राजन्, पर्वत की भाँति अविचल रहे। उन्होंने आचमन करके पवित्र होकर अग्नि से कहा —
सहदेव उवाच
श्लोक 43 (2.32.43)
त्वदर्थोऽयं समारम्भः कृष्णवर्त्मन्नमोऽस्तु ते । मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक ॥
tvadartho'yaṃ samārambhaḥ kṛṣṇavartmannamo'stu te | mukhaṃ tvamasi devānāṃ yajñastvamasi pāvaka
"हे कृष्णवर्त्मा! यह सारा आयोजन आपके ही लिए है; आपको नमस्कार है। हे पावक! आप देवताओं के मुख हैं, आप ही यज्ञ हैं।
श्लोक 44 (2.32.44)
पावनात्पावकश्चासि वहनाद्धव्यवाहनः । वेदास्त्वदर्थं जाता वै जातवेदास्ततो ह्यसि ॥
pāvanātpāvakaścāsi vahanāddhavyavāhanaḥ | vedāstvadarthaṃ jātā vai jātavedāstato hyasi
पवित्र करने के कारण आप पावक हैं और हवि वहन करने के कारण हव्यवाहन। वेद आपके लिए ही उत्पन्न हुए, इसीलिए आप जातवेदा हैं।
श्लोक 45 (2.32.45)
चित्रभानुः सुरेशश्च अनलस्त्वं विभावसो । स्वर्गद्वारस्पृशश्चासि हुताशो ज्वलनः शिखी ॥
citrabhānuḥ sureśaśca analastvaṃ vibhāvaso | svargadvāraspṛśaścāsi hutāśo jvalanaḥ śikhī
हे विभावसु! आप चित्रभानु, सुरेश और अनल हैं; आप स्वर्ग के द्वार को छूने वाले हैं; आप हुताश, ज्वलन और शिखी हैं।
श्लोक 46 (2.32.46)
वैश्वानरस्त्वं पिङ्गेशः प्लवङ्गो भूरितेजसः । कुमारसूस्त्वं भगवान्रुद्रगर्भो हिरण्यकृत् ॥
vaiśvānarastvaṃ piṅgeśaḥ plavaṅgo bhūritejasaḥ | kumārasūstvaṃ bhagavānrudragarbho hiraṇyakṛt
आप वैश्वानर, पिङ्गेश और प्लवङ्ग हैं, अपार तेज वाले हैं; आप कुमार (स्कन्द) को जन्म देने वाले भगवान्, रुद्रगर्भ और हिरण्यकृत् हैं।
श्लोक 47 (2.32.47)
अग्निर्ददातु मे तेजो वायुः प्राणं ददातु मे । पृथिवी बलमादध्याच्छिवं चापो दिशन्तु मे ॥
agnirdadātu me tejo vāyuḥ prāṇaṃ dadātu me | pṛthivī balamādadhyācchivaṃ cāpo diśantu me
अग्नि मुझे तेज दें, वायु मुझे प्राण दें, पृथ्वी मुझमें बल स्थापित करे और जल मेरा कल्याण करें।
श्लोक 48 (2.32.48)
अपां गर्भ महासत्व जातवेदः सुरेश्वर । देवानां मुखमग्ने त्वं सत्येन विपुनीहि माम् ॥
apāṃ garbha mahāsatva jātavedaḥ sureśvara | devānāṃ mukhamagne tvaṃ satyena vipunīhi mām
हे जल के गर्भ, महाबली जातवेदा, देवेश्वर! हे अग्ने, आप देवताओं के मुख हैं; सत्य के द्वारा मुझे पवित्र कीजिए।
श्लोक 49 (2.32.49)
ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव दैवतैरसुरैरपि । नित्यं सुहुत यज्ञेषु सत्येन विपुनीहि माम् ॥
ṛṣibhirbrāhmaṇaiścaiva daivatairasurairapi | nityaṃ suhuta yajñeṣu satyena vipunīhi mām
हे ऋषियों, ब्राह्मणों, देवताओं और असुरों द्वारा भी यज्ञों में सदा भलीभाँति आहुति पाने वाले! सत्य के द्वारा मुझे पवित्र कीजिए।
श्लोक 50 (2.32.50)
धूमकेतुः शिखी च त्वं पापहाऽनिलसम्भवः । सर्वप्राणिषु नित्यस्थः सत्येन विपुनीहि माम् ॥
dhūmaketuḥ śikhī ca tvaṃ pāpahā'nilasambhavaḥ | sarvaprāṇiṣu nityasthaḥ satyena vipunīhi mām
आप धूमकेतु हैं, शिखी हैं, पापों का नाश करने वाले और वायु से उत्पन्न हैं; सब प्राणियों में सदा स्थित रहने वाले! सत्य के द्वारा मुझे पवित्र कीजिए।
श्लोक 51 (2.32.51)
एवं स्तुतोऽसि भगवन्प्रीतेन शुचिना मया । तुष्टिं पुष्टिं श्रुतं चैव प्रीतिं चाग्ने प्रयच्छ मे ॥
evaṃ stuto'si bhagavanprītena śucinā mayā | tuṣṭiṃ puṣṭiṃ śrutaṃ caiva prītiṃ cāgne prayaccha me
हे भगवन्! मैंने प्रेमपूर्वक और पवित्र होकर इस प्रकार आपकी स्तुति की है। हे अग्ने! मुझे सन्तोष, पुष्टि, विद्या और प्रसन्नता प्रदान कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 52 (2.32.52)
इत्येवं मन्त्रमाग्नेयं पठन्यो जुहुयाद्विभुम् । ऋद्धिमान्सततं दान्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
ityevaṃ mantramāgneyaṃ paṭhanyo juhuyādvibhum | ṛddhimānsatataṃ dāntaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
जो इस आग्नेय मन्त्र का पाठ करते हुए विभु अग्नि में आहुति देता है, वह सदा समृद्ध और संयमी होता है तथा सब पापों से मुक्त हो जाता है।
सहदेव उवाच
श्लोक 53 (2.32.53)
यज्ञविघ्नमिमं कर्तुं नार्हस्त्वं यज्ञवाहन ॥
yajñavighnamimaṃ kartuṃ nārhastvaṃ yajñavāhana
"हे यज्ञवाहन! आपको इस यज्ञ में यह विघ्न नहीं डालना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (2.32.54)
एवमुक्त्वा तु माद्रेयः कुशैरास्तीर्य मेदिनीम् ॥
evamuktvā tu mādreyaḥ kuśairāstīrya medinīm
ऐसा कहकर माद्रीपुत्र ने धरती पर कुश बिछाया,
श्लोक 55 (2.32.55)
विधिवत्पुरुषव्याघ्रः पावकं प्रत्युपाविशत् । प्रमुखे तस्य सैन्यस्य भीतोद्विग्नस्य भारत ॥
vidhivatpuruṣavyāghraḥ pāvakaṃ pratyupāviśat | pramukhe tasya sainyasya bhītodvignasya bhārata
और हे भारत! वह पुरुषसिंह अपनी भयभीत और व्याकुल सेना के आगे विधिपूर्वक अग्नि के सामने बैठ गया।
श्लोक 56 (2.32.56)
न चैनमत्यगाद्वह्निर्वेलामिव महोदधिः । तमुपेत्य शनैर्वह्निरुवाच कुरुनन्दनम् ॥
na cainamatyagādvahnirvelāmiva mahodadhiḥ | tamupetya śanairvahniruvāca kurunandanam
और अग्नि ने उनका उल्लंघन नहीं किया, जैसे महासागर अपने तट का उल्लंघन नहीं करता। धीरे-से उनके पास आकर अग्नि ने कुरुनन्दन से,
श्लोक 57 (2.32.57)
सहदेवं नृणां देवं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥
sahadevaṃ nṛṇāṃ devaṃ sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ
मनुष्यों में देवतुल्य सहदेव से, सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा —
अग्निरुवाच
श्लोक 58 (2.32.58)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कौरव्य जिज्ञासेयं कृता मया ॥
uttiṣṭhottiṣṭha kauravya jijñāseyaṃ kṛtā mayā
"उठो, उठो, हे कौरव्य! यह तो मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी।
श्लोक 59 (2.32.59)
वेद्मि सर्वमभिप्रायं तव धर्मसुतस्य च । मया तु रक्षितव्या पुरीयं भरतसत्तम ॥
vedmi sarvamabhiprāyaṃ tava dharmasutasya ca | mayā tu rakṣitavyā purīyaṃ bharatasattama
मैं तुम्हारा और धर्मपुत्र युधिष्ठिर का सारा अभिप्राय जानता हूँ। परन्तु हे भरतश्रेष्ठ, मुझे इस नगरी की रक्षा करनी है,
श्लोक 60 (2.32.60)
यावद्राज्ञो हि नीलस्य कुले वंशधरा इति । ईप्सितं तु करिष्यामि मनसस्तव पाण्डव ॥
yāvadrājño hi nīlasya kule vaṃśadharā iti | īpsitaṃ tu kariṣyāmi manasastava pāṇḍava
जब तक राजा नील के कुल में वंश चलाने वाले हैं। फिर भी, हे पाण्डव, मैं तुम्हारे मन की इच्छा पूरी करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 61 (2.32.61)
तत उत्थाय हृष्टात्मा प्राञ्जलिः शिरसा नतः । पूजयामास माद्रेयः पावकं भरतर्षभ ॥
tata utthāya hṛṣṭātmā prāñjaliḥ śirasā nataḥ | pūjayāmāsa mādreyaḥ pāvakaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! तब माद्रीपुत्र ने प्रसन्न मन से उठकर, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर अग्नि का पूजन किया।
श्लोक 62 (2.32.62)
पावके विनिवृत्ते तु नीलो राजाऽभ्यगात्तदा । पावकस्याज्ञया चैनमर्चयामास पार्थिवः ॥
pāvake vinivṛtte tu nīlo rājā'bhyagāttadā | pāvakasyājñayā cainamarcayāmāsa pārthivaḥ
अग्नि के लौट जाने पर राजा नील वहाँ आए, और अग्नि की आज्ञा से उस राजा ने
श्लोक 63 (2.32.63)
सत्कारेण नरव्याघ्रं सहदेवं युधां पतिम् । प्रतिगृह्य च तां पूजां करे च विनिवेश्य च ॥
satkāreṇa naravyāghraṃ sahadevaṃ yudhāṃ patim | pratigṛhya ca tāṃ pūjāṃ kare ca viniveśya ca
योद्धाओं के स्वामी, पुरुषसिंह सहदेव का सत्कारपूर्वक पूजन किया। उस पूजा को स्वीकार करके और उसे करदाता बनाकर,
श्लोक 64 (2.32.64)
माद्रीसुतस्ततः प्रायाद्विजयी दक्षिणां दिशम् । त्रैपुरं स वशे कृत्वा राजानममितौजसम् ॥
mādrīsutastataḥ prāyādvijayī dakṣiṇāṃ diśam | traipuraṃ sa vaśe kṛtvā rājānamamitaujasam
विजयी माद्रीपुत्र आगे दक्षिण दिशा में बढ़े। अमित तेजस्वी त्रैपुर-नरेश को वश में करके,
श्लोक 65 (2.32.65)
निजग्राह महाबाहुस्तरसा पौरवेश्वरम् । आकृतिं कौशिकाचार्यं यत्नेन महता ततः ॥
nijagrāha mahābāhustarasā pauraveśvaram | ākṛtiṃ kauśikācāryaṃ yatnena mahatā tataḥ
उन महाबाहु ने शीघ्र ही पौरवेश्वर को अधीन किया; और फिर बड़े प्रयत्न से
श्लोक 66 (2.32.66)
वशे चक्रे महाबाहुः सुराष्ट्राधिपतिं तदा । सुराष्ट्रविषयस्थश्च प्रेषयामास रुक्मिणे ॥
vaśe cakre mahābāhuḥ surāṣṭrādhipatiṃ tadā | surāṣṭraviṣayasthaśca preṣayāmāsa rukmiṇe
उन महाबाहु ने कौशिकों के आचार्य, सुराष्ट्र के अधिपति आकृति को वश में किया। सुराष्ट्र देश में रहते हुए उन्होंने रुक्मी के पास,
श्लोक 67 (2.32.67)
राज्ञे भोजकटस्थाय महामात्राय धीमते । भीष्मकाय स धर्मात्मा साक्षादिन्द्रसखाय वै ॥
rājñe bhojakaṭasthāya mahāmātrāya dhīmate | bhīṣmakāya sa dharmātmā sākṣādindrasakhāya vai
और भोजकट में रहने वाले बुद्धिमान्, उच्च पदस्थ, साक्षात् इन्द्र के मित्र राजा भीष्मक के पास — उस धर्मात्मा ने सन्देश भेजा।
श्लोक 68 (2.32.68)
स चास्य प्रतिजग्राह ससुतः शासनं तदा । प्रीतिपूर्वं महाराज वासुदेवमवेक्ष्य च ॥
sa cāsya pratijagrāha sasutaḥ śāsanaṃ tadā | prītipūrvaṃ mahārāja vāsudevamavekṣya ca
हे महाराज! और भीष्मक ने अपने पुत्र सहित वासुदेव का ध्यान रखते हुए उनकी आज्ञा प्रेमपूर्वक स्वीकार कर ली।
श्लोक 69 (2.32.69)
ततः स रत्नान्यादाय पुनः प्रायाद्युधां पतिः । ततः शूर्पारकं चैव तालाकटमथापि च ॥
tataḥ sa ratnānyādāya punaḥ prāyādyudhāṃ patiḥ | tataḥ śūrpārakaṃ caiva tālākaṭamathāpi ca
तब रत्न लेकर योद्धाओं के स्वामी फिर आगे बढ़े। फिर शूर्पारक और तालाकट को,
श्लोक 70 (2.32.70)
वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश्च महाबलः । सागरद्वीपवासांश्च नृपतीन्म्लेच्छयोनिजान् ॥
vaśe cakre mahātejā daṇḍakāṃśca mahābalaḥ | sāgaradvīpavāsāṃśca nṛpatīnmlecchayonijān
उस महातेजस्वी महाबली ने वश में किया, और दण्डकों को भी; समुद्र के द्वीपों में रहने वाले म्लेच्छवंशी राजाओं को,
श्लोक 71 (2.32.71)
निषादान्पुरुषादांश्च कर्णप्रावरणानपि । ये च कालमुखा नाम नरराक्षसयोनयः ॥
niṣādānpuruṣādāṃśca karṇaprāvaraṇānapi | ye ca kālamukhā nāma nararākṣasayonayaḥ
निषादों को, पुरुषादों (नरभक्षियों) को, कर्णप्रावरणों को, और उन्हें जो कालमुख कहलाते हैं और मनुष्य तथा राक्षस से उत्पन्न हैं,
श्लोक 72 (2.32.72)
कृत्स्नं कोलगिरिं चैव सुरभीपट्टनं तथा । द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथा ॥
kṛtsnaṃ kolagiriṃ caiva surabhīpaṭṭanaṃ tathā | dvīpaṃ tāmrāhvayaṃ caiva parvataṃ rāmakaṃ tathā
सम्पूर्ण कोलगिरि को, सुरभीपट्टन को, ताम्र नामक द्वीप को और रामक पर्वत को;
श्लोक 73 (2.32.73)
तिमिङ्गिलं च स नृपं वशे कृत्वा महामतिः । एकपादांश्च पुरुषान्केरलान्वनवासिनः ॥
timiṅgilaṃ ca sa nṛpaṃ vaśe kṛtvā mahāmatiḥ | ekapādāṃśca puruṣānkeralānvanavāsinaḥ
और उस बुद्धिमान् ने राजा तिमिङ्गिल को वश में किया। एकपाद पुरुषों को, वनवासी केरलों को,
श्लोक 74 (2.32.74)
नगरीं सञ्जयन्तीं च पाषण्डं करहाटकम् । दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत् ॥
nagarīṃ sañjayantīṃ ca pāṣaṇḍaṃ karahāṭakam | dūtaireva vaśe cakre karaṃ cainānadāpayat
संजयन्ती नगरी को, पाषण्ड और करहाटक को उन्होंने केवल दूतों द्वारा ही वश में कर लिया और उनसे कर दिलवाया।
श्लोक 75 (2.32.75)
पाण्ड्यांश्च द्रविडांश्चैव सहितांश्चोड्रकेरलैः । अन्ध्रांस्तलवनांश्चैव कलिङ्गानुष्ट्रकर्णिकान् ॥
pāṇḍyāṃśca draviḍāṃścaiva sahitāṃścoḍrakeralaiḥ | andhrāṃstalavanāṃścaiva kaliṅgānuṣṭrakarṇikān
पाण्ड्यों और द्रविड़ों को, ओड्रों और केरलों सहित, आन्ध्रों, तलवनों, कलिङ्गों और उष्ट्रकर्णिकों को,
श्लोक 76 (2.32.76)
आटवीं च पुरीं रम्यां यवनानां पुरं तथा । दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत् ॥
āṭavīṃ ca purīṃ ramyāṃ yavanānāṃ puraṃ tathā | dūtaireva vaśe cakre karaṃ cainānadāpayat
रमणीय आटवी पुरी को और यवनों के नगर को उन्होंने केवल दूतों द्वारा ही वश में कर लिया और उनसे कर दिलवाया।
श्लोक 77 (2.32.77)
ताम्रपर्णीं ततो गत्वा कन्यातीर्थमतीत्य च । दक्षिणां च दिशं सर्वां विजित्य कुरुनन्दनः ॥
tāmraparṇīṃ tato gatvā kanyātīrthamatītya ca | dakṣiṇāṃ ca diśaṃ sarvāṃ vijitya kurunandanaḥ
फिर ताम्रपर्णी नदी तक जाकर और कन्यातीर्थ को पार करके कुरुनन्दन ने सम्पूर्ण दक्षिण दिशा को जीत लिया,
श्लोक 78 (2.32.78)
उत्तरं तीरमासाद्य सागरस्योर्मिमालिनः । चिन्तयामास कौन्तेयो भ्रातुः पुत्रं घटोत्कचम् ॥
uttaraṃ tīramāsādya sāgarasyormimālinaḥ | cintayāmāsa kaunteyo bhrātuḥ putraṃ ghaṭotkacam
और लहरों की माला से सजे समुद्र के उत्तरी तट पर पहुँचकर उस पाण्डव ने अपने भाई के पुत्र घटोत्कच का स्मरण किया।
श्लोक 79 (2.32.79)
ततश्चिन्तितमात्रस्तु राक्षसः प्रत्यदृश्यत । तं मेरुशिखराकारमागतं पाण्डुनन्दनः ॥
tataścintitamātrastu rākṣasaḥ pratyadṛśyata | taṃ meruśikharākāramāgataṃ pāṇḍunandanaḥ
स्मरण करते ही वह राक्षस प्रकट हो गया। मेरु के शिखर जैसे विशाल उस आए हुए राक्षस से पाण्डुनन्दन ने,
श्लोक 80 (2.32.80)
भृगुकच्छात्ततो धीमान्साम्नैवामित्रकर्शनः । आगम्यतामिति प्राह धर्मराजस्य शासनात् ॥
bhṛgukacchāttato dhīmānsāmnaivāmitrakarśanaḥ | āgamyatāmiti prāha dharmarājasya śāsanāt
उस बुद्धिमान् शत्रुनाशक ने तब भृगुकच्छ से धर्मराज की आज्ञा के अनुसार शान्त भाव से कहा, "आओ।"
श्लोक 81 (2.32.81)
स राक्षसपरीवारस्तं प्रणम्याशु संस्थितः । घटोत्कचं महात्मानं राक्षसं घोरदर्शनम् ॥
sa rākṣasaparīvārastaṃ praṇamyāśu saṃsthitaḥ | ghaṭotkacaṃ mahātmānaṃ rākṣasaṃ ghoradarśanam
अपने राक्षस-परिवार से घिरा वह उन्हें प्रणाम करके तुरन्त सेवा में खड़ा हो गया। उस भयानक रूप वाले महात्मा राक्षस घटोत्कच को,
श्लोक 82 (2.32.82)
तत्रस्थः प्रेषयामास पौलस्त्याय महात्मने । बिभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिन्दमः ॥
tatrasthaḥ preṣayāmāsa paulastyāya mahātmane | bibhīṣaṇāya dharmātmā prītipūrvamarindamaḥ
उस धर्मात्मा शत्रुदमन ने वहीं रहते हुए प्रेमपूर्वक पुलस्त्यवंशी महात्मा विभीषण के पास भेजा।
श्लोक 83 (2.32.83)
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् । तच्च कृष्णकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥
sa cāsya pratijagrāha śāsanaṃ prītipūrvakam | tacca kṛṣṇakṛtaṃ dhīmānabhyamanyata sa prabhuḥ
और विभीषण ने उनकी आज्ञा प्रेमपूर्वक स्वीकार कर ली; उस बुद्धिमान् प्रभु ने इसे श्रीकृष्ण का ही किया हुआ माना।
श्लोक 84 (2.32.84)
ततः सम्प्रेषयामास रत्नानि विविधानि च । चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्याभरणानि च । वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् ॥
tataḥ sampreṣayāmāsa ratnāni vividhāni ca | candanāgurukāṣṭhāni divyānyābharaṇāni ca | vāsāṃsi ca mahārhāṇi maṇīṃścaiva mahādhanān
तब उन्होंने अनेक प्रकार के रत्न, चन्दन और अगरु की लकड़ी, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और महामूल्यवान् मणियाँ भेजीं।