सभा पर्व · अध्याय 31
भीमसेन की पूर्व दिशा पर विजय
भीमसेन पूर्व दिशा में अपना अभियान आगे बढ़ाते हैं: कोसल और अयोध्या, हिमालय की तलहटी, काशी, मत्स्य, वत्सभूमि, विदेह और किरातों के अधिपति, फिर मगध, जहाँ वे जरासन्ध के पुत्र को करदाता बनाते हैं। वे कर्ण को, मोदागिरि के राजा को, पौण्ड्रक वासुदेव को (जो श्रीकृष्ण के भय से कर दे देता है) तथा वङ्ग, ताम्रलिप्त और समुद्रतट के राजाओं को जीतते हैं, लौहित्य तक पहुँचते हैं और अपार धन लेकर इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के पास लौटते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.31.1)
ततः कुमारविषये श्रेणिमन्तमथाजयत् । कोसलाधिपतिं चैव बृहद्बलमरिन्दमः ॥
tataḥ kumāraviṣaye śreṇimantamathājayat | kosalādhipatiṃ caiva bṛhadbalamarindamaḥ
तत्पश्चात् शत्रुदमन भीम ने कुमार देश में श्रेणिमान् को जीता, और कोसल के अधिपति बृहद्बल को भी।
श्लोक 2 (2.31.2)
अयोध्यायां तु धर्मज्ञं दीर्घयज्ञं महाबलम् । अजयत्पाण्डवश्रेष्ठो नातितीव्रेण कर्मणा ॥
ayodhyāyāṃ tu dharmajñaṃ dīrghayajñaṃ mahābalam | ajayatpāṇḍavaśreṣṭho nātitīvreṇa karmaṇā
अयोध्या में पाण्डवश्रेष्ठ ने धर्मज्ञ और महाबली दीर्घयज्ञ को बिना किसी कठोर युद्ध के जीत लिया।
श्लोक 3 (2.31.3)
ततो गोपालकक्षं च सोत्तरानपि कोसलान् । मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं चाजयत्प्रभुः ॥
tato gopālakakṣaṃ ca sottarānapi kosalān | mallānāmadhipaṃ caiva pārthivaṃ cājayatprabhuḥ
फिर प्रभु भीम ने गोपालकक्ष को, उत्तरी कोसलों सहित कोसलों को, और मल्लों के अधिपति राजा को जीत लिया।
श्लोक 4 (2.31.4)
ततो हिमवतः पार्श्वं समभ्येत्य जलोद्भवम् । सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशं बली ॥
tato himavataḥ pārśvaṃ samabhyetya jalodbhavam | sarvamalpena kālena deśaṃ cakre vaśaṃ balī
इसके बाद हिमालय के पार्श्व में स्थित जलोद्भव में पहुँचकर उस बलवान् ने थोड़े ही समय में वह सारा देश अपने वश में कर लिया।
श्लोक 5 (2.31.5)
एवं बहुविधान्देशान्विजिग्ये भरतर्षभः । भल्लाटमभितो जिग्ये शुक्तिमन्तं च पर्वतम् ॥
evaṃ bahuvidhāndeśānvijigye bharatarṣabhaḥ | bhallāṭamabhito jigye śuktimantaṃ ca parvatam
इस प्रकार भरतश्रेष्ठ ने अनेक प्रकार के देश जीते। उन्होंने भल्लाट के चारों ओर का प्रदेश और शुक्तिमान् पर्वत भी जीत लिया।
श्लोक 6 (2.31.6)
पाण्डवः सुमहावीर्यो बलेन बलिनां वरः । स काशिराजं समरे सुबाहुमनिवर्तिनम् ॥
pāṇḍavaḥ sumahāvīryo balena balināṃ varaḥ | sa kāśirājaṃ samare subāhumanivartinam
अत्यन्त पराक्रमी, बलवानों में श्रेष्ठ उस पाण्डव ने — युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले काशिराज सुबाहु को
श्लोक 7 (2.31.7)
वशे चक्रे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः । ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम् ॥
vaśe cakre mahābāhurbhīmo bhīmaparākramaḥ | tataḥ supārśvamabhitastathā rājapatiṃ kratham
भयंकर पराक्रम वाले महाबाहु भीम ने वश में कर लिया। फिर सुपार्श्व के प्रदेश में पाण्डवश्रेष्ठ ने राजाओं के राजा क्रथ को,
श्लोक 8 (2.31.8)
युध्यमानं बलात्सङ्ख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः । ततो मत्स्यान्महातेजा मलदांश्च महाबलान् ॥
yudhyamānaṃ balātsaṅkhye vijigye pāṇḍavarṣabhaḥ | tato matsyānmahātejā maladāṃśca mahābalān
जो युद्ध में पूरे बल से लड़ रहा था, जीत लिया। तब उस महातेजस्वी ने मत्स्यों और महाबली मलदों को,
श्लोक 9 (2.31.9)
अनघानभयांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः । निवृत्य च महाबाहुर्मदधारं महीधरम् ॥
anaghānabhayāṃścaiva paśubhūmiṃ ca sarvaśaḥ | nivṛtya ca mahābāhurmadadhāraṃ mahīdharam
अनघों और अभयों को तथा सम्पूर्ण पशुभूमि को भी जीता। फिर लौटकर वे महाबाहु मदधार पर्वत पर गए,
श्लोक 10 (2.31.10)
सोमधेयांश्च निर्जित्य प्रययावुत्तरामुखः । वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान्बलात् ॥
somadheyāṃśca nirjitya prayayāvuttarāmukhaḥ | vatsabhūmiṃ ca kaunteyo vijigye balavānbalāt
और सोमधेयों को जीतकर वे उत्तर की ओर मुख करके चल पड़े। फिर बलवान् कुन्तीपुत्र ने बलपूर्वक वत्सभूमि को जीत लिया।
श्लोक 11 (2.31.11)
भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा । विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान्बहून् ॥
bhargāṇāmadhipaṃ caiva niṣādādhipatiṃ tathā | vijigye bhūmipālāṃśca maṇimatpramukhānbahūn
उन्होंने भर्गों के अधिपति को, निषादों के अधिपति को, और मणिमान् आदि बहुत-से भूपालों को जीत लिया।
श्लोक 12 (2.31.12)
ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पर्वतम् । तरसैवाजयद्भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ॥
tato dakṣiṇamallāṃśca bhogavantaṃ ca parvatam | tarasaivājayadbhīmo nātitīvreṇa karmaṇā
फिर भीम ने बिना कठोर युद्ध के, शीघ्र ही दक्षिण मल्लों और भोगवान् पर्वत को जीत लिया।
श्लोक 13 (2.31.13)
शर्मकान्वर्मकांश्चैव व्यजयत्सान्त्वपूर्वकम् । वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् ॥
śarmakānvarmakāṃścaiva vyajayatsāntvapūrvakam | vaidehakaṃ ca rājānaṃ janakaṃ jagatīpatim
शर्मकों और वर्मकों को उन्होंने समझा-बुझाकर अपने पक्ष में किया; और विदेह के राजा, पृथ्वीपति जनक को
श्लोक 14 (2.31.14)
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा । शकांश्च बर्बराश्चैव अजयच्छद्मपूर्वकम् ॥
vijigye puruṣavyāghro nātitīvreṇa karmaṇā | śakāṃśca barbarāścaiva ajayacchadmapūrvakam
उस पुरुषसिंह ने बिना कठोर युद्ध के जीत लिया। शकों और बर्बरों को उन्होंने छल-युक्ति से जीता।
श्लोक 15 (2.31.15)
वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् । किरातानामधिपतीनजयत्सप्त पाण्डवः ॥
vaidehasthastu kaunteya indraparvatamantikāt | kirātānāmadhipatīnajayatsapta pāṇḍavaḥ
विदेह में ठहरे हुए कुन्तीपुत्र पाण्डव ने इन्द्रपर्वत के समीप से किरातों के सात अधिपतियों को जीत लिया।
श्लोक 16 (2.31.16)
ततः सुह्यान्प्रसुह्यांश्च सपक्षानतिवीर्यवान् । विजित्य युधि कौन्तेयो मागधानभ्यधाद्बली ॥
tataḥ suhyānprasuhyāṃśca sapakṣānativīryavān | vijitya yudhi kaunteyo māgadhānabhyadhādbalī
तब अत्यन्त पराक्रमी कुन्तीपुत्र ने युद्ध में सुह्मों, प्रसुह्मों और उनके सहायकों को जीतकर मगधवासियों से कर देने को कहा।
श्लोक 17 (2.31.17)
दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् । तैरेव सहितैः सर्वैर्गिरिव्रजमुपाद्रवत् ॥
daṇḍaṃ ca daṇḍadhāraṃ ca vijitya pṛthivīpatīn | taireva sahitaiḥ sarvairgirivrajamupādravat
दण्ड और दण्डधार नामक पृथ्वीपतियों को जीतकर वे उन सबको साथ लेकर गिरिव्रज पर चढ़ गए।
श्लोक 18 (2.31.18)
जारासन्धिं सान्त्वयित्वा करे च विनिवेश्य ह । तैरेव सहितैः सर्वैः कर्णमभ्यद्रवद्बली ॥
jārāsandhiṃ sāntvayitvā kare ca viniveśya ha | taireva sahitaiḥ sarvaiḥ karṇamabhyadravadbalī
जरासन्ध के पुत्र को सान्त्वना देकर और उसे करदाता बनाकर, वे बलवान् उन सबके साथ कर्ण पर टूट पड़े।
श्लोक 19 (2.31.19)
स कम्पयन्निव महीं बलेन चतुरङ्गिणा । युयुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनामित्रघातिना ॥
sa kampayanniva mahīṃ balena caturaṅgiṇā | yuyudhe pāṇḍavaśreṣṭhaḥ karṇenāmitraghātinā
अपनी चतुरंगिणी सेना से मानो पृथ्वी को कँपाते हुए पाण्डवश्रेष्ठ ने शत्रुनाशक कर्ण से युद्ध किया।
श्लोक 20 (2.31.20)
स कर्णं युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत । ततो विजिग्ये बलवान्राज्ञः पर्वतवासिनः ॥
sa karṇaṃ yudhi nirjitya vaśe kṛtvā ca bhārata | tato vijigye balavānrājñaḥ parvatavāsinaḥ
हे भारत! युद्ध में कर्ण को हराकर और उसे वश में करके उस बलवान् ने फिर पर्वतवासी राजाओं को जीत लिया।
श्लोक 21 (2.31.21)
अथ मोदागिरौ चैव राजानं बलवत्तरम् । पाण्डवो बाहुवीर्येण निजघान महामृधे ॥
atha modāgirau caiva rājānaṃ balavattaram | pāṇḍavo bāhuvīryeṇa nijaghāna mahāmṛdhe
फिर मोदागिरि में पाण्डव ने अपनी भुजाओं के बल से एक अत्यन्त बलशाली राजा को महासंग्राम में मार डाला।
श्लोक 22 (2.31.22)
ततः पुण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं समाययौ । इदानीं वृष्णिवीरेण न योत्स्यामीति पौण्ड्रकः ॥
tataḥ puṇḍrādhipaṃ vīraṃ vāsudevaṃ samāyayau | idānīṃ vṛṣṇivīreṇa na yotsyāmīti pauṇḍrakaḥ
फिर वे पुण्ड्रों के वीर अधिपति वासुदेव के पास पहुँचे। "अब मैं वृष्णिवीर से युद्ध नहीं करूँगा" — यह कहकर पौण्ड्रक ने,
श्लोक 23 (2.31.23)
कृष्णस्य भुजसंत्रासात्करमाशु ददौ नृपः । कौशिकीकच्छनिलयं राजानं च महौजसम् ॥
kṛṣṇasya bhujasaṃtrāsātkaramāśu dadau nṛpaḥ | kauśikīkacchanilayaṃ rājānaṃ ca mahaujasam
श्रीकृष्ण की भुजाओं के भय से, उस राजा ने तुरन्त कर दे दिया। और कौशिकी नदी के कछार में रहने वाले महाबली राजा को भी —
श्लोक 24 (2.31.24)
उभौ बलभृतौ वीरावुभौ तीव्रपराक्रमौ । निर्जित्याजौ महाराज वङ्गराजमुपाद्रवत् ॥
ubhau balabhṛtau vīrāvubhau tīvraparākramau | nirjityājau mahārāja vaṅgarājamupādravat
इन दोनों बलवान्, तीव्र पराक्रम वाले वीरों को युद्ध में जीतकर, हे महाराज, वे वङ्गराज पर चढ़ गए।
श्लोक 25 (2.31.25)
समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् । ताम्रलिप्तं च राजानं कर्वटाधिपतिं तथा ॥
samudrasenaṃ nirjitya candrasenaṃ ca pārthivam | tāmraliptaṃ ca rājānaṃ karvaṭādhipatiṃ tathā
समुद्रसेन और राजा चन्द्रसेन को, ताम्रलिप्त के राजा को और कर्वटों के अधिपति को जीतकर,
श्लोक 26 (2.31.26)
सुह्यानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः । सर्वान्म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥
suhyānāmadhipaṃ caiva ye ca sāgaravāsinaḥ | sarvānmlecchagaṇāṃścaiva vijigye bharatarṣabhaḥ
सुह्मों के अधिपति को, सागर-तट के निवासियों को और म्लेच्छों के सभी समूहों को भरतश्रेष्ठ ने जीत लिया।
श्लोक 27 (2.31.27)
एवं बहुविधान्देशान्विजित्य पवनात्मजः । वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद्बली ॥
evaṃ bahuvidhāndeśānvijitya pavanātmajaḥ | vasu tebhya upādāya lauhityamagamadbalī
इस प्रकार अनेक देशों को जीतकर पवनपुत्र भीम उनसे धन लेकर लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) तक जा पहुँचे।
श्लोक 28 (2.31.28)
स सर्वान्म्लेच्छनृपतीन्सागरानूपवासिनः । करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥
sa sarvānmlecchanṛpatīnsāgarānūpavāsinaḥ | karamāhārayāmāsa ratnāni vividhāni ca
उन्होंने समुद्र के तटवर्ती दलदली प्रदेशों में रहने वाले सभी म्लेच्छ राजाओं से कर और अनेक प्रकार के रत्न मँगवाए —
श्लोक 29 (2.31.29)
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् । काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥
candanāguruvastrāṇi maṇimauktikakambalam | kāñcanaṃ rajataṃ caiva vidrumaṃ ca mahādhanam
चन्दन, अगरु और वस्त्र, मणि, मोती और कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगा।
श्लोक 30 (2.31.30)
ते कोटीशतसङ्ख्येन कौन्तेयं महता तदा । अभ्यवर्षन्महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥
te koṭīśatasaṅkhyena kaunteyaṃ mahatā tadā | abhyavarṣanmahātmānaṃ dhanavarṣeṇa pāṇḍavam
तब उन्होंने महात्मा कुन्तीपुत्र पाण्डव पर सैकड़ों करोड़ की संख्या वाली धन की भारी वर्षा कर दी।
श्लोक 31 (2.31.31)
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रमः । निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद्धनम् ॥
indraprasthamupāgamya bhīmo bhīmaparākramaḥ | nivedayāmāsa tadā dharmarājāya taddhanam
इन्द्रप्रस्थ लौटकर भयंकर पराक्रमी भीम ने वह सारा धन धर्मराज युधिष्ठिर को अर्पित कर दिया।