सभा पर्व · अध्याय 30
भीम का पूर्व-दिग्विजय के लिए प्रस्थान और शिशुपाल से भेंट
उसी समय भीमसेन युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर विशाल सेना के साथ पूर्व दिशा की ओर चलते हैं। वे पाञ्चालों को समझा-बुझाकर अपने पक्ष में करते हैं, गण्डकों, विदेहों और दशार्णों को जीतते हैं — दशार्ण-नरेश सुधर्मा उनसे बिना शस्त्रों के युद्ध करता है और भीम उसे अपना प्रधान सेनापति बना लेते हैं — तथा अश्वमेध के राजा रोचमान, पूर्व देश और पुलिन्दों को परास्त करते हैं। युधिष्ठिर की आज्ञा से वे चेदिराज शिशुपाल के पास जाते हैं, जो उनका स्वागत करता है, उनका उद्देश्य सुनकर उसे स्वीकार करता है और तीस रातों तक उनका सत्कार करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.30.1)
एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान् । धर्मराजमनुज्ञाप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति ॥
etasminneva kāle tu bhīmaseno'pi vīryavān | dharmarājamanujñāpya yayau prācīṃ diśaṃ prati
उसी समय पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराज से आज्ञा लेकर पूर्व दिशा की ओर चल पड़े,
श्लोक 2 (2.30.2)
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् ॥
mahatā balacakreṇa pararāṣṭrāvamardinā | hastyaśvarathapūrṇena daṃśitena pratāpavān
शत्रु-राज्यों को रौंदने वाली, हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी, कवचधारी विशाल सेना के साथ; और वह प्रतापी वीर,
श्लोक 3 (2.30.3)
वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्धनः । स गत्वा नरशार्दूलः पञ्चालानां पुरं महत् ॥
vṛto bharataśārdūlo dviṣacchokavivardhanaḥ | sa gatvā naraśārdūlaḥ pañcālānāṃ puraṃ mahat
शत्रुओं का शोक बढ़ाने वाला भरतश्रेष्ठ, उस सेना से घिरा हुआ, पाञ्चालों के महान नगर में पहुँचा,
श्लोक 4 (2.30.4)
पञ्चालान्विविधोपायैः सान्त्वयामास पाण्डवः । किञ्चित्करं समादाय विदेहानां पुरं ययौ । ततः स गण्डकाञ्शूरो विदेहान्भरतर्षभः ॥
pañcālānvividhopāyaiḥ sāntvayāmāsa pāṇḍavaḥ | kiñcitkaraṃ samādāya videhānāṃ puraṃ yayau | tataḥ sa gaṇḍakāñśūro videhānbharatarṣabhaḥ
और पाण्डव ने अनेक उपायों से पाञ्चालों को अपने पक्ष में कर लिया। कुछ कर लेकर वे विदेहों के नगर को गए। फिर उस शूर भरतश्रेष्ठ ने गण्डकों और विदेहों को
श्लोक 5 (2.30.5)
विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानजयत्प्रभुः । तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा रोमहर्षणम् । कृतवान्भीमसेनेन महद्युद्धं निरायुधम् ॥
vijityālpena kālena daśārṇānajayatprabhuḥ | tatra dāśārṇako rājā sudharmā romaharṣaṇam | kṛtavānbhīmasenena mahadyuddhaṃ nirāyudham
थोड़े ही समय में जीत लिया, और फिर प्रभु ने दशार्णों को जीता। वहाँ दशार्ण-नरेश सुधर्मा ने भीमसेन के साथ बिना शस्त्रों के रोंगटे खड़े कर देने वाला महान युद्ध किया।
श्लोक 6 (2.30.6)
भीमसेनस्तु तद्दृष्ट्वा तस्य कर्म महात्मनः । अधिसेनापतिं चक्रे सुधर्माणं महाबलम् ॥
bhīmasenastu taddṛṣṭvā tasya karma mahātmanaḥ | adhisenāpatiṃ cakre sudharmāṇaṃ mahābalam
उस महात्मा राजा का वह पराक्रम देखकर भीमसेन ने महाबली सुधर्मा को अपना प्रधान सेनापति बना लिया।
श्लोक 7 (2.30.7)
ततः प्राचीं दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रमः । सैन्येन महता राजन्कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥
tataḥ prācīṃ diśaṃ bhīmo yayau bhīmaparākramaḥ | sainyena mahatā rājankampayanniva medinīm
फिर, हे राजन्, भयंकर पराक्रम वाले भीम अपनी विशाल सेना से मानो पृथ्वी को कँपाते हुए पूर्व दिशा की ओर बढ़े।
श्लोक 8 (2.30.8)
सोऽश्वमेधेश्वरं राजन्रोचमानं सहानुगम् । जिगाय समरे वीरो बलेन बलिनां वरः ॥
so'śvamedheśvaraṃ rājanrocamānaṃ sahānugam | jigāya samare vīro balena balināṃ varaḥ
हे राजन्, बलवानों में श्रेष्ठ उस वीर ने अश्वमेध के स्वामी रोचमान को उसके अनुचरों सहित युद्ध में बलपूर्वक जीत लिया।
श्लोक 9 (2.30.9)
स तं निर्जित्य कौन्तेयो नातितीव्रेण कर्मणा । पूर्वदेशं महावीर्यं विजिग्ये कुरुनन्दनः ॥
sa taṃ nirjitya kaunteyo nātitīvreṇa karmaṇā | pūrvadeśaṃ mahāvīryaṃ vijigye kurunandanaḥ
उसे बिना बहुत कठोर प्रयास के जीतकर कुन्तीपुत्र कुरुनन्दन ने शक्तिशाली पूर्व देश को जीत लिया।
श्लोक 10 (2.30.10)
ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् । सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ॥
tato dakṣiṇamāgamya pulindanagaraṃ mahat | sukumāraṃ vaśe cakre sumitraṃ ca narādhipam
फिर दक्षिण की ओर आकर उन्होंने पुलिन्दों के महान नगर को, सुकुमार को और राजा सुमित्र को अपने वश में कर लिया।
श्लोक 11 (2.30.11)
ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद्भरतर्षभः । शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाज्जनमेजय ॥
tatastu dharmarājasya śāsanādbharatarṣabhaḥ | śiśupālaṃ mahāvīryamabhyagājjanamejaya
हे जनमेजय, इसके बाद धर्मराज की आज्ञा से भरतश्रेष्ठ भीम महापराक्रमी शिशुपाल के पास गए।
श्लोक 12 (2.30.12)
चेदिराजोऽपि तच्छ्रुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्षितम् । उपनिष्क्रम्य नगरात्प्रत्यगृह्णात्परन्तप ॥
cedirājo'pi tacchrutvā pāṇḍavasya cikīrṣitam | upaniṣkramya nagarātpratyagṛhṇātparantapa
हे परन्तप, पाण्डव का अभिप्राय सुनकर चेदिराज भी अपने नगर से बाहर निकलकर उनकी अगवानी करने आया।
श्लोक 13 (2.30.13)
तौ समेत्य महाराज कुरुचेदिवृषौ तदा । उभयोरात्मकुलयोः कौशलं पर्यपृच्छताम् ॥
tau sametya mahārāja kurucedivṛṣau tadā | ubhayorātmakulayoḥ kauśalaṃ paryapṛcchatām
हे महाराज, कुरुओं और चेदियों के उन दोनों श्रेष्ठ वीरों ने मिलकर एक-दूसरे के कुलों का कुशल-समाचार पूछा।
श्लोक 14 (2.30.14)
ततो निवेद्य तद्राष्ट्रं चेदिराजो विशाम्पते । उवाच भीमं प्रहसन्किमिदं कुरुषेऽनघ ॥
tato nivedya tadrāṣṭraṃ cedirājo viśāmpate | uvāca bhīmaṃ prahasankimidaṃ kuruṣe'nagha
हे प्रजानाथ, तब चेदिराज ने अपना राज्य उन्हें निवेदित करके मुस्कराते हुए भीम से कहा — "हे निष्पाप, यह तुम क्या कर रहे हो?"
श्लोक 15 (2.30.15)
तस्य भीमस्तदाचख्यौ धर्मराजचिकीर्षितम् । स च तं प्रतिगृह्यैव तथा चक्रे नराधिपः ॥
tasya bhīmastadācakhyau dharmarājacikīrṣitam | sa ca taṃ pratigṛhyaiva tathā cakre narādhipaḥ
तब भीम ने उसे धर्मराज का अभिप्राय बताया, और उस राजा ने उसे स्वीकार करके वैसा ही किया।
श्लोक 16 (2.30.16)
ततो भीमस्तत्र राजन्नुषित्वा त्रिदशाः क्षपाः । सत्कृतः शिशुपालेन ययौ सबलवाहनः ॥
tato bhīmastatra rājannuṣitvā tridaśāḥ kṣapāḥ | satkṛtaḥ śiśupālena yayau sabalavāhanaḥ
हे राजन्, फिर भीम शिशुपाल से सत्कार पाकर वहाँ तीस रातें रहे, और उसके बाद अपनी सेना और वाहनों के साथ आगे चल पड़े।