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सभा पर्व · अध्याय 29

अर्जुन का मेरु और उत्तर कुरु तक पहुँचना

श्वेत पर्वत को पार करके अर्जुन किम्पुरुषों, हाटक देश के गुह्यकों और मानसरोवर के आसपास के गन्धर्वों को जीतते हैं। दक्षिणी पाठ के एक लम्बे अंश में वे पृथ्वी के अनेक वर्षों से होकर जाते हैं — हरिवर्ष, स्वर्णिम मेरु और विशाल जम्बू वृक्ष से घिरा इलावृत, सोने की जम्बू नदी, केतुमाल, भद्राश्व, रम्यक और हिरण्वत, जहाँ महलों की छतों पर खड़ी स्त्रियाँ उन पर फूल बरसाती हैं। उत्तर कुरु देश में द्वारपाल उनसे कहते हैं कि कोई मनुष्य उसमें प्रवेश नहीं कर सकता, न उसे देख सकता है; तब वे युधिष्ठिर के लिए केवल कर माँगते हैं। धन और उत्तम घोड़ों से लदे वे इन्द्रप्रस्थ लौटकर सब कुछ राजा को अर्पित कर देते हैं।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.29.1)

स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान् । देशं किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् ॥

sa śvetaparvataṃ vīraḥ samatikramya vīryavān | deśaṃ kimpuruṣāvāsaṃ drumaputreṇa rakṣitam

पराक्रमी वीर अर्जुन श्वेत पर्वत को पार करके किम्पुरुषों के निवास वाले उस देश में पहुँचे, जिसकी रक्षा द्रुमपुत्र करता था।

श्लोक 2 (2.29.2)

महता सन्निपातेन क्षत्रियान्तकरेण ह । अजयत्पाण्डवश्रेष्ठः करे चैनं न्यवेशयत् ॥

mahatā sannipātena kṣatriyāntakareṇa ha | ajayatpāṇḍavaśreṣṭhaḥ kare cainaṃ nyaveśayat

क्षत्रियों का संहार करने वाले भारी संग्राम में पाण्डवश्रेष्ठ ने उसे जीत लिया और उसे कर देने वाला बना दिया।

श्लोक 3 (2.29.3)

तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम् । पाकशासनिरव्यग्रः सहसैन्यः समासदत् ॥

taṃ jitvā hāṭakaṃ nāma deśaṃ guhyakarakṣitam | pākaśāsaniravyagraḥ sahasainyaḥ samāsadat

उसे जीतकर इन्द्रपुत्र शान्त चित्त से अपनी सेना के साथ गुह्यकों द्वारा रक्षित हाटक नामक देश में पहुँचे।

श्लोक 4 (2.29.4)

तांस्तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम् । ऋषिकुल्यास्तथा सर्वा ददर्श कुरुनन्दनः ॥

tāṃstu sāntvena nirjitya mānasaṃ sara uttamam | ṛṣikulyāstathā sarvā dadarśa kurunandanaḥ

उन्हें समझा-बुझाकर अपने पक्ष में करके कुरुनन्दन ने उत्तम मानसरोवर और ऋषियों की सब नदियों (ऋषिकुल्याओं) के दर्शन किए।

श्लोक 5 (2.29.5)

सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः । गन्धर्वरक्षितं देशमजयत्पाण्डवस्ततः ॥

saro mānasamāsādya hāṭakānabhitaḥ prabhuḥ | gandharvarakṣitaṃ deśamajayatpāṇḍavastataḥ

मानसरोवर पहुँचकर प्रभु पाण्डव ने फिर हाटकों के चारों ओर फैले गन्धर्वों द्वारा रक्षित देश को जीत लिया।

श्लोक 6 (2.29.6)

तत्र तित्तिरिकल्माषान्मण्डूकाख्यान्हयोत्तमान् । लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरात्तदा ॥

tatra tittirikalmāṣānmaṇḍūkākhyānhayottamān | lebhe sa karamatyantaṃ gandharvanagarāttadā

वहाँ गन्धर्वों के नगर से उन्होंने भरपूर कर पाया — तीतर जैसे चितकबरे, मण्डूक नामक उत्तम घोड़े।

श्लोक 7 (2.29.7)

हेमकूटमथासाद्य न्यवसत्फल्गुनस्तदा । तं हेमकूटं राजेन्द्र समतिक्रम्य पाण्डवः ॥

hemakūṭamathāsādya nyavasatphalgunastadā | taṃ hemakūṭaṃ rājendra samatikramya pāṇḍavaḥ

फिर फल्गुन हेमकूट पर्वत पर पहुँचे और वहाँ ठहरे। हे राजेन्द्र, उस हेमकूट को पार करके पाण्डव

श्लोक 8 (2.29.8)

हरिवर्षं विवेशाथ सैन्येन महता वृतः । तत्र पार्थो ददर्शाथ बहूनिह मनोरमान् ॥

harivarṣaṃ viveśātha sainyena mahatā vṛtaḥ | tatra pārtho dadarśātha bahūniha manoramān

विशाल सेना से घिरे हुए हरिवर्ष में प्रविष्ट हुए। वहाँ पार्थ ने बहुत-सी मनोहर वस्तुएँ देखीं —

श्लोक 9 (2.29.9)

नगरान्सवनांश्चैव नदीश्च विमलोदकाः । पुरुषान्देवकल्पांश्च नारीश्च प्रियदर्शनाः ॥

nagarānsavanāṃścaiva nadīśca vimalodakāḥ | puruṣāndevakalpāṃśca nārīśca priyadarśanāḥ

उपवनों सहित नगर, निर्मल जल वाली नदियाँ, देवताओं जैसे पुरुष और देखने में सुन्दर स्त्रियाँ।

श्लोक 10 (2.29.10)

तान्सर्वांस्तत्र दृष्ट्वाऽथ मुदा युक्तो धनञ्जयः । वशे चक्रे स रत्नानि लेभे च सुबहूनि च ॥

tānsarvāṃstatra dṛṣṭvā'tha mudā yukto dhanañjayaḥ | vaśe cakre sa ratnāni lebhe ca subahūni ca

वहाँ उन सबको देखकर धनञ्जय आनन्दित हुए; उन्होंने उन्हें अपने वश में किया और बहुत-से रत्न प्राप्त किए।

श्लोक 11 (2.29.11)

ततो निषधमासाद्य गिरिस्थानजयत्प्रभुः । अथ राजन्नतिक्रम्य निषधं शैलमायतम् ॥

tato niṣadhamāsādya giristhānajayatprabhuḥ | atha rājannatikramya niṣadhaṃ śailamāyatam

फिर निषध पर्वत पर पहुँचकर प्रभु ने वहाँ के पर्वतवासियों को जीता। और हे राजन्, लम्बे निषध पर्वत को पार करके

श्लोक 12 (2.29.12)

विवेश मध्यमं वर्षं पार्थो दिव्यमिलावृतम् । तत्र दिव्योपमान्दिव्यान्पुरुषान्देवदर्शनान् ॥

viveśa madhyamaṃ varṣaṃ pārtho divyamilāvṛtam | tatra divyopamāndivyānpuruṣāndevadarśanān

पार्थ मध्य के दिव्य वर्ष इलावृत में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने देवताओं जैसे दिव्य, देवरूप पुरुषों को देखा,

श्लोक 13 (2.29.13)

अदृष्टपूर्वान्सुभगान्स ददर्श धनञ्जयः । सदनानि च शुभ्राणि नारीश्चाप्सरसंनिभाः ॥

adṛṣṭapūrvānsubhagānsa dadarśa dhanañjayaḥ | sadanāni ca śubhrāṇi nārīścāpsarasaṃnibhāḥ

ऐसे सौभाग्यशाली लोग जिन्हें पहले कभी नहीं देखा था; धनञ्जय ने उज्ज्वल भवन और अप्सराओं जैसी स्त्रियाँ भी देखीं।

श्लोक 14 (2.29.14)

दृष्ट्वा तानजयद्रम्यान्स तैश्च ददृशे तदा । जित्वा च तान्महाभागान्करे च विनिवेश्य च ॥

dṛṣṭvā tānajayadramyānsa taiśca dadṛśe tadā | jitvā ca tānmahābhāgānkare ca viniveśya ca

उन मनोहर लोगों को देखकर उन्होंने उन्हें जीत लिया, और उन्होंने भी तब उन्हें देखा। उन महाभागों को जीतकर और उनसे कर लेकर,

श्लोक 15 (2.29.15)

रत्नान्यादाय दिव्यानि भूषणान्यासनैः सह । उदीचीमथ राजेन्द्र ययौ पार्थो मुदाऽन्वितः ॥

ratnānyādāya divyāni bhūṣaṇānyāsanaiḥ saha | udīcīmatha rājendra yayau pārtho mudā'nvitaḥ

आभूषणों और आसनों सहित दिव्य रत्न लेकर, हे राजेन्द्र, पार्थ प्रसन्न मन से उत्तर दिशा की ओर चले।

श्लोक 16 (2.29.16)

स ददर्श ततो मेरुं शिखरिणां प्रभुं महत् । तं काञ्चनमयं दिव्यं चतुर्वर्णं दुरासदम् ॥

sa dadarśa tato meruṃ śikhariṇāṃ prabhuṃ mahat | taṃ kāñcanamayaṃ divyaṃ caturvarṇaṃ durāsadam

फिर उन्होंने पर्वतों के महान स्वामी मेरु को देखा — स्वर्णमय, दिव्य, चार रंगों वाला और दुर्गम,

श्लोक 17 (2.29.17)

उन्नतं शतसाहस्रं योजनानां तु सुस्थितम् । ज्वलन्तमचलं मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम् ॥

unnataṃ śatasāhasraṃ yojanānāṃ tu susthitam | jvalantamacalaṃ meruṃ tejorāśimanuttamam

एक लाख योजन ऊँचा और दृढ़ता से स्थित; प्रज्वलित, अचल मेरु, तेज का अनुपम पुंज,

श्लोक 18 (2.29.18)

आक्षिपन्तं प्रभां भानोः स्वशृङ्गैः काञ्चनोज्ज्वलैः । काञ्चनाभरणं दिव्यं देवगन्धर्वसेवितम् ॥

ākṣipantaṃ prabhāṃ bhānoḥ svaśṛṅgaiḥ kāñcanojjvalaiḥ | kāñcanābharaṇaṃ divyaṃ devagandharvasevitam

अपने सुनहरे चमकते शिखरों से सूर्य की प्रभा को भी फीका करता हुआ; सोने से अलंकृत, दिव्य, देवताओं और गन्धर्वों से सेवित,

श्लोक 19 (2.29.19)

अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनैः । व्यालैराचरितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम् ॥

aprameyamanādhṛṣyamadharmabahulairjanaiḥ | vyālairācaritaṃ ghorairdivyauṣadhividīpitam

अपरिमेय, अधर्मी लोगों के लिए अगम्य, भयानक सर्पों से भरा और दिव्य औषधियों से प्रकाशित,

श्लोक 20 (2.29.20)

स्वर्गमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छ्रायेण महागिरिम् । अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम् ॥

svargamāvṛtya tiṣṭhantamucchrāyeṇa mahāgirim | agamyaṃ manasāpyanyairnadīvṛkṣasamanvitam

वह महापर्वत जो अपनी ऊँचाई से स्वर्ग को घेरे खड़ा है, जहाँ दूसरे मन से भी नहीं पहुँच सकते, और जो नदियों तथा वृक्षों से भरा है,

श्लोक 21 (2.29.21)

नानाविहगसङ्घैश्च नादितं सुमनोहरैः । तं दृष्ट्वा फल्गुनो मेरुं प्रीतिमानभवत्तदा ॥

nānāvihagasaṅghaiśca nāditaṃ sumanoharaiḥ | taṃ dṛṣṭvā phalguno meruṃ prītimānabhavattadā

और अनेक प्रकार के मनोहर पक्षियों के झुंडों से गूँजता हुआ। उस मेरु को देखकर फल्गुन प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 22 (2.29.22)

मेरोरिलावृतं दिव्यं सर्वतः परिमण्डितम् । मेरोस्तु दक्षिणे पार्श्वे जम्बूर्नाम वनस्पतिः ॥

merorilāvṛtaṃ divyaṃ sarvataḥ parimaṇḍitam | merostu dakṣiṇe pārśve jambūrnāma vanaspatiḥ

दिव्य इलावृत मेरु को चारों ओर से सुशोभित करता है। मेरु के दक्षिणी भाग में जम्बू नाम का एक वृक्ष है,

श्लोक 23 (2.29.23)

नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः । आस्वर्गमुच्छ्रिता राजंस्तस्य शाखा वनस्पतेः ॥

nityapuṣpaphalopetaḥ siddhacāraṇasevitaḥ | āsvargamucchritā rājaṃstasya śākhā vanaspateḥ

जो सदा फूलों और फलों से लदा रहता है और सिद्धों तथा चारणों से सेवित है; हे राजन्, उस वृक्ष की शाखाएँ स्वर्ग तक ऊँची उठी हुई हैं।

श्लोक 24 (2.29.24)

यस्य नाम्ना त्विदं द्वीपं जम्बूद्वीपमिति स्मृतम् । तां च जम्बूं ददर्शाथ सव्यसाची परन्तपः ॥

yasya nāmnā tvidaṃ dvīpaṃ jambūdvīpamiti smṛtam | tāṃ ca jambūṃ dadarśātha savyasācī parantapaḥ

इसी वृक्ष के नाम से यह द्वीप जम्बूद्वीप कहलाता है। शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची ने उस जम्बू वृक्ष के भी दर्शन किए।

श्लोक 25 (2.29.25)

तौ दृष्ट्वाऽप्रतिमौ लोके जम्बूं मेरुं च संस्थितौ । प्रीतिमानभवद्राजन्सर्वतः स विलोकयन् ॥

tau dṛṣṭvā'pratimau loke jambūṃ meruṃ ca saṃsthitau | prītimānabhavadrājansarvataḥ sa vilokayan

संसार में अनुपम उन दोनों — जम्बू वृक्ष और मेरु पर्वत — को वहाँ स्थित देखकर, हे राजन्, वे चारों ओर से उन्हें निहारते हुए प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 26 (2.29.26)

तत्र लेभे ततो जिष्णुः सिद्धैर्दिव्यैश्च चारणैः । रत्नानि बहुसाहस्रं दत्तान्याभरणानि च ॥

tatra lebhe tato jiṣṇuḥ siddhairdivyaiśca cāraṇaiḥ | ratnāni bahusāhasraṃ dattānyābharaṇāni ca

वहाँ जिष्णु ने सिद्धों और दिव्य चारणों से हज़ारों रत्न और भेंट में दिए गए आभूषण प्राप्त किए,

श्लोक 27 (2.29.27)

वासांसि च महार्हाणि तत्र लब्ध्वाऽर्जुनस्तदा । आमन्त्रयित्वा तान्सर्वान्यज्ञमुद्दिश्य वै गुरोः ॥

vāsāṃsi ca mahārhāṇi tatra labdhvā'rjunastadā | āmantrayitvā tānsarvānyajñamuddiśya vai guroḥ

और बहुमूल्य वस्त्र भी। उन्हें वहाँ पाकर अर्जुन ने अपने बड़े भाई के यज्ञ को ध्यान में रखते हुए उन सबसे विदा ली,

श्लोक 28 (2.29.28)

अथादाय बहून्रत्नान्गमनायोपचक्रमे । मेरुं प्रदक्षिणीकृत्य पर्वतप्रवरं प्रभुः ॥

athādāya bahūnratnāngamanāyopacakrame | meruṃ pradakṣiṇīkṛtya parvatapravaraṃ prabhuḥ

और बहुत-से रत्न लेकर जाने को तैयार हुए। पर्वतश्रेष्ठ मेरु की प्रदक्षिणा करके प्रभु अर्जुन

श्लोक 29 (2.29.29)

ययौ जम्बूनदीतीरे नदीं श्रेष्ठां विलोकयन् । स तां मनोरमां दिव्यां जम्बूस्वादुरसावहाम् ॥

yayau jambūnadītīre nadīṃ śreṣṭhāṃ vilokayan | sa tāṃ manoramāṃ divyāṃ jambūsvādurasāvahām

उस श्रेष्ठ नदी को निहारते हुए जम्बू नदी के तट पर गए। वह मनोहर, दिव्य नदी जम्बू-फलों का मीठा रस बहाती थी,

श्लोक 30 (2.29.30)

हैमपक्षिगणैर्जुष्टां सौवर्णजलजाकुलाम् । हैमपङ्कां हैमजलां सौवर्णोज्ज्वलवालुकाम् ॥

haimapakṣigaṇairjuṣṭāṃ sauvarṇajalajākulām | haimapaṅkāṃ haimajalāṃ sauvarṇojjvalavālukām

सुनहरे पक्षियों के झुंड उस पर रहते थे और वह सोने के कमलों से भरी थी; उसका कीचड़ सोने का, जल सोने का और बालू सोने की चमक वाली थी;

श्लोक 31 (2.29.31)

क्वचित्सुपुष्पितैः पूर्णां सौवर्णकुसुमोत्पलैः । क्वचित्तीररुहैः कीर्णां हैमपुष्पैः सुपुष्पितैः ॥

kvacitsupuṣpitaiḥ pūrṇāṃ sauvarṇakusumotpalaiḥ | kvacittīraruhaiḥ kīrṇāṃ haimapuṣpaiḥ supuṣpitaiḥ

कहीं वह खिले हुए सुनहरे फूलों और कमलों से भरी थी, तो कहीं किनारे पर उगे वृक्षों के खिले हुए सुनहरे फूलों से ढकी थी;

श्लोक 32 (2.29.32)

तीर्थैश्च रुक्मसोपानैः सर्वतः समलङ्कृताम् । विमलैर्मणिजालैश्च नृत्तगीतरवैर्युताम् ॥

tīrthaiśca rukmasopānaiḥ sarvataḥ samalaṅkṛtām | vimalairmaṇijālaiśca nṛttagītaravairyutām

वह सब ओर सोने की सीढ़ियों वाले घाटों और निर्मल मणियों की जालियों से सजी थी, और नृत्य-गीत के स्वरों से गूँजती थी;

श्लोक 33 (2.29.33)

दीप्तैर्हेमवितानैश्च समन्ताच्छोभितां शुभाम् । तथाविधां नदीं दृष्ट्वा पार्थस्तां प्रशशंस ह ॥

dīptairhemavitānaiśca samantācchobhitāṃ śubhām | tathāvidhāṃ nadīṃ dṛṣṭvā pārthastāṃ praśaśaṃsa ha

चमकते सुनहरे वितानों से वह चारों ओर शोभित और सुन्दर थी। ऐसी नदी को देखकर पार्थ ने उसकी प्रशंसा की।

श्लोक 34 (2.29.34)

अदृष्टपूर्वां राजेन्द्र दृष्ट्वा हर्षमवाप च । दर्शनीयान् नदीतीरे पुरुषान्सुमनोहरान् ॥

adṛṣṭapūrvāṃ rājendra dṛṣṭvā harṣamavāpa ca | darśanīyān nadītīre puruṣānsumanoharān

हे राजेन्द्र, ऐसी नदी को, जैसी पहले कभी नहीं देखी थी, देखकर वे हर्ष से भर गए। नदी के तट पर उन्होंने सुन्दर और मनोहर पुरुष देखे,

श्लोक 35 (2.29.35)

तान्नदीसलिलाहारान्सदारानमरोपमान् । नित्यं सुखमुदा युक्तान्सर्वालङ्कारशोभितान् ॥

tānnadīsalilāhārānsadārānamaropamān | nityaṃ sukhamudā yuktānsarvālaṅkāraśobhitān

जो नदी का जल ही पीकर जीते थे, अपनी पत्नियों के साथ देवताओं की भाँति रहते थे, सदा सुख और आनन्द से युक्त और सब प्रकार के आभूषणों से सुशोभित थे।

श्लोक 36 (2.29.36)

तेभ्यो बहूनि रत्नानि तदा लेभे धनञ्जयः । दिव्यजम्बूफलं हैमं भूषणानि च पेशलम् ॥

tebhyo bahūni ratnāni tadā lebhe dhanañjayaḥ | divyajambūphalaṃ haimaṃ bhūṣaṇāni ca peśalam

उनसे धनञ्जय ने तब बहुत-से रत्न, सोने जैसे दिव्य जम्बू-फल और सुन्दर आभूषण प्राप्त किए।

श्लोक 37 (2.29.37)

लब्ध्वा तान्दुर्लभान्पार्थः प्रतीचीं प्रययौ दिशम् । नागानां रक्षितं देशमजयच्च पुनस्ततः ॥

labdhvā tāndurlabhānpārthaḥ pratīcīṃ prayayau diśam | nāgānāṃ rakṣitaṃ deśamajayacca punastataḥ

उन दुर्लभ वस्तुओं को पाकर पार्थ पश्चिम दिशा की ओर चले और वहाँ फिर नागों द्वारा रक्षित देश को जीत लिया।

श्लोक 38 (2.29.38)

ततो गत्वा महाराज वारुणीं पाकशासनिः । गन्धमादनमासाद्य ततस्तानजयत्प्रभुः ॥

tato gatvā mahārāja vāruṇīṃ pākaśāsaniḥ | gandhamādanamāsādya tatastānajayatprabhuḥ

फिर, हे महाराज, इन्द्रपुत्र वरुण की पश्चिम दिशा में गए, गन्धमादन पहुँचे और वहाँ के लोगों को जीत लिया।

श्लोक 39 (2.29.39)

तं गन्धमादनं राजन्नतिक्रम्य ततोऽर्जुनः । केतुमालं ददर्शाथ वर्षं रत्नसमन्वितम् ॥

taṃ gandhamādanaṃ rājannatikramya tato'rjunaḥ | ketumālaṃ dadarśātha varṣaṃ ratnasamanvitam

हे राजन्, गन्धमादन को पार करके अर्जुन ने रत्नों से भरे केतुमाल वर्ष को देखा,

श्लोक 40 (2.29.40)

सेवितं देवकल्पैश्च नारीभिः प्रियदर्शनैः । तं जित्वा चार्जुनो राजन्करे च विनिवेश्य च ॥

sevitaṃ devakalpaiśca nārībhiḥ priyadarśanaiḥ | taṃ jitvā cārjuno rājankare ca viniveśya ca

जहाँ देवताओं जैसे पुरुष और सुन्दर स्त्रियाँ रहती थीं। हे राजन्, उसे जीतकर और उससे कर लेकर,

श्लोक 41 (2.29.41)

आहृत्य तत्र रत्नानि दुर्लभानि तथार्जुनः । पुनश्च परिवृत्याथ मध्यं देशमिलावृतम् ॥

āhṛtya tatra ratnāni durlabhāni tathārjunaḥ | punaśca parivṛtyātha madhyaṃ deśamilāvṛtam

और वहाँ दुर्लभ रत्न एकत्र करके अर्जुन फिर लौटकर मध्य देश इलावृत में आए,

श्लोक 42 (2.29.42)

गत्वा प्राचीं दिशं राजन्सव्यसाची धनञ्जयः । मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् ॥

gatvā prācīṃ diśaṃ rājansavyasācī dhanañjayaḥ | merumandarayormadhye śailodāmabhito nadīm

और हे राजन्, पूर्व दिशा में जाकर सव्यसाची धनञ्जय ने मेरु और मन्दर के बीच, शैलोदा नदी के दोनों ओर रहने वालों को जीता,

श्लोक 43 (2.29.43)

ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते । खषान्झषांश्च नद्योतान्प्रघसान्दीप्तवेणिपान् ॥

ye te kīcakaveṇūnāṃ chāyāṃ ramyāmupāsate | khaṣānjhaṣāṃśca nadyotānpraghasāndīptaveṇipān

जो कीचक बाँसों की सुहानी छाया में रहते हैं — खष, झष, नद्योत, प्रघस, दीप्तवेणिप,

श्लोक 44 (2.29.44)

पशुपांश्च कुलिन्दांश्च तङ्कणान्परतङ्कणान् । एतान्समस्ताञ्जित्वा च करे च विनिवेश्य च ॥

paśupāṃśca kulindāṃśca taṅkaṇānparataṅkaṇān | etānsamastāñjitvā ca kare ca viniveśya ca

पशुप, कुलिन्द, तङ्गण और परतङ्गण। इन सबको जीतकर और उनसे कर लेकर,

श्लोक 45 (2.29.45)

रत्नान्यादाय सर्वेभ्यो माल्यवन्तं ततो ययौ । तं माल्यवन्तं शैलेन्द्रं समतिक्रम्य पाण्डवः ॥

ratnānyādāya sarvebhyo mālyavantaṃ tato yayau | taṃ mālyavantaṃ śailendraṃ samatikramya pāṇḍavaḥ

और उन सबसे रत्न लेकर वे माल्यवान् पर्वत पर गए। उस पर्वतराज माल्यवान् को पार करके पाण्डव

श्लोक 46 (2.29.46)

भद्राश्वं प्रविवेशाथ वर्षं स्वर्गोपमं शुचिम् । तत्र देवोपमान्दिव्यान्पुरुषाञ्शुभसंयुतान् ॥

bhadrāśvaṃ praviveśātha varṣaṃ svargopamaṃ śucim | tatra devopamāndivyānpuruṣāñśubhasaṃyutān

स्वर्ग के समान पवित्र भद्राश्व वर्ष में प्रविष्ट हुए। वहाँ देवताओं जैसे, शुभ गुणों से युक्त दिव्य पुरुषों को

श्लोक 47 (2.29.47)

जित्वा तान्स्ववशे कृत्वा करे च विनिवेश्य च । आहृत्य सर्वतो रत्नान्यसङ्ख्यानि ततस्ततः ॥

jitvā tānsvavaśe kṛtvā kare ca viniveśya ca | āhṛtya sarvato ratnānyasaṅkhyāni tatastataḥ

जीतकर, अपने वश में करके और उनसे कर लेकर, उन्होंने सब ओर से असंख्य रत्न एकत्र किए।

श्लोक 48 (2.29.48)

नीलं नाम गिरिं गत्वा तत्रस्थानजयत्प्रभुः । ततो जिष्णुरतिक्रम्य पर्वतं नीलमायतम् ॥

nīlaṃ nāma giriṃ gatvā tatrasthānajayatprabhuḥ | tato jiṣṇuratikramya parvataṃ nīlamāyatam

नील नामक पर्वत पर जाकर प्रभु ने वहाँ रहने वालों को जीता। फिर जिष्णु लम्बे नील पर्वत को पार करके

श्लोक 49 (2.29.49)

विवेश रम्यकं वर्षं सङ्कीर्णं मिथुनैः शुभैः । तं देशमथ जित्वा स करे च विनिवेश्य च ॥

viveśa ramyakaṃ varṣaṃ saṅkīrṇaṃ mithunaiḥ śubhaiḥ | taṃ deśamatha jitvā sa kare ca viniveśya ca

सुन्दर जोड़ों से भरे रम्यक वर्ष में प्रविष्ट हुए। उस देश को जीतकर और उससे कर लेकर,

श्लोक 50 (2.29.50)

अजयच्चापि बीभत्सुर्देशं गुह्यकरक्षितम् । तत्र लेभे च राजेन्द्र सौवर्णान्मृगपक्षिणः ॥

ajayaccāpi bībhatsurdeśaṃ guhyakarakṣitam | tatra lebhe ca rājendra sauvarṇānmṛgapakṣiṇaḥ

बीभत्सु ने गुह्यकों द्वारा रक्षित देश को भी जीत लिया। हे राजेन्द्र, वहाँ उन्हें सोने के मृग और पक्षी मिले;

श्लोक 51 (2.29.51)

अगृह्णाद्यज्ञभूत्यर्थं रमणीयान्मनोहरान् । अन्यांश्च लब्ध्वा रत्नानि पाण्डवोऽथ महाबलः ॥

agṛhṇādyajñabhūtyarthaṃ ramaṇīyānmanoharān | anyāṃśca labdhvā ratnāni pāṇḍavo'tha mahābalaḥ

उन रमणीय और मनोहर प्राणियों को उन्होंने यज्ञ की शोभा के लिए ले लिया। फिर और भी रत्न पाकर महाबली पाण्डव ने

श्लोक 52 (2.29.52)

गन्धर्वरक्षितं देशमजयत्सगणं तदा । तत्र रत्नानि दिव्यानि लब्ध्वा राजन्नथार्जुनः ॥

gandharvarakṣitaṃ deśamajayatsagaṇaṃ tadā | tatra ratnāni divyāni labdhvā rājannathārjunaḥ

गन्धर्वों द्वारा रक्षित देश को उनके गणों सहित जीत लिया। हे राजन्, वहाँ दिव्य रत्न पाकर अर्जुन ने फिर

श्लोक 53 (2.29.53)

वर्षं हिरण्वतं नाम विवेशाथ महीपते । स तु देशेषु रम्येषु गन्तुं तत्रोपचक्रमे ॥

varṣaṃ hiraṇvataṃ nāma viveśātha mahīpate | sa tu deśeṣu ramyeṣu gantuṃ tatropacakrame

हे महीपते, हिरण्वत नामक वर्ष में प्रवेश किया और वहाँ के रमणीय प्रदेशों में घूमने लगे।

श्लोक 54 (2.29.54)

मध्ये प्रासादवृन्देषु नक्षत्राणां शशी यथा । महापथेषु राजेन्द्र सर्वतो यान्तमर्जुनम् ॥

madhye prāsādavṛndeṣu nakṣatrāṇāṃ śaśī yathā | mahāpatheṣu rājendra sarvato yāntamarjunam

हे राजेन्द्र, जब अर्जुन महलों के समूहों के बीच बड़े-बड़े राजमार्गों पर सब ओर चल रहे थे, जैसे तारों के बीच चन्द्रमा,

श्लोक 55 (2.29.55)

प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया वीर्यशोभया । ददृशुस्तं स्त्रियः सर्वाः पार्थमात्मयशस्करम् ॥

prāsādavaraśṛṅgasthāḥ parayā vīryaśobhayā | dadṛśustaṃ striyaḥ sarvāḥ pārthamātmayaśaskaram

तब श्रेष्ठ महलों के शिखरों पर खड़ी सब स्त्रियों ने अपना यश बढ़ाने वाले पार्थ को उनकी परम पराक्रम-शोभा में देखा —

श्लोक 56 (2.29.56)

तं कलापधरं शूरं सरथं सधनुः करम् । सवर्मं सकिरीटं वै संनद्धं सपरिच्छदम् ॥

taṃ kalāpadharaṃ śūraṃ sarathaṃ sadhanuḥ karam | savarmaṃ sakirīṭaṃ vai saṃnaddhaṃ saparicchadam

तरकश धारण किए, रथ पर सवार, हाथ में धनुष लिए, कवच और किरीट पहने, युद्ध के लिए सन्नद्ध और सब साज-सामान से युक्त उस वीर को,

श्लोक 57 (2.29.57)

सुकुमारं महासत्वं तेजोराशिमनुत्तमम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥

sukumāraṃ mahāsatvaṃ tejorāśimanuttamam | śakropamamamitraghnaṃ paravāraṇavāraṇam

जो सुकुमार होकर भी महाबली थे, तेज के अनुपम पुंज थे, इन्द्र के समान थे, शत्रुओं का नाश करने वाले और शत्रुओं के हाथियों को रोक देने वाले थे।

श्लोक 58 (2.29.58)

पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शक्तिपाणिं स्म मेनिरे । अयं स पुरुषव्याघ्रो रणेऽद्भुतपराक्रमः ॥

paśyantaḥ strīgaṇāstatra śaktipāṇiṃ sma menire | ayaṃ sa puruṣavyāghro raṇe'dbhutaparākramaḥ

उन्हें देखकर वहाँ की स्त्रियों ने उन्हें शक्ति धारण करने वाले स्कन्द ही समझा। "यह वही पुरुषसिंह है, जो युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाता है;

श्लोक 59 (2.29.59)

अस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः । इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा धनञ्जयम् ॥

asya bāhubalaṃ prāpya na bhavantyasuhṛdgaṇāḥ | iti vāco bruvantyastāḥ striyaḥ premṇā dhanañjayam

इसकी भुजाओं के बल से टकराकर शत्रुओं के दल नहीं बचते।" ऐसे वचन कहती हुई वे स्त्रियाँ प्रेम से

श्लोक 60 (2.29.60)

तुष्टुवुः पुष्पवृष्टिं च ससृजुस्तस्य मूर्धनि । दृष्ट्वा ते तु मुदा युक्ताः कौतूहलसमन्विताः ॥

tuṣṭuvuḥ puṣpavṛṣṭiṃ ca sasṛjustasya mūrdhani | dṛṣṭvā te tu mudā yuktāḥ kautūhalasamanvitāḥ

धनञ्जय की स्तुति करने लगीं और उनके सिर पर फूलों की वर्षा करने लगीं। और लोग भी उन्हें देखकर आनन्द और कौतूहल से भरकर

श्लोक 61 (2.29.61)

रत्नैर्विभूषणैश्चैव अभ्यवर्षंश्च पाण्डवम् । अथ जित्वा समस्तांस्तान्करे च विनिवेश्य च ॥

ratnairvibhūṣaṇaiścaiva abhyavarṣaṃśca pāṇḍavam | atha jitvā samastāṃstānkare ca viniveśya ca

पाण्डव पर रत्नों और आभूषणों की वर्षा करने लगे। फिर उन सबको जीतकर और उनसे कर लेकर,

श्लोक 62 (2.29.62)

मणिहेमप्रबालानि शस्त्राण्याभरणानि च । एतानि लब्ध्वा पार्थोऽथ शृङ्गवन्तं गिरिं ययौ ॥

maṇihemaprabālāni śastrāṇyābharaṇāni ca | etāni labdhvā pārtho'tha śṛṅgavantaṃ giriṃ yayau

और मणि, सोना, मूँगा, शस्त्र तथा आभूषण पाकर पार्थ शृङ्गवान् पर्वत की ओर गए।

श्लोक 63 (2.29.63)

शृङ्गवन्तं च कौरव्यः समतिक्रम्य फल्गुनः । उत्तरं हरिवर्षं तु स समासाद्य पाण्डवः ॥

śṛṅgavantaṃ ca kauravyaḥ samatikramya phalgunaḥ | uttaraṃ harivarṣaṃ tu sa samāsādya pāṇḍavaḥ

कुरुवंशी पाण्डव फल्गुन शृङ्गवान् पर्वत को पार करके उत्तर हरिवर्ष में पहुँचे।

श्लोक 64 (2.29.64)

विद्याधरगणांश्चैव यक्षेन्द्रांश्च विनिर्जयन् । तत्र लेभे महात्मा वै वासो दिव्यमनुत्तमम् ॥

vidyādharagaṇāṃścaiva yakṣendrāṃśca vinirjayan | tatra lebhe mahātmā vai vāso divyamanuttamam

विद्याधरों के गणों और यक्षराजों को जीतते हुए उन महात्मा ने वहाँ एक दिव्य, अनुपम वस्त्र प्राप्त किया,

श्लोक 65 (2.29.65)

किन्नरद्रुमपत्रांश्च तत्र कृष्णाजिनान्बहून् । याज्ञीयांस्तांस्तदा दिव्यांस्तत्र लेभे धनञ्जयः ॥

kinnaradrumapatrāṃśca tatra kṛṣṇājinānbahūn | yājñīyāṃstāṃstadā divyāṃstatra lebhe dhanañjayaḥ

और वहीं धनञ्जय ने किन्नर-वृक्ष के बहुत-से पत्ते और यज्ञ के योग्य दिव्य काले मृगचर्म प्राप्त किए।

श्लोक 66 (2.29.66)

उत्तरं हरिवर्षं तु स समासाद्य पाण्डवः । इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः ॥

uttaraṃ harivarṣaṃ tu sa samāsādya pāṇḍavaḥ | iyeṣa jetuṃ taṃ deśaṃ pākaśāsananandanaḥ

उत्तर हरिवर्ष में पहुँचकर इन्द्रपुत्र पाण्डव ने उस देश को जीतना चाहा।

श्लोक 67 (2.29.67)

तत एनं महावीर्यं महाकाया महाबलाः । द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमब्रुवन् ॥

tata enaṃ mahāvīryaṃ mahākāyā mahābalāḥ | dvārapālāḥ samāsādya hṛṣṭā vacanamabruvan

तब विशाल शरीर वाले महाबली द्वारपाल उस महापराक्रमी वीर के पास आए और प्रसन्न होकर ये वचन बोले —

द्वारपाला ऊचुः

श्लोक 68 (2.29.68)

पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथञ्जन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत ॥

pārtha nedaṃ tvayā śakyaṃ puraṃ jetuṃ kathañjana | upāvartasva kalyāṇa paryāptamidamacyuta

"हे पार्थ, तुम इस नगर को किसी भी प्रकार नहीं जीत सकते। हे कल्याणमय, लौट जाओ; हे अच्युत, इतना ही पर्याप्त है।

श्लोक 69 (2.29.69)

इदं पुरं यः प्रविशेद्ध्रुवं न स भवेन्नरः । प्रीयामहे त्वया वीर पर्याप्तो विजयस्तव ॥

idaṃ puraṃ yaḥ praviśeddhruvaṃ na sa bhavennaraḥ | prīyāmahe tvayā vīra paryāpto vijayastava

जो मनुष्य इस नगर में प्रवेश करेगा, वह निश्चय ही मनुष्य नहीं रह पाएगा। हे वीर, हम तुमसे प्रसन्न हैं; तुम्हारी विजय पूरी हो चुकी है।

श्लोक 70 (2.29.70)

न चात्र किञ्चिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तराः कुरुवो ह्येते नात्र युद्धं प्रवर्तते ॥

na cātra kiñcijjetavyamarjunātra pradṛśyate | uttarāḥ kuruvo hyete nātra yuddhaṃ pravartate

हे अर्जुन, यहाँ जीतने योग्य कुछ भी दिखाई नहीं देता। ये उत्तर कुरु हैं; यहाँ युद्ध नहीं होता।

श्लोक 71 (2.29.71)

प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किञ्चन । न हि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम् ॥

praviṣṭo'pi hi kaunteya neha drakṣyasi kiñcana | na hi mānuṣadehena śakyamatrābhivīkṣitum

हे कुन्तीपुत्र, यदि तुम भीतर प्रवेश भी करो तो यहाँ कुछ नहीं देख पाओगे, क्योंकि मनुष्य-देह से यहाँ कुछ देखा नहीं जा सकता।

श्लोक 72 (2.29.72)

अथेह पुरुषव्याघ्र किञ्चिदन्यच्चिकीर्षसि । तत्प्रब्रूहि करिष्यामो वचनात्तव भारत ॥

atheha puruṣavyāghra kiñcidanyaccikīrṣasi | tatprabrūhi kariṣyāmo vacanāttava bhārata

हे पुरुषसिंह, यदि तुम यहाँ कुछ और करवाना चाहते हो तो बताओ; हे भारत, हम तुम्हारे कहने से वह कर देंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 73 (2.29.73)

ततस्तानब्रवीद्राजन्नर्जुनः प्रहसन्निव । पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः ॥

tatastānabravīdrājannarjunaḥ prahasanniva | pārthivatvaṃ cikīrṣāmi dharmarājasya dhīmataḥ

तब, हे राजन्, अर्जुन ने मुस्कराते हुए उनसे कहा — "मैं बुद्धिमान धर्मराज का सार्वभौम राज्य स्थापित करना चाहता हूँ।

अर्जुन उवाच

श्लोक 74 (2.29.74)

न प्रवेक्ष्यामि वो देशं विरुद्धं यदि मानुषैः । युधिष्ठिराय यत्किञ्चित्करपण्यं प्रदीयताम् ॥

na pravekṣyāmi vo deśaṃ viruddhaṃ yadi mānuṣaiḥ | yudhiṣṭhirāya yatkiñcitkarapaṇyaṃ pradīyatām

यदि तुम्हारा देश मनुष्यों के लिए वर्जित है तो मैं उसमें प्रवेश नहीं करूँगा। युधिष्ठिर के लिए कर के रूप में कुछ वस्तुएँ दे दी जाएँ।

श्लोक 75 (2.29.75)

नो चेत्कृष्णेन सहितो योधयिष्यामि सायकैः ॥

no cetkṛṣṇena sahito yodhayiṣyāmi sāyakaiḥ

नहीं तो मैं कृष्ण के साथ मिलकर बाणों से तुमसे युद्ध करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 76 (2.29.76)

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम् ॥

tato divyāni vastrāṇi divyānyābharaṇāni ca | kṣaumājināni divyāni tasya te pradaduḥ karam

तब उन्होंने उन्हें कर के रूप में दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य रेशमी वस्त्र और मृगचर्म दिए।

श्लोक 77 (2.29.77)

एवं स पुरुषव्याघ्रो विजित्य दिशमुत्तराम् । सङ्ग्रामान्सुबहून्कृत्वा क्षत्रियैर्दस्युभिस्तथा ॥

evaṃ sa puruṣavyāghro vijitya diśamuttarām | saṅgrāmānsubahūnkṛtvā kṣatriyairdasyubhistathā

इस प्रकार उस पुरुषसिंह ने क्षत्रियों और दस्युओं के साथ बहुत-से युद्ध करके उत्तर दिशा को जीत लिया।

श्लोक 78 (2.29.78)

स विनिर्जित्य राज्ञस्तान्करे च विनिवेश्य तु । धनान्यादाय सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ॥

sa vinirjitya rājñastānkare ca viniveśya tu | dhanānyādāya sarvebhyo ratnāni vividhāni ca

उन राजाओं को जीतकर और उनसे कर लेकर, उन सबसे धन और नाना प्रकार के रत्न लेकर,

श्लोक 79 (2.29.79)

हयांस्तित्तिरिकल्माषाञ्शुकपत्रनिभानपि । मयूरसदृशानन्यान्सर्वाननिलरंहसः ॥

hayāṃstittirikalmāṣāñśukapatranibhānapi | mayūrasadṛśānanyānsarvānanilaraṃhasaḥ

और तीतर जैसे चितकबरे, तोते के पंखों जैसे रंग वाले तथा मोर जैसे अन्य घोड़े, जो सभी वायु के समान वेगवान थे,

श्लोक 80 (2.29.80)

वृतः सुमहता राजन्बलेन चतुरङ्गिणा । आजगाम पुनर्वीरः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥

vṛtaḥ sumahatā rājanbalena caturaṅgiṇā | ājagāma punarvīraḥ śakraprasthaṃ purottamam

वह वीर, हे राजन्, विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरा हुआ, फिर श्रेष्ठ नगर शक्रप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) लौट आया।

श्लोक 81 (2.29.81)

धर्मराजाय तत्पार्थो धनं सर्वं सवाहनम् । न्यवेदयदनुज्ञातस्तेन राज्ञा गृहान्ययौ ॥

dharmarājāya tatpārtho dhanaṃ sarvaṃ savāhanam | nyavedayadanujñātastena rājñā gṛhānyayau

पार्थ ने वह सारा धन वाहनों सहित धर्मराज को अर्पित कर दिया, और फिर राजा की आज्ञा पाकर अपने भवन को चले गए।

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