सभा पर्व · अध्याय 28
अर्जुन द्वारा उत्तर के पर्वतीय राज्यों की विजय
भगदत्त से बात तय करके अर्जुन कुबेर द्वारा रक्षित उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं। वे अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि के पर्वतीय राज्यों को जीतते हैं, उलूक के राजा बृहन्त को हराते हैं, सेनाबिन्दु को राज्य से हटाते हैं और पौरव विष्वगश्व का नगर जीत लेते हैं। फिर वे कश्मीरी, त्रिगर्त, बाह्लीक, दरद, काम्बोज आदि अनेक जातियों को जीतते हैं और ऋषिकों से देवासुर-संग्राम जैसा भयंकर युद्ध करते हैं। कर के रूप में उत्तम घोड़े लेकर वे हिमालय को जीतते हैं और श्वेत पर्वत पर पड़ाव डालते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.28.1)
एवमुक्तः प्रत्युवाच भगदत्तं धनञ्जयः । अनेनैव कृतं सर्वं भविष्यत्यनुजानता ॥
evamuktaḥ pratyuvāca bhagadattaṃ dhanañjayaḥ | anenaiva kṛtaṃ sarvaṃ bhaviṣyatyanujānatā
ऐसा कहे जाने पर धनञ्जय ने भगदत्त को उत्तर दिया — "आपकी इस स्वीकृति से ही सब कुछ पूरा हो जाएगा।"
श्लोक 2 (2.28.2)
तं विजित्य महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । प्रययावुत्तरां तस्माद्दिशं धनदपालिताम् ॥
taṃ vijitya mahābāhuḥ kuntīputro dhanañjayaḥ | prayayāvuttarāṃ tasmāddiśaṃ dhanadapālitām
उसे जीतकर महाबाहु कुन्तीपुत्र धनञ्जय वहाँ से धनपति कुबेर द्वारा रक्षित उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (2.28.3)
अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम् । तथैवोपगिरं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभः ॥
antargiriṃ ca kaunteyastathaiva ca bahirgirim | tathaivopagiraṃ caiva vijigye puruṣarṣabhaḥ
पुरुषश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र ने अन्तर्गिरि को, वैसे ही बहिर्गिरि को और उपगिरि को भी जीत लिया।
श्लोक 4 (2.28.4)
विजित्य पर्वतान्सर्वान्ये च तत्र नराधिपाः । तान्वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वशः ॥
vijitya parvatānsarvānye ca tatra narādhipāḥ | tānvaśe sthāpayitvā sa dhanānyādāya sarvaśaḥ
सब पर्वतों को और वहाँ जो राजा थे उन्हें जीतकर, उन्हें अपने वश में करके उन्होंने उनका सारा धन ले लिया।
श्लोक 5 (2.28.5)
तैरेव सहितः सर्वैरनुरज्य च तान्नृपान् । उलूकवासिनं राजन्बृहन्तमुपजग्मिवान् ॥
taireva sahitaḥ sarvairanurajya ca tānnṛpān | ulūkavāsinaṃ rājanbṛhantamupajagmivān
फिर उन सबको साथ लेकर और उन राजाओं को प्रसन्न करके, हे राजन्, वे उलूक देश में रहने वाले बृहन्त पर चढ़ आए,
श्लोक 6 (2.28.6)
मृदङ्गवरनादेन रथनेमिस्वनेन च । हस्तिनां च निनादेन कम्पयन्वसुधामिमाम् ॥
mṛdaṅgavaranādena rathanemisvanena ca | hastināṃ ca ninādena kampayanvasudhāmimām
उत्तम मृदंगों के नाद, रथों के पहियों की घरघराहट और हाथियों की चिंघाड़ से इस पृथ्वी को कँपाते हुए।
श्लोक 7 (2.28.7)
ततो बृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरङ्गिणा । निष्क्रम्य नगरात्तस्माद्योधयामास फाल्गुनम् ॥
tato bṛhantastvarito balena caturaṅgiṇā | niṣkramya nagarāttasmādyodhayāmāsa phālgunam
तब बृहन्त चतुरंगिणी सेना लेकर शीघ्रता से अपने नगर से निकला और फाल्गुन से युद्ध करने लगा।
श्लोक 8 (2.28.8)
सुमहान्सन्निपातोऽभूद्धनञ्जयबृहन्तयोः । न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम् ॥
sumahānsannipāto'bhūddhanañjayabṛhantayoḥ | na śaśāka bṛhantastu soḍhuṃ pāṇḍavavikramam
धनञ्जय और बृहन्त के बीच बड़ा भारी संग्राम हुआ, किन्तु बृहन्त पाण्डव के पराक्रम को सह न सका।
श्लोक 9 (2.28.9)
सोऽविषह्यतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वरः । उपावर्तत दुर्धर्षो रत्नान्यादाय सर्वशः ॥
so'viṣahyatamaṃ matvā kaunteyaṃ parvateśvaraḥ | upāvartata durdharṣo ratnānyādāya sarvaśaḥ
कुन्तीपुत्र को सर्वथा असह्य जानकर वह दुर्धर्ष पर्वतराज सब प्रकार के रत्न लेकर उनकी शरण में आ गया।
श्लोक 10 (2.28.10)
स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ । सेनाबिन्दुमथो राजन्राज्यादाशु समाक्षिपत् ॥
sa tadrājyamavasthāpya ulūkasahito yayau | senābindumatho rājanrājyādāśu samākṣipat
अर्जुन ने उसका राज्य उसी को सौंपकर उलूकराज को साथ ले आगे प्रस्थान किया और फिर, हे राजन्, सेनाबिन्दु को शीघ्र ही उसके राज्य से हटा दिया।
श्लोक 11 (2.28.11)
मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसङ्कुलम् । उलूकानुत्तरांश्चैव तांश्च राज्ञः समानयत् ॥
modāpuraṃ vāmadevaṃ sudāmānaṃ susaṅkulam | ulūkānuttarāṃścaiva tāṃśca rājñaḥ samānayat
उन्होंने मोदापुर, वामदेव, सुदामा और सुसंकुल को तथा उत्तर उलूकों को जीता और उनके राजाओं को अपने अधीन कर लिया।
श्लोक 12 (2.28.12)
तत्रस्थः पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात् । किरीटी जितवान्राजन्देशान्पञ्चगणांस्ततः ॥
tatrasthaḥ puruṣaireva dharmarājasya śāsanāt | kirīṭī jitavānrājandeśānpañcagaṇāṃstataḥ
हे राजन्, वहीं रहते हुए किरीटी ने धर्मराज की आज्ञा से केवल अपने सैनिकों के द्वारा पञ्चगणों के देशों को जीत लिया।
श्लोक 13 (2.28.13)
स देवप्रस्थमासाद्य सेनाबिन्दोः पुरं प्रति । बलेन चतुरङ्गेण निवेशमकरोत्प्रभुः ॥
sa devaprasthamāsādya senābindoḥ puraṃ prati | balena caturaṅgeṇa niveśamakarotprabhuḥ
सेनाबिन्दु के नगर देवप्रस्थ पहुँचकर प्रभु अर्जुन ने अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ वहाँ डेरा डाला।
श्लोक 14 (2.28.14)
स तैः परिवृतः सर्वैर्विष्वगश्वं नराधिपम् । अभ्यगच्छन्महातेजाः पौरवं पुरुषर्षभ ॥
sa taiḥ parivṛtaḥ sarvairviṣvagaśvaṃ narādhipam | abhyagacchanmahātejāḥ pauravaṃ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, उन सब राजाओं से घिरे हुए वे महातेजस्वी वीर पुरुवंशी राजा विष्वगश्व पर चढ़ गए।
श्लोक 15 (2.28.15)
विजित्य चाहवे शूरान्पार्वतीयान्महारथान् । जिगाय सेनया राजन्पुरं पौरवरक्षितम् ॥
vijitya cāhave śūrānpārvatīyānmahārathān | jigāya senayā rājanpuraṃ pauravarakṣitam
युद्ध में शूरवीर पर्वतीय महारथियों को हराकर, हे राजन्, उन्होंने अपनी सेना से पौरव द्वारा रक्षित नगर को जीत लिया।
श्लोक 16 (2.28.16)
पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून्पर्वतवासिनः । गणानुत्सवसङ्केतानजयत्सप्त पाण्डवः ॥
pauravaṃ yudhi nirjitya dasyūnparvatavāsinaḥ | gaṇānutsavasaṅketānajayatsapta pāṇḍavaḥ
युद्ध में पौरव को परास्त करके पाण्डव ने पर्वतों में रहने वाले दस्युओं — उत्सवसंकेत नामक सात गणों — को जीत लिया।
श्लोक 17 (2.28.17)
ततः काश्मीरकान्वीरान्क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः । व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ॥
tataḥ kāśmīrakānvīrānkṣatriyānkṣatriyarṣabhaḥ | vyajayallohitaṃ caiva maṇḍalairdaśabhiḥ saha
फिर क्षत्रियश्रेष्ठ अर्जुन ने कश्मीर के वीर क्षत्रियों को और दस मण्डलों सहित लोहित को जीत लिया।
श्लोक 18 (2.28.18)
ततस्त्रिगर्ताः कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा । क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥
tatastrigartāḥ kaunteyaṃ dārvāḥ kokanadāstathā | kṣatriyā bahavo rājannupāvartanta sarvaśaḥ
तब, हे राजन्, त्रिगर्त, दार्व, कोकनद तथा और भी बहुत-से क्षत्रिय सब ओर से कुन्तीपुत्र की शरण में आ गए।
श्लोक 19 (2.28.19)
अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः । उरगावासिनं रम्यं रोचमानं रणेऽजयत् ॥
abhisārīṃ tato ramyāṃ vijigye kurunandanaḥ | uragāvāsinaṃ ramyaṃ rocamānaṃ raṇe'jayat
इसके बाद कुरुनन्दन ने रमणीय अभिसारी नगरी को जीता और उरगा में रहने वाले रोचमान को युद्ध में परास्त किया।
श्लोक 20 (2.28.20)
ततः सिंहपुरं रम्यं चित्रायुधसुरक्षितम् । प्रामथद्बलमास्थाय पाकशासनिराहवे ॥
tataḥ siṃhapuraṃ ramyaṃ citrāyudhasurakṣitam | prāmathadbalamāsthāya pākaśāsanirāhave
फिर इन्द्रपुत्र ने अपने बल का सहारा लेकर चित्रायुध द्वारा सुरक्षित रमणीय सिंहपुर को युद्ध में रौंद डाला।
श्लोक 21 (2.28.21)
ततः सुह्मांश्च चोलांश्च किरीटी पाण्डवर्षभः । सहितः सर्वसैन्येन प्रामथत्कुरुनन्दनः ॥
tataḥ suhmāṃśca colāṃśca kirīṭī pāṇḍavarṣabhaḥ | sahitaḥ sarvasainyena prāmathatkurunandanaḥ
फिर पाण्डवश्रेष्ठ कुरुनन्दन किरीटी ने अपनी पूरी सेना के साथ सुह्मों और चोलों को रौंद डाला।
श्लोक 22 (2.28.22)
ततः परमविक्रान्तो बाह्लीकान्पाकशासनिः । महता परिमर्देन वशे चक्रे दुरासदान् ॥
tataḥ paramavikrānto bāhlīkānpākaśāsaniḥ | mahatā parimardena vaśe cakre durāsadān
फिर परम पराक्रमी इन्द्रपुत्र ने भारी मार-काट के बाद दुर्जय बाह्लीकों को अपने वश में कर लिया।
श्लोक 23 (2.28.23)
गृहीत्वा तु बलं सारं फल्गुनः पाण्डुनन्दनः । दरदान्सहकाम्भोजैरजयत्पाकशासनिः ॥
gṛhītvā tu balaṃ sāraṃ phalgunaḥ pāṇḍunandanaḥ | daradānsahakāmbhojairajayatpākaśāsaniḥ
अपनी सेना के चुने हुए भाग को साथ लेकर पाण्डुनन्दन इन्द्रपुत्र फल्गुन ने काम्बोजों सहित दरदों को जीत लिया।
श्लोक 24 (2.28.24)
प्रागुत्तरां दिशं ये च वसन्त्याश्रित्य दस्यवः । निवसन्ति वने ये च तान्सर्वानजयत्प्रभुः ॥
prāguttarāṃ diśaṃ ye ca vasantyāśritya dasyavaḥ | nivasanti vane ye ca tānsarvānajayatprabhuḥ
जो दस्यु उत्तर-पूर्व दिशा का आश्रय लेकर रहते थे और जो वनों में बसते थे, उन सबको प्रभु अर्जुन ने जीत लिया।
श्लोक 25 (2.28.25)
लोहान्परमकाम्भोजानृषिकानुत्तरानपि । सहितांस्तान्महाराज व्यजयत्पाकशासनिः ॥
lohānparamakāmbhojānṛṣikānuttarānapi | sahitāṃstānmahārāja vyajayatpākaśāsaniḥ
हे महाराज, लोह, परम काम्बोज और उत्तर ऋषिक — इन सबको एक साथ इन्द्रपुत्र ने जीत लिया।
श्लोक 26 (2.28.26)
ऋषिकेष्वपि सङ्ग्रामो बभूवातिभयङ्करः । तारकामयसङ्काशः परस्त्वृषिकपार्थयोः ॥
ṛṣikeṣvapi saṅgrāmo babhūvātibhayaṅkaraḥ | tārakāmayasaṅkāśaḥ parastvṛṣikapārthayoḥ
ऋषिकों के देश में भी ऋषिकों और पार्थ के बीच अत्यन्त भयंकर और घोर संग्राम हुआ, जो तारा के लिए हुए देवासुर-संग्राम के समान था।
श्लोक 27 (2.28.27)
स विजित्य ततो राजन्नृषिकान्रणमूर्धनि । शुकोदरसमांस्तत्र हयानष्टौ समानयत् ॥
sa vijitya tato rājannṛṣikānraṇamūrdhani | śukodarasamāṃstatra hayānaṣṭau samānayat
हे राजन्, युद्ध के मुहाने पर ऋषिकों को जीतकर वे वहाँ से तोते के पेट के रंग वाले आठ घोड़े ले आए,
श्लोक 28 (2.28.28)
मयूरसदृशानन्यानुत्तरानपरानपि । जवनानाशुगांश्चैव करार्थं समुपानयत् ॥
mayūrasadṛśānanyānuttarānaparānapi | javanānāśugāṃścaiva karārthaṃ samupānayat
और मोर जैसे रंग वाले दूसरे घोड़े, उत्तर देश के घोड़े तथा और भी वेगवान, तेज़ दौड़ने वाले घोड़े वे कर के रूप में ले आए।
श्लोक 29 (2.28.29)
स विनिर्जित्य सङ्ग्रामे हिमवन्तं सनिष्कुटम् । श्वेतपर्वतमासाद्य न्यविशत्पुरुषर्षभः ॥
sa vinirjitya saṅgrāme himavantaṃ saniṣkuṭam | śvetaparvatamāsādya nyaviśatpuruṣarṣabhaḥ
घाटियों सहित हिमालय को युद्ध में जीतकर पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन श्वेत पर्वत पर पहुँचे और वहाँ डेरा डाला।