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सभा पर्व · अध्याय 5

नारद के राजधर्म-विषयक प्रश्न

जब पाण्डव अपनी नई सभा में बैठे थे, तब समस्त विद्याओं के ज्ञाता देवर्षि नारद पारिजात, पर्वत और सुमुख के साथ वहाँ आए और युधिष्ठिर ने पूरे सम्मान के साथ उनका सत्कार किया। कुशल-प्रश्न के बहाने नारद ने राजा से राजधर्म पर प्रश्नों की लम्बी शृंखला पूछी — धर्म, अर्थ और काम का संतुलन, मन्त्रियों का चयन और मन्त्रणा की गोपनीयता, गुप्तचर, दुर्ग और सेना, आय-व्यय, कृषि और व्यापार, न्याय, असहायों का पालन तथा वे दोष जिनसे राजा को बचना चाहिए। युधिष्ठिर ने मुनि को प्रणाम कर उनकी शिक्षा पर चलने का वचन दिया, और अन्त में नारद ने कहा कि जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों की रक्षा करता है, वह इन्द्रलोक को प्राप्त होता है।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.5.1)

अथ तत्रोपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत ॥

atha tatropaviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | mahatsu copaviṣṭeṣu gandharveṣu ca bhārata

तब, हे भारत, जब महात्मा पाण्डव वहाँ बैठे थे और महान गन्धर्व भी आसन ग्रहण कर चुके थे,

श्लोक 2 (2.5.2)

वेदोपनिषदां वेत्ता ऋषिः सुरगणार्चितः । इतिहासपुराणज्ञः क्रियाकल्पविशेषवित् ॥

vedopaniṣadāṃ vettā ṛṣiḥ suragaṇārcitaḥ | itihāsapurāṇajñaḥ kriyākalpaviśeṣavit

तब देवगणों से पूजित एक ऋषि आए — वेदों और उपनिषदों के ज्ञाता, इतिहास और पुराणों के जानकार तथा कर्मकाण्ड की बारीकियों के विशेषज्ञ;

श्लोक 3 (2.5.3)

स्तुतस्तोमग्रहस्तोभपदक्रमविभागवित् । शिक्षाक्षरविभागज्ञः पुराकल्पविशेषवित् ॥

stutastomagrahastobhapadakramavibhāgavit | śikṣākṣaravibhāgajñaḥ purākalpaviśeṣavit

जो स्तुत, स्तोम, ग्रह, स्तोभ तथा पद और क्रम पाठ के विभागों को जानते थे; शिक्षा और अक्षरों के विश्लेषण के ज्ञाता थे और प्राचीन कल्पों की विशेषताओं से परिचित थे;

श्लोक 4 (2.5.4)

आदिकल्पार्थवेत्ता च कल्पसूत्रार्थतत्त्ववित् । ब्रह्मचर्यव्रतपर ऊहापोहविशारदः ॥

ādikalpārthavettā ca kalpasūtrārthatattvavit | brahmacaryavratapara ūhāpohaviśāradaḥ

जो आदि कल्प के अर्थ और कल्पसूत्रों के तत्त्व के ज्ञाता थे; ब्रह्मचर्य-व्रत में तत्पर और तर्क-वितर्क (ऊहापोह) में निपुण थे;

श्लोक 5 (2.5.5)

नृत्तगान्धर्वसेवी च सर्वत्राप्रतिमस्तथा । अष्टादशानां विद्यानां कोशभूतो महाद्युतिः ॥

nṛttagāndharvasevī ca sarvatrāpratimastathā | aṣṭādaśānāṃ vidyānāṃ kośabhūto mahādyutiḥ

नृत्य और गन्धर्व-संगीत के प्रेमी, सर्वत्र अनुपम, महान तेजस्वी और अठारह विद्याओं के भण्डार;

श्लोक 6 (2.5.6)

न्यायविद्धर्मतत्त्वज्ञः षडङ्गविदनुत्तमः । ऐक्यसंयोगनानात्वसमवायविशारदः ॥

nyāyaviddharmatattvajñaḥ ṣaḍaṅgavidanuttamaḥ | aikyasaṃyoganānātvasamavāyaviśāradaḥ

न्यायशास्त्र और धर्म के तत्त्व के ज्ञाता, छहों वेदाङ्गों के अद्वितीय विद्वान, तथा एकता, संयोग, नानात्व और समवाय के विवेचन में कुशल;

श्लोक 7 (2.5.7)

वक्ता प्रगल्भो मेधावी स्मृतिमान्नयवित्कविः । परापरविभागज्ञः प्रमाणकृतनिश्चयः ॥

vaktā pragalbho medhāvī smṛtimānnayavitkaviḥ | parāparavibhāgajñaḥ pramāṇakṛtaniścayaḥ

प्रभावशाली और निर्भीक वक्ता, मेधावी, स्मरणशक्ति से सम्पन्न, नीतिज्ञ और कवि; पर और अपर का भेद जानने वाले तथा प्रमाणों के आधार पर निश्चय करने वाले;

श्लोक 8 (2.5.8)

पञ्चावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित् । उत्तरोत्तरवक्ता च वदतोऽपि बृहस्पतेः ॥

pañcāvayavayuktasya vākyasya guṇadoṣavit | uttarottaravaktā ca vadato'pi bṛhaspateḥ

पाँच अवयवों वाले वाक्य (तर्क) के गुण-दोष के ज्ञाता, और बोलते हुए बृहस्पति को भी एक-एक बात का उत्तर देने में समर्थ;

श्लोक 9 (2.5.9)

धर्मकामार्थमोक्षेषु यथावत्कृतनिश्चयः । तथा भुवनकोशस्य सर्वस्यास्य महामतिः ॥

dharmakāmārthamokṣeṣu yathāvatkṛtaniścayaḥ | tathā bhuvanakośasya sarvasyāsya mahāmatiḥ

धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के विषय में यथावत् निश्चय रखने वाले; और इस सम्पूर्ण भुवनकोश के विषय में वे महामति

श्लोक 10 (2.5.10)

प्रत्यक्षदर्शी लोकस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । साङ्ख्ययोगविभागज्ञो निर्विवित्सुः सुरासुरान् ॥

pratyakṣadarśī lokasya tiryagūrdhvamadhastathā | sāṅkhyayogavibhāgajño nirvivitsuḥ surāsurān

लोक को तिरछे, ऊपर और नीचे — सब ओर प्रत्यक्ष देखते थे; सांख्य और योग के विभागों के ज्ञाता थे, और देवताओं तथा असुरों में परस्पर फूट डालना चाहते थे;

श्लोक 11 (2.5.11)

सन्धिविग्रहतत्त्वज्ञस्त्वनुमानविभागवित् । षाङ्गुण्यविधियुक्तश्च सर्वशास्त्रविशारदः ॥

sandhivigrahatattvajñastvanumānavibhāgavit | ṣāṅguṇyavidhiyuktaśca sarvaśāstraviśāradaḥ

सन्धि और विग्रह के तत्त्व के ज्ञाता, अनुमान के भेदों को समझने वाले, षाड्गुण्य-नीति के विधान में निपुण और समस्त शास्त्रों में पारंगत;

श्लोक 12 (2.5.12)

युद्धगान्धर्वसेवी च सर्वत्राप्रतिघस्तथा । एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्युक्तो गुणगणैर्मुनिः ॥

yuddhagāndharvasevī ca sarvatrāpratighastathā | etaiścānyaiśca bahubhiryukto guṇagaṇairmuniḥ

युद्ध और संगीत के प्रेमी, सर्वत्र निर्बाध गति वाले — इन तथा अन्य अनेक गुणों से सम्पन्न वे मुनि,

श्लोक 13 (2.5.13)

लोकाननुचरन्सर्वानागमत्तां सभां नृप । नारदः सुमहातेजा ऋषिभिः सहितस्तदा ॥

lokānanucaransarvānāgamattāṃ sabhāṃ nṛpa | nāradaḥ sumahātejā ṛṣibhiḥ sahitastadā

महातेजस्वी नारद, सब लोकों में विचरण करते हुए, हे राजन्, अन्य ऋषियों के साथ उस सभा में आए।

श्लोक 14 (2.5.14)

पारिजातेन राजेन्द्र पर्वतेन च धीमता । सुमुखेन च सौम्येन देवर्षिरमितद्युतिः ॥

pārijātena rājendra parvatena ca dhīmatā | sumukhena ca saumyena devarṣiramitadyutiḥ

हे राजेन्द्र, पारिजात, बुद्धिमान पर्वत और सौम्य सुमुख के साथ अपार कान्ति वाले वे देवर्षि,

श्लोक 15 (2.5.15)

सभास्थान्पाण्डवान्द्रष्टुं प्रीयमाणो मनोजवः । जयाशीर्भिस्तु तं विप्रो धर्मराजानमार्चयत् ॥

sabhāsthānpāṇḍavāndraṣṭuṃ prīyamāṇo manojavaḥ | jayāśīrbhistu taṃ vipro dharmarājānamārcayat

मन के समान वेगवान, सभा में बैठे पाण्डवों को देखने के लिए प्रसन्न होकर आए। उस ब्राह्मण ने विजय के आशीर्वादों से धर्मराज का अभिनन्दन किया।

श्लोक 16 (2.5.16)

तमागतमृषिं दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् । सहसा पाण्डवश्रेष्ठः प्रत्युत्थायानुजैः सह ॥

tamāgatamṛṣiṃ dṛṣṭvā nāradaṃ sarvadharmavit | sahasā pāṇḍavaśreṣṭhaḥ pratyutthāyānujaiḥ saha

ऋषि नारद को आया देखकर समस्त धर्मों के ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों के साथ तुरंत उठ खड़े हुए

श्लोक 17 (2.5.17)

अभ्यवादयत प्रीत्या विनयावनतस्तदा । तदर्हमासनं तस्मै सम्प्रदाय यथाविधि ॥

abhyavādayata prītyā vinayāvanatastadā | tadarhamāsanaṃ tasmai sampradāya yathāvidhi

और विनय से झुककर प्रेमपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक उन्हें उनके योग्य आसन देकर,

श्लोक 18 (2.5.18)

गां चैव मधुपर्कं च सम्प्रदायार्घ्यमेव च । अर्चयामास रत्नैश्च सर्वकामैश्च धर्मवित् ॥

gāṃ caiva madhuparkaṃ ca sampradāyārghyameva ca | arcayāmāsa ratnaiśca sarvakāmaiśca dharmavit

गौ, मधुपर्क और अर्घ्य अर्पित करके उस धर्मज्ञ ने रत्नों और सभी मनचाही वस्तुओं से उनका पूजन किया।

श्लोक 19 (2.5.19)

तुतोष च यथावच्च पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् । सोऽर्चितः पाण्डवैः सर्वैर्महर्षिर्वेदपारगः । धर्मकामार्थसंयुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम् ॥

tutoṣa ca yathāvacca pūjāṃ prāpya yudhiṣṭhirāt | so'rcitaḥ pāṇḍavaiḥ sarvairmaharṣirvedapāragaḥ | dharmakāmārthasaṃyuktaṃ papracchedaṃ yudhiṣṭhiram

युधिष्ठिर से यथोचित पूजा पाकर वे संतुष्ट हुए। सब पाण्डवों से सम्मानित, वेदों के पारंगत उस महर्षि ने युधिष्ठिर से धर्म, काम और अर्थ से जुड़े ये प्रश्न पूछे।

नारद उवाच

श्लोक 20 (2.5.20)

कच्चिदर्थाश्च कल्पन्ते धर्मे च रमते मनः । सुखानि चानुभूयन्ते मनश्च न विहन्यते ॥

kaccidarthāśca kalpante dharme ca ramate manaḥ | sukhāni cānubhūyante manaśca na vihanyate

क्या तुम्हारा धन तुम्हारे प्रयोजनों के लिए पर्याप्त है? क्या तुम्हारा मन धर्म में रमता है? क्या तुम सुखों का उपभोग करते हो? क्या तुम्हारा मन किसी आघात से व्यथित तो नहीं होता?

श्लोक 21 (2.5.21)

कच्चिदाचरितां पूर्वैर्नरदेवपितामहैः । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु ॥

kaccidācaritāṃ pūrvairnaradevapitāmahaiḥ | vartase vṛttimakṣudrāṃ dharmārthasahitāṃ triṣu

हे नरदेव! क्या तुम अपने पितामहों द्वारा अपनाए गए, धर्म और अर्थ से युक्त उदार आचरण का मित्र, उदासीन और शत्रु — तीनों के प्रति पालन करते हो?

श्लोक 22 (2.5.22)

कच्चिदर्थेन वा धर्मं धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे ॥

kaccidarthena vā dharmaṃ dharmeṇārthamathāpi vā | ubhau vā prītisāreṇa na kāmena prabādhase

क्या तुम अर्थ के लिए धर्म को, या धर्म के लिए अर्थ को, अथवा सुख ही जिसका सार है उस काम के लिए दोनों को हानि तो नहीं पहुँचाते?

श्लोक 23 (2.5.23)

कच्चिदर्थं च धर्मं च कामं च जयतां वर । विभज्य काले कालज्ञः सदा वरद सेवसे ॥

kaccidarthaṃ ca dharmaṃ ca kāmaṃ ca jayatāṃ vara | vibhajya kāle kālajñaḥ sadā varada sevase

हे विजेताओं में श्रेष्ठ, हे वरदायक, समय के ज्ञाता! क्या तुम समय को बाँटकर अर्थ, धर्म और काम — तीनों का सदा सेवन करते हो?

श्लोक 24 (2.5.24)

कच्चिद्राजगुणैः षड्भिः सप्तोपायांस्तथाऽनघ । बलाबलं तथा सम्यक्चतुर्दश परीक्षसे ॥

kaccidrājaguṇaiḥ ṣaḍbhiḥ saptopāyāṃstathā'nagha | balābalaṃ tathā samyakcaturdaśa parīkṣase

हे निष्पाप! क्या तुम राजा के छह गुणों के साथ सात उपायों तथा बल और निर्बलता — इन चौदह बातों की भलीभाँति परीक्षा करते हो?

श्लोक 25 (2.5.25)

कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्च जयतां वर । तथा सन्धाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे ॥

kaccidātmānamanvīkṣya parāṃśca jayatāṃ vara | tathā sandhāya karmāṇi aṣṭau bhārata sevase

हे विजेताओं में श्रेष्ठ भारत! क्या तुम अपनी और शत्रुओं की स्थिति को परखकर, उसी के अनुसार व्यवस्था करके आठों कर्मों का पालन करते हो?

श्लोक 26 (2.5.26)

कच्चित्प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । आढ्यास्तथाऽव्यसनिनः स्वनुरक्ताश्च सर्वशः ॥

kaccitprakṛtayaḥ sapta na luptā bharatarṣabha | āḍhyāstathā'vyasaninaḥ svanuraktāśca sarvaśaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! क्या तुम्हारी सातों प्रकृतियाँ (राज्य के अंग) अक्षुण्ण हैं? क्या वे सम्पन्न, व्यसनों से मुक्त और पूरी तरह तुम्हारे प्रति अनुरक्त हैं?

श्लोक 27 (2.5.27)

कच्चिन्न कृतकैर्दूतैर्ये चाप्यपरिशङ्किताः । त्वत्तो वा तव चामात्यैर्भिद्यते मन्त्रितं तथा ॥

kaccinna kṛtakairdūtairye cāpyapariśaṅkitāḥ | tvatto vā tava cāmātyairbhidyate mantritaṃ tathā

क्या तुम्हारी मन्त्रणा बनावटी दूतों के द्वारा, या उन लोगों के द्वारा जिन पर कोई संदेह नहीं करता, अथवा स्वयं तुम्हारे या तुम्हारे मन्त्रियों के द्वारा कभी भेदी तो नहीं जाती?

श्लोक 28 (2.5.28)

मित्रोदासीनशत्रूणां कच्चिद्वेत्सि चिकीर्षितम् । कच्चित्सन्धिं यथाकालं विग्रहं चोपसेवसे ॥

mitrodāsīnaśatrūṇāṃ kaccidvetsi cikīrṣitam | kaccitsandhiṃ yathākālaṃ vigrahaṃ copasevase

क्या तुम मित्रों, उदासीनों और शत्रुओं के इरादों को जानते हो? क्या तुम उचित समय पर सन्धि और विग्रह का आश्रय लेते हो?

श्लोक 29 (2.5.29)

कच्चिद्वृत्तिमुदासीने मध्यमे चानुमन्यसे । कच्चिदात्मसमा वृद्धाः शुद्धाः सम्बोधनक्षमाः ॥

kaccidvṛttimudāsīne madhyame cānumanyase | kaccidātmasamā vṛddhāḥ śuddhāḥ sambodhanakṣamāḥ

क्या तुम उदासीन और मध्यम राजाओं के प्रति उचित नीति अपनाते हो? हे वीर! क्या तुमने अपने ही समान अनुभवी, पवित्र, परामर्श देने में समर्थ,

श्लोक 30 (2.5.30)

कुलीनाश्चानुरक्ताश्च कृतास्ते वीरमन्त्रिणः । विजयो मन्त्रमूलो हि राज्ञो भवति भारत ॥

kulīnāścānuraktāśca kṛtāste vīramantriṇaḥ | vijayo mantramūlo hi rājño bhavati bhārata

कुलीन और अनुरक्त लोगों को अपना मन्त्री बनाया है? क्योंकि हे भारत, राजा की विजय का मूल मन्त्रणा ही है।

श्लोक 31 (2.5.31)

कच्चित्संवृतमन्त्रैस्ते अमात्यैः शास्त्रकोविदैः । राष्ट्रं सुरक्षितं तात शत्रुभिर्न विलुप्यते ॥

kaccitsaṃvṛtamantraiste amātyaiḥ śāstrakovidaiḥ | rāṣṭraṃ surakṣitaṃ tāta śatrubhirna vilupyate

तात! मन्त्रणा को गुप्त रखने वाले, शास्त्रों में निपुण मन्त्रियों के द्वारा क्या तुम्हारा राष्ट्र सुरक्षित है, ताकि शत्रु उसे नष्ट न कर सकें?

श्लोक 32 (2.5.32)

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्काले विबुद्ध्यसे । कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित् ॥

kaccinnidrāvaśaṃ naiṣi kaccitkāle vibuddhyase | kacciccāpararātreṣu cintayasyarthamarthavit

क्या तुम निद्रा के वश में तो नहीं हो जाते? क्या समय पर जाग जाते हो? और क्या रात्रि के पिछले पहर में, हित-अहित को जानते हुए, अपने कार्यों पर विचार करते हो?

श्लोक 33 (2.5.33)

कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह । कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो न राष्ट्रं परिधावति ॥

kaccinmantrayase naikaḥ kaccinna bahubhiḥ saha | kaccitte mantrito mantro na rāṣṭraṃ paridhāvati

क्या तुम न अकेले मन्त्रणा करते हो और न बहुत लोगों के साथ? क्या तुम्हारी की हुई मन्त्रणा पूरे राष्ट्र में फैल तो नहीं जाती?

श्लोक 34 (2.5.34)

कच्चिदर्थान्विनिश्चित्य लघुमूलान्महोदयान् । क्षिप्रमारभसे कर्तुं न विघ्नयसि तादृशान् ॥

kaccidarthānviniścitya laghumūlānmahodayān | kṣipramārabhase kartuṃ na vighnayasi tādṛśān

क्या तुम थोड़ी लागत और बड़े लाभ वाले कार्यों का निश्चय करके उन्हें शीघ्र आरम्भ कर देते हो, और ऐसे कार्यों में विघ्न तो नहीं डालते?

श्लोक 35 (2.5.35)

कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः परोक्षास्ते विशङ्किताः । सर्वे वा पुनरुत्सृष्टाः संसृष्टं चात्र कारणम् ॥

kaccinna sarve karmāntāḥ parokṣāste viśaṅkitāḥ | sarve vā punarutsṛṣṭāḥ saṃsṛṣṭaṃ cātra kāraṇam

क्या तुम्हारे सभी उद्योग (कृषि आदि) तुम्हारी आँखों से ओझल और संदिग्ध तो नहीं हैं? या वे सब यों ही छोड़ तो नहीं दिए गए? इनकी सफलता का कारण तो इनसे स्वयं जुड़े रहना ही है।

श्लोक 36 (2.5.36)

आप्तैरलुब्धैः क्रमिकैस्ते च कच्चिदनुष्ठिताः । कच्चिद्राजन्कृतान्येव कृतप्रायाणि वा पुनः ॥

āptairalubdhaiḥ kramikaiste ca kaccidanuṣṭhitāḥ | kaccidrājankṛtānyeva kṛtaprāyāṇi vā punaḥ

क्या वे विश्वसनीय, निर्लोभी और क्रम से आगे बढ़े हुए लोगों द्वारा संचालित होते हैं? हे राजन्! क्या लोग तुम्हारे कार्यों को तभी जान पाते हैं जब वे पूरे हो चुके हों या लगभग पूरे हो गए हों,

श्लोक 37 (2.5.37)

विदुस्ते वीर कर्माणि नानवाप्तानि कानिचित् । कच्चित्कारणिका धर्मे सर्वशास्त्रेषु कोविदाः । कारयन्ति कुमारांश्च योधमुख्यांश्च सर्वशः ॥

viduste vīra karmāṇi nānavāptāni kānicit | kaccitkāraṇikā dharme sarvaśāstreṣu kovidāḥ | kārayanti kumārāṃśca yodhamukhyāṃśca sarvaśaḥ

हे वीर, और अधूरे कार्यों को कभी नहीं? क्या धर्म और समस्त शास्त्रों में निपुण तुम्हारे शिक्षक राजकुमारों और प्रमुख योद्धाओं को सब प्रकार से प्रशिक्षित करते हैं?

श्लोक 38 (2.5.38)

कच्चित्सहस्रैर्मूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम् । पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं परम् ॥

kaccitsahasrairmūrkhāṇāmekaṃ krīṇāsi paṇḍitam | paṇḍito hyarthakṛcchreṣu kuryānniḥśreyasaṃ param

क्या तुम हज़ार मूर्खों के बदले एक पण्डित को अपनाते हो? क्योंकि संकट के समय पण्डित ही परम कल्याण कर सकता है।

श्लोक 39 (2.5.39)

कच्चिद्दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकैः । यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः ॥

kacciddurgāṇi sarvāṇi dhanadhānyāyudhodakaiḥ | yantraiśca paripūrṇāni tathā śilpidhanurdharaiḥ

क्या तुम्हारे सभी दुर्ग धन, अन्न, अस्त्र-शस्त्र और जल से, यन्त्रों से तथा शिल्पियों और धनुर्धरों से भरे-पूरे हैं?

श्लोक 40 (2.5.40)

एकोप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥

ekopyamātyo medhāvī śūro dānto vicakṣaṇaḥ | rājānaṃ rājaputraṃ vā prāpayenmahatīṃ śriyam

एक भी मन्त्री यदि मेधावी, शूरवीर, संयमी और विवेकी हो, तो वह राजा या राजकुमार को महान ऐश्वर्य तक पहुँचा सकता है।

श्लोक 41 (2.5.41)

कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च । त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥

kaccidaṣṭādaśānyeṣu svapakṣe daśa pañca ca | tribhistribhiravijñātairvetsi tīrthāni cārakaiḥ

क्या तुम शत्रु-पक्ष के अठारह और अपने पक्ष के पन्द्रह तीर्थों (प्रमुख पदाधिकारियों) पर, एक-दूसरे से अनजान तीन-तीन गुप्तचरों के द्वारा दृष्टि रखते हो?

श्लोक 42 (2.5.42)

कच्चिद्द्विषामविदितः प्रतिपन्नश्च सर्वदा । नित्ययुक्तो रिपून्सर्वान्वीक्षसे रिपुसूदन ॥

kacciddviṣāmaviditaḥ pratipannaśca sarvadā | nityayukto ripūnsarvānvīkṣase ripusūdana

हे शत्रुसूदन! क्या तुम शत्रुओं से अज्ञात रहकर, सदा सावधान और तत्पर रहते हुए अपने सब शत्रुओं पर दृष्टि रखते हो?

श्लोक 43 (2.5.43)

कच्चिद्विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः । अनसूयुरनुप्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः ॥

kaccidvinayasampannaḥ kulaputro bahuśrutaḥ | anasūyuranupraṣṭā satkṛtaste purohitaḥ

क्या तुम्हारे पुरोहित, जो विनयसम्पन्न, कुलीन, बहुश्रुत, ईर्ष्या से रहित और प्रत्येक विषय की छानबीन करने वाले हैं, तुमसे सम्मान पाते हैं?

श्लोक 44 (2.5.44)

कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः । हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा ॥

kaccidagniṣu te yukto vidhijño matimānṛjuḥ | hutaṃ ca hoṣyamāṇaṃ ca kāle vedayate sadā

क्या तुम्हारे अग्निहोत्र के लिए नियुक्त व्यक्ति विधि का ज्ञाता, बुद्धिमान और सरल है? क्या वह सदा समय पर बताता है कि कौन-सी आहुति दी जा चुकी है और कौन-सी देनी है?

श्लोक 45 (2.5.45)

कच्चिदङ्गेषु निष्णातो ज्योतिषः प्रतिपादकः । उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञः कुशलस्तव ॥

kaccidaṅgeṣu niṣṇāto jyotiṣaḥ pratipādakaḥ | utpāteṣu ca sarveṣu daivajñaḥ kuśalastava

क्या तुम्हारा दैवज्ञ वेदाङ्गों में निपुण, ज्योतिष का व्याख्याता और सब प्रकार के उत्पातों को समझने में कुशल है?

श्लोक 46 (2.5.46)

कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः । जघन्याश्च जघन्येषु भृत्याः कर्मसु योजिताः ॥

kaccinmukhyā mahatsveva madhyameṣu ca madhyamāḥ | jaghanyāśca jaghanyeṣu bhṛtyāḥ karmasu yojitāḥ

क्या तुम्हारे सेवक अपने योग्य कार्यों में लगे हैं — श्रेष्ठ लोग बड़े कार्यों में, मध्यम लोग मध्यम कार्यों में और निम्न लोग निम्न कार्यों में?

श्लोक 47 (2.5.47)

अमात्यानुपधातीतान्पितृपैतामहाञ्शुचीन् । श्रेष्ठाञ्श्रेष्ठेषु कच्चित्त्वं नियोजयसि कर्मसु ॥

amātyānupadhātītānpitṛpaitāmahāñśucīn | śreṣṭhāñśreṣṭheṣu kaccittvaṃ niyojayasi karmasu

क्या तुम निष्ठा की परीक्षाओं में खरे उतरे, पिता-पितामह के समय से सेवा करते आ रहे, पवित्र और श्रेष्ठ मन्त्रियों को श्रेष्ठ कार्यों में नियुक्त करते हो?

श्लोक 48 (2.5.48)

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजितप्रजाः । राष्ट्रं तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ ॥

kaccinnogreṇa daṇḍena bhṛśamudvejitaprajāḥ | rāṣṭraṃ tavānuśāsanti mantriṇo bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! क्या तुम्हारे मन्त्री कठोर दण्ड से प्रजा को अत्यन्त भयभीत करते हुए तुम्हारे राष्ट्र का शासन तो नहीं करते?

श्लोक 49 (2.5.49)

कच्चित्त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा । उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः ॥

kaccittvāṃ nāvajānanti yājakāḥ patitaṃ yathā | ugrapratigrahītāraṃ kāmayānamiva striyaḥ

क्या तुम्हारे याजक तुम्हारा वैसे ही तिरस्कार तो नहीं करते जैसे पतित मनुष्य का, या जैसे स्त्रियाँ उस कामी पुरुष का करती हैं जो उन्हें कठोरता से ग्रहण करता है?

श्लोक 50 (2.5.50)

कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान्धृतिमाञ्शुचिः । कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिस्तथा ॥

kacciddhṛṣṭaśca śūraśca matimāndhṛtimāñśuciḥ | kulīnaścānuraktaśca dakṣaḥ senāpatistathā

क्या तुम्हारा सेनापति साहसी, शूरवीर, बुद्धिमान, धैर्यवान, पवित्र, कुलीन, अनुरक्त और दक्ष है?

श्लोक 51 (2.5.51)

कच्चिद्बलस्य ते मुख्याः सर्वयुद्धविशारदाः । धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः ॥

kaccidbalasya te mukhyāḥ sarvayuddhaviśāradāḥ | dhṛṣṭāvadātā vikrāntāstvayā satkṛtya mānitāḥ

क्या तुम्हारी सेना के प्रमुख अधिकारी सब प्रकार के युद्धों में निपुण, साहसी, निर्मल चरित्र वाले और पराक्रमी हैं, और क्या तुम उनका सत्कार कर उन्हें सम्मान देते हो?

श्लोक 52 (2.5.52)

कच्चिद्बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम् । सम्प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकर्षसि ॥

kaccidbalasya bhaktaṃ ca vetanaṃ ca yathocitam | samprāptakāle dātavyaṃ dadāsi na vikarṣasi

क्या तुम अपनी सेना को उचित भोजन-सामग्री और वेतन, देने का समय आने पर, दे देते हो और उसे रोकते तो नहीं?

श्लोक 53 (2.5.53)

कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयोर्भृताः । भर्तुः कुप्यन्ति दौर्गत्यात्सोऽनर्थः सुमहान्स्मृतः ॥

kālātikramaṇādete bhaktavetanayorbhṛtāḥ | bhartuḥ kupyanti daurgatyātso'narthaḥ sumahānsmṛtaḥ

भोजन और वेतन में समय से देर होने पर ये भृत्य कष्ट के कारण अपने स्वामी पर कुपित हो जाते हैं, और इसे बहुत बड़ा अनर्थ माना गया है।

श्लोक 54 (2.5.54)

कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः । कच्चित्प्राणांस्तवार्थेषु सन्त्यजन्ति सदा युधि ॥

kaccitsarve'nuraktāstvāṃ kulaputrāḥ pradhānataḥ | kaccitprāṇāṃstavārtheṣu santyajanti sadā yudhi

क्या सभी कुलीन पुरुष, विशेषकर प्रमुख लोग, तुमसे अनुराग रखते हैं? क्या वे युद्ध में तुम्हारे लिए सदा प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं?

श्लोक 55 (2.5.55)

कच्चिन्नैको बहूनर्थान्सर्वशः साम्परायिकान् । अनुशास्ति यथाकामं कामात्मा शासनातिगः ॥

kaccinnaiko bahūnarthānsarvaśaḥ sāmparāyikān | anuśāsti yathākāmaṃ kāmātmā śāsanātigaḥ

क्या कोई अकेला व्यक्ति, कामनाओं के वश में होकर और तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन करके, युद्ध-सम्बन्धी अनेक कार्यों का पूरी तरह मनमाना संचालन तो नहीं करता?

श्लोक 56 (2.5.56)

कच्चित्पुरुषकारेण पुरुषः कर्म शोभयन् । लभते मानमधिकं भूयो वा भक्तवेतनम् ॥

kaccitpuruṣakāreṇa puruṣaḥ karma śobhayan | labhate mānamadhikaṃ bhūyo vā bhaktavetanam

जो व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से अपने कार्य को चमका देता है, क्या उसे अधिक सम्मान या अधिक भोजन-वेतन मिलता है?

श्लोक 57 (2.5.57)

कच्चिद्विद्याविनीतांश्च नराञ्ज्ञानविशारदान् । यथार्हं गुणतश्चैव दानेनाभ्युपपद्यसे ॥

kaccidvidyāvinītāṃśca narāñjñānaviśāradān | yathārhaṃ guṇataścaiva dānenābhyupapadyase

क्या तुम विद्या से विनीत और ज्ञान में निपुण लोगों को उनकी योग्यता और गुणों के अनुसार दान देकर अनुगृहीत करते हो?

श्लोक 58 (2.5.58)

कच्चिद्दारान्मनुष्याणां तवार्थे मृत्युमीयुषाम् । व्यसनं चाभ्युपेतानां बिभर्षि भरतर्षभ ॥

kacciddārānmanuṣyāṇāṃ tavārthe mṛtyumīyuṣām | vyasanaṃ cābhyupetānāṃ bibharṣi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! जो लोग तुम्हारे लिए मृत्यु को प्राप्त हुए या संकट में पड़े, क्या तुम उनकी पत्नियों का भरण-पोषण करते हो?

श्लोक 59 (2.5.59)

कच्चिद्भयादुपगतं क्षीणं वा रिपुमागतम् । युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत्परिरक्षसि ॥

kaccidbhayādupagataṃ kṣīṇaṃ vā ripumāgatam | yuddhe vā vijitaṃ pārtha putravatparirakṣasi

हे पार्थ! जो शत्रु भय से तुम्हारी शरण में आया हो, या क्षीण होकर आया हो, या युद्ध में पराजित हुआ हो, क्या तुम पुत्र के समान उसकी रक्षा करते हो?

श्लोक 60 (2.5.60)

कच्चित्त्वमेव सर्वस्याः पृथिव्याः पृथिवीपते । समश्चानभिशङ्क्यश्च यथा माता यथा पिता ॥

kaccittvameva sarvasyāḥ pṛthivyāḥ pṛthivīpate | samaścānabhiśaṅkyaśca yathā mātā yathā pitā

हे पृथ्वीपति! क्या तुम समस्त पृथ्वी के लिए माता और पिता के समान समदर्शी और विश्वसनीय हो?

श्लोक 61 (2.5.61)

कच्चिद्व्यसनिनं शत्रुं निशम्य भरतर्षभ । अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम् ॥

kaccidvyasaninaṃ śatruṃ niśamya bharatarṣabha | abhiyāsi javenaiva samīkṣya trividhaṃ balam

हे भरतश्रेष्ठ! शत्रु को संकट में पड़ा सुनकर क्या तुम तीनों प्रकार के बल का विचार करके वेग से उस पर चढ़ाई करते हो?

श्लोक 62 (2.5.62)

यात्रामारभसे दिष्ट्या प्राप्तकालमरिन्दम । पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम् ॥

yātrāmārabhase diṣṭyā prāptakālamarindama | pārṣṇimūlaṃ ca vijñāya vyavasāyaṃ parājayam

हे अरिन्दम! क्या तुम सौभाग्य से उचित समय आने पर, अपने पृष्ठभाग और मूल (राजधानी) की स्थिति, अपने निश्चय तथा पराजय की सम्भावना को समझकर, अभियान आरम्भ करते हो,

श्लोक 63 (2.5.63)

बलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रतः । कच्चिच्च बलमुख्येभ्यः परराष्ट्रे परन्तप । उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथार्हतः ॥

balasya ca mahārāja dattvā vetanamagrataḥ | kaccicca balamukhyebhyaḥ pararāṣṭre parantapa | upacchannāni ratnāni prayacchasi yathārhataḥ

और हे महाराज, सेना को पहले ही वेतन देकर? हे परन्तप! क्या तुम शत्रु के राष्ट्र में सेना के प्रमुख लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार गुप्त रूप से रत्न देते हो?

श्लोक 64 (2.5.64)

कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रियः । पराञ्जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान् ॥

kaccidātmānamevāgre vijitya vijitendriyaḥ | parāñjigīṣase pārtha pramattānajitendriyān

हे पार्थ! क्या तुम पहले स्वयं को जीतकर, इन्द्रियों को वश में करके, असावधान और अजितेन्द्रिय शत्रुओं को जीतने की इच्छा करते हो?

श्लोक 65 (2.5.65)

कच्चित्ते यास्यतः शत्रून्पूर्वं यान्ति स्वनुष्ठिताः । साम दानं च भेदश्च दण्डश्च विधिवद्गुणाः ॥

kaccitte yāsyataḥ śatrūnpūrvaṃ yānti svanuṣṭhitāḥ | sāma dānaṃ ca bhedaśca daṇḍaśca vidhivadguṇāḥ

जब तुम शत्रुओं पर चढ़ाई करते हो, तो क्या साम, दान, भेद और दण्ड — ये चारों उपाय विधिपूर्वक प्रयुक्त होकर तुम्हारे आगे-आगे चलते हैं?

श्लोक 66 (2.5.66)

तांश्च विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि । कच्चिदष्टाङ्गसंयुक्ता चतुर्विधबला चमूः ॥

tāṃśca vikramase jetuṃ jitvā ca parirakṣasi | kaccidaṣṭāṅgasaṃyuktā caturvidhabalā camūḥ

और क्या तुम उन्हें जीतने के लिए पराक्रम करते हो और जीतकर उनकी रक्षा करते हो? क्या आठ अंगों और चार प्रकार के बलों से युक्त तुम्हारी सेना,

श्लोक 67 (2.5.67)

बलमुख्यैः सुनीता ते द्विषतां प्रतिवर्धिनी । कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परन्तप ॥

balamukhyaiḥ sunītā te dviṣatāṃ prativardhinī | kaccillavaṃ ca muṣṭiṃ ca pararāṣṭre parantapa

सेनानायकों द्वारा भली-भाँति संचालित होकर शत्रुओं का प्रतिकार करने वाली है? हे परन्तप! शत्रु के राष्ट्र में फसल काटने और अनाज सँभालने के समय को हाथ से न जाने देकर,

श्लोक 68 (2.5.68)

अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून् । कच्चित्स्वपरराष्ट्रेषु बहवोऽधिकृतास्तव ॥

avihāya mahārāja nihaṃsi samare ripūn | kaccitsvapararāṣṭreṣu bahavo'dhikṛtāstava

हे महाराज, क्या तुम युद्ध में शत्रुओं का संहार करते हो? क्या अपने और शत्रु के राष्ट्रों में तुम्हारे अनेक अधिकारी

श्लोक 69 (2.5.69)

अर्थान्समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम् ॥

arthānsamadhitiṣṭhanti rakṣanti ca parasparam

तुम्हारे कार्यों की देखरेख करते हैं और एक-दूसरे की रक्षा करते हैं?

श्लोक 70 (2.5.70)

कच्चिदभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च । घ्रेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव ॥

kaccidabhyavahāryāṇi gātrasaṃsparśanāni ca | ghreyāṇi ca mahārāja rakṣantyanumatāstava

हे महाराज! क्या तुम्हारे भोजन, शरीर को छूने वाली वस्तुओं और सुगन्धित पदार्थों की रक्षा तुम्हारे विश्वस्त लोग करते हैं?

श्लोक 71 (2.5.71)

कच्चित्कोशश्च कोष्ठं च वाहनं द्वारमायुधम् । आयश्च कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुष्ठितः ॥

kaccitkośaśca koṣṭhaṃ ca vāhanaṃ dvāramāyudham | āyaśca kṛtakalyāṇaistava bhaktairanuṣṭhitaḥ

क्या तुम्हारा कोश, अन्न-भण्डार, वाहन, द्वार, शस्त्रागार और आय — इन सबकी देखभाल तुम्हारे हितैषी और भक्त लोग करते हैं?

श्लोक 72 (2.5.72)

कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च बाह्येभ्यश्च विशाम्पते । रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ॥

kaccidābhyantarebhyaśca bāhyebhyaśca viśāmpate | rakṣasyātmānamevāgre tāṃśca svebhyo mithaśca tān

हे प्रजानाथ! क्या तुम भीतर के और बाहर के लोगों से सबसे पहले अपनी रक्षा करते हो, और उन्हें अपने स्वजनों से तथा आपस में एक-दूसरे से भी बचाते हो?

श्लोक 73 (2.5.73)

कच्चिन्न पाने द्यूते वा क्रीडासु प्रमदासु च । प्रतिजानन्ति पूर्वाह्णे व्ययं व्यसनजं तव ॥

kaccinna pāne dyūte vā krīḍāsu pramadāsu ca | pratijānanti pūrvāhṇe vyayaṃ vyasanajaṃ tava

क्या तुम्हारे कर्मचारी पूर्वाह्न में तुम्हारे सामने मद्यपान, जुए, क्रीड़ाओं और स्त्रियों के व्यसन से हुए व्यय का ब्योरा तो नहीं रखते?

श्लोक 74 (2.5.74)

कच्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः । पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशुद्ध्यते तव ॥

kaccidāyasya cārdhena caturbhāgena vā punaḥ | pādabhāgaistribhirvāpi vyayaḥ saṃśuddhyate tava

क्या तुम्हारा व्यय तुम्हारी आय के आधे, चौथाई या तीन-चौथाई भाग से पूरा हो जाता है?

श्लोक 75 (2.5.75)

कच्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्वणिजः शिल्पिनः श्रितान् । अभीक्ष्णमनुगृह्णासि धनधान्येन दुर्गतान् ॥

kaccijjñātīngurūnvṛddhānvaṇijaḥ śilpinaḥ śritān | abhīkṣṇamanugṛhṇāsi dhanadhānyena durgatān

क्या तुम अपने कुटुम्बियों, गुरुजनों, वृद्धों, व्यापारियों, शिल्पियों और आश्रितों में से जो विपन्न हों, उन पर धन-धान्य देकर निरन्तर अनुग्रह करते हो?

श्लोक 76 (2.5.76)

कच्चिच्चायव्यये युक्ताः सर्वे गणकलेखकाः । अनुतिष्ठन्ति पूर्वाह्णे नित्यमायं व्ययं तव ॥

kacciccāyavyaye yuktāḥ sarve gaṇakalekhakāḥ | anutiṣṭhanti pūrvāhṇe nityamāyaṃ vyayaṃ tava

क्या आय-व्यय के काम में लगे सब गणक और लेखक प्रतिदिन पूर्वाह्न में तुम्हें तुम्हारी आय और व्यय का विवरण देते हैं?

श्लोक 77 (2.5.77)

कच्चिदर्थेषु सम्प्रौढान्हितकामाननुप्रियान् । नापकर्षसि कर्मभ्यः पूर्वमप्राप्य किल्बिषम् ॥

kaccidartheṣu samprauḍhānhitakāmānanupriyān | nāpakarṣasi karmabhyaḥ pūrvamaprāpya kilbiṣam

क्या तुम कार्यकुशल, हितैषी और अनुरक्त लोगों को, उनका कोई दोष सामने आए बिना, उनके पदों से हटा तो नहीं देते?

श्लोक 78 (2.5.78)

कच्चिद्विदित्वा पुरुषानुत्तमाधममध्यमान् । त्वं कर्मस्वनुरूपेषु नियोजयसि भारत ॥

kaccidviditvā puruṣānuttamādhamamadhyamān | tvaṃ karmasvanurūpeṣu niyojayasi bhārata

हे भारत! क्या तुम लोगों को उत्तम, मध्यम और अधम पहचानकर उन्हें उनके अनुरूप कार्यों में लगाते हो?

श्लोक 79 (2.5.79)

कच्चिन्न लुब्धाश्चौरा वा वैरिणो वा विशाम्पते । अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुष्ठिताः ॥

kaccinna lubdhāścaurā vā vairiṇo vā viśāmpate | aprāptavyavahārā vā tava karmasvanuṣṭhitāḥ

हे प्रजानाथ! क्या तुम्हारे कार्यों में लोभी, चोर, शत्रु या अनुभवहीन लोग तो नियुक्त नहीं हैं?

श्लोक 80 (2.5.80)

कच्चिन्न चौरैर्लुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीबलेन वा । त्वया वा पीड्यते राष्ट्रं कच्चित्तुष्टाः कृषीवलाः ॥

kaccinna caurairlubdhairvā kumāraiḥ strībalena vā | tvayā vā pīḍyate rāṣṭraṃ kaccittuṣṭāḥ kṛṣīvalāḥ

क्या तुम्हारा राष्ट्र चोरों, लोभियों, राजकुमारों, स्त्रियों के प्रभाव या स्वयं तुम्हारे द्वारा पीड़ित तो नहीं है? क्या तुम्हारे किसान संतुष्ट हैं?

श्लोक 81 (2.5.81)

कच्चिद्राष्ट्रे तटाकानि पूर्णानि च बृहन्ति च । भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका ॥

kaccidrāṣṭre taṭākāni pūrṇāni ca bṛhanti ca | bhāgaśo viniviṣṭāni na kṛṣirdevamātṛkā

क्या तुम्हारे राष्ट्र में स्थान-स्थान पर जल से भरे बड़े-बड़े तालाब बने हैं, ताकि खेती केवल वर्षा के भरोसे न रहे?

श्लोक 82 (2.5.82)

कच्चिन्न भक्तं बीजं च कर्षकस्यावसीदति । प्रत्येकं च शतं वृद्ध्या ददास्यृणमनुग्रहम् ॥

kaccinna bhaktaṃ bījaṃ ca karṣakasyāvasīdati | pratyekaṃ ca śataṃ vṛddhyā dadāsyṛṇamanugraham

क्या किसान का अन्न और बीज कभी कम तो नहीं पड़ता? क्या तुम अनुग्रह करके प्रत्येक को सौ पर एक के ब्याज से ऋण देते हो?

श्लोक 83 (2.5.83)

कच्चित्स्वनुष्ठिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनैः । वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते ॥

kaccitsvanuṣṭhitā tāta vārtā te sādhubhirjanaiḥ | vārtāyāṃ saṃśritastāta loko'yaṃ sukhamedhate

तात! क्या तुम्हारी वार्ता (कृषि, पशुपालन और वाणिज्य) सज्जन लोगों द्वारा भली-भाँति चलाई जाती है? क्योंकि तात, यह लोक वार्ता के आश्रय से ही सुखपूर्वक फलता-फूलता है।

श्लोक 84 (2.5.84)

कच्चिच्छूराः कृतप्रज्ञाः पञ्चपञ्च स्वनुष्ठिताः । क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजञ्जनपदे तव ॥

kaccicchūrāḥ kṛtaprajñāḥ pañcapañca svanuṣṭhitāḥ | kṣemaṃ kurvanti saṃhatya rājañjanapade tava

हे राजन्! क्या प्रत्येक स्थान पर नियुक्त पाँच-पाँच शूरवीर और बुद्धिमान अधिकारी मिलकर तुम्हारे जनपद का कल्याण करते हैं?

श्लोक 85 (2.5.85)

कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थं ग्रामा नगरवत्कृताः । ग्रामवच्च कृताः प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणाः ॥

kaccinnagaraguptyarthaṃ grāmā nagaravatkṛtāḥ | grāmavacca kṛtāḥ prāntāste ca sarve tvadarpaṇāḥ

क्या नगरों की रक्षा के लिए गाँवों को नगर जैसा और सीमान्त प्रदेशों को गाँव जैसा बनाया गया है? और क्या वे सब अपना भाग तुम्हें अर्पित करते हैं?

श्लोक 86 (2.5.86)

कच्चिद्बलेनानुगताः समानि विषमाणि च । पुराणि चौरान्निघ्नन्तश्चरन्ति विषये तव ॥

kaccidbalenānugatāḥ samāni viṣamāṇi ca | purāṇi caurānnighnantaścaranti viṣaye tava

क्या तुम्हारे लोग सेना के साथ तुम्हारे राज्य के समतल और ऊबड़-खाबड़ प्रदेशों के नगरों में चोरों का दमन करते हुए विचरते हैं?

श्लोक 87 (2.5.87)

कच्चित्स्त्रियः सान्त्वयसि कच्चित्ताश्च सुरक्षिताः । कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद्गुह्यं न भाषसे ॥

kaccitstriyaḥ sāntvayasi kaccittāśca surakṣitāḥ | kaccinna śraddadhāsyāsāṃ kaccidguhyaṃ na bhāṣase

क्या तुम स्त्रियों को सान्त्वना देते हो? क्या वे भली-भाँति सुरक्षित हैं? क्या तुम उन पर पूरा भरोसा तो नहीं कर लेते, और उनसे गुप्त बातें तो नहीं कहते?

श्लोक 88 (2.5.88)

कच्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च । प्रियाण्यनुभवञ्शेषे न त्वमन्तः पुरे नृप ॥

kaccidātyayikaṃ śrutvā tadarthamanucintya ca | priyāṇyanubhavañśeṣe na tvamantaḥ pure nṛpa

हे राजन्! किसी आसन्न संकट का समाचार सुनकर क्या तुम उस पर विचार करते हो, और अन्तःपुर में सुख भोगते हुए सोए तो नहीं रहते?

श्लोक 89 (2.5.89)

कच्चिद्द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रेः सुप्त्वा विशाम्पते । सञ्चिन्तयसि धर्मार्थौ याम उत्थाय पश्चिमे ॥

kacciddvau prathamau yāmau rātreḥ suptvā viśāmpate | sañcintayasi dharmārthau yāma utthāya paścime

हे प्रजानाथ! क्या तुम रात के पहले दो पहर सोकर, अन्तिम पहर में उठकर धर्म और अर्थ का चिन्तन करते हो?

श्लोक 90 (2.5.90)

कच्चिद्दर्शयसे नित्यं मनुष्यान्समलङ्कृतः । उत्थाय काले कालज्ञैः सह पाण्डव मन्त्रिभिः ॥

kacciddarśayase nityaṃ manuṣyānsamalaṅkṛtaḥ | utthāya kāle kālajñaiḥ saha pāṇḍava mantribhiḥ

हे पाण्डुनन्दन! क्या तुम समय पर उठकर, अलंकृत होकर, समय के ज्ञाता मन्त्रियों के साथ प्रतिदिन प्रजा को दर्शन देते हो?

श्लोक 91 (2.5.91)

कच्चिद्रक्ताम्बरधराः खड्गहस्ताः स्वलङ्कृताः । उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिन्दम ॥

kaccidraktāmbaradharāḥ khaḍgahastāḥ svalaṅkṛtāḥ | upāsate tvāmabhito rakṣaṇārthamarindama

हे अरिन्दम! क्या लाल वस्त्र पहने, हाथ में तलवार लिए और भली-भाँति सजे हुए रक्षक तुम्हारी रक्षा के लिए चारों ओर उपस्थित रहते हैं?

श्लोक 92 (2.5.92)

कच्चिद्दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशाम्पते । परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च ॥

kacciddaṇḍyeṣu yamavatpūjyeṣu ca viśāmpate | parīkṣya vartase samyagapriyeṣu priyeṣu ca

हे प्रजानाथ! क्या तुम प्रिय और अप्रिय — सबके प्रति भली-भाँति परखकर, दण्डनीयों के प्रति यमराज के समान और पूज्यों के प्रति आदरपूर्वक व्यवहार करते हो?

श्लोक 93 (2.5.93)

कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा । मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थापकर्षसि ॥

kaccicchārīramābādhamauṣadhairniyamena vā | mānasaṃ vṛddhasevābhiḥ sadā pārthāpakarṣasi

हे पार्थ! क्या तुम शारीरिक कष्ट को औषधियों और संयमित आहार-विहार से, तथा मानसिक कष्ट को वृद्धजनों की सेवा से सदा दूर करते हो?

श्लोक 94 (2.5.94)

कच्चिद्वैद्याश्चिकित्सायामष्टाङ्गायां विशारदाः । सुहृदश्चानुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ॥

kaccidvaidyāścikitsāyāmaṣṭāṅgāyāṃ viśāradāḥ | suhṛdaścānuraktāśca śarīre te hitāḥ sadā

क्या तुम्हारे वैद्य आठ अंगों वाली चिकित्सा में निपुण, मित्रभाव रखने वाले, अनुरक्त और सदा तुम्हारे शरीर के हित में लगे रहते हैं?

श्लोक 95 (2.5.95)

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्वा मानाद्वापि विशाम्पते । अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तान्नापास्यसि कथञ्चन ॥

kaccinna lobhānmohādvā mānādvāpi viśāmpate | arthipratyarthinaḥ prāptānnāpāsyasi kathañcana

हे प्रजानाथ! क्या तुम लोभ, मोह या अभिमान के कारण अपने पास आए वादी और प्रतिवादी को कभी लौटा तो नहीं देते?

श्लोक 96 (2.5.96)

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्वा विश्रम्भात्प्रणयेन वा । आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै ॥

kaccinna lobhānmohādvā viśrambhātpraṇayena vā | āśritānāṃ manuṣyāṇāṃ vṛttiṃ tvaṃ saṃruṇatsi vai

क्या तुम लोभ, मोह, अन्धे विश्वास या स्नेह के कारण अपने आश्रितों की जीविका तो नहीं रोक देते?

श्लोक 97 (2.5.97)

कच्चित्पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिनः । त्वया सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथञ्चन ॥

kaccitpaurā na sahitā ye ca te rāṣṭravāsinaḥ | tvayā saha virudhyante paraiḥ krītāḥ kathañcana

क्या तुम्हारे नगरवासी और राष्ट्रवासी शत्रुओं द्वारा खरीद लिए जाकर किसी प्रकार एकजुट होकर तुम्हारा विरोध तो नहीं करते?

श्लोक 98 (2.5.98)

कच्चिन्न दुर्बलः शत्रुर्बलेन परिपीडितः । मन्त्रेण बलवान्कश्चिदुभाभ्यां च कथञ्चन ॥

kaccinna durbalaḥ śatrurbalena paripīḍitaḥ | mantreṇa balavānkaścidubhābhyāṃ ca kathañcana

क्या तुम दुर्बल शत्रु को बल से, बलवान शत्रु को मन्त्रणा (कूटनीति) से, और किसी को दोनों के द्वारा दबाकर नहीं रखते?

श्लोक 99 (2.5.99)

कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः । कच्चित्प्राणांस्त्वदर्थेषु सन्त्यजन्ति त्वया हृताः ॥

kaccitsarve'nuraktāstvāṃ bhūmipālāḥ pradhānataḥ | kaccitprāṇāṃstvadartheṣu santyajanti tvayā hṛtāḥ

क्या सभी भूपाल, विशेषकर प्रमुख राजा, तुमसे अनुराग रखते हैं? क्या तुम्हारे द्वारा अपनाए गए वे तुम्हारे लिए प्राण न्योछावर करते हैं?

श्लोक 100 (2.5.100)

कच्चित्ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते । ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदाः ॥

kaccitte sarvavidyāsu guṇato'rcā pravartate | brāhmaṇānāṃ ca sādhūnāṃ tava naiḥśreyasī śubhā | dakṣiṇāstvaṃ dadāsyeṣāṃ nityaṃ svargāpavargadāḥ

क्या तुम्हारे यहाँ सभी विद्याओं के विद्वानों का उनके गुणों के अनुसार सम्मान होता है? क्या ब्राह्मणों और साधुओं के प्रति तुम्हारी पूजा शुभ और परम कल्याणकारी है? क्या तुम उन्हें सदा स्वर्ग और मोक्ष देने वाली दक्षिणा देते हो?

श्लोक 101 (2.5.101)

कच्चिद्धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः । यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन्कर्मणि वर्तसे ॥

kacciddharme trayīmūle pūrvairācarite janaiḥ | yatamānastathā kartuṃ tasminkarmaṇi vartase

क्या तुम उसी प्रकार आचरण करने का प्रयत्न करते हुए, पूर्वजों द्वारा आचरित और तीनों वेदों पर आधारित धर्म के कर्म में लगे रहते हो?

श्लोक 102 (2.5.102)

कच्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्रन्ति वै द्विजाः । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्षं सदक्षिणम् ॥

kaccittava gṛhe'nnāni svādūnyaśranti vai dvijāḥ | guṇavanti guṇopetāstavādhyakṣaṃ sadakṣiṇam

क्या तुम्हारे घर में गुणवान ब्राह्मण तुम्हारी उपस्थिति में स्वादिष्ट और उत्तम अन्न का भोजन करते हैं और उन्हें दक्षिणा भी मिलती है?

श्लोक 103 (2.5.103)

कच्चित्क्रतूनेकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वशः । पौण्डरीकांश्च कार्त्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ॥

kaccitkratūnekacitto vājapeyāṃśca sarvaśaḥ | pauṇḍarīkāṃśca kārtsnyena yatase kartumātmavān

क्या तुम एकाग्रचित्त और आत्मसंयमी होकर वाजपेय और पौण्डरीक जैसे यज्ञों को सम्पूर्ण रूप से करने का प्रयत्न करते हो?

श्लोक 104 (2.5.104)

कच्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्दैवतांस्तापसानपि । चैत्यांश्च वृक्षान्कल्याणान्ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥

kaccijjñātīngurūnvṛddhāndaivatāṃstāpasānapi | caityāṃśca vṛkṣānkalyāṇānbrāhmaṇāṃśca namasyasi

क्या तुम अपने कुटुम्बियों, गुरुजनों, वृद्धों, देवताओं, तपस्वियों, चैत्यों, मंगलकारी वृक्षों और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हो?

श्लोक 105 (2.5.105)

कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेऽनघ । अपि मङ्गलहस्तश्च जनः पार्श्वे न तिष्ठति ॥

kaccicchoko na manyurvā tvayā protpādyate'nagha | api maṅgalahastaśca janaḥ pārśve na tiṣṭhati

हे निष्पाप! क्या तुम किसी के मन में शोक या क्रोध तो उत्पन्न नहीं करते? और क्या मंगल-द्रव्य हाथ में लिए लोग तुम्हारे पास उपस्थित रहते हैं?

श्लोक 106 (2.5.106)

कच्चिदेषा च ते बुद्धिर्वृत्तिरेषा च तेऽनघ । आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥

kaccideṣā ca te buddhirvṛttireṣā ca te'nagha | āyuṣyā ca yaśasyā ca dharmakāmārthadarśinī

हे निष्पाप! क्या तुम्हारी बुद्धि और तुम्हारा आचरण ऐसा ही है — आयु और यश बढ़ाने वाला तथा धर्म, काम और अर्थ पर दृष्टि रखने वाला?

श्लोक 107 (2.5.107)

एतया वर्तमानस्य बुद्ध्या राष्ट्रं न सीदति । विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तं सुखमेधते ॥

etayā vartamānasya buddhyā rāṣṭraṃ na sīdati | vijitya ca mahīṃ rājā so'tyantaṃ sukhamedhate

क्योंकि जो राजा इस बुद्धि से आचरण करता है, उसका राष्ट्र दुर्दशा में नहीं पड़ता; वह पृथ्वी को जीतकर अत्यन्त सुखपूर्वक उन्नति करता है।

श्लोक 108 (2.5.108)

कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारितश्चौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद्वध्यते शुचिः ॥

kaccidāryo viśuddhātmā kṣāritaścaurakarmaṇi | adṛṣṭaśāstrakuśalairna lobhādvadhyate śuciḥ

क्या कोई सज्जन, शुद्धहृदय और निर्दोष व्यक्ति, जिस पर चोरी का झूठा आरोप लगा हो, शास्त्र न जानते हुए भी स्वयं को चतुर मानने वाले लोगों द्वारा लोभवश मार तो नहीं डाला जाता?

श्लोक 109 (2.5.109)

दुष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ञैर्दृष्टः सकारणः । कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नरर्षभ ॥

duṣṭo gṛhītastatkārī tajjñairdṛṣṭaḥ sakāraṇaḥ | kaccinna mucyate steno dravyalobhānnararṣabha

हे नरश्रेष्ठ! क्या कोई दोषी चोर, जो पकड़ा गया हो, जो उस कर्म का कर्ता हो, जिसे जानकारों ने देखा हो और जिसके विरुद्ध प्रमाण हो, धन के लोभ में छोड़ तो नहीं दिया जाता?

श्लोक 110 (2.5.110)

उत्पन्नान्कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत । अर्थान्न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता धनैः ॥

utpannānkaccidāḍhyasya daridrasya ca bhārata | arthānna mithyā paśyanti tavāmātyā hṛtā dhanaiḥ

हे भारत! धनी और निर्धन के बीच उत्पन्न विवादों में क्या तुम्हारे मन्त्री धन से खरीदे जाकर मामलों को असत्य दृष्टि से तो नहीं देखते?

श्लोक 111 (2.5.111)

नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् । अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् । एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् ॥

nāstikyamanṛtaṃ krodhaṃ pramādaṃ dīrghasūtratām | adarśanaṃ jñānavatāmālasyaṃ pañcavṛttitām | ekacintanamarthānāmanarthajñaiśca cintanam

नास्तिकता, असत्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियों से न मिलना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियों के अधीन रहना, अकेले ही कार्यों पर विचार करना और कार्यों को न समझने वालों के साथ विचार करना;

श्लोक 112 (2.5.112)

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् । मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ॥

niścitānāmanārambhaṃ mantrasyāparirakṣaṇam | maṅgalādyaprayogaṃ ca pratyutthānaṃ ca sarvataḥ

निश्चित कार्यों को आरम्भ न करना, मन्त्रणा की रक्षा न करना, मंगल-कर्मों का अनुष्ठान न करना और सब ओर एक साथ शत्रुओं पर चढ़ाई कर देना —

श्लोक 113 (2.5.113)

कच्चित्त्वं वर्जयस्येतान्राजदोषांश्चतुर्दश । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवाः ॥

kaccittvaṃ varjayasyetānrājadoṣāṃścaturdaśa | prāyaśo yairvinaśyanti kṛtamūlāpi pārthivāḥ

क्या तुम राजाओं के इन चौदह दोषों को त्याग देते हो, जिनके कारण दृढ़ जड़ों वाले राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं?

श्लोक 114 (2.5.114)

कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चित्ते सफलं धनम् । कच्चित्ते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं श्रुतम् ॥

kaccitte saphalā vedāḥ kaccitte saphalaṃ dhanam | kaccitte saphalā dārāḥ kaccitte saphalaṃ śrutam

क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? क्या तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी पत्नियाँ सफल हैं? क्या तुम्हारा शास्त्र-ज्ञान सफल है?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 115 (2.5.115)

कथं वै सफला वेदाः कथं वै सफलं धनम् । कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं श्रुतम् ॥

kathaṃ vai saphalā vedāḥ kathaṃ vai saphalaṃ dhanam | kathaṃ vai saphalā dārāḥ kathaṃ vai saphalaṃ śrutam

वेद किस प्रकार सफल होते हैं? धन किस प्रकार सफल होता है? पत्नियाँ किस प्रकार सफल होती हैं? और शास्त्र-ज्ञान किस प्रकार सफल होता है?

नारद उवाच

श्लोक 116 (2.5.116)

अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् । रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ॥

agnihotraphalā vedā dattabhuktaphalaṃ dhanam | ratiputraphalā dārāḥ śīlavṛttaphalaṃ śrutam

वेदों का फल अग्निहोत्र है; धन का फल दान और उपभोग है; पत्नी का फल प्रेम और पुत्र है; और शास्त्र-ज्ञान का फल शील और सदाचार है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 117 (2.5.117)

एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपाः । पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥

etadākhyāya sa munirnārado vai mahātapāḥ | papracchānantaramidaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram

यह कहकर महातपस्वी मुनि नारद ने इसके बाद धर्मात्मा युधिष्ठिर से यह पूछा।

नारद उवाच

श्लोक 118 (2.5.118)

कच्चिदभ्यागता दूराद्वणिजो लाभकारणात् । यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्कं शुल्कोपजीविभिः ॥

kaccidabhyāgatā dūrādvaṇijo lābhakāraṇāt | yathoktamavahāryante śulkaṃ śulkopajīvibhiḥ

क्या लाभ की इच्छा से दूर से आए व्यापारियों से शुल्क पर जीविका चलाने वाले अधिकारी केवल उतना ही शुल्क लेते हैं जितना निर्धारित है?

श्लोक 119 (2.5.119)

कच्चित्ते पुरुषा राजन्पुरे राष्ट्रे च मानिताः । उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवञ्चिताः ॥

kaccitte puruṣā rājanpure rāṣṭre ca mānitāḥ | upānayanti paṇyāni upadhābhiravañcitāḥ

हे राजन्! क्या वे लोग तुम्हारे नगर और राष्ट्र में सम्मान पाते हैं, और बिना छल-कपट से ठगे गए अपना माल लाते हैं?

श्लोक 120 (2.5.120)

कच्चिच्छृणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिरः । नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम् ॥

kaccicchṛṇoṣi vṛddhānāṃ dharmārthasahitā giraḥ | nityamarthavidāṃ tāta yathādharmārthadarśinām

तात! क्या तुम अर्थ के ज्ञाता और धर्म-अर्थ को यथावत् देखने वाले वृद्धजनों की धर्म और अर्थ से युक्त बातें सदा सुनते हो?

श्लोक 121 (2.5.121)

कच्चित्ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च । धर्मार्थं च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी ॥

kaccitte kṛṣitantreṣu goṣu puṣpaphaleṣu ca | dharmārthaṃ ca dvijātibhyo dīyete madhusarpiṣī

क्या तुम्हारी खेती, गौओं, फूलों और फलों में से धर्म के निमित्त द्विजों को मधु और घी दिया जाता है?

श्लोक 122 (2.5.122)

द्रव्योपकरणं किञ्चित्सर्वदा सर्वशिल्पिनाम् । चातुर्मास्यावरं सम्यङ्नियतं सम्प्रयच्छसि ॥

dravyopakaraṇaṃ kiñcitsarvadā sarvaśilpinām | cāturmāsyāvaraṃ samyaṅniyataṃ samprayacchasi

क्या तुम सभी शिल्पियों को सदा नियमपूर्वक कम से कम चार महीनों के लिए आवश्यक सामग्री और उपकरण देते हो?

श्लोक 123 (2.5.123)

कच्चित्कृतं विजानीषे कर्तारं च प्रशंससि । सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजयन् ॥

kaccitkṛtaṃ vijānīṣe kartāraṃ ca praśaṃsasi | satāṃ madhye mahārāja satkaroṣi ca pūjayan

हे महाराज! क्या तुम किए गए कार्य को पहचानते हो, कर्ता की प्रशंसा करते हो, और सज्जनों के बीच उसका आदर-सत्कार करते हो?

श्लोक 124 (2.5.124)

कच्चित्सूत्राणि सर्वाणि गृह्णासि भरतर्षभ । हस्तिसूत्राश्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो ॥

kaccitsūtrāṇi sarvāṇi gṛhṇāsi bharatarṣabha | hastisūtrāśvasūtrāṇi rathasūtrāṇi vā vibho

हे भरतश्रेष्ठ, हे प्रभु! क्या तुम सभी सूत्रग्रन्थों — हाथियों, घोड़ों और रथों से सम्बन्धित सूत्रों — को ग्रहण करते हो?

श्लोक 125 (2.5.125)

कच्चिदभ्यस्यते सम्यग्गृहे ते भरतर्षभ । धनुर्वेदस्य सूत्रं वै यन्त्रसूत्रं च नागरम् ॥

kaccidabhyasyate samyaggṛhe te bharatarṣabha | dhanurvedasya sūtraṃ vai yantrasūtraṃ ca nāgaram

हे भरतश्रेष्ठ! क्या तुम्हारे घर में धनुर्वेद के सूत्र और नगर-रक्षा के यन्त्रों के सूत्र का भली-भाँति अभ्यास होता है?

श्लोक 126 (2.5.126)

कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि ब्रह्मदण्डश्च तेऽनघ । विषयोगास्तथा सर्वे विदिताः शत्रुनाशनाः ॥

kaccidastrāṇi sarvāṇi brahmadaṇḍaśca te'nagha | viṣayogāstathā sarve viditāḥ śatrunāśanāḥ

हे निष्पाप! क्या तुम्हें सभी अस्त्रों, ब्रह्मदण्ड और शत्रुओं का नाश करने वाले सभी विष-प्रयोगों का ज्ञान है?

श्लोक 127 (2.5.127)

कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्वं व्यालभयात्तथा । रोगरक्षोभयाच्चैव राष्ट्रं स्वं परिरक्षसि ॥

kaccidagnibhayāccaiva sarvaṃ vyālabhayāttathā | rogarakṣobhayāccaiva rāṣṭraṃ svaṃ parirakṣasi

क्या तुम अपने समस्त राष्ट्र की अग्नि, हिंसक पशुओं, रोगों और राक्षसों के भय से रक्षा करते हो?

श्लोक 128 (2.5.128)

कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गून्व्यङ्गानबान्धवान् । पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि ॥

kaccidandhāṃśca mūkāṃśca paṅgūnvyaṅgānabāndhavān | piteva pāsi dharmajña tathā pravrajitānapi

हे धर्मज्ञ! क्या तुम अंधों, गूँगों, लँगड़ों, विकलांगों, बन्धुहीनों और संन्यासियों का भी पिता के समान पालन करते हो?

श्लोक 129 (2.5.129)

षडनर्था महाराज कच्चित्ते पृष्ठतः कृताः । निद्राऽऽलस्यं भयं क्रोधो मार्दवं दीर्घसूत्रता ॥

ṣaḍanarthā mahārāja kaccitte pṛṣṭhataḥ kṛtāḥ | nidrā''lasyaṃ bhayaṃ krodho mārdavaṃ dīrghasūtratā

हे महाराज! क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, ढिलाई और दीर्घसूत्रता — इन छह अनर्थों को पीछे छोड़ दिया है?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 130 (2.5.130)

ततः कुरूणामृषभो महात्मा श्रुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य । प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो राजाऽब्रवीन्नारदं देवरूपम् ॥

tataḥ kurūṇāmṛṣabho mahātmā śrutvā giro brāhmaṇasattamasya | praṇamya pādāvabhivādya tuṣṭo rājā'bravīnnāradaṃ devarūpam

तब कुरुश्रेष्ठ महात्मा राजा ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के वचन सुनकर उनके चरणों में प्रणाम और अभिवादन किया, और संतुष्ट होकर देवस्वरूप नारद से कहा —

श्लोक 131 (2.5.131)

एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजा लेभे महीं सागरमेखलां च ॥

evaṃ kariṣyāmi yathā tvayoktaṃ prajñā hi me bhūya evābhivṛddhā | uktvā tathā caiva cakāra rājā lebhe mahīṃ sāgaramekhalāṃ ca

"आपने जैसा कहा है, मैं वैसा ही करूँगा; मेरी बुद्धि और भी बढ़ गई है।" यह कहकर राजा ने वैसा ही किया और सागर से घिरी पृथ्वी प्राप्त की।

नारद उवाच

श्लोक 132 (2.5.132)

एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे । स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम् ॥

evaṃ yo vartate rājā cāturvarṇyasya rakṣaṇe | sa vihṛtyeha susukhī śakrasyaiti salokatām

जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों की रक्षा करते हुए आचरण करता है, वह यहाँ सुखपूर्वक विहार करके अन्त में इन्द्र के लोक को प्राप्त होता है।

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