सभा पर्व · अध्याय 60
कृष्ण द्वारा बाणासुर की पराजय और अनिरुद्ध की मुक्ति
भीष्म कृष्ण के पराक्रमों का वर्णन आगे बढ़ाते हुए बाणासुर की कथा सुनाते हैं — बलि का सहस्रभुज ज्येष्ठ पुत्र, जो शिव से वर पाकर शोणितपुर से देवताओं पर शासन करता है। जब कृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध बाण की पुत्री उषा के साथ गुप्त रूप से रहता पकड़ा जाता है और कारागार में डाल दिया जाता है, तब नारद द्वारका में यह समाचार देते हैं। कृष्ण बलराम और प्रद्युम्न के साथ गरुड़ पर चढ़कर जाते हैं, द्वार पर शिव को परास्त करते हैं, चक्र से बाण की सहस्र भुजाएँ काट डालते हैं और अनिरुद्ध, उषा तथा बाण के धन के साथ लौटते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.60.1)
द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् । सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥
dvārakāyāṃ tataḥ kṛṣṇaḥ svadāreṣu divāniśam | sukhaṃ labdhvā mahārāja pramumoda mahāyaśāḥ
हे महाराज, तदनन्तर महायशस्वी कृष्ण द्वारका में अपनी पत्नियों के बीच दिन-रात सुखपूर्वक रहते हुए आनन्दित रहे।
श्लोक 2 (2.60.2)
पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां प्रियं तदा । सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥
pautrasya kāraṇāccakre vibudhānāṃ priyaṃ tadā | savāsavaiḥ suraiḥ sarvairduṣkaraṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, तब उन्होंने अपने पौत्र के कारण देवताओं को प्रिय लगने वाला ऐसा कार्य किया, जो इन्द्र सहित सब देवताओं के लिए भी दुष्कर था।
श्लोक 3 (2.60.3)
बाणो नामाऽभवद्राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली । वीर्यवान्भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥
bāṇo nāmā'bhavadrājā balerjyeṣṭhasuto balī | vīryavānbharataśreṣṭha sa ca bāhusahasravān
बलि का ज्येष्ठ पुत्र बाण नाम का एक बलवान राजा था। हे भरतश्रेष्ठ, वह पराक्रमी था और उसकी सहस्र भुजाएँ थीं।
श्लोक 4 (2.60.4)
ततस्तेपे तपस्तीव्रं सत्वेन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहु ॥
tatastepe tapastīvraṃ satvena manasā nṛpa | rudramārādhayāmāsa sa ca bāṇaḥ samā bahu
हे राजन्, उसने दृढ़ मन से कठोर तपस्या की और बहुत वर्षों तक रुद्र की आराधना की।
श्लोक 5 (2.60.5)
तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना । तांश्च लब्ध्वा वरान्बाणो दुर्लभानसुरैर्भुवि ॥
tasmai bahuvarā dattāḥ śaṅkareṇa mahātmanā | tāṃśca labdhvā varānbāṇo durlabhānasurairbhuvi
महात्मा शंकर ने उसे बहुत-से वर दिए। पृथ्वी पर असुरों के लिए दुर्लभ उन वरों को पाकर
श्लोक 6 (2.60.6)
स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली । त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥
sa śoṇitapure rājyaṃ cakārāpratimo balī | trāsitāśca surāḥ sarve tena bāṇena pāṇḍava
वह अनुपम बलवान बाण शोणितपुर में राज्य करने लगा। हे पाण्डुनन्दन, उस बाण ने सब देवताओं को त्रस्त कर दिया।
श्लोक 7 (2.60.7)
विजित्य विबुधान्सेन्द्रान्बाणः संवत्सरान्बहून् । अशासत महद्राज्यं कुबेर इव भारत ॥
vijitya vibudhānsendrānbāṇaḥ saṃvatsarānbahūn | aśāsata mahadrājyaṃ kubera iva bhārata
हे भारत, इन्द्र सहित देवताओं को जीतकर बाण ने कुबेर की भाँति बहुत वर्षों तक विशाल राज्य पर शासन किया।
श्लोक 8 (2.60.8)
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता यथा । येनोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ॥
tato rājannuṣā nāma bāṇasya duhitā yathā | yenopāyena kaunteya aniruddho mahādyutiḥ
हे राजन्, बाण की उषा नाम की एक पुत्री थी। हे कुन्तीनन्दन, किसी उपाय से महातेजस्वी अनिरुद्ध ने,
श्लोक 9 (2.60.9)
प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह । अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ॥
prādyumnistāmuṣāṃ prāpya pracchannaḥ pramumoda ha | atha bāṇo mahātejāstadā tatra yudhiṣṭhira
जो प्रद्युम्न के पुत्र थे, उस उषा को पा लिया और छिपकर उसके साथ आनन्द से रहने लगे। हे युधिष्ठिर, तब महातेजस्वी बाण ने
श्लोक 10 (2.60.10)
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया तदा । गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ॥
taṃ guhyanilayaṃ jñātvā prādyumniṃ sutayā tadā | gṛhītvā kārayāmāsa vastuṃ kārāgṛhe balāt
यह जानकर कि प्रद्युम्नपुत्र उसकी पुत्री के साथ गुप्त निवास में छिपा है, उसे पकड़वा लिया और बलपूर्वक कारागार में बन्द करवा दिया।
श्लोक 11 (2.60.11)
स कुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखसमन्वितः । बाणेन घातितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ॥
sa kumāraḥ sukhārho'tha tadā duḥkhasamanvitaḥ | bāṇena ghātito rājannaniruddho mumoha ca
सुख भोगने योग्य वह राजकुमार अनिरुद्ध तब दुःख में पड़ गया। हे राजन्, बाण की चोट से वह मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 12 (2.60.12)
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः । द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ॥
etasminneva kāle tu nārado munipuṅgavaḥ | dvārakāṃ prāpya kaunteya kṛṣṇaṃ dṛṣṭvā vaco'bravīt
हे कुन्तीनन्दन, उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारद द्वारका पहुँचे और कृष्ण को देखकर बोले—
श्लोक 13 (2.60.13)
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन । पौत्रस्ते बाध्यमानोऽत्र बाणेनामिततेजसा ॥
kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho yadūnāṃ kīrtivardhana | pautraste bādhyamāno'tra bāṇenāmitatejasā
"हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे महाबाहु, यदुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले! तुम्हारा पौत्र वहाँ अमित तेजस्वी बाण के द्वारा सताया जा रहा है।
श्लोक 14 (2.60.14)
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा । एतदुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ॥
kṛcchraṃ prāpto'niruddho vai śete kārāgṛhe sadā | etaduktvā surarṣirvai bāṇasyātha puraṃ yayau
अनिरुद्ध घोर संकट में है और निरन्तर कारागार में पड़ा है।" यह कहकर देवर्षि नारद बाण की नगरी को चले गए।
श्लोक 15 (2.60.15)
नारदस्य वचः श्रुत्वा ततो राजञ्जनार्दनः । आहूय बलदेवं हि प्रद्युम्नं च महाद्युतिम् ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā tato rājañjanārdanaḥ | āhūya baladevaṃ hi pradyumnaṃ ca mahādyutim
हे राजन्, नारद की बात सुनकर जनार्दन ने बलदेव और महातेजस्वी प्रद्युम्न को बुलाया
श्लोक 16 (2.60.16)
आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दनः । ततः सुपर्णमारुह्य जयाय भरतर्षभ ॥
āruroha garutmantaṃ tābhyāṃ saha janārdanaḥ | tataḥ suparṇamāruhya jayāya bharatarṣabha
और उन दोनों के साथ गरुड़ पर सवार हुए। हे भरतश्रेष्ठ, तब सुपर्ण पर आरूढ़ होकर विजय के लिए
श्लोक 17 (2.60.17)
जग्मुः क्रुधा महावीर्या बाणस्य नगरं प्रति । अथासाद्य महाराज तत्पुरं ददृशुश्च ते ॥
jagmuḥ krudhā mahāvīryā bāṇasya nagaraṃ prati | athāsādya mahārāja tatpuraṃ dadṛśuśca te
वे महापराक्रमी वीर क्रोध में भरकर बाण के नगर की ओर चले। हे महाराज, वहाँ पहुँचकर उन्होंने वह नगरी देखी,
श्लोक 18 (2.60.18)
ताम्रप्राकारसङ्गुप्तां हेमप्रासादसङ्कुलाम् । दृष्ट्वा मुदा युताः सर्वे विस्मयं परमं ययुः ॥
tāmraprākārasaṅguptāṃ hemaprāsādasaṅkulām | dṛṣṭvā mudā yutāḥ sarve vismayaṃ paramaṃ yayuḥ
जो ताँबे के परकोटों से सुरक्षित थी और सोने के महलों से भरी हुई थी। उसे देखकर वे सब हर्षित हुए और अत्यन्त विस्मित हो गए।
श्लोक 19 (2.60.19)
तथा बाणपुरस्यासन्द्वारस्था देवताः सदा । महेश्वरो गुहश्चैव भद्रकाली विनायकः ॥
tathā bāṇapurasyāsandvārasthā devatāḥ sadā | maheśvaro guhaścaiva bhadrakālī vināyakaḥ
बाण की नगरी के द्वारों पर सदा देवता नियुक्त रहते थे — महेश्वर, गुह, भद्रकाली और विनायक।
श्लोक 20 (2.60.20)
अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान्युधिष्ठिर । सुसङ्क्रुद्धो महातेजाः शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥
atha kṛṣṇo balājjitvā dvārapālānyudhiṣṭhira | susaṅkruddho mahātejāḥ śaṅkhacakragadāsibhṛt
हे युधिष्ठिर, तब शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण किए महातेजस्वी कृष्ण ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर द्वारपालों को बलपूर्वक जीत लिया
श्लोक 21 (2.60.21)
आससादोत्तरद्वारं शङ्करेणाभिरक्षितम् । तत्र तस्थौ महातेजाः शूलपाणिर्महेश्वरः ॥
āsasādottaradvāraṃ śaṅkareṇābhirakṣitam | tatra tasthau mahātejāḥ śūlapāṇirmaheśvaraḥ
और शंकर द्वारा रक्षित उत्तरी द्वार पर जा पहुँचे। वहाँ महातेजस्वी शूलपाणि महेश्वर खड़े थे,
श्लोक 22 (2.60.22)
पिनाकं सशरं गृह्य बाणस्य हितकाम्यया । ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥
pinākaṃ saśaraṃ gṛhya bāṇasya hitakāmyayā | jñātvā tamāgataṃ kṛṣṇaṃ vyāditāsyamivāntakam
जो बाण के हित की कामना से बाण चढ़ा हुआ पिनाक धनुष लिए थे। मुँह फैलाए काल के समान आए कृष्ण को पहचानकर
श्लोक 23 (2.60.23)
ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहेश्वरौ । तद्युद्धमभवद्घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् ॥
tatastau cakraturyuddhaṃ vāsudevamaheśvarau | tadyuddhamabhavadghoramacintyaṃ romaharṣaṇam
वासुदेव और महेश्वर दोनों में युद्ध छिड़ गया। वह युद्ध भयंकर, अकल्पनीय और रोमांचकारी था।
श्लोक 24 (2.60.24)
अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । दिव्यान्यस्त्राणि तौ देवौ क्रुद्धौ मुमुचतुस्तदा ॥
anyonyaṃ tau tatakṣāte anyonyajayakāṅkṣiṇau | divyānyastrāṇi tau devau kruddhau mumucatustadā
एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से वे परस्पर प्रहार करने लगे, और क्रोध में भरे उन दोनों देवों ने दिव्य अस्त्र छोड़े।
श्लोक 25 (2.60.25)
ततः कृष्णो रणं कृत्वा मुहूर्तं शूलपाणिना । विजित्य तं महादेवं ततो युद्धे जनार्दनः । अन्यांश्च जित्वा द्वारस्थान्प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥
tataḥ kṛṣṇo raṇaṃ kṛtvā muhūrtaṃ śūlapāṇinā | vijitya taṃ mahādevaṃ tato yuddhe janārdanaḥ | anyāṃśca jitvā dvārasthānpraviveśa purottamam
तब कृष्ण ने कुछ समय तक शूलपाणि से युद्ध किया और उस युद्ध में महादेव को परास्त करके, अन्य द्वारपालों को भी जीतकर, उस श्रेष्ठ नगरी में प्रवेश किया।
श्लोक 26 (2.60.26)
प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दनः । चक्रे युद्धं महाक्रुद्धस्तेन बाणेन भरतर्षभ ॥
praviśya bāṇamāsādya sa tatrātha janārdanaḥ | cakre yuddhaṃ mahākruddhastena bāṇena bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, भीतर जाकर जनार्दन ने बाण का सामना किया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उससे युद्ध किया।
श्लोक 27 (2.60.27)
बाणोऽपि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ । सुसङ्क्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे ॥
bāṇo'pi sarvaśastrāṇi śitāni bharatarṣabha | susaṅkruddhastadā yuddhe pātayāmāsa keśave
हे भरतश्रेष्ठ, बाण ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस युद्ध में अपने सब तीखे शस्त्र केशव पर गिराए।
श्लोक 28 (2.60.28)
पुनरुद्यम्य शस्त्राणि सहस्रं सर्वबाहुभिः । मुमोच बाणः सङ्क्रुद्धः कृष्णं प्रति रणाजिरे ॥
punarudyamya śastrāṇi sahasraṃ sarvabāhubhiḥ | mumoca bāṇaḥ saṅkruddhaḥ kṛṣṇaṃ prati raṇājire
फिर क्रोध से भरे बाण ने अपनी सब भुजाओं से सहस्र शस्त्र उठाकर रणभूमि में कृष्ण पर छोड़े।
श्लोक 29 (2.60.29)
ततः कृष्णस्तदा कृत्त्वा तानि सर्वाणि भारत । कृत्वा मुहूर्तं बाणेन युद्धं राजन्नधोक्षजः ॥
tataḥ kṛṣṇastadā kṛttvā tāni sarvāṇi bhārata | kṛtvā muhūrtaṃ bāṇena yuddhaṃ rājannadhokṣajaḥ
हे भारत, तब कृष्ण ने उन सबको काट डाला, और हे राजन्, कुछ समय तक बाण से युद्ध करके अधोक्षज ने
श्लोक 30 (2.60.30)
चक्रमुद्यम्य रोषाद्वै दिव्यं शस्त्रोत्तमं ततः । सहस्रबाहूंश्चिच्छेद बाणस्यामिततेजसः ॥
cakramudyamya roṣādvai divyaṃ śastrottamaṃ tataḥ | sahasrabāhūṃściccheda bāṇasyāmitatejasaḥ
क्रोधपूर्वक अपना दिव्य, सर्वश्रेष्ठ आयुध चक्र उठाया और अमित तेजस्वी बाण की सहस्र भुजाएँ काट डालीं।
श्लोक 31 (2.60.31)
ततो बाणो महाराज कृष्णेन भृशपीडितः । भिन्नबाहुः पपाताशु विशाख इव पादपः ॥
tato bāṇo mahārāja kṛṣṇena bhṛśapīḍitaḥ | bhinnabāhuḥ papātāśu viśākha iva pādapaḥ
हे महाराज, तब कृष्ण से अत्यन्त पीड़ित बाण भुजाएँ कट जाने पर शाखाहीन वृक्ष की भाँति तुरन्त गिर पड़ा।
श्लोक 32 (2.60.32)
स पातयित्वा बाणैस्तं बाणं कृष्णस्त्वरान्वितः । प्राद्युम्निं मोचयामास क्षिप्रं राजगृहात्तदा ॥
sa pātayitvā bāṇaistaṃ bāṇaṃ kṛṣṇastvarānvitaḥ | prādyumniṃ mocayāmāsa kṣipraṃ rājagṛhāttadā
बाणों से बाणासुर को गिराकर कृष्ण ने शीघ्रता से प्रद्युम्नपुत्र को राजकारागार से तुरन्त छुड़ा लिया।
श्लोक 33 (2.60.33)
मोक्षयित्वाऽथ गोविन्दः प्राद्युम्निं सह भार्यया । बाणस्य सर्वरत्नानि असङ्ख्यानि जहार सः ॥
mokṣayitvā'tha govindaḥ prādyumniṃ saha bhāryayā | bāṇasya sarvaratnāni asaṅkhyāni jahāra saḥ
प्रद्युम्नपुत्र को उसकी पत्नी सहित छुड़ाकर गोविन्द ने बाण के सारे असंख्य रत्न हर लिए।
श्लोक 34 (2.60.34)
गोधनानि च सर्वस्वं स बाणस्यालये बलात् । जहार च हृषीकेशो यदूनां कुलवर्धनः ॥
godhanāni ca sarvasvaṃ sa bāṇasyālaye balāt | jahāra ca hṛṣīkeśo yadūnāṃ kulavardhanaḥ
यदुकुल की वृद्धि करने वाले हृषीकेश ने बाण के भवन से गोधन और सारी सम्पत्ति भी बलपूर्वक ले ली।
श्लोक 35 (2.60.35)
ततः स सर्वरत्नानि चाहृत्य मधुसूदनः । क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे सर्वस्वं गरुडोपरि ॥
tataḥ sa sarvaratnāni cāhṛtya madhusūdanaḥ | kṣipramāropayāñcakre sarvasvaṃ garuḍopari
सारे रत्न एकत्र करके मधुसूदन ने वह समस्त सम्पत्ति शीघ्र ही गरुड़ पर लाद दी।
श्लोक 36 (2.60.36)
त्वरयाऽथ स कौन्तेय बलदेवं महाबलम् । प्रद्युम्नं च महावीर्यमनिरुद्धं महाद्युतिम् ॥
tvarayā'tha sa kaunteya baladevaṃ mahābalam | pradyumnaṃ ca mahāvīryamaniruddhaṃ mahādyutim
हे कुन्तीनन्दन, फिर उस पराक्रमी ने शीघ्रता से महाबली बलदेव, महावीर प्रद्युम्न, महातेजस्वी अनिरुद्ध
श्लोक 37 (2.60.37)
उषां च सुन्दरीं राजन्भृत्यदारगणैः सह । सर्वानेतान्समारोप्य गरुडोपरि वीर्यवान् ॥
uṣāṃ ca sundarīṃ rājanbhṛtyadāragaṇaiḥ saha | sarvānetānsamāropya garuḍopari vīryavān
और हे राजन्, सेवकों और स्त्रियों के समूह सहित सुन्दरी उषा — इन सबको गरुड़ पर बिठाया।
श्लोक 38 (2.60.38)
मुदा युक्तो महातेजाः पीताम्बरधरो बली । दिव्याभरणचित्राङ्गः शङ्खचक्रगदासिभृत् । आरुरोह गरुत्मन्तमुदयं भास्करो यथा ॥
mudā yukto mahātejāḥ pītāmbaradharo balī | divyābharaṇacitrāṅgaḥ śaṅkhacakragadāsibhṛt | āruroha garutmantamudayaṃ bhāskaro yathā
फिर आनन्द से भरे, पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित अंगों वाले, शंख-चक्र-गदा-खड्ग धारण किए वे महातेजस्वी बलशाली कृष्ण उदित होते सूर्य की भाँति गरुड़ पर आरूढ़ हुए।