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सभा पर्व · अध्याय 59

द्वारका की स्त्रियों द्वारा श्रीकृष्ण का स्वागत

दाशार्हों की स्त्रियाँ, यशोदा, श्रीकृष्ण की रानियाँ और द्वारका की अन्य स्त्रियाँ श्रीकृष्ण का वैभव देखने सभा-भवन में आती हैं। बलराम और श्रीकृष्ण रोहिणी और देवकी को प्रणाम करते हैं, और यशोदा की पुत्री एकानंगा का प्रेम से स्वागत करते हैं, जिसके कारण श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया था। वृष्णियों द्वारा अक्षत और फूलों की वर्षा के बीच श्रीकृष्ण अपने भवन जाते हैं और अपनी प्रत्येक रानी के साथ समय बिताते हैं। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि यही शार्ङ्गधनुषधारी की विजय थी और यही मनुष्यों में उनके जन्म का प्रयोजन।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.59.1)

ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः । नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्रुता ॥

tataḥ sarvadaśārhāṇāmāhukasya ca yāḥ striyaḥ | nandagopasya mahiṣī yaśodā lokaviśrutā

तब सब दाशार्हों और आहुक की स्त्रियाँ, नन्दगोप की पटरानी लोकविख्यात यशोदा,

श्लोक 2 (2.59.2)

रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पतिव्रता । सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि च ॥

revatī ca mahābhāgā rukmiṇī ca pativratā | satyā jāmbavatī cobhe gāndhārī śiṃśumāpi ca

महाभाग्यशालिनी रेवती और पतिव्रता रुक्मिणी, सत्या और जाम्बवती दोनों, गान्धारी और शिंशुमा भी,

श्लोक 3 (2.59.3)

विशोका लक्षणा चापि सुमित्रा केतुमा तथा । वासुदेवमहिष्योऽन्याः श्रिया सार्धं ययुस्तदा ॥

viśokā lakṣaṇā cāpi sumitrā ketumā tathā | vāsudevamahiṣyo'nyāḥ śriyā sārdhaṃ yayustadā

विशोका और लक्षणा, सुमित्रा और केतुमा, तथा वासुदेव की अन्य रानियाँ भी तब श्री के साथ वहाँ चलीं।

श्लोक 4 (2.59.4)

विभूतिं द्रष्टुमनसः केशवस्य महात्मनः । प्रीयमाणाः सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम् ॥

vibhūtiṃ draṣṭumanasaḥ keśavasya mahātmanaḥ | prīyamāṇāḥ sabhāṃ jagmurālokayitumacyutam

महात्मा केशव का वैभव देखने की इच्छा से वे प्रसन्न होकर अच्युत के दर्शन के लिए सभा-भवन में गईं।

श्लोक 5 (2.59.5)

देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता । ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभृता सह ॥

devakī sarvadevīnāṃ rohiṇī ca puraskṛtā | dadṛśurdevamāsīnaṃ kṛṣṇaṃ halabhṛtā saha

सब रानियों में अग्रणी देवकी और रोहिणी के साथ उन्होंने हलधर (बलराम) के संग बैठे दिव्य कृष्ण को देखा।

श्लोक 6 (2.59.6)

तौ तु पूर्वमतिक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥

tau tu pūrvamatikramya rohiṇīmabhivādya ca | abhyavādayatāṃ devau devakīṃ rāmakeśavau

वे दोनों दिव्य भाई, बलराम और केशव, पहले आगे बढ़कर रोहिणी को प्रणाम करके फिर देवकी को प्रणाम करने लगे।

श्लोक 7 (2.59.7)

सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभेऽधिकम् । देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च ॥

sā tābhyāmṛṣabhākṣābhyāṃ putrābhyāṃ śuśubhe'dhikam | devakī devamāteva mitreṇa varuṇena ca

वृषभ जैसे नेत्रों वाले उन दोनों पुत्रों के साथ देवकी और भी अधिक शोभित हुईं, जैसे मित्र और वरुण के साथ देवमाता अदिति।

श्लोक 8 (2.59.8)

ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि । जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयाऽतीव भारत ॥

tataḥ prāptā yaśodāyā duhitā vai kṣaṇena hi | jājvalyamānā vapuṣā prabhayā'tīva bhārata

तब हे भारत, क्षण भर में यशोदा की पुत्री वहाँ आ पहुँची, जो अपने रूप से दमक रही थी और अत्यन्त कान्तिमयी थी —

श्लोक 9 (2.59.9)

एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां वै कामरूपिणीम् । यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः ॥

ekānaṅgeti yāmāhuḥ kanyāṃ vai kāmarūpiṇīm | yatkṛte sagaṇaṃ kaṃsaṃ jaghāna puruṣottamaḥ

वह कन्या जिसे लोग एकानंगा कहते हैं, जो इच्छानुसार रूप धारण करती है, और जिसके कारण पुरुषोत्तम ने कंस को उसके गणों सहित मारा था।

श्लोक 10 (2.59.10)

ततः स भगवान्रामस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् । मूर्ध्न्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना ॥

tataḥ sa bhagavānrāmastāmupākramya bhāminīm | mūrdhnyupāghrāya savyena parijagrāha pāṇinā

तब भगवान बलराम ने उस तेजस्विनी के पास जाकर उसका मस्तक सूँघा और बाएँ हाथ से उसे थाम लिया।

श्लोक 11 (2.59.11)

तां च तत्रोपसम्प्राप्य प्रियामिव सखीमिमाम् । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥

tāṃ ca tatropasamprāpya priyāmiva sakhīmimām | dakṣiṇena karāgreṇa parijagrāha mādhavaḥ

और माधव ने भी वहाँ उसके पास जाकर, प्रिय सखी के समान, दाहिने हाथ की उँगलियों से उसे थाम लिया।

श्लोक 12 (2.59.12)

ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः । रुक्मपद्मशयां पद्मश्रीमिवोत्तमनागयोः ॥

dadṛśustāṃ sabhāmadhye bhaginīṃ rāmakṛṣṇayoḥ | rukmapadmaśayāṃ padmaśrīmivottamanāgayoḥ

सभा के बीच लोगों ने बलराम और कृष्ण की उस बहन को देखा, मानो दो श्रेष्ठ गजराजों के बीच स्वर्णकमल पर विराजमान, कमल की शोभा वाली लक्ष्मी हों।

श्लोक 13 (2.59.13)

अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि । वृष्णयोऽवाकिरन्प्रीताः सङ्कर्षणजनार्दनौ ॥

athākṣatamahāvṛṣṭyā lājapuṣpaghṛtairapi | vṛṣṇayo'vākiranprītāḥ saṅkarṣaṇajanārdanau

तब वृष्णियों ने प्रसन्न होकर संकर्षण और जनार्दन पर अक्षत, लाजा, फूलों और घी की भारी वर्षा की।

श्लोक 14 (2.59.14)

सबालाः सहवृद्धाश्च ये ज्ञातिकुलबान्धवाः । उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् ॥

sabālāḥ sahavṛddhāśca ye jñātikulabāndhavāḥ | upopaviviśuḥ prītā vṛṣṇayo madhusūdanam

बालक और वृद्ध, जाति, कुल और बन्धु-बान्धवों सहित सब वृष्णि प्रसन्न होकर मधुसूदन के पास चारों ओर बैठ गए।

श्लोक 15 (2.59.15)

पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः । विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः ॥

pūjyamāno mahābāhuḥ paurāṇāṃ rativardhanaḥ | viveśa puruṣavyāghraḥ svaveśma madhusūdanaḥ

सबसे सम्मान पाते हुए, नगरवासियों का आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु पुरुषसिंह मधुसूदन ने अपने भवन में प्रवेश किया।

श्लोक 16 (2.59.16)

रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् । अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत ॥

rukmiṇyā sahito devyā pramumoda sukhī sukham | anantaraṃ ca satyāyā jāmbavatyāśca bhārata

उन्होंने देवी रुक्मिणी के साथ सुखपूर्वक आनन्द मनाया, और उसके बाद, हे भारत, सत्यभामा और जाम्बवती के साथ।

श्लोक 17 (2.59.17)

सर्वासां च यदुश्रेष्ठो गेहे गेहे विहारवान् । जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः सदनं पुनः ॥

sarvāsāṃ ca yaduśreṣṭho gehe gehe vihāravān | jagāma ca hṛṣīkeśo rukmiṇyāḥ sadanaṃ punaḥ

यदुश्रेष्ठ हृषीकेश ने घर-घर जाकर सबके साथ विहार किया और फिर रुक्मिणी के भवन लौट आए।

श्लोक 18 (2.59.18)

एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः । एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः ॥

eṣa tāta mahābāho vijayaḥ śārṅgadhanvanaḥ | etadarthaṃ ca janmāhurmānuṣeṣu mahātmanaḥ

हे तात, हे महाबाहो, यही शार्ङ्गधनुषधारी की विजय है; और कहते हैं कि इसी प्रयोजन से उस महात्मा ने मनुष्यों में जन्म लिया।

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