सभा पर्व · अध्याय 58
श्रीकृष्ण का गृह-आगमन और इन्द्र की विदाई
श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्र द्वारका को निहारते हैं, और गरुड़ पर खड़े श्रीकृष्ण अपना शंख बजाते हैं। उग्रसेन के नेतृत्व में यादव हर्ष से बाहर आते हैं और स्त्रियाँ श्रीकृष्ण पर अक्षत बरसाती हैं। श्रीकृष्ण मणिपर्वत को स्थापित करते हैं, लाया हुआ धन सभा-भवन में रखते हैं, गुरु सान्दीपनि और पिता को प्रणाम करते हैं और धन अपने बन्धुओं में बाँट देते हैं। इन्द्र एकत्र वृष्णियों को संक्षेप में बताते हैं कि श्रीकृष्ण ने किस प्रयोजन से जन्म लिया और क्या-क्या किया, फिर यादव प्रमुखों को गले लगाकर ऐरावत पर सवार होकर चले जाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.58.1)
एवमालोकयाञ्चक्रुर्द्वारकामृषभास्त्रयः । उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः ॥
evamālokayāñcakrurdvārakāmṛṣabhāstrayaḥ | upendrabaladevau ca vāsavaśca mahāyaśāḥ
इस प्रकार उन तीनों श्रेष्ठ पुरुषों — उपेन्द्र (श्रीकृष्ण), बलदेव और महायशस्वी इन्द्र — ने द्वारका को निहारा।
श्लोक 2 (2.58.2)
ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन्गरुत्मतः । प्रीतः शङ्खमुपाध्मासीद्द्विषतां रोमहर्षणम् ॥
tatastaṃ pāṇḍaraṃ śaurirmūrdhni tiṣṭhangarutmataḥ | prītaḥ śaṅkhamupādhmāsīddviṣatāṃ romaharṣaṇam
तब गरुड़ के मस्तक पर खड़े शौरि ने प्रसन्न होकर अपना श्वेत शंख बजाया, जो शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देता है।
श्लोक 3 (2.58.3)
तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चुक्षुभे भृशम् । ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत्तदा ॥
tasya śaṅkhasya śabdena sāgaraścukṣubhe bhṛśam | rarāsa ca nabhaḥ sarvaṃ taccitramabhavattadā
उस शंख की ध्वनि से सागर अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और सारा आकाश गूँज गया; उस समय वह एक अद्भुत दृश्य था।
श्लोक 4 (2.58.4)
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धकाः । प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् ॥
pāñcajanyasya nirghoṣaṃ niśamya kukurāndhakāḥ | prīyamāṇāḥ samājagmurālokya madhusūdanam
पाञ्चजन्य का घोष सुनकर कुकुर और अन्धक प्रसन्न होकर मधुसूदन के दर्शन के लिए एकत्र हुए।
श्लोक 5 (2.58.5)
वसुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशङ्खरवैः सह । उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम् ॥
vasudevaṃ puraskṛtya veṇuśaṅkharavaiḥ saha | ugraseno yayau rājā vāsudevaniveśanam
वसुदेव को आगे करके राजा उग्रसेन वेणु और शंखों की ध्वनि के साथ वासुदेव (श्रीकृष्ण) के भवन की ओर चले।
श्लोक 6 (2.58.6)
आनन्दितुं पर्यचरन्स्वेषु वेश्मसु देवकी । रोहिणी च ययौ देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः ॥
ānandituṃ paryacaransveṣu veśmasu devakī | rohiṇī ca yayau deśamāhukasya ca yāḥ striyaḥ
स्वागत का आनन्द मनाने के लिए देवकी आदि अपने-अपने भवनों में दौड़-धूप करने लगीं; रोहिणी भी वहाँ गईं, और आहुक के घर की स्त्रियाँ भी।
श्लोक 7 (2.58.7)
हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः । एवमुक्तः सह स्त्रीभिरक्षतैर्मधुसूदनः ॥
hatā brahmadviṣaḥ sarve jayantyandhakavṛṣṇayaḥ | evamuktaḥ saha strībhirakṣatairmadhusūdanaḥ
"ब्राह्मणों के सब द्वेषी मारे गए! अन्धक और वृष्णि विजयी हैं!" — ऐसा कहते हुए स्त्रियों ने मधुसूदन पर अक्षत बरसाए।
श्लोक 8 (2.58.8)
ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात् । चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम् ॥
tataḥ śauriḥ suparṇena svaṃ niveśanamabhyayāt | cakārātha yathoddeśamīśvaro maṇiparvatam
तब शौरि सुपर्ण (गरुड़) पर सवार होकर अपने भवन गए, और प्रभु ने मणिपर्वत को उसके योग्य स्थान पर स्थापित किया।
श्लोक 9 (2.58.9)
ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः । निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः ॥
tato dhanāni ratnāni sabhāyāṃ madhusūdanaḥ | nidhāya puṇḍarīkākṣaḥ piturdarśanalālasaḥ
फिर कमलनयन मधुसूदन ने धन और रत्न सभा-भवन में रख दिए, क्योंकि वे अपने पिता के दर्शन के लिए उत्सुक थे।
श्लोक 10 (2.58.10)
ततः सान्दीपिनिं पूर्वं ब्राह्मणं चापि भारत । यथान्यायं वासुदेव उपस्पृष्ट्वा महायशाः ॥
tataḥ sāndīpiniṃ pūrvaṃ brāhmaṇaṃ cāpi bhārata | yathānyāyaṃ vāsudeva upaspṛṣṭvā mahāyaśāḥ
तब हे भारत, महायशस्वी वासुदेव ने विधिपूर्वक आचमन करके सबसे पहले ब्राह्मण सान्दीपनि को —
श्लोक 11 (2.58.11)
ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महायशाः । तथाऽश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दभृतचेतसम् ॥
vavande pṛthutāmrākṣaḥ prīyamāṇo mahāyaśāḥ | tathā'śruparipūrṇākṣamānandabhṛtacetasam
विशाल और ताम्रवर्ण नेत्रों वाले उस महायशस्वी ने प्रसन्न होकर प्रणाम किया। फिर आँसुओं से भरे नेत्रों और आनन्द से भरे हृदय वाले —
श्लोक 12 (2.58.12)
ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः । ताभ्यां च मूर्ध्न्युपाघ्रातः केशवः परवीरहा ॥
vavande saha rāmeṇa pitaraṃ vāsavānujaḥ | tābhyāṃ ca mūrdhnyupāghrātaḥ keśavaḥ paravīrahā
पिता को इन्द्र के छोटे भाई (श्रीकृष्ण) ने बलराम के साथ प्रणाम किया। उन दोनों ने शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव का मस्तक सूँघा।
श्लोक 13 (2.58.13)
यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान्यदुनन्दनः । सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः ॥
yathāśreṣṭhamupāgamya sātvatānyadunandanaḥ | sarveṣāṃ nāma jagrāha dāśārhāṇāmadhokṣajaḥ
फिर यदुनन्दन अधोक्षज ने वरिष्ठता के क्रम से सात्वतों के पास जाकर सभी दाशार्हों को नाम लेकर सम्बोधित किया।
श्लोक 14 (2.58.14)
ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च । व्यभजत्तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः ॥
tataḥ sarvāṇi vittāni sarvaratnamayāni ca | vyabhajattāni tebhyo'tha sarvebhyo yadunandanaḥ
तब यदुनन्दन ने वह सारा धन और समस्त रत्नमय सम्पदा उन सबमें बाँट दी।
श्लोक 15 (2.58.15)
सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रतिमैः सभा । शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहैरिव गिरेर्गुहा ॥
sā keśavamahāmātrairmahendrapratimaiḥ sabhā | śuśubhe vṛṣṇiśārdūlaiḥ siṃhairiva girerguhā
केशव के महान मन्त्रियों और इन्द्र के समान तेजस्वी वृष्णि-सिंहों से भरी वह सभा ऐसी शोभित हुई जैसे सिंहों से भरी पर्वत की गुफा।
श्लोक 16 (2.58.16)
अथासनगतान्सर्वानुवाच विबुधाधिपः । शुभया हर्षयन्वाचा महेन्द्रस्तान्महायशाः । कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम् ॥
athāsanagatānsarvānuvāca vibudhādhipaḥ | śubhayā harṣayanvācā mahendrastānmahāyaśāḥ | kukurāndhakamukhyāṃśca taṃ ca rājānamāhukam
तब देवताओं के स्वामी महायशस्वी महेन्द्र ने अपनी शुभ वाणी से सबको हर्षित करते हुए वहाँ बैठे सब लोगों से — कुकुरों और अन्धकों के प्रमुखों से और राजा आहुक से — कहा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 17 (2.58.17)
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः । यत्कृतं वासुदेवेन तद्वक्ष्यामि समासतः ॥
yadarthaṃ janma kṛṣṇasya mānuṣeṣu mahātmanaḥ | yatkṛtaṃ vāsudevena tadvakṣyāmi samāsataḥ
"महात्मा कृष्ण ने किस प्रयोजन से मनुष्यों में जन्म लिया और वासुदेव ने क्या-क्या किया, यह मैं संक्षेप में बताता हूँ।
श्लोक 18 (2.58.18)
अयं शतसहस्राणि दानवानामरिन्दमः । निहत्य पुण्डरीकाक्षः पातालविवरं ययौ ॥
ayaṃ śatasahasrāṇi dānavānāmarindamaḥ | nihatya puṇḍarīkākṣaḥ pātālavivaraṃ yayau
इस कमलनयन शत्रुदमन ने लाखों दानवों का वध किया और पाताल के विवर तक गया।
श्लोक 19 (2.58.19)
यच्च नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः । तदिदं शौरिणा वित्तं प्रापितं भवतामिह ॥
yacca nādhigataṃ pūrvaiḥ prahlādabaliśambaraiḥ | tadidaṃ śauriṇā vittaṃ prāpitaṃ bhavatāmiha
जो धन पूर्वकाल के प्रह्लाद, बलि और शम्बर भी नहीं पा सके, वह शौरि ने यहाँ आप लोगों तक पहुँचा दिया है।
श्लोक 20 (2.58.20)
सपाशं मुरमाक्रम्य पाञ्चजन्यं च धीमता । शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भः सगणो हतः ॥
sapāśaṃ muramākramya pāñcajanyaṃ ca dhīmatā | śilāsaṅghānatikramya niśumbhaḥ sagaṇo hataḥ
उस बुद्धिमान ने पाशों सहित मुर को और पाञ्चजन्य को भी परास्त किया; शिलाओं के समूहों को लाँघकर उसने निशुम्भ को उसके गणों सहित मार डाला।
श्लोक 21 (2.58.21)
हयग्रीवश्च विक्रान्तो दानवो निहतो बली । मथितश्च मृधे भौमः कुण्डले चाहृते पुनः ॥
hayagrīvaśca vikrānto dānavo nihato balī | mathitaśca mṛdhe bhaumaḥ kuṇḍale cāhṛte punaḥ
पराक्रमी और बलवान दानव हयग्रीव मारा गया; भौम (नरकासुर) युद्ध में कुचल डाला गया और कुण्डल फिर से लौटा लाए गए।
श्लोक 22 (2.58.22)
पुनर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभिः सह । मन्मुखा आगमिष्यन्ति साध्याश्च मधुसूदनम् ॥
punarbāṇavadhe śaurimādityā vasubhiḥ saha | manmukhā āgamiṣyanti sādhyāśca madhusūdanam
और फिर बाणासुर के वध के समय आदित्य, वसु और साध्य मुझे आगे करके शौरि मधुसूदन के पास आएँगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (2.58.23)
एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् । सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः ॥
evamuktvā tataḥ sarvānāmantrya kukurāndhakān | sasvaje rāmakṛṣṇau ca vasudevaṃ ca vāsavaḥ
ऐसा कहकर और सब कुकुरों तथा अन्धकों से विदा लेकर इन्द्र ने बलराम, कृष्ण और वसुदेव को गले लगाया।
श्लोक 24 (2.58.24)
प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाननिरुद्धं च सारणम् । बभ्रुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ॥
pradyumnasāmbapramukhānaniruddhaṃ ca sāraṇam | babhruṃ jhalliṃ gadaṃ bhānuṃ cārudeṣṇaṃ ca vṛtrahā
वृत्रहन्ता इन्द्र ने प्रद्युम्न, साम्ब आदि को, अनिरुद्ध और सारण को, तथा बभ्रु, झल्लि, गद, भानु और चारुदेष्ण को गले लगाया।
श्लोक 25 (2.58.25)
सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम् । सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम् । भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्चान्धकवृष्णिषु ॥
satkṛtya sāraṇākrūrau punarābhāṣya sātyakim | sasvaje vṛṣṇirājānamāhukaṃ kukurādhipam | bhojaṃ ca kṛtavarmāṇamanyāṃścāndhakavṛṣṇiṣu
सारण और अक्रूर का सत्कार करके तथा सात्यकि से फिर बात करके उन्होंने वृष्णियों के राजा और कुकुरों के अधिपति आहुक को, भोज कृतवर्मा को और अन्धक-वृष्णियों में से अन्य लोगों को भी गले लगाया।
श्लोक 26 (2.58.26)
आमन्त्र्य देवप्रवरैर्वासवो वासवानुजम् । ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः ॥
āmantrya devapravarairvāsavo vāsavānujam | tataḥ śvetācalaprakhyaṃ gajamairāvataṃ prabhuḥ
श्रेष्ठ देवताओं के साथ इन्द्र ने अपने छोटे भाई (श्रीकृष्ण) से विदा ली। फिर वे प्रभु श्वेत पर्वत के समान दिखने वाले ऐरावत हाथी की ओर बढ़े।
श्लोक 27 (2.58.27)
पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपतिः । पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम् ॥
paśyatāṃ sarvabhūtānāmāruroha śacīpatiḥ | pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca divaṃ ca varavāraṇam
सब प्राणियों के देखते-देखते शचीपति उस श्रेष्ठ गजराज पर चढ़ गए, जो मानो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग को
श्लोक 28 (2.58.28)
मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्तमिवासकृत् । हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम् ॥
mukhāḍambaranirghoṣaiḥ pūrayantamivāsakṛt | haimayantramahākakṣyaṃ hiraṇmayaviṣāṇinam
अपनी सूँड़ के गम्भीर गर्जन से बार-बार भर रहा था; उसकी विशाल पेटियाँ सोने के यन्त्रों से जड़ी थीं और उसके दाँत सुनहरे थे;
श्लोक 29 (2.58.29)
मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम् । नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम् ॥
manoharakuthāstīrṇaṃ sarvaratnavibhūṣitam | nityasrutamadasrāvaṃ kṣarantamiva toyadam
वह मनोहर झूल से ढका और सब रत्नों से सजा था; उसके मद की धारा निरन्तर बहती थी, मानो जल बरसाता मेघ हो।
श्लोक 30 (2.58.30)
दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः । प्रबभौ मन्दराग्रस्थः प्रतपन्भानुमानिव ॥
diśāgajaṃ mahāmātraṃ kāñcanasrajamāsthitaḥ | prababhau mandarāgrasthaḥ pratapanbhānumāniva
उस विशाल दिग्गज पर सोने की माला पहने बैठे इन्द्र ऐसे शोभित हुए जैसे मन्दराचल के शिखर पर तपता सूर्य।
श्लोक 31 (2.58.31)
ततो वज्रमयं भीमं प्रगृह्य परमाङ्कुशम् । ययौ बलवता सार्धं पावकेन शचीपतिः ॥
tato vajramayaṃ bhīmaṃ pragṛhya paramāṅkuśam | yayau balavatā sārdhaṃ pāvakena śacīpatiḥ
फिर वज्रमय, भयंकर और श्रेष्ठ अंकुश हाथ में लेकर शचीपति बलवान अग्नि के साथ चल पड़े।
श्लोक 32 (2.58.32)
तं करेणुगजव्रातैर्विमानैश्च मरुद्गणाः । पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः कुबेरवरुणग्रहाः ॥
taṃ kareṇugajavrātairvimānaiśca marudgaṇāḥ | pṛṣṭhato'nuyayuḥ prītāḥ kuberavaruṇagrahāḥ
मरुद्गण हथिनियों और हाथियों के झुंडों तथा विमानों पर सवार होकर प्रसन्नता से उनके पीछे चले, और कुबेर, वरुण तथा ग्रह भी।
श्लोक 33 (2.58.33)
स वायुपक्षमास्थाय वैश्वानरपथं गतः । प्राप्य सूर्यपथं देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
sa vāyupakṣamāsthāya vaiśvānarapathaṃ gataḥ | prāpya sūryapathaṃ devastatraivāntaradhīyata
वायु के पंखों का आश्रय लेकर वे वैश्वानर (अग्नि) के मार्ग पर गए, और सूर्य के मार्ग तक पहुँचकर वे देव वहीं अन्तर्धान हो गए।