सभा पर्व · अध्याय 64
शिशुपाल का भीष्म पर आक्षेप: पाखण्डी हंस की कथा
शिशुपाल भीष्म पर टूट पड़ता है। वह कृष्ण के प्रसिद्ध बाल-कर्मों — पूतना, छकड़ा, दो वृक्ष, नाग, गोवर्धन और कंस-वध — को कोई आश्चर्य नहीं मानता, और कृष्ण को स्त्री तथा गौ की हत्या करने वाला बताकर स्तुति के अयोग्य ठहराता है। वह भीष्म पर भी पाखण्ड का आरोप लगाता है: अम्बा का अपहरण, निःसन्तान और निष्फल ब्रह्मचर्य, और ऐसी धर्म-चर्चा जिसे उनका आचरण झुठलाता है। वह चेतावनी देता है कि जैसे पक्षियों ने अहिंसा का उपदेश देकर चुपके से उनके अण्डे खाने वाले बूढ़े हंस को मार डाला था, वैसे ही राजा भीष्म को मार सकते हैं, और अन्त में उस हंस के विषय में गाई जाने वाली एक गाथा सुनाता है।
शिशुपाल उवाच
श्लोक 1 (2.64.1)
बिभीषिकाभिर्बह्वीभिर्भीषयन्भीष्म पार्थिवान् । न व्यपत्रपसे कस्माद्वृद्धः सन्कुलपांसनः ॥
bibhīṣikābhirbahvībhirbhīṣayanbhīṣma pārthivān | na vyapatrapase kasmādvṛddhaḥ sankulapāṃsanaḥ
भीष्म! इतनी सारी डरावनी बातों से राजाओं को डराते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती? तुम बूढ़े होकर भी अपने कुल को कलंकित करने वाले हो।
श्लोक 2 (2.64.2)
युक्तमेतत्तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया । वक्तुं धर्मादपेतार्थं त्वं हि सर्वकुरूत्तमः ॥
yuktametattṛtīyāyāṃ prakṛtau vartatā tvayā | vaktuṃ dharmādapetārthaṃ tvaṃ hi sarvakurūttamaḥ
तीसरी प्रकृति (नपुंसकता) में रहने वाले तुम्हारे लिए धर्म से रहित बातें कहना उचित ही है — तुम तो सारे कुरुओं में 'श्रेष्ठ' हो न!
श्लोक 3 (2.64.3)
नावि नौरिव सम्बद्धा यथान्धो वान्धमन्वियात् । तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म त्वमग्रणीः ॥
nāvi nauriva sambaddhā yathāndho vāndhamanviyāt | tathābhūtā hi kauravyā yeṣāṃ bhīṣma tvamagraṇīḥ
जैसे एक नाव से बँधी दूसरी नाव, या जैसे अंधा अंधे के पीछे चले — भीष्म, वैसे ही हैं ये कौरव, जिनके तुम अगुआ हो।
श्लोक 4 (2.64.4)
पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषतः । त्वया कीर्तयताऽस्माकं भूयः प्रव्यथितं मनः ॥
pūtanāghātapūrvāṇi karmāṇyasya viśeṣataḥ | tvayā kīrtayatā'smākaṃ bhūyaḥ pravyathitaṃ manaḥ
पूतना-वध से आरम्भ करके इसके कर्मों का विशेष रूप से बखान करके तुमने हमारे मन को और भी व्यथित कर दिया है।
श्लोक 5 (2.64.5)
अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छतः । कथं भीष्म न ते जिह्वा शतधेयं विदीर्यते ॥
avaliptasya mūrkhasya keśavaṃ stotumicchataḥ | kathaṃ bhīṣma na te jihvā śatadheyaṃ vidīryate
घमंडी मूर्ख! केशव की स्तुति करना चाहते हुए, भीष्म, तुम्हारी यह जीभ सौ टुकड़े होकर फट क्यों नहीं जाती?
श्लोक 6 (2.64.6)
यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म बालतरैर्नरैः । तमिमं ज्ञानवृद्धः सन्गोपं संस्तोतुमिच्छसि ॥
yatra kutsā prayoktavyā bhīṣma bālatarairnaraiḥ | tamimaṃ jñānavṛddhaḥ sangopaṃ saṃstotumicchasi
जिसकी निन्दा तो बालक भी करें, उसी ग्वाले की तुम ज्ञानवृद्ध होकर स्तुति करना चाहते हो!
श्लोक 7 (2.64.7)
यद्यनेन हता बाल्ये शकुनिश्चित्रमत्र किम् । तौ वाऽश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ ॥
yadyanena hatā bālye śakuniścitramatra kim | tau vā'śvavṛṣabhau bhīṣma yau na yuddhaviśāradau
यदि बचपन में इसने एक पक्षी (शकुनि) को मार डाला तो इसमें आश्चर्य क्या? अथवा उस घोड़े और बैल को, भीष्म, जो युद्ध में कुशल ही न थे?
श्लोक 8 (2.64.8)
चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम् । पादेन शकटं भीष्म तत्र किं कृतमद्भुतम् ॥
cetanārahitaṃ kāṣṭhaṃ yadyanena nipātitam | pādena śakaṭaṃ bhīṣma tatra kiṃ kṛtamadbhutam
यदि इसने पैर से एक छकड़े को — निर्जीव लकड़ी को — उलट दिया, तो भीष्म, उसमें कौन-सा अद्भुत काम किया?
श्लोक 9 (2.64.9)
अर्कप्रमाणौ तौ वृक्षौ यद्यनेन निपातितौ । नागश्च दमितोऽनेन तत्र को विस्मयः कृतः ॥
arkapramāṇau tau vṛkṣau yadyanena nipātitau | nāgaśca damito'nena tatra ko vismayaḥ kṛtaḥ
यदि इसने आक के पौधों जितने उन दो वृक्षों को गिरा दिया और एक नाग का दमन किया, तो उसमें विस्मय की क्या बात हुई?
श्लोक 10 (2.64.10)
वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः । तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम ॥
valmīkamātraḥ saptāhaṃ yadyanena dhṛto'calaḥ | tadā govardhano bhīṣma na taccitraṃ mataṃ mama
यदि इसने सात दिन तक दीमक की बाँबी जितने पर्वत गोवर्धन को उठाए रखा, तो भीष्म, मेरी दृष्टि में वह कोई आश्चर्य नहीं।
श्लोक 11 (2.64.11)
भुक्तमेतेन बह्वन्नं क्रीडता नगमूर्धनि । इति ते भीष्म शृण्वानाः परे विस्मयमागताः ॥
bhuktametena bahvannaṃ krīḍatā nagamūrdhani | iti te bhīṣma śṛṇvānāḥ pare vismayamāgatāḥ
'पर्वत की चोटी पर खेलते हुए इसने ढेर-सा अन्न खा लिया' — भीष्म, तुमसे यह सुनकर दूसरे लोग विस्मित हो गए।
श्लोक 12 (2.64.12)
यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं बलीयसः । स चानेन हतः कंस इत्येतत्तु महाद्भुतम् ॥
yasya cānena dharmajña bhuktamannaṃ balīyasaḥ | sa cānena hataḥ kaṃsa ityetattu mahādbhutam
और हे धर्मज्ञ, जिस बलवान कंस का अन्न इसने खाया, उसी कंस को इसने मार डाला — यह तो सचमुच बड़ा अद्भुत काम है!
श्लोक 13 (2.64.13)
न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथयतां सताम् । यद्वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम ॥
na te śrutamidaṃ bhīṣma nūnaṃ kathayatāṃ satām | yadvakṣye tvāmadharmajñaṃ vākyaṃ kurukulādhama
भीष्म, निश्चय ही तुमने सज्जनों के मुख से वह बात नहीं सुनी जो मैं अब तुमसे कहूँगा — तुम जो धर्म नहीं जानते, हे कुरुकुल के अधम!
श्लोक 14 (2.64.14)
स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातयेद्ब्राह्मणेषु च । इति सन्तोऽनुशासन्ति सज्जना धर्मिणः सदा । भीष्म लोके हि तत्सर्वं वितथं त्वयि दृश्यते ॥
strīṣu goṣu na śastrāṇi pātayedbrāhmaṇeṣu ca | iti santo'nuśāsanti sajjanā dharmiṇaḥ sadā | bhīṣma loke hi tatsarvaṃ vitathaṃ tvayi dṛśyate
'स्त्रियों, गौओं और ब्राह्मणों पर शस्त्र नहीं चलाना चाहिए' — सज्जन और धर्मात्मा पुरुष सदा यही उपदेश देते हैं। किन्तु भीष्म, संसार देखता है कि तुममें यह सब झूठा पड़ जाता है।
श्लोक 15 (2.64.15)
ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूयांसं केशवं मम । अजानत इवाख्यासि संस्तुवन्कौरवाधम ॥
jñānavṛddhaṃ ca vṛddhaṃ ca bhūyāṃsaṃ keśavaṃ mama | ajānata ivākhyāsi saṃstuvankauravādhama
हे कौरवाधम, मानो तुम कुछ जानते ही न हो, इस प्रकार स्तुति करते हुए तुम केशव को ज्ञान में वृद्ध, आयु में वृद्ध और मुझसे बड़ा बताते हो।
श्लोक 16 (2.64.16)
गोघ्नः स्त्रीघ्नश्च सन्भीष्म त्वद्वाक्याद्यदि पूज्यते । एवम्भूतश्च यो भीष्म कथं संस्तवमर्हति ॥
goghnaḥ strīghnaśca sanbhīṣma tvadvākyādyadi pūjyate | evambhūtaśca yo bhīṣma kathaṃ saṃstavamarhati
भीष्म, गोहत्या और स्त्रीहत्या करने वाला होकर भी यदि यह तुम्हारे कहने से पूजा जाता है, तो ऐसा व्यक्ति, भीष्म, स्तुति के योग्य कैसे हो सकता है?
श्लोक 17 (2.64.17)
असौ मतिमतां श्रेष्ठो य एष जगतः प्रभुः । सम्भावयति चाप्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दनः । एवमेतत्सर्वमिति तत्सर्वं वितथं ध्रुवम् ॥
asau matimatāṃ śreṣṭho ya eṣa jagataḥ prabhuḥ | sambhāvayati cāpyevaṃ tvadvākyācca janārdanaḥ | evametatsarvamiti tatsarvaṃ vitathaṃ dhruvam
'यह बुद्धिमानों में श्रेष्ठ है, यह जगत का स्वामी है' — तुम्हारे कहने से जनार्दन भी अपने को ऐसा ही मानने लगा है कि 'यह सब ठीक ऐसा ही है'। परन्तु यह सब निश्चय ही झूठ है।
श्लोक 18 (2.64.18)
आत्मानमात्मनाऽऽधातुं यदि शक्तो जनार्दनः । अकामयन्तं तं भीष्म कथं साध्विव पश्यसि ॥
ātmānamātmanā''dhātuṃ yadi śakto janārdanaḥ | akāmayantaṃ taṃ bhīṣma kathaṃ sādhviva paśyasi
यदि जनार्दन अपने ही बल से स्वयं को प्रतिष्ठित करने में समर्थ है, तो भीष्म, जब वह स्वयं यह चाहता ही नहीं, तब तुम उसे सज्जन-सा कैसे देखते हो?
श्लोक 19 (2.64.19)
न गाथा गाथिनं शास्ति बहुचेदपि गायति । प्रकृतिं यान्ति भूतानि कुलिङ्गशकुनिर्यथा ॥
na gāthā gāthinaṃ śāsti bahucedapi gāyati | prakṛtiṃ yānti bhūtāni kuliṅgaśakuniryathā
गाथा गाने वाले को शिक्षा नहीं देती, चाहे वह उसे कितना ही गाए। प्राणी अपने स्वभाव के अनुसार ही चलते हैं, जैसे कुलिंग पक्षी।
श्लोक 20 (2.64.20)
नूनं प्रकृतिरेषा ते जघन्या नात्र संशयः । नदीसुतत्वात्ते चित्तं चञ्चलं न स्थिरं स्मृतम् ॥
nūnaṃ prakṛtireṣā te jaghanyā nātra saṃśayaḥ | nadīsutatvātte cittaṃ cañcalaṃ na sthiraṃ smṛtam
निःसन्देह तुम्हारा यह स्वभाव अधम है। नदी का पुत्र होने के कारण तुम्हारा चित्त चंचल माना गया है, स्थिर नहीं।
श्लोक 21 (2.64.21)
अतः पापीयसी चैषां पाण्डवानामपीष्यते । येषामर्च्यतमः कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शकः ॥
ataḥ pāpīyasī caiṣāṃ pāṇḍavānāmapīṣyate | yeṣāmarcyatamaḥ kṛṣṇastvaṃ ca yeṣāṃ pradarśakaḥ
इसीलिए इन पाण्डवों का स्वभाव भी और अधिक पापपूर्ण माना जाता है, जिनके लिए कृष्ण सबसे अधिक पूजनीय है और तुम जिनके पथ-प्रदर्शक हो।
श्लोक 22 (2.64.22)
धर्मवांस्त्वमधर्मज्ञः सतां मार्गादवप्लुतः । को हि धर्मिणमात्मानं जानञ्ज्ञानविदां वरः ॥
dharmavāṃstvamadharmajñaḥ satāṃ mārgādavaplutaḥ | ko hi dharmiṇamātmānaṃ jānañjñānavidāṃ varaḥ
तुम धर्मवान बनते हो पर धर्म को जानते नहीं; तुम सज्जनों के मार्ग से गिर चुके हो। ज्ञानियों में श्रेष्ठ कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो स्वयं को धर्मात्मा जानते हुए
श्लोक 23 (2.64.23)
कुर्याद्यथा त्वया भीष्म कृतं धर्ममवेक्षता । चेत्त्वं धर्मं विजानासि यदि प्राज्ञा मतिस्तव ॥
kuryādyathā tvayā bhīṣma kṛtaṃ dharmamavekṣatā | cettvaṃ dharmaṃ vijānāsi yadi prājñā matistava
वैसा करे जैसा, भीष्म, तुमने धर्म पर दृष्टि रखते हुए किया है — यदि सचमुच तुम धर्म को जानते हो और तुम्हारी बुद्धि विवेकशील है?
श्लोक 24 (2.64.24)
अन्यकामा हि धर्मज्ञा कन्यका प्राज्ञमानिना । अम्बा नामेति भद्रं ते कथं साऽपहृता त्वया ॥
anyakāmā hi dharmajñā kanyakā prājñamāninā | ambā nāmeti bhadraṃ te kathaṃ sā'pahṛtā tvayā
अम्बा नाम की वह कन्या धर्म जानती थी और दूसरे पुरुष को चाहती थी — तुम्हारा भला हो! — तो अपने को बुद्धिमान मानने वाले तुमने उसका अपहरण कैसे किया?
श्लोक 25 (2.64.25)
तां त्वयाऽपहृतां भीष्म कन्यां नैषितवान्नृपः । भ्राता विचित्रवीर्यस्ते सतां मार्गमनुस्मरन् ॥
tāṃ tvayā'pahṛtāṃ bhīṣma kanyāṃ naiṣitavānnṛpaḥ | bhrātā vicitravīryaste satāṃ mārgamanusmaran
भीष्म, तुम्हारे द्वारा हरी गई उस कन्या को तुम्हारे भाई राजा विचित्रवीर्य ने सज्जनों के मार्ग का स्मरण करते हुए स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 26 (2.64.26)
भार्ययोर्यस्य चान्येन मिषतः प्राज्ञमानिनः । तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि ॥
bhāryayoryasya cānyena miṣataḥ prājñamāninaḥ | tava jātānyapatyāni sajjanācarite pathi
और अपने को बुद्धिमान मानने वाले तुम्हारे देखते-देखते उसकी दोनों पत्नियों से किसी दूसरे के द्वारा संतानें उत्पन्न हुईं — उसी मार्ग पर जिस पर सज्जन चलते हैं!
श्लोक 27 (2.64.27)
को हि धर्मोऽस्ति ते भीष्म ब्रह्मचर्यमिदं वृथा । यद्धारयसि मोहाद्वा क्लीबत्वाद्वा न संशयः ॥
ko hi dharmo'sti te bhīṣma brahmacaryamidaṃ vṛthā | yaddhārayasi mohādvā klībatvādvā na saṃśayaḥ
भीष्म, तुममें कौन-सा धर्म है? तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य व्यर्थ है, जिसे तुम या तो मोह से या नपुंसकता से धारण किए हुए हो — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 28 (2.64.28)
न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचयं क्वचित् । न हि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममब्रवीः ॥
na tvahaṃ tava dharmajña paśyāmyupacayaṃ kvacit | na hi te sevitā vṛddhā ya evaṃ dharmamabravīḥ
हे धर्मज्ञ, मैं तुम्हारी कहीं कोई उन्नति नहीं देखता। तुमने वृद्धों की सेवा नहीं की, तभी तो तुम धर्म की ऐसी बातें करते हो।
श्लोक 29 (2.64.29)
इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः । सर्वमेतदपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
iṣṭaṃ dattamadhītaṃ ca yajñāśca bahudakṣiṇāḥ | sarvametadapatyasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm
यज्ञ, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणा वाले यज्ञ — ये सब मिलकर संतान के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।
श्लोक 30 (2.64.30)
व्रतोपवासैर्बहुभिः कृतं भवति भीष्म यत् । सर्वं तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चयात् ॥
vratopavāsairbahubhiḥ kṛtaṃ bhavati bhīṣma yat | sarvaṃ tadanapatyasya moghaṃ bhavati niścayāt
भीष्म, अनेक व्रतों और उपवासों से जो कुछ अर्जित होता है, वह सब निःसन्तान व्यक्ति के लिए निश्चय ही निष्फल हो जाता है।
श्लोक 31 (2.64.31)
सोऽनपत्यश्च वृद्धश्च मिथ्याधर्मानुशासनात् । हंसवत्त्वमपीदानीं ज्ञातिभ्यः प्राप्नुया वधम् ॥
so'napatyaśca vṛddhaśca mithyādharmānuśāsanāt | haṃsavattvamapīdānīṃ jñātibhyaḥ prāpnuyā vadham
तुम निःसन्तान हो, वृद्ध हो, और झूठे धर्म का उपदेश देते हो; इसलिए अब तुम भी उस हंस की भाँति अपने ही जाति-बन्धुओं के हाथों मारे जा सकते हो।
श्लोक 32 (2.64.32)
एवं हि कथयन्त्यन्ये नरा ज्ञानविदः पुरा । भीष्म यत्तदहं सम्यग्वक्ष्यामि तव शृण्वतः ॥
evaṃ hi kathayantyanye narā jñānavidaḥ purā | bhīṣma yattadahaṃ samyagvakṣyāmi tava śṛṇvataḥ
पूर्वकाल में दूसरे ज्ञानी पुरुषों ने यह कथा इसी प्रकार कही है। भीष्म, सुनो, मैं उसे तुम्हें भली-भाँति सुनाता हूँ।
श्लोक 33 (2.64.33)
वृद्धः किल समुद्रान्ते कश्चिद्धंसोऽभवत्पुरा । धर्मवागन्यथावृत्तः पक्षिणः सोऽनुशास्ति च ॥
vṛddhaḥ kila samudrānte kaściddhaṃso'bhavatpurā | dharmavāganyathāvṛttaḥ pakṣiṇaḥ so'nuśāsti ca
कहते हैं, पहले समुद्र-तट पर एक बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्म की बातें करता था पर उसका आचरण उसके विपरीत था; और वह पक्षियों को उपदेश दिया करता था।
श्लोक 34 (2.64.34)
धर्मं चरत माऽधर्ममिति तस्य वचः किल । पक्षिणः शुश्रुवुर्भीष्म सततं धर्मवादिनः ॥
dharmaṃ carata mā'dharmamiti tasya vacaḥ kila | pakṣiṇaḥ śuśruvurbhīṣma satataṃ dharmavādinaḥ
'धर्म का आचरण करो, अधर्म का नहीं' — कहते हैं, यही उसका वचन था। भीष्म, पक्षी उस धर्मवादी की बातें निरन्तर सुनते रहते थे।
श्लोक 35 (2.64.35)
हंसस्य तु वचः श्रुत्वा मुदिताः सर्वपक्षिणः । ऊचुश्चैव खगा हंसं परिवार्य च सर्वशः ॥
haṃsasya tu vacaḥ śrutvā muditāḥ sarvapakṣiṇaḥ | ūcuścaiva khagā haṃsaṃ parivārya ca sarvaśaḥ
हंस की बात सुनकर सब पक्षी प्रसन्न हुए, और चारों ओर से उसे घेरकर वे पक्षी उससे बोले—
पक्षिण ऊचुः
श्लोक 36 (2.64.36)
कथयस्व भवान्सर्वं पक्षिणां तु समासतः । को हि नाम द्विजश्रेष्ठ ब्रूहि नो धर्म उत्तमः ॥
kathayasva bhavānsarvaṃ pakṣiṇāṃ tu samāsataḥ | ko hi nāma dvijaśreṣṭha brūhi no dharma uttamaḥ
'आप हम पक्षियों को संक्षेप में सब कुछ बताइए। हे पक्षिश्रेष्ठ, उत्तम धर्म कौन-सा है? हमें बताइए।'
हंस उवाच
श्लोक 37 (2.64.37)
प्रजास्वहिंसा धर्मो वै हिंसाऽधर्मः खगव्रजाः । एतदेवानुबोद्धव्यं धर्माधर्मः समासतः ॥
prajāsvahiṃsā dharmo vai hiṃsā'dharmaḥ khagavrajāḥ | etadevānuboddhavyaṃ dharmādharmaḥ samāsataḥ
'हे पक्षीगण, प्राणियों की हिंसा न करना ही धर्म है और हिंसा अधर्म है। संक्षेप में धर्म और अधर्म के विषय में यही समझना चाहिए।'
शिशुपाल उवाच
श्लोक 38 (2.64.38)
वृद्धहंसवचः श्रुत्वा पक्षिणस्ते सुसंहिताः । ऊचुश्च धर्मलुब्धास्ते स्मयमाना इवाण्डजाः ॥
vṛddhahaṃsavacaḥ śrutvā pakṣiṇaste susaṃhitāḥ | ūcuśca dharmalubdhāste smayamānā ivāṇḍajāḥ
बूढ़े हंस की बात सुनकर वे पक्षी, एकमत होकर और धर्म के लिए उत्सुक होकर, मानो मुस्कराते हुए बोले—
पक्षिण ऊचुः
श्लोक 39 (2.64.39)
धर्मं यः कुरुते नित्यं लोके धीरतरोऽण्डजः । स यत्र गच्छेद्धर्मात्मा तन्मे ब्रूहीह तत्त्वतः ॥
dharmaṃ yaḥ kurute nityaṃ loke dhīrataro'ṇḍajaḥ | sa yatra gaccheddharmātmā tanme brūhīha tattvataḥ
'संसार में जो धैर्यवान पक्षी सदा धर्म का आचरण करता है, वह धर्मात्मा कहाँ जाता है? यह मुझे यहीं ठीक-ठीक बताइए।'
हंस उवाच
श्लोक 40 (2.64.40)
बाला यूयं न जानीध्वं धर्मसूक्ष्मं विहङ्गमाः । धर्मं यः कुरुते लोके सततं शुभबुद्धिना । न चायुषोऽन्ते स्वं देहं त्यक्त्वा स्वर्गं स गच्छति ॥
bālā yūyaṃ na jānīdhvaṃ dharmasūkṣmaṃ vihaṅgamāḥ | dharmaṃ yaḥ kurute loke satataṃ śubhabuddhinā | na cāyuṣo'nte svaṃ dehaṃ tyaktvā svargaṃ sa gacchati
'हे पक्षियो, तुम बालक हो; धर्म की सूक्ष्मता नहीं जानते। जो संसार में सदा शुभ बुद्धि से धर्म का आचरण करता है, क्या वह आयु के अन्त में अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग नहीं जाता?'
श्लोक 41 (2.64.41)
तथाऽहमपि च त्यक्त्वा काले देहमिमं द्विजाः । स्वर्गलोकं गमिष्यामि इयं धर्मस्य वै गतिः ॥
tathā'hamapi ca tyaktvā kāle dehamimaṃ dvijāḥ | svargalokaṃ gamiṣyāmi iyaṃ dharmasya vai gatiḥ
'उसी प्रकार हे पक्षियो, मैं भी समय आने पर इस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक जाऊँगा। धर्म की यही गति है।'
शिशुपाल उवाच
श्लोक 42 (2.64.42)
एवं धर्मकथां चक्रे स हंसः पक्षिणां भृशम् । पक्षिणः शुश्रुवुर्भीष्म सततं धर्ममेव ते ॥
evaṃ dharmakathāṃ cakre sa haṃsaḥ pakṣiṇāṃ bhṛśam | pakṣiṇaḥ śuśruvurbhīṣma satataṃ dharmameva te
इस प्रकार वह हंस पक्षियों से बार-बार धर्म-कथा करता रहा, और भीष्म, वे पक्षी निरन्तर धर्म ही सुनते रहे।
श्लोक 43 (2.64.43)
अथास्य भक्ष्यमाजह्रुः समुद्रजलचारिणः । अण्डजा भीष्म तस्यान्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम ॥
athāsya bhakṣyamājahruḥ samudrajalacāriṇaḥ | aṇḍajā bhīṣma tasyānye dharmārthamiti śuśruma
तब समुद्र के जल में विचरने वाले दूसरे पक्षी, भीष्म, धर्म के निमित्त उसके लिए भोजन लाने लगे — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 44 (2.64.44)
ते च तस्य समभ्याशे निक्षिप्याण्डानि सर्वशः । समुद्राम्भस्यमोदन्त चरन्तो भीष्म पक्षिणः ॥
te ca tasya samabhyāśe nikṣipyāṇḍāni sarvaśaḥ | samudrāmbhasyamodanta caranto bhīṣma pakṣiṇaḥ
और भीष्म, वे पक्षी अपने सब अण्डे उसके पास रखकर समुद्र के जल में विचरते हुए आनन्द करते थे।
श्लोक 45 (2.64.45)
तेषामण्डानि सर्वेषां भक्षयामास पापकृत् । स हंसः सम्प्रमत्तानामप्रमत्तः स्वकर्मणि ॥
teṣāmaṇḍāni sarveṣāṃ bhakṣayāmāsa pāpakṛt | sa haṃsaḥ sampramattānāmapramattaḥ svakarmaṇi
वह पापी हंस उन सबके अण्डे खा जाता था — वे असावधान रहते थे, और वह अपने काम में पूरी सावधानी रखता था।
श्लोक 46 (2.64.46)
ततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेष्वण्डजोऽपरः । अशङ्कत महाप्राज्ञः स कदाचिद्ददर्श ह ॥
tataḥ prakṣīyamāṇeṣu teṣu teṣvaṇḍajo'paraḥ | aśaṅkata mahāprājñaḥ sa kadāciddadarśa ha
तब जब उनके अण्डे घटने लगे, तो एक दूसरे बड़े बुद्धिमान पक्षी को सन्देह हुआ, और एक दिन उसने उसे (अण्डे खाते) देख लिया।
श्लोक 47 (2.64.47)
ततः सङ्कथयामास दृष्ट्वा हंसस्य किल्बिषम् । तेषां परमदुःखार्तः स पक्षी सर्वपक्षिणाम् ॥
tataḥ saṅkathayāmāsa dṛṣṭvā haṃsasya kilbiṣam | teṣāṃ paramaduḥkhārtaḥ sa pakṣī sarvapakṣiṇām
हंस का वह पाप देखकर अत्यन्त दुःखी उस पक्षी ने सब पक्षियों को यह बात बता दी।
श्लोक 48 (2.64.48)
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा पक्षिणस्ते समीपगाः । निजघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह ॥
tataḥ pratyakṣato dṛṣṭvā pakṣiṇaste samīpagāḥ | nijaghnustaṃ tadā haṃsaṃ mithyāvṛttaṃ kurūdvaha
तब पास आकर अपनी आँखों से देखकर उन पक्षियों ने, हे कुरुश्रेष्ठ, उस मिथ्याचारी हंस को मार डाला।
श्लोक 49 (2.64.49)
एवं त्वां हंसधर्माणमपीमे वसुधाधिपाः । निहन्युर्भीष्म सङ्क्रुद्धाः पक्षिणस्तं यथाण्डजम् ॥
evaṃ tvāṃ haṃsadharmāṇamapīme vasudhādhipāḥ | nihanyurbhīṣma saṅkruddhāḥ pakṣiṇastaṃ yathāṇḍajam
उसी प्रकार भीष्म, ये राजा भी क्रुद्ध होकर तुम्हें — जो उस हंस के समान आचरण वाले हो — मार डालें, जैसे पक्षियों ने उस पक्षी को मार डाला।
श्लोक 50 (2.64.50)
गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक्कथयिष्यामि भारत ॥
gāthāmapyatra gāyanti ye purāṇavido janāḥ | bhīṣma yāṃ tāṃ ca te samyakkathayiṣyāmi bhārata
पुराणों के जानकार लोग इस विषय में एक गाथा भी गाते हैं; हे भारत भीष्म, वह भी मैं तुम्हें भली-भाँति सुनाऊँगा।
श्लोक 51 (2.64.51)
अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत्तव वाचमतीयते ॥
antarātmanyabhihate rauṣi patrarathāśuci | aṇḍabhakṣaṇakarmaitattava vācamatīyate
'हे अपवित्र पक्षी, तेरी अन्तरात्मा तो दूषित है, फिर भी तू (धर्म की) बोली बोलता है; पर अण्डे खाने का तेरा यह कर्म तेरी वाणी को झुठला देता है।'