सभा पर्व · अध्याय 65
भीम का क्रोध और भीष्म द्वारा उसका निवारण
शिशुपाल जरासन्ध की प्रशंसा करता है, जिसने कृष्ण को अपने योग्य न मानकर उनसे युद्ध नहीं किया था, और इस बात की निन्दा करता है कि कृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मणों का छद्म वेश धरकर द्वार छोड़ दूसरे मार्ग से उसके नगर में घुसे, उसका आतिथ्य ठुकराया और उसे मार डाला। वह भीष्म को स्त्री-स्वभाव वाला और बूढ़ा कहकर उनका उपहास करता है। भीम भयंकर क्रोध में उठ खड़े होते हैं, पर भीष्म उन्हें पकड़कर अनेक वचनों से शान्त करते हैं। निडर शिशुपाल हँसकर भीष्म से भीम को छोड़ देने को कहता है, और भीष्म भीम को बताते हैं कि चेदिराज का यह दुस्साहस कृष्ण का ही निश्चय है।
शिशुपाल उवाच
श्लोक 1 (2.65.1)
स मे बहुमतो राजा जरासन्धो महाबलः । योऽनेन युद्धं नेयेष दासोऽयमिति संयुगे ॥
sa me bahumato rājā jarāsandho mahābalaḥ | yo'nena yuddhaṃ neyeṣa dāso'yamiti saṃyuge
उस महाबली राजा जरासन्ध का मैं बहुत आदर करता हूँ, जिसने 'यह तो दास है' कहकर युद्ध में इससे लड़ना स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 2 (2.65.2)
केशवेन कृतं कर्म जरासन्धवधे तदा । भीमसेनार्जुनाभ्यां च कस्तत्साध्विति मन्यते ॥
keśavena kṛtaṃ karma jarāsandhavadhe tadā | bhīmasenārjunābhyāṃ ca kastatsādhviti manyate
जरासन्ध के वध में केशव ने भीमसेन और अर्जुन के साथ मिलकर जो काम किया, उसे कौन उचित मानेगा?
श्लोक 3 (2.65.3)
अद्वारेण प्रविष्टेन छद्मना ब्रह्मवादिना । दृष्टः प्रभावः कृष्णेन जरासन्धस्य भूपतेः ॥
advāreṇa praviṣṭena chadmanā brahmavādinā | dṛṣṭaḥ prabhāvaḥ kṛṣṇena jarāsandhasya bhūpateḥ
द्वार से नहीं, दूसरे रास्ते से, ब्राह्मण का छद्म वेश बनाकर घुसे कृष्ण ने राजा जरासन्ध का प्रभाव देखा।
श्लोक 4 (2.65.4)
येन धर्मात्मनाऽऽत्मानं ब्रह्मण्यमभिजानता । प्रेषितं पाद्यमस्मै तद्दातुमग्रे दुरात्मने ॥
yena dharmātmanā''tmānaṃ brahmaṇyamabhijānatā | preṣitaṃ pādyamasmai taddātumagre durātmane
उस धर्मात्मा राजा ने, जो अपने को ब्राह्मणों का भक्त जानता था, इस दुष्ट को सबसे पहले पैर धोने का जल देने के लिए भेजा।
श्लोक 5 (2.65.5)
भुज्यतामिति तेनोक्ताः कृष्णभीमधनञ्जयाः । जरासन्धेन कौरव्य कृष्णेन विकृतं कृतम् ॥
bhujyatāmiti tenoktāḥ kṛṣṇabhīmadhanañjayāḥ | jarāsandhena kauravya kṛṣṇena vikṛtaṃ kṛtam
हे कौरव्य, जरासन्ध ने कृष्ण, भीम और धनंजय से कहा, 'भोजन कीजिए', पर अनुचित काम तो कृष्ण ने ही किया।
श्लोक 6 (2.65.6)
यद्ययं जगतः कर्ता यथैनं मूर्ख मन्यसे । कस्मान्न ब्राह्मणं सम्यगात्मानमवगच्छति ॥
yadyayaṃ jagataḥ kartā yathainaṃ mūrkha manyase | kasmānna brāhmaṇaṃ samyagātmānamavagacchati
मूर्ख! यदि यह जगत का कर्ता है, जैसा तुम इसे मानते हो, तो यह अपने को ठीक-ठीक ब्राह्मण क्यों नहीं मानता?
श्लोक 7 (2.65.7)
इदं त्वाश्चर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वया । अपकृष्टाः सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साध्विति ॥
idaṃ tvāścaryabhūtaṃ me yadime pāṇḍavāstvayā | apakṛṣṭāḥ satāṃ mārgānmanyante tacca sādhviti
पर मुझे इसी बात का आश्चर्य है कि तुम्हारे द्वारा सज्जनों के मार्ग से भटकाए गए ये पाण्डव उसे ठीक समझते हैं।
श्लोक 8 (2.65.8)
अथवा नैतदाश्चर्यं येषां त्वमसि भारत । स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्च सर्वार्थानां प्रदर्शकः ॥
athavā naitadāścaryaṃ yeṣāṃ tvamasi bhārata | strīsadharmā ca vṛddhaśca sarvārthānāṃ pradarśakaḥ
अथवा हे भारत, इसमें आश्चर्य ही क्या, जब स्त्रियों जैसे स्वभाव वाले और बूढ़े तुम ही सब बातों में उनके मार्गदर्शक हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (2.65.9)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रूक्षं रूक्षाक्षरं बहु । चुकोप बलिनां श्रेष्ठो भीमसेनः प्रतापवान् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā rūkṣaṃ rūkṣākṣaraṃ bahu | cukopa balināṃ śreṣṭho bhīmasenaḥ pratāpavān
उसके वे बहुत-से कठोर, कर्कश अक्षरों वाले वचन सुनकर बलवानों में श्रेष्ठ, प्रतापी भीमसेन क्रोध से भर उठे।
श्लोक 10 (2.65.10)
तथा पद्मप्रतीकाशे स्वभावायतविस्तृते । भूयः क्रोधाभिताम्राक्षे रक्ते नेत्रे बभूवतुः ॥
tathā padmapratīkāśe svabhāvāyatavistṛte | bhūyaḥ krodhābhitāmrākṣe rakte netre babhūvatuḥ
तब उनकी कमल-सी, स्वभाव से ही लम्बी और बड़ी आँखें क्रोध से ताँबे जैसी होकर और भी लाल हो गईं।
श्लोक 11 (2.65.11)
त्रिशिखां भ्रकुटीं चास्य ददृशुः सर्वपार्थिवाः । ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥
triśikhāṃ bhrakuṭīṃ cāsya dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ | lalāṭasthāṃ trikūṭasthāṃ gaṅgāṃ tripathagāmiva
सब राजाओं ने उनके ललाट पर तीन रेखाओं वाली भृकुटि देखी, मानो त्रिकूट पर्वत पर स्थित त्रिपथगा गंगा हो।
श्लोक 12 (2.65.12)
दन्तान्सन्दशतस्तस्य कोपाद्ददृशुराननम् । युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव जिघत्सतः ॥
dantānsandaśatastasya kopāddadṛśurānanam | yugānte sarvabhūtāni kālasyeva jighatsataḥ
क्रोध से दाँत पीसते हुए उनका मुख उन्होंने ऐसा देखा, मानो युग के अन्त में सब प्राणियों को निगल जाने को आतुर काल का मुख हो।
श्लोक 13 (2.65.13)
उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् । भीष्म एव महाबाहुर्महासेनमिवेश्वरः ॥
utpatantaṃ tu vegena jagrāhainaṃ manasvinam | bhīṣma eva mahābāhurmahāsenamiveśvaraḥ
वेग से उछलते हुए उस मनस्वी भीम को महाबाहु भीष्म ने स्वयं पकड़ लिया, जैसे भगवान शंकर ने महासेन (कार्तिकेय) को थाम लिया हो।
श्लोक 14 (2.65.14)
तस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत । गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः ॥
tasya bhīmasya bhīṣmeṇa vāryamāṇasya bhārata | guruṇā vividhairvākyaiḥ krodhaḥ praśamamāgataḥ
हे भारत, गुरुजन भीष्म के अनेक प्रकार के वचनों से रोके जाने पर भीम का क्रोध शान्त हो गया।
श्लोक 15 (2.65.15)
नातिचक्राम भीष्मस्य स हि वाक्यमरिन्दमः । समुद्वृत्तो घनापाये वेलामिव महोदधिः ॥
nāticakrāma bhīṣmasya sa hi vākyamarindamaḥ | samudvṛtto ghanāpāye velāmiva mahodadhiḥ
शत्रुओं का दमन करने वाले भीम ने भीष्म की बात का उल्लंघन नहीं किया, जैसे वर्षा के अन्त में उमड़ा हुआ महासागर अपने तट को नहीं लाँघता।
श्लोक 16 (2.65.16)
शिशुपालस्तु सङ्क्रुद्धे भीमसेने जनाधिप । नाकम्पत तदा वीरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ॥
śiśupālastu saṅkruddhe bhīmasene janādhipa | nākampata tadā vīraḥ pauruṣe sve vyavasthitaḥ
किन्तु हे जनाधिप, भीमसेन के अत्यन्त क्रुद्ध होने पर भी वीर शिशुपाल तनिक नहीं काँपा; वह अपने पौरुष में स्थिर रहा।
श्लोक 17 (2.65.17)
उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिन्दमः । न स तं चिन्तयामास सिंहः क्रुद्धो मृगं यथा ॥
utpatantaṃ tu vegena punaḥ punararindamaḥ | na sa taṃ cintayāmāsa siṃhaḥ kruddho mṛgaṃ yathā
भीम बार-बार वेग से उछल रहे थे, फिर भी शत्रुदमन शिशुपाल ने उनकी कोई परवाह नहीं की, जैसे क्रुद्ध सिंह हिरन की परवाह नहीं करता।
श्लोक 18 (2.65.18)
प्रहसंश्चाब्रवीद्वाक्यं चेदिराजः प्रतापवान् । भीमसेनमभिक्रुद्धं दृष्ट्वा भीमपराक्रमम् ॥
prahasaṃścābravīdvākyaṃ cedirājaḥ pratāpavān | bhīmasenamabhikruddhaṃ dṛṣṭvā bhīmaparākramam
और भयंकर पराक्रमी भीमसेन को क्रोध में भरा देखकर प्रतापी चेदिराज हँसते हुए बोला—
शिशुपाल उवाच
श्लोक 19 (2.65.19)
मुञ्चैनं भीष्म पश्यन्तु यावदेनं नराधिपाः । मत्प्रभावविनिर्दग्धं पतङ्गमिव वह्निना ॥
muñcainaṃ bhīṣma paśyantu yāvadenaṃ narādhipāḥ | matprabhāvavinirdagdhaṃ pataṅgamiva vahninā
'भीष्म, इसे छोड़ दो! राजा लोग देखें कि मेरे प्रताप में यह कैसे जल जाता है, जैसे आग में पतंगा।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (2.65.20)
ततश्चेदिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा तत्कुरुसत्तमः । भीमसेनमुवाचेदं भीष्मो मतिमतां वरः ॥
tataścedipatervākyaṃ śrutvā tatkurusattamaḥ | bhīmasenamuvācedaṃ bhīṣmo matimatāṃ varaḥ
तब चेदिराज के वे वचन सुनकर कुरुश्रेष्ठ, बुद्धिमानों में अग्रणी भीष्म ने भीमसेन से यह कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 21 (2.65.21)
नैषा चेदिपतेर्बुद्धिर्यत्त्वामाह्वयतेऽच्युतम् । भीमसेन महाबाहो कृष्णस्यैव विनिश्चयः ॥
naiṣā cedipaterbuddhiryattvāmāhvayate'cyutam | bhīmasena mahābāho kṛṣṇasyaiva viniścayaḥ
'हे महाबाहु भीमसेन, यह चेदिराज की अपनी बुद्धि नहीं है कि वह तुम जैसे अडिग वीर को ललकार रहा है; यह तो कृष्ण का ही निश्चय है।'