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सभा पर्व · अध्याय 66

शिशुपाल का जन्म और कृष्ण का वचन

भीम को रोकने के लिए भीष्म शिशुपाल के जन्म की कथा सुनाते हैं। वह चेदि के राजकुल में तीन नेत्रों और चार भुजाओं के साथ गधे की तरह रेंकता हुआ जन्मा था, और उसके माता-पिता उसे त्यागने वाले थे; तभी एक अशरीरी वाणी ने उसे पालने को कहा — उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है, और वह तब पहचाना जाएगा जब उसकी गोद में बालक की अधिक भुजाएँ गिर जाएँगी और तीसरा नेत्र धँस जाएगा। हजारों राजाओं ने बालक को गोद में लिया पर कुछ न हुआ; किन्तु जब बलराम और कृष्ण चेदि में अपनी बुआ से मिलने आए, तो कृष्ण की गोद में वे लक्षण प्रकट हो गए। भयभीत माता ने कृष्ण से वचन लिया कि वे उसके पुत्र के सौ अपराध क्षमा करेंगे, और भीष्म अन्त में कहते हैं कि इसी वरदान के बल पर शिशुपाल इतना दुस्साहसी हो रहा है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.66.1)

चेदिराजकुले जातस्त्र्यक्ष एष चतुर्भुजः । रासभारावसदृशं ररास च ननाद च ॥

cedirājakule jātastryakṣa eṣa caturbhujaḥ | rāsabhārāvasadṛśaṃ rarāsa ca nanāda ca

चेदिराज के कुल में जन्मा यह (शिशुपाल) तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाला था, और वह गधे के रेंकने जैसा शब्द करता और गरजता था।

श्लोक 2 (2.66.2)

तेनास्य मातापितरौ त्रेसतुस्तौ सबान्धवौ । वैकृतं तस्य तौ दृष्ट्वा त्यागायाकुरुतां मतिम् ॥

tenāsya mātāpitarau tresatustau sabāndhavau | vaikṛtaṃ tasya tau dṛṣṭvā tyāgāyākurutāṃ matim

इससे उसके माता-पिता और उनके बन्धु-बान्धव भयभीत हो गए; और उसकी विकृत आकृति देखकर उन दोनों ने उसे त्याग देने का विचार किया।

श्लोक 3 (2.66.3)

ततः सभार्यं नृपतिं सामात्यं सपुरोहितम् । चिन्तासंमूढहृदयं वागुवाचाशरीरिणी ॥

tataḥ sabhāryaṃ nṛpatiṃ sāmātyaṃ sapurohitam | cintāsaṃmūḍhahṛdayaṃ vāguvācāśarīriṇī

तब पत्नी, मन्त्रियों और पुरोहित के साथ बैठे, चिन्ता से व्याकुल हृदय वाले राजा से एक अशरीरी वाणी ने कहा—

अशरीरिणी वागुवाच

श्लोक 4 (2.66.4)

एष ते नृपते पुत्रः श्रीमाञ्जातो बलाधिकः । तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्रः पाहि वै शिशुम् ॥

eṣa te nṛpate putraḥ śrīmāñjāto balādhikaḥ | tasmādasmānna bhetavyamavyagraḥ pāhi vai śiśum

'राजन्, तुम्हारा यह पुत्र श्रीमान और अत्यन्त बलवान होकर जन्मा है। इसलिए इससे डरो मत; शान्त मन से इस बालक का पालन करो।'

श्लोक 5 (2.66.5)

न च वै तस्य मृत्युस्त्वं न कालः प्रत्युपस्थितः । यश्च शस्त्रेण हन्ताऽस्य स चोत्पन्नो नराधिप ॥

na ca vai tasya mṛtyustvaṃ na kālaḥ pratyupasthitaḥ | yaśca śastreṇa hantā'sya sa cotpanno narādhipa

'तुम इसकी मृत्यु का कारण नहीं बनोगे, और न अभी इसका काल ही आया है। हे नराधिप, जो शस्त्र से इसका वध करेगा, वह जन्म ले चुका है।'

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (2.66.6)

संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततः । पुत्रस्नेहाभिसन्तप्ता जननी वाक्यमब्रवीत् ॥

saṃśrutyodāhṛtaṃ vākyaṃ bhūtamantarhitaṃ tataḥ | putrasnehābhisantaptā jananī vākyamabravīt

वह वचन सुनाई देने के बाद बोलने वाला वह प्राणी अदृश्य हो गया। तब पुत्र-स्नेह से संतप्त माता बोली—

जनन्युवाच

श्लोक 7 (2.66.7)

येनेदमीरितं वाक्यं ममैतं तनयं प्रति । प्राञ्जलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वचः ॥

yenedamīritaṃ vākyaṃ mamaitaṃ tanayaṃ prati | prāñjalistaṃ namasyāmi bravītu sa punarvacaḥ

'जिसने मेरे इस पुत्र के विषय में यह वचन कहा है, उसे मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। वह फिर से कुछ कहे।'

श्लोक 8 (2.66.8)

याथातथ्येन भगवान्देवो वा यदि वेतरः । श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य कोऽस्य मृत्युर्भविष्यति ॥

yāthātathyena bhagavāndevo vā yadi vetaraḥ | śrotumicchāmi putrasya ko'sya mṛtyurbhaviṣyati

'वह चाहे भगवान देवता हो या कोई और, मैं ठीक-ठीक सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्र की मृत्यु कौन होगा।'

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (2.66.9)

अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वचः । यस्योत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ ॥

antarbhūtaṃ tato bhūtamuvācedaṃ punarvacaḥ | yasyotsaṅge gṛhītasya bhujāvabhyadhikāvubhau

तब उस अदृश्य प्राणी ने फिर यह वचन कहा — 'जिसकी गोद में लिए जाने पर इसकी दोनों अधिक भुजाएँ

अशरीरिणी वागुवाच

श्लोक 10 (2.66.10)

पतिष्यतः क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ । तृतीयमेतद्बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम् ॥

patiṣyataḥ kṣititale pañcaśīrṣāvivoragau | tṛtīyametadbālasya lalāṭasthaṃ tu locanam

पाँच फन वाले साँपों की भाँति धरती पर गिर पड़ेंगी, और जिसे देखकर इस बालक के ललाट पर स्थित यह तीसरा नेत्र

भीष्म उवाच

श्लोक 11 (2.66.11)

निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युर्भविष्यति । त्र्यक्षं चतुर्भुजं श्रुत्वा तथा च समुदाहृतम् ॥

nimajjiṣyati yaṃ dṛṣṭvā so'sya mṛtyurbhaviṣyati | tryakṣaṃ caturbhujaṃ śrutvā tathā ca samudāhṛtam

धँस जाएगा, वही इसकी मृत्यु होगा।' तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाले बालक के विषय में और उस भविष्यवाणी के बारे में सुनकर

श्लोक 12 (2.66.12)

पृथिव्यां पार्थिवाः सर्वे अभ्यागच्छन्दिदृक्षवः । तान्पूजयित्वा सम्प्राप्तान्यथार्हं स महीपतिः ॥

pṛthivyāṃ pārthivāḥ sarve abhyāgacchandidṛkṣavaḥ | tānpūjayitvā samprāptānyathārhaṃ sa mahīpatiḥ

पृथ्वी के सब राजा उसे देखने की इच्छा से आए। राजा ने आए हुए उन सबका यथायोग्य सत्कार किया

श्लोक 13 (2.66.13)

एकैकस्य नृपस्याङ्के पुत्रमारोपयत्तदा । एवं राजसहस्राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम् ॥

ekaikasya nṛpasyāṅke putramāropayattadā | evaṃ rājasahasrāṇāṃ pṛthaktvena yathākramam

और फिर एक-एक राजा की गोद में अपने पुत्र को बिठाया। इस प्रकार हजारों राजाओं की गोद में क्रम से अलग-अलग

श्लोक 14 (2.66.14)

शिशुरङ्के समारूढो न तत्प्राप निदर्शनम् । एतदेव तु संश्रुत्य द्वारवत्यां महाबलौ ॥

śiśuraṅke samārūḍho na tatprāpa nidarśanam | etadeva tu saṃśrutya dvāravatyāṃ mahābalau

बालक को बिठाया गया, पर वह लक्षण प्रकट नहीं हुआ। यही बात द्वारका में सुनकर दोनों महाबली

श्लोक 15 (2.66.15)

ततश्चेदिपुरं प्राप्तौ सङ्कर्षणजनार्दनौ । यादवौ यादवीं द्रष्टुं स्वसारं तौ पितुस्तदा ॥

tataścedipuraṃ prāptau saṅkarṣaṇajanārdanau | yādavau yādavīṃ draṣṭuṃ svasāraṃ tau pitustadā

संकर्षण और जनार्दन — दोनों यादव — अपने पिता की बहन, उस यादव-कन्या से मिलने के लिए चेदिपुर पहुँचे।

श्लोक 16 (2.66.16)

अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्ठं नृपं च ताम् । कुशलानामयं पृष्ट्वा निषण्णौ रामकेशवौ ॥

abhivādya yathānyāyaṃ yathāśreṣṭhaṃ nṛpaṃ ca tām | kuśalānāmayaṃ pṛṣṭvā niṣaṇṇau rāmakeśavau

बलराम और केशव ने यथोचित रीति से, बड़प्पन के क्रम से, राजा और अपनी बुआ को प्रणाम किया, कुशल-मंगल पूछा और बैठ गए।

श्लोक 17 (2.66.17)

साऽभ्यर्च्य तौ तदा वीरौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः । पुत्रं दामोदरोत्सङ्गे देवी संन्यदधात्स्वयम् ॥

sā'bhyarcya tau tadā vīrau prītyā cābhyadhikaṃ tataḥ | putraṃ dāmodarotsaṅge devī saṃnyadadhātsvayam

उसने बड़े प्रेम से उन दोनों वीरों का विशेष सत्कार किया, और फिर रानी ने स्वयं अपने पुत्र को दामोदर की गोद में रख दिया।

श्लोक 18 (2.66.18)

न्यस्तमात्रस्य तस्याङ्के भुजावभ्यधिकावुभौ । पेततुस्तच्च नयनं न्यमज्जत ललाटजम् ॥

nyastamātrasya tasyāṅke bhujāvabhyadhikāvubhau | petatustacca nayanaṃ nyamajjata lalāṭajam

उनकी गोद में रखते ही उसकी दोनों अधिक भुजाएँ गिर पड़ीं और ललाट पर उत्पन्न वह नेत्र भीतर धँस गया।

श्लोक 19 (2.66.19)

तद्दृष्ट्वा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत । ददस्व मे वरं कृष्ण भयार्ताया महाभुज ॥

taddṛṣṭvā vyathitā trastā varaṃ kṛṣṇamayācata | dadasva me varaṃ kṛṣṇa bhayārtāyā mahābhuja

यह देखकर वह व्यथित और भयभीत हो गई और उसने कृष्ण से वर माँगा — 'हे महाबाहु कृष्ण, मैं भय से पीड़ित हूँ, मुझे वर दो।

श्लोक 20 (2.66.20)

त्वं ह्यार्तानां समाश्वासो भीतानामभयप्रदः । एवमुक्तस्ततः कृष्णः सोऽब्रवीद्यदुनन्दनः ॥

tvaṃ hyārtānāṃ samāśvāso bhītānāmabhayapradaḥ | evamuktastataḥ kṛṣṇaḥ so'bravīdyadunandanaḥ

क्योंकि तुम दुखियों का सहारा और भयभीतों को अभय देने वाले हो।' ऐसा कहे जाने पर यदुनन्दन कृष्ण बोले—

कृष्ण उवाच

श्लोक 21 (2.66.21)

मा भैस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोऽस्ति भयं तव । ददामि कं वरं किं च करवाणि पितृष्वसः ॥

mā bhaistvaṃ devi dharmajñe na matto'sti bhayaṃ tava | dadāmi kaṃ varaṃ kiṃ ca karavāṇi pitṛṣvasaḥ

'हे धर्म को जानने वाली देवी, डरो मत; मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं है। हे बुआ, मैं तुम्हें कौन-सा वर दूँ, या तुम्हारे लिए क्या करूँ?

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (2.66.22)

शक्यं वा यदि वाऽशक्यं करिष्यामि वचस्तव । एवमुक्ता ततः कृष्णमब्रवीद्यदुनन्दनम् ॥

śakyaṃ vā yadi vā'śakyaṃ kariṣyāmi vacastava | evamuktā tataḥ kṛṣṇamabravīdyadunandanam

सम्भव हो या असम्भव, मैं तुम्हारा कहा करूँगा।' ऐसा कहे जाने पर उसने यदुनन्दन कृष्ण से कहा—

जनन्युवाच

श्लोक 23 (2.66.23)

शिशुपालस्यापराधान्क्षमेथास्त्वं महाबल । मत्कृते यदुशार्दूल विद्ध्येनं मे वरं प्रभो ॥

śiśupālasyāparādhānkṣamethāstvaṃ mahābala | matkṛte yaduśārdūla viddhyenaṃ me varaṃ prabho

'हे महाबली यदुश्रेष्ठ, मेरे लिए तुम शिशुपाल के अपराधों को क्षमा कर देना। हे प्रभु, इसी को मेरा वर समझो।'

कृष्ण उवाच

श्लोक 24 (2.66.24)

अपराधशतं क्षाम्यं मया ह्यस्य पितृष्वसः । पुत्रस्य ते वधार्हस्य मा त्वं शोके मनः कृथाः ॥

aparādhaśataṃ kṣāmyaṃ mayā hyasya pitṛṣvasaḥ | putrasya te vadhārhasya mā tvaṃ śoke manaḥ kṛthāḥ

'हे बुआ, तुम्हारे इस पुत्र के सौ अपराध, वध के योग्य होने पर भी, मैं क्षमा करूँगा। तुम मन को शोक में मत डालो।'

भीष्म उवाच

श्लोक 25 (2.66.25)

स जानन्नात्मनो मृत्युं कृष्णं यदुसुखावहम् । एवमेष नृपः पापः शिशुपालः सुमन्दधीः । त्वां समाह्वयते वीर गोविन्दवरदर्पितः ॥

sa jānannātmano mṛtyuṃ kṛṣṇaṃ yadusukhāvaham | evameṣa nṛpaḥ pāpaḥ śiśupālaḥ sumandadhīḥ | tvāṃ samāhvayate vīra govindavaradarpitaḥ

यह जानते हुए भी कि यदुओं को सुख देने वाले कृष्ण ही उसकी मृत्यु हैं, यह पापी, मन्दबुद्धि राजा शिशुपाल गोविन्द के वरदान से घमंड में भरकर, हे वीर, तुम्हें ललकार रहा है।

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