सभा पर्व · अध्याय 67
शिशुपाल द्वारा राजाओं की प्रशंसा और भीष्म की ललकार
भीष्म भीम से कहते हैं कि शिशुपाल का यह दुस्साहस कृष्ण का ही निश्चय है, क्योंकि चेदिराज में स्थित अपने तेज के अंश को हरि वापस ले लेना चाहते हैं। शिशुपाल पलटकर उन राजाओं के नाम गिनाता है जिनकी भीष्म को स्तुति करनी चाहिए — बाह्लीक, कर्ण, द्रोण और अश्वत्थामा, दुर्योधन, जयद्रथ, द्रुम, कृप, रुक्मी, भगदत्त, विराट, द्रुपद, शल्य और बहुत-से अन्य। वह भीष्म की तुलना उस कुलिंग चिड़िया से करता है जो 'दुस्साहस मत करो' कहती हुई सिंह के दाँतों से मांस निकालती है और सिंह की इच्छा से ही जीवित रहती है। भीष्म राजाओं को तिनके के बराबर भी नहीं गिनते; कुछ राजा उन्हें मार डालने या जला देने की बात करते हैं, और भीष्म उत्तर देते हैं कि जिसे मरने की जल्दी हो, वह कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारे।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.67.1)
नैषा चेदिपतेर्बुद्धिर्यया त्वाह्वयतेऽच्युतम् । नूनमेव जगद्भर्तुः कृष्णस्यैव विनिश्चयः ॥
naiṣā cedipaterbuddhiryayā tvāhvayate'cyutam | nūnameva jagadbhartuḥ kṛṣṇasyaiva viniścayaḥ
चेदिराज अपनी बुद्धि से अच्युत को नहीं ललकार रहा है; निश्चय ही यह जगत के स्वामी कृष्ण का ही निश्चय है।
श्लोक 2 (2.67.2)
को हि मां भीमसेनाद्य क्षितावर्हति पार्थिवः । क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथैष कुलपांसनः ॥
ko hi māṃ bhīmasenādya kṣitāvarhati pārthivaḥ | kṣeptuṃ kālaparītātmā yathaiṣa kulapāṃsanaḥ
भीमसेन, पृथ्वी पर कौन-सा राजा आज मुझ पर ऐसे आक्षेप करने का साहस कर सकता है, जैसे यह कुलकलंक कर रहा है — जब तक उसका मन काल के वश में न हो?
श्लोक 3 (2.67.3)
एष ह्यस्य महाबाहुस्तेजोंशश्च हरेर्ध्रुवम् । तमेव पुनरादातुं कुरुतेऽत्र मतिं हरिः ॥
eṣa hyasya mahābāhustejoṃśaśca harerdhruvam | tameva punarādātuṃ kurute'tra matiṃ hariḥ
क्योंकि यह महाबाहु निश्चय ही हरि के तेज का एक अंश है, और हरि ने अब उसी अंश को फिर से अपने में ले लेने का निश्चय किया है।
श्लोक 4 (2.67.4)
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् । गर्जत्यतीव दुर्बुद्धिः सर्वानस्मानचिन्तयन् ॥
yenaiṣa kuruśārdūla śārdūla iva cedirāṭ | garjatyatīva durbuddhiḥ sarvānasmānacintayan
इसी कारण, हे कुरुश्रेष्ठ, यह दुर्बुद्धि चेदिराज हम सबकी कुछ भी परवाह न करते हुए बाघ की तरह इतना गरज रहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (2.67.5)
ततो न ममृषे चैद्यस्तद्भीष्मवचनं तदा । उवाच चैनं सङ्क्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम् ॥
tato na mamṛṣe caidyastadbhīṣmavacanaṃ tadā | uvāca cainaṃ saṅkruddhaḥ punarbhīṣmamathottaram
तब चेदिराज भीष्म के उस वचन को सहन न कर सका और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने फिर भीष्म को उत्तर दिया—
शिशुपाल उवाच
श्लोक 6 (2.67.6)
द्विषतां नोऽस्तु भीष्मैष प्रभावः केशवस्य यः । यस्य संस्तववक्ता त्वं बन्दिवत्सततोत्थितः ॥
dviṣatāṃ no'stu bhīṣmaiṣa prabhāvaḥ keśavasya yaḥ | yasya saṃstavavaktā tvaṃ bandivatsatatotthitaḥ
भीष्म, केशव का यह प्रभाव हमारे शत्रुओं को ही मिले, जिसकी स्तुति करने के लिए तुम भाट की तरह सदा खड़े रहते हो!
श्लोक 7 (2.67.7)
संस्तवे च मनो भीष्म परेषां रमते यदि । तदा संस्तुहि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम् ॥
saṃstave ca mano bhīṣma pareṣāṃ ramate yadi | tadā saṃstuhi rājñastvamimaṃ hitvā janārdanam
और भीष्म, यदि तुम्हारा मन दूसरों की स्तुति में ही रमता है, तो इस जनार्दन को छोड़कर इन राजाओं की स्तुति करो।
श्लोक 8 (2.67.8)
दरदं स्तुहि बाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् । जायमानेन येनेयमभवद्दारिता मही ॥
daradaṃ stuhi bāhlīkamimaṃ pārthivasattamam | jāyamānena yeneyamabhavaddāritā mahī
इस दरद, बाह्लीक राजा की स्तुति करो, जो राजाओं में श्रेष्ठ है और जिसके जन्म लेते ही यह पृथ्वी फट गई थी।
श्लोक 9 (2.67.9)
वङ्गाङ्गविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं बले । स्तुहि कर्णमिमं भीष्म महाचापविकर्षणम् ॥
vaṅgāṅgaviṣayādhyakṣaṃ sahasrākṣasamaṃ bale | stuhi karṇamimaṃ bhīṣma mahācāpavikarṣaṇam
भीष्म, वंग और अंग देशों के स्वामी, बल में सहस्राक्ष इन्द्र के समान, विशाल धनुष खींचने वाले इस कर्ण की स्तुति करो,
श्लोक 10 (2.67.10)
यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते । कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम् ॥
yasyeme kuṇḍale divye sahaje devanirmite | kavacaṃ ca mahābāho bālārkasadṛśaprabham
जिसके ये दोनों दिव्य कुण्डल जन्म से ही साथ हैं और देवताओं के बनाए हुए हैं, और हे महाबाहु, जिसका कवच उगते सूर्य के समान चमकता है;
श्लोक 11 (2.67.11)
वासवप्रतिमो येन जरासन्धोऽतिदुर्जयः । विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भितः ॥
vāsavapratimo yena jarāsandho'tidurjayaḥ | vijito bāhuyuddhena dehabhedaṃ ca lambhitaḥ
जिसने इन्द्र के समान अत्यन्त दुर्जय जरासन्ध को बाहुयुद्ध में जीता और उसके शरीर को चीर डालने की स्थिति तक पहुँचा दिया।
श्लोक 12 (2.67.12)
द्रोणं द्रौणिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ । स्तुहि स्तुत्यावुभौ भीष्म सततं द्विजसत्तमौ ॥
droṇaṃ drauṇiṃ ca sādhu tvaṃ pitāputrau mahārathau | stuhi stutyāvubhau bhīṣma satataṃ dvijasattamau
भीष्म, पिता-पुत्र द्रोण और द्रौणि (अश्वत्थामा) की भली-भाँति स्तुति करो, जो दोनों महारथी हैं, स्तुति के योग्य हैं और सदा ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं,
श्लोक 13 (2.67.13)
ययोरन्यतरो भीष्म सङ्क्रुद्धः सचराचराम् । इमां वसुमतीं कुर्यान्निःशेषामिति मे मतिः ॥
yayoranyataro bhīṣma saṅkruddhaḥ sacarācarām | imāṃ vasumatīṃ kuryānniḥśeṣāmiti me matiḥ
जिनमें से कोई एक भी, भीष्म, क्रुद्ध हो जाए तो चराचर सहित इस पृथ्वी को निःशेष कर दे — ऐसा मेरा विश्वास है।
श्लोक 14 (2.67.14)
द्रोणस्य हि समं युद्धे न पश्यामि नराधिपम् । नाश्वत्थाम्नः समं भीष्म न च तौ स्तोतुमिच्छसि ॥
droṇasya hi samaṃ yuddhe na paśyāmi narādhipam | nāśvatthāmnaḥ samaṃ bhīṣma na ca tau stotumicchasi
भीष्म, युद्ध में मैं द्रोण के समान कोई राजा नहीं देखता, न अश्वत्थामा के समान; फिर भी तुम इन दोनों की स्तुति नहीं करना चाहते।
श्लोक 15 (2.67.15)
पृथिव्यां सागरान्तायां यो वैप्रतिसमो भवेत् । दुर्योधनं त्वं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम् ॥
pṛthivyāṃ sāgarāntāyāṃ yo vaipratisamo bhavet | duryodhanaṃ tvaṃ rājendramatikramya mahābhujam
सागर तक फैली इस पृथ्वी पर जिसकी बराबरी करने वाला कोई नहीं, उस महाबाहु राजराज दुर्योधन को लाँघकर,
श्लोक 16 (2.67.16)
जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् । द्रुमं किम्पुरुषाचार्यं लोके प्रथितविक्रमम् । अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥
jayadrathaṃ ca rājānaṃ kṛtāstraṃ dṛḍhavikramam | drumaṃ kimpuruṣācāryaṃ loke prathitavikramam | atikramya mahāvīryaṃ kiṃ praśaṃsasi keśavam
और अस्त्रविद्या में निपुण, दृढ़ पराक्रमी राजा जयद्रथ को, और लोक में प्रसिद्ध पराक्रम वाले किम्पुरुषों के आचार्य द्रुम को — इन महावीरों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो?
श्लोक 17 (2.67.17)
वृद्धं च भरताचार्यं तथा शारद्वतं कृपम् । अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥
vṛddhaṃ ca bharatācāryaṃ tathā śāradvataṃ kṛpam | atikramya mahāvīryaṃ kiṃ praśaṃsasi keśavam
भरतवंशियों के वृद्ध आचार्य को तथा शरद्वान के पुत्र कृप को — इन महापराक्रमियों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो?
श्लोक 18 (2.67.18)
धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् । अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥
dhanurdharāṇāṃ pravaraṃ rukmiṇaṃ puruṣottamam | atikramya mahāvīryaṃ kiṃ praśaṃsasi keśavam
धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, पुरुषोत्तम, महापराक्रमी रुक्मी को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो?
श्लोक 19 (2.67.19)
भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्त्रं च भूमिपम् । भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम् ॥
bhīṣmakaṃ ca mahāvīryaṃ dantavaktraṃ ca bhūmipam | bhagadattaṃ yūpaketuṃ jayatsenaṃ ca māgadham
महापराक्रमी भीष्मक और राजा दन्तवक्त्र, भगदत्त, यूपकेतु और मगध के जयत्सेन;
श्लोक 20 (2.67.20)
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बृहद्बलम् । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तमम् ॥
virāṭadrupadau cobhau śakuniṃ ca bṛhadbalam | vindānuvindāvāvantyau pāṇḍyaṃ śvetamathottamam
विराट और द्रुपद दोनों, शकुनि और बृहद्बल, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, पाण्ड्य राजा और श्रेष्ठ श्वेत;
श्लोक 21 (2.67.21)
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम् । एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम् ॥
śaṅkhaṃ ca sumahābhāgaṃ vṛṣasenaṃ ca māninam | ekalavyaṃ ca vikrāntaṃ kāliṅgaṃ ca mahāratham
परम भाग्यशाली शंख, स्वाभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य और कलिंग के महारथी राजा —
श्लोक 22 (2.67.22)
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् । शल्यादीनपि कस्मात्त्वं न स्तौषि वसुधाधिपान् । स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म वसुधाधिपान् ॥
atikramya mahāvīryaṃ kiṃ praśaṃsasi keśavam | śalyādīnapi kasmāttvaṃ na stauṣi vasudhādhipān | stavāya yadi te buddhirvartate bhīṣma vasudhādhipān
इन महावीरों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो? और भीष्म, यदि तुम्हारी बुद्धि राजाओं की स्तुति करने में ही लगी है, तो शल्य आदि राजाओं की स्तुति क्यों नहीं करते?
श्लोक 23 (2.67.23)
किं हि शक्यं मया कर्तुं यद्वृद्धानां त्वया नृप । पुरा कथयतां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ॥
kiṃ hi śakyaṃ mayā kartuṃ yadvṛddhānāṃ tvayā nṛpa | purā kathayatāṃ nūnaṃ na śrutaṃ dharmavādinām
पर राजन्, मैं क्या कर सकता हूँ, यदि तुमने पहले धर्म की बातें कहने वाले वृद्धों के मुख से यह नहीं सुना?
श्लोक 24 (2.67.24)
आत्मनिन्दात्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः । अनाचरितमार्याणामिति ते भीष्म न श्रुतम् ॥
ātmanindātmapūjā ca paranindā parastavaḥ | anācaritamāryāṇāmiti te bhīṣma na śrutam
अपनी निन्दा और अपनी प्रशंसा, दूसरों की निन्दा और दूसरों की स्तुति — श्रेष्ठ पुरुष ऐसा आचरण नहीं करते। भीष्म, यह तुमने नहीं सुना।
श्लोक 25 (2.67.25)
यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात्संस्तौषि भक्तितः । केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते ॥
yadastavyamimaṃ śaśvanmohātsaṃstauṣi bhaktitaḥ | keśavaṃ tacca te bhīṣma na kaścidanumanyate
भीष्म, तुम जो मोह और भक्ति के कारण इस स्तुति के अयोग्य केशव की निरन्तर स्तुति करते हो, उसे कोई भी उचित नहीं मानता।
श्लोक 26 (2.67.26)
कथं भोजस्य पुरुषे वत्सपाले दुरात्मनि । समावेशयसे सर्वं जगत्केवलकाम्यया ॥
kathaṃ bhojasya puruṣe vatsapāle durātmani | samāveśayase sarvaṃ jagatkevalakāmyayā
केवल अपनी इच्छा से तुम भोज (कंस) के सेवक, इस दुष्ट बछड़े चराने वाले में सारे जगत को कैसे स्थापित कर देते हो?
श्लोक 27 (2.67.27)
अथ चैषा न ते बुद्धिः प्रकृतिं याति भारत । मयैव कथितं पूर्वं कुलिङ्गशकुनिर्यथा ॥
atha caiṣā na te buddhiḥ prakṛtiṃ yāti bhārata | mayaiva kathitaṃ pūrvaṃ kuliṅgaśakuniryathā
अथवा हे भारत, तुम्हारी यह बुद्धि अपने स्वभाव के अनुसार ही चल रही है, ठीक उस कुलिंग पक्षी की भाँति जिसकी बात मैंने पहले कही थी।
श्लोक 28 (2.67.28)
कुलिङ्गशकुनिर्नाम पार्श्वे हिमवतः परे । भीष्म तस्याः सदा वाचः श्रूयन्तेऽर्थविगर्हिताः ॥
kuliṅgaśakunirnāma pārśve himavataḥ pare | bhīṣma tasyāḥ sadā vācaḥ śrūyante'rthavigarhitāḥ
भीष्म, हिमालय के उस पार कुलिंग नाम की एक चिड़िया रहती है; उसकी बोली सदा सुनाई देती है, पर उसका आचरण ही उसके शब्दों को झुठलाता है।
श्लोक 29 (2.67.29)
मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल । साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते ॥
mā sāhasamitīdaṃ sā satataṃ vāśate kila | sāhasaṃ cātmanātīva carantī nāvabudhyate
कहते हैं, वह सदा यही चिल्लाती रहती है — "दुस्साहस मत करो!" — और नहीं समझती कि वह स्वयं कितना बड़ा दुस्साहस कर रही है।
श्लोक 30 (2.67.30)
सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात्सिंहस्य खादतः । दन्तान्तरविलग्नं यत्तदादत्तेऽल्पचेतना ॥
sā hi māṃsārgalaṃ bhīṣma mukhātsiṃhasya khādataḥ | dantāntaravilagnaṃ yattadādatte'lpacetanā
भीष्म, वह मूर्ख चिड़िया खाते हुए सिंह के मुँह से उसके दाँतों के बीच फँसा मांस का टुकड़ा निकाल लेती है।
श्लोक 31 (2.67.31)
इच्छतः सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशयम् । तद्वत्त्वमप्यधर्मिष्ठ सदा वाचः प्रभाषसे ॥
icchataḥ sā hi siṃhasya bhīṣma jīvatyasaṃśayam | tadvattvamapyadharmiṣṭha sadā vācaḥ prabhāṣase
भीष्म, निःसन्देह वह सिंह की इच्छा से ही जीवित रहती है। उसी प्रकार हे परम अधर्मी, तुम भी सदा बकवास करते रहते हो।
श्लोक 32 (2.67.32)
इच्छतां भूमिपालानां भीष्म जीवस्यसंशयम् । लोकविद्विष्टकर्मा हि नान्योऽस्ति भवता समः ॥
icchatāṃ bhūmipālānāṃ bhīṣma jīvasyasaṃśayam | lokavidviṣṭakarmā hi nānyo'sti bhavatā samaḥ
भीष्म, निःसन्देह तुम भी इन राजाओं की इच्छा से ही जीवित हो; क्योंकि संसार में तुम्हारे समान लोकनिन्दित कर्म करने वाला दूसरा कोई नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (2.67.33)
ततश्चेदिपतेः श्रुत्वा भीष्मः स कटुकं वचः । उवाचेदं वचो राजंश्चेदिराजस्य शृण्वतः ॥
tataścedipateḥ śrutvā bhīṣmaḥ sa kaṭukaṃ vacaḥ | uvācedaṃ vaco rājaṃścedirājasya śṛṇvataḥ
तब हे राजन्, चेदिपति के कटु वचन सुनकर भीष्म ने चेदिराज के सुनते हुए यह कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (2.67.34)
इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् । सोऽहं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान् ॥
icchatāṃ kila nāmāhaṃ jīvāmyeṣāṃ mahīkṣitām | so'haṃ na gaṇayāmyetāṃstṛṇenāpi narādhipān
'तो मैं इन राजाओं की इच्छा से जी रहा हूँ — मैं, जो इन नरेशों को तिनके के बराबर भी नहीं गिनता!'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (2.67.35)
एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः सञ्चुक्रुशुर्नृपाः । केचिज्जहृषिरे तत्र केचिद्भीष्मं जगर्हिरे ॥
evamukte tu bhīṣmeṇa tataḥ sañcukruśurnṛpāḥ | kecijjahṛṣire tatra kecidbhīṣmaṃ jagarhire
भीष्म के ऐसा कहने पर राजा लोग कोलाहल करने लगे। उनमें से कुछ प्रसन्न हुए और कुछ भीष्म की निन्दा करने लगे।
श्लोक 36 (2.67.36)
केचिदूचुर्महेष्वासाः श्रुत्वा भीष्मस्य यद्वचः । पापोऽवलिप्तो वृद्धश्च नायं भीष्मोऽर्हति क्षमाम् ॥
kecidūcurmaheṣvāsāḥ śrutvā bhīṣmasya yadvacaḥ | pāpo'valipto vṛddhaśca nāyaṃ bhīṣmo'rhati kṣamām
कुछ महाधनुर्धर भीष्म की बात सुनकर बोले — 'यह भीष्म पापी, घमंडी और बूढ़ा है; यह क्षमा के योग्य नहीं।
नृपा ऊचुः
श्लोक 37 (2.67.37)
हन्यतां दुर्मतिर्भीष्मः पशुवत्साध्वयं नृपाः । सर्वैः समेत्य संरब्धैर्दह्यतां वा कटाग्निना ॥
hanyatāṃ durmatirbhīṣmaḥ paśuvatsādhvayaṃ nṛpāḥ | sarvaiḥ sametya saṃrabdhairdahyatāṃ vā kaṭāgninā
राजाओ, इस दुर्बुद्धि भीष्म को पशु की भाँति मार डालना ही ठीक है; या हम सब मिलकर क्रोधपूर्वक इसे घास-फूस की आग में जला दें।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (2.67.38)
इति तेषां वचः श्रुत्वा ततः कुरुपितामहः । उवाच मतिमान्भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान् ॥
iti teṣāṃ vacaḥ śrutvā tataḥ kurupitāmahaḥ | uvāca matimānbhīṣmastāneva vasudhādhipān
उनकी यह बात सुनकर कुरुओं के पितामह बुद्धिमान भीष्म ने उन्हीं राजाओं से कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 39 (2.67.39)
उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये । यत्तु वक्ष्यामि तत्सर्वं शृणुध्वं वसुधाधिपाः ॥
uktasyoktasya nehāntamahaṃ samupalakṣaye | yattu vakṣyāmi tatsarvaṃ śṛṇudhvaṃ vasudhādhipāḥ
कहने-सुनने का यहाँ कोई अन्त मुझे दिखाई नहीं देता। हे राजाओ, अब मैं जो कहूँगा, वह सब सुनो।
श्लोक 40 (2.67.40)
पशुवद्घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना । क्रियतां मूर्ध्नि वो न्यस्तं मयेदं सकलं पदम् ॥
paśuvadghātanaṃ vā me dahanaṃ vā kaṭāgninā | kriyatāṃ mūrdhni vo nyastaṃ mayedaṃ sakalaṃ padam
चाहे मुझे पशु की तरह मारो या घास-फूस की आग में जलाओ, जो करना हो करो — मैंने अपना यह पूरा पैर तुम सबके सिर पर रख दिया है!
श्लोक 41 (2.67.41)
एष तिष्ठति गोविन्दः पूजितोऽस्माभिरच्युतः । यस्य वस्त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम् ॥
eṣa tiṣṭhati govindaḥ pūjito'smābhiracyutaḥ | yasya vastvarate buddhirmaraṇāya sa mādhavam
यह खड़े हैं गोविन्द अच्युत, जिनकी हमने पूजा की है। तुममें से जिसकी बुद्धि मरने के लिए उतावली हो रही हो,
श्लोक 42 (2.67.42)
कृष्णमाह्वयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् । यादवस्यैव देवस्य देहं विशतु पातितः ॥
kṛṣṇamāhvayatāmadya yuddhe cakragadādharam | yādavasyaiva devasya dehaṃ viśatu pātitaḥ
वह आज चक्र और गदा धारण करने वाले माधव कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारे, और उनके हाथों मारा जाकर इन्हीं यादव देवता के शरीर में प्रवेश करे।