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सभा पर्व · अध्याय 68

कृष्ण द्वारा शिशुपाल के अपराधों का वर्णन

भीष्म के वचनों से तिलमिलाकर शिशुपाल कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारता है और युधिष्ठिर के यज्ञ को नष्ट करने के लिए राजाओं के साथ निकल पड़ता है; कृष्ण अपने गरुडध्वज रथ पर चढ़ते हैं। कृष्ण राजाओं को अलग हट जाने को कहते हैं और यादवों के प्रति शिशुपाल के अपराध गिनाते हैं — द्वारका को जलाना, यज्ञ का अश्व चुराना, बभ्रु की पत्नी और वैशाली की भद्रा का हरण, और जरासन्ध से मेल। शिशुपाल की माता के कारण उन्होंने उसके सौ अपराध क्षमा किए हैं, पर यज्ञ और पाण्डवों के प्रति उसकी शत्रुता क्षमा नहीं करेंगे। राजा शिशुपाल की निन्दा करके भाग जाते हैं; शिशुपाल रुक्मिणी को लेकर कृष्ण का उपहास करता है और पतंगे की तरह आग की ओर, अकेला ही उन पर चढ़ आता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.68.1)

वचः श्रुत्वैव भीष्मस्य चेदिराडुरुविक्रमः । युयुत्सुर्वासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह ॥

vacaḥ śrutvaiva bhīṣmasya cedirāḍuruvikramaḥ | yuyutsurvāsudevena vāsudevamuvāca ha

भीष्म के वचन सुनते ही महापराक्रमी चेदिराज ने वासुदेव से युद्ध करने की इच्छा से वासुदेव से कहा —

शिशुपाल उवाच

श्लोक 2 (2.68.2)

आह्वये त्वां रणं गच्छ मया सार्धं जनार्दन । यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवैः ॥

āhvaye tvāṃ raṇaṃ gaccha mayā sārdhaṃ janārdana | yāvadadya nihanmi tvāṃ sahitaṃ sarvapāṇḍavaiḥ

"जनार्दन, मैं तुम्हें ललकारता हूँ। मेरे साथ युद्ध में चलो, ताकि आज मैं तुम्हें सब पाण्डवों सहित मार डालूँ।"

श्लोक 3 (2.68.3)

सह त्वया हि मे वध्याः सर्वथा कृष्ण पाण्डवाः । नृपतीन्समतिक्रम्य यैरराजा त्वमर्चितः ॥

saha tvayā hi me vadhyāḥ sarvathā kṛṣṇa pāṇḍavāḥ | nṛpatīnsamatikramya yairarājā tvamarcitaḥ

"कृष्ण, तुम्हारे साथ ये पाण्डव भी सर्वथा मेरे हाथों मारे जाने योग्य हैं, क्योंकि इन्होंने राजाओं की उपेक्षा करके तुम जैसे राजपदहीन का पूजन किया है।"

श्लोक 4 (2.68.4)

ये त्वां दासमराजानं बाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् । अनर्हमर्हवत्कृष्ण वध्यास्त इति मे मतिः ॥

ye tvāṃ dāsamarājānaṃ bālyādarcanti durmatim | anarhamarhavatkṛṣṇa vadhyāsta iti me matiḥ

"जो लोग नासमझी में तुम जैसे दास, राजपदहीन और दुर्बुद्धि का, अयोग्य होते हुए भी योग्य की भाँति पूजन करते हैं, कृष्ण, वे वध के योग्य हैं — यही मेरा मत है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (2.68.5)

इत्युक्त्वा राजशार्दूल शार्दूल इव नादयन् । पश्यतां सर्वभूतानां शिशुपालः प्रतापवान् ॥

ityuktvā rājaśārdūla śārdūla iva nādayan | paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ śiśupālaḥ pratāpavān

हे राजशार्दूल, यह कहकर प्रतापी शिशुपाल सब प्राणियों के देखते-देखते बाघ की भाँति गरजने लगा।

श्लोक 6 (2.68.6)

स रणायैव सङ्क्रुद्धः सन्नद्धः सर्वराजभिः । सुनीथः प्रययौ क्षिप्रं पार्थयज्ञजिघांसया ॥

sa raṇāyaiva saṅkruddhaḥ sannaddhaḥ sarvarājabhiḥ | sunīthaḥ prayayau kṣipraṃ pārthayajñajighāṃsayā

क्रोध से भरा और युद्ध के लिए सन्नद्ध सुनीथ (शिशुपाल) पार्थ के यज्ञ को नष्ट करने की इच्छा से सब राजाओं के साथ तुरन्त चल पड़ा।

श्लोक 7 (2.68.7)

ततश्चक्रगदापाणिः केशवः केशिहा हरिः । सध्वजं रथमास्थाय दारुकेण सुसत्कृतम् । भीष्मेण दत्तहस्तोऽसावारुरोह रथोत्तमम् ॥

tataścakragadāpāṇiḥ keśavaḥ keśihā hariḥ | sadhvajaṃ rathamāsthāya dārukeṇa susatkṛtam | bhīṣmeṇa dattahasto'sāvāruroha rathottamam

तब चक्र और गदा धारण करने वाले, केशी का वध करने वाले केशव हरि दारुक द्वारा भली-भाँति सजाए गए ध्वजायुक्त रथ के पास आए; भीष्म ने उन्हें हाथ का सहारा दिया और वे उस उत्तम रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 8 (2.68.8)

तेन पापस्वभावेन कोपितान्सर्वपार्थिवान् । आससाद रणे कृष्णः सज्जितैकरथः स्थितः ॥

tena pāpasvabhāvena kopitānsarvapārthivān | āsasāda raṇe kṛṣṇaḥ sajjitaikarathaḥ sthitaḥ

उस पापी स्वभाव वाले ने जिन सब राजाओं को कुपित कर दिया था, उनके सामने कृष्ण अपने अकेले सज्जित रथ पर खड़े होकर रणभूमि में आ पहुँचे।

श्लोक 9 (2.68.9)

ततः पुष्करपत्राक्षं तार्क्ष्यध्वजरथे स्थितम् । दिवाकरमिवोद्यन्तं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥

tataḥ puṣkarapatrākṣaṃ tārkṣyadhvajarathe sthitam | divākaramivodyantaṃ dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ

तब सब राजाओं ने उन कमलनयन को गरुडध्वज वाले रथ पर खड़े, उदय होते सूर्य के समान देखा।

श्लोक 10 (2.68.10)

आरोपयन्तं ज्यां कृष्णं प्रतपन्तमिवौजसा । स्थितं पुष्परथे दिव्ये पुष्पकेतुमिवापरम् ॥

āropayantaṃ jyāṃ kṛṣṇaṃ pratapantamivaujasā | sthitaṃ puṣparathe divye puṣpaketumivāparam

उन्होंने देखा कि कृष्ण धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा रहे हैं, मानो अपने तेज से तप रहे हों, और दिव्य पुष्परथ पर ऐसे खड़े हैं मानो दूसरे पुष्पकेतु (कामदेव) हों।

श्लोक 11 (2.68.11)

दृष्ट्वा कृष्णं तथा यान्तं प्रतपन्तमिवौजसा । यथार्हं केशवे वृत्तिमवशाः प्रतिपेदिरे ॥

dṛṣṭvā kṛṣṇaṃ tathā yāntaṃ pratapantamivaujasā | yathārhaṃ keśave vṛttimavaśāḥ pratipedire

कृष्ण को इस प्रकार अपने तेज से तपते हुए आते देखकर राजा विवश होकर केशव के प्रति यथोचित व्यवहार करने लगे।

श्लोक 12 (2.68.12)

तानुवाच महाबाहुर्महाऽसुरनिबर्हणः । वृष्णिवीरस्तदा राजन्सान्त्वयन्परवीरहा ॥

tānuvāca mahābāhurmahā'suranibarhaṇaḥ | vṛṣṇivīrastadā rājansāntvayanparavīrahā

तब, हे राजन्, बड़े-बड़े असुरों का संहार करने वाले, शत्रुवीरों के नाशक महाबाहु वृष्णिवीर ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा —

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 13 (2.68.13)

अपेत सबलाः सर्व आश्वस्ता मम शासनात् । मा दृष्टो दूषयेत्पाप एष वः सर्वपार्थिवाः ॥

apeta sabalāḥ sarva āśvastā mama śāsanāt | mā dṛṣṭo dūṣayetpāpa eṣa vaḥ sarvapārthivāḥ

"तुम सब अपनी सेनाओं के साथ हट जाओ और मेरी आज्ञा से निश्चिन्त रहो। हे राजाओ, कहीं इस पापी का दर्शन तुम्हें दूषित न कर दे।"

श्लोक 14 (2.68.14)

एष नः शत्रुरत्यन्तमेष वृष्णिविमर्दनः । सात्वतां सात्वतीपुत्रो वैरं चरति शाश्वतम् ॥

eṣa naḥ śatruratyantameṣa vṛṣṇivimardanaḥ | sātvatāṃ sātvatīputro vairaṃ carati śāśvatam

"यह हमारा घोर शत्रु है, वृष्णियों को कुचलने वाला है। सात्वत कुल की कन्या का यह पुत्र सात्वतों से निरन्तर वैर करता चला आ रहा है।"

श्लोक 15 (2.68.15)

प्राग्ज्योतिषपुरं यातानस्माञ्ज्ञात्वा नृशंसकृत् । अदहद्द्वारकामेष स्वस्रीयः सन्नराधिपाः ॥

prāgjyotiṣapuraṃ yātānasmāñjñātvā nṛśaṃsakṛt | adahaddvārakāmeṣa svasrīyaḥ sannarādhipāḥ

"हे राजाओ, यह जानकर कि हम प्राग्ज्योतिषपुर गए हुए हैं, इस क्रूरकर्मा ने हमारे कुल का भानजा होते हुए भी द्वारका को जला डाला।"

श्लोक 16 (2.68.16)

क्रीडतो भोजराजस्य एष रैवतके गिरौ । हत्वा बद्ध्वा च तान्सर्वानुपायात्स्वपुरं पुरा ॥

krīḍato bhojarājasya eṣa raivatake girau | hatvā baddhvā ca tānsarvānupāyātsvapuraṃ purā

"एक बार जब भोजराज रैवतक पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे थे, तब इसने उनके सब साथियों को मारकर और बाँधकर अपने नगर की राह ली।"

श्लोक 17 (2.68.17)

अश्वमेधे हयं मेध्यमुत्सृष्टं रक्षिभिर्वृतम् । पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत्पापनिश्चयः ॥

aśvamedhe hayaṃ medhyamutsṛṣṭaṃ rakṣibhirvṛtam | piturme yajñavighnārthamaharatpāpaniścayaḥ

"अश्वमेध में रक्षकों से घिरे, छोड़े गए यज्ञीय अश्व को इस पापनिश्चयी ने मेरे पिता के यज्ञ में विघ्न डालने के लिए हर लिया।"

श्लोक 18 (2.68.18)

सौवीरान्प्रतियातां च बभ्रोरेष तपस्विनः । भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम् ॥

sauvīrānpratiyātāṃ ca babhroreṣa tapasvinaḥ | bhāryāmabhyaharanmohādakāmāṃ tāmito gatām

"तपस्वी बभ्रु की पत्नी जब यहाँ से सौवीर देश की ओर जा रही थी, तब इसने मोहवश उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका हरण कर लिया।"

श्लोक 19 (2.68.19)

एष मायाप्रतिच्छन्नः कारूशार्थे तपस्विनीम् । जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत् ॥

eṣa māyāpraticchannaḥ kārūśārthe tapasvinīm | jahāra bhadrāṃ vaiśālīṃ mātulasya nṛśaṃsakṛt

"माया से अपना रूप छिपाकर इस क्रूरकर्मा ने करूषराज के लिए वैशाली की तपस्विनी भद्रा का हरण कर लिया, जो इसके अपने मामा की वरी हुई कन्या थी।"

श्लोक 20 (2.68.20)

वृष्णिदारान्विलाप्यैव हत्वा च कुकुरान्धकान् । पापबुद्धिरुपातिष्ठत्स प्रविश्य ससम्भ्रमम् ॥

vṛṣṇidārānvilāpyaiva hatvā ca kukurāndhakān | pāpabuddhirupātiṣṭhatsa praviśya sasambhramam

"इसने वृष्णियों की स्त्रियों को रुलाया, कुकुरों और अन्धकों को मारा, और पापबुद्धि से भरा यह हड़बड़ी के बीच भीतर घुस आया।"

श्लोक 21 (2.68.21)

विशालराज्ञो दुहितां मम पित्रा वृतां सतीम् । अनेन कृत्वा सन्धानं करूशेन जिगीषया ॥

viśālarājño duhitāṃ mama pitrā vṛtāṃ satīm | anena kṛtvā sandhānaṃ karūśena jigīṣayā

"विशाल के राजा की साध्वी पुत्री को, जिसे मेरे पिता ने वरण किया था, इसने विजय की लालसा में करूषराज से सन्धि करके हर लिया।"

श्लोक 22 (2.68.22)

जरासन्धं समाश्रित्य कृतवान्विप्रियाणि मे । तानि सर्वाणि सङ्ख्यातुं न शक्नोमि नराधिपाः ॥

jarāsandhaṃ samāśritya kṛtavānvipriyāṇi me | tāni sarvāṇi saṅkhyātuṃ na śaknomi narādhipāḥ

"जरासन्ध का आश्रय लेकर इसने मेरे अनेक अप्रिय कार्य किए हैं; हे राजाओ, मैं उन सबको गिना नहीं सकता।"

श्लोक 23 (2.68.23)

एवमेतदपर्यन्तमेष वृष्णिषु किल्बिषी । अस्माकमयमारम्भांश्चकार परमानृजुः ॥

evametadaparyantameṣa vṛṣṇiṣu kilbiṣī | asmākamayamārambhāṃścakāra paramānṛjuḥ

"इस प्रकार वृष्णियों का यह अपराधी, अत्यन्त कुटिल, हमारे हर कार्य के विरुद्ध अनन्त बार चलता रहा है।"

श्लोक 24 (2.68.24)

शतं क्षन्तव्यमस्माभिर्वधार्हाणां किलागसाम् । बद्धोऽस्मि समयैर्घोरैर्मातुरस्यैव सङ्गरे ॥

śataṃ kṣantavyamasmābhirvadhārhāṇāṃ kilāgasām | baddho'smi samayairghorairmāturasyaiva saṅgare

"इसके सौ अपराध, यद्यपि हर एक वध के योग्य था, हमें क्षमा करने थे; इसकी माता से की गई कठोर प्रतिज्ञा से मैं बँधा हुआ था।"

श्लोक 25 (2.68.25)

तत्तथा शतमस्माकं क्षान्तं क्षयकरं मया । द्वौ तु मे वधकालेऽस्मिन्न क्षन्तव्यौ कथञ्चन ॥

tattathā śatamasmākaṃ kṣāntaṃ kṣayakaraṃ mayā | dvau tu me vadhakāle'sminna kṣantavyau kathañcana

"इसलिए हमारे प्रति इसके वे सौ विनाशकारी अपराध मैंने क्षमा कर दिए। किन्तु अब, जब इसके वध का समय आ गया है, दो अपराध किसी भी प्रकार क्षमा योग्य नहीं हैं —"

श्लोक 26 (2.68.26)

यज्ञविघ्नकरं हन्यां पाण्डवानां च दुर्हृदम् । इति मे वर्तते भावस्तमतीयां कथं न्वहम् ॥

yajñavighnakaraṃ hanyāṃ pāṇḍavānāṃ ca durhṛdam | iti me vartate bhāvastamatīyāṃ kathaṃ nvaham

"यज्ञ में विघ्न डालने वाले और पाण्डवों के शत्रु को मुझे मारना ही है। यही मेरा संकल्प है; मैं इसका उल्लंघन कैसे करूँ?"

श्लोक 27 (2.68.27)

पितृष्वसुः कृते दुःखं सुमहन्मर्षयाम्यहम् । दिष्ट्या हीदं सर्वराज्ञां सन्निधावद्य वर्तते ॥

pitṛṣvasuḥ kṛte duḥkhaṃ sumahanmarṣayāmyaham | diṣṭyā hīdaṃ sarvarājñāṃ sannidhāvadya vartate

"अपनी बुआ के कारण मैंने बहुत बड़ा दुःख सहा है। सौभाग्य से आज यह सब राजाओं की उपस्थिति में हो रहा है।"

श्लोक 28 (2.68.28)

पश्यन्ति हि भवन्तोऽद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् । कृतानि तु परोक्षं मे यानि तानि निबोधत ॥

paśyanti hi bhavanto'dya mayyatīva vyatikramam | kṛtāni tu parokṣaṃ me yāni tāni nibodhata

"आप सब आज देख ही रहे हैं कि यह मेरे प्रति कितना बड़ा अपराध कर रहा है। अब यह भी जान लीजिए कि इसने मेरी पीठ पीछे क्या-क्या किया है।"

श्लोक 29 (2.68.29)

इमं त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् । अवलेपाद्वधार्हस्य समग्रे राजमण्डले ॥

imaṃ tvasya na śakṣyāmi kṣantumadya vyatikramam | avalepādvadhārhasya samagre rājamaṇḍale

"परन्तु इसका आज का यह अपराध मैं क्षमा नहीं कर सकूँगा — समस्त राजमण्डल के सामने किया गया इसका यह घमण्ड, जिसके कारण यह वध के योग्य है।"

श्लोक 30 (2.68.30)

रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थनाऽऽसीन्मुमूर्षतः । न च तां प्राप्तवान्मूढः शूद्रो वेदश्रुतिमिव ॥

rukmiṇyāmasya mūḍhasya prārthanā''sīnmumūrṣataḥ | na ca tāṃ prāptavānmūḍhaḥ śūdro vedaśrutimiva

"मरने को उतावले इस मूर्ख ने कभी रुक्मिणी को चाहा था; पर यह मूर्ख उसे पा न सका, जैसे शूद्र वेद का श्रवण नहीं पाता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (2.68.31)

एवमादि ततः सर्वे सहितास्ते नराधिपाः । गर्हणं शिशुपालस्य वासुदेवेन विश्रुताः ॥

evamādi tataḥ sarve sahitāste narādhipāḥ | garhaṇaṃ śiśupālasya vāsudevena viśrutāḥ

तब वे सब राजा, जिन्होंने वासुदेव के मुख से शिशुपाल की ये और ऐसी ही अन्य निन्दाएँ सुनी थीं,

श्लोक 32 (2.68.32)

वासुदेववचः श्रुत्वा चेदिराजं व्यगर्हयन् । रथोपस्थे धनुष्मन्तं शरान्सन्दधतं रुषा ॥

vāsudevavacaḥ śrutvā cedirājaṃ vyagarhayan | rathopasthe dhanuṣmantaṃ śarānsandadhataṃ ruṣā

वासुदेव के वचन सुनकर रथ पर धनुष लिए खड़े और क्रोध से बाण चढ़ाते चेदिराज की निन्दा करने लगे।

श्लोक 33 (2.68.33)

श्रुत्वाऽपि च विलोक्याशु दुद्रुवुः सर्वपार्थिवाः । विहाय परमोद्विग्नाश्चेदिराजं चमूमुखे ॥

śrutvā'pi ca vilokyāśu dudruvuḥ sarvapārthivāḥ | vihāya paramodvignāścedirājaṃ camūmukhe

यह सुनकर और चारों ओर देखकर सब राजा अत्यन्त घबराकर, सेना के मुहाने पर खड़े चेदिराज को छोड़कर तुरन्त भाग खड़े हुए।

श्लोक 34 (2.68.34)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिशुपालः प्रतापवान् । जहास स्वनवद्धासं वाक्यं चेदमुवाच ह ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā śiśupālaḥ pratāpavān | jahāsa svanavaddhāsaṃ vākyaṃ cedamuvāca ha

उनकी वह बात सुनकर प्रतापी शिशुपाल ठठाकर हँसा और यह बोला —

शिशुपाल उवाच

श्लोक 35 (2.68.35)

मत्पूर्वां रुक्मिणीं कृष्ण संसत्सु परिकीर्तयन् । विशेषतः पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम् ॥

matpūrvāṃ rukmiṇīṃ kṛṣṇa saṃsatsu parikīrtayan | viśeṣataḥ pārthiveṣu vrīḍāṃ na kuruṣe katham

"कृष्ण, सभाओं में, और विशेषकर राजाओं के बीच, यह कहते हुए कि रुक्मिणी पहले मेरे लिए ठहराई गई थी, तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?"

श्लोक 36 (2.68.36)

मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुषः परिकीर्तयेत् । अन्यपूर्वां स्त्रियं जातु त्वदन्यो मधुसूदन ॥

manyamāno hi kaḥ satsu puruṣaḥ parikīrtayet | anyapūrvāṃ striyaṃ jātu tvadanyo madhusūdana

"मधुसूदन, तुम्हारे सिवा कौन ऐसा स्वाभिमानी पुरुष होगा जो सज्जनों के बीच यह कहता फिरे कि कोई स्त्री पहले किसी और के लिए ठहराई गई थी?"

श्लोक 37 (2.68.37)

क्षमा वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम । क्रुद्धाद्वापि प्रसन्नाद्वा किं मे त्वत्तो भविष्यते ॥

kṣamā vā yadi te śraddhā mā vā kṛṣṇa mama kṣama | kruddhādvāpi prasannādvā kiṃ me tvatto bhaviṣyate

"कृष्ण, यदि क्षमा करने की तुम्हारी इच्छा हो तो मुझे क्षमा करो, या न करो। तुम क्रोधित हो या प्रसन्न, मेरा क्या बिगाड़ लोगे?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (2.68.38)

स तांस्तु विद्रुतान्सर्वान्साश्वपत्तिरथद्विपान् । कृष्णतेजोहतान्सर्वान्समीक्ष्य वसुधाधिपान् ॥

sa tāṃstu vidrutānsarvānsāśvapattirathadvipān | kṛṣṇatejohatānsarvānsamīkṣya vasudhādhipān

उन सब पृथ्वीपतियों को घोड़ों, पैदलों, रथों और हाथियों सहित कृष्ण के तेज से आहत होकर भागते देखकर

श्लोक 39 (2.68.39)

शिशुपालो रथेनैकः प्रत्युपायात्स केशवम् । रुषा ताम्रेक्षणो राजञ्छलभः पावकं यथा ॥

śiśupālo rathenaikaḥ pratyupāyātsa keśavam | ruṣā tāmrekṣaṇo rājañchalabhaḥ pāvakaṃ yathā

शिशुपाल क्रोध से लाल आँखें किए अकेला ही रथ पर सवार होकर केशव की ओर बढ़ा, हे राजन्, जैसे पतंगा आग की ओर लपकता है।

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