सभा पर्व · अध्याय 69
नारद द्वारा विनाशसूचक उत्पातों का वर्णन
शिशुपाल को युद्ध के लिए सन्नद्ध देखकर युधिष्ठिर नारद से राजाओं के विनाश की सूचना देने वाले लक्षणों के बारे में पूछते हैं। नारद ग्रहों, वृक्षों, प्रतिमाओं, पशुओं, जन्मों, नदियों और पृथ्वी के अपशकुन गिनाते हैं और बताते हैं कि ये सब लक्षण केशव से ही उत्पन्न होते हैं, जो अब इनके द्वारा चेदिराज के अन्त की सूचना दे रहे हैं। युद्ध निकट आने पर राजा ग्रहण, भूकम्प, सियारों का चीत्कार और शिशुपाल के ध्वज पर गिरता गिद्ध देखते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.69.1)
ततो युद्धाय संनद्धं चेदिराजं युधिष्ठिरः । दृष्ट्वा मतिमतां श्रेष्ठो नारदं समुवाच ह ॥
tato yuddhāya saṃnaddhaṃ cedirājaṃ yudhiṣṭhiraḥ | dṛṣṭvā matimatāṃ śreṣṭho nāradaṃ samuvāca ha
तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने चेदिराज को युद्ध के लिए सन्नद्ध देखकर नारद से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (2.69.2)
अन्तरिक्षे च भूमौ च न तेऽस्त्यविदितं क्वचित् । यानि राजविनाशाय भौमानि च खगानि च ॥
antarikṣe ca bhūmau ca na te'styaviditaṃ kvacit | yāni rājavināśāya bhaumāni ca khagāni ca
"आकाश में या पृथ्वी पर ऐसा कुछ नहीं जो आपको ज्ञात न हो। राजाओं के विनाश की सूचना देने वाले जो भूमि और आकाश के लक्षण
श्लोक 3 (2.69.3)
निमित्तानीह जायन्ते उत्पाताश्च पृथग्विधाः । एतदिच्छामि कार्त्स्न्येन श्रोतुं त्वत्तो महामुने ॥
nimittānīha jāyante utpātāśca pṛthagvidhāḥ | etadicchāmi kārtsnyena śrotuṃ tvatto mahāmune
"और तरह-तरह के उत्पात यहाँ प्रकट होते हैं, हे महामुने, मैं उन सबके बारे में आपसे पूरी तरह सुनना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (2.69.4)
इत्येवं मतिमान्विप्रः कुरुराजस्य धीमतः । पृच्छतः सर्वमव्यग्रमाचचक्षे महायशाः ॥
ityevaṃ matimānvipraḥ kururājasya dhīmataḥ | pṛcchataḥ sarvamavyagramācacakṣe mahāyaśāḥ
बुद्धिमान कुरुराज के इस प्रकार पूछने पर उन बुद्धिमान, महायशस्वी ब्राह्मण ने शान्त भाव से उन्हें सब कुछ बताया।
नारद उवाच
श्लोक 5 (2.69.5)
पराक्रमं च मार्गं च संनिपातं समुच्छ्रयम् । आरोहणं कुरुश्रेष्ठ अन्योन्यं प्रतिसर्पणम् ॥
parākramaṃ ca mārgaṃ ca saṃnipātaṃ samucchrayam | ārohaṇaṃ kuruśreṣṭha anyonyaṃ pratisarpaṇam
"ग्रहों की गति और मार्ग, उनका योग और उदय, हे कुरुश्रेष्ठ, उनका आरोहण और एक-दूसरे की ओर बढ़ना;"
श्लोक 6 (2.69.6)
रश्मीनां व्यतिसंसर्गं व्यायामं वृत्तिपीडनम् । दर्शनादर्शनं चैव अदृश्यानां च दर्शनम् ॥
raśmīnāṃ vyatisaṃsargaṃ vyāyāmaṃ vṛttipīḍanam | darśanādarśanaṃ caiva adṛśyānāṃ ca darśanam
"उनकी किरणों का परस्पर मिलना, उनका युद्ध, उनकी गति में बाधा, उनका दिखना और न दिखना, और अदृश्य ग्रहों का दिखाई देना;"
श्लोक 7 (2.69.7)
हानिं वृद्धिं च ह्रासं च वर्णस्थानं बलाबलम् । सर्वमेतत्परीक्षेत ग्रहाणां ग्रहकोविदः ॥
hāniṃ vṛddhiṃ ca hrāsaṃ ca varṇasthānaṃ balābalam | sarvametatparīkṣeta grahāṇāṃ grahakovidaḥ
"उनकी हानि, वृद्धि और क्षय, उनका वर्ण और स्थान, उनका बल और निर्बलता — ग्रहों का जानकार इन सबकी परीक्षा करे।"
श्लोक 8 (2.69.8)
भौमाः पूर्वं प्रवर्तन्ते खेचराश्च ततः परम् । उत्पद्यन्ते च लोकेऽस्मिन्नुत्पाता देवनिर्मिताः ॥
bhaumāḥ pūrvaṃ pravartante khecarāśca tataḥ param | utpadyante ca loke'sminnutpātā devanirmitāḥ
"पहले भूमि के उत्पात होते हैं और उसके बाद आकाश के; देवताओं द्वारा रचे ये उत्पात इस लोक में प्रकट होते हैं।"
श्लोक 9 (2.69.9)
यदा तु सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते । अपरेण गते सूर्ये तत्पराभवलक्षणम् ॥
yadā tu sarvabhūtānāṃ chāyā na parivartate | apareṇa gate sūrye tatparābhavalakṣaṇam
"जब सूर्य के पश्चिम में चले जाने पर भी सब प्राणियों की छाया नहीं घूमती, तो वह पराजय का लक्षण है।"
श्लोक 10 (2.69.10)
अच्छाये विमलच्छाया प्रतिच्छायेव दृश्यते । यत्र चैत्यकवृक्षाणां तत्र विद्यान्महद्भयम् ॥
acchāye vimalacchāyā praticchāyeva dṛśyate | yatra caityakavṛkṣāṇāṃ tatra vidyānmahadbhayam
"जहाँ चैत्यवृक्षों के बीच छायाहीन स्थान पर प्रतिबिम्ब जैसी निर्मल छाया दिखाई दे, वहाँ महान भय समझना चाहिए।"
श्लोक 11 (2.69.11)
शीर्णपर्णप्रवालाश्च शुष्कपर्णाश्च चैत्यकाः । अपभ्रष्टप्रवालाश्च तत्राभावं विनिर्दिशेत् ॥
śīrṇaparṇapravālāśca śuṣkaparṇāśca caityakāḥ | apabhraṣṭapravālāśca tatrābhāvaṃ vinirdiśet
"जहाँ चैत्यवृक्षों के पत्ते और कोंपलें मुरझा गई हों, पत्ते सूख गए हों और कोंपलें झड़ गई हों, वहाँ विनाश बताना चाहिए।"
श्लोक 12 (2.69.12)
स्निग्धपर्णप्रवालाश्च दृश्यन्ते यत्र चैत्यकाः । ईहमानाश्च वृक्षाश्च भावस्तत्र न संशयः ॥
snigdhaparṇapravālāśca dṛśyante yatra caityakāḥ | īhamānāśca vṛkṣāśca bhāvastatra na saṃśayaḥ
"जहाँ चैत्यवृक्ष चिकने पत्तों और कोंपलों से युक्त दिखें और वृक्ष फलते-फूलते लगें, वहाँ निःसन्देह समृद्धि होती है।"
श्लोक 13 (2.69.13)
पुष्पे पुष्पं प्रजायेत फले वा फलमाश्रितम् । राजा वा राजमात्रो वा मरणायोपपद्यते ॥
puṣpe puṣpaṃ prajāyeta phale vā phalamāśritam | rājā vā rājamātro vā maraṇāyopapadyate
"यदि फूल पर फूल उगे या फल पर फल लगे, तो कोई राजा या राजा के समान व्यक्ति मृत्यु के निकट है।"
श्लोक 14 (2.69.14)
प्रावृट्छरदि हेमन्ते वसन्ते वापि सर्वशः । आकालिकं पुष्पफलं राष्ट्रक्षोभं विनिर्दिशेत् ॥
prāvṛṭcharadi hemante vasante vāpi sarvaśaḥ | ākālikaṃ puṣpaphalaṃ rāṣṭrakṣobhaṃ vinirdiśet
"वर्षा, शरद, हेमन्त या वसन्त — किसी भी ऋतु में असमय फूल और फल आएँ तो राष्ट्र में उथल-पुथल बतानी चाहिए।"
श्लोक 15 (2.69.15)
नदीनां स्रोतसोऽकाले द्योतयन्ति महाभयम् । वनस्पतिः पूज्यमानः पूजितोऽपूजितोऽपि वा ॥
nadīnāṃ srotaso'kāle dyotayanti mahābhayam | vanaspatiḥ pūjyamānaḥ pūjito'pūjito'pi vā
"नदियों का असमय बहना महान भय का सूचक है। और जब कोई वनस्पति, चाहे वह पूजित हो या अपूजित,"
श्लोक 16 (2.69.16)
यदा भज्येत वातेन भिद्यते नमितोऽपि वा । अग्निवायुभयं विद्याच्छ्रेष्ठो वापि विनश्यति ॥
yadā bhajyeta vātena bhidyate namito'pi vā | agnivāyubhayaṃ vidyācchreṣṭho vāpi vinaśyati
"हवा से टूट जाए, फट जाए या झुक जाए, तो अग्नि और वायु का भय समझना चाहिए, या यह कि कोई श्रेष्ठ पुरुष नष्ट होगा।"
श्लोक 17 (2.69.17)
दिशः सर्वाश्च दीप्यन्ते जायन्ते राजविभ्रमाः । भिद्यमानो यदा वृक्षो निनदेच्चापि पातितः । सह राष्ट्रं च पतितं न तं वृक्षं प्रपातयेत् ॥
diśaḥ sarvāśca dīpyante jāyante rājavibhramāḥ | bhidyamāno yadā vṛkṣo ninadeccāpi pātitaḥ | saha rāṣṭraṃ ca patitaṃ na taṃ vṛkṣaṃ prapātayet
"सारी दिशाएँ जल उठती हैं और राजा भ्रम में पड़ जाते हैं। जब काटा या गिराया जाता हुआ वृक्ष चीख उठे, तो उसके साथ राष्ट्र भी गिरता है; ऐसे वृक्ष को नहीं गिराना चाहिए।"
श्लोक 18 (2.69.18)
अथैनं छेदयेत्कश्चित्प्रतिक्रुद्धो वनस्पतिः । छेत्ता भेत्ता पतिश्चैव क्षिप्रमेव नशिष्यति ॥
athainaṃ chedayetkaścitpratikruddho vanaspatiḥ | chettā bhettā patiścaiva kṣiprameva naśiṣyati
"यदि कोई उसे काट ही डाले, तो वह वनस्पति कुपित होती है, और काटने वाला, चीरने वाला और उसका स्वामी भी शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।"
श्लोक 19 (2.69.19)
देवतानां च पतनं मण्टपानां च पातनम् । अचलानां प्रकम्पश्च तत्पराभवलक्षणम् ॥
devatānāṃ ca patanaṃ maṇṭapānāṃ ca pātanam | acalānāṃ prakampaśca tatparābhavalakṣaṇam
"देवप्रतिमाओं का गिरना, मण्डपों का ढहना और पर्वतों का काँपना — यह पराजय का लक्षण है।"
श्लोक 20 (2.69.20)
निशि चेन्द्रधनुर्दृष्टं ततोऽपि च महद्भयम् । तद्द्रष्टुरेव भीतिः स्यान्नान्येषां भरतर्षभ ॥
niśi cendradhanurdṛṣṭaṃ tato'pi ca mahadbhayam | taddraṣṭureva bhītiḥ syānnānyeṣāṃ bharatarṣabha
"रात में दिखा इन्द्रधनुष भी महान भय लाता है, हे भरतश्रेष्ठ; पर वह भय देखने वाले के लिए ही होता है, दूसरों के लिए नहीं।"
श्लोक 21 (2.69.21)
रात्राविन्द्रधनुर्दृष्ट्वा तद्राष्ट्रं परिवर्जयेत् ॥
rātrāvindradhanurdṛṣṭvā tadrāṣṭraṃ parivarjayet
"रात में इन्द्रधनुष देखकर उस राष्ट्र को छोड़ देना चाहिए।"
श्लोक 22 (2.69.22)
अर्चा यत्र प्रनृत्यन्ति नदन्ति च हसन्ति च । उन्मीलन्ति निमीलन्ति राष्ट्रक्षोभं विनिर्दिशेत् ॥
arcā yatra pranṛtyanti nadanti ca hasanti ca | unmīlanti nimīlanti rāṣṭrakṣobhaṃ vinirdiśet
"जहाँ प्रतिमाएँ नाचें, चीखें और हँसें, आँखें खोलें और मूँदें, वहाँ राष्ट्र में उथल-पुथल बतानी चाहिए।"
श्लोक 23 (2.69.23)
शिला यदि प्रसिञ्चन्ति स्नेहांश्चोदकसम्भवान् । अन्यद्वा विकृतं किञ्चित्तद्भयस्य निदर्शनम् ॥
śilā yadi prasiñcanti snehāṃścodakasambhavān | anyadvā vikṛtaṃ kiñcittadbhayasya nidarśanam
"यदि शिलाओं से जल से उत्पन्न चिकने द्रव रिसने लगें, या कुछ और विकृत दिखाई दे, तो वह भय का सूचक है।"
श्लोक 24 (2.69.24)
म्रियन्ते वा महामात्रा राजा सपरिवारकः । पुरस्य वा भवेद्व्याधी राष्ट्रे देशे च विभ्रमाः ॥
mriyante vā mahāmātrā rājā saparivārakaḥ | purasya vā bhavedvyādhī rāṣṭre deśe ca vibhramāḥ
"तब बड़े-बड़े मन्त्री मरते हैं, या राजा अपने परिवार सहित; या नगर में रोग फैलता है और राष्ट्र तथा देश में अव्यवस्था छा जाती है।"
श्लोक 25 (2.69.25)
देवतानां यदाऽऽवासे राज्ञां वा यत्र वेश्मनि । भाण्डागारायुधागारे निविशेत यदा मधु ॥
devatānāṃ yadā''vāse rājñāṃ vā yatra veśmani | bhāṇḍāgārāyudhāgāre niviśeta yadā madhu
"जब मधुमक्खियाँ किसी देवालय में, या राजा के महल में, या भण्डार-गृह अथवा शस्त्रागार में छत्ता बना लें,"
श्लोक 26 (2.69.26)
सर्वं तदा भवेत्स्थानं हन्यमानं बलीयसा । आगन्तुकं भयं तत्र भवेदित्येव निर्दिशेत् ॥
sarvaṃ tadā bhavetsthānaṃ hanyamānaṃ balīyasā | āgantukaṃ bhayaṃ tatra bhavedityeva nirdiśet
"तब वह सारा स्थान किसी अधिक बलवान द्वारा नष्ट किया जाएगा; वहाँ बाहर से भय आने की बात कहनी चाहिए।"
श्लोक 27 (2.69.27)
पादपश्चैव यो यत्र रक्तं स्रवति शोणितम् । दन्ताग्रात्कुञ्जरो वापि शृङ्गाद्वा वृषभस्तथा ॥
pādapaścaiva yo yatra raktaṃ sravati śoṇitam | dantāgrātkuñjaro vāpi śṛṅgādvā vṛṣabhastathā
"जहाँ कोई वृक्ष लाल रक्त बहाए, या हाथी के दाँत की नोक से या बैल के सींग से रक्त बहे,"
श्लोक 28 (2.69.28)
पादपाद्राष्ट्रविभ्रंशः कुञ्जराद्राजविभ्रमः । गोब्राह्मणविनाशः स्याद्वृषभस्येति निर्दिशेत् ॥
pādapādrāṣṭravibhraṃśaḥ kuñjarādrājavibhramaḥ | gobrāhmaṇavināśaḥ syādvṛṣabhasyeti nirdiśet
"वृक्ष से राष्ट्र का विनाश, हाथी से राजा का पतन, और बैल से गौओं तथा ब्राह्मणों का नाश बताना चाहिए।"
श्लोक 29 (2.69.29)
छत्रं नरपतेर्यत्र निपतेत्पृथिवीतले । सराष्ट्रो नृपती राजन्क्षिप्रमेव विनश्यति ॥
chatraṃ narapateryatra nipatetpṛthivītale | sarāṣṭro nṛpatī rājankṣiprameva vinaśyati
"जहाँ राजा का छत्र भूमि पर गिर पड़े, वहाँ, हे राजन्, वह राजा अपने राष्ट्र सहित शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।"
श्लोक 30 (2.69.30)
देवागारेषु वा यत्र राज्ञो वा यत्र वेश्मनि । विकृतं यदि दृश्येत नागावासेषु वा पुनः ॥
devāgāreṣu vā yatra rājño vā yatra veśmani | vikṛtaṃ yadi dṛśyeta nāgāvāseṣu vā punaḥ
"यदि देवालयों में, या राजा के महल में, या फिर नागों के निवासों में कुछ विकृत दिखाई दे,"
श्लोक 31 (2.69.31)
तस्य देशस्य पीडा स्याद्राज्ञो जनपदस्य वा । अनावृष्टिभयं घोरमतिदुर्भिक्षमादिशेत् ॥
tasya deśasya pīḍā syādrājño janapadasya vā | anāvṛṣṭibhayaṃ ghoramatidurbhikṣamādiśet
"तो उस देश को, उसके राजा को या उसकी प्रजा को कष्ट होगा; अनावृष्टि का घोर भय और भीषण अकाल बताना चाहिए।"
श्लोक 32 (2.69.32)
अर्चाया बाहुभङ्गेन गृहस्थानां भयं भवेत् । भग्ने प्रहरणे विद्यात्सेनापतिविनाशनम् ॥
arcāyā bāhubhaṅgena gṛhasthānāṃ bhayaṃ bhavet | bhagne praharaṇe vidyātsenāpativināśanam
"यदि प्रतिमा की भुजा टूट जाए तो गृहस्थों पर भय आता है; यदि उसका शस्त्र टूट जाए तो सेनापति का विनाश समझना चाहिए।"
श्लोक 33 (2.69.33)
आगन्तुका तु प्रतिमा स्थानं यत्र न विन्दति । अभ्यन्तरेण षण्मासाद्राजा त्यजति तत्पुरम् ॥
āgantukā tu pratimā sthānaṃ yatra na vindati | abhyantareṇa ṣaṇmāsādrājā tyajati tatpuram
"जहाँ बाहर से लाई गई प्रतिमा को स्थान न मिले, वहाँ का राजा छह महीने के भीतर वह नगर छोड़ देता है।"
श्लोक 34 (2.69.34)
प्रदीर्यते मही यत्र विनदत्यपि पात्यते । म्रियते तत्र राजा च तत्र राष्ट्रं विनश्यति ॥
pradīryate mahī yatra vinadatyapi pātyate | mriyate tatra rājā ca tatra rāṣṭraṃ vinaśyati
"जहाँ धरती फटे, गरजे और धँस जाए, वहाँ राजा मरता है और राष्ट्र नष्ट हो जाता है।"
श्लोक 35 (2.69.35)
एणीपदान्वा सर्पान्वा डुण्डुभानथ दीप्यकान् । मण्डूको ग्रसते यत्र तत्र राजा विनश्यति ॥
eṇīpadānvā sarpānvā ḍuṇḍubhānatha dīpyakān | maṇḍūko grasate yatra tatra rājā vinaśyati
"जहाँ मेंढक एणीपद जीवों को, या साँपों को, या डुण्डुभ जलसर्पों को, या दीप्यकों को निगल जाए, वहाँ राजा का नाश होता है।"
श्लोक 36 (2.69.36)
अभिन्नं वाप्यपक्वं वा यत्रान्नमुपचीयते । जीर्यन्ते वा म्रियन्ते वा तदन्नं नोपभुञ्जते ॥
abhinnaṃ vāpyapakvaṃ vā yatrānnamupacīyate | jīryante vā mriyante vā tadannaṃ nopabhuñjate
"जहाँ अन्न बिना कुटे या कच्चा ही ढेर होता जाए, वहाँ लोग क्षीण होते या मरते हैं और वह अन्न खा नहीं पाते।"
श्लोक 37 (2.69.37)
उदपाने च यत्रापो विवर्धन्ते युधिष्ठिर । स्थावरेषु प्रवर्तन्ते निर्गच्छेन्न पुनस्ततः ॥
udapāne ca yatrāpo vivardhante yudhiṣṭhira | sthāvareṣu pravartante nirgacchenna punastataḥ
"युधिष्ठिर, जहाँ कुओं का जल बढ़कर भूमि पर फैल जाए और फिर वापस न लौटे, वह भी अशुभ लक्षण है।"
श्लोक 38 (2.69.38)
अपादं वा त्रिपादं वा द्विशीर्षं वा चतुर्भुजम् । स्त्रियो यत्र प्रसूयन्ते ब्रूयात्तत्र पराभवम् ॥
apādaṃ vā tripādaṃ vā dviśīrṣaṃ vā caturbhujam | striyo yatra prasūyante brūyāttatra parābhavam
"जहाँ स्त्रियाँ बिना पैरों के, तीन पैरों वाले, दो सिरों वाले या चार भुजाओं वाले शिशुओं को जन्म दें, वहाँ पराजय बतानी चाहिए।"
श्लोक 39 (2.69.39)
अजैडकाः स्त्रियो गावो ये चान्ये च वियोनयः । विकृतानि प्रजायन्ते तत्र तत्र पराभवः ॥
ajaiḍakāḥ striyo gāvo ye cānye ca viyonayaḥ | vikṛtāni prajāyante tatra tatra parābhavaḥ
"जहाँ बकरियाँ, भेड़ें, स्त्रियाँ, गौएँ और अन्य जीव भी विकृत सन्तान को जन्म दें, वहाँ-वहाँ पराजय होती है।"
श्लोक 40 (2.69.40)
नदी यत्र प्रतिस्रोता आवहेत्कलुषोदकम् । दिशश्च न प्रकाशन्ते तत्पराभवलक्षणम् ॥
nadī yatra pratisrotā āvahetkaluṣodakam | diśaśca na prakāśante tatparābhavalakṣaṇam
"जहाँ कोई नदी उलटी धारा में मटमैला जल बहाए और दिशाएँ प्रकाशित न हों, वह पराजय का लक्षण है।"
श्लोक 41 (2.69.41)
एतानि च निमित्तानि यानि चान्यानि भारत । केशवादेव जायन्ते भौमानि च खगानि च ॥
etāni ca nimittāni yāni cānyāni bhārata | keśavādeva jāyante bhaumāni ca khagāni ca
"हे भारत, ये लक्षण और अन्य भी, भूमि के और आकाश के, केशव से ही उत्पन्न होते हैं।"
श्लोक 42 (2.69.42)
चन्द्रादित्यौ ग्रहाश्चैव नक्षत्राणि च भारत । वायुरग्निस्तथा चापः पृथिवी च जनार्दनात् ॥
candrādityau grahāścaiva nakṣatrāṇi ca bhārata | vāyuragnistathā cāpaḥ pṛthivī ca janārdanāt
"हे भारत, चन्द्रमा और सूर्य, ग्रह और नक्षत्र, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — सब जनार्दन से ही हैं।"
श्लोक 43 (2.69.43)
यस्य देशस्य हानिं वा वृद्धिं वा कर्तुमिच्छति । तस्मिन्देशे निमित्तानि तानि तानि करोत्ययम् ॥
yasya deśasya hāniṃ vā vṛddhiṃ vā kartumicchati | tasmindeśe nimittāni tāni tāni karotyayam
"जिस देश का वे विनाश या उत्कर्ष करना चाहते हैं, उस देश में वे वैसे ही लक्षण उत्पन्न करते हैं।"
श्लोक 44 (2.69.44)
सोऽसौ चेदिपतेस्तात विनाशं समुपस्थितम् । निवेदयति गोविन्दः स्वैरुपायैर्न संशयः ॥
so'sau cedipatestāta vināśaṃ samupasthitam | nivedayati govindaḥ svairupāyairna saṃśayaḥ
"तात, यह गोविन्द ही अपने उपायों से चेदिपति के निकट आए विनाश की सूचना दे रहे हैं, इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 45 (2.69.45)
इयं प्रचलिता भूमिरशिवा वान्ति मारुताः । राहुश्चाप्यपतत्सोममपर्वणि विशाम्पते ॥
iyaṃ pracalitā bhūmiraśivā vānti mārutāḥ | rāhuścāpyapatatsomamaparvaṇi viśāmpate
"हे प्रजानाथ, यह पृथ्वी काँप रही है, अशुभ हवाएँ चल रही हैं, और राहु ने बिना पर्व के ही चन्द्रमा को ग्रस लिया है।"
श्लोक 46 (2.69.46)
सनिर्घाताः पतन्त्युल्कास्तमः सञ्जायते भृशम् । चेदिराजविनाशाय हरिरेष विजृम्भते ॥
sanirghātāḥ patantyulkāstamaḥ sañjāyate bhṛśam | cedirājavināśāya harireṣa vijṛmbhate
"गड़गड़ाहट के साथ उल्काएँ गिर रही हैं और घना अन्धकार छा रहा है। हरि चेदिराज के विनाश के लिए उद्यत हो रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (2.69.47)
एवमुक्त्वा तु देवर्षिर्नारदो विरराम ह । ताभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां तस्मिन्युद्ध उपस्थिते ॥
evamuktvā tu devarṣirnārado virarāma ha | tābhyāṃ puruṣasiṃhābhyāṃ tasminyuddha upasthite
यह कहकर देवर्षि नारद मौन हो गए। तब उन दोनों पुरुषसिंहों के बीच युद्ध छिड़ने को हुआ, तो
श्लोक 48 (2.69.48)
ददृशुर्भूमिपालास्ते घोरानौत्पातिकान्बहून् । तत्र वै दृश्यमानानां दिक्षु सर्वासु भारत ॥
dadṛśurbhūmipālāste ghorānautpātikānbahūn | tatra vai dṛśyamānānāṃ dikṣu sarvāsu bhārata
राजाओं ने अनेक भयानक उत्पात देखे। हे भारत, उनके देखते-देखते सब दिशाओं में
श्लोक 49 (2.69.49)
अश्रूयन्त तदा राजञ्छिवानामशिवा रवाः । ररास च मही कृत्स्ना सवृक्षवनपर्वता ॥
aśrūyanta tadā rājañchivānāmaśivā ravāḥ | rarāsa ca mahī kṛtsnā savṛkṣavanaparvatā
हे राजन्, सियारों का अमंगल चीत्कार सुनाई देने लगा, और वृक्षों, वनों तथा पर्वतों सहित सारी पृथ्वी गरज उठी।
श्लोक 50 (2.69.50)
अपर्वणि च मध्याह्ने सूर्यं स्वर्भानुरग्रसत् । ध्वजाग्रे चेदिराजस्य सर्वरत्नपरिष्कृते ॥
aparvaṇi ca madhyāhne sūryaṃ svarbhānuragrasat | dhvajāgre cedirājasya sarvaratnapariṣkṛte
बिना पर्व के ही दोपहर में स्वर्भानु (राहु) ने सूर्य को ग्रस लिया; और सब प्रकार के रत्नों से सजे चेदिराज के ध्वज के शिखर पर
श्लोक 51 (2.69.51)
अपतत्खाच्च्युतो गृध्रस्तीक्ष्णतुण्डः परन्तप । आरण्यैः सहसा हृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः ॥
apatatkhāccyuto gṛdhrastīkṣṇatuṇḍaḥ parantapa | āraṇyaiḥ sahasā hṛṣṭā grāmyāśca mṛgapakṣiṇaḥ
हे परन्तप, आकाश से एक तीखी चोंच वाला गिद्ध आ गिरा। गाँव के पशु-पक्षी वन के पशु-पक्षियों के साथ सहसा उत्तेजित होकर
श्लोक 52 (2.69.52)
चुक्रुशुर्भैरवं तत्र तस्मिन्युद्ध उपस्थिते । एवमादीनि घोराणि भौमानि च खगानि च ॥
cukruśurbhairavaṃ tatra tasminyuddha upasthite | evamādīni ghorāṇi bhaumāni ca khagāni ca
युद्ध के निकट आने पर वहाँ भयानक स्वर में चीखने लगे। ऐसे ही और भी भूमि तथा आकाश के भयंकर उत्पात
श्लोक 53 (2.69.53)
औत्पातिकान्यदृश्यन्त सङ्क्रुद्धे शार्ङ्गधन्वनि ॥
autpātikānyadṛśyanta saṅkruddhe śārṅgadhanvani
शार्ङ्गधनुषधारी (कृष्ण) के क्रुद्ध होने पर दिखाई दिए।