सभा पर्व · अध्याय 70
श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल-वध
शिशुपाल श्रीकृष्ण को द्वन्द्व-युद्ध के लिए ललकारता है और दोनों पहले बाणों से, फिर एक-दूसरे के दिव्यास्त्रों को काटते हुए लड़ते हैं, यहाँ तक कि शिशुपाल की माया नष्ट हो जाती है और बाणों से ढके कृष्ण से सारथि दारुक युद्ध समाप्त करने का आग्रह करता है। कृष्ण बताते हैं कि यही शत्रु पहले हिरण्यकशिपु और रावण था, पाञ्चजन्य फूँकते हैं और चक्र से शिशुपाल का सिर काट देते हैं; उसके शरीर से निकला तेज कृष्ण में समा जाता है। राजा मौन, क्रोध या प्रशंसा से प्रतिक्रिया करते हैं, और युधिष्ठिर शिशुपाल का अन्त्य-संस्कार करवाकर उसके पुत्र को चेदि-राज्य पर अभिषिक्त करवाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.70.1)
ततो विष्फारयन्राजा महच्चैदिपतिर्धनुः । अभियास्यन्हृषीकेशमुवाच मधुसूदनम् ॥
tato viṣphārayanrājā mahaccaidipatirdhanuḥ | abhiyāsyanhṛṣīkeśamuvāca madhusūdanam
तब चेदिराज ने अपने विशाल धनुष की टंकार करते हुए हृषीकेश पर धावा बोला और मधुसूदन से कहा —
शिशुपाल उवाच
श्लोक 2 (2.70.2)
एकस्त्वमसि मे शत्रुस्तत्त्वां हत्वाऽद्य माधव । ततः सागरपर्यन्तां पालयिष्यामि मेदिनीम् ॥
ekastvamasi me śatrustattvāṃ hatvā'dya mādhava | tataḥ sāgaraparyantāṃ pālayiṣyāmi medinīm
"तुम्हीं मेरे एकमात्र शत्रु हो। इसलिए, हे माधव, आज तुम्हें मारकर मैं समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का पालन करूँगा।
श्लोक 3 (2.70.3)
द्वैरथं काङ्क्षितं यद्वै तदिदं पर्युपस्थितम् । चिरस्य वत मे दिष्ट्या वासुदेव सह त्वया । अद्य त्वां निहनिष्यामि भीष्मं च सह पाण्डवैः ॥
dvairathaṃ kāṅkṣitaṃ yadvai tadidaṃ paryupasthitam | cirasya vata me diṣṭyā vāsudeva saha tvayā | adya tvāṃ nihaniṣyāmi bhīṣmaṃ ca saha pāṇḍavaiḥ
जिस रथ-द्वन्द्व की मुझे लालसा थी, वह आज आ पहुँचा है। हे वासुदेव, सौभाग्य से बहुत समय बाद तुमसे मेरा सामना हुआ है। आज मैं तुम्हें मार डालूँगा, और पाण्डवों सहित भीष्म को भी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (2.70.4)
एवमुक्त्वा स तं बाणैर्निशितैराप्ततेजनैः । विव्याध युधि तीक्ष्णाग्रैश्चेदिराड्यदुपुङ्गवम् ॥
evamuktvā sa taṃ bāṇairniśitairāptatejanaiḥ | vivyādha yudhi tīkṣṇāgraiścedirāḍyadupuṅgavam
यह कहकर चेदिराज ने युद्ध में यदुश्रेष्ठ को अच्छे दण्डों वाले, तीखी नोकों वाले पैने बाणों से बींध दिया।
श्लोक 5 (2.70.5)
कङ्कपत्रच्छदा बाणाश्चेदिराजधनुश्च्युताः । विविशुस्ते तदा कृष्णं भुजङ्गा इव पर्वतम् ॥
kaṅkapatracchadā bāṇāścedirājadhanuścyutāḥ | viviśuste tadā kṛṣṇaṃ bhujaṅgā iva parvatam
कंक-पंखों से युक्त, चेदिराज के धनुष से छूटे वे बाण कृष्ण के शरीर में वैसे ही घुस गए जैसे सर्प पर्वत में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 6 (2.70.6)
नाददानस्य चैद्यस्य शरानत्यस्यतोऽपि वा । ददृशुर्विवरं केचिद्गतिं वायोरिवाम्बरे ॥
nādadānasya caidyasya śarānatyasyato'pi vā | dadṛśurvivaraṃ kecidgatiṃ vāyorivāmbare
चैद्य बाण उठा रहा हो या छोड़ रहा हो, कोई उनके बीच अन्तराल नहीं देख पाता था, जैसे आकाश में वायु का मार्ग नहीं दिखता।
श्लोक 7 (2.70.7)
चेदिराजमहामेघः शरजालाम्बुमांस्तदा । अभ्यवर्षद्धृषीकेशं पयोद इव पर्वतम् ॥
cedirājamahāmeghaḥ śarajālāmbumāṃstadā | abhyavarṣaddhṛṣīkeśaṃ payoda iva parvatam
तब बाणों के जाल को ही जल बनाए चेदिराज रूपी महामेघ ने हृषीकेश पर वैसे ही वर्षा की जैसे बादल पर्वत पर बरसता है।
श्लोक 8 (2.70.8)
ततः शार्ङ्गममित्रघ्नः कृत्वा सशरमच्युतः । आबभाषे महाबाहुः सुनीथं परवीरहा ॥
tataḥ śārṅgamamitraghnaḥ kṛtvā saśaramacyutaḥ | ābabhāṣe mahābāhuḥ sunīthaṃ paravīrahā
तब शत्रुनाशक, शत्रु-वीरों के संहारक महाबाहु अच्युत ने शार्ङ्ग धनुष पर बाण चढ़ाकर सुनीथ से कहा —
कृष्ण उवाच
श्लोक 9 (2.70.9)
अयं त्वां मामकस्तीक्ष्णश्चेदिराज महाशरः । भेत्तुमर्हति वेगेन महाशनिरिवाचलम् ॥
ayaṃ tvāṃ māmakastīkṣṇaścedirāja mahāśaraḥ | bhettumarhati vegena mahāśanirivācalam
"हे चेदिराज, मेरा यह तीक्ष्ण महाबाण अपने वेग से तुम्हें वैसे ही भेद सकता है जैसे महावज्र पर्वत को।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (2.70.10)
एवं ब्रुवति गोविन्दे ततश्चेदिपतिः पुनः । मुमोच निशितानन्यान्कृष्णं प्रति शरान्बहून् ॥
evaṃ bruvati govinde tataścedipatiḥ punaḥ | mumoca niśitānanyānkṛṣṇaṃ prati śarānbahūn
गोविन्द के ऐसा कहते ही चेदिराज ने फिर कृष्ण पर बहुत-से और पैने बाण छोड़े।
श्लोक 11 (2.70.11)
अथ बाणार्दितः कृष्णः शार्ङ्गमायम्य दीप्तिमान् । मुमोच निशितान्बाणाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥
atha bāṇārditaḥ kṛṣṇaḥ śārṅgamāyamya dīptimān | mumoca niśitānbāṇāñchataśo'tha sahasraśaḥ
तब बाणों से पीड़ित तेजस्वी कृष्ण ने शार्ङ्ग को खींचकर सैकड़ों-हज़ारों पैने बाण छोड़े।
श्लोक 12 (2.70.12)
ताञ्छरांस्तु स चिच्छेद शरवर्षैस्तु चेदिराट् । षड्भिश्चान्यैर्जघानाशु केशवं चेदिपुङ्गवः ॥
tāñcharāṃstu sa ciccheda śaravarṣaistu cedirāṭ | ṣaḍbhiścānyairjaghānāśu keśavaṃ cedipuṅgavaḥ
चेदिराज ने अपनी बाण-वर्षा से उन बाणों को काट डाला, और उस चेदि-श्रेष्ठ ने छह और बाणों से शीघ्र केशव पर प्रहार किया।
श्लोक 13 (2.70.13)
ततोऽस्त्रं सहसा कृष्णः प्रमुमोच जगद्गुरुः । अस्त्रेण तन्महाबाहुर्वारयामास चेदिराट् ॥
tato'straṃ sahasā kṛṣṇaḥ pramumoca jagadguruḥ | astreṇa tanmahābāhurvārayāmāsa cedirāṭ
तब जगद्गुरु कृष्ण ने सहसा एक दिव्यास्त्र छोड़ा; महाबाहु चेदिराज ने अपने अस्त्र से उसे रोक दिया।
श्लोक 14 (2.70.14)
ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् । सर्वतः समवाकीर्य शौरिं दामोदरं तदा ॥
tataḥ śatasahasreṇa śarāṇāṃ nataparvaṇām | sarvataḥ samavākīrya śauriṃ dāmodaraṃ tadā
तब झुकी गाँठों वाले लाख बाणों से शौरि दामोदर को चारों ओर से ढककर —
श्लोक 15 (2.70.15)
ननाद बलवान्क्रुद्धः शिशुपालः प्रतापवान् । इदं चोवाच संरब्धः केशवं परवीरहा ॥
nanāda balavānkruddhaḥ śiśupālaḥ pratāpavān | idaṃ covāca saṃrabdhaḥ keśavaṃ paravīrahā
बलवान, प्रतापी शिशुपाल क्रोध से गरज उठा, और शत्रु-वीरों के उस संहारक ने आवेश में केशव से यह कहा —
शिशुपाल उवाच
श्लोक 16 (2.70.16)
अद्याङ्गं मामका बाणा भेत्स्यन्ति तव संयुगे । हत्वा त्वां ससुतामात्यं पाण्डवांश्च तरस्विनः ॥
adyāṅgaṃ māmakā bāṇā bhetsyanti tava saṃyuge | hatvā tvāṃ sasutāmātyaṃ pāṇḍavāṃśca tarasvinaḥ
"आज युद्ध में मेरे बाण तुम्हारे शरीर को भेद डालेंगे। तुम्हें तुम्हारे पुत्रों और मन्त्रियों सहित, और वेगशाली पाण्डवों को भी मारकर,
श्लोक 17 (2.70.17)
आनृण्यमद्य यास्यामि जरासन्धस्य धीमतः । कंसस्य केशिनश्चैव नरकस्य तथैव ह ॥
ānṛṇyamadya yāsyāmi jarāsandhasya dhīmataḥ | kaṃsasya keśinaścaiva narakasya tathaiva ha
आज मैं बुद्धिमान जरासन्ध, कंस, केशी और नरक के ऋण से भी उऋण हो जाऊँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (2.70.18)
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षः शिशुपालो जनार्दनम् । अदृश्यं शरवर्षेण सर्वतः स चकार ह ॥
ityuktvā krodhatāmrākṣaḥ śiśupālo janārdanam | adṛśyaṃ śaravarṣeṇa sarvataḥ sa cakāra ha
यह कहकर क्रोध से लाल आँखों वाले शिशुपाल ने बाण-वर्षा से जनार्दन को चारों ओर से ढककर अदृश्य कर दिया।
श्लोक 19 (2.70.19)
ततोऽस्त्रेणैव चान्योन्यं निकृत्य च शरान्बहून् । शरवर्षैस्तदा चैद्यमन्तर्धातुं प्रचक्रमे ॥
tato'streṇaiva cānyonyaṃ nikṛtya ca śarānbahūn | śaravarṣaistadā caidyamantardhātuṃ pracakrame
तब कृष्ण ने अस्त्र से ही उन बहुत-से बाणों को काटकर, बदले में बाण-वर्षा से चैद्य को ढक देना आरम्भ किया।
श्लोक 20 (2.70.20)
अन्तर्धानगतौ वीरौ शुशुभाते महारथौ । तौ दृष्ट्वा सर्वभूतानि साधुसाध्वित्यपूजयन् ॥
antardhānagatau vīrau śuśubhāte mahārathau | tau dṛṣṭvā sarvabhūtāni sādhusādhvityapūjayan
अदृश्य हुए वे दोनों महारथी वीर शोभा पा रहे थे; उन्हें देखकर सब प्राणी "साधु, साधु" कहकर सराहना करने लगे —
श्लोक 21 (2.70.21)
न दृष्टपूर्वमस्माभिर्युद्धमीदृशकं पुरा । ततः कृष्णं जघानाशु शिशुपालस्त्रिभिः शरैः ॥
na dṛṣṭapūrvamasmābhiryuddhamīdṛśakaṃ purā | tataḥ kṛṣṇaṃ jaghānāśu śiśupālastribhiḥ śaraiḥ
"हमने ऐसा युद्ध पहले कभी नहीं देखा।" तब शिशुपाल ने तीन बाणों से कृष्ण पर शीघ्र प्रहार किया।
श्लोक 22 (2.70.22)
कृष्णोऽपि बाणैर्विव्याध सुनीथं पञ्चभिर्युधि । ततः सुनीथं सप्तत्या नाराचैरर्दयद्बली ॥
kṛṣṇo'pi bāṇairvivyādha sunīthaṃ pañcabhiryudhi | tataḥ sunīthaṃ saptatyā nārācairardayadbalī
कृष्ण ने भी युद्ध में पाँच बाणों से सुनीथ को बींधा; फिर उस बलवान ने सत्तर नाराचों से सुनीथ को पीड़ित किया।
श्लोक 23 (2.70.23)
ततोऽतिविद्धः कृष्णेन सुनीथः क्रोधमूर्छितः । विव्याध निशितैर्बाणैर्वासुदेवं स्तनान्तरे ॥
tato'tividdhaḥ kṛṣṇena sunīthaḥ krodhamūrchitaḥ | vivyādha niśitairbāṇairvāsudevaṃ stanāntare
तब कृष्ण के बाणों से बुरी तरह घायल सुनीथ ने क्रोध से मूर्च्छित-सा होकर पैने बाणों से वासुदेव की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 24 (2.70.24)
पुनः कृष्णं त्रिभिर्विद्ध्वा ननादावसरे नृपः । ततोऽतिदारुणं युद्धं सहसा चक्रतुस्तदा ॥
punaḥ kṛṣṇaṃ tribhirviddhvā nanādāvasare nṛpaḥ | tato'tidāruṇaṃ yuddhaṃ sahasā cakratustadā
फिर तीन बाणों से कृष्ण को बींधकर उस राजा ने उसी क्षण गर्जना की। तब वे दोनों सहसा अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे।
श्लोक 25 (2.70.25)
तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महागजौ । दंष्ट्राभिरिव पञ्चास्यौ चरणैरिव कुक्कुटौ ॥
tau nakhairiva śārdūlau dantairiva mahāgajau | daṃṣṭrābhiriva pañcāsyau caraṇairiva kukkuṭau
जैसे दो बाघ नखों से, दो महागज दाँतों से, दो सिंह दाढ़ों से और दो मुर्गे पंजों से (लड़ते हैं),
श्लोक 26 (2.70.26)
दारयेतां शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं युधि तावुभौ । ततो मुमुचतुः क्रुद्धौ शरवर्षमनुत्तमम् ॥
dārayetāṃ śaraistīkṣṇairanyonyaṃ yudhi tāvubhau | tato mumucatuḥ kruddhau śaravarṣamanuttamam
वैसे ही वे दोनों युद्ध में तीखे बाणों से एक-दूसरे को चीरने लगे। फिर क्रुद्ध होकर दोनों ने अनुपम बाण-वर्षा की।
श्लोक 27 (2.70.27)
शरैरेव शराञ्छित्वा तावुभौ पुरुषर्षभौ । चक्रातेऽस्त्रमयं युद्धं घोरं तदतिमानुषम् ॥
śaraireva śarāñchitvā tāvubhau puruṣarṣabhau | cakrāte'stramayaṃ yuddhaṃ ghoraṃ tadatimānuṣam
बाणों से ही बाणों को काटते हुए उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों ने दिव्यास्त्रों का घोर, अलौकिक युद्ध किया।
श्लोक 28 (2.70.28)
आग्नेयमस्त्रं मुमुचे शिशुपालः प्रतापवान् । वारुणास्त्रेण तच्छीघ्रं नाशयामास केशवः ॥
āgneyamastraṃ mumuce śiśupālaḥ pratāpavān | vāruṇāstreṇa tacchīghraṃ nāśayāmāsa keśavaḥ
प्रतापी शिशुपाल ने आग्नेयास्त्र छोड़ा; केशव ने वारुणास्त्र से उसे शीघ्र नष्ट कर दिया।
श्लोक 29 (2.70.29)
कौबेरमस्त्रं सहसा चेदिराट् प्रमुमोच ह । कौबेरेणैव सहसाऽनाशयत्तं जगत्प्रभुः ॥
kauberamastraṃ sahasā cedirāṭ pramumoca ha | kaubereṇaiva sahasā'nāśayattaṃ jagatprabhuḥ
चेदिराज ने सहसा कौबेरास्त्र छोड़ा; जगत्प्रभु ने कौबेरास्त्र से ही उसे तत्काल नष्ट कर दिया।
श्लोक 30 (2.70.30)
याम्यमस्त्रं ततः क्रुद्धो मुमुचे कालमोहितः । याम्येनैवास्त्रयोगेन याम्यमस्त्रं व्यनाशयत् ॥
yāmyamastraṃ tataḥ kruddho mumuce kālamohitaḥ | yāmyenaivāstrayogena yāmyamastraṃ vyanāśayat
तब काल से मोहित, क्रुद्ध शिशुपाल ने याम्यास्त्र छोड़ा; कृष्ण ने याम्यास्त्र के प्रयोग से ही उस याम्यास्त्र को नष्ट कर दिया।
श्लोक 31 (2.70.31)
गान्धर्वेण च गान्धर्वं मानवं मानवेन च । वायव्येन च वायव्यं रौद्रं रौद्रेण चाभिभूः ॥
gāndharveṇa ca gāndharvaṃ mānavaṃ mānavena ca | vāyavyena ca vāyavyaṃ raudraṃ raudreṇa cābhibhūḥ
गान्धर्वास्त्र को गान्धर्वास्त्र से, मानवास्त्र को मानवास्त्र से, वायव्यास्त्र को वायव्यास्त्र से और रौद्रास्त्र को रौद्रास्त्र से उस प्रभु ने काट दिया;
श्लोक 32 (2.70.32)
ऐन्द्रमैन्द्रेण भगवान्वैष्णवेन च वैष्णवम् । एवमस्त्राणि कुर्वाणौ युयुधाते महाबलौ ॥
aindramaindreṇa bhagavānvaiṣṇavena ca vaiṣṇavam | evamastrāṇi kurvāṇau yuyudhāte mahābalau
ऐन्द्रास्त्र को ऐन्द्रास्त्र से और वैष्णवास्त्र को वैष्णवास्त्र से भगवान ने काटा। इस प्रकार दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हुए वे दोनों महाबली लड़ते रहे।
श्लोक 33 (2.70.33)
ततो मायां विकुर्वाणो दमघोषसुतो बली । गदामुसलसंयुक्ताञ्छक्तितोमरसायकान् ॥
tato māyāṃ vikurvāṇo damaghoṣasuto balī | gadāmusalasaṃyuktāñchaktitomarasāyakān
तब दमघोष के बलवान पुत्र ने माया रचकर गदा, मूसल, शक्ति, तोमर और बाण,
श्लोक 34 (2.70.34)
परश्वथमुसण्डीश्च ववर्ष युधि केशवम् । अमोघास्त्रेण भगवान्नाशयामास केशिहा ॥
paraśvathamusaṇḍīśca vavarṣa yudhi keśavam | amoghāstreṇa bhagavānnāśayāmāsa keśihā
फरसे और मुसुण्डियाँ युद्ध में केशव पर बरसाईं; केशी का वध करने वाले भगवान ने अमोघ अस्त्र से उन्हें नष्ट कर दिया।
श्लोक 35 (2.70.35)
शिलावर्षं महाघोरं ववर्ष युधि चेदिराट् । वज्रास्त्रेणाभिसङ्क्रुद्धश्चूर्णं तदकरोत्प्रभुः ॥
śilāvarṣaṃ mahāghoraṃ vavarṣa yudhi cedirāṭ | vajrāstreṇābhisaṅkruddhaścūrṇaṃ tadakarotprabhuḥ
चेदिराज ने युद्ध में अत्यन्त भयंकर शिला-वर्षा की; क्रुद्ध प्रभु ने वज्रास्त्र से उसे चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 36 (2.70.36)
जलवर्षं ततो घोरं व्यसृजच्चेदिपुङ्गवः । वायव्यास्त्रेण भगवान्व्याक्षिपच्छतशो हि तत् ॥
jalavarṣaṃ tato ghoraṃ vyasṛjaccedipuṅgavaḥ | vāyavyāstreṇa bhagavānvyākṣipacchataśo hi tat
तब चेदि-श्रेष्ठ ने भयंकर जल-वर्षा की; भगवान ने वायव्यास्त्र से उसे सैकड़ों दिशाओं में बिखेर दिया।
श्लोक 37 (2.70.37)
निहत्य सर्वमायां वै सुनीथस्य जनार्दनः । स मुहूर्तं चकाराशु द्वन्द्वयुद्धं महारथः ॥
nihatya sarvamāyāṃ vai sunīthasya janārdanaḥ | sa muhūrtaṃ cakārāśu dvandvayuddhaṃ mahārathaḥ
सुनीथ की समस्त माया का नाश करके महारथी जनार्दन ने कुछ देर उससे द्वन्द्व-युद्ध किया।
श्लोक 38 (2.70.38)
स बाणयुद्धं कुर्वाणो भर्त्सयामास चेदिराट् । दमघोषसुतो धृष्टमुवाच यदुपुङ्गवम् ॥
sa bāṇayuddhaṃ kurvāṇo bhartsayāmāsa cedirāṭ | damaghoṣasuto dhṛṣṭamuvāca yadupuṅgavam
बाणों से लड़ते हुए दमघोष-पुत्र चेदिराज ने उन्हें फटकारा और ढिठाई से यदुश्रेष्ठ से कहा —
श्लोक 39 (2.70.39)
अद्य कृष्णमकृष्णं तु कुर्वन्तु मम सायकाः । इत्येवमुक्त्वा दुष्टात्मा शरवर्षं जनार्दने ॥
adya kṛṣṇamakṛṣṇaṃ tu kurvantu mama sāyakāḥ | ityevamuktvā duṣṭātmā śaravarṣaṃ janārdane
"आज मेरे बाण कृष्ण को अकृष्ण कर दें!" ऐसा कहकर उस दुष्टात्मा
श्लोक 40 (2.70.40)
मुमोच पुरुषव्याघ्रो घोरं वै चेदिपुङ्गवः । शरसङ्कृत्तगात्रस्तु क्षणेन यदुनन्दनः ॥
mumoca puruṣavyāghro ghoraṃ vai cedipuṅgavaḥ | śarasaṅkṛttagātrastu kṣaṇena yadunandanaḥ
पुरुषसिंह चेदि-श्रेष्ठ ने जनार्दन पर भयंकर बाण-वर्षा की। क्षण भर में बाणों से क्षत-विक्षत शरीर वाले यदुनन्दन
श्लोक 41 (2.70.41)
रुधिरं परिसुस्राव मदं मत्त इव द्विपः । न यन्ता न रथो वापि न चाश्वाः पर्वतोपमाः ॥
rudhiraṃ parisusrāva madaṃ matta iva dvipaḥ | na yantā na ratho vāpi na cāśvāḥ parvatopamāḥ
से रक्त वैसे बहने लगा जैसे मतवाले हाथी से मद बहता है। न उनका सारथि, न रथ, न पर्वत-जैसे घोड़े
श्लोक 42 (2.70.42)
दृश्यन्ते शरसञ्छन्नाः केशवस्य महात्मनः । केशवं तदवस्थं तु दृष्ट्वा भूतानि चुक्रुशुः ॥
dṛśyante śarasañchannāḥ keśavasya mahātmanaḥ | keśavaṃ tadavasthaṃ tu dṛṣṭvā bhūtāni cukruśuḥ
दिखाई देते थे, महात्मा केशव इस प्रकार बाणों से ढक गए थे। केशव को उस दशा में देखकर सब प्राणी चीत्कार कर उठे।
श्लोक 43 (2.70.43)
दारुकस्तु तदा प्राह कृष्णं यादवनन्दनम् । नेदृशो दृष्टपूर्वो हि सङ्ग्रामो वै पुरा मया ॥
dārukastu tadā prāha kṛṣṇaṃ yādavanandanam | nedṛśo dṛṣṭapūrvo hi saṅgrāmo vai purā mayā
तब दारुक ने यादवनन्दन कृष्ण से कहा — "ऐसा संग्राम मैंने पहले कभी नहीं देखा।
दारुक उवाच
श्लोक 44 (2.70.44)
स्थातव्यमिति तिष्ठामि त्वत्प्रभावेण माधव । अन्यथा न च मे प्राणा धरायेयुर्जनार्दन ॥
sthātavyamiti tiṣṭhāmi tvatprabhāveṇa mādhava | anyathā na ca me prāṇā dharāyeyurjanārdana
हे माधव, डटे रहना है, इसलिए आपके प्रभाव से ही मैं टिका हुआ हूँ; अन्यथा, हे जनार्दन, मेरे प्राण न टिक पाते।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (2.70.45)
अतः सञ्चिन्त्य गोविन्द क्षिप्रमस्य वधं कुरु । एवमुक्तस्तु सूतेन केशवो वाक्यमब्रवीत् ॥
ataḥ sañcintya govinda kṣipramasya vadhaṃ kuru | evamuktastu sūtena keśavo vākyamabravīt
इसलिए, हे गोविन्द, सोच-विचारकर शीघ्र इसका वध कीजिए।" सारथि के ऐसा कहने पर केशव बोले —
कृष्ण उवाच
श्लोक 46 (2.70.46)
एष ह्यतिबलो दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा । रिपुः सुराणामभवद्वरदानेन गर्वितः ॥
eṣa hyatibalo daityo hiraṇyakaśipuḥ purā | ripuḥ surāṇāmabhavadvaradānena garvitaḥ
"यही पूर्वकाल में अत्यन्त बलवान दैत्य हिरण्यकशिपु था, जो वरदान से गर्वित होकर देवताओं का शत्रु बना।
श्लोक 47 (2.70.47)
तथाऽऽसीद्रावणो नाम राक्षसो ह्यतिवीर्यवान् । तेनैव बलवीर्येण बलं नागणयन्मम ॥
tathā''sīdrāvaṇo nāma rākṣaso hyativīryavān | tenaiva balavīryeṇa balaṃ nāgaṇayanmama
इसी प्रकार यह रावण नामक अत्यन्त पराक्रमी राक्षस था, जिसने उसी बल-पराक्रम के घमण्ड में मेरे बल को कुछ न गिना।
श्लोक 48 (2.70.48)
अहं मृत्युश्च भविता काले काले दुरात्मनः । न भेतव्यं तथा सूत नैष कश्चिन्मयि स्थिते ॥
ahaṃ mṛtyuśca bhavitā kāle kāle durātmanaḥ | na bhetavyaṃ tathā sūta naiṣa kaścinmayi sthite
और मैं समय-समय पर इस दुरात्मा की मृत्यु बनूँगा। इसलिए, हे सूत, डरो मत; मेरे रहते यह कुछ भी नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (2.70.49)
इत्येवमुक्त्वा भगवान्ननर्द गरुडध्वजः । पाञ्चजन्यं महाशङ्खं पूरयामास केशवः ॥
ityevamuktvā bhagavānnanarda garuḍadhvajaḥ | pāñcajanyaṃ mahāśaṅkhaṃ pūrayāmāsa keśavaḥ
ऐसा कहकर गरुड़ध्वज भगवान ने गर्जना की, और केशव ने अपना महाशंख पाञ्चजन्य फूँका।
श्लोक 50 (2.70.50)
संमोहयित्वा भगवांश्चक्रं दिव्यं समाददे । चिच्छेद च सुनीथस्य शिरश्चक्रेण संयुगे ॥
saṃmohayitvā bhagavāṃścakraṃ divyaṃ samādade | ciccheda ca sunīthasya śiraścakreṇa saṃyuge
शत्रु को मोहित करके भगवान ने दिव्य चक्र उठाया और युद्ध में उसी चक्र से सुनीथ का सिर काट डाला।
श्लोक 51 (2.70.51)
स पपात महाबाहुर्वज्राहत इवाचलः । ततश्चेदिपतेर्देहात्तेजोऽग्र्यं ददृशुर्नृपाः ॥
sa papāta mahābāhurvajrāhata ivācalaḥ | tataścedipaterdehāttejo'gryaṃ dadṛśurnṛpāḥ
वह महाबाहु राजा वज्र से आहत पर्वत की भाँति गिर पड़ा। तब राजाओं ने चेदिराज के शरीर से एक उत्कृष्ट तेज निकलते देखा,
श्लोक 52 (2.70.52)
उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् । ततः कमलपत्राक्षं कृष्णं लोकनमस्कृतम् । ववन्दे तत्तदा तेजो विवेश च नराधिप ॥
utpatantaṃ mahārāja gaganādiva bhāskaram | tataḥ kamalapatrākṣaṃ kṛṣṇaṃ lokanamaskṛtam | vavande tattadā tejo viveśa ca narādhipa
हे महाराज, जो आकाश में चढ़ते सूर्य के समान ऊपर उठ रहा था। हे नराधिप, उस तेज ने लोकवन्दित कमलनयन कृष्ण को प्रणाम किया और उन्हीं में प्रवेश कर गया।
श्लोक 53 (2.70.53)
तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः । यद्विवेश महाबाहुं तत्तेजः पुरुषोत्तमम् ॥
tadadbhutamamanyanta dṛṣṭvā sarve mahīkṣitaḥ | yadviveśa mahābāhuṃ tattejaḥ puruṣottamam
यह देखकर सब राजाओं ने इसे अद्भुत माना कि वह तेज महाबाहु पुरुषोत्तम में प्रवेश कर गया।
श्लोक 54 (2.70.54)
अनभ्रे प्रववर्ष द्यौः पपात ज्वलिताशनिः । कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुन्धरा ॥
anabhre pravavarṣa dyauḥ papāta jvalitāśaniḥ | kṛṣṇena nihate caidye cacāla ca vasundharā
कृष्ण द्वारा चैद्य के मारे जाने पर बिना बादल के आकाश बरसा, जलती हुई बिजली गिरी और पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 55 (2.70.55)
ततः केचिन्महीपाला नाब्रुवंस्तत्र किञ्चन । अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ॥
tataḥ kecinmahīpālā nābruvaṃstatra kiñcana | atītavākpathe kāle prekṣamāṇā janārdanam
तब कुछ राजा कुछ भी न बोले; उस वाणी से परे क्षण में वे जनार्दन को बस देखते रहे।
श्लोक 56 (2.70.56)
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नमर्षिताः । अपरे दशनैरोष्ठानदशन्क्रोधमूर्छिताः ॥
hastairhastāgramapare pratyapiṃṣannamarṣitāḥ | apare daśanairoṣṭhānadaśankrodhamūrchitāḥ
कुछ दूसरे असहिष्णु होकर हाथों से उँगलियाँ मसलने लगे; और कुछ क्रोध से मूर्च्छित-से होकर दाँतों से होंठ चबाने लगे।
श्लोक 57 (2.70.57)
रहश्च केचिद्वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपाः । केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्त्वपरेऽभवन् ॥
rahaśca kecidvārṣṇeyaṃ praśaśaṃsurnarādhipāḥ | kecideva susaṃrabdhā madhyasthāstvapare'bhavan
कुछ राजाओं ने एकान्त में वार्ष्णेय (कृष्ण) की प्रशंसा की; कुछ अत्यन्त क्रुद्ध थे, और कुछ तटस्थ रहे।
श्लोक 58 (2.70.58)
प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षयः । ब्राह्मणाश्च महात्मानः पार्थिवाश्च महाबलाः । शशंसुर्निर्वृताः सर्वे दृष्ट्वा कृष्णस्य विक्रमम् ॥
prahṛṣṭāḥ keśavaṃ jagmuḥ saṃstuvanto maharṣayaḥ | brāhmaṇāśca mahātmānaḥ pārthivāśca mahābalāḥ | śaśaṃsurnirvṛtāḥ sarve dṛṣṭvā kṛṣṇasya vikramam
महर्षि प्रसन्न होकर स्तुति करते हुए केशव के पास गए, और महात्मा ब्राह्मण तथा महाबली राजा भी; कृष्ण का पराक्रम देखकर सब संतुष्ट होकर उसकी सराहना करने लगे।
श्लोक 59 (2.70.59)
सदेवगन्धर्वगणा राजानो भुवि विश्रुताः । प्रणामं हि हृषीकेशे प्राकुर्वत महात्मनि ॥
sadevagandharvagaṇā rājāno bhuvi viśrutāḥ | praṇāmaṃ hi hṛṣīkeśe prākurvata mahātmani
पृथ्वी पर विख्यात राजाओं ने देवताओं और गन्धर्वों के समूहों के साथ महात्मा हृषीकेश को प्रणाम किया।
श्लोक 60 (2.70.60)
ये त्वासुरगणाः पक्षाः सम्भूताः क्षत्रिया इह । ते निन्दन्ति हृषीकेशं दुरात्मानो गतायुषः ॥
ye tvāsuragaṇāḥ pakṣāḥ sambhūtāḥ kṣatriyā iha | te nindanti hṛṣīkeśaṃ durātmāno gatāyuṣaḥ
परन्तु जो क्षत्रिय असुरगणों के पक्ष से यहाँ जन्मे थे, वे दुरात्मा, जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, हृषीकेश की निन्दा करने लगे।
श्लोक 61 (2.70.61)
प्रजापतिगणा ये तु मध्यस्थाश्च महात्मनि । ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च गन्धर्वोरगचारणाः ॥
prajāpatigaṇā ye tu madhyasthāśca mahātmani | brahmarṣayaśca siddhāśca gandharvoragacāraṇāḥ
प्रजापति के गणों में से जो उन महात्मा के प्रति तटस्थ थे, और ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, नाग तथा चारण —
श्लोक 62 (2.70.62)
ते वै स्तुवन्ति गोविन्दं दिव्यैर्मङ्गलसंयुतैः । परस्परं च नृत्यन्ति गीतेन विविधेन च । उपतिष्ठन्ति गोविन्दं प्रीतियुक्ता महात्मनि ॥
te vai stuvanti govindaṃ divyairmaṅgalasaṃyutaiḥ | parasparaṃ ca nṛtyanti gītena vividhena ca | upatiṣṭhanti govindaṃ prītiyuktā mahātmani
वे दिव्य, मंगलमय स्तुतियों से गोविन्द का स्तवन करने लगे, नाना प्रकार के गीतों के साथ परस्पर नाचने लगे, और प्रेम से भरकर उन महात्मा गोविन्द की सेवा में उपस्थित हुए।
श्लोक 63 (2.70.63)
प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षयः । ब्राह्मणाश्चापि सुप्रीताः पाण्डवाश्च महाबलाः ॥
prahṛṣṭāḥ keśavaṃ jagmuḥ saṃstuvanto maharṣayaḥ | brāhmaṇāścāpi suprītāḥ pāṇḍavāśca mahābalāḥ
महर्षि हर्षित होकर स्तुति करते हुए केशव के पास गए; अत्यन्त प्रसन्न ब्राह्मण और महाबली पाण्डव भी गए।
श्लोक 64 (2.70.64)
पाण्डवस्त्वब्रवीद्भातॄन्सत्कारेण महीपतिम् । दमघोषात्मजं शूरं संस्कारयत मा चिरम् ॥
pāṇḍavastvabravīdbhātṝnsatkāreṇa mahīpatim | damaghoṣātmajaṃ śūraṃ saṃskārayata mā ciram
पाण्डव (युधिष्ठिर) ने अपने भाइयों से कहा — "दमघोष के वीर पुत्र राजा का सत्कारपूर्वक शीघ्र अन्त्य-संस्कार करो।"
श्लोक 65 (2.70.65)
कुरुराजवचः श्रुत्वा भ्रातरस्ते त्वरान्विताः । तथा च कृतवन्तस्ते भ्रातुर्वै शासनं तदा ॥
kururājavacaḥ śrutvā bhrātaraste tvarānvitāḥ | tathā ca kṛtavantaste bhrāturvai śāsanaṃ tadā
कुरुराज के वचन सुनकर उनके भाइयों ने शीघ्रता की और अपने भाई की आज्ञा का पालन किया।
श्लोक 66 (2.70.66)
चेदीनामाधिपत्ये च पुत्रं तस्याज्ञया हरेः । अभ्यषिञ्चत तं पार्थः सहितैर्वसुधाधिपैः ॥
cedīnāmādhipatye ca putraṃ tasyājñayā hareḥ | abhyaṣiñcata taṃ pārthaḥ sahitairvasudhādhipaiḥ
और हरि की आज्ञा से पार्थ ने राजाओं के साथ मिलकर शिशुपाल के पुत्र का चेदि-राज्य पर अभिषेक किया।