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सभा पर्व · अध्याय 71

राजसूय यज्ञ का वैभव

शिशुपाल के मारे जाने के बाद युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ श्रीकृष्ण के संरक्षण में आगे बढ़ता है; व्यास और धौम्य आदि सोलह ऋत्विज उसे सम्पन्न कराते हैं और सहदेव उसकी व्यवस्था सँभालते हैं। वर्णन में उसके सुवर्ण-तोरणों और पात्रों, ब्राह्मणों के निरन्तर भोजन — जिसमें हर एक लाख के भोजन पर शंख बजता था — अन्न के पर्वतों और घी के सरोवरों, विद्वानों के शास्त्रार्थ, तथा दिव्य गायकों और अप्सराओं का चित्रण है। सब वर्णों और देशों के लोग वहाँ उमड़ पड़ते हैं; भीष्म, द्रोण, दुर्योधन और वृष्णि सेवकों की भाँति काम करते हैं, और युधिष्ठिर राजाओं से मिले सारे रत्न ब्राह्मणों को दान कर देते हैं।

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.71.1)

ततः प्रववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः । शान्तविघ्नार्हणक्षोभो महर्षिगणसङ्कुलः ॥

tataḥ pravavṛte yajño dharmarājasya dhīmataḥ | śāntavighnārhaṇakṣobho maharṣigaṇasaṅkulaḥ

तब बुद्धिमान धर्मराज का यज्ञ आरम्भ हुआ; उसके विघ्न शान्त हो गए थे, सत्कार की विधियाँ बिना किसी अव्यवस्था के सम्पन्न हो रही थीं, और वह महर्षियों के समूहों से भरा हुआ था।

श्लोक 2 (2.71.2)

तं तु यज्ञं महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दनः । ररक्ष भगवाञ्छौरिः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ॥

taṃ tu yajñaṃ mahābāhurāsamāpterjanārdanaḥ | rarakṣa bhagavāñchauriḥ śārṅgacakragadādharaḥ

शार्ङ्ग धनुष, चक्र और गदा धारण करने वाले महाबाहु भगवान शौरि जनार्दन ने उस यज्ञ की समाप्ति तक रक्षा की।

श्लोक 3 (2.71.3)

तस्मिन्यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः । हेतुवादान्बहून्प्राहुः परपक्षजिगीषवः ॥

tasminyajñe pravṛtte tu vāgmino hetuvādinaḥ | hetuvādānbahūnprāhuḥ parapakṣajigīṣavaḥ

यज्ञ चलते समय वाक्पटु तार्किक, विपक्ष को जीतने की इच्छा से, अनेक तर्कपूर्ण वाद प्रस्तुत करते थे।

श्लोक 4 (2.71.4)

ददृशुस्ते नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । उपेन्द्रस्येव विहितं सहदेवेन भारत ॥

dadṛśuste nṛpatayo yajñasya vidhimuttamam | upendrasyeva vihitaṃ sahadevena bhārata

हे भारत, राजाओं ने यज्ञ की वह उत्तम व्यवस्था देखी, जिसे सहदेव ने मानो स्वयं उपेन्द्र की भाँति रचा था।

श्लोक 5 (2.71.5)

तद्यज्ञे न्यवसन्राजन्ब्राह्मणा भृशमुत्सुकाः । कथयन्तः कथाः पुण्याः पश्यन्तो नटनर्तकान् ॥

tadyajñe nyavasanrājanbrāhmaṇā bhṛśamutsukāḥ | kathayantaḥ kathāḥ puṇyāḥ paśyanto naṭanartakān

हे राजन्, उस यज्ञ में ब्राह्मण अत्यन्त उत्साह से रहते थे; वे पुण्य कथाएँ कहते और नटों तथा नर्तकों को देखते थे।

श्लोक 6 (2.71.6)

ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च । दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा ॥

dadṛśustoraṇānyatra hematālamayāni ca | dīptabhāskaratulyāni pradīptānīva tejasā

उन्होंने वहाँ ताड़ के आकार के सुवर्ण-तोरण देखे, जो प्रदीप्त सूर्य के समान थे और तेज से मानो जल रहे थे।

श्लोक 7 (2.71.7)

स यज्ञस्तोरणैस्तत्र ग्रहैर्द्योरिव सम्बभौ । शय्यासनविहारांश्च सुबहून्रत्नसंवृतान् ॥

sa yajñastoraṇaistatra grahairdyoriva sambabhau | śayyāsanavihārāṃśca subahūnratnasaṃvṛtān

उन तोरणों से वह यज्ञ ग्रहों से युक्त आकाश की भाँति शोभा पा रहा था। रत्नों से जड़े बहुत-से पलंग, आसन और विहार-स्थान,

श्लोक 8 (2.71.8)

घटान्पात्रीकटाहानि कलशानि समन्ततः । न ते किञ्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवाः ॥

ghaṭānpātrīkaṭāhāni kalaśāni samantataḥ | na te kiñcidasauvarṇamapaśyaṃstatra pārthivāḥ

घड़े, थालियाँ, कड़ाह और कलश चारों ओर थे — राजाओं ने वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं देखा जो सोने का न हो।

श्लोक 9 (2.71.9)

भुञ्जानानां च विप्राणां स्वादुभोज्यैः पृथग्विधैः । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् ॥

bhuñjānānāṃ ca viprāṇāṃ svādubhojyaiḥ pṛthagvidhaiḥ | aniśaṃ śrūyate tatra muditānāṃ mahātmanām

नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन करते हुए उन प्रसन्न महात्मा ब्राह्मणों के बीच निरन्तर सुनाई देता था —

श्लोक 10 (2.71.10)

दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवम्प्रकाराः सञ्जल्पाः श्रूयन्ते तत्र नित्यशः ॥

dīyatāṃ dīyatāmeṣāṃ bhujyatāṃ bhujyatāmiti | evamprakārāḥ sañjalpāḥ śrūyante tatra nityaśaḥ

"इन्हें दो, दो! खाइए, खाइए!" — ऐसी पुकारें वहाँ सदा सुनाई देती थीं।

श्लोक 11 (2.71.11)

ओदनानां विकाराणि स्वादूनि च बहूनि च । विविधानि च भक्ष्याणि पेयानि मधुराणि च ॥

odanānāṃ vikārāṇi svādūni ca bahūni ca | vividhāni ca bhakṣyāṇi peyāni madhurāṇi ca

चावल से बने अनेक स्वादिष्ट व्यंजन, भाँति-भाँति के पकवान और मधुर पेय

श्लोक 12 (2.71.12)

ददुर्द्विजानां सततं राजप्रेष्या महाध्वरे । पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुञ्जतां तदा ॥

dadurdvijānāṃ satataṃ rājapreṣyā mahādhvare | pūrṇe śatasahasre tu viprāṇāṃ bhuñjatāṃ tadā

उस महायज्ञ में राजसेवक द्विजों को निरन्तर देते रहते थे। जब भी पूरे एक लाख ब्राह्मण भोजन कर चुकते,

श्लोक 13 (2.71.13)

स्थापितस्तत्र सञ्ज्ञार्थं शङ्खोऽध्मायत नित्यशः । मुहुर्मुहुः प्रणादस्तु तस्य शङ्खस्य भारत ॥

sthāpitastatra sañjñārthaṃ śaṅkho'dhmāyata nityaśaḥ | muhurmuhuḥ praṇādastu tasya śaṅkhasya bhārata

तो संकेत के लिए वहाँ रखा गया शंख बजाया जाता; हे भारत, उस शंख का नाद बार-बार गूँजता था,

श्लोक 14 (2.71.14)

उत्तमः श्रूयते शब्दः श्रुत्वा विस्मयमागमन् । एवं प्रवृत्ते यज्ञे तु तुष्टपुष्टजनायुते ॥

uttamaḥ śrūyate śabdaḥ śrutvā vismayamāgaman | evaṃ pravṛtte yajñe tu tuṣṭapuṣṭajanāyute

और उसका उत्तम स्वर सुनकर लोग चकित हो जाते। इस प्रकार संतुष्ट और तृप्त जनों से भरा वह यज्ञ चलता रहा।

श्लोक 15 (2.71.15)

अन्नस्य बहुशो राजन्नुत्सेधाः पर्वतोपमाः । दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदाञ्जनाः ॥

annasya bahuśo rājannutsedhāḥ parvatopamāḥ | dadhikulyāśca dadṛśuḥ sarpiṣaśca hradāñjanāḥ

हे राजन्, अनेक स्थानों पर अन्न के पर्वत-जैसे ढेर थे; लोगों ने दही की नहरें और घी के सरोवर देखे।

श्लोक 16 (2.71.16)

जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुतः । राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्मिन्महाक्रतौ ॥

jambūdvīpo hi sakalo nānājanapadāyutaḥ | rājannadṛśyataikastho rājñastasminmahākratau

हे राजन्, अनेक जनपदों से युक्त सारा जम्बूद्वीप मानो राजा के उस महायज्ञ में एक ही स्थान पर एकत्र दिखाई देता था।

श्लोक 17 (2.71.17)

तत्र राजसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः । गृहीत्वा धनमाजग्मुस्तस्य राज्ञो महाक्रतौ ॥

tatra rājasahasrāṇi puruṣāṇāṃ tatastataḥ | gṛhītvā dhanamājagmustasya rājño mahākratau

वहाँ सब ओर से हज़ारों राजा और लोग धन लेकर राजा के उस महायज्ञ में आए।

श्लोक 18 (2.71.18)

राजानः स्रग्विणश्चैव संमृष्टमणिकुण्डलाः । तान्परीविविषुर्विप्राञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥

rājānaḥ sragviṇaścaiva saṃmṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ | tānparīviviṣurviprāñchataśo'tha sahasraśaḥ

मालाएँ पहने और चमकते मणि-कुण्डल धारण किए राजा सैकड़ों-हज़ारों ब्राह्मणों को भोजन परोसते थे।

श्लोक 19 (2.71.19)

विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च । तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्मणेभ्यो ददुः स्म ते ॥

vividhānyannapānāni lehyāni vividhāni ca | teṣāṃ nṛpopabhogyāni brāhmaṇebhyo daduḥ sma te

राजाओं के उपभोग योग्य नाना प्रकार के अन्न-पान और भाँति-भाँति के चाटने योग्य व्यंजन वे ब्राह्मणों को देते थे।

श्लोक 20 (2.71.20)

नानाविधानि भक्ष्याणि स्वादुपुष्पफलानि च । गुलानि स्वादुक्षौद्राणि ददुस्ते ब्राह्मणेषु वै ॥

nānāvidhāni bhakṣyāṇi svādupuṣpaphalāni ca | gulāni svādukṣaudrāṇi daduste brāhmaṇeṣu vai

अनेक प्रकार की मिठाइयाँ, स्वादिष्ट फूल और फल, गुड़ और मीठा मधु वे ब्राह्मणों को देते थे।

श्लोक 21 (2.71.21)

एतानि सततं भुक्त्वा तस्मिन्यज्ञे द्विजातयः । परां प्रीतिं ययुः सर्वे मोदमानास्ततस्ततः ॥

etāni satataṃ bhuktvā tasminyajñe dvijātayaḥ | parāṃ prītiṃ yayuḥ sarve modamānāstatastataḥ

उस यज्ञ में इन्हें निरन्तर खाकर सब द्विज परम प्रसन्न हुए और जहाँ-तहाँ आनन्द मनाने लगे।

श्लोक 22 (2.71.22)

एवं प्रमुदितं सर्वं बहुशो धनधान्यवत् । यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः ॥

evaṃ pramuditaṃ sarvaṃ bahuśo dhanadhānyavat | yajñavāṭaṃ nṛpā dṛṣṭvā vismayaṃ paramaṃ yayuḥ

धन-धान्य से भरपूर, सब ओर आनन्दित उस यज्ञशाला को देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 23 (2.71.23)

यथावद्धूयमानाग्निं राजसूयं महाक्रतुम् । पाण्डवस्य यथाशास्त्रं जुहुवुः सर्वयाजकाः ॥

yathāvaddhūyamānāgniṃ rājasūyaṃ mahākratum | pāṇḍavasya yathāśāstraṃ juhuvuḥ sarvayājakāḥ

सब याजकों ने पाण्डव के महायज्ञ राजसूय में, जिसकी अग्नियों में विधिवत् आहुतियाँ दी जा रही थीं, शास्त्र के अनुसार हवन किया।

श्लोक 24 (2.71.24)

व्यासधौम्यादयः सर्वे विधिवत्षोडशर्त्विजः । स्वस्वकर्माणि चक्रुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ ॥

vyāsadhaumyādayaḥ sarve vidhivatṣoḍaśartvijaḥ | svasvakarmāṇi cakruste pāṇḍavasya mahākratau

व्यास, धौम्य आदि सोलह ऋत्विजों ने पाण्डव के महायज्ञ में विधिपूर्वक अपने-अपने कर्म किए।

श्लोक 25 (2.71.25)

नाषडङ्गविदत्रासीत्सदस्यो नाबहुश्रुतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न पापो नाक्षमो द्विजः ॥

nāṣaḍaṅgavidatrāsītsadasyo nābahuśrutaḥ | nāvrato nānupādhyāyo na pāpo nākṣamo dvijaḥ

वहाँ कोई सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों वेदांगों का ज्ञाता न हो या बहुश्रुत न हो; कोई ब्राह्मण व्रतहीन, गुरुहीन, पापी या असमर्थ नहीं था।

श्लोक 26 (2.71.26)

न तत्र कृपणः कश्चिद्दरिद्रो न बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुषः ॥

na tatra kṛpaṇaḥ kaściddaridro na babhūva ha | kṣudhito duḥkhito vāpi prākṛto vāpi mānuṣaḥ

वहाँ कोई दीन या दरिद्र नहीं था; कोई भूखा, दुखी या हीन दशा वाला मनुष्य भी नहीं था।

श्लोक 27 (2.71.27)

भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा । सहदेवो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥

bhojanaṃ bhojanārthibhyo dāpayāmāsa sarvadā | sahadevo mahātejāḥ satataṃ rājaśāsanāt

महातेजस्वी सहदेव राजा की आज्ञा से भोजन चाहने वाले सब लोगों को सदा भोजन दिलवाते थे।

श्लोक 28 (2.71.28)

संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकर्माणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुषः ॥

saṃstare kuśalāścāpi sarvakarmāṇi yājakāḥ | divase divase cakruryathāśāstrārthacakṣuṣaḥ

और यज्ञ-विधान में कुशल याजक, शास्त्रों के अर्थ पर दृष्टि रखते हुए, प्रतिदिन सब कर्म करते थे।

श्लोक 29 (2.71.29)

ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञाः कथाश्चक्रुश्च सर्वतः । रेमिरे च कथान्ते तु सर्वे तस्मिन्महाक्रतौ ॥

brāhmaṇā vedaśāstrajñāḥ kathāścakruśca sarvataḥ | remire ca kathānte tu sarve tasminmahākratau

वेद और शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण सब ओर कथा-प्रवचन करते थे, और कथा समाप्त होने पर सब उस महायज्ञ में आनन्द करते थे।

श्लोक 30 (2.71.30)

सा वेदिर्वेदसम्पन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः । आबभासे तदा कीर्णा नक्षत्रैर्द्यौरिवामला ॥

sā vedirvedasampannairdevadvijamaharṣibhiḥ | ābabhāse tadā kīrṇā nakṣatrairdyaurivāmalā

वेद-सम्पन्न देवताओं, ब्राह्मणों और महर्षियों से भरी वह वेदी तब नक्षत्रों से जड़े निर्मल आकाश की भाँति चमक रही थी।

श्लोक 31 (2.71.31)

पाण्डित्यदर्शनार्थाय केचन द्विजसत्तमाः । तर्कार्थमागताः केचित्केचिद्विद्याभिमानिनः ॥

pāṇḍityadarśanārthāya kecana dvijasattamāḥ | tarkārthamāgatāḥ kecitkecidvidyābhimāninaḥ

कुछ श्रेष्ठ द्विज अपना पाण्डित्य दिखाने आए थे, कुछ शास्त्रार्थ के लिए, और कुछ अपनी विद्या के अभिमानी थे;

श्लोक 32 (2.71.32)

केचिद्दिदृक्षया केचिद्भीत्या राज्ञः प्रतापिनः । सर्वेऽप्यवभृथस्नाता याजकाः केचन द्विजाः ॥

keciddidṛkṣayā kecidbhītyā rājñaḥ pratāpinaḥ | sarve'pyavabhṛthasnātā yājakāḥ kecana dvijāḥ

कुछ देखने की इच्छा से, कुछ प्रतापी राजा के भय से आए थे; और याजक तथा अन्य ब्राह्मण, सबने अवभृथ-स्नान किया।

श्लोक 33 (2.71.33)

ततो वै हेमयूपांश्च सर्वरत्नसमाचितान् । शोभार्थं कारयामास सहदेवो महाद्युतिः ॥

tato vai hemayūpāṃśca sarvaratnasamācitān | śobhārthaṃ kārayāmāsa sahadevo mahādyutiḥ

तब महातेजस्वी सहदेव ने शोभा के लिए सब प्रकार के रत्नों से जड़े सुवर्ण-यूप बनवाए।

श्लोक 34 (2.71.34)

ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च । स यज्ञस्तोरणैस्तैश्च ग्रहैर्द्योरिव सम्बभौ ॥

dadṛśustoraṇānyatra hematālamayāni ca | sa yajñastoraṇaistaiśca grahairdyoriva sambabhau

उन्होंने वहाँ ताड़ के आकार के सुवर्ण-तोरण देखे, और उन तोरणों से वह यज्ञ ग्रहों से युक्त आकाश की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 35 (2.71.35)

तालानां तोरणैर्हैमैर्दान्तैरिव दिशागजैः । दिक्षु सर्वासु विन्यस्तैस्तेजोभिर्भास्करैर्यथा ॥

tālānāṃ toraṇairhaimairdāntairiva diśāgajaiḥ | dikṣu sarvāsu vinyastaistejobhirbhāskarairyathā

सब दिशाओं में स्थापित ताड़ के आकार के सुवर्ण-तोरण दाँतों वाले दिग्गजों के समान लगते थे और सूर्यों की भाँति तेजस्वी थे।

श्लोक 36 (2.71.36)

सकिरीटैर्नृपैश्चैव शुशुभे तत्सदस्तदा । देवैर्दिव्यैश्च यक्षैश्च उरगैर्दिव्यमानुषैः ॥

sakirīṭairnṛpaiścaiva śuśubhe tatsadastadā | devairdivyaiśca yakṣaiśca uragairdivyamānuṣaiḥ

वह सभा तब मुकुटधारी राजाओं से, और देवताओं, दिव्य प्राणियों, यक्षों, नागों तथा दिव्य मनुष्यों से शोभित थी;

श्लोक 37 (2.71.37)

विद्याधरगणैः कीर्णः पाण्डवस्य महात्मनः । स राजसूयः शुशुभे धर्मराजस्य धीमतः ॥

vidyādharagaṇaiḥ kīrṇaḥ pāṇḍavasya mahātmanaḥ | sa rājasūyaḥ śuśubhe dharmarājasya dhīmataḥ

विद्याधरों के समूहों से भरा, महात्मा पाण्डव बुद्धिमान धर्मराज का वह राजसूय अत्यन्त शोभायमान था।

श्लोक 38 (2.71.38)

गन्धर्वगणसङ्कीर्णः शोभितोऽप्सरसां गणैः । देवैर्मुनिगणैर्यक्षैर्देवलोक इवापरः ॥

gandharvagaṇasaṅkīrṇaḥ śobhito'psarasāṃ gaṇaiḥ | devairmunigaṇairyakṣairdevaloka ivāparaḥ

गन्धर्वों के समूहों से भरा, अप्सराओं के गणों से सुशोभित, देवताओं, मुनियों और यक्षों से युक्त वह दूसरा देवलोक-सा लगता था।

श्लोक 39 (2.71.39)

स किम्पुरुषगीतैश्च किन्नरैरुपशोभितः । नारदश्च जगौ तत्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः ॥

sa kimpuruṣagītaiśca kinnarairupaśobhitaḥ | nāradaśca jagau tatra tumburuśca mahādyutiḥ

वह किम्पुरुषों के गीतों और किन्नरों से सुशोभित था; वहाँ नारद गाते थे, और महातेजस्वी तुम्बुरु भी;

श्लोक 40 (2.71.40)

विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथाऽन्ये गीतकोविदाः । रमयन्ति स्म तान्सर्वान्यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ॥

viśvāvasuścitrasenastathā'nye gītakovidāḥ | ramayanti sma tānsarvānyajñakarmāntareṣvatha

विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीत-मर्मज्ञ यज्ञ-कर्मों के बीच के अवकाशों में उन सबका मनोरंजन करते थे।

श्लोक 41 (2.71.41)

तत्र चाप्सरसः सर्वाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः । ननृतुश्च जगुश्चात्र नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ॥

tatra cāpsarasaḥ sarvāḥ sundaryaḥ priyadarśanāḥ | nanṛtuśca jaguścātra nityaṃ karmāntareṣvatha

वहाँ सब सुन्दर, प्रियदर्शना अप्सराएँ कर्मों के अवकाशों में सदा नाचती और गाती थीं।

श्लोक 42 (2.71.42)

इतिहासपुराणानि आख्यानानि च सर्वशः । ऊचुर्वै शब्दशास्त्रज्ञा नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ॥

itihāsapurāṇāni ākhyānāni ca sarvaśaḥ | ūcurvai śabdaśāstrajñā nityaṃ karmāntareṣvatha

व्याकरण-शास्त्र के ज्ञाता कर्मों के अवकाशों में सदा इतिहास, पुराण और सब प्रकार के आख्यान सुनाते थे।

श्लोक 43 (2.71.43)

भेर्यश्च मुरजाश्चैव मड्डुका गोमुखाश्च ये । शृङ्गवंशाम्बुजा वीणाः श्रूयन्ते स्म सहस्रशः ॥

bheryaśca murajāścaiva maḍḍukā gomukhāśca ye | śṛṅgavaṃśāmbujā vīṇāḥ śrūyante sma sahasraśaḥ

भेरियाँ और मुरज, मड्डुक और गोमुख, सींग, बाँसुरियाँ, शंख और वीणाएँ हज़ारों की संख्या में सुनाई देती थीं।

श्लोक 44 (2.71.44)

लोकेऽस्मिन्सर्वविप्राश्च वैश्याः शूद्रा नृपादयः । सर्वे म्लेच्छाः सर्वगणास्त्वादिमध्यान्तजास्तथा ॥

loke'sminsarvaviprāśca vaiśyāḥ śūdrā nṛpādayaḥ | sarve mlecchāḥ sarvagaṇāstvādimadhyāntajāstathā

इस लोक के सब ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, राजा आदि, सब म्लेच्छ, और आदि, मध्य तथा अन्त्य वर्गों में जन्मे सब प्रकार के लोग —

श्लोक 45 (2.71.45)

नानादेशसमुद्भूतैर्नानाजातिभिरागतैः । पर्याप्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ॥

nānādeśasamudbhūtairnānājātibhirāgataiḥ | paryāpta iva loko'yaṃ yudhiṣṭhiraniveśane

अनेक देशों में उत्पन्न, अनेक जातियों के लोग वहाँ आए थे, मानो यह सारा संसार युधिष्ठिर के निवास में समा गया हो।

श्लोक 46 (2.71.46)

भीष्मद्रोणादयः सर्वे कुरवः ससुयोधनाः । वृष्णयश्च समग्राश्च पाञ्चालाश्चापि सर्वशः ॥

bhīṣmadroṇādayaḥ sarve kuravaḥ sasuyodhanāḥ | vṛṣṇayaśca samagrāśca pāñcālāścāpi sarvaśaḥ

भीष्म, द्रोण आदि, सुयोधन सहित सब कुरु, सब वृष्णि और सब पाञ्चाल

श्लोक 47 (2.71.47)

यज्ञेऽस्मिन्सर्वकर्माणि चक्रुर्दासा इव क्रतौ । एवं प्रवृत्तो यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः ॥

yajñe'sminsarvakarmāṇi cakrurdāsā iva kratau | evaṃ pravṛtto yajñaḥ sa dharmarājasya dhīmataḥ

इस यज्ञ में सेवकों की भाँति सब काम करते थे। इस प्रकार बुद्धिमान धर्मराज का वह यज्ञ चलता रहा,

श्लोक 48 (2.71.48)

शुशुभे च महाबाहो सोमस्येव क्रतुर्यथा । वस्त्राणि कम्बलांश्चैव प्रावारांश्चैव सर्वदा ॥

śuśubhe ca mahābāho somasyeva kraturyathā | vastrāṇi kambalāṃścaiva prāvārāṃścaiva sarvadā

और हे महाबाहो, वह सोम के यज्ञ के समान शोभित हुआ। वस्त्र, कम्बल और ओढ़ने के वस्त्र सदा,

श्लोक 49 (2.71.49)

निष्कहेमजभाण्डानि भूषणानि च सर्वशः । प्रददौ तत्र विप्राणां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

niṣkahemajabhāṇḍāni bhūṣaṇāni ca sarvaśaḥ | pradadau tatra viprāṇāṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

स्वर्ण-मुद्राएँ, सोने के पात्र और सब प्रकार के आभूषण धर्मराज युधिष्ठिर ने वहाँ ब्राह्मणों को दिए।

श्लोक 50 (2.71.50)

यानि तत्र महीपालैर्लब्धवान्भरतर्षभः । तानि सर्वाणि रत्नानि ब्राह्मणानां ददौ तदा ॥

yāni tatra mahīpālairlabdhavānbharatarṣabhaḥ | tāni sarvāṇi ratnāni brāhmaṇānāṃ dadau tadā

भरतश्रेष्ठ ने राजाओं से जो-जो रत्न प्राप्त किए थे, वे सब उन्होंने तब ब्राह्मणों को दे दिए।

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