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सभा पर्व · अध्याय 72

राजसूय की समाप्ति और श्रीकृष्ण का द्वारका-गमन

भारी दान-दक्षिणा के साथ राजसूय यज्ञ सम्पन्न होता है। अवभृथ-स्नान के बाद युधिष्ठिर व्यास आदि ऋषियों का, फिर श्रीकृष्ण, बलराम और कुरुवंश के वृद्धों का पूजन करते हैं। आए हुए राजा विदा लेते हैं और पाण्डव भाई उन्हें राज्य की सीमा तक पहुँचाते हैं। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर और कुन्ती से विदा लेकर द्वारका को प्रस्थान करते हैं, जबकि दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन उसी सभा-भवन में ठहरे रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.72.1)

ततः स कुरुराजस्य सर्वकर्मसमृद्धिमान् । यज्ञः प्रीतिकरो राजन्संबभौ विपुलोत्सवः ॥

tataḥ sa kururājasya sarvakarmasamṛddhimān | yajñaḥ prītikaro rājansaṃbabhau vipulotsavaḥ

हे राजन्, तब कुरुराज का वह यज्ञ, जो सभी कर्मों से समृद्ध और सबको आनन्द देने वाला था, एक विशाल उत्सव के रूप में शोभित हुआ।

श्लोक 2 (2.72.2)

शान्तविघ्नः सुखारम्भः प्रभूतधनधान्यवान् । अन्नवान्बहुभक्ष्यश्च केशवेन सुरक्षितः ॥

śāntavighnaḥ sukhārambhaḥ prabhūtadhanadhānyavān | annavānbahubhakṣyaśca keśavena surakṣitaḥ

उसके सभी विघ्न शान्त हो गए थे और उसका आरम्भ सुखपूर्वक हुआ था; वह धन-धान्य से भरपूर था, अन्न और अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों से सम्पन्न था, और केशव उसकी रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 3 (2.72.3)

समापयामास च तं राजसूयं महाक्रतुम् । कोटिसहस्रं प्रददौ ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥

samāpayāmāsa ca taṃ rājasūyaṃ mahākratum | koṭisahasraṃ pradadau brāhmaṇānāṃ mahātmanām

और उन्होंने उस महान् क्रतु राजसूय को सम्पन्न किया। उन्होंने महात्मा ब्राह्मणों को सहस्र करोड़ (मुद्राएँ) दान में दीं,

श्लोक 4 (2.72.4)

न करिष्यति तं लोके कश्चिदन्यो महीपतिः । याजकाः सर्वकामैश्च सततं ततृपुर्धनैः ॥

na kariṣyati taṃ loke kaścidanyo mahīpatiḥ | yājakāḥ sarvakāmaiśca satataṃ tatṛpurdhanaiḥ

ऐसा दान संसार में कोई दूसरा राजा नहीं करेगा। यज्ञ कराने वाले ऋत्विज् धन से और सभी मनचाही वस्तुओं से निरन्तर तृप्त होते रहे।

श्लोक 5 (2.72.5)

ततश्चावभृथस्नातः स राजा पाण्डुनन्दनः । व्यासं धौम्यं वसिष्ठं च नारदं च महामुनिम् ॥

tataścāvabhṛthasnātaḥ sa rājā pāṇḍunandanaḥ | vyāsaṃ dhaumyaṃ vasiṣṭhaṃ ca nāradaṃ ca mahāmunim

तब अवभृथ-स्नान करके पाण्डुनन्दन राजा ने व्यास, धौम्य, वसिष्ठ और महामुनि नारद का,

श्लोक 6 (2.72.6)

सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च । याज्ञवल्क्यं च कपिलं कपालं कौशिकं तथा । सर्वांश्च ऋत्विक्प्रवरान्पूजयामास सत्कृतान् ॥

sumantuṃ jaiminiṃ pailaṃ vaiśampāyanameva ca | yājñavalkyaṃ ca kapilaṃ kapālaṃ kauśikaṃ tathā | sarvāṃśca ṛtvikpravarānpūjayāmāsa satkṛtān

सुमन्तु, जैमिनि, पैल और वैशम्पायन का भी, याज्ञवल्क्य, कपिल, कपाल और कौशिक का पूजन किया; और सभी श्रेष्ठ ऋत्विजों का भी आदरपूर्वक सत्कार किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (2.72.7)

युष्मत्प्रसादात्प्राप्तोऽयं राजसूयो महाक्रतुः । जनार्दनप्रसादाद्धि सम्पूर्णो मे मनोरथः ॥

yuṣmatprasādātprāpto'yaṃ rājasūyo mahākratuḥ | janārdanaprasādāddhi sampūrṇo me manorathaḥ

"आप लोगों की कृपा से मुझे यह महान् राजसूय यज्ञ प्राप्त हुआ है, और जनार्दन की कृपा से मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (2.72.8)

अथ यज्ञं समाप्यान्ते पूजयामास माधवम् । बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्च कुरूद्वहान् ॥

atha yajñaṃ samāpyānte pūjayāmāsa mādhavam | baladevaṃ ca deveśaṃ bhīṣmādyāṃśca kurūdvahān

फिर यज्ञ समाप्त करके अन्त में उन्होंने माधव का, देवेश बलदेव का और भीष्म आदि कुरुश्रेष्ठों का पूजन किया।

श्लोक 9 (2.72.9)

ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समस्तं पार्थिवं क्षत्रमुपगम्येदमब्रवीत् ॥

tatastvavabhṛthasnātaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | samastaṃ pārthivaṃ kṣatramupagamyedamabravīt

तब अवभृथ-स्नान कर चुके धर्मात्मा युधिष्ठिर के पास सारे क्षत्रिय राजा आए और बोले —

राजान ऊचुः

श्लोक 10 (2.72.10)

दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवानसि । आजमीढाजमीढानां यशः संवर्धितं त्वया ॥

diṣṭyā vardhasi dharmajña sāmrājyaṃ prāptavānasi | ājamīḍhājamīḍhānāṃ yaśaḥ saṃvardhitaṃ tvayā

"हे धर्मज्ञ, सौभाग्य की बात है कि आपका उत्कर्ष हो रहा है और आपने साम्राज्य प्राप्त कर लिया है। हे अजमीढवंशी, आपने अजमीढवंशियों का यश बढ़ाया है।

श्लोक 11 (2.72.11)

कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्च सुमहान्कृतः । आपृच्छामो नरव्याघ्र सर्वकामैः सुपूजिताः ॥

karmaṇaitena rājendra dharmaśca sumahānkṛtaḥ | āpṛcchāmo naravyāghra sarvakāmaiḥ supūjitāḥ

"हे राजेन्द्र, इस कर्म से आपने महान् धर्म का सम्पादन किया है। हे नरश्रेष्ठ, सभी मनचाही वस्तुओं से भली-भाँति सम्मानित होकर हम आपसे विदा माँगते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (2.72.12)

स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि । श्रुत्वा तु वचनं राज्ञां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

svarāṣṭrāṇi gamiṣyāmastadanujñātumarhasi | śrutvā tu vacanaṃ rājñāṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

"हम अपने-अपने राज्यों को जाएँगे; आप हमें अनुमति दें।" राजाओं के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने

श्लोक 13 (2.72.13)

यथार्हं पूज्य नृपतीन्भ्रातॄन्सर्वानुवाच ह । राजानः सर्व एवैते प्रीत्याऽस्मान्समुपागताः ॥

yathārhaṃ pūjya nṛpatīnbhrātṝnsarvānuvāca ha | rājānaḥ sarva evaite prītyā'smānsamupāgatāḥ

यथायोग्य राजाओं का सत्कार करके अपने सब भाइयों से कहा — "ये सभी राजा प्रेमवश हमारे पास आए थे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 14 (2.72.14)

प्रस्थिताः स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छ्य परन्तपाः । अनुव्रजत भद्रं वो विषयान्तं नृपोत्तमान् ॥

prasthitāḥ svāni rāṣṭrāṇi māmāpṛcchya parantapāḥ | anuvrajata bhadraṃ vo viṣayāntaṃ nṛpottamān

"अब ये शत्रुओं को तपाने वाले राजा मुझसे विदा लेकर अपने-अपने राज्यों को जा रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो — इन श्रेष्ठ राजाओं को अपने राज्य की सीमा तक पहुँचा आओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (2.72.15)

भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिणः । यथार्हं नृपतीन्सर्वानेकैकं समनुव्रजन् ॥

bhrāturvacanamājñāya pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | yathārhaṃ nṛpatīnsarvānekaikaṃ samanuvrajan

भाई की आज्ञा मानकर धर्मपरायण पाण्डवों ने यथायोग्य एक-एक राजा के साथ जाकर उन्हें विदा किया।

श्लोक 16 (2.72.16)

विराटमन्वयात्तूर्णं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । धनञ्जयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम् ॥

virāṭamanvayāttūrṇaṃ dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | dhanañjayo yajñasenaṃ mahātmānaṃ mahāratham

प्रतापी धृष्टद्युम्न तुरन्त विराट के साथ गए; धनञ्जय महात्मा महारथी यज्ञसेन (द्रुपद) के साथ गए;

श्लोक 17 (2.72.17)

भीष्मं च धृतराष्ट्रं च भीमसेनो महाबलः । द्रोणं तु ससुतं वीरं सहदेवो युधां पतिः ॥

bhīṣmaṃ ca dhṛtarāṣṭraṃ ca bhīmaseno mahābalaḥ | droṇaṃ tu sasutaṃ vīraṃ sahadevo yudhāṃ patiḥ

महाबली भीमसेन भीष्म और धृतराष्ट्र के साथ गए; योद्धाओं के स्वामी सहदेव पुत्रसहित वीर द्रोण के साथ गए;

श्लोक 18 (2.72.18)

नकुलः सुबलं राजन्सहपुत्रं समन्वयात् । द्रौपदेयाः ससौभद्राः पार्वतीयान्महारथान् ॥

nakulaḥ subalaṃ rājansahaputraṃ samanvayāt | draupadeyāḥ sasaubhadrāḥ pārvatīyānmahārathān

हे राजन्, नकुल पुत्रसहित सुबल के साथ गए; द्रौपदी के पुत्र सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु) के साथ पर्वतीय महारथियों के साथ गए।

श्लोक 19 (2.72.19)

अन्वगच्छंस्तथैवान्यान्क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभाः । एवं सुपूजिताः सर्वे जग्मुर्विप्राः सहस्रशः ॥

anvagacchaṃstathaivānyānkṣatriyānkṣatriyarṣabhāḥ | evaṃ supūjitāḥ sarve jagmurviprāḥ sahasraśaḥ

इसी प्रकार अन्य क्षत्रियश्रेष्ठों ने शेष क्षत्रियों का अनुगमन किया। इस तरह भली-भाँति सम्मानित होकर हज़ारों ब्राह्मण भी चले गए।

श्लोक 20 (2.72.20)

गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठिरमुवाचेदं वासुदेवः प्रतापवान् ॥

gateṣu pārthivendreṣu sarveṣu brāhmaṇeṣu ca | yudhiṣṭhiramuvācedaṃ vāsudevaḥ pratāpavān

जब सभी राजा और सभी ब्राह्मण चले गए, तब प्रतापी वासुदेव ने युधिष्ठिर से कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 21 (2.72.21)

आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ॥

āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi dvārakāṃ kurunandana | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ diṣṭyā tvaṃ prāptavānasi

"हे कुरुनन्दन, मैं आपसे विदा लेता हूँ; मैं द्वारका जाऊँगा। सौभाग्य से आपने श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय सम्पन्न कर लिया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (2.72.22)

तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् । तव प्रसादाद्गोविन्द प्राप्तः क्रतुवरो मया ॥

tamuvācaivamuktastu dharmarājo janārdanam | tava prasādādgovinda prāptaḥ kratuvaro mayā

ऐसा कहे जाने पर धर्मराज ने जनार्दन से कहा — "हे गोविन्द, आपकी कृपा से ही मुझे यह श्रेष्ठ यज्ञ प्राप्त हुआ है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 23 (2.72.23)

क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद्वशे स्थितम् । उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम् ॥

kṣatraṃ samagramapi ca tvatprasādādvaśe sthitam | upādāya baliṃ mukhyaṃ māmeva samupasthitam

"आपकी ही कृपा से समस्त क्षत्रिय-समाज मेरे वश में है और श्रेष्ठ भेंट लेकर मेरे पास उपस्थित हुआ है।

श्लोक 24 (2.72.24)

कथं त्वद्गमनार्थं मे वाणी वितरतेऽनघ ॥

kathaṃ tvadgamanārthaṃ me vāṇī vitarate'nagha

"हे निष्पाप, आपके जाने की बात कहने को मेरी वाणी कैसे तैयार हो?

श्लोक 25 (2.72.25)

न ह्यहं त्वामृते वीरं रतिं प्राप्नोमि कर्हचित् । अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारका पुरी ॥

na hyahaṃ tvāmṛte vīraṃ ratiṃ prāpnomi karhacit | avaśyaṃ caiva gantavyā bhavatā dvārakā purī

"हे वीर, आपके बिना मुझे कभी आनन्द नहीं मिलता। फिर भी आपको द्वारका नगरी अवश्य जाना ही है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (2.72.26)

एवमुक्तः स धर्मात्मा युधिष्ठिरसहायवान् । अभिगम्याब्रवीत्प्रीतः पृथां पृथुयशा हरिः ॥

evamuktaḥ sa dharmātmā yudhiṣṭhirasahāyavān | abhigamyābravītprītaḥ pṛthāṃ pṛthuyaśā hariḥ

ऐसा कहे जाने पर धर्मात्मा, महायशस्वी हरि युधिष्ठिर के साथ पृथा (कुन्ती) के पास गए और प्रसन्न होकर बोले —

वासुदेव उवाच

श्लोक 27 (2.72.27)

साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः । सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि ॥

sāmrājyaṃ samanuprāptāḥ putrāste'dya pitṛṣvasaḥ | siddhārthā vasumantaśca sā tvaṃ prītimavāpnuhi

"हे बुआ, आपके पुत्रों ने आज साम्राज्य प्राप्त कर लिया है; वे सफल-मनोरथ और धनवान् हैं, अतः आप प्रसन्न हों।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (2.72.28)

अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे । सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजयत केशवः ॥

anujñātastvayā cāhaṃ dvārakāṃ gantumutsahe | subhadrāṃ draupadīṃ caiva sabhājayata keśavaḥ

"आपकी अनुमति हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ।" फिर केशव ने सुभद्रा और द्रौपदी को स्नेहपूर्वक प्रसन्न करके उनसे विदा ली।

श्लोक 29 (2.72.29)

निष्क्रम्यान्तःपुरात्तस्माद्युधिष्ठिरसहायवान् । स्नातश्च कृतजप्यश्च ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ॥

niṣkramyāntaḥpurāttasmādyudhiṣṭhirasahāyavān | snātaśca kṛtajapyaśca brāhmaṇānsvasti vācya ca

युधिष्ठिर के साथ अन्तःपुर से निकलकर उन्होंने स्नान किया, जप किया और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया।

श्लोक 30 (2.72.30)

ततो मेघवपुःप्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् । योजयित्वा महाबाहुर्दारुकः समुपस्थितः ॥

tato meghavapuḥprakhyaṃ syandanaṃ ca sukalpitam | yojayitvā mahābāhurdārukaḥ samupasthitaḥ

तब महाबाहु दारुक मेघ के समान दिखने वाले, भली-भाँति सजे हुए रथ को जोतकर ले आया।

श्लोक 31 (2.72.31)

उपस्थितं रथं दृष्ट्वा तार्क्ष्यप्रवरकेतनम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः ॥

upasthitaṃ rathaṃ dṛṣṭvā tārkṣyapravaraketanam | pradakṣiṇamupāvṛtya samāruhya mahāmanāḥ

गरुड़-चिह्नित श्रेष्ठ ध्वजा वाले रथ को उपस्थित देखकर उन महामना ने उसकी प्रदक्षिणा की और उस पर आरूढ़ हुए;

श्लोक 32 (2.72.32)

प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम् ॥

prayayau puṇḍarīkākṣastato dvāravatīṃ purīm

और फिर कमलनयन (श्रीकृष्ण) द्वारवती नगरी की ओर चल पड़े।

श्लोक 33 (2.72.33)

तं पद्भ्यामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितः श्रीमान्वासुदेवं महाबलम् ॥

taṃ padbhyāmanuvavrāja dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ śrīmānvāsudevaṃ mahābalam

श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ महाबली वासुदेव के पीछे-पीछे पैदल चले।

श्लोक 34 (2.72.34)

ततो मुहूर्तं सङ्गृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः । अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

tato muhūrtaṃ saṅgṛhya syandanapravaraṃ hariḥ | abravītpuṇḍarīkākṣaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

तब कमलनयन हरि ने क्षण भर के लिए अपने श्रेष्ठ रथ को रोककर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 35 (2.72.35)

अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशाम्पते । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः ॥

apramattaḥ sthito nityaṃ prajāḥ pāhi viśāmpate | parjanyamiva bhūtāni mahādrumamiva dvijāḥ

"हे प्रजानाथ, सदा सावधान रहकर प्रजा की रक्षा कीजिए — जैसे मेघ सब प्राणियों का और विशाल वृक्ष पक्षियों का पालन करता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (2.72.36)

बान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः । कृत्वा परस्परेणैव संवादं कृष्णपाण्डवौ ॥

bāndhavāstvopajīvantu sahasrākṣamivāmarāḥ | kṛtvā paraspareṇaiva saṃvādaṃ kṛṣṇapāṇḍavau

"आपके बन्धु-बान्धव आपके आश्रय में वैसे ही जीवन बिताएँ जैसे देवता सहस्राक्ष इन्द्र के आश्रय में।" इस प्रकार आपस में बातचीत करके कृष्ण और पाण्डव (युधिष्ठिर)

श्लोक 37 (2.72.37)

अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान्प्रति । गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नृप ॥

anyonyaṃ samanujñāpya jagmatuḥ svagṛhānprati | gate dvāravatīṃ kṛṣṇe sātvatapravare nṛpa

एक-दूसरे से विदा लेकर अपने-अपने घर चले गए। हे राजन्, सात्वतश्रेष्ठ कृष्ण के द्वारवती चले जाने पर

श्लोक 38 (2.72.38)

महादुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः । सूतपुत्रश्च राधेयः सह दुःशासनादिभिः ॥

mahāduryodhano rājā śakuniścāpi saubalaḥ | sūtaputraśca rādheyaḥ saha duḥśāsanādibhiḥ

महाराज दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि, सूतपुत्र राधेय (कर्ण) तथा दुःशासन आदि के साथ,

श्लोक 39 (2.72.39)

सर्वकामगुणोपेतैरर्च्यमानास्तु भारत । तस्यां सभायां दिव्यायामवसंस्तत्र पाण्डवैः ॥

sarvakāmaguṇopetairarcyamānāstu bhārata | tasyāṃ sabhāyāṃ divyāyāmavasaṃstatra pāṇḍavaiḥ

हे भारत, सभी मनचाही वस्तुओं से सत्कृत होकर उस दिव्य सभा में पाण्डवों के साथ रहते रहे।

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