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सभा पर्व · अध्याय 73

व्यास की भविष्यवाणी और युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा

यज्ञ के बाद व्यास युधिष्ठिर के पास आते हैं, उन्हें आशीर्वाद देते हैं और जाने को उद्यत होते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या नारद के बताए उत्पात शिशुपाल की मृत्यु से शान्त हो गए; तब व्यास भविष्यवाणी करते हैं कि तेरह वर्षों में युधिष्ठिर को निमित्त बनाकर, दुर्योधन के अपराध और भीम-अर्जुन के बल से, समस्त क्षत्रियों का विनाश होगा; और वे शिव के उस स्वप्न का वर्णन करते हैं जो युधिष्ठिर उस समय देखेंगे। व्याकुल युधिष्ठिर मरने का विचार करते हैं, पर अर्जुन के समझाने पर वे प्रतिज्ञा करते हैं कि तेरह वर्षों तक वे कोई कठोर वचन नहीं बोलेंगे और हर प्रकार की फूट से बचेंगे।

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.73.1)

अनुसंसार्य नृपतीन्पाण्डवाः पाण्डवाग्रजम् । अभिजग्मुर्महेष्वासा धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

anusaṃsārya nṛpatīnpāṇḍavāḥ pāṇḍavāgrajam | abhijagmurmaheṣvāsā dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

राजाओं को विदा करके महाधनुर्धर पाण्डव अपने अग्रज धर्मराज युधिष्ठिर के पास आए।

श्लोक 2 (2.73.2)

सोऽनुमेने महाबाहुर्भ्रातॄंश्च सुहृदस्तथा । शिष्यैः परिवृतो व्यासः पुरस्तात्समपद्यत ॥

so'numene mahābāhurbhrātṝṃśca suhṛdastathā | śiṣyaiḥ parivṛto vyāsaḥ purastātsamapadyata

महाबाहु राजा ने अपने भाइयों और सुहृदों का अभिनन्दन किया। तभी शिष्यों से घिरे व्यास उनके सामने आ उपस्थित हुए।

श्लोक 3 (2.73.3)

सोऽभ्ययादासनात्तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः । पाद्येनासनदानेन पितामहमपूजयत् ॥

so'bhyayādāsanāttūrṇaṃ bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | pādyenāsanadānena pitāmahamapūjayat

भाइयों से घिरे युधिष्ठिर तुरन्त आसन से उठकर उनकी ओर बढ़े और पाद्य तथा आसन देकर अपने पितामह का पूजन किया।

श्लोक 4 (2.73.4)

अथोपविश्य भगवान्काञ्चने परमासने । आस्यतामिति चोवाच धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

athopaviśya bhagavānkāñcane paramāsane | āsyatāmiti covāca dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

तब भगवान् व्यास उत्तम स्वर्ण-आसन पर बैठकर धर्मराज युधिष्ठिर से बोले — "बैठो।"

श्लोक 5 (2.73.5)

अथोपविष्टं राजानं भ्रातृभिः परिवारितम् । उवाच भगवान्व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारदः ॥

athopaviṣṭaṃ rājānaṃ bhrātṛbhiḥ parivāritam | uvāca bhagavānvyāsastattadvākyaviśāradaḥ

जब राजा भाइयों के साथ बैठ गए, तब प्रसंग के अनुकूल वचन बोलने में निपुण भगवान् व्यास ने कहा —

व्यास उवाच

श्लोक 6 (2.73.6)

दिष्ट्या वर्धसि कौन्तेय साम्राज्यं प्राप्य दुर्लभम् । वर्धिताः कुरवः सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वह ॥

diṣṭyā vardhasi kaunteya sāmrājyaṃ prāpya durlabham | vardhitāḥ kuravaḥ sarve tvayā kurukulodvaha

"हे कौन्तेय, सौभाग्य से तुम दुर्लभ साम्राज्य पाकर उन्नति कर रहे हो। हे कुरुकुल-धुरन्धर, तुम्हारे द्वारा सभी कुरुवंशी उन्नत हुए हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (2.73.7)

आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितोऽस्मि विशाम्पते । एवमुक्तः स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi pūjito'smi viśāmpate | evamuktaḥ sa kṛṣṇena dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

"हे प्रजानाथ, मैं सम्मानित हो चुका हूँ; अब तुमसे विदा लेकर जाऊँगा।" कृष्णद्वैपायन के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने

श्लोक 8 (2.73.8)

अभिवाद्योपसङ्गृह्य पितामहमथाब्रवीत् ॥

abhivādyopasaṅgṛhya pitāmahamathābravīt

अपने पितामह को प्रणाम करके, उनके चरण पकड़कर कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 9 (2.73.9)

संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ममोत्पन्नः सुदुर्लभः । तस्य नान्योऽस्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुङ्गव ॥

saṃśayo dvipadāṃ śreṣṭha mamotpannaḥ sudurlabhaḥ | tasya nānyo'sti vaktā vai tvāmṛte dvijapuṅgava

"हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, मेरे मन में एक ऐसा संशय उठा है जिसका समाधान अत्यन्त कठिन है; हे द्विजश्रेष्ठ, आपके अतिरिक्त उसका उत्तर देने वाला और कोई नहीं है।

श्लोक 10 (2.73.10)

उत्पातांस्त्रिविधान्प्राह नारदो भगवानृषिः । दिव्यांश्चैवान्तरिक्षांश्च पार्थिवांश्च पितामह ॥

utpātāṃstrividhānprāha nārado bhagavānṛṣiḥ | divyāṃścaivāntarikṣāṃśca pārthivāṃśca pitāmaha

"हे पितामह, भगवान् नारद ऋषि ने तीन प्रकार के उत्पात बताए थे — दिव्य, आन्तरिक्ष (आकाश के) और पार्थिव।

श्लोक 11 (2.73.11)

सुमहच्च फलं तेषां भवितेति न संशयः । अपि चैद्यस्य पतनाच्छान्तमौत्पातिकं महत् ॥

sumahacca phalaṃ teṣāṃ bhaviteti na saṃśayaḥ | api caidyasya patanācchāntamautpātikaṃ mahat

"इसमें सन्देह नहीं कि उनका फल बहुत बड़ा होगा। क्या चेदिराज के पतन से वह महान् उत्पात शान्त हो गया है?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (2.73.12)

राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः । कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमब्रवीत् ॥

rājñastu vacanaṃ śrutvā parāśarasutaḥ prabhuḥ | kṛṣṇadvaipāyano vyāsa idaṃ vacanamabravīt

राजा का वचन सुनकर पराशरनन्दन प्रभु कृष्णद्वैपायन व्यास ने यह कहा —

व्यास उवाच

श्लोक 13 (2.73.13)

त्रयोदश समा राजन्नुत्पातानां फलं महत् । सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशाम्पते ॥

trayodaśa samā rājannutpātānāṃ phalaṃ mahat | sarvakṣatravināśāya bhaviṣyati viśāmpate

"हे राजन्, तेरह वर्षों तक उन उत्पातों का महान् फल होगा; हे प्रजानाथ, वह समस्त क्षत्रियों के विनाश का कारण बनेगा।

श्लोक 14 (2.73.14)

त्वामेकं कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ । समेतं पार्थिवं क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥

tvāmekaṃ kāraṇaṃ kṛtvā kālena bharatarṣabha | sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ kṣayaṃ yāsyati bhārata | duryodhanāparādhena bhīmārjunabalena ca

"हे भरतश्रेष्ठ, समय आने पर केवल तुम्हें निमित्त बनाकर, दुर्योधन के अपराध से और भीम-अर्जुन के बल से, एकत्र हुए पृथ्वी के सारे क्षत्रिय नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 15 (2.73.15)

स्वप्नं द्रक्ष्यसि राजेन्द्र तस्मिन्काल उपस्थिते । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

svapnaṃ drakṣyasi rājendra tasminkāla upasthite | tatte'haṃ sampravakṣyāmi tannibodha yudhiṣṭhira

"हे राजेन्द्र, वह समय उपस्थित होने पर तुम एक स्वप्न देखोगे। मैं तुम्हें वह बताता हूँ; युधिष्ठिर, उसे ध्यान से सुनो।

श्लोक 16 (2.73.16)

यान्तं द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम् । नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम् ॥

yāntaṃ drakṣyasi rājendra kṣapānte tvaṃ vṛṣadhvajam | nīlakaṇṭhaṃ bhavaṃ sthāṇuṃ kapāliṃ tripurāntakam

"हे राजेन्द्र, रात्रि के अन्त में तुम वृषध्वज (शिव) को जाते हुए देखोगे — नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक;

श्लोक 17 (2.73.17)

उग्रं रुद्रं पशुपतिं महादेवमुमापतिम् । हरं शर्वं वृषं शूलिं पिनाकिं कृत्तिवाससम् ॥

ugraṃ rudraṃ paśupatiṃ mahādevamumāpatim | haraṃ śarvaṃ vṛṣaṃ śūliṃ pinākiṃ kṛttivāsasam

"उग्र, रुद्र, पशुपति, उमापति महादेव; हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी और चर्मवस्त्रधारी (कृत्तिवासा);

श्लोक 18 (2.73.18)

कैलासकूटप्रतिमे वृषभेऽवस्थितं शिवम् । निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम् ॥

kailāsakūṭapratime vṛṣabhe'vasthitaṃ śivam | nirīkṣamāṇaṃ satataṃ pitṛrājāśritāṃ diśam

"कैलास-शिखर के समान वृषभ पर आसीन शिव, जो निरन्तर पितृराज (यम) की दिशा की ओर देख रहे होंगे।

श्लोक 19 (2.73.19)

एवमीदृशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ॥

evamīdṛśakaṃ svapnaṃ drakṣyasi tvaṃ viśāmpate | mā tatkṛte hyanudhyāhi kālo hi duratikramaḥ

"हे प्रजानाथ, तुम ऐसा ही स्वप्न देखोगे। उसके कारण चिन्ता मत करना, क्योंकि काल का उल्लंघन करना कठिन है।

श्लोक 20 (2.73.20)

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति । अप्रमत्तः स्थितो दान्तः पृथिवीं परिपालय ॥

svasti te'stu gamiṣyāmi kailāsaṃ parvataṃ prati | apramattaḥ sthito dāntaḥ pṛthivīṃ paripālaya

"तुम्हारा कल्याण हो; मैं कैलास पर्वत को जाऊँगा। सावधान और संयमी रहकर पृथ्वी का पालन करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (2.73.21)

एवमुक्त्वा स भगवान्कैलासं पर्वतं ययौ । कृष्णद्वैपायनो व्यासः सह शिष्यैः सहानुगैः ॥

evamuktvā sa bhagavānkailāsaṃ parvataṃ yayau | kṛṣṇadvaipāyano vyāsaḥ saha śiṣyaiḥ sahānugaiḥ

ऐसा कहकर भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास अपने शिष्यों और अनुयायियों के साथ कैलास पर्वत को चले गए।

श्लोक 22 (2.73.22)

गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वितः । निःश्वसन्नुष्णमसकृत्तमेवार्थं विचिन्तयन् ॥

gate pitāmahe rājā cintāśokasamanvitaḥ | niḥśvasannuṣṇamasakṛttamevārthaṃ vicintayan

पितामह के चले जाने पर राजा चिन्ता और शोक से भर गए; वे बार-बार गरम साँसें लेते हुए उसी बात पर विचार करते रहे —

श्लोक 23 (2.73.23)

कथं तु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम् । अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा ॥

kathaṃ tu daivaṃ śakyeta pauruṣeṇa prabādhitum | avaśyameva bhavitā yaduktaṃ paramarṣiṇā

"दैव को पुरुषार्थ से कैसे रोका जा सकता है? परम ऋषि ने जो कहा है, वह अवश्य ही होगा।"

श्लोक 24 (2.73.24)

ततोऽब्रवीन्महातेजाः सर्वान्भ्रातॄन्युधिष्ठिरः । श्रुतं वै पुरुषव्याघ्रा यन्मां द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥

tato'bravīnmahātejāḥ sarvānbhrātṝnyudhiṣṭhiraḥ | śrutaṃ vai puruṣavyāghrā yanmāṃ dvaipāyano'bravīt

तब महातेजस्वी युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों से कहा — "हे पुरुषसिंहो, द्वैपायन ने मुझसे जो कहा, वह तुमने सुना।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 25 (2.73.25)

तदा तद्वचनं श्रुत्वा मरणे निश्चिता मतिः । सर्वक्षत्रस्य निधने यद्यहं हेतुरीप्सितः ॥

tadā tadvacanaṃ śrutvā maraṇe niścitā matiḥ | sarvakṣatrasya nidhane yadyahaṃ heturīpsitaḥ

"उनके वे वचन सुनकर मेरी बुद्धि ने मरने का निश्चय कर लिया है, यदि समस्त क्षत्रियों के विनाश का कारण मुझे ही बनना है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (2.73.26)

कालेन निर्मितस्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः । एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुनः प्रत्यभाषत ॥

kālena nirmitastāta ko mamārtho'sti jīvataḥ | evaṃ bruvantaṃ rājānaṃ phālgunaḥ pratyabhāṣata

"भाइयो, यदि काल ने मुझे इसी के लिए रचा है, तो मेरे जीवित रहने का क्या प्रयोजन?" राजा के ऐसा कहने पर फाल्गुन (अर्जुन) ने उत्तर दिया —

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (2.73.27)

मा राजन्कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम् । सम्प्रधार्य महाराज यत्क्षमं तत्समाचर ॥

mā rājankaśmalaṃ ghoraṃ praviśo buddhināśanam | sampradhārya mahārāja yatkṣamaṃ tatsamācara

"हे राजन्, बुद्धि को नष्ट करने वाले इस भयानक मोह में मत पड़िए। हे महाराज, भली-भाँति विचार करके जो उचित हो वही कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (2.73.28)

ततोऽब्रवीत्सत्यधृतिर्भ्रातॄन्सर्वान्युधिष्ठिरः । द्वैपायनस्य वचनं तत्रैव समचिन्तयत् ॥

tato'bravītsatyadhṛtirbhrātṝnsarvānyudhiṣṭhiraḥ | dvaipāyanasya vacanaṃ tatraiva samacintayat

तब सत्य में दृढ़ युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों से कहा; वे उस समय भी द्वैपायन के वचन पर ही विचार कर रहे थे —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 29 (2.73.29)

अद्यप्रभृति भद्रं वः प्रतिज्ञां मे निबोधत । त्रयोदश समास्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ॥

adyaprabhṛti bhadraṃ vaḥ pratijñāṃ me nibodhata | trayodaśa samāstāta ko mamārtho'sti jīvataḥ

"तुम्हारा कल्याण हो; आज से मेरी प्रतिज्ञा सुनो। भाइयो, इन तेरह वर्षों तक (और जीवित रहकर मेरा प्रयोजन ही क्या है?)

श्लोक 30 (2.73.30)

न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातॄनन्यांश्च पार्थिवान् । स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत्समुदाहरन् ॥

na pravakṣyāmi paruṣaṃ bhrātṝnanyāṃśca pārthivān | sthito nideśe jñātīnāṃ yokṣye tatsamudāharan

"मैं अपने भाइयों से या अन्य राजाओं से कभी कठोर वचन नहीं बोलूँगा। अपने जाति-बन्धुओं की आज्ञा में स्थित रहकर, इसी का उद्घोष करते हुए मैं इस व्रत में लगा रहूँगा।

श्लोक 31 (2.73.31)

एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च । भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रहः ॥

evaṃ me vartamānasya svasuteṣvitareṣu ca | bhedo na bhavitā loke bhedamūlo hi vigrahaḥ

"अपने पुत्रों और दूसरों के प्रति इस प्रकार आचरण करने से संसार में फूट नहीं होगी; और फूट ही कलह की जड़ है।

श्लोक 32 (2.73.32)

विग्रहं दूरतो रक्षन्प्रियाण्येव समाचरन् । वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभाः ॥

vigrahaṃ dūrato rakṣanpriyāṇyeva samācaran | vācyatāṃ na gamiṣyāmi lokeṣu manujarṣabhāḥ

"हे नरश्रेष्ठो, कलह से दूर रहकर और केवल प्रिय कार्य करते हुए मैं संसार में निन्दा का पात्र नहीं बनूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (2.73.33)

भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वचनं पाण्डवाः संनिशम्य तत् । तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रताः ॥

bhrāturjyeṣṭhasya vacanaṃ pāṇḍavāḥ saṃniśamya tat | tameva samavartanta dharmarājahite ratāḥ

अपने बड़े भाई का यह वचन सुनकर धर्मराज के हित में लगे पाण्डवों ने उसी का अनुसरण किया।

श्लोक 34 (2.73.34)

संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड्भ्रातृभिः सह । पितॄंस्तर्प्य यथान्यायं देवताश्च विशाम्पते ॥

saṃsatsu samayaṃ kṛtvā dharmarāḍbhrātṛbhiḥ saha | pitṝṃstarpya yathānyāyaṃ devatāśca viśāmpate

हे प्रजानाथ, भाइयों के साथ सभा में यह प्रतिज्ञा करके धर्मराज ने विधिपूर्वक पितरों और देवताओं का तर्पण किया।

श्लोक 35 (2.73.35)

कृतमङ्गलकल्याणो भ्रातृभिः परिवारितः । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥

kṛtamaṅgalakalyāṇo bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | gateṣu kṣatriyendreṣu sarveṣu bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, मंगल-कृत्य सम्पन्न हो जाने पर और सब क्षत्रिय राजाओं के चले जाने पर, भाइयों से घिरे हुए

श्लोक 36 (2.73.36)

युधिष्ठिरः सहामात्यः प्रविवेश पुरोत्तमम् । दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबलः । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप ॥

yudhiṣṭhiraḥ sahāmātyaḥ praviveśa purottamam | duryodhano mahārāja śakuniścāpi saubalaḥ | sabhāyāṃ ramaṇīyāyāṃ tatraivāste narādhipa

युधिष्ठिर ने मन्त्रियों के साथ अपने उत्तम नगर में प्रवेश किया। हे महाराज, हे नरेश, दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि उसी रमणीय सभा में ठहरे रहे।

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