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सभा पर्व · अध्याय 74

सभा में दुर्योधन का उपहास

शकुनि के साथ पाण्डवों की सभा में ठहरा दुर्योधन बार-बार उसके भ्रमों में पड़ता है — स्फटिक के फ़र्श को जल समझकर वस्त्र उठा लेता है, सूखी भूमि समझकर बावली में गिर पड़ता है और स्फटिक के द्वार से सिर टकरा बैठता है; भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव और सेवक उस पर हँसते हैं। ईर्ष्या से जलता हुआ हस्तिनापुर लौटकर वह शकुनि से कहता है कि वह पाण्डवों का वैभव सहन नहीं कर सकता, दैव ही प्रबल है और उसका पुरुषार्थ व्यर्थ है, और वह मर जाना चाहता है; वह शकुनि से अपनी व्यथा धृतराष्ट्र को बताने का अनुरोध करता है।

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.74.1)

वसन्दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ । शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह ॥

vasanduryodhanastasyāṃ sabhāyāṃ puruṣarṣabha | śanairdadarśa tāṃ sarvāṃ sabhāṃ śakuninā saha

हे पुरुषश्रेष्ठ, उस सभा में ठहरे हुए दुर्योधन ने शकुनि के साथ धीरे-धीरे पूरी सभा देखी।

श्लोक 2 (2.74.2)

तस्यां दिव्यानभिप्रायान्ददर्श कुरुनन्दनः । न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्वये ॥

tasyāṃ divyānabhiprāyāndadarśa kurunandanaḥ | na dṛṣṭapūrvā ye tena nagare nāgasāhvaye

उसमें कुरुनन्दन ने ऐसी दिव्य रचनाएँ देखीं, जो उसने हस्तिनापुर में पहले कभी नहीं देखी थीं।

श्लोक 3 (2.74.3)

स कदाचित्सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपतिः । स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया ॥

sa kadācitsabhāmadhye dhārtarāṣṭro mahīpatiḥ | sphāṭikaṃ sthalamāsādya jalamityabhiśaṅkayā

एक बार सभा के बीच में धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्फटिक के एक धरातल पर पहुँचा और उसे जल समझने की शंका से,

श्लोक 4 (2.74.4)

स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान्बुद्धिमोहितः । दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम् ॥

svavastrotkarṣaṇaṃ rājā kṛtavānbuddhimohitaḥ | durmanā vimukhaścaiva paricakrāma tāṃ sabhām

बुद्धि के भ्रम में पड़े राजा ने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। फिर खिन्न-मन और विमुख होकर वह सभा में घूमता रहा।

श्लोक 5 (2.74.5)

ततः स्थले निपतितो दुर्मना व्रीडितो नृपः । निःश्वसन्विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम् ॥

tataḥ sthale nipatito durmanā vrīḍito nṛpaḥ | niḥśvasanvimukhaścāpi paricakrāma tāṃ sabhām

फिर सूखी भूमि पर गिर पड़ने से राजा खिन्न और लज्जित हो गया, और लम्बी साँसें लेता हुआ, मुँह फेरकर सभा में घूमता रहा।

श्लोक 6 (2.74.6)

ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् । वापीं मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतञ्जले ॥

tataḥ sphāṭikatoyāṃ vai sphāṭikāmbujaśobhitām | vāpīṃ matvā sthalamiva savāsāḥ prāpatañjale

फिर स्फटिक-से निर्मल जल वाली, स्फटिक-कमलों से सुशोभित एक बावली को सूखी भूमि मानकर वह वस्त्रों सहित जल में गिर पड़ा।

श्लोक 7 (2.74.7)

जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः । जहास जहसुश्चैव किङ्कराश्च सुयोधनम् ॥

jale nipatitaṃ dṛṣṭvā bhīmaseno mahābalaḥ | jahāsa jahasuścaiva kiṅkarāśca suyodhanam

सुयोधन को जल में गिरा देखकर महाबली भीमसेन हँस पड़े, और सेवक भी उस पर हँसने लगे।

श्लोक 8 (2.74.8)

वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् । तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ॥

vāsāṃsi ca śubhānyasmai pradadū rājaśāsanāt | tathāgataṃ tu taṃ dṛṣṭvā bhīmaseno mahābalaḥ

राजा (युधिष्ठिर) की आज्ञा से उन्होंने उसे सुन्दर वस्त्र दिए। उसकी वह दशा देखकर महाबली भीमसेन,

श्लोक 9 (2.74.9)

अर्जुनश्च यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा । नामर्षयत्ततस्तेषामवहासममर्षणः ॥

arjunaśca yamau cobhau sarve te prāhasaṃstadā | nāmarṣayattatasteṣāmavahāsamamarṣaṇaḥ

अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई — सभी तब हँस पड़े। असहिष्णु दुर्योधन उनका उपहास सह न सका।

श्लोक 10 (2.74.10)

आकारं रक्षमाणस्तु न स तान्समुदैक्षत । पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् ॥

ākāraṃ rakṣamāṇastu na sa tānsamudaikṣata | punarvasanamutkṣipya pratariṣyanniva sthalam

अपने भाव को छिपाते हुए उसने उनकी ओर नहीं देखा। फिर एक सूखे स्थान पर, मानो जल पार करने जा रहा हो, वस्त्र ऊपर उठाकर

श्लोक 11 (2.74.11)

आरुरोह ततः सर्वे जहसुश्च पुनर्जनाः । द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिकं प्रेक्ष्य भूमिपः । प्रविशन्नाहतो मूर्ध्नि व्याघूर्णित इव स्थितः ॥

āruroha tataḥ sarve jahasuśca punarjanāḥ | dvāraṃ tu pihitākāraṃ sphāṭikaṃ prekṣya bhūmipaḥ | praviśannāhato mūrdhni vyāghūrṇita iva sthitaḥ

वह उस पर चढ़ गया; और सब लोग फिर हँस पड़े। फिर स्फटिक का बना, बन्द-सा दिखने वाला एक द्वार देखकर राजा उसमें प्रवेश करते हुए सिर से टकरा गया और चकराया-सा खड़ा रह गया।

श्लोक 12 (2.74.12)

तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकवाटकम् । विघट्टयन्कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात हा ॥

tādṛśaṃ ca paraṃ dvāraṃ sphāṭikorukavāṭakam | vighaṭṭayankarābhyāṃ tu niṣkramyāgre papāta hā

वैसे ही एक दूसरे द्वार को, जिसके किवाड़ स्फटिक के बड़े पटल थे, दोनों हाथों से धकेलते हुए वह बाहर निकला और हाय, आगे की ओर गिर पड़ा।

श्लोक 13 (2.74.13)

द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः । तद्वृत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थानादुपारमत् ॥

dvāraṃ tu vitatākāraṃ samāpede punaśca saḥ | tadvṛttaṃ ceti manvāno dvārasthānādupāramat

फिर वह एक खुले हुए द्वार के पास पहुँचा, पर यह सोचकर कि यहाँ भी वैसा ही होगा, वह द्वार के पास से लौट आया।

श्लोक 14 (2.74.14)

एवं प्रलम्भान्विविधान्प्राप्य तत्र विशाम्पते । पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो दुर्योधनो नृपः ॥

evaṃ pralambhānvividhānprāpya tatra viśāmpate | pāṇḍaveyābhyanujñātastato duryodhano nṛpaḥ

हे प्रजानाथ, वहाँ इस प्रकार अनेक धोखे खाकर राजा दुर्योधन पाण्डवों से अनुमति लेकर,

श्लोक 15 (2.74.15)

अपहृष्टेन मनसा राजसूये महाक्रतौ । प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धिं जगाम गजसाह्वयम् ॥

apahṛṣṭena manasā rājasūye mahākratau | prekṣya tāmadbhutāmṛddhiṃ jagāma gajasāhvayam

राजसूय महायज्ञ में वह अद्भुत वैभव देखकर, उदास मन से हस्तिनापुर चला गया।

श्लोक 16 (2.74.16)

पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छतः । दुर्योधनस्य नृपतेः पापा मतिरजायत ॥

pāṇḍavaśrīprataptasya dhyāyamānasya gacchataḥ | duryodhanasya nṛpateḥ pāpā matirajāyata

पाण्डवों की लक्ष्मी से संतप्त होकर सोचते हुए जाते राजा दुर्योधन के मन में एक पापपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ।

श्लोक 17 (2.74.17)

पार्थान्सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्च वशानुगान् । कृत्स्नं चापि हितं लोकमाकुमारं कुरूद्वह ॥

pārthānsumanaso dṛṣṭvā pārthivāṃśca vaśānugān | kṛtsnaṃ cāpi hitaṃ lokamākumāraṃ kurūdvaha

हे कुरुश्रेष्ठ, पृथा के पुत्रों को प्रसन्नचित्त और राजाओं को उनके अधीन देखकर, और बच्चों तक सारे लोक को उनका हितैषी देखकर,

श्लोक 18 (2.74.18)

महिमानं परं चापि पाण्डवानां महात्मनाम् । दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो विवर्णः समपद्यत ॥

mahimānaṃ paraṃ cāpi pāṇḍavānāṃ mahātmanām | duryodhano dhārtarāṣṭro vivarṇaḥ samapadyata

और महात्मा पाण्डवों की परम महिमा देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन का रंग फीका पड़ गया।

श्लोक 19 (2.74.19)

स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेकोऽन्वचिन्तयत् । श्रियं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ॥

sa tu gacchannanekāgraḥ sabhāmeko'nvacintayat | śriyaṃ ca tāmanupamāṃ dharmarājasya dhīmataḥ

चलते हुए वह व्यग्रचित्त होकर अकेले उस सभा के बारे में और बुद्धिमान् धर्मराज की उस अनुपम लक्ष्मी के बारे में सोचता रहा।

श्लोक 20 (2.74.20)

प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा । नाभ्यभाषत्सुबलजं भाषमाणं पुनः पुनः ॥

pramatto dhṛtarāṣṭrasya putro duryodhanastadā | nābhyabhāṣatsubalajaṃ bhāṣamāṇaṃ punaḥ punaḥ

उस समय विचारों में खोया धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन सुबलपुत्र शकुनि के बार-बार बोलने पर भी उससे कुछ नहीं बोला।

श्लोक 21 (2.74.21)

अनेकाग्रं तु तं दृष्ट्वा शकुनिः प्रत्यभाषत । दुर्योधन कुतोमूलं निःश्वसन्निव गच्छसि ॥

anekāgraṃ tu taṃ dṛṣṭvā śakuniḥ pratyabhāṣata | duryodhana kutomūlaṃ niḥśvasanniva gacchasi

उसे व्यग्र देखकर शकुनि ने कहा — "दुर्योधन, किस कारण से तुम इस प्रकार लम्बी साँसें लेते हुए चल रहे हो?"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 22 (2.74.22)

दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् । जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ॥

dṛṣṭvemāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ yudhiṣṭhiravaśānugām | jitāmastrapratāpena śvetāśvasya mahātmanaḥ

"इस सम्पूर्ण पृथ्वी को युधिष्ठिर के वश में देखकर, जिसे श्वेत अश्वों वाले महात्मा (अर्जुन) ने अपने अस्त्रों के प्रताप से जीता है,

श्लोक 23 (2.74.23)

तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल । यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युतेः ॥

taṃ ca yajñaṃ tathābhūtaṃ dṛṣṭvā pārthasya mātula | yathā śakrasya deveṣu tathābhūtaṃ mahādyuteḥ

"और हे मामा, उस महातेजस्वी पार्थ का वह यज्ञ देखकर, जो देवताओं में इन्द्र के यज्ञ जैसा था,

श्लोक 24 (2.74.24)

अमर्षेण तु सम्पूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् । शुचिशुक्रागमे काले शुष्ये तोयमिवाल्पकम् ॥

amarṣeṇa tu sampūrṇo dahyamāno divāniśam | śuciśukrāgame kāle śuṣye toyamivālpakam

"मैं ईर्ष्या से भरकर दिन-रात जल रहा हूँ; ग्रीष्म ऋतु के आने पर थोड़े-से जल की तरह सूखता जा रहा हूँ।

श्लोक 25 (2.74.25)

पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातितः । न च तत्र पुमानासीत्कश्चित्तस्य पदानुगः ॥

paśya sātvatamukhyena śiśupālo nipātitaḥ | na ca tatra pumānāsītkaścittasya padānugaḥ

"देखो, सात्वतश्रेष्ठ (कृष्ण) ने शिशुपाल को मार गिराया, और वहाँ एक भी पुरुष उसके पक्ष में आगे नहीं आया।

श्लोक 26 (2.74.26)

दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वह्निना । क्षान्तवन्तोऽपराधं ते को हि तत्क्षन्तुमर्हति ॥

dahyamānā hi rājānaḥ pāṇḍavotthena vahninā | kṣāntavanto'parādhaṃ te ko hi tatkṣantumarhati

"पाण्डवों से उठी आग में जलते हुए भी राजाओं ने उस अपराध को क्षमा कर दिया। किन्तु भला उसे कौन क्षमा कर सकता है?

श्लोक 27 (2.74.27)

वासुदेवेन तत्कर्म यथाऽयुक्तं महत्कृतम् । सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम् ॥

vāsudevena tatkarma yathā'yuktaṃ mahatkṛtam | siddhaṃ ca pāṇḍuputrāṇāṃ pratāpena mahātmanām

"वासुदेव ने वह बड़ा कर्म किया, अनुचित होते हुए भी, और महात्मा पाण्डुपुत्रों के प्रताप से वह सफल भी हुआ।

श्लोक 28 (2.74.28)

तथाहि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् । उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदाः ॥

tathāhi ratnānyādāya vividhāni nṛpā nṛpam | upātiṣṭhanta kaunteyaṃ vaiśyā iva karapradāḥ

"इसी प्रकार राजा लोग अनेक प्रकार के रत्न लेकर कुन्तीपुत्र राजा की सेवा में ऐसे उपस्थित हुए, जैसे कर चुकाने वाले वैश्य।

श्लोक 29 (2.74.29)

श्रियं तथागतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे । अमर्षवशमापन्नो दह्यामि न तथोचितः ॥

śriyaṃ tathāgatāṃ dṛṣṭvā jvalantīmiva pāṇḍave | amarṣavaśamāpanno dahyāmi na tathocitaḥ

"पाण्डव के पास ऐसी, मानो धधकती हुई लक्ष्मी देखकर मैं ईर्ष्या के वश में हो गया हूँ और जल रहा हूँ, जबकि मैं ऐसी दशा के योग्य नहीं था।

श्लोक 30 (2.74.30)

वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम् । अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ॥

vahnimeva pravekṣyāmi bhakṣayiṣyāmi vā viṣam | apo vāpi pravekṣyāmi na hi śakṣyāmi jīvitum

"मैं आग में प्रवेश कर जाऊँगा, या विष खा लूँगा, या जल में डूब जाऊँगा; क्योंकि अब मैं जी नहीं सकूँगा।

श्लोक 31 (2.74.31)

को हि नाम पुमांल्लोके मर्षयिष्यति सत्ववान् । सपत्नानृद्ध्यतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च ॥

ko hi nāma pumāṃlloke marṣayiṣyati satvavān | sapatnānṛddhyato dṛṣṭvā hīnamātmānameva ca

"संसार में कौन ऐसा स्वाभिमानी पुरुष होगा जो अपने शत्रुओं को बढ़ते और स्वयं को हीन होते देखकर सहन कर लेगा?

श्लोक 32 (2.74.32)

सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि । योऽहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम् ॥

so'haṃ na strī na cāpyastrī na pumānnāpumānapi | yo'haṃ tāṃ marṣayāmyadya tādṛśīṃ śriyamāgatām

"यदि मैं आज उन्हें प्राप्त हुई ऐसी लक्ष्मी को सहन कर लूँ, तो मैं न स्त्री हूँ, न अस्त्री, न पुरुष हूँ, न अपुरुष।

श्लोक 33 (2.74.33)

ईश्वरत्वं पृथिव्याश्च वसुमत्तां च तादृशीम् । यज्ञं च तादृशं दृष्ट्वा मादृशः को न सञ्ज्वरेत् ॥

īśvaratvaṃ pṛthivyāśca vasumattāṃ ca tādṛśīm | yajñaṃ ca tādṛśaṃ dṛṣṭvā mādṛśaḥ ko na sañjvaret

"पृथ्वी पर ऐसा प्रभुत्व, ऐसी सम्पत्ति और ऐसा यज्ञ देखकर मेरे जैसा कौन होगा जो संतप्त न हो?

श्लोक 34 (2.74.34)

अशक्तश्चैक एवाहं तामाहर्तुं नृपश्रियम् । सहायांश्च न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये ॥

aśaktaścaika evāhaṃ tāmāhartuṃ nṛpaśriyam | sahāyāṃśca na paśyāmi tena mṛtyuṃ vicintaye

"अकेले मैं उस राजलक्ष्मी को छीन लेने में असमर्थ हूँ, और मुझे कोई सहायक दिखाई नहीं देता; इसलिए मैं मृत्यु का विचार कर रहा हूँ।

श्लोक 35 (2.74.35)

दैवमेव परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् । दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा ॥

daivameva paraṃ manye pauruṣaṃ ca nirarthakam | dṛṣṭvā kuntīsute śuddhāṃ śriyaṃ tāmahatāṃ tathā

"कुन्तीपुत्र के पास वह निर्मल और अक्षुण्ण लक्ष्मी देखकर मैं मानता हूँ कि दैव ही सर्वोपरि है और पुरुषार्थ व्यर्थ है।

श्लोक 36 (2.74.36)

कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल । तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम् ॥

kṛto yatno mayā pūrvaṃ vināśe tasya saubala | tacca sarvamatikramya saṃvṛddho'psviva paṅkajam

"हे सुबलपुत्र, मैंने पहले उसके विनाश के प्रयत्न किए थे; परन्तु वह उन सबको पार करके जल में कमल की भाँति बढ़ता गया।

श्लोक 37 (2.74.37)

तेन दैवं परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् । धार्तराष्ट्राश्च हीयन्ते पार्था वर्धन्ति नित्यशः । कृष्णस्तु सुमनास्तेषां विवर्धयति सम्पदः ॥

tena daivaṃ paraṃ manye pauruṣaṃ ca nirarthakam | dhārtarāṣṭrāśca hīyante pārthā vardhanti nityaśaḥ | kṛṣṇastu sumanāsteṣāṃ vivardhayati sampadaḥ

"इसीलिए मैं दैव को ही श्रेष्ठ और पुरुषार्थ को व्यर्थ मानता हूँ — धृतराष्ट्र के पुत्र घटते जा रहे हैं और पृथा के पुत्र नित्य बढ़ रहे हैं; और प्रसन्नचित्त कृष्ण उनकी सम्पत्ति बढ़ाते रहते हैं।

श्लोक 38 (2.74.38)

सोऽहं श्रियं च तां दृष्ट्वा सभां तां च तथाविधाम् । रक्षिभिश्चावहासं तं परितप्ये यथाऽग्निना ॥

so'haṃ śriyaṃ ca tāṃ dṛṣṭvā sabhāṃ tāṃ ca tathāvidhām | rakṣibhiścāvahāsaṃ taṃ paritapye yathā'gninā

"वह लक्ष्मी, वैसी वह सभा और रक्षकों का किया हुआ वह उपहास देखकर मैं मानो आग से संतप्त हो रहा हूँ।

श्लोक 39 (2.74.39)

स मामभ्यनुजानीहि मातुलाद्य सुदुःखितम् । अमर्षं च समाविष्टं धृतराष्ट्रे निवेदय ॥

sa māmabhyanujānīhi mātulādya suduḥkhitam | amarṣaṃ ca samāviṣṭaṃ dhṛtarāṣṭre nivedaya

"इसलिए हे मामा, आज मैं अत्यन्त दुःखी हूँ, मुझे जाने की अनुमति दीजिए; और मुझमें समाए इस क्रोध की बात धृतराष्ट्र को बता दीजिए।"

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