सभा पर्व · अध्याय 75
शकुनि का द्यूत-प्रस्ताव
शकुनि दुर्योधन से कहता है कि वह युधिष्ठिर पर क्रोध न करे — पाण्डव अपने भाग्य का और अपने पराक्रम से अर्जित फल भोग रहे हैं; और दुर्योधन असहाय भी नहीं है, क्योंकि द्रोण, कर्ण, भीष्म, कृप, जयद्रथ आदि उसके साथ हैं। जब दुर्योधन युद्ध में पाण्डवों को जीतने की बात करता है, तो शकुनि चेताता है कि उन्हें देवता भी नहीं हरा सकते, और दूसरा उपाय सुझाता है: युधिष्ठिर को जुआ प्रिय है पर वह खेलना नहीं जानता, और द्यूत में अद्वितीय शकुनि दुर्योधन के लिए उसका राज्य जीत लेगा। शकुनि चाहता है कि दुर्योधन यह बात धृतराष्ट्र से कहे, पर दुर्योधन शकुनि से ही यह कहने का अनुरोध करता है।
शकुनिरुवाच
श्लोक 1 (2.75.1)
दुर्योधन न तेऽमर्षः कार्यः प्रति युधिष्ठिरम् । भागधेयानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ॥
duryodhana na te'marṣaḥ kāryaḥ prati yudhiṣṭhiram | bhāgadheyāni hi svāni pāṇḍavā bhuñjate sadā
"दुर्योधन, तुम्हें युधिष्ठिर पर क्रोध नहीं करना चाहिए; क्योंकि पाण्डव सदा अपने ही भाग्य का फल भोगते हैं।
श्लोक 2 (2.75.2)
विधानं विविधाकारं परं तेषां विधानतः । अनेकैरभ्युपायैश्च त्वया न शकिताः पुरा ॥
vidhānaṃ vividhākāraṃ paraṃ teṣāṃ vidhānataḥ | anekairabhyupāyaiśca tvayā na śakitāḥ purā
"उनके लिए विधाता का विधान अनेक प्रकार का और सर्वोपरि है; अनेक उपायों से भी तुम पहले उन्हें पराजित नहीं कर सके।
श्लोक 3 (2.75.3)
आरब्धा हि महाराज पुनः पुनररिन्दम । विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेयपुरस्कृताः । उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु ॥
ārabdhā hi mahārāja punaḥ punararindama | vimuktāśca naravyāghrā bhāgadheyapuraskṛtāḥ | utsāhavantaḥ puruṣā nāvasīdanti karmasu
"हे महाराज, हे शत्रुदमन, उन पर बार-बार प्रहार किए गए, फिर भी वे नरश्रेष्ठ अपने भाग्य के बल पर बच निकले। उत्साही पुरुष अपने कार्यों में कभी हताश नहीं होते।
श्लोक 4 (2.75.4)
तैर्लब्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह । सहायाः पृथिवीपाला वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥
tairlabdhā draupadī bhāryā drupadaśca sutaiḥ saha | sahāyāḥ pṛthivīpālā vāsudevaśca vīryavān
"उन्होंने द्रौपदी को पत्नी के रूप में पाया, पुत्रों सहित द्रुपद को पाया, पृथ्वी के राजाओं को सहायक के रूप में पाया, और पराक्रमी वासुदेव को भी।
श्लोक 5 (2.75.5)
लब्धश्चानभिभूतार्थैः पित्र्योऽंशः पृथिवीपते । विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना ॥
labdhaścānabhibhūtārthaiḥ pitryo'ṃśaḥ pṛthivīpate | vivṛddhastejasā teṣāṃ tatra kā paridevanā
"हे पृथ्वीपति, जिनके प्रयोजन कभी विफल नहीं हुए, उन्होंने अपना पैतृक भाग प्राप्त किया, और वह उनके तेज से बढ़ता गया। इसमें शोक की क्या बात है?
श्लोक 6 (2.75.6)
धनञ्जयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम् ॥
dhanañjayena gāṇḍīvamakṣayyau ca maheṣudhī | labdhānyastrāṇi divyāni toṣayitvā hutāśanam
"धनञ्जय ने अग्निदेव को सन्तुष्ट करके गाण्डीव धनुष, दो अक्षय महान् तरकश और दिव्य अस्त्र प्राप्त किए।
श्लोक 7 (2.75.7)
तेन कार्मुकमुख्येन बाहुवीर्येण चात्मनः । कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ॥
tena kārmukamukhyena bāhuvīryeṇa cātmanaḥ | kṛtā vaśe mahīpālāstatra kā paridevanā
"उस श्रेष्ठ धनुष और अपनी भुजाओं के बल से उसने राजाओं को वश में किया। इसमें शोक की क्या बात है?
श्लोक 8 (2.75.8)
अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् । सभां तां कारयामास सव्यसाची परन्तपः ॥
agnidāhānmayaṃ cāpi mokṣayitvā sa dānavam | sabhāṃ tāṃ kārayāmāsa savyasācī parantapaḥ
"शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची ने दानव मय को अग्निदाह से बचाया और उससे वह सभा बनवाई।
श्लोक 9 (2.75.9)
तेन चैव मयेनोक्ताः किङ्करा नाम राक्षसाः । वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना ॥
tena caiva mayenoktāḥ kiṅkarā nāma rākṣasāḥ | vahanti tāṃ sabhāṃ bhīmāstatra kā paridevanā
"और उसी मय के कहने पर किंकर नामक भयानक राक्षस उस सभा को उठाए रहते हैं। इसमें शोक की क्या बात है?
श्लोक 10 (2.75.10)
यच्चासहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत । तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगाः ॥
yaccāsahāyatāṃ rājannuktavānasi bhārata | tanmithyā bhrātaro hīme tava sarve vaśānugāḥ
"हे राजन्, हे भारत, तुमने जो अपने असहाय होने की बात कही, वह मिथ्या है; क्योंकि ये तुम्हारे सब भाई तुम्हारे अधीन हैं।
श्लोक 11 (2.75.11)
द्रोणस्तव महेष्वासः सह पुत्रेण वीर्यवान् । सूतपुत्रश्च राधेयो दृढधन्वा महारथः ॥
droṇastava maheṣvāsaḥ saha putreṇa vīryavān | sūtaputraśca rādheyo dṛḍhadhanvā mahārathaḥ
"महाधनुर्धर द्रोण अपने पराक्रमी पुत्र सहित तुम्हारे हैं; और दृढ़ धनुष वाले महारथी सूतपुत्र राधेय (कर्ण) भी।
श्लोक 12 (2.75.12)
स एकः समरे सर्वान्पाण्डवान्सहसोमकान् । विजेष्यति महाबाहो किं सहायैः करिष्यसि ॥
sa ekaḥ samare sarvānpāṇḍavānsahasomakān | vijeṣyati mahābāho kiṃ sahāyaiḥ kariṣyasi
"हे महाबाहु, वह अकेला ही युद्ध में सोमकों सहित सब पाण्डवों को जीत लेगा; तुम्हें सहायकों की क्या आवश्यकता?
श्लोक 13 (2.75.13)
भीष्मश्च पुरुषव्याघ्रो गौतमश्च महारथः । जयद्रथश्च बलवान्सोमदत्तस्तथैव च ॥
bhīṣmaśca puruṣavyāghro gautamaśca mahārathaḥ | jayadrathaśca balavānsomadattastathaiva ca
"पुरुषसिंह भीष्म और महारथी गौतम (कृपाचार्य); बलवान् जयद्रथ और सोमदत्त भी;
श्लोक 14 (2.75.14)
अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च पार्थिवः । एतैस्त्वं सहितः सर्वैर्जय कृत्स्नं वसुन्धराम् ॥
ahaṃ ca saha sodaryaiḥ saumadattiśca pārthivaḥ | etaistvaṃ sahitaḥ sarvairjaya kṛtsnaṃ vasundharām
"मैं स्वयं अपने भाइयों सहित, और राजा सौमदत्ति — इन सबके साथ मिलकर तुम सारी पृथ्वी को जीत लो।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 15 (2.75.15)
त्वया च सहितो राजन्नेतैश्चान्यैर्महारथैः । एतानहं विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ॥
tvayā ca sahito rājannetaiścānyairmahārathaiḥ | etānahaṃ vijeṣyāmi yadi tvamanumanyase
"हे राजन्, यदि आप अनुमति दें तो आपके साथ और इन तथा अन्य महारथियों के साथ मिलकर मैं इन्हें जीत लूँगा।
श्लोक 16 (2.75.16)
एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम । सर्वे च पृथिवीपालाः सभा सा च महाधना ॥
eteṣu vijiteṣvadya bhaviṣyati mahī mama | sarve ca pṛthivīpālāḥ sabhā sā ca mahādhanā
"इनके जीते जाने पर आज ही पृथ्वी मेरी हो जाएगी, सब राजा भी, और वह महाधनसम्पन्न सभा भी।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 17 (2.75.17)
धनञ्जयो वासुदेवो भीमसेनो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च द्रुपदश्च सहात्मजैः ॥
dhanañjayo vāsudevo bhīmaseno yudhiṣṭhiraḥ | nakulaḥ sahadevaśca drupadaśca sahātmajaiḥ
"धनञ्जय, वासुदेव, भीमसेन, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और पुत्रों सहित द्रुपद —
श्लोक 18 (2.75.18)
नैते युधि पराजेतुं शक्या देवगणैरपि । महारथा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥
naite yudhi parājetuṃ śakyā devagaṇairapi | mahārathā maheṣvāsāḥ kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ
"इन्हें युद्ध में देवताओं के समूह भी नहीं हरा सकते। ये महारथी, महाधनुर्धर, अस्त्रविद्या में निपुण और युद्ध में उन्मत्त होकर लड़ने वाले हैं।
श्लोक 19 (2.75.19)
अहं तु तद्विजानामि विजेतुं येन शक्यते । युधिष्ठिरं स्वयं राजंस्तन्निबोध जुषस्व च ॥
ahaṃ tu tadvijānāmi vijetuṃ yena śakyate | yudhiṣṭhiraṃ svayaṃ rājaṃstannibodha juṣasva ca
"परन्तु हे राजन्, मैं वह उपाय जानता हूँ जिससे स्वयं युधिष्ठिर को जीता जा सकता है। उसे सुनो और अपनाओ।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 20 (2.75.20)
अप्रमादेन सुहृदामन्येषां च महात्मनाम् । यदि शक्या विजेतुं ते तन्ममाचक्ष्व मातुल ॥
apramādena suhṛdāmanyeṣāṃ ca mahātmanām | yadi śakyā vijetuṃ te tanmamācakṣva mātula
"हे मामा, यदि हमारे सुहृदों और अन्य महात्माओं को कोई संकट उठाए बिना उन्हें जीता जा सकता हो, तो वह उपाय मुझे बताइए।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 21 (2.75.21)
द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न स जानाति देवितुम् । समाहूतश्च राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम् ॥
dyūtapriyaśca kaunteyo na sa jānāti devitum | samāhūtaśca rājendro na śakṣyati nivartitum
"कुन्तीपुत्र को जुआ प्रिय है, परन्तु वह खेलना नहीं जानता; और बुलाए जाने पर वह राजेन्द्र पीछे नहीं हट सकेगा।
श्लोक 22 (2.75.22)
देवने कुशलश्चाहं न मेऽस्ति सदृशो भुवि । त्रिषु लोकेषु कौरव्य तं त्वं द्यूते समाह्वय ॥
devane kuśalaścāhaṃ na me'sti sadṛśo bhuvi | triṣu lokeṣu kauravya taṃ tvaṃ dyūte samāhvaya
"मैं जुए में कुशल हूँ; हे कौरव्य, पृथ्वी पर ही नहीं, तीनों लोकों में मेरे समान कोई नहीं है। तुम उसे द्यूत के लिए बुलाओ।
श्लोक 23 (2.75.23)
तस्याक्षकुशलो राजन्नादास्येऽहमसंशयम् । राज्यं श्रियं च तां दीप्तां त्वदर्थं पुरुषर्षभ ॥
tasyākṣakuśalo rājannādāsye'hamasaṃśayam | rājyaṃ śriyaṃ ca tāṃ dīptāṃ tvadarthaṃ puruṣarṣabha
"हे राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ, पासों में कुशल मैं निःसन्देह तुम्हारे लिए उसका राज्य और वह दीप्तिमान् लक्ष्मी छीन लूँगा।
श्लोक 24 (2.75.24)
इदं तु सर्वं त्वं राज्ञे दुर्योधन निवेदय । अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तान्न संशयः ॥
idaṃ tu sarvaṃ tvaṃ rājñe duryodhana nivedaya | anujñātastu te pitrā vijeṣye tānna saṃśayaḥ
"दुर्योधन, यह सब तुम राजा (धृतराष्ट्र) को बताओ। तुम्हारे पिता की अनुमति मिलते ही मैं उन्हें जीत लूँगा, इसमें सन्देह नहीं।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 25 (2.75.25)
त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौबल । निवेदय यथान्यायं नाहं शक्ष्ये निवेदितुम् ॥
tvameva kurumukhyāya dhṛtarāṣṭrāya saubala | nivedaya yathānyāyaṃ nāhaṃ śakṣye niveditum
"हे सुबलपुत्र, आप ही कुरुश्रेष्ठ धृतराष्ट्र को यह बात यथोचित रीति से बताइए; मैं उन्हें नहीं बता सकूँगा।"