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सभा पर्व · अध्याय 76

शकुनि द्वारा द्यूत का प्रस्ताव

युधिष्ठिर के राजसूय के बाद हस्तिनापुर लौटकर शकुनि धृतराष्ट्र से कहता है कि दुर्योधन शोक से घुला जा रहा है। पिता के पूछने पर दुर्योधन पाण्डवों के वैभव, उन्हें मिले अपार उपहारों और मय की सभा में हुए अपने उपहास पर अपनी जलन प्रकट करता है। शकुनि कपट-द्यूत से युधिष्ठिर की लक्ष्मी जीत लाने का प्रस्ताव रखता है; धृतराष्ट्र विदुर से परामर्श करना चाहते हैं तो दुर्योधन प्राण त्यागने की धमकी देता है, और राजा एक विशाल द्यूत-सभा बनवाने का आदेश देकर विदुर के विरोध के बावजूद उन्हें युधिष्ठिर को बुलाने भेजते हैं।

अध्याय 75अध्याय-सूचीअध्याय 77

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.76.1)

अनुभूय तु राज्ञस्तं राजसूयं सुदुर्मतिः । युधिष्ठिरस्य शकुनिर्दुर्योधनसुसंयुतः ॥

anubhūya tu rājñastaṃ rājasūyaṃ sudurmatiḥ | yudhiṣṭhirasya śakunirduryodhanasusaṃyutaḥ

राजा युधिष्ठिर का वह राजसूय यज्ञ देखकर अत्यन्त दुर्बुद्धि शकुनि दुर्योधन के साथ-साथ,

श्लोक 2 (2.76.2)

विवेश हास्तिनपुरं दुर्योधनमतेन सः । बाढमित्येव शकुनिर्दृढं हृदि चकार ह ॥

viveśa hāstinapuraṃ duryodhanamatena saḥ | bāḍhamityeva śakunirdṛḍhaṃ hṛdi cakāra ha

दुर्योधन की इच्छा के अनुसार हस्तिनापुर में प्रवेश किया। "ठीक है," कहकर शकुनि ने उस बात को अपने हृदय में दृढ़ता से ठान लिया।

श्लोक 3 (2.76.3)

अस्वस्थतां च तां दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रस्य पापकृत् । भारतानां च दुष्टात्मा क्षयाय हि नृपक्षयः ॥

asvasthatāṃ ca tāṃ dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrasya pāpakṛt | bhāratānāṃ ca duṣṭātmā kṣayāya hi nṛpakṣayaḥ

धृतराष्ट्र के पुत्र की वह व्याकुलता देखकर उस पापी, दुष्टात्मा, राजाओं के विनाशक ने भरतवंशियों के विनाश का निश्चय कर लिया।

श्लोक 4 (2.76.4)

प्रियकृन्मतमाज्ञाय पूर्वं दुर्योधनस्य तत् । प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौबलस्तदा ॥

priyakṛnmatamājñāya pūrvaṃ duryodhanasya tat | prajñācakṣuṣamāsīnaṃ śakuniḥ saubalastadā

दुर्योधन का मनोभाव पहले से जानकर, उसका प्रिय करने वाला सुबलपुत्र शकुनि तब प्रज्ञाचक्षु राजा के पास गया, जो वहाँ बैठे थे।

श्लोक 5 (2.76.5)

दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम् । उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमब्रवीत् ॥

duryodhanavacaḥ śrutvā dhṛtarāṣṭraṃ janādhipam | upagamya mahāprājñaṃ śakunirvākyamabravīt

दुर्योधन की बात सुनकर शकुनि परम बुद्धिमान नरेश धृतराष्ट्र के पास पहुँचा और बोला।

शकुनिरुवाच

श्लोक 6 (2.76.6)

दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिणः कृशः । दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप ॥

duryodhano mahārāja vivarṇo hariṇaḥ kṛśaḥ | dīnaścintāparaścaiva taṃ viddhi manujādhipa

महाराज! दुर्योधन का रंग उड़ गया है, वह पीला और दुबला हो गया है, दीन और चिन्ता में डूबा रहता है। हे नरेश, इसे जान लीजिए।

श्लोक 7 (2.76.7)

न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसंभवम् । ज्येष्ठपुत्रस्य हृच्छोकं किमर्थं नावबुध्यसे ॥

na vai parīkṣase samyagasahyaṃ śatrusaṃbhavam | jyeṣṭhaputrasya hṛcchokaṃ kimarthaṃ nāvabudhyase

आप ठीक से परखते नहीं। आपके ज्येष्ठ पुत्र के हृदय में शत्रुओं के कारण उपजा यह असह्य शोक है; आप इसे क्यों नहीं समझते?

श्लोक 8 (2.76.8)

एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । दुर्योधनं समाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥

evamuktaḥ śakuninā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | duryodhanaṃ samāhūya idaṃ vacanamabravīt

शकुनि के ऐसा कहने पर नरेश धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को बुलाकर यह बात कही।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 9 (2.76.9)

दुर्योधन कुतोमूलं भृशमार्तोऽसि पुत्रक । श्रोतव्यश्चेन्मया सोऽर्थो ब्रूहि मे कुरुनन्दन ॥

duryodhana kutomūlaṃ bhṛśamārto'si putraka | śrotavyaścenmayā so'rtho brūhi me kurunandana

दुर्योधन! बेटा, तुम्हारे इस गहरे दुःख का मूल क्या है? यदि वह बात मुझे सुननी चाहिए, तो हे कुरुनन्दन, मुझे बताओ।

श्लोक 10 (2.76.10)

अयं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम् । चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम् ॥

ayaṃ tvāṃ śakuniḥ prāha vivarṇaṃ hariṇaṃ kṛśam | cintayaṃśca na paśyāmi śokasya tava sambhavam

यह शकुनि मुझसे कहता है कि तुम्हारा रंग उड़ गया है, तुम पीले और दुबले हो गए हो; पर सोचने पर भी मुझे तुम्हारे शोक का कोई कारण नहीं दिखता।

श्लोक 11 (2.76.11)

ऐश्वर्यं हि महत्पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम् ॥

aiśvaryaṃ hi mahatputra tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam | bhrātaraḥ suhṛdaścaiva nācaranti tavāpriyam

बेटा, यह सारा महान ऐश्वर्य तुम्हीं में प्रतिष्ठित है। तुम्हारे भाई और मित्र तुम्हारा कोई अप्रिय नहीं करते।

श्लोक 12 (2.76.12)

आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् । आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः ॥

ācchādayasi prāvārānaśnāsi piśitaudanam | ājāneyā vahantyaśvāḥ kenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ

तुम उत्तम दुशाले ओढ़ते हो, मांस और भात खाते हो, उत्तम जाति के घोड़े तुम्हें ले जाते हैं। फिर किस कारण तुम पीले और दुबले हो गए हो?

श्लोक 13 (2.76.13)

शयनानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः । गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम् ॥

śayanāni mahārhāṇi yoṣitaśca manoramāḥ | guṇavanti ca veśmāni vihārāśca yathāsukham

बहुमूल्य शय्याएँ, मनोहर स्त्रियाँ, सुसज्जित भवन और इच्छानुसार विहार-स्थल —

श्लोक 14 (2.76.14)

देवानामिव ते सर्वं वाचि बद्धं न संशयः । स दीन इव दुर्धर्ष कस्माच्छोचसि पुत्रक ॥

devānāmiva te sarvaṃ vāci baddhaṃ na saṃśayaḥ | sa dīna iva durdharṣa kasmācchocasi putraka

देवताओं की भाँति यह सब निःसन्देह तुम्हारे वचन के अधीन है। तब हे दुर्धर्ष पुत्र, तुम दीन की तरह शोक क्यों करते हो?

श्लोक 15 (2.76.15)

मात्रा पित्रा च पुत्रस्य यद्वै कार्यं परं स्मृतम् । प्राप्तस्त्वमसि तत्तात निखिलां नः कुलश्रियम् ॥

mātrā pitrā ca putrasya yadvai kāryaṃ paraṃ smṛtam | prāptastvamasi tattāta nikhilāṃ naḥ kulaśriyam

माता-पिता का पुत्र के प्रति जो सबसे बड़ा कर्तव्य माना गया है, वह तुम्हें मिल चुका है, तात — हमारे कुल की सम्पूर्ण लक्ष्मी।

श्लोक 16 (2.76.16)

उपस्थितः सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा । विविधैरन्नपानैश्च प्रवरैः किं नु शोचसि ॥

upasthitaḥ sarvakāmaistridive vāsavo yathā | vividhairannapānaiśca pravaraiḥ kiṃ nu śocasi

स्वर्ग में इन्द्र की भाँति तुम्हें सब मनचाही वस्तुएँ और नाना प्रकार के उत्तम अन्न-पान उपलब्ध हैं; फिर तुम शोक क्यों करते हो?

श्लोक 17 (2.76.17)

निरुक्तं निगमं छन्दः षडङ्गान्यस्त्रशास्त्रवान् । अधीती कृतविद्यस्त्वं दशव्याकरणैः कृपात् ॥

niruktaṃ nigamaṃ chandaḥ ṣaḍaṅgānyastraśāstravān | adhītī kṛtavidyastvaṃ daśavyākaraṇaiḥ kṛpāt

निरुक्त, निगम, छन्द, छहों वेदांग और शस्त्र-शास्त्र तुमने सीखे हैं; तुम विद्वान हो, कृपाचार्य से दस व्याकरणों सहित शिक्षा पाए हुए।

श्लोक 18 (2.76.18)

हलायुधात्कृपाद्द्रोणादस्त्रविद्यामधीतवान् । भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये किमु शोचसि पुत्रक ॥

halāyudhātkṛpāddroṇādastravidyāmadhītavān | bhrātṛjyeṣṭhaḥ sthito rājye kimu śocasi putraka

हलायुध (बलराम), कृप और द्रोण से तुमने अस्त्रविद्या सीखी है। भाइयों में ज्येष्ठ होकर तुम राज्य पर प्रतिष्ठित हो; फिर बेटा, तुम शोक क्यों करते हो?

श्लोक 19 (2.76.19)

पृथग्जनैरलभ्यं यदशनाच्छादनं बहु । प्रभुः सन्भुञ्जसे पुत्र संस्तुतः सूतमागधैः ॥

pṛthagjanairalabhyaṃ yadaśanācchādanaṃ bahu | prabhuḥ sanbhuñjase putra saṃstutaḥ sūtamāgadhaiḥ

जो प्रचुर भोजन और वस्त्र साधारण लोगों को नहीं मिलते, उन्हें तुम स्वामी बनकर भोगते हो, बेटा, और सूत-मागध तुम्हारी स्तुति करते हैं।

श्लोक 20 (2.76.20)

तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् । लोकेऽस्मिञ्ज्येष्ठभागन्यस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥

tasya te viditaprajña śokamūlamidaṃ katham | loke'smiñjyeṣṭhabhāganyastanmamācakṣva pṛcchataḥ

तब हे प्रसिद्ध बुद्धि वाले, तुम्हारे इस शोक का मूल क्या है? इस संसार में और कौन ज्येष्ठ का भाग पाने वाला है? मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (2.76.21)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मन्दः क्रोधवशानुगः । पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन् ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā mandaḥ krodhavaśānugaḥ | pitaraṃ pratyuvācedaṃ svamatiṃ samprakāśayan

पिता की यह बात सुनकर क्रोध के वश में पड़े मन्दबुद्धि दुर्योधन ने अपना मन खोलते हुए उन्हें यह उत्तर दिया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 22 (2.76.22)

अश्नाम्याच्छादये चाहं यथा कुपुरुषस्तथा । अमर्षं धारये चोग्रं निनीषुः कालपर्ययम् ॥

aśnāmyācchādaye cāhaṃ yathā kupuruṣastathā | amarṣaṃ dhāraye cograṃ ninīṣuḥ kālaparyayam

मैं किसी तुच्छ पुरुष की तरह बस खाता हूँ और कपड़े पहनता हूँ। मैं भीतर उग्र असहिष्णुता धारण किए हूँ और समय के पलटने की प्रतीक्षा में हूँ।

श्लोक 23 (2.76.23)

अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय परं स्थितः । क्लेशान्मुमुक्षुः परजान्स वै पुरुष उच्यते ॥

amarṣaṇaḥ svāḥ prakṛtīrabhibhūya paraṃ sthitaḥ | kleśānmumukṣuḥ parajānsa vai puruṣa ucyate

जो अपमान सहन नहीं करता, अपनी प्रजा को वश में करके सर्वोपरि स्थित रहता है और शत्रुओं से उपजे क्लेशों से छूटना चाहता है, वही पुरुष कहलाता है।

श्लोक 24 (2.76.24)

सन्तोषो वै श्रियं हन्ति ह्यभिमानं च भारत । अनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत् ॥

santoṣo vai śriyaṃ hanti hyabhimānaṃ ca bhārata | anukrośabhaye cobhe yairvṛto nāśnute mahat

हे भारत, सन्तोष लक्ष्मी को नष्ट करता है, और अभिमान भी; दया और भय — ये दोनों भी। जो इनसे घिरा है, वह कुछ महान नहीं पाता।

श्लोक 25 (2.76.25)

न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे । अतिज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम ॥

na māṃ prīṇāti madbhuktaṃ śriyaṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhire | atijvalantīṃ kaunteye vivarṇakaraṇīṃ mama

युधिष्ठिर के पास, उस कुन्तीपुत्र में, अत्यन्त दमकती हुई वह लक्ष्मी देखकर — जो मेरा रंग उड़ा देती है — मुझे अपना भोग भी प्रसन्न नहीं करता।

श्लोक 26 (2.76.26)

सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीयमानं निशाम्य च । अदृश्यामपि कौन्तेये श्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ॥

sapatnānṛdhyato''tmānaṃ hīyamānaṃ niśāmya ca | adṛśyāmapi kaunteye śriyaṃ paśyannivodyatām

अपने शत्रुओं को बढ़ते और स्वयं को घटते देखकर, कुन्तीपुत्र की वह लक्ष्मी आँखों से ओझल होने पर भी मुझे अपने सामने उठी हुई-सी दिखती है।

श्लोक 27 (2.76.27)

तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः । अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ॥

tasmādahaṃ vivarṇaśca dīnaśca hariṇaḥ kṛśaḥ | aṣṭāśītisahasrāṇi snātakā gṛhamedhinaḥ

इसी कारण मैं विवर्ण, दीन, पीला और दुबला हो गया हूँ। अठासी हज़ार स्नातक गृहस्थ —

श्लोक 28 (2.76.28)

त्रिंशद्दासीक एकैको यान्बिभर्ति युधिष्ठिरः । दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् । भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥

triṃśaddāsīka ekaiko yānbibharti yudhiṣṭhiraḥ | daśānyāni sahasrāṇi yatīnāmūrdhvaretasām | bhuñjate rukmapātrībhiryudhiṣṭhiraniveśane

जिनमें से प्रत्येक के पास तीस दासियाँ हैं — युधिष्ठिर पालते हैं; और दस हज़ार अन्य ऊर्ध्वरेता यति युधिष्ठिर के महल में सोने की थालियों में भोजन करते हैं।

श्लोक 29 (2.76.29)

कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च । काम्भोजः प्राहिणोत्तस्मै परार्ध्यानपि कम्बलान् । गजयोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥

kadalīmṛgamokāni kṛṣṇaśyāmāruṇāni ca | kāmbhojaḥ prāhiṇottasmai parārdhyānapi kambalān | gajayoṣidgavāśvasya śataśo'tha sahasraśaḥ

काम्बोजराज ने उन्हें कदली मृगों की काली, साँवली और लाल खालें, बहुमूल्य कम्बल, और सैकड़ों-हज़ारों हाथी, स्त्रियाँ, गौएँ और घोड़े भेजे।

श्लोक 30 (2.76.30)

त्रिंशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत । राजन्या बलिमादाय समेता हि नृपक्षये ॥

triṃśataṃ coṣṭravāmīnāṃ śatāni vicarantyuta | rājanyā balimādāya sametā hi nṛpakṣaye

वहाँ तीन हज़ार ऊँटनियाँ भी विचरती हैं, और क्षत्रिय राजा कर लेकर राजा के भवन में एकत्र हुए हैं।

श्लोक 31 (2.76.31)

पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते । आहरन्क्रतुमुख्येऽस्मिन्कुन्तीपुत्राय भूरिशः ॥

pṛthagvidhāni ratnāni pārthivāḥ pṛthivīpate | āharankratumukhye'sminkuntīputrāya bhūriśaḥ

हे पृथ्वीपति, उस श्रेष्ठ यज्ञ में राजाओं ने कुन्तीपुत्र के लिए नाना प्रकार के रत्न प्रचुर मात्रा में भेंट किए।

श्लोक 32 (2.76.32)

न क्वचिद्धि मया तादृग्दृष्टपूर्वो न च श्रुतः । यादृग्धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥

na kvaciddhi mayā tādṛgdṛṣṭapūrvo na ca śrutaḥ | yādṛgdhanāgamo yajñe pāṇḍuputrasya dhīmataḥ

पाण्डु के बुद्धिमान पुत्र के यज्ञ में जैसा धन आया, वैसा मैंने पहले कभी न देखा, न सुना।

श्लोक 33 (2.76.33)

असत्यं चेदिदं सर्वं सञ्जयं प्रष्टुमर्हसि । अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप । शर्म नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते ॥

asatyaṃ cedidaṃ sarvaṃ sañjayaṃ praṣṭumarhasi | aparyantaṃ dhanaughaṃ taṃ dṛṣṭvā śatrorahaṃ nṛpa | śarma naivābhigacchāmi cintayāno viśāmpate

यदि यह सब असत्य लगे तो आप संजय से पूछ लीजिए। हे राजन्, शत्रु के धन की वह अनन्त बाढ़ देखकर मैं उसी की चिन्ता में डूबा रहता हूँ और मुझे शान्ति नहीं मिलती।

श्लोक 34 (2.76.34)

ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसङ्घशः । त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

brāhmaṇā vāṭadhānāśca gomantaḥ śatasaṅghaśaḥ | trikharvaṃ balimādāya dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

ब्राह्मण, और लहलहाते खेतों वाले, गौओं से सम्पन्न लोग, सैकड़ों के झुण्डों में, तीन खर्व का कर लेकर द्वार पर रोके हुए खड़े रहते हैं।

श्लोक 35 (2.76.35)

कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्शुभान् । त्रैखर्वाः प्रतिवेद्यास्मै लेभिरेऽथ प्रवेशनम् ॥

kamaṇḍalūnupādāya jātarūpamayāñśubhān | traikharvāḥ prativedyāsmai lebhire'tha praveśanam

सोने के सुन्दर कमण्डलु लेकर, तीन खर्व लाने वालों ने अपने आगमन की सूचना दी, तभी उन्हें भीतर जाने मिला।

श्लोक 36 (2.76.36)

यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रियः । तदस्मै कांस्यमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः ॥

yathaiva madhu śakrāya dhārayantyamarastriyaḥ | tadasmai kāṃsyamāhārṣīdvāruṇaṃ kalaśodadhiḥ

जैसे देवांगनाएँ इन्द्र के लिए मधु धारण करती हैं, वैसे ही समुद्र ने उनके लिए वरुण का काँसे का कलश भेंट किया।

श्लोक 37 (2.76.37)

शङ्खप्रवरमादाय वासुदेवोऽभिषिक्तवान् । शैक्यं रुक्मसहस्रस्य बहुरत्नविभूषितम् ॥

śaṅkhapravaramādāya vāsudevo'bhiṣiktavān | śaikyaṃ rukmasahasrasya bahuratnavibhūṣitam

वासुदेव ने श्रेष्ठ शंख लेकर उनका अभिषेक किया; और छींके पर रखा एक पात्र भी था, जो हज़ार स्वर्ण-मुद्राओं से बना और अनेक रत्नों से अलंकृत था।

श्लोक 38 (2.76.38)

दृष्ट्वा च मम तत्सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् । गृहीत्वा तत्तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ ॥

dṛṣṭvā ca mama tatsarvaṃ jvararūpamivābhavat | gṛhītvā tattu gacchanti samudrau pūrvadakṣiṇau

वह सब देखकर मुझे मानो ज्वर चढ़ गया। लोग पात्र लेकर पूर्वी और दक्षिणी समुद्रों तक जाते हैं,

श्लोक 39 (2.76.39)

तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ । उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिणः । तत्र गत्वाऽर्जुनो दण्डमाजहारामितं धनम् ॥

tathaiva paścimaṃ yānti gṛhītvā bharatarṣabha | uttaraṃ tu na gacchanti vinā tāta patatriṇaḥ | tatra gatvā'rjuno daṇḍamājahārāmitaṃ dhanam

और वैसे ही, हे भरतश्रेष्ठ, पश्चिमी समुद्र तक भी जाते हैं; पर उत्तरी समुद्र तक, तात, पक्षियों के सिवा कोई नहीं जाता। फिर भी अर्जुन ने वहाँ जाकर अपार धन कर के रूप में ले लिया।

श्लोक 40 (2.76.40)

कृतां बैन्दुसरै रत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम् । अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ॥

kṛtāṃ baindusarai ratnairmayena sphāṭikacchadām | apaśyaṃ nalinīṃ pūrṇāmudakasyeva bhārata

हे भारत, मैंने मय द्वारा बिन्दुसर के रत्नों से बनाई, स्फटिक से ढकी एक कमल-तलैया देखी, जो जल से भरी हुई-सी लगती थी।

श्लोक 41 (2.76.41)

उत्कर्षन्तं च वासश्च प्राहसन्मां वृकोदरः । किङ्कराश्च सभापाला जहसुर्भरतर्षभ ॥

utkarṣantaṃ ca vāsaśca prāhasanmāṃ vṛkodaraḥ | kiṅkarāśca sabhāpālā jahasurbharatarṣabha

जब मैंने अपना वस्त्र ऊपर उठाया, तो वृकोदर मुझ पर हँस पड़ा, और हे भरतश्रेष्ठ, सेवक और सभा के रक्षक भी हँसे।

श्लोक 42 (2.76.42)

पित्रोरर्थे विशेषेण प्रावृण्वं तत्र जीवितम् । तत्र स्म यदि शक्तः स्यां घातयेयं वृकोदरम् ॥

pitrorarthe viśeṣeṇa prāvṛṇvaṃ tatra jīvitam | tatra sma yadi śaktaḥ syāṃ ghātayeyaṃ vṛkodaram

विशेषकर माता-पिता के कारण मैंने वहाँ अपने प्राणों को संयम में रखा; यदि उस समय मुझमें सामर्थ्य होता तो मैं वृकोदर को मरवा डालता।

श्लोक 43 (2.76.43)

सपत्नेनापहासो हि स मां दहति भारत ॥

sapatnenāpahāso hi sa māṃ dahati bhārata

हे भारत, शत्रु द्वारा किया गया वह उपहास मुझे जलाता है।

श्लोक 44 (2.76.44)

तत्र स्फाटिकतोयां हि स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् । सभां पुष्करिणीं मत्वा पतितोऽस्मि नराधिप ॥

tatra sphāṭikatoyāṃ hi sphāṭikāmbujaśobhitām | sabhāṃ puṣkariṇīṃ matvā patito'smi narādhipa

हे नरेश, वहाँ स्फटिक के जल और स्फटिक के कमलों से सुशोभित सभा को सरोवर समझकर मैं गिर पड़ा।

श्लोक 45 (2.76.45)

तत्र मामहसद्भीमः सह पार्थेन सस्वरम् । द्रौपदी च सह स्त्रीभिः पातयन्ती मनो मम ॥

tatra māmahasadbhīmaḥ saha pārthena sasvaram | draupadī ca saha strībhiḥ pātayantī mano mama

वहाँ भीम पार्थ के साथ ज़ोर से मुझ पर हँसा, और द्रौपदी भी स्त्रियों के साथ हँसी, जिससे मेरा मन बैठ गया।

श्लोक 46 (2.76.46)

क्लिन्नवस्त्रस्य च जले किङ्करा राजचोदिताः । ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखतरं मम ॥

klinnavastrasya ca jale kiṅkarā rājacoditāḥ | dadurvāsāṃsi me'nyāni tacca duḥkhataraṃ mama

जल में मेरे कपड़े भीग गए थे, तो राजा की आज्ञा से सेवकों ने मुझे दूसरे वस्त्र दिए; वह मेरे लिए और भी अधिक दुःखदायी था।

श्लोक 47 (2.76.47)

अस्तम्भा इव तिष्ठन्ति स्तम्भा इव सहस्रशः । सोऽहं तत्राहतो राजन्स्फटिकाभ्यन्तरे विभो ॥

astambhā iva tiṣṭhanti stambhā iva sahasraśaḥ | so'haṃ tatrāhato rājansphaṭikābhyantare vibho

वहाँ हज़ारों ऐसी वस्तुएँ खम्भों जैसी खड़ी हैं जो खम्भे नहीं हैं; हे राजन्, हे प्रभो, वहाँ उस स्फटिक के भीतर मुझे चोट लगी।

श्लोक 48 (2.76.48)

अद्वारेण विनिर्गच्छन्द्वारसंस्थानरूपिणा । अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः ॥

advāreṇa vinirgacchandvārasaṃsthānarūpiṇā | abhihatya śilāṃ bhūyo lalāṭenāsmi vikṣataḥ

द्वार के आकार वाले, पर वास्तव में द्वार न होने वाले मार्ग से बाहर निकलते हुए मैं फिर पत्थर से टकराया और मेरा माथा कट गया।

श्लोक 49 (2.76.49)

आमृशन्निव तां दृष्ट्वा मार्गान्तरमुपाविशम् । इदं द्वारमिदं राजन्नद्वारमिति मां प्रति । अद्भुतं प्रहसन्वाक्यं बभाषे स वृकोदरः ॥

āmṛśanniva tāṃ dṛṣṭvā mārgāntaramupāviśam | idaṃ dvāramidaṃ rājannadvāramiti māṃ prati | adbhutaṃ prahasanvākyaṃ babhāṣe sa vṛkodaraḥ

उसे देखकर मैं मानो टटोलता हुआ दूसरे मार्ग पर गया। तब वृकोदर ने हँसते हुए मुझसे उपहास भरी बात कही — "राजन्, यह द्वार है, वह द्वार नहीं है।"

श्लोक 50 (2.76.50)

स्त्रियश्च तत्र मां दृष्ट्वा जहसुस्तादृशं नृप । सर्वं हासकरं तेषां सदस्यानां नरर्षभ ॥

striyaśca tatra māṃ dṛṣṭvā jahasustādṛśaṃ nṛpa | sarvaṃ hāsakaraṃ teṣāṃ sadasyānāṃ nararṣabha

हे राजन्, वहाँ की स्त्रियाँ भी मुझे उस दशा में देखकर हँसीं; हे नरश्रेष्ठ, उन सभासदों के लिए सब कुछ हँसी का विषय बन गया।

श्लोक 51 (2.76.51)

न श्रुतानि न दृष्टानि यानि रत्नानि मे क्वचित् । तानि मे तत्र दृष्टानि तेन तप्तोऽस्मि दुःखितः ॥

na śrutāni na dṛṣṭāni yāni ratnāni me kvacit | tāni me tatra dṛṣṭāni tena tapto'smi duḥkhitaḥ

जो रत्न मैंने कभी कहीं न सुने थे, न देखे थे, वे मैंने वहाँ देखे; इसी से मैं सन्तप्त और दुःखी हूँ।

श्लोक 52 (2.76.52)

हुताशनं प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि महोदधिम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥

hutāśanaṃ pravekṣyāmi pravekṣyāmi mahodadhim | sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate

मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा, महासागर में कूद पड़ूँगा; सम्मानित पुरुष के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।

श्लोक 53 (2.76.53)

इदं चाद्भुतमत्रासीत्तन्मे निगदतः शृणु ॥

idaṃ cādbhutamatrāsīttanme nigadataḥ śṛṇu

और वहाँ यह अद्भुत बात भी हुई, उसे मुझसे सुनिए।

श्लोक 54 (2.76.54)

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुञ्जतां सदा । स्थापितस्तत्र सञ्ज्ञार्थं शङ्खो ध्मायति नित्यशः ॥

pūrṇe śatasahasre tu viprāṇāṃ bhuñjatāṃ sadā | sthāpitastatra sañjñārthaṃ śaṅkho dhmāyati nityaśaḥ

जब-जब पूरे एक लाख ब्राह्मण भोजन कर लेते, तब-तब वहाँ संकेत के लिए रखा गया शंख बजाया जाता — निरन्तर।

श्लोक 55 (2.76.55)

मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत । अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् ॥

muhurmuhuḥ praṇadatastasya śaṅkhasya bhārata | aniśaṃ śabdamaśrauṣaṃ tato romāṇi me'hṛṣan

हे भारत, बार-बार गूँजते उस शंख का स्वर मैं निरन्तर सुनता रहा, और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

श्लोक 56 (2.76.56)

पार्थिवैर्बहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः । अशोभत महाराज नक्षत्रैर्द्यौरिवामला ॥

pārthivairbahubhiḥ kīrṇamupasthānaṃ didṛkṣubhiḥ | aśobhata mahārāja nakṣatrairdyaurivāmalā

हे महाराज, दर्शन के इच्छुक अनेक राजाओं से भरी वह सभा ऐसी शोभित थी जैसे तारों से भरा निर्मल आकाश।

श्लोक 57 (2.76.57)

सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर । यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥

sarvaratnānyupādāya pārthivā vai janeśvara | yajñe tasya mahārāja pāṇḍuputrasya dhīmataḥ

हे जनेश्वर, हे महाराज, सब प्रकार के रत्न लेकर राजा पाण्डु के उस बुद्धिमान पुत्र के यज्ञ में उपस्थित थे;

श्लोक 58 (2.76.58)

वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः । न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन्युधिष्ठिरे ॥

vaiśyā iva mahīpālā dvijātipariveṣakāḥ | na sā śrīrdevarājasya yamasya varuṇasya ca | guhyakādhipatervāpi yā śrī rājanyudhiṣṭhire

पृथ्वी के स्वामी वैश्यों की भाँति द्विजों को भोजन परोस रहे थे। हे राजन्, जो लक्ष्मी युधिष्ठिर के पास है, वैसी न देवराज के पास है, न यम के, न वरुण के, न गुह्यकों के स्वामी कुबेर के पास।

श्लोक 59 (2.76.59)

तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम् । शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ॥

tāṃ dṛṣṭvā pāṇḍuputrasya śriyaṃ paramikāmaham | śāntiṃ na parigacchāmi dahyamānena cetasā

पाण्डुपुत्र की वह परम लक्ष्मी देखकर मुझे शान्ति नहीं मिलती; मेरा मन जलता रहता है।

श्लोक 60 (2.76.60)

अप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं शमो मम न विद्यते । अरीन्बाणैः शाययिष्ये शयिष्ये वा हतः परैः ॥

aprāpya pāṇḍavaiśvaryaṃ śamo mama na vidyate | arīnbāṇaiḥ śāyayiṣye śayiṣye vā hataḥ paraiḥ

पाण्डवों का ऐश्वर्य पाए बिना मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। मैं शत्रुओं को बाणों से सुला दूँगा, या शत्रुओं से मारा जाकर स्वयं सो जाऊँगा।

श्लोक 61 (2.76.61)

एतादृशस्य मे किं तु जीवितेन परन्तप । वर्धन्ते पाण्डवा राजन्वयं हि स्थितवृद्धयः ॥

etādṛśasya me kiṃ tu jīvitena parantapa | vardhante pāṇḍavā rājanvayaṃ hi sthitavṛddhayaḥ

हे परन्तप, ऐसी दशा में मेरे जीने से क्या लाभ? हे राजन्, पाण्डव बढ़ते जा रहे हैं और हम जहाँ थे वहीं रुके हैं।

शकुनिरुवाच

श्लोक 62 (2.76.62)

यामेतामतुलां लक्ष्मीं दृष्टवानसि पाण्डवे । तस्याः प्राप्तावुपायं मे शृणु सत्यपराक्रम ॥

yāmetāmatulāṃ lakṣmīṃ dṛṣṭavānasi pāṇḍave | tasyāḥ prāptāvupāyaṃ me śṛṇu satyaparākrama

हे सत्यपराक्रमी, पाण्डव के पास तुमने जो अतुलनीय लक्ष्मी देखी है, उसे पाने का उपाय मुझसे सुनो।

श्लोक 63 (2.76.63)

अहमक्षेष्वभिज्ञोऽस्मि पृथिव्यामपि भारत । हृदयज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने ॥

ahamakṣeṣvabhijño'smi pṛthivyāmapi bhārata | hṛdayajñaḥ paṇajñaśca viśeṣajñaśca devane

हे भारत, पृथ्वी भर में मैं पासों का जानकार हूँ; मैं द्यूत का मर्म, दाँव और उसकी बारीकियाँ सब जानता हूँ।

श्लोक 64 (2.76.64)

द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न च जानाति देवितुम् । आहूतश्चैष्यति व्यक्तं नित्यमेवाह्वयत्स्वयम् ॥

dyūtapriyaśca kaunteyo na ca jānāti devitum | āhūtaścaiṣyati vyaktaṃ nityamevāhvayatsvayam

कुन्तीपुत्र को द्यूत प्रिय है, पर वह खेलना नहीं जानता। बुलाने पर वह अवश्य आएगा; वह तो स्वयं सदा दूसरों को खेलने के लिए ललकारता रहा है।

श्लोक 65 (2.76.65)

नियतं तं विजेष्यामि कृत्वा तु कपटं विभो । आनयामि समृद्धिं तां दिव्यां चोपाह्वयस्व तम् ॥

niyataṃ taṃ vijeṣyāmi kṛtvā tu kapaṭaṃ vibho | ānayāmi samṛddhiṃ tāṃ divyāṃ copāhvayasva tam

हे प्रभो, मैं कपट करके उसे निश्चय ही जीत लूँगा और वह दिव्य समृद्धि यहाँ ले आऊँगा। इसलिए उसे बुलाओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 66 (2.76.66)

एवमुक्तः शकुनिना राजा दुर्योधनस्ततः । धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥

evamuktaḥ śakuninā rājā duryodhanastataḥ | dhṛtarāṣṭramidaṃ vākyamapadāntaramabravīt

शकुनि के ऐसा कहने पर राजा दुर्योधन ने बिना रुके धृतराष्ट्र से यह बात कही —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 67 (2.76.67)

अयमुत्सहते राजञ्श्रियमाहर्तुमक्षवित् । द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

ayamutsahate rājañśriyamāhartumakṣavit | dyūtena pāṇḍuputrasya tadanujñātumarhasi

राजन्, पासों का यह जानकार द्यूत द्वारा पाण्डुपुत्र की लक्ष्मी छीन लाने का उत्साह रखता है; आप इसकी अनुमति दीजिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 68 (2.76.68)

क्षत्ता मन्त्री महाप्राज्ञः स्थितो यस्यास्मि शासने । तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥

kṣattā mantrī mahāprājñaḥ sthito yasyāsmi śāsane | tena saṅgamya vetsyāmi kāryasyāsya viniścayam

मेरे परम बुद्धिमान मन्त्री क्षत्ता (विदुर), जिनके परामर्श पर मैं चलता हूँ — उनसे मिलकर मैं इस कार्य का निर्णय जानूँगा।

श्लोक 69 (2.76.69)

स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम् । उभयोः पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम् ॥

sa hi dharmaṃ puraskṛtya dīrghadarśī paraṃ hitam | ubhayoḥ pakṣayoryuktaṃ vakṣyatyarthaviniścayam

क्योंकि वे दूरदर्शी हैं और धर्म को आगे रखते हैं; वे दोनों पक्षों के लिए उचित और परम हितकर निर्णय बताएँगे।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 70 (2.76.70)

निवर्तयिष्यति त्वाऽसौ यदि क्षत्ता समेष्यति । निवृत्ते त्वयि राजेन्द्र मरिष्येऽहमसंशयम् ॥

nivartayiṣyati tvā'sau yadi kṣattā sameṣyati | nivṛtte tvayi rājendra mariṣye'hamasaṃśayam

यदि क्षत्ता आ गए तो वे आपको रोक देंगे; और हे राजेन्द्र, यदि आप रुक गए तो मैं निःसन्देह मर जाऊँगा।

श्लोक 71 (2.76.71)

स त्वं मयि मृते राजन्विदुरेण सुखी भव । भोक्ष्यसे पृथिवीं कृत्स्नां किं मया त्वं करिष्यसि ॥

sa tvaṃ mayi mṛte rājanvidureṇa sukhī bhava | bhokṣyase pṛthivīṃ kṛtsnāṃ kiṃ mayā tvaṃ kariṣyasi

राजन्, मेरे मर जाने पर आप विदुर के साथ सुखी रहिए। आप सारी पृथ्वी भोगिए; मुझसे आपको क्या काम?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 72 (2.76.72)

आर्तवाक्यं तु तत्तस्य प्रणयोक्तं निशम्य सः । धृतराष्ट्रोऽब्रवीत्प्रेष्यन्दुर्योधनमते स्थितः ॥

ārtavākyaṃ tu tattasya praṇayoktaṃ niśamya saḥ | dhṛtarāṣṭro'bravītpreṣyanduryodhanamate sthitaḥ

उसके स्नेह से कहे गए वे आर्त वचन सुनकर दुर्योधन के मत पर स्थिर धृतराष्ट्र ने सेवकों से कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 73 (2.76.73)

स्थूणासहस्रैर्बृहतीं शतद्वारां सभां मम । मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तु शिल्पिनः ॥

sthūṇāsahasrairbṛhatīṃ śatadvārāṃ sabhāṃ mama | manoramāṃ darśanīyāmāśu kurvantu śilpinaḥ

शिल्पी शीघ्र ही मेरे लिए हज़ार खम्भों और सौ द्वारों वाली एक विशाल, मनोहर और दर्शनीय सभा बनाएँ।

श्लोक 74 (2.76.74)

ततः संस्तीर्य रत्नैस्तां तक्ष्ण आनाय्य सर्वशः । सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मेऽशनैः ॥

tataḥ saṃstīrya ratnaistāṃ takṣṇa ānāyya sarvaśaḥ | sukṛtāṃ supraveśāṃ ca nivedayata me'śanaiḥ

फिर सब ओर से बढ़ई बुलवाकर और उसे रत्नों से सजाकर, जब वह भली-भाँति बन जाए और उसमें प्रवेश सुगम हो जाए, तब मुझे शीघ्र सूचित करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 75 (2.76.75)

दुर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः । धृतराष्ट्रो महाराज प्राहिणोद्विदुराय वै ॥

duryodhanasya śāntyarthamiti niścitya bhūmipaḥ | dhṛtarāṣṭro mahārāja prāhiṇodvidurāya vai

हे महाराज, दुर्योधन की शान्ति के लिए ऐसा निश्चय करके राजा धृतराष्ट्र ने विदुर के पास सन्देश भेजा।

श्लोक 76 (2.76.76)

अपृष्ट्वा विदुरं स्वस्य नासीत्कश्चिद्विनिश्चयः । द्यूते दोषांश्च जानन्स पुत्रस्नेहादकृष्यत ॥

apṛṣṭvā viduraṃ svasya nāsītkaścidviniścayaḥ | dyūte doṣāṃśca jānansa putrasnehādakṛṣyata

विदुर से पूछे बिना उनका अपना कोई निश्चय नहीं होता था। द्यूत के दोष जानते हुए भी वे पुत्र-स्नेह से खिंचे चले गए।

श्लोक 77 (2.76.77)

तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान्कलिद्वारमुपस्थितम् । विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत् ॥

tacchrutvā viduro dhīmānkalidvāramupasthitam | vināśamukhamutpannaṃ dhṛtarāṣṭramupādravat

यह सुनकर बुद्धिमान विदुर, कलियुग का द्वार सामने और विनाश का मुख खुलता देखकर, धृतराष्ट्र के पास दौड़े आए।

श्लोक 78 (2.76.78)

सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम् । मूर्ध्ना प्रणम्य चरणाविदं वचनमब्रवीत् ॥

so'bhigamya mahātmānaṃ bhrātā bhrātaramagrajam | mūrdhnā praṇamya caraṇāvidaṃ vacanamabravīt

अपने महात्मा बड़े भाई के पास पहुँचकर भाई विदुर ने उनके चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया और यह बात कही।

विदुर उवाच

श्लोक 79 (2.76.79)

नाभिनन्दामि ते राजन्व्यवसायमिमं प्रभो । पुत्रैर्भेदो यथा न स्याद्द्यूतहेतोस्तथा कुरु ॥

nābhinandāmi te rājanvyavasāyamimaṃ prabho | putrairbhedo yathā na syāddyūtahetostathā kuru

हे राजन्, हे प्रभो, मैं आपके इस निश्चय का अनुमोदन नहीं करता। ऐसा कीजिए कि द्यूत के कारण आपके पुत्रों में फूट न पड़े।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 80 (2.76.80)

क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैर्मे कलहो न भविष्यति । यदि देवाः प्रसादं नः करिष्यन्ति न संशयः ॥

kṣattaḥ putreṣu putrairme kalaho na bhaviṣyati | yadi devāḥ prasādaṃ naḥ kariṣyanti na saṃśayaḥ

क्षत्ता, यदि देवता हम पर कृपा करें तो निःसन्देह मेरे पुत्रों और उनके भाइयों में कलह नहीं होगी।

श्लोक 81 (2.76.81)

अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाऽहितम् । प्रवर्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशयः ॥

aśubhaṃ vā śubhaṃ vāpi hitaṃ vā yadi vā'hitam | pravartatāṃ suhṛddyūtaṃ diṣṭametanna saṃśayaḥ

शुभ हो या अशुभ, हितकर हो या अहितकर — यह मैत्रीपूर्ण द्यूत होने दो; यह निःसन्देह विधि का विधान है।

श्लोक 82 (2.76.82)

मयि सन्निहिते द्रोणे भीष्मे त्वयि च भारत । अनयो दैवविहितो न कथञ्चिद्भविष्यति ॥

mayi sannihite droṇe bhīṣme tvayi ca bhārata | anayo daivavihito na kathañcidbhaviṣyati

हे भारत, जब मैं, द्रोण, भीष्म और तुम यहाँ उपस्थित हैं, तब दैव का रचा कोई अनर्थ किसी प्रकार नहीं होगा।

श्लोक 83 (2.76.83)

गच्छ त्वं रथमास्थाय हयैर्वातसमैर्जवे । खाण्डवप्रस्थमद्यैव समानय युधिष्ठिरम् ॥

gaccha tvaṃ rathamāsthāya hayairvātasamairjave | khāṇḍavaprasthamadyaiva samānaya yudhiṣṭhiram

जाओ, वायु के समान वेग वाले घोड़ों से जुते रथ पर बैठकर आज ही खाण्डवप्रस्थ से युधिष्ठिर को ले आओ।

श्लोक 84 (2.76.84)

न वाच्यो व्यवसायो मे विदुरैतद्ब्रवीमि ते । दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ॥

na vācyo vyavasāyo me viduraitadbravīmi te | daivameva paraṃ manye yenaitadupapadyate

विदुर, मैं तुमसे कहता हूँ — मेरे इस निश्चय के विरुद्ध कुछ न कहना। मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ, जिससे यह सब हो रहा है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 85 (2.76.85)

इत्युक्तो विदुरो धीमान्नेदमस्तीति चिन्तयन् । आपगेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत्सुदुःखितः ॥

ityukto viduro dhīmānnedamastīti cintayan | āpageyaṃ mahāprājñamabhyagacchatsuduḥkhitaḥ

ऐसा कहे जाने पर बुद्धिमान विदुर "यह उचित नहीं है" ऐसा सोचते हुए अत्यन्त दुःखी होकर परम ज्ञानी गंगापुत्र भीष्म के पास गए।

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